September 02, 2026
बम से शांति या टेबल पर समझौता? ओबामा की 2015 डील आज भी क्यों दे रही है दुनिया को सबसे बड़ा सबक
बम से शांति या टेबल पर समझौता? ओबामा की 2015 डील आज भी क्यों दे रही है दुनिया को सबसे बड़ा सबक
जब दुनिया ईरान के परमाणु प्रोग्राम को लेकर जंग के मुहाने पर खड़ी थी, तब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक अलग रास्ता चुना - बातचीत का। उनका मानना था कि डिप्लोमेसी से वह हासिल किया जा सकता है जिसकी गारंटी बम कभी नहीं दे सकते।
- Friday World 3 Sap 2026
जब दुनिया ईरान के परमाणु प्रोग्राम को लेकर जंग के मुहाने पर खड़ी थी, तब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने एक अलग रास्ता चुना - बातचीत का। उनका मानना था कि डिप्लोमेसी से वह हासिल किया जा सकता है जिसकी गारंटी बम कभी नहीं दे सकते।
2015 में हुई ईरान न्यूक्लियर डील, जिसे JCPOA कहा जाता है, इसी सोच का नतीजा थी। इस डील के तहत ईरान ने अपने एनरिच्ड यूरेनियम स्टॉक का लगभग 97% हिस्सा छोड़ दिया। उसने अपने हजारों सेंट्रीफ्यूज बंद किए और सबसे बड़ी बात, इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) को अपने परमाणु ठिकानों की कड़ी निगरानी की इजाजत दी।
ओबामा ने तब कहा था कि यह नतीजा बिना एक भी मिसाइल दागे, बिना बड़े पैमाने पर लोगों की जान लिए और बिना होर्मुज स्ट्रेट जैसे दुनिया के सबसे अहम तेल रूट को बंद किए हासिल हुआ है। यह एक ऐसी जीत थी जो सिर्फ कागज पर नहीं, जमीन पर दिख रही थी।
डील ने क्या दिया?
इस समझौते के समर्थक आज भी तीन बातों को इसकी सबसे बड़ी सफलता मानते हैं। पहला, ईरान का परमाणु प्रोग्राम 1 साल से ज्यादा पीछे धकेल दिया गया। अगर ईरान बम बनाना भी चाहता, तो उसे कम से कम एक साल का ब्रेकआउट टाइम लगता। दूसरा, IAEA को 24 घंटे कैमरे और इंस्पेक्टर रखने की छूट मिली, जो इतिहास में सबसे सख्त निगरानी में से एक थी। तीसरा, मिडिल ईस्ट में एक बड़ी जंग टल गई।
बदले में ईरान को प्रतिबंधों में राहत दी गई, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था सांस ले सके।
आलोचना क्यों हुई?
लेकिन इस डील के आलोचक भी कम नहीं थे। उनका तर्क था कि इस डील की कई पाबंदियां टेम्पररी थीं। इन्हें ‘सनसेट क्लॉज’ कहा गया। मतलब, 10 से 15 साल बाद ये पाबंदियां अपने आप खत्म हो जाएंगी। ईरान के पास नॉलेज और इंफ्रास्ट्रक्चर तो रहेगा ही, वह बाद में फिर से प्रोग्राम शुरू कर सकता है।
यह बहस 2018 में और तेज हो गई जब अमेरिका खुद इस डील से बाहर निकल गया। इसके बाद ईरान ने भी धीरे-धीरे अपने प्रोग्राम को फिर से बढ़ाना शुरू कर दिया। यूरेनियम एनरिचमेंट 3.67% से बढ़ाकर 60% तक कर दिया, जो बम बनाने के लेवल के बहुत करीब है।
कुछ लोग कहते हैं कि यही इस डील की सबसे बड़ी कमजोरी थी - यह पॉलिटिकल कंटिन्यूटी पर निर्भर थी। एक राष्ट्रपति ने बनाई, दूसरे ने तोड़ दी। वहीं दूसरे गुट का कहना है कि टाइम-लिमिटेड डील भी बिना डील से बेहतर होती है। कम से कम 10 साल का संकट तो टला, डी-एस्केलेशन का मौका तो मिला।
असली सवाल: रिस्क किससे कम होता है?
आर्म्स कंट्रोल का इतिहास यही कहता है कि परफेक्ट और परमानेंट सॉल्यूशन कभी नहीं मिलता। हमेशा एक ‘वेरिफाइड पॉज’ यानी जांचा-परखा ठहराव ही मिलता है।
आज जब अमेरिका और ईरान फिर से एक-दूसरे पर मिसाइलें दाग रहे हैं, होर्मुज स्ट्रेट में तेल के जहाजों पर हमले हो रहे हैं, और कुवैत से लेकर जॉर्डन तक अमेरिकी बेस निशाने पर हैं, तो ओबामा का वह सवाल फिर जिंदा हो गया है।
क्या बम गिराकर ईरान की परमाणु क्षमता को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है? एक्सपर्ट्स कहते हैं नहीं। बमबारी से प्रोग्राम 2-3 साल पीछे जाएगा, लेकिन ईरान का वैज्ञानिक ज्ञान और बदले की भावना और बढ़ेगी। वहीं, एक लागू होने वाली डील, भले ही टाइम-लिमिटेड हो, रिस्क को कम करती है, इंस्पेक्शन का रास्ता खोलती है और तेल बाजार को स्थिर रखती है।
दूसरी तरफ, बिना डील के हर दिन युद्ध का खतरा बना रहता है, जिसमें हजारों जानें जा सकती हैं और दुनिया की इकॉनमी हिल सकती है।
तो आप कहाँ खड़े हैं? क्या एक अधूरी लेकिन लागू होने वाली डील, बिना किसी डील से बेहतर है? या यह सिर्फ एक बड़ी प्रॉब्लम को कुछ सालों के लिए टालना है?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 3 Sap 2026
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