-Friday World 24 May 2026
छत्तीसगढ़ के सुदूर जंगलों में बहू की ममता ने सबको भावुक कर दिया
रायपुर। मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक कर्तव्य की मिसाल पेश करने वाली एक मार्मिक घटना छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट क्षेत्र से सामने आई है। जहां एक बहू ने अपनी 90 वर्षीय बीमार सास को पीठ पर लादकर करीब 9 किलोमीटर लंबे पथरीले रास्ते, नाले और जंगलों को पार करते हुए बैंक पहुंचाया, ताकि उनकी रुकी हुई वृद्धा पेंशन निकल सके।
यह कहानी है सोमारी बाई और उनकी बहू रुकमनिया की।
संघर्ष की मिसाल बनी तस्वीर
जंगलपारा गांव, जहां सड़कें नहीं, बिजली-इंटरनेट की पहुंच सीमित और आवागमन का कोई साधन नहीं है। यहां रहने वाली सोमारी बाई आदिवासी समाज से हैं। उम्र 90 वर्ष, स्वास्थ्य ठीक नहीं। तीन महीने से उनकी 1500 रुपये मासिक वृद्धा पेंशन रुकी हुई थी। परिवार के लिए यह राशि बहुत महत्वपूर्ण थी।
जब समस्या बढ़ी तो बहू रुकमनिया ने कोई बहाना नहीं बनाया। उन्होंने अपनी सास को पीठ पर लादा, पथरीले रास्तों और नाले को पार किया और मैनपाट स्थित सेंट्रल बैंक तक पहुंची। इस पूरे सफर में रुकमनिया का दृढ़ संकल्प और सास के प्रति अटूट लगाव देखने लायक था।
बैंक पहुंचकर क्या हुआ?
बैंक प्रबंधक अल्ताफ मिर्जा ने बताया कि केवाईसी (KYC) प्रक्रिया पूरी न होने के कारण खाता फ्रीज हो गया था। रुकमनिया की मेहनत रंग लाई। बैंक स्टाफ ने तुरंत केवाईसी पूरी की, मोबाइल नंबर लिंक किया और आगे से पेंशन राशि बैंक मित्र के माध्यम से घर पहुंचाने का भरोसा दिया।
प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया
मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन भी सक्रिय हो गया। मैनपाट के एसडीएम फागेश सिन्हा की टीम गांव पहुंची। उन्होंने सोमारी बाई और रुकमनिया से मुलाकात की। एसडीएम ने घोषणा की कि अब रुकमनिया को अधिकृत किया जाएगा, ताकि भविष्य में बुजुर्ग महिला को इस कष्टदायक सफर से न गुजरना पड़े।
ग्रामीण भारत की हकीकत
यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह पूरे ग्रामीण और आदिवासी भारत की हकीकत को उजागर करती है। जहां विकास की मुख्यधारा से दूर बसे गांवों में सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं।
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन जैसी योजनाएं चली आ रही हैं, लेकिन पहुंच और क्रियान्वयन में कमी स्पष्ट दिखती है। सड़कों की कमी, परिवहन सुविधाओं का अभाव और जागरूकता की कमी कई बुजुर्गों को पेंशन से वंचित रखती है।
रुकमनिया जैसी बहुएं इस समाज की रीढ़ हैं। जो न केवल अपने परिवार की देखभाल करती हैं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों को भी निभाती हैं। उनकी इस ममता ने साबित कर दिया कि रिश्तों की मधुरता अभी भी जिंदा है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि ऐसी घटनाओं से दो बातें स्पष्ट होती हैं:
1. ग्रामीण क्षेत्रों में डोर-स्टेप डिलीवरी सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है।
2. पेंशन जैसी योजनाओं में केवाईसी और अन्य प्रक्रियाओं को और सरल बनाना चाहिए, खासकर बुजुर्गों और आदिवासी समुदायों के लिए।
सकारात्मक निष्कर्ष
सोमारी बाई की पेंशन अब नियमित रूप से घर पहुंचेगी। लेकिन सबसे बड़ी जीत यह है कि एक बहू की लगन ने पूरे सिस्टम को जागृत कर दिया।
रुकमनिया ने साबित किया कि "रिश्ते खून के नहीं, प्यार के होते हैं" । उनकी इस यात्रा ने न केवल अपनी सास की समस्या हल की बल्कि हजारों लोगों के दिलों को छू लिया।
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विकास की असली मापदंड सड़कें, पुल और इमारतें नहीं, बल्कि इंसानियत, संवेदना और पारिवारिक मूल्य हैं।
जंगलपारा गांव की यह घटना अब पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है। उम्मीद है कि ऐसी कहानियां और आएंगी, लेकिन अगली बार किसी को 9 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक न जाना पड़े।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 24 May 2026