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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Saturday, 20 June 2026

June 20, 2026

શનિવારે સભામંડપ બન્યો શમશાન: પરભણીના યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં છત ધરાશાયી, 6 ભક્તોના મોત, 40થી વધુ દટાયા

શનિવારે સભામંડપ બન્યો શમશાન: પરભણીના યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં છત ધરાશાયી, 6 ભક્તોના મોત, 40થી વધુ દટાયા
-Friday World 20 Jun 2026
પરભણી | 20 જૂન 2026:
 શ્રદ્ધાનું કેન્દ્ર અચાનક શોકનું ઘર બની ગયું. મહારાષ્ટ્રના પરભણી જિલ્લાના માનવત તાલુકાના યશવાડી ગામે આવેલા પ્રસિદ્ધ મારૂતિ મંદિરમાં શનિવારનો દિવસ કાળ બનીને ત્રાટક્યો. હનુમાનજીના દર્શન અને કીર્તન માટે ઉમટેલા સેંકડો શ્રદ્ધાળુઓ પર સભામંડપની જર્જરિત છત અચાનક કડડભૂસ થઈને તૂટી પડી. આ હૃદયદ્રાવક દુર્ઘટનામાં 6 નિર્દોષ ભક્તોએ જીવ ગુમાવ્યા છે, જ્યારે 25થી વધુ લોકો ગંભીર રીતે ઘાયલ થયા છે. 7c025dec

શું બની ઘટના?
શનિવાર હનુમાનજીનો વાર હોવાથી યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં સવારથી જ ભક્તોની ભારે ભીડ હતી. બપોરના સમયે મંદિરના સભામંડપમાં કીર્તન અને ધાર્મિક કાર્યક્રમ ચાલી રહ્યો હતો. મંડપમાં લગભગ 100થી વધુ શ્રદ્ધાળુઓ બેઠા હતા ત્યારે જ અચાનક સમગ્ર છત ધડાકાભેર નીચે પડી. એક ક્ષણમાં ભજન-કીર્તનના સૂર ચીસોમાં ફેરવાઈ ગયા. નાસભાગ મચી ગઈ અને ધૂળની ડમરીઓથી આખો પરિસર છવાઈ ગયો. આ દ્રશ્યો મંદિરના CCTV કેમેરામાં પણ કેદ થયા છે. 29137c02

કાટમાળ નીચે જીવ માટે જંગ
પ્રાથમિક અંદાજ મુજબ 30 થી 40 લોકો કાટમાળ નીચે દબાયા હતા. ઘટનાની જાણ થતાં જ સ્થાનિક લોકો અને શ્રદ્ધાળુઓએ તાત્કાલિક બચાવ કામગીરી શરૂ કરી દીધી. થોડી જ વારમાં જિલ્લા વહીવટીતંત્ર, પોલીસ અને NDRFની ટીમો ઘટનાસ્થળે પહોંચી ગઈ અને યુદ્ધના ધોરણે કામગીરી શરૂ કરી. અત્યાર સુધીમાં લગભગ 25 લોકોને સુરક્ષિત બહાર કાઢવામાં આવ્યા છે. ઘાયલોને માનવત અને પરભણીની સરકારી હોસ્પિટલમાં ખસેડવામાં આવ્યા છે. 5dec2913

પોલીસ અધિકારીએ જણાવ્યું કે આ ઘટના શનિવારે બપોરે બની હતી. કાટમાળ હટાવવાની કામગીરી હજુ ચાલુ છે અને મૃત્યુઆંક વધવાની ભીતિ સેવાઈ રહી છે. 5dec

વહીવટીતંત્ર એલર્ટ પર
ઘટનાને પગલે સમગ્ર વિસ્તારને કોર્ડન કરી લેવામાં આવ્યો છે. મેઘના બોર્ડીકરે જિલ્લા કલેક્ટર અને પોલીસ અધિક્ષક સાથે સતત સંપર્કમાં રહીને બચાવ કામગીરી પર નજર રાખી છે. અધિકારીઓએ જણાવ્યું કે પરિસ્થિતિ પર સતત નજર રાખવામાં આવી રહી છે અને ટૂંક સમયમાં વિગતવાર માહિતી શેર કરવામાં આવશે. 2913

સવાલોના વર્તુળમાં સભામંડપ
યશવાડી મારૂતિ મંદિર આ વિસ્તારનું જૂનું અને પ્રસિદ્ધ ધામ છે. શનિવારે અહીં મોટી સંખ્યામાં ભાવિકો દર્શન માટે આવે છે. સૂત્રોનું માનીએ તો સભામંડપનું બાંધકામ ઘણું જૂનું હતું. ચોમાસા પહેલા મંદિર પરિસરનું સ્ટ્રક્ચરલ ઓડિટ થયું હતું કે નહીં, તે હવે તપાસનો વિષય બન્યો છે. મંદિરોમાં સભામંડપ, નાટમંડપ જેવા બાંધકામો ભક્તો એકઠા થવા માટે જ હોય છે. પણ જો તેની જાળવણી ન થાય તો શ્રદ્ધાનું સ્થળ જોખમી બની જાય છે. 6a45

સરકાર દ્વારા સહાયની જાહેરાત
મુખ્યમંત્રી કાર્યાલય દ્વારા દુર્ઘટના પર દુઃખ વ્યક્ત કરવામાં આવ્યું છે. પ્રાથમિક માહિતી મુજબ મૃતકોના પરિવારજનોને 5 લાખ અને ગંભીર ઘાયલોને 50 હજારની સહાય આપવાની જાહેરાત થઈ શકે છે. સમગ્ર ઘટનાની ઉચ્ચસ્તરીય તપાસના આદેશ પણ આપવામાં આવ્યા છે.

શ્રદ્ધા અને અંધશ્રદ્ધા વચ્ચેની ભેદરેખા જાળવણી છે. મંદિરો, સભામંડપો માત્ર આસ્થાના નહીં, સુરક્ષાના કેન્દ્રો પણ બનવા જોઈએ. યશવાડીની આ ઘટના તંત્ર અને મંદિર ટ્રસ્ટો માટે લાલબત્તી સમાન છે. કીર્તનના સૂર બંધ થયા, પણ એમ્બ્યુલન્સના સાયરન હજુ ચાલુ છે. જે ભક્તો દર્શન કરવા આવ્યા હતા, તેમના પરિવારજનો હવે હોસ્પિટલના દરવાજે આશા અને પ્રાર્થના સાથે ઉભા છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 20 Jun 2026
June 20, 2026

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'
- Friday World 20 Jun 2026
अमेरिका की विदेश नीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान ने लैटिन अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ट्रंप प्रशासन की नजरें क्यूबा पर टिक गई हैं। एक प्राइवेट इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो क्यूबा में भी अमेरिका वैसा ही अभियान चला सकता है जैसा वेनेजुएला में चलाया गया था। 

ट्रंप का बयान: 'क्यूबा अमेरिका के बहुत करीब है'
इंटरव्यू के दौरान जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या क्यूबा में संभावित अमेरिकी ऑपरेशन वेनेजुएला जैसा हो सकता है, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया - 'संभव है।' ट्रंप ने कहा कि क्यूबा की भौगोलिक स्थिति उसे अलग बनाती है। यह देश अमेरिका से सिर्फ 90 मील दूर है। इसलिए वहां की कोई भी अस्थिरता सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा हितों को प्रभावित करती है। 

हालांकि ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि उनकी पहली प्राथमिकता हमेशा शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन ही रहेगी। लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो सैन्य विकल्पों को भी टेबल से हटाया नहीं गया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ महीनों से अमेरिका लगातार क्यूबा पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है।

अमेरिका का बढ़ता दबाव: प्रतिबंधों से लेकर सैन्य चेतावनी तक
रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने हवाना पर नए प्रतिबंधों का ऐलान किया है। इन प्रतिबंधों का मकसद क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बनाना है। अमेरिका ने क्यूबा को खुली चेतावनी दी है कि अगर उसने ऐसे हथियार हासिल करने की कोशिश की जो अमेरिकी क्षेत्र या ग्वांतानामो बे में स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे के लिए खतरा बन सकते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि क्यूबा रूस और चीन के साथ अपने रक्षा संबंध बढ़ा रहा है। ग्वांतानामो बे के इतने करीब किसी विरोधी देश की सैन्य मौजूदगी वाशिंगटन के लिए अस्वीकार्य है। इसलिए अमेरिका पहले से ही 'प्लान B' पर काम कर रहा है। 

'प्लान B' क्या है? सैन्य और राजनयिक दोनों विकल्प खुले 
ट्रंप ने इंटरव्यू में बताया कि उनकी टीम ने क्यूबा में संभावित अस्थिरता की स्थिति से निपटने के लिए कई योजनाएं तैयार की हैं। इनमें राजनयिक दबाव, आर्थिक नाकेबंदी को और सख्त करना, और अंतिम विकल्प के रूप में सीमित सैन्य कार्रवाई शामिल है। 

ट्रंप प्रशासन के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, अगर क्यूबा में जन आंदोलन तेज होता है या सरकार कमजोर पड़ती है, तो अमेरिका 'मानवीय हस्तक्षेप' के नाम पर कदम उठा सकता है। 1961 के बे ऑफ पिग्स आक्रमण की नाकामी के बाद अमेरिका सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है। लेकिन ट्रंप की भाषा से लगता है कि वे पुरानी नीतियों को बदलने से नहीं हिचकिचाएंगे।

ईरान से तुलना: 'क्यूबा का केस अलग है'
ट्रंप ने क्यूबा की स्थिति की तुलना हाल ही में ईरान पर किए गए अभियान से भी की। उन्होंने कहा कि ईरान वाला ऑपरेशन बहुत बड़े स्तर का था। उसमें ज्यादा हथियार, ज्यादा संसाधन और लंबी दूरी की रणनीति शामिल थी। 

इसके उलट क्यूबा अमेरिका के दरवाजे पर है। फ्लोरिडा से इसकी दूरी इतनी कम है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई लॉजिस्टिक रूप से आसान होगी। ट्रंप के शब्दों में, 'भौगोलिक रूप से क्यूबा हमारे लिए ज्यादा सुविधाजनक है।' इस बयान को विशेषज्ञ क्यूबा के लिए सीधी धमकी के रूप में देख रहे हैं।

क्या वेनेजुएला मॉडल क्यूबा में चलेगा?
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की क्यूबा रणनीति काफी हद तक 'वेनेजुएला मॉडल' जैसी दिखती है। वेनेजुएला में अमेरिका ने निकोलस मादुरो सरकार पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई थी। इसमें कड़े आर्थिक प्रतिबंध, विपक्षी नेता हुआन गुआइदो को समर्थन, और पड़ोसी देशों के जरिए कूटनीतिक अलगाव शामिल था। साथ ही समय समय पर सैन्य कार्रवाई के संकेत भी दिए गए थे।

लेकिन क्यूबा और वेनेजुएला में बड़ा फर्क है। क्यूबा में कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ 1959 से बेहद मजबूत है। फिदेल कास्त्रो के बाद राउल कास्त्रो और अब मिगुएल डियाज-कनेल के नेतृत्व में सरकार ने हर अमेरिकी दबाव को झेला है। दूसरा फर्क यह है कि क्यूबा को रूस, चीन और लैटिन अमेरिका के कई देशों का खुला समर्थन हासिल है। वेनेजुएला की तरह क्यूबा आर्थिक रूप से पूरी तरह ढहा हुआ नहीं है, हालांकि वहां भी हालात कठिन हैं।

60 साल पुरानी दुश्मनी की नई किस्त
अमेरिका और क्यूबा के रिश्ते 1959 की क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। 1962 का मिसाइल संकट दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर ले आया था। इसके बाद से अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। ओबामा के समय में रिश्तों में थोड़ी नरमी आई थी। राजनयिक संबंध बहाल हुए और कुछ पाबंदियां हटी थीं। 

लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल में ये सभी प्रयास पलट दिए गए। बाइडेन प्रशासन ने भी कोई बड़ी राहत नहीं दी। अब ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद क्यूबा नीति और आक्रामक हो गई है। क्यूबा सरकार इसे 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' का नया रूप बता रही है। हवाना का कहना है कि अमेरिका क्यूबा के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है।

लैटिन अमेरिका में चिंता: 'क्या मोनरो डॉक्ट्रिन की वापसी हो रही है?'
ट्रंप के बयान के बाद पूरे लैटिन अमेरिका में बेचैनी है। मेक्सिको, ब्राजील और कोलंबिया जैसे बड़े देशों ने कहा है कि किसी भी देश में सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरनाक होगा। 19वीं सदी की 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के तहत अमेरिका लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता रहा है। 

विश्लेषकों को डर है कि ट्रंप उसी सोच को 21वीं सदी में वापस ला रहे हैं। वेनेजुएला में नाकामी के बाद क्यूबा को निशाना बनाना यह दिखाता है कि अमेरिका अब 'रिजीम चेंज' की नीति को खुलकर अपना रहा है। 

आगे क्या? समयसीमा पर सस्पेंस बरकरार
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या और कब अमेरिका क्यूबा में कार्रवाई करेगा। ट्रंप ने इस पर कोई समयसीमा नहीं दी। उन्होंने कहा कि स्थिति 'फ्लेक्सिबल' है और फैसले हालात देखकर लिए जाएंगे। इसका मतलब है कि वाशिंगटन हवाना के हर कदम पर नजर रख रहा है। 

अगर क्यूबा में आर्थिक संकट गहराता है, बड़े प्रदर्शन होते हैं, या सरकार रूस से कोई बड़ा रक्षा समझौता करती है, तो अमेरिका बहाने के तौर पर कार्रवाई कर सकता है। 2026 अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले विदेश नीति में एक 'बड़ी जीत' दिखाना भी ट्रंप की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

क्यूबा की तैयारी: 'हम किसी धमकी से नहीं डरते' 
उधर क्यूबा ने भी सख्त रुख अपनाया है। राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कनेल ने कहा कि क्यूबा की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा। क्यूबा की सेना को अलर्ट पर रखा गया है। रूस और चीन ने भी बयान जारी कर कहा है कि वे क्यूबा के साथ खड़े हैं। 

क्यूबा की जनता में भी मिली जुली प्रतिक्रिया है। सरकार समर्थक इसे अमेरिकी दादागिरी बता रहे हैं। वहीं सरकार विरोधी गुटों को उम्मीद है कि अमेरिकी दबाव से बदलाव का रास्ता खुलेगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि बाहरी दबाव से क्यूबा की सरकार और मजबूत होती रही है।

: लैटिन अमेरिका बना नया शीत युद्ध का मैदान  
ट्रंप का क्यूबा को लेकर दिया गया बयान सिर्फ एक धमकी नहीं है। यह अमेरिकी विदेश नीति के बड़े बदलाव का संकेत है। वेनेजुएला, ईरान और अब क्यूबा, तीनों मामलों में ट्रंप प्रशासन का संदेश साफ है: जो देश अमेरिकी हितों के खिलाफ जाएगा, उसे परिणाम भुगतने होंगे। 

चाहे वह आर्थिक प्रतिबंध हों या सैन्य कार्रवाई, अमेरिका अब 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को आक्रामक तरीके से लागू कर रहा है। इससे लैटिन अमेरिका एक बार फिर महाशक्तियों के टकराव का अखाड़ा बन सकता है। आने वाले महीने तय करेंगे कि ट्रंप की धमकी बयानबाजी तक सीमित रहती है या क्यूबा वाकई वेनेजुएला और ईरान के बाद अमेरिका का अगला युद्धक्षेत्र बनता है। 

फिलहाल इतना तय है कि कैरेबियन सागर में सियासी तापमान बढ़ चुका है। हवाना से वाशिंगटन तक, सबकी नजरें अब इसी पर टिकी हैं कि अगला कदम कौन उठाता है। शांति से सत्ता परिवर्तन होगा या टकराव होगा, इसका जवाब सिर्फ वक्त देगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 20 Jun 2026
June 20, 2026

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा
- Friday World 20 Jun 2026
तेहरान-ब्यूरो
39 दिनों तक चले भीषण टकराव के बाद आखिरकार अमेरिका ने ईरान की शर्तों पर समझौता कर लिया है। 28 फरवरी को शुरू हुआ यह संघर्ष सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं था, बल्कि इसने पूरी दुनिया की शक्ति-समीकरण को हिला दिया। युद्धविराम की स्याही सूखने से पहले ही विश्लेषक मान रहे हैं कि मिडिल ईस्ट अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।

कैसे शुरू हुई 39 दिन की जंग?  
28 फरवरी की सुबह खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंचा। अमेरिकी दबाव और इजरायल की रणनीतिक चालों के जवाब में ईरान ने सीधा मोर्चा खोल दिया। तेहरान ने साफ किया कि वह अब छद्म युद्ध नहीं, सीधी टक्कर के लिए तैयार है। इसके बाद जो हुआ उसने 1945 के बाद पहली बार किसी देश को अमेरिका के सामने इस तरह अड़ते देखा।

ईरान ने एक साथ कई मोर्चे खोले। कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत पर भयानक मिसाइल हमलों की झड़ी लगा दी गई। तेहरान का दावा था कि ये हमले आत्मरक्षा और बदले के अधिकार के तहत हैं। इन हमलों ने खाड़ी देशों की ऊर्जा सप्लाई लाइनों को बुरी तरह तोड़ दिया। तेल के कुएं, रिफाइनरी और शिपिंग रूट निशाने पर आए। कुछ ही दिनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मच गया। 

अमेरिका को क्यों झुकना पड़ा? 
युद्ध के पहले हफ्ते में ही वॉशिंगटन को अहसास हो गया कि यह 2003 का इराक या 2001 का अफगानिस्तान नहीं है। ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन स्वॉर्म और क्षेत्रीय मिलिशिया नेटवर्क ने अमेरिकी ठिकानों को लगातार नुकसान पहुंचाया। पेंटागन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि ईरान लड़ाई को लंबा खींचने की रणनीति पर था। हर गुजरते दिन के साथ अमेरिका के सहयोगी देशों में घबराहट बढ़ रही थी।

खाड़ी देशों में हुई मौतों और बुनियादी ढांचे की तबाही ने अमेरिका पर अंदरूनी दबाव बना दिया। सऊदी अरब और यूएई ने वॉशिंगटन से कहा कि या तो युद्ध रोको, या फिर वे खुद अलग रास्ता चुनेंगे। यूरोप में भी तेल संकट गहराने लगा। घरेलू स्तर पर अमेरिकी प्रशासन पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 39वें दिन अमेरिका ने माना कि सैन्य जीत की कीमत अब कूटनीतिक हार से ज्यादा है।

इजरायल का छद्मजाल कैसे टूटा?
पिछले दो दशक से इजरायल ने ईरान को घेरने के लिए खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा गठजोड़ बनाए थे। अब्राहम समझौते इसी रणनीति का हिस्सा थे। लेकिन 28 फरवरी के बाद ईरान ने सीधे उन देशों पर हमला किया जिन्हें इजरायल अपना सुरक्षा कवच मानता था। संदेश साफ था: तेहरान अब प्रॉक्सी नहीं, प्रिंसिपल से लड़ेगा। 

इन हमलों ने इजरायल की डिटरेंस नीति को ध्वस्त कर दिया। तेल अवीव को समझ आ गया कि ईरान अब हर लाल रेखा पार करने को तैयार है। नतीजा यह हुआ कि इजरायल युद्ध के आखिरी 10 दिनों में पूरी तरह रक्षात्मक हो गया और अमेरिका पर युद्धविराम का दबाव बनाने लगा।

GCC की भूमिका और कतर की मध्यस्थता
युद्ध जितना तेजी से भड़का, उतनी ही तेजी से कूटनीति भी सक्रिय हुई। खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों में मतभेद उभर आए। ओमान और कुवैत शुरू से ही तनाव कम करने के पक्ष में थे। लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई कतर ने। दोहा ने तेहरान और वॉशिंगटन के बीच गुप्त चैनल खोला। 

कतर के अमीर ने खुद कई दौर की बातचीत की मेजबानी की। सऊदी अरब ने भी आखिरी हफ्ते में रुख नरम किया क्योंकि उसके तेल संयंत्रों पर हमलों से अरामको का उत्पादन 40% तक गिर गया था। GCC को अहसास हुआ कि अमेरिका की छतरी अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। इसलिए क्षेत्रीय समाधान ही एकमात्र रास्ता बचा।

समझौते की बड़ी शर्तें क्या हैं? 
हालांकि पूरा दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन तीन बड़ी बातें सामने आई हैं:  

1. प्रतिबंधों में ढील: अमेरिका ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर लगे प्रमुख प्रतिबंध हटाएगा।  

2. क्षेत्रीय सुरक्षा गारंटी: ईरान खाड़ी में और हमले न करने पर सहमत हुआ है, बशर्ते उसकी सुरक्षा चिंताओं को मान्यता मिले।  

3. परमाणु निगरानी का नया फॉर्मूला: ईरान सीमित निरीक्षण के लिए तैयार हुआ है, लेकिन संवर्धन पर उसकी संप्रभुता बनी रहेगी।  

तेहरान इसे अपनी जीत बता रहा है। राष्ट्रपति कार्यालय से जारी बयान में कहा गया कि ईरान ने साबित कर दिया कि सुपरपावर को भी झुकाया जा सकता है।

मिडिल ईस्ट में अब कौन होगा असली सुल्तान?
युद्ध के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है। ईरान अब खुद को प्रतिरोध की धुरी के केंद्र के तौर पर पेश कर रहा है। उसने दिखा दिया कि वह इजरायल और अमेरिका के गठजोड़ को सैन्य तौर पर चुनौती दे सकता है। यमन से लेबनान तक उसके समर्थक समूहों का मनोबल बढ़ा है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब है। युद्ध में सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान रियाद को ही हुआ। लेकिन क्राउन प्रिंस अब दोहरी रणनीति पर हैं। एक तरफ वे कतर और ओमान के साथ मिलकर ईरान से तनाव कम करना चाहते हैं, ताकि विजन 2030 बचे। दूसरी तरफ वे इस्लामिक दुनिया के सुन्नी नेतृत्व का दावा नहीं छोड़ना चाहते। 

इसलिए अगला दशक तेहरान और रियाद के बीच वर्चस्व की शांत लड़ाई का होगा। जो देश ज्यादा स्थिरता, आर्थिक मौके और सुरक्षा देगा, इस्लामिक दुनिया उसी के पीछे लामबंद होगी। ईरान के पास अब सैन्य मनोबल है। सऊदी के पास तेल और मक्का-मदीना की कस्टोडियनशिप है।

अमेरिका के पीछे हटने के दूरगामी असर

1. डॉलर का दबदबा कमजोर: तेल व्यापार अब सिर्फ डॉलर में नहीं होगा। ईरान-चीन-रूस पहले से ही वैकल्पिक मुद्रा पर काम कर रहे हैं।  

2. नाटो सहयोगियों में शक: यूरोपीय देश अब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को सौ फीसदी नहीं मानेंगे।  

3. चीन की एंट्री: बीजिंग युद्धविराम के तुरंत बाद पुनर्निर्माण पैकेज लेकर खाड़ी पहुंच गया है।  

4. हथियारों की नई दौड़: सऊदी, यूएई और कतर अब आत्मनिर्भर रक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करेंगे।  

भारत समेत एशिया के लिए मतलब
भारत के लिए यह दोधारी तलवार है। एक तरफ ईरान से चाबहार और तेल व्यापार आसान होगा। दूसरी तरफ खाड़ी में अस्थिरता से 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और रेमिटेंस पर खतरा रहेगा। भारत को अब तेहरान और रियाद दोनों के साथ संतुलन बनाना होगा।

 एक युग का अंत, दूसरे का आगाज

39 दिन की जंग ने साबित किया कि 21वीं सदी में सिर्फ सैन्य बजट से सुपरपावर नहीं बना जाता। सहनशक्ति, क्षेत्रीय पकड़ और जोखिम उठाने की हिम्मत भी मायने रखती है। ईरान ने वह हिम्मत दिखाई। अमेरिका ने व्यावहारिकता चुनी। 

अब मिडिल ईस्ट वॉशिंगटन की छाया से निकलकर अपने फैसले खुद लेगा। असली सुल्तान कौन होगा, इसका फैसला मिसाइलों से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कूटनीति और अवाम के भरोसे से होगा। तेहरान ने जंग जीती है, लेकिन वर्चस्व की जंग अभी बाकी है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 20 Jun 2026

Friday, 19 June 2026

June 19, 2026

ट्रम्प ने हर तरह के दांव-पेंच अपनाए... ईरान-अमेरिका डील पर खामेनेई का बड़ा बयान: 'मेरा मत अलग था, लेकिन मंजूरी दे दी'

ट्रम्प ने हर तरह के दांव-पेंच अपनाए... ईरान-अमेरिका डील पर खामेनेई का बड़ा बयान: 'मेरा मत अलग था, लेकिन मंजूरी दे दी'
-Friday World 19 Jun 2026
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध की आशंकाओं के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जो दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्त करने और आगे की बातचीत का रास्ता खोलता है। इस डील के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का पहला आधिकारिक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने अपनी शंकाओं को स्वीकार करते हुए डील को मंजूरी देने की बात कही है।

यह डील न केवल दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल आपूर्ति और मध्य पूर्व की स्थिरता पर भी गहरा असर डालेगी। आइए विस्तार से समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम को, खामेनेई के बयान का महत्व और इसके संभावित प्रभावों को।

 खामेनेई का बयान: शंकाओं के बावजूद मंजूरी क्यों?

मोजतबा खामेनेई ने लिखित बयान में स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ इस MoU पर उनके मन में कुछ आपत्तियां और संदेह थे। फिर भी, उन्होंने राष्ट्रपति पेजेश्कियान और उच्च सुरक्षा अधिकारियों के आश्वासन पर डील को मंजूरी दे दी। उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति पेजेश्कियान और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने मुझे आश्वासन दिया कि ईरान के हितों की रक्षा की जाएगी।"

खामेनेई ने आगे ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने "उत्साह और हताशा" में इस डील को साकार करने के लिए हर तरह का दबाव और प्रभाव का इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि सिद्धांत रूप से उनका मत अलग था, लेकिन ईरानी नेतृत्व की प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्होंने अनुमति दे दी।

अमेरिका को साफ चेतावनी: खामेनेई ने भविष्य की बातचीत पर भी जोर देते हुए कहा, "हम अमेरिका के दृष्टिकोण को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। अगर अमेरिका अत्यधिक मांगें रखेगा तो हम उन्हें मानने वाले नहीं हैं।" यह बयान ईरान की 'प्रतिरोध की धुरी' (Resistance Front) की मजबूती और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का संदेश देता है।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खामेनेई ईरान की सर्वोच्च सत्ता हैं। उनका अनुमोदन डील को घरेलू स्तर पर वैधता प्रदान करता है, जबकि उनकी शंकाएं ईरान की सतर्क नीति को दर्शाती हैं।

 डील के मुख्य बिंदु: क्या-क्या हुआ समझौते में?

इस MoU के तहत:
- दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों (खासकर लेबनान) पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने का वादा किया।

- अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी हटा ली।

- होर्मुज की खाड़ी को 60 दिनों के लिए टोल-फ्री खोल दिया गया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% प्रभावित करता था।

- ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने और IAEA निरीक्षण स्वीकार करने का वादा किया।

- आगे 60 दिनों में पूर्ण समझौते के लिए बातचीत होगी, जिसमें प्रतिबंध हटाना और आर्थिक राहत शामिल है।

ट्रंप ने इसे "आर्थिक आपदा" से बचने का कदम बताया, जबकि पेजेश्कियान ने इसे ईरान के हितों की रक्षा बताई। पाकिस्तान की मध्यस्थता भी इस डील में अहम रही।

ऐतिहासिक संदर्भ: पुरानी दुश्मनी से नई शुरुआत?

ईरान-अमेरिका संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में JCPOA (परमाणु समझौता) से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद टकराव बढ़ा। हालिया संघर्ष में अमेरिकी हमलों और ईरानी प्रतिक्रियाओं ने दुनिया को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था।

यह डील उस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है जहां:

- आर्थिक प्रभाव: होर्मुज खाड़ी खुलने से तेल कीमतें स्थिर होंगी, वैश्विक व्यापार को राहत मिलेगी।

- क्षेत्रीय स्थिरता: लेबनान, इराक और सीरिया जैसे मोर्चों पर शांति की संभावना बढ़ी।

- परमाणु मुद्दा: IAEA निगरानी के तहत ईरान का कार्यक्रम पारदर्शी बनेगा।

हालांकि, इजराइल जैसे सहयोगी अभी भी सतर्क हैं, और कुछ आलोचक इसे अमेरिका की "पीछे हटने" की रणनीति मानते हैं।

खामेनेई के बयान का रणनीतिक महत्व

खामेनेई का बयान ईरान की आंतरिक राजनीति को भी संबोधित करता है। ईरान में कट्टरपंथी तत्व इस डील को "समर्पण" मान सकते थे, लेकिन सुप्रीम लीडर की मंजूरी इसे "राष्ट्रीय हित" का हिस्सा बनाती है। उन्होंने "प्रतिरोध की धुरी" (Hezbollah, Houthis आदि) की सुरक्षा का जिक्र कर कट्टर समर्थकों को आश्वस्त किया।

ट्रंप की "दबाव की रणनीति" को स्वीकार करते हुए खामेनेई ने अमेरिका को कमजोर दिखाया, जो घरेलू स्तर पर ईरानी गर्व को बढ़ावा देता है। भविष्य की बातचीत में ईरान "अत्यधिक मांगों" का विरोध कर सकता है, जो डील को नाजुक बनाता है।

 संभावित चुनौतियां और आगे का रास्ता

1. 60 दिनों की समयसीमा: इस दौरान पूर्ण समझौता (UN-समर्थित) होना है। परमाणु, प्रतिबंध और क्षेत्रीय मुद्दे जटिल हैं।

2. इजराइल का रुख: इजराइल लेबनान में अभियान जारी रख सकता है, जो डील को प्रभावित करे।

3. आर्थिक राहत: अमेरिका द्वारा संपत्ति छोड़ना और पुनर्निर्माण सहायता पर अमल मुश्किल हो सकता है।

4. ईरान की घरेलू राजनीति: यदि डील फेल हुई तो खामेनेई और पेजेश्कियान पर दबाव बढ़ेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यह डील "अंतरिम" है, लेकिन अगर सफल हुई तो मध्य पूर्व का नक्शा बदल सकता है।

 शांति की उम्मीद या नया खेल?

ट्रंप की आक्रामक कूटनीति और खामेनेई की सतर्क मंजूरी ने एक नया अध्याय शुरू किया है। ईरान-अमेरिका संबंधों में यह पहला बड़ा ब्रेकथ्रू है, जो युद्ध की बजाय बातचीत को प्राथमिकता देता है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि ऐसे समझौते नाजुक होते हैं।

दुनिया अब 60 दिनों का इंतजार कर रही है। क्या यह स्थायी शांति लाएगा या सिर्फ एक सांस लेने का मौका? समय बताएगा। ईरान की जनता, क्षेत्रीय शक्तियां और वैश्विक अर्थव्यवस्था इस डील के नतीजों पर नजर रखे हुए हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 19 Jun 2026
June 19, 2026

राख में तब्दील EVM और सवालों के धुएं में घिरता लोकतंत्र: भरोसे की चिता कब बुझेगी?

राख में तब्दील EVM और सवालों के धुएं में घिरता लोकतंत्र: भरोसे की चिता कब बुझेगी?
-Friday World 19 Jun 2026
तस्वीर झकझोर देने वाली है। काले पड़ चुके लोहे के रैक, जले हुए तार, और पिघली हुई EVM की कतारें। ये सिर्फ मशीनें नहीं जलीं। जला है एक भरोसा। वह भरोसा जो कहता था कि मेरा एक वोट सरकार बदल सकता है।
आपने जो कहा, "लोकतंत्र की हत्या की यह जली हुई चिता EVM बहुत कुछ कह रही है", यह लाइन अब सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस आग की तस्वीर है जो गोदाम में लगी या किसी के मन में लगी। फर्क क्या पड़ता है? राख दोनों जगह बनती है।
1. यह तस्वीर बोलती क्या है?
इस फोटो में जली हुई EVM और VVPAT मशीनें दिख रही हैं। शायद किसी गोदाम में आग लगी। शायद किसी ने लगाई। कारण जो भी हो, प्रतीक बहुत बड़ा है।
लोकतंत्र मशीनों से नहीं चलता। लोकतंत्र चलता है जनता के विश्वास से। जब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, जब संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने लगे, तब सबसे बड़ा नुकसान EVM का नहीं होता। नुकसान होता है उस नागरिक का जो अगली बार लाइन में लगने से पहले दस बार सोचेगा।
EVM सिर्फ प्लास्टिक और चिप का डिब्बा है। मगर इस डिब्बे में 96 करोड़ लोगों की उम्मीद बंद थी। आज वह उम्मीद राख के ढेर में बदली पड़ी है।
2. EVM आई ही क्यों थी? बैलेट का दौर भूल गए?
1990 से पहले चुनाव बैलेट पेपर से होते थे। तब क्या होता था?
*बूथ कैप्चरिंग*: बाहुबली पूरी की पूरी मतपेटी उठा ले जाते थे। हज़ारों फर्जी ठप्पे लगा दिए जाते थे।
*गिनती में खेल*: 3 दिन तक गिनती चलती थी। हर राउंड में विवाद। फिर से गिनती के नाम पर दबाव।
*खर्च और वक्त*: करोड़ों बैलेट छापो। ट्रकों में ढोओ। फिर कचरे में फेंक दो।
EVM इन सबका जवाब बनकर आई। 1982 में केरल में पहला प्रयोग। 2004 से पूरे देश में लोकसभा चुनाव EVM से।
वादा था तीन चीज़ों का:
- *तेज़ी*: शाम 6 बजे वोटिंग बंद, रात 12 बजे तक नतीजे।
- *पारदर्शिता*: एक आदमी, एक बटन, एक वोट। हज़ार ठप्पे मारना बंद।
- *किफायत*: बार बार कागज़ छापने का खर्च खत्म।
दुनिया ने माना कि भारत ने कमाल कर दिया। 10 लाख बूथ। एक दिन में चुनाव। यह तकनीकी क्रांति थी।
3. फिर चिता जलने की नौबत क्यों आई?
मशीन खराब नहीं थी। भरोसा खराब हुआ। और भरोसा टूटने की 4 बड़ी वजहें हैं:
*पहली वजह: तकनीक और जनता के बीच दूरी*
बैलेट दिखता था। मुहर लगती थी। डिब्बे में डालते थे। आंखों के सामने सील लगता था। EVM के अंदर क्या होता है? आम वोटर नहीं जानता। जो दिखता नहीं, उस पर शक स्वाभाविक है। चुनाव आयोग लाख कहे कि मशीन स्टैंडअलोन है, इंटरनेट से नहीं जुड़ती, हैक नहीं हो सकती। मगर जब समझ ही न हो तो भरोसा कैसे हो?
*दूसरी वजह: हार का ठीकरा*
कड़वी सच्चाई यह है कि EVM पर सवाल हमेशा हारने वाला उठाता है। 2014, 2019 में विपक्ष ने उठाए। राज्यों में जब वही विपक्ष जीता तो EVM माता बन गई। 2009 में BJP हारी तो उसने सवाल उठाए थे। यह चयनात्मक हमला जनता को कन्फ्यूज़ करता है। उसे लगता है कि मुद्दा EVM नहीं, कुर्सी है।
*तीसरी वजह: संस्थाओं की साख*
EVM चुनाव आयोग चलाता है। अगर लोगों को लगे कि आयोग ही दबाव में है, तो मशीन पर शक लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। जब नियुक्ति पर सवाल हों, तो नतीजों पर सवाल उठेंगे ही।
*चौथी वजह: VVPAT का आधा अधूरा सच*
2019 से हर EVM के साथ VVPAT लगा। आप बटन दबाते हैं, 7 सेकंड की पर्ची दिखती है। तसल्ली होती है कि वोट सही गया। मगर सिर्फ 5 बूथ की पर्चियां ही गिनी जाती हैं। मांग है 50% या 100% गिनती की। आयोग कहता है कि वक्त बढ़ जाएगा। जनता कहती है कि भरोसे से बड़ा वक्त नहीं। यह टकराव आग में घी डालता है।
4. क्या EVM सच में हैक हो सकती है? फैक्ट क्या है
चुनाव आयोग के दावे सुनिए:
1. EVM में वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप है। एक बार कोड डाला, फिर बदला नहीं जा सकता।
2. मशीन किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ती। न ब्लूटूथ, न वाई-फाई, न इंटरनेट।
3. बटन दबाने और नतीजे में महीनों का गैप होता है। बीच में मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम में सील रहती हैं।
4. 2017 में आयोग ने हैकाथॉन की खुली चुनौती दी थी। कोई राजनीतिक दल हैक करके नहीं दिखा पाया।
आज तक लाखों VVPAT पर्चियां EVM के नतीजों से मिलाई गई हैं। एक भी केस में अंतर नहीं मिला। यह डेटा है।
मगर शक करने वाले पूछते हैं: अगर निर्माण के समय ही खेल हो तो? अगर स्ट्रॉन्ग रूम से मशीन बदल दी जाए तो? इन सवालों का जवाब सिर्फ तकनीक से नहीं, पारदर्शी प्रक्रिया से मिलेगा।
5. दुनिया ने क्या किया? सबक क्या है?
*जर्मनी*: 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM को असंवैधानिक बताया। तर्क था कि आम नागरिक पूरी प्रक्रिया को समझ न पाए तो वह चुनाव पारदर्शी नहीं है। जर्मनी बैलेट पर लौट गया।
*नीदरलैंड, आयरलैंड*: हैकिंग के डर से EVM हटा दी।
*ब्राज़ील, फिलीपींस*: भारत की तरह EVM इस्तेमाल करते हैं और संतुष्ट हैं।
*अमेरिका*: हर राज्य का अपना सिस्टम। कहीं पेपर बैलेट, कहीं स्कैनिंग मशीन, कहीं EVM।
भारत की चुनौती सबसे अलग है। 96 करोड़ वोटर। दूर दराज़ के इलाके। बूथ कैप्चरिंग का इतिहास। बैलेट पर लौटना आसान नहीं। मगर जर्मनी का तर्क भी वज़नदार है: चुनाव सिर्फ सही नहीं होना चाहिए, सही दिखना भी चाहिए।
6. जली हुई चिता का मतलब क्या है?
यह तस्वीर दो बातें कहती है।
पहली: अगर यह हादसा है, तो हमारी चुनावी तैयारियों पर सवाल है। करोड़ों की मशीनें ऐसे कैसे जल गईं? सुरक्षा कहां थी?
दूसरी: अगर यह साज़िश है, तो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। कोई इतना बौखलाया हुआ है कि वह पूरी व्यवस्था को ही आग लगाना चाहता है।
दोनों सूरतों में नुकसान लोकतंत्र का है। क्योंकि जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है। मशीनें फिर बन जाएंगी। भरोसा टूट गया तो उसे कौन जोड़ेगा?
7. अब रास्ता क्या है? भरोसा कैसे लौटे?
आग बुझाने के लिए पानी चाहिए, भाषण नहीं। 5 ठोस कदम ये हो सकते हैं:
*1. दिखाओ, सिर्फ बताओ मत*
EVM की फर्स्ट लेवल चेकिंग, रैंडमाइज़ेशन, मॉक पोल, सीलिंग। ये सब हर दल के एजेंट के सामने हो। पूरी वीडियोग्राफी हो। वेबसाइट पर लाइव डाला जाए। जब प्रक्रिया दिखेगी, तो शक घटेगा।
*2. VVPAT गिनती बढ़ाओ*
5 बूथ बहुत कम हैं। सुप्रीम कोर्ट 25% या 50% बूथ की गिनती का आदेश दे सकता है। हां, नतीजे 2 दिन लेट आएंगे। मगर 5 साल के लिए भरोसा पक्का हो जाएगा। यह सौदा महंगा नहीं है।
*3. चुनाव आयोग को मज़बूत करो*
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस की समिति हो। सुप्रीम कोर्ट यह सुझाव दे चुका है। जब नियुक्ति निष्पक्ष दिखेगी, तो फैसले निष्पक्ष लगेंगे।
*4. तकनीकी ऑडिट हर चुनाव से पहले*
IIT, IISc जैसे स्वतंत्र संस्थानों से EVM का सैंपल ऑडिट करवाया जाए। रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
*5. राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तय हो*
बिना सबूत EVM को चोर कहना बंद हो। अगर हैक का दावा है तो आयोग की चुनौती स्वीकार करो। हार को EVM पर नहीं, अपनी कमियों पर डालने की हिम्मत दिखाओ।
8. आखिरी बात: चिता ठंडी करनी होगी
यह जली हुई EVM की तस्वीर एक चेतावनी है। लोकतंत्र की हत्या एक दिन में नहीं होती। वह रोज़ थोड़ी थोड़ी होती है। जब नेता सवाल से भागते हैं। जब संस्थाएं चुप रहती हैं। जब नागरिक व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर भरोसा कर लेता है।
जनता का विश्वास बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग की कि वह पारदर्शी रहे। कोर्ट की कि वह निगरानी रखे। मीडिया की कि वह सच दिखाए। दलों की कि वे एजेंट ट्रेन करें। और आपकी, हमारी कि हम आंख बंद करके न यकीन करें, न शक करें। सवाल पूछें। जवाब मांगें। प्रक्रिया का हिस्सा बनें।
क्योंकि EVM जल सकती है। दूसरी बन जाएगी। मगर अगर भरोसे की चिता जल गई, तो राख से लोकतंत्र वापस नहीं आएगा।
उसे बचाना है। आज। अभी। वरना कल यह राख हमारे हाथों में होगी। और हम पूछ रहे होंगे कि गलती किसकी थी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026

Thursday, 18 June 2026

June 18, 2026

107 साल बाद वर्साय में उलटा खेल: घुटनों पर आया सुपरपावर, 110 दिन बाद ईरान ने लिखी जीत की इबारत

107 साल बाद वर्साय में उलटा खेल: घुटनों पर आया सुपरपावर, 110 दिन बाद ईरान ने लिखी जीत की इबारत -Friday World 19 Jun 2026
_पेरिस, 12 जून 2026_  
इतिहास खुद को दोहराता है, मगर कभी कभी आईने में चेहरा बदल जाता है। फ्रांस के पैलेस ऑफ़ वर्साय के शीशमहल में बुधवार रात वही हुआ जिसका इंतजार दुनिया ने 110 दिन से किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ 300 अरब डॉलर की उस डील पर दस्तखत कर दिए जिसे तेहरान पहले ही "प्रतिरोध की फतह" घोषित कर चुका है। 

28 जून 1919 को इसी हॉल में जर्मनी को झुकाकर वर्साय संधि थोप दी गई थी। 32 देशों ने मिलकर एक महाशक्ति को अपमान की स्याही से नहला दिया था। 107 साल बाद उसी मेज़ पर अमेरिका झुका। कलम ट्रम्प के हाथ में थी, मगर शर्तें ईरान की थीं। प्रतिबंध हटेंगे, यूरेनियम ईरान के पास रहेगा, और इज़रायल पहली बार अमेरिकी डील से बाहर रहेगा। 

110 दिन का घेरा और वर्साय की उड़ान
7 मार्च 2026 को नतांज पर साइबर हमले के साथ जो टकराव शुरू हुआ था, वह फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों, लाल सागर में ड्रोन और यूरोप की गैस पाइपलाइन तक फैल गया। अमेरिका ने यूएसएस जेराल्ड फोर्ड और यूएसएस एंटरप्राइज को खाड़ी में उतारा। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में 4000 स्पीडबोट तैनात कर दीं। 

तेल 142 डॉलर प्रति बैरल छू गया। यूरोप में महंगाई 11% पर पहुंची। अमेरिकी गैस स्टेशन पर लाइनें लग गईं। 110 दिन में वाशिंगटन समझ गया कि प्रतिबंधों की तलवार अब खुद उसी की गर्दन पर है। फ्रांस ने मध्यस्थता की पेशकश की। नौ दौर की गुप्त बैठक के बाद वर्साय चुना गया। संदेश साफ था। जहाँ 1919 में हार लिखी गई थी, वहीं 2026 में नई बराबरी लिखी जाएगी।

डील की वो 8 शर्तें जो बदल देंगी मिडिल ईस्ट

1. 300 अरब डॉलर का मेगा फंड: अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, कतर और यूएई मिलकर 10 साल में ईरान में निवेश करेंगे। पैसा तेल, गैस, बंदरगाह, सोलर और रेल में लगेगा। 

2. प्रतिबंध खत्म: अमेरिकी कांग्रेस 90 दिन में कॉम्प्रिहेंसिव ईरान सैंक्शंस एक्ट को रद्द करेगी। ईरानी बैंक स्विफ्ट, वीज़ा और मास्टरकार्ड से फिर जुड़ेंगे।

3. यूरेनियम पर ईरान का हक ईरान के पास मौजूद 60% समृद्ध यूरेनियम वहीं रहेगा। वह उसे नागरिक बिजली के लिए इस्तेमाल करेगा। IAEA सिर्फ कैमरों से निगरानी करेगा।

4. तेल की खुली छूट: ईरान तुरंत 40 लाख बैरल प्रतिदिन तेल बेचेगा। चीन, भारत और तुर्की को रियायती दर पर सप्लाई देगा।

5. क्षेत्रीय युद्धविराम: ईरान यमन, लेबनान और इराक में हथियार सप्लाई 5 साल तक रोकेगा। बदले में इज़रायल सीरिया में हवाई हमले बंद करेगा और गाज़ा की नाकेबंदी में ढील देगा।

6. कैदी रिहाई: 1979 के बाद सबसे बड़ा आदान प्रदान होगा। दोनों तरफ के 78 नागरिक 30 दिन में घर लौटेंगे।

7.सीधी कनेक्टिविटी: तेहरान से न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो के लिए सीधी उड़ानें 180 दिन में शुरू होंगी।

8. तकनीक ट्रांसफर बोइंग और एयरबस ईरान को 300 नए यात्री विमान देंगे। अमेरिकी कंपनियां ईरान में सेमीकंडक्टर फैक्ट्री लगाएंगी।

इन शर्तों में ईरान कहीं भी हारा हुआ नहीं दिखता। न जमीन गई, न यूरेनियम गया, न सम्मान गया। गया तो सिर्फ अमेरिका का वह घमंड जो कहता था कि प्रतिबंध से देश झुक जाते हैं।

1919 का वर्साय बनाम 2026 का वर्साय
1919 में जर्मनी से उसकी 13% जमीन, सारी कॉलोनी और 132 अरब गोल्ड मार्क वसूले गए। उसकी सेना 1 लाख तक सीमित कर दी गई। राइनलैंड को निशस्त्र क्षेत्र बना दिया गया। कीन्स ने तभी कहा था कि यह शांति नहीं, 20 साल का युद्धविराम है। 1939 में उनकी बात सच हुई।

2026 में पासा पलटा है। इस बार हरजाना देने वाला अमेरिका है। 300 अरब डॉलर ईरान की मौजूदा जीडीपी का 68% है। 1919 में जर्मनी को दबाया गया था। 2026 में ईरान को उठाया गया है। इसलिए यह संधि टिकेगी। क्योंकि यह अपमान पर नहीं, सौदे पर टिकी है।

ट्रम्प 2.0: नेतन्याहू से आज़ाद व्हाइट हाउस
डोनाल्ड ट्रम्प का पहला कार्यकाल इज़रायल के इर्द गिर्द घूमता था। जेरुशलम को राजधानी माना, गोलान हाइट्स को मान्यता दी, ईरान डील तोड़ी। दूसरा कार्यकाल अलग है। 

2024 के चुनाव में ट्रम्प को खाड़ी के अरबपति डोनर्स और अमेरिकी तेल लॉबी ने शर्त रखी थी कि मिडिल ईस्ट में शांति चाहिए। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को वर्साय नहीं बुलाया गया। उन्होंने ट्वीट किया कि यह डील इज़रायल की पीठ में छुरा है। मगर ट्रम्प ने जवाब नहीं दिया। 

साइन के बाद ट्रम्प ने कहा: "मैंने अमेरिका को फिर से महान बनाने का वादा किया था। महान देश लड़ते नहीं हैं, डील करते हैं। आज हमने इतिहास की सबसे बड़ी डील की है।" 

तेहरान में जश्न, तेल अवीव में सन्नाटा
ईरान के राष्ट्रपति ने आज़ादी टावर से एलान किया: "110 दिन ने 45 साल का हिसाब बराबर कर दिया। वर्साय अब हार का नहीं, इज़्ज़त का नाम है।" पूरी रात तेहरान में आतिशबाजी हुई। रियाल 22% मजबूत हुआ। तेल मंत्री ने कहा कि कल से हम यूरोप को गैस बेचेंगे।

उधर तेल अवीव में कैबिनेट की इमरजेंसी बैठक बेनतीजा रही। रक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने नेतन्याहू से इस्तीफा मांगा। हिब्रू अखबारों की हेडलाइन थी: "अमेरिका ने हमें अकेला छोड़ दिया।"

300 अरब डॉलर कहाँ खर्च होंगे
ईरानी वित्त मंत्रालय ने तुरंत रोडमैप जारी किया।
क्षेत्र राशि मुख्य प्रोजेक्ट

ऊर्जा 115 अरब डॉलर साउथ पार्स गैस फील्ड, नई रिफाइनरी, सोलर पार्क

ट्रांसपोर्ट 65 अरब डॉलर चाबहार से यूरोप तक रेल कॉरिडोर, 8 नए एयरपोर्ट

इंडस्ट्री 50 अरब डॉलर स्टील, ऑटो, सेमीकंडक्टर फैक्ट्री

पानी-कृषि 30 अरब डॉलर खारे पानी को मीठा बनाने के 20 प्लांट
स्वास्थ्य 25 अरब डॉलर 250 अस्पताल, कैंसर रिसर्च सेंटर

शिक्षा-टेक 15 अरब डॉलर 10 AI यूनिवर्सिटी, स्टार्टअप फंड
इस निवेश से ईरान की विकास दर 2027 तक 8.5% पहुंच जाएगी। बेरोज़गारी 21% से 7% पर आएगी। मध्यम वर्ग की आय दोगुनी होगी।

दुनिया के लिए मायने: किसका फायदा, किसका नुकसान

भारत: चाबहार पोर्ट अब गेमचेंजर बनेगा। ईरान से सस्ता तेल और गैस मिलेगा। मध्य एशिया और रूस तक सीधी पहुंच बनेगी। रुपये में व्यापार से डॉलर की जरूरत घटेगी।

चीन: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को ईरान में खुला मैदान मिला। 25 साल का तेल समझौता पक्का हुआ। अमेरिका को मिडिल ईस्ट से पीछे धकेलने में कामयाबी।

यूरोप: सर्दियों से पहले गैस संकट खत्म। महंगाई काबू में आएगी। जर्मनी और फ्रांस की कंपनियों को ईरान में ठेके मिलेंगे।

रूस: तेल की कीमत 70 से 80 डॉलर पर स्थिर रहेगी। बजट संभलेगा। मगर सीरिया और मिडिल ईस्ट में ईरान अब रूस का मोहताज नहीं रहेगा।

सऊदी अरब और यूएई: सबसे बड़ा कूटनीतिक झटका। ईरान विरोधी धड़ा टूटा। अब अब्राहम अकॉर्ड की जगह तेहरान-रियाद डायरेक्ट डायलॉग होगा।

110 दिन ने दिया नया सबक
अमेरिका ने 1979 से ईरान को अलग थलग करने की कोशिश की। नतीजा उल्टा निकला। ईरान ने मिसाइल प्रोग्राम बनाया, ड्रोन में महारत हासिल की, क्षेत्रीय नेटवर्क खड़ा किया। 110 दिन के संकट ने दिखाया कि प्रतिबंध अब लगाने वाले को ज़्यादा चोट पहुंचाते हैं। 

अमेरिकी ट्रेजरी की अपनी रिपोर्ट कहती है कि ईरान ने क्रिप्टो, बार्टर और चीन के साथ युआन व्यापार से 80% प्रतिबंध बेअसर कर दिए। उधर अमेरिका को हर दिन 50 करोड़ डॉलर का सैन्य खर्च उठाना पड़ा। ट्रम्प ने कारोबारी दिमाग लगाया और घाटे का सौदा बंद कर दिया।

आगे की राह: क्या यह शांति टिकेगी
1919 की वर्साय संधि इसलिए फेल हुई क्योंकि वह बदले पर बनी थी। 2026 की डील फायदे पर बनी है। इसलिए इसके टिकने के आसार ज़्यादा हैं। 

फिर भी तीन चुनौतियां हैं। पहली, अमेरिकी सीनेट में 60 वोट जुटाना। दूसरी, इज़रायल की खुफिया एजेंसियां डील को पटरी से उतार सकती हैं। तीसरी, ईरान के कट्टरपंथी गुट इसे अमेरिका से समझौता बताकर विरोध कर सकते हैं।

मगर 12 जून 2026 की तारीख अब किताबों में दर्ज हो चुकी है। 107 साल बाद वर्साय फिर गवाह बना। फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार झुकने वाला वही था जो 1919 में झुकवाता था। 

सुपरपावर जब घुटनों पर आते हैं तो धमाका नहीं होता। सिर्फ दस्तखत की खरखराहट सुनाई देती है। कल रात वर्साय के हॉल ऑफ़ मिरर्स में वही आवाज़ गूंजी। उसने दुनिया को बता दिया कि 21वीं सदी का मिडिल ईस्ट अब तेहरान की धुरी पर घूमेगा। और अमेरिका ने मान लिया है कि हर जंग मैदान में नहीं जीती जाती। कुछ जंगें मेज़ पर हारकर ही जीती जाती हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026
June 18, 2026

जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना

जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना -Friday World 19 Jun 2026
आलेख: मुरलीधरन, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते

केंद्र सरकार ने एक उच्च-स्तरीय समिति (एचएलसी) बनाने की घोषणा की है। इसका मकसद कथित तौर पर अवैध आव्रजन और असामान्य बसावट के तरीकों आदि से होने वाले "अस्वाभाविक" जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच करना है। प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्ति में कहा गया है कि "यह समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर आबादी में होने वाले असामान्य बदलावों के पैटर्न का विश्लेषण करेगी और इस मुद्दे से निपटने के लिए एक सुनियोजित और समय-सीमा के भीतर लागू होने वाला समाधान पेश करेगी"।

जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति को एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का काम दिया गया है। यह बात दिलचस्प लग सकती है कि मोदी सरकार ने जनगणना की प्रक्रिया, जिससे जनसांख्यिकी से जुड़े आंकड़े सामने आते, पूरी होने का इंतज़ार करने के बजाय, जल्दबाज़ी में एचएलसी का गठन कर दिया है।

सालों से, आरएसएस-भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि भारत आंतरिक जनसांख्यिकीय खतरे से जूझ रहा है। 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद से यह बात और ज़ोर-शोर से कही जाने लगी है। "दीमक" से लेकर "घुसपैठिए" तक, शब्द भले ही अलग-अलग हों, लेकिन निशाना एक ही है, मुख्य रूप से मुसलमान — जिन पर देश की "जनसांख्यिकीय संतुलन" को बिगाड़कर अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया जाता है।

नई कमिटी इसे संस्थागत रूप देगी। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कमिटी के किसी भी सदस्य का जनसांख्यिकी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। असल में, कमिटी के चेयरमैन प्रकाश प्रभाकर नवलेकर ने खुलकर कहा कि उन्हें "हैरानी" हुई है कि उन्हें कमिटी का प्रमुख बनाया गया है, और जनसांख्यिकी तथा अवैध प्रवास उनके लिए नए विषय हैं।

आरएसएस के लिए यह मुद्दा कितना अहम है, यह बात 'ऑर्गनाइज़र' के 14 जून के अंक से एक बार फिर साफ़ होती है। इस अंक में इस विषय पर 27 पेज समर्पित किए गए हैं और साथ ही सुरक्षा और घुसपैठ के नज़रिए से "सिलीगुड़ी कॉरिडोर" पर भी चार पेज दिए गए हैं।

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस साल की शुरुआत में कहा था, "घुसपैठ को लेकर सरकार को बहुत कुछ करना है। उन्हें घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजना होगा। अब तक ऐसा नहीं हो रहा था। लेकिन धीरे-धीरे यह काम शुरू हो गया है और आगे और तेज होगा। जब जनगणना या एसआईआर होता है, तो ऐसे कई लोग सामने आते हैं, जो इस देश के नागरिक नहीं हैं ; उन्हें अपने आप इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन हम एक काम कर सकते हैं : हम उनकी पहचान करने का काम कर सकते हैं। हमें उनकी पहचान करनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए। हमें पुलिस को बताना चाहिए कि हमें शक है कि ये लोग विदेशी हैं..."।

इस बात का उल्लेख करन ज़रूरी है कि मई 2026 में पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने के बाद भाजपा सरकार के शुरुआती फैसलों में से एक फैसला नौ ज़िलों में 142.79 एकड़ ज़मीन बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) को सौंपने का है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में संवेदनशील भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ और सीमाओं पर नई चौकियां बनाने के लिए 600 एकड़ ज़मीन हस्तांतरित करने का वादा किया था।

एचएलसी का गठन हिंदुत्व की राजनीति के व्यापक दायरे में पूरी तरह से फिट बैठता है। नागरिकता संशोधन कानून, नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून, अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों पर हमले, कई राज्यों में समान नागरिक संहिता और "आबादी के असंतुलन" की बार-बार की जाने वाली बातें -- ये सभी एक ही विचारधारा का हिस्सा हैं। इनमें सबसे गंभीर बात मतदाता सूची का 'विशेष गहन पुनरीक्षण' है। इन सभी कदमों का मकसद बहुसंख्यकवादी नज़रिए से नागरिकता की परिभाषा को बदलना है। धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य को धीरे-धीरे एक ऐसे हिंदू राष्ट्र के रूप में बदला जा रहा है, जहाँ अल्पसंख्यकों का अस्तित्व शर्तों और शक के दायरे में है।

एचएलसी के काम करने के तरीके और मकसद से यह साफ़ पता चलता है कि इसका मकसद एक ऐसी सोच को संस्थागत वैधता देना है, जो लंबे समय से हिंदुत्व को बढ़ावा देने का मुख्य आधार रही है — यानी यह कि हिंदू बहुसंख्यक आबादी अपनी ही ज़मीन पर खतरे में है। यह सोच तब भी बनी हुई है, जब ऐसी आशंकाओं को साबित करने के लिए आबादी से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिलता। भारत में सभी धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर लगातार कम हो रही है। पिछले कुछ सालों में समुदायों के बीच का अंतर भी काफ़ी कम हुआ है

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 2019–21 में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच प्रजनन दर का अंतर प्रति महिला सिर्फ़ 0.42 बच्चे था, जबकि 1992 में यह अंतर 1.1 था। 1992–93 के बाद से मुस्लिमों में प्रजनन दर 46.5% कम हुआ है, जबकि हिंदुओं में यह 41.2% कम हुआ है — यानी मुस्लिमों में प्रजनन दर तेज़ी से कम हो रही है। पिछले 20 सालों में हिंदुओं में प्रजनन दर 30% कम हुई है, जबकि मुस्लिमों में यह कमी 35% रही है।

जनसांख्यिकी से जुड़े डर की राजनीति एक साथ कई मकसद पूरे करती है। पहला, यह देश के भीतर ही एक स्थायी दुश्मन खड़ा कर देती है। नव-उदारवादी शासन की नाकामियों या कॉरपोरेट के हाथों में संपत्ति के संकेद्रण पर सवाल उठाने के बजाय, लोगों के एक हिस्से को यह यकीन दिलाया जाता है कि देश की समस्याएं घुसपैठियों, जनसांख्यिकीय साज़िशों या सांस्कृतिक रूप से बाहरी लोगों की वजह से पैदा हो रही हैं।

दूसरी बात, जनसांख्यिकीय राजनीति, जातिगत विभाजनों के बावजूद, एक एकजुट हिंदू राजनीतिक पहचान बनाने में मदद करती है। हिंदुत्व ने एक व्यापक बहुसंख्यक चेतना पैदा करके हिंदू समाज के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को दबाने की कोशिश की है। बाहरी या आंतरिक खतरे का ज़िक्र ठीक इसी तरह के एकीकरण को संभव बनाता है। सामाजिक चिंताओं का रुख जातिगत उत्पीड़न, बेरोजगारी या वर्गीय शोषण के बजाए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ देता हैं।

तीसरी बात, जनसांख्यिकीय डर की वजह से सरकारी निगरानी और दस्तावेजीकरण का दायरा बढ़ता है। एक बार जब अप्रवासन और आबादी में बदलाव को सुरक्षा के नज़रिए से देखा जाने लगता है, तो कड़े या असाधारण कदमों को सही ठहराना आसान हो जाता है। देश की अखंडता की रक्षा के नाम पर नागरिकता की जांच, निवारक निरोध प्रणाली, सीमा पर पुलिस जांच, आंकड़े इकट्ठा करना और खास तौर पर कमज़ोर तबकों की जांच-पड़ताल जैसी चीज़ों को सामान्य माना जाने लगता है। ऐसी नीतियों का सबसे ज़्यादा बोझ गरीब, भूमिहीन, प्रवासी और बिना कागज़ात वाले लोगों को उठाना पड़ता है। एसआईआर इसका एक उदाहरण है, जहाँ एक करोड़ से ज़्यादा लोग न सिर्फ़ वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए हैं, बल्कि वे ऐसे "संदिग्ध" नागरिक बन गए हैं जिन्हें उनके अधिकार और सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।

मदुरै में हुए सीपीआई(एम) के 24वें महाधिवेशन में केंद्र की मौजूदा सरकार को "नव-फासीवादी लक्षण" वाली बताया गया था। जर्मनी में जिस तरह का फासीवाद देखा गया था, उससे हमें यह सीख मिलती है कि लोकतांत्रिक समाज में डर, प्रचार और नौकरशाही की वैधता के ज़रिए धीरे-धीरे भेदभावपूर्ण राजनीति को सामान्य बनाया जा सकता है। संस्थाओं, कानूनों, समितियों, प्रशासनिक भाषा और लोगों के मन में जान-बूझकर पैदा की गई चिंताओं के ज़रिए तानाशाही कदम-दर-कदम आगे बढ़ती है।

एडॉल्फ हिटलर ने बार-बार यह तर्क दिया था कि जर्मनी को आबादी और सभ्यता के स्तर पर कथित तौर पर बाहरी आबादी, खासकर यहूदियों, से विनाश का खतरा है। नाज़ी प्रचार ने अल्पसंख्यकों को देश की शुद्धता, सुरक्षा और भविष्य के लिए अस्तित्व का खतरा बना दिया। आर्थिक तंगी और राजनीतिक अस्थिरता को देश के भीतर मौजूद दुश्मनों के प्रति नफ़रत में बदल दिया गया। 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों के तहत नागरिकता को नस्ल के आधार पर फिर से परिभाषित किया गया, जिससे यहूदियों को समान नागरिक अधिकार नहीं मिले।

अमेरिकी पत्रकार और इतिहासकार विलियम शिरेर ने अपनी मशहूर किताब 'द राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ़ द थर्ड राइख़' में कहा है कि फ़ासीवाद का उदय सिर्फ़ किसी एक नेता की महत्वाकांक्षाओं की वजह से नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए हुआ था, क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाएँ अंदर से कमज़ोर हो गई थीं और अभिजात वर्ग को लगता था कि वे तानाशाही ताक़तों के साथ अपनी पटरी बैठा सकते हैं और उन पर नियंत्रण रख सकते हैं। प्रचार, राष्ट्रवाद और स्थायी दुश्मनों को खड़ा करने की कोशिशों ने धीरे-धीरे लोगों की सोच को बदल दिया।

शिरेर लिखते हैं, “15 सितंबर 1935 के तथाकथित न्यूरेम्बर्ग कानूनों ने यहूदियों से जर्मन नागरिकता छीन ली और उन्हें सिर्फ़ ‘प्रजा’ का दर्जा दिया गया। इन कानूनों ने यहूदियों और आर्यों के बीच शादी और शादी के बाहर के रिश्तों पर भी रोक लगा दी। साथ ही, यहूदियों के लिए 35 साल से कम उम्र की आर्य महिला नौकरानियों को काम पर रखना भी मना कर दिया गया। अगले कुछ सालों में, न्यूरेम्बर्ग कानूनों को और सख्त बनाने वाले लगभग तेरह और आदेश आए, जिन्होंने यहूदियों को पूरी तरह से गैर-कानूनी बना दिया। ...कानून या नाज़ी आतंक — अक्सर आतंक, कानून से पहले आता था -- के ज़रिए यहूदियों को सरकारी और निजी नौकरियों से इस हद तक बाहर कर दिया गया कि उनमें से लगभग आधे लोगों के पास आजीविका का कोई साधन नहीं बचा। 'थर्ड राइख' के पहले साल, यानी 1933 में, उन्हें सरकारी पदों, नागरिक सेवा, पत्रकारिता, रेडियो, खेती, शिक्षण, थिएटर और फ़िल्मों से बाहर कर दिया गया ; 1934 में उन्हें स्टॉक एक्सचेंज से निकाल दिया गया। हालाँकि, वकालत, डॉक्टरी या व्यापार करने पर कानूनी रोक 1938 में लगी, लेकिन असल में नाज़ी शासन के पहले चार साल खत्म होने तक ही उन्हें इन क्षेत्रों से हटा दिया गया था।”

'दूसरे' (यानी जो अपने समुदाय के नहीं हैं) के प्रति यह नफ़रत हिंदुत्व के बड़े नेता एम.एस. गोलवलकर की शिक्षाओं में भी दिखती है। वे कहते हैं : “वे (मुसलमान और ईसाई) बेशक इसी भूमि पर पैदा हुए हैं, लेकिन क्या वे इस भूमि के प्रति नमकहलाल हैं? ...नहीं। उनके धर्म बदलने के साथ ही, देश के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना भी खत्म हो गई है।”

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि गोलवलकर हिटलर की खुलकर तारीफ़ करता था। 1939 में हिटलर के विनाशकारी युद्ध शुरू करने से कुछ महीने पहले छपी अपनी किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' में उन्होंने लिखा था: "अपनी नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने सेमिटिक नस्लों — यहूदियों — को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया।" इसके अलावा, उन्होंने लिखा: "यहाँ नस्लीय गर्व का सबसे ऊँचा रूप देखने को मिला। जर्मनी ने यह भी दिखाया है कि जिन नस्लों और संस्कृतियों में बुनियादी अंतर हों, उन्हें एक साथ मिलाकर एक इकाई बनाना लगभग नामुमकिन है ; यह हिंदुस्तान के लिए एक अच्छा सबक है, जिससे हमें सीखना चाहिए और फ़ायदा उठाना चाहिए।"

गोलवलकर ने मुसलमानों के मुकाबले देश पर हिंदुओं के खास दावे पर ज़ोर देते हुए तर्क दिया कि "हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी जातियों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का सम्मान और आदर करना सीखना होगा, हिंदू जाति और संस्कृति यानी हिंदू राष्ट्र की महिमा के अलावा कोई और विचार नहीं रखना होगा और हिंदू जाति में घुलने-मिलने के लिए अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी ; या फिर वे देश में हिंदू राष्ट्र के पूरी तरह अधीन होकर, बिना किसी दावे या विशेषाधिकार के, रह सकते हैं, और उन्हें कोई खास सुविधाएं या नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे।"

इसके अलावा, "राष्ट्रीय जीवन में उनकी कोई जगह नहीं है, जब तक कि वे अपने मतभेदों को छोड़कर देश का धर्म, संस्कृति और भाषा न अपना लें और पूरी तरह से राष्ट्रीय समुदाय में घुल-मिल न जाएं। लेकिन जब तक वे अपने नस्लीय और सांस्कृतिक मतभेदों को बनाए रखते हैं, तब तक उन्हें विदेशी ही माना जाएगा।"

यह आज भी हिंदुत्व की परियोजना का ब्लूप्रिंट और आरएसएस की सोच का आधार बना हुआ है। गोलवलकर की दूसरी किताब 'बंच ऑफ़ थॉट्स' (विचार मीमांसा) — जिसमें उनके लेख और भाषण शामिल थे और जो ढाई दशक बाद प्रकाशित हुई थी — उसमें भी उन्हीं विचारों का सार था, जो उन्होंने 1939 में लिखे थे।

हिंदुत्व के प्रचार में मुसलमानों को सालों से, बहुत ज़्यादा दिखने वाले और राजनीतिक रूप से संदिग्ध के तौर पर चित्रित करने की कोशिश की गई है : जैसे कि वे बहुत ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं, बहुत ज़्यादा बेईमान होते हैं, बहुत ज़्यादा संगठित होते हैं और बहुत ज़्यादा विदेशी होते हैं। ऐसी बातें 20 करोड़ से ज़्यादा नागरिकों वाले पूरे समुदाय को जनसांख्यिकीय लिहाज से एक ख़तरे की श्रेणी में डाल देती हैं।

जनसांख्यिकीय समिति का गठन हिंदुत्व की परियोजना को आगे बढ़ाने का एक और माध्यम है। इससे नागरिक ऐसे जनसांख्यिकीय विषयों में बदल जाएंगे, जिनकी वैधता बड़े पैमाने पर पहचान, दस्तावेज़ों और राजनीतिक अनुरूपता पर निर्भर होकर रह जाएगी।

लेखक माकपा के केंद्रीय सचिवमंडल सदस्य हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026