-Friday world 8/2/2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित शताब्दी वर्षगांठ कार्यक्रम में एक ऐसा बयान दिया है, जिसने सामाजिक-राजनीतिक चर्चाओं में नई हलचल मचा दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि
यह बयान जाति व्यवस्था पर संघ की सोच को बिल्कुल साफ करता है और हिंदुत्व की एकता पर जोर देता है।
शताब्दी वर्ष में बड़ा संदेश: जाति नहीं, हिंदुत्व है योग्यता मुंबई के व्याख्यानमाला कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने कहा, "संघ का सरसंघचालक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं बन सकता। कोई विशेष जाति का होना जरूरी नहीं है। केवल एक ही शर्त है—वह हिंदू होना चाहिए।" उन्होंने आगे जोड़ा कि
"एससी/एसटी का होना कोई अयोग्यता नहीं है और ब्राह्मण होना कोई विशेष योग्यता नहीं है।"
यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RSS की स्थापना से अब तक के अधिकांश सरसंघचालक ब्राह्मण रहे हैं। डॉ. हेडगेवार से लेकर मोहन भागवत तक, पांच में से अधिकांश ब्राह्मण पृष्ठभूमि के रहे हैं। केवल चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह 'रज्जू भैया' राजपूत थे। लेकिन भागवत ने स्पष्ट किया कि शुरुआती दौर में ब्राह्मणों की संख्या अधिक होने के कारण ऐसा हुआ, पर अब संगठन में जाति कोई मापदंड नहीं है।
पद की पसंदगी और संगठन की परंपरा भागवत ने सरसंघचालक की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी रोशनी डाली। उन्होंने बताया कि यह पद चुनाव से नहीं, बल्कि प्रादेशिक और प्रांतीय स्तर के प्रमुखों की सर्वसम्मति से चुना जाता है। संगठन ही अंतिम निर्णय लेता है, व्यक्ति नहीं।
अपनी उम्र और पद पर रहने के बारे में उन्होंने कहा, "सामान्यतः 75 वर्ष के बाद पद छोड़ने की परंपरा है। मैंने संघ को अपनी उम्र के बारे में सूचित किया था, लेकिन संगठन ने मुझे काम जारी रखने को कहा। मैं पद छोड़ सकता हूं, लेकिन काम से कभी नहीं। जब भी संघ कहेगा, मैं तुरंत पद छोड़ दूंगा।"
यह बयान RSS की अनुशासनपूर्ण और संगठन-केंद्रित संस्कृति को दर्शाता है, जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर संगठन का हित होता है।
स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणादायक संदेश कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा, "जीवन में चुनौतियां और सुविधाएं आती-जाती रहेंगी, लेकिन हमें समस्या पर नहीं, समाधान पर फोकस करना चाहिए। संघ के इतिहास में कभी किसी को जबरदस्ती रिटायर नहीं किया गया, बल्कि हृदय से काम करने की प्रेरणा दी जाती है।"
क्या अब SC/ST से बनेगा RSS प्रमुख? भागवत के इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—
क्या भविष्य में RSS का सरसंघचालक अनुसूचित जाति या जनजाति से होगा? संगठन ने बार-बार जाति-आधारित भेदभाव को नकारा है और हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया है। यह बयान समाज में समानता और हिंदुत्व की भावना को मजबूत करने की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान RSS की 100 वर्षीय यात्रा में एक नया अध्याय खोल सकता है, जहां जाति की दीवारें टूटकर केवल हिंदू पहचान मजबूत हो। लेकिन क्या यह व्यावहारिक रूप से लागू होगा? समय ही बताएगा। फिलहाल, यह बयान निश्चित रूप से दलित, आदिवासी और अन्य वंचित वर्गों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
RSS का यह संदेश स्पष्ट है—जातिवाद से ऊपर उठकर हिंदुत्व की एकता ही संगठन की असली ताकत है। मुंबई का यह कार्यक्रम शताब्दी वर्ष की शुरुआत में ही एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो रहा है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday world 8/2/2026