-Friday World 24 May 2026
तेहरान/ ईरान और अमेरिका के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर ईरानी सरकारी मीडिया ने साफ संकेत दिया है कि बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, लेकिन अभी भी 1 या 2 अहम मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है। ईरानी पक्ष अमेरिका पर अड़ियल रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है।
ईरान की प्रमुख सरकारी समाचार एजेंसी तसनीम ने रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दोनों पक्षों के बीच “एक या दो” मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। एजेंसी के अनुसार, इन मुद्दों पर अमेरिका की तरफ से अड़चन के कारण समझौता अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है।
पाकिस्तान मध्यस्थ को दी गई जानकारी
तसनीम ने आगे बताया कि ईरान ने मध्यस्थ भूमिका निभा रहे पाकिस्तान को अपने रुख के बारे में पूरी जानकारी दे दी है। यदि अमेरिका अपनी अड़चन जारी रखता है तो समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता।
दूसरी ओर, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी समाचार एजेंसी फार्स ने उन मुद्दों का स्पष्ट जिक्र किया है जिन पर सहमति नहीं बन पाई है। फार्स के मुताबिक, विवाद के मुख्य बिंदु हैं:
- ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां (frozen assets)
- तेल और तेल से जुड़े उत्पादों पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध**
पृष्ठभूमि: लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध
ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव 2015 के JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौते के अमेरिका द्वारा 2018 में एकतरफा तरीके से बाहर निकलने के बाद बढ़ गया था। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिसके कारण ईरानी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा।
बाइडेन प्रशासन के दौरान कुछ दौर की अप्रत्यक्ष बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अब 2026 में नई अमेरिकी प्रशासन के साथ ईरान फिर से डील की संभावना तलाश रहा है। ईरानी मीडिया की ताजा रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि दोनों पक्ष काफी करीब पहुंच चुके हैं, लेकिन आखिरी बाधा अभी बाकी है।
ईरान का रुख सख्त क्यों?
ईरानी नेतृत्व बार-बार कह चुका है कि वह किसी भी समझौते में अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा। खासतौर पर:
- फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्ति को तुरंत रिलीज किए बिना कोई डील स्वीकार्य नहीं।
- तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में पूर्ण छूट।
- IRGC को आतंकवादी संगठन की सूची से हटाने या कम से कम आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग।
फार्स एजेंसी की रिपोर्ट में इन मुद्दों को “मुख्य अड़चन” बताया गया है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
यह संभावित समझौता न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों को प्रभावित करेगा बल्कि पूरे मध्य पूर्व की जियो-पॉलिटिक्स को बदल सकता है।
- इजराइल इस डील का कड़ा विरोधी रहा है।
- सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी सतर्क नजर आ रहे हैं।
- चीन और रूस ईरान के करीबी सहयोगी के रूप में इस प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं।
यदि समझौता हो जाता है तो ईरानी तेल बाजार में वापसी से वैश्विक तेल कीमतों पर असर पड़ेगा। वहीं, अगर बातचीत विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
ईरानी मीडिया का संदेश
तसनीम और फार्स जैसी सरकारी एजेंसियां आमतौर पर ईरानी सरकार के आधिकारिक रुख को ही प्रतिबिंबित करती हैं। इसलिए इन रिपोर्ट्स को ईरान की विदेश नीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। ईरान स्पष्ट रूप से कह रहा है कि वह **“सम्मानजनक और निष्पक्ष”** समझौते को तैयार है, लेकिन अमेरिका को अपनी “अड़ियल” नीति छोड़नी होगी।
क्या है आगे का रास्ता?
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के अलावा ओमान और कतर जैसे देश भी मध्यस्थता की भूमिका में सक्रिय हैं। दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता (indirect talks) जारी बताई जा रही है।
ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई और राष्ट्रपति ने पहले ही साफ कर दिया है कि देश की परमाणु गतिविधियां और क्षेत्रीय प्रभाव “अपनी जगह” पर रहेंगे। कोई भी समझौता इन लाल रेखाओं के अंदर ही हो सकता है।
ईरानी सरकारी मीडिया की ताजा रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि ईरान-अमेरिका समझौता अब “अंतिम चरण” में है, लेकिन **अमेरिका की अड़चन** अभी भी बाधा बन रही है। फ्रीज संपत्तियों और तेल प्रतिबंधों जैसे मुद्दों का हल निकलता है तो डील हो सकती है, अन्यथा बातचीत फिर लंबी खिंच सकती है।
यह घटनाक्रम न केवल ईरान के 90 मिलियन नागरिकों के आर्थिक भविष्य को प्रभावित करेगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और मध्य पूर्व की स्थिरता को भी आकार देगा।
क्या अमेरिका अपनी जिद छोड़ेगा या ईरान और कड़ा रुख अपनाएगा? आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक गतिविधियां इस सवाल का जवाब तय करेंगी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 24 May 2026