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Wednesday, 28 October 2026

October 28, 2026

इज़रायल_चुनाव: क्या बेंजामिन नेतन्याहू के अपराजेय युग का अंत की ओर?

इज़रायल_चुनाव: क्या बेंजामिन नेतन्याहू के अपराजेय युग का अंत की ओर?
-Friday World Oct 28,2026 
यरूशलेम/तेल अवीव।* इज़रायल की राजनीति के 'किंग' कहे जाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू, जिन्हें उनके समर्थक प्यार से 'बीबी' बुलाते हैं, आज अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन चौराहे पर खड़े हैं। मंगलवार को हुए आम चुनाव के शुरुआती रुझानों और एग्जिट पोल्स ने संकेत दिया है कि नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन 61 सीटों के जादुई बहुमत के आंकड़े से दूर रह सकता है। अगर ये नतीजे अंतिम आंकड़ों में बदलते हैं, तो यह न केवल इज़रायल के इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले प्रधानमंत्री की विदाई होगी, बल्कि एक पूरे राजनीतिक युग का अंत भी होगा। नेतन्याहू का कार्यकाल सुरक्षा, आर्थिक विकास और विवादों का एक जटिल मिश्रण रहा है। उनके समर्थकों के लिए, वह 'मिस्टर सिक्योरिटी' हैं जिन्होंने इज़रायल को क्षेत्रीय खतरों से सुरक्षित रखा और 'अब्राहम समझौते' के माध्यम से अरब देशों के साथ ऐतिहासिक शांति स्थापित की। लेकिन विरोधियों के लिए, उनके शासन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, न्यायिक प्रणाली को कमजोर करने की कोशिशें और देश को दो हिस्सों में बांटने वाली राजनीति का दाग है। तेल अवीव की सड़कों पर कल रात से ही जश्न और नारों का गूंजना शुरू हो गया है, जो इस बात का सबूत है कि इज़रायल की जनता अब बदलाव की ओर देख रही है। विपक्षी गठबंधन, जिसमें यायर लैपिड और बेनी गैंट्ज़ जैसे कद्दावर नेता शामिल हैं, इस बार अधिक एकजुट दिखाई दे रहे हैं। सत्ता के इस समीकरण में अरब पार्टियाँ एक 'किंगमेकर' की भूमिका निभा सकती हैं, जो इज़रायली राजनीति में एक अभूतपूर्व घटना होगी। क्या नेतन्याहू अपनी जादुई राजनीतिक चालों से एक बार फिर सत्ता का रास्ता निकाल लेंगे, या इस बार तेल अवीव की हवा उनके खिलाफ पूरी तरह से बह चुकी है? आने वाले कुछ घंटे इज़रायल के भविष्य की नई दिशा तय करेंगे। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल: पहले से वोटर रहे लोगों से फॉर्म-6 क्यों? दिल्ली SIR में मतदान अधिकार पर बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट का तीखा सवाल: पहले से वोटर रहे लोगों से फॉर्म-6 क्यों? दिल्ली SIR में मतदान अधिकार पर बड़ा फैसला
-Friday World Oct 28,2026 
नई दिल्ली। लोकतंत्र की रीढ़ माने जाने वाले मतदान के अधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को चुनाव आयोग से सीधे और तीखे सवाल पूछे हैं। दिल्ली में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) यानी विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि जो लोग पहले से मतदाता सूची में थे, उनके नाम ड्राफ्ट सूची से गायब होने पर उनसे फॉर्म-6 क्यों भरवाया जा रहा है? जबकि फॉर्म-6 नए वोटरों के लिए है।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय बेंच अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में दिल्ली SIR के दौरान जारी नोटिसों में कथित पारदर्शिता की कमी का मुद्दा उठाया गया था। लाइव लॉ और बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि फॉर्म-6 पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने वालों के लिए है, जिसमें आवेदक को यह घोषणा करनी पड़ती है कि वह पहली बार नाम जुड़वा रहा है। पहले से वोटर रहे व्यक्ति से ऐसी घोषणा करवाना संरचनात्मक असंगति है।

**क्या है पूरा मामला?**

दिल्ली में SIR के गणना चरण के दौरान लगभग 47 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर कर दिए गए। ये आंकड़ा दिल्ली के कुल मतदाताओं का करीब 33 प्रतिशत बैठता है। इनमें से बड़ी संख्या ASDD श्रेणी (Absent, Shifted, Dead या Duplicate) में डाली गई। यानी अनुपस्थित, पलायन किए हुए, मृत या डुप्लीकेट। कई लोगों तक गणना फॉर्म (Enumeration Form) पहुंच ही नहीं पाया क्योंकि वे अस्थायी रूप से बाहर थे, पते बदल चुके थे या अन्य कारणों से उपलब्ध नहीं थे।

चुनाव आयोग का तरीका यह रहा कि ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए इन लोगों को अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए फॉर्म-6 भरना होगा। फॉर्म-6 में स्पष्ट रूप से लिखा होता है कि आवेदक पहली बार मतदाता सूची में शामिल होना चाहता है। कोर्ट ने इस पर आपत्ति जताई। जस्टिस बागची ने कहा कि मतदान का अधिकार अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति गणना फॉर्म नहीं भर पाया तो क्या उसका अधिकार हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा? कोर्ट ने पूछा कि ऐसे लोगों को देर से ही सही, एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने का मौका क्यों नहीं दिया जा सकता?

एन्यूमरेशन फॉर्म वह दस्तावेज है जिसके जरिए चुनाव आयोग SIR के दौरान मौजूदा मतदाता की जानकारी की पुष्टि करता है। इसमें व्यक्ति अपनी पहचान, पता और अन्य जरूरी विवरण देता है ताकि उसका नाम संशोधित सूची में रखा जा सके। कोर्ट का मानना था कि पहले से वोटर रहे लोगों के लिए यही फॉर्म पर्याप्त हो सकता है, या फिर पते बदलने वाले फॉर्म-8 का इस्तेमाल किया जा सकता है।

#कोर्ट के सवाल और चुनाव आयोग का रुख

चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति वसंत कुंज का वोटर था और अब सरिता विहार चला गया है तो वह पुराना बूथ नंबर, वोटर नंबर बताकर फॉर्म-8 भर सकता है। उसे फॉर्म-6 भरने की जरूरत क्यों पड़े? जस्टिस बागची ने इसे “स्ट्रक्चरल इनकांग्रुइटी” यानी संरचनात्मक विसंगति करार दिया। उन्होंने चुनाव आयोग से कहा कि आपका काम पूरी सावधानी से करना है। मतदान अधिकार को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

चुनाव आयोग की ओर से कोर्ट को बताया गया कि वे सुझावों पर विचार करेंगे। 30 अक्टूबर की डेडलाइन बढ़ाने और देर से आए एन्यूमरेशन फॉर्म स्वीकार करने पर विचार किया जा रहा है। कोर्ट ने आयोग से कहा कि कोई कट-ऑफ डेट न रखें क्योंकि राष्ट्रीय राजधानी में फिलहाल कोई चुनाव नहीं है। प्रभावित मतदाताओं तक पहुंचने के लिए सक्रिय प्रयास करें और प्रक्रिया को सरल बनाएं।

#याचिकाकर्ताओं का पक्ष

वरिष्ठ अधिवक्ता #प्रशांत भूषण याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि लगभग 43 लाख लोग शिफ्टेड या अनुपस्थित श्रेणी में डाले गए हैं। इन्हें फॉर्म-6 भरने को कहना गलत घोषणा करवाने जैसा है। इससे कानूनी समस्या भी पैदा हो सकती है क्योंकि व्यक्ति झूठी घोषणा कर रहा होगा। आसान समाधान है कि देर से एन्यूमरेशन फॉर्म स्वीकार कर लिए जाएं और पते बदलने वालों को फॉर्म-8 की अनुमति दी जाए।

याचिका में यह भी कहा गया था कि SIR के दौरान जारी नोटिसों में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं थी। कई लोगों को यह पता ही नहीं चला कि उनका नाम कैसे और क्यों बाहर कर दिया गया।

SIR प्रक्रिया और मतदाताओं पर प्रभाव

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाने के लिए चलाया जाता है। इसका उद्देश्य डुप्लीकेट, मृत और अवास्तविक नामों को हटाना है। लेकिन दिल्ली जैसे बड़े शहर में जहां लोग अक्सर पलायन करते हैं, काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं या किराए के मकान बदलते रहते हैं, गणना प्रक्रिया में कई नाम छूट जाते हैं। लगभग एक तिहाई मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट से बाहर होना बड़ा आंकड़ा है और इससे लोकतंत्र की व्यापकता पर सवाल उठता है।

कोर्ट ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि मतदान अधिकार मौलिक और महत्वपूर्ण है। इसे प्रक्रियात्मक कठिनाइयों के कारण छीना नहीं जा सकता। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह मतदाताओं को सुविधा प्रदान करे, न कि उन्हें जटिल प्रक्रियाओं में फंसाए।

आगे क्या?

कोर्ट ने चुनाव आयोग को दो सप्ताह का समय दिया है कि वह आवश्यक बदलावों पर रिपोर्ट पेश करे। डेडलाइन बढ़ाने, देर से फॉर्म स्वीकार करने और प्रभावित लोगों तक पहुंच बनाने के निर्देश दिए गए हैं। इस बीच प्रभावित मतदाताओं को सलाह दी जा रही है कि वे अपनी स्थिति जांचें और आवश्यक दस्तावेज तैयार रखें।

यह मामला सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है। SIR प्रक्रिया अन्य राज्यों में भी चली है या चल रही है। सुप्रीम कोर्ट के इन सवालों से चुनाव आयोग की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और संवेदनशीलता बढ़ाने का संदेश गया है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर पात्र नागरिक को बिना अनावश्यक बाधा के अपना मत देने का अवसर मिले।

सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई ने एक बार फिर याद दिलाया है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है लेकिन उसके कामकाज की समीक्षा न्यायपालिका कर सकती है, खासकर जब मौलिक अधिकार प्रभावित हों। दिल्ली के लाखों मतदाताओं के लिए यह राहत भरा संकेत है कि उनका अधिकार आसानी से नहीं छीना जा सकता।

अब नजरें चुनाव आयोग के अगले कदमों पर हैं। क्या वे प्रक्रिया को सरल बनाएंगे? क्या प्रभावित मतदाताओं को आसानी से नाम वापस जुड़वाने का रास्ता मिलेगा? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ होंगे। एक बात तय है कि मतदान अधिकार की रक्षा में सुप्रीम कोर्ट सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

सर्बिया में ऐतिहासिक बदलाव: छात्र आंदोलन ने वुचिच के 14 साल के शासन को उखाड़ फेंका

सर्बिया में ऐतिहासिक बदलाव: छात्र आंदोलन ने वुचिच के 14 साल के शासन को उखाड़ फेंका
-Friday World Oct 28,2026 
बेलग्रेड की सड़कों पर नृत्य, गीत और जश्न का माहौल छाया हुआ है। पुलिस बैरक में लौट चुकी है और आम लोग सड़कों पर अपनी जीत का उत्सव मना रहे हैं। सर्बिया की संसदीय चुनावों में छात्र समर्थित ‘स्टूडेंट लिस्ट’ (Student List – Students Win) ने ऐतिहासिक जीत हासिल की है। लंबे समय से सत्ता पर काबिज रहे अलेक्जेंडर वुचिच की सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (SNS) ने हार स्वीकार कर ली है।

रविवार 25 अक्टूबर 2026 को हुए चुनाव के लगभग अंतिम नतीजों के अनुसार स्टूडेंट लिस्ट को करीब 52.7 प्रतिशत वोट मिले, जबकि वुचिच के गठबंधन ‘यूनाइटेड सर्बिया’ को 39.2 प्रतिशत वोट मिले। इससे स्टूडेंट लिस्ट को 250 सदस्यीय संसद में लगभग 139-141 सीटें मिलने का अनुमान है, जिससे वे बिना गठबंधन के सरकार बना सकते हैं। वोटिंग प्रतिशत लगभग 69 प्रतिशत रहा, जो पिछले तीन दशकों में सबसे अधिक है।

वुचिच ने खुद चुनाव परिणाम आने से पहले ही हार स्वीकार कर ली। उन्होंने टेलीविजन संबोधन में कहा कि स्टूडेंट लिस्ट ने जीत हासिल की है। उनके इस बयान के तुरंत बाद बेलग्रेड और अन्य शहरों की सड़कों पर लोग नाचने-गाने लगे। कारों के हॉर्न बज रहे थे, पटाखे फूट रहे थे और युवा ‘विजय’ और ‘अब खत्म’ के नारे लगा रहे थे। पहले जहां राष्ट्रपति महल, चुनाव आयोग और सरकारी इमारतों के आसपास विशेष पुलिस बल तैनात थे, वहां अब सिर्फ कुछ बख्तरबंद गाड़ियां दिख रही हैं। पुलिस बैरक में लौट गई है।

यह जीत अचानक नहीं आई। नवंबर 2024 में नोवी साद के रेलवे स्टेशन पर कैनोपी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना ने भ्रष्टाचार और सरकारी लापरवाही के खिलाफ बड़े आंदोलन को जन्म दिया। छात्रों ने विश्वविद्यालय बंद किए, शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए और धीरे-धीरे पूरे देश में व्यापक समर्थन हासिल किया। दो साल तक चले इस आंदोलन ने अंततः राजनीतिक रूप ले लिया। स्टूडेंट लिस्ट में ज्यादातर प्रोफेसर, डॉक्टर, अभिनेता और आम पेशेवर शामिल हैं। इसमें कोई एक प्रमुख नेता नहीं है, जो आंदोलन की विशेषता रही।

सर्बिया में वुचिच 2014 से या तो प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के रूप में सत्ता में रहे। उन्होंने आर्थिक विकास का दावा किया, लेकिन आलोचक उन्हें सत्तावादी रुझान और मीडिया नियंत्रण का आरोप लगाते रहे। छात्र आंदोलन ने भ्रष्टाचार, जवाबदेही और लोकतंत्र की मांग को केंद्र में रखा। अब सवाल यह है कि अनुभवहीन उम्मीदवार कैसे शासन करेंगे। अभी प्रधानमंत्री समेत प्रमुख पदों पर किसे चुना जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है।

बेलग्रेड की सड़कों पर अब जश्न का माहौल है। लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे हैं, झंडे लहरा रहे हैं और भविष्य की उम्मीद जता रहे हैं। कई जगहों पर पहले तैनात पुलिस को भीड़ ने शांतिपूर्वक हटा दिया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें लोग खुशी से झूम रहे हैं। यह न सिर्फ सर्बिया बल्कि दुनिया भर के उन देशों के लिए भी संदेश है जहां लंबे समय से सत्ता पर एक ही व्यक्ति या दल का कब्जा रहता है।

छात्रों की इस जीत को कई यूरोपीय नेताओं ने भी सराहा है। यह दिखाता है कि शांतिपूर्ण आंदोलन, उच्च मतदान और जन-समर्थन से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। अब सर्बिया नए अध्याय की ओर बढ़ रहा है। भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था, बेहतर शिक्षा और जवाबदेह सरकार की उम्मीदें जगी हैं। हालांकि शासन का अनुभव न होने से चुनौतियां भी कम नहीं होंगी।

इस ऐतिहासिक पल ने सर्बिया की युवा पीढ़ी को नई ताकत दी है। बेलग्रेड की रातें अब जश्न से रोशन हैं और देश एक नए राजनीतिक युग में प्रवेश कर चुका है।[

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

माइक्रोसॉफ्ट का एआई धक्का: 60 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक छंटनी का ऑफर, भारत में भी असर

माइक्रोसॉफ्ट का एआई धक्का: 60 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक छंटनी का ऑफर, भारत में भी असर
-Friday World Oct 28,2026 
सैन फ्रांसिस्को। दुनिया की दिग्गज टेक कंपनी माइक्रोसॉफ्ट ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और क्लाउड टेक्नोलॉजी में अरबों डॉलर के निवेश की तैयारी के साथ अपने कारोबार को नया रूप देने का फैसला लिया है। इस प्रक्रिया के तहत कंपनी ने भारत, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका समेत कई देशों में चुनिंदा करीब 60 हजार कर्मचारियों को स्वैच्छिक रूप से नौकरी छोड़ने का प्रस्ताव दिया है। यह कंपनी के एक साल के अंदर दूसरी बड़ी छंटनी प्रक्रिया है।

#माइक्रोसॉफ्ट की कार्यकारी उपाध्यक्ष और चीफ पीपल ऑफिसर एमी कोलमैन ने सोमवार को ब्लॉग पोस्ट में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि Voluntary Exit Offer (VEO) योजना उन कर्मचारियों के लिए है जिनका इंटरनल जॉब ग्रेड 70 या उससे नीचे है। इसमें जनरल मैनेजर और कुछ वाइस प्रेसिडेंट स्तर के कर्मचारी भी शामिल हैं, लेकिन कॉर्पोरेट वाइस प्रेसिडेंट इसमें नहीं आते। कंपनी के कुल करीब 2.23 लाख कर्मचारियों में से लगभग एक चौथाई को इस स्वैच्छिक योजना में शामिल किया गया है।

#भारत में माइक्रोसॉफ्ट के लगभग 23 हजार कर्मचारी काम करते हैं। कितने लोग इस ऑफर को स्वीकार करेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। कंपनी ने पहले रिटायरमेंट बायआउट ऑफर दिया था। इस बार उम्र, अनुभव के साल या परफॉर्मेंस जैसे मापदंडों को नहीं देखा गया। पात्र कर्मचारियों को व्यक्तिगत ईमेल भेजे गए हैं। उन्हें दिसंबर के पहले सप्ताह तक फैसला करना है कि वे साल के अंत तक कंपनी छोड़ेंगे या नहीं।

#कोलमैन के अनुसार, ऑफर स्वीकार करने वाले कर्मचारियों को हर साल की सेवा के बदले एक महीने के बेसिक सैलरी के बराबर राशि, स्वास्थ्य बीमा, नई नौकरी या करियर बदलाव के लिए सहायता और अपना स्टार्टअप शुरू करने के लिए आर्थिक मदद दी जाएगी। यह योजना सीमित समय के लिए है। कंपनी ने साफ कहा है कि हर देश और विभाग में ऑफर एक जैसा नहीं होगा। यह कारोबारी प्राथमिकताओं, ग्राहकों की जरूरतों और कर्मचारियों की स्थिति पर निर्भर करेगा। वरिष्ठता, देश, जगह और सेवा के हिसाब से पैकेज अलग-अलग हो सकते हैं। भविष्य में और नौकरियों में कटौती की संभावना को भी कंपनी ने पूरी तरह नकारा नहीं है।

एआई और क्लाउड पर फोकस बढ़ाने के लिए #माइक्रोसॉफ्ट बड़े पैमाने पर संसाधन जुटा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनी दक्षता बढ़ाने और लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या नियंत्रित करना चाहती है। जो कर्मचारी ऑफर ठुकराएंगे, उनके लिए आगे चुनौतियां बढ़ सकती हैं क्योंकि कंपनी आगे भी इसी दिशा में कदम बढ़ा सकती है।

#भारत में अचानक छंटनी का एक और मामला: इनोडेटा ने 550 कर्मचारियों की नौकरी खत्म की

इसी बीच भारत में एक अमेरिकी कंपनी की सब्सिडियरी इनोडेटा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने करीब 550 कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के नौकरी से निकाल दिया। न्यू जर्सी मुख्यालय वाली इस कंपनी के कर्मचारियों ने सोमवार को सामान्य दिन की तरह ऑफिस पहुंचे, लैपटॉप खोला, लॉगिन किया और उपस्थिति दर्ज की। कुछ घंटों बाद अचानक सिस्टम लॉगआउट हो गए, आधिकारिक आईडी बंद हो गईं और व्यक्तिगत ईमेल पर टर्मिनेशन मेल आ गया।

कर्मचारियों के अनुसार दिन की शुरुआत पूरी तरह सामान्य थी। दोपहर तक काम का दबाव था। किसी को अंदाजा नहीं था कि छंटनी होने वाली है। लंच के आसपास स्थिति बदलने लगी। कुछ लोगों का सिस्टम एक्सेस धीरे-धीरे बंद होने लगा। फिलीपींस की टीम को जूम कॉल के दौरान ही निकाल दिया गया, जिसमें क्वालिटी एक्सपर्ट्स, टीम लीड्स और ऑपरेशनल मैनेजर शामिल थे। भारत के कर्मचारियों ने एचआर पोर्टल चेक किया तो पाया कि पे स्लिप पहले ही बन चुकी थी और इस्तीफे की तारीख 26 अक्टूबर दर्ज थी।

मैनेजर खुद हैरान थे। एचआर से संपर्क करने की कोशिश के दौरान कई कर्मचारियों का एक्सेस भी कट गया। लैपटॉप लॉगआउट हो गए और आधिकारिक आईडी निष्क्रिय हो गईं। कर्मचारियों का कहना है कि न कोई कारण बताया गया, न कोई बातचीत हुई और न कोई नोटिस मिला। अचानक सिस्टम बंद और नौकरी खत्म। यह घटना टेक सेक्टर में बढ़ती अनिश्चितता को दर्शाती है।

माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियां एआई निवेश के नाम पर कर्मचारियों की संख्या घटा रही हैं जबकि छोटी-मझोली कंपनियां भी अचानक कटौती कर रही हैं। दोनों मामलों में कर्मचारियों को आर्थिक सुरक्षा और करियर ट्रांजिशन के विकल्प सीमित नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि ऐसे समय में कौशल विकास, नेटवर्किंग और वैकल्पिक अवसरों पर ध्यान देना जरूरी है।

टेक इंडस्ट्री में बदलाव तेज है। एआई की बदौलत उत्पादकता बढ़ रही है लेकिन रोजगार के पारंपरिक ढांचे पर दबाव भी बढ़ रहा है। माइक्रोसॉफ्ट का स्वैच्छिक ऑफर कुछ राहत देता है लेकिन इनोडेटा जैसी घटनाएं कर्मचारियों की असुरक्षा को उजागर करती हैं। आने वाले महीनों में और कंपनियों के फैसले उद्योग की दिशा तय करेंगे।


Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

नेतन्याहू की संभावित विदाई: तेल अवीव में विपक्ष का जश्न शुरू, गठबंधन बहुमत से पीछे!

नेतन्याहू की संभावित विदाई: तेल अवीव में विपक्ष का जश्न शुरू, गठबंधन बहुमत से पीछे!
-Friday World Oct 28,2026 
तेल अवीव की सड़कों और विपक्षी मुख्यालयों में वोटिंग खत्म होते ही जश्न का माहौल छा गया। चुनावी सर्वे और शुरुआती एग्जिट पोल के मुताबिक बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गया है। विपक्षी समर्थक खुशी से झूम रहे हैं, जबकि अरब पार्टियाँ सत्ता समीकरण में अहम भूमिका निभा सकती हैं। जो नेतन्याहू चुनाव चुराने की आशंका जता रहे थे, उनके विरोधी अब जश्न मना रहे हैं।

इसराइल में मंगलवार को हुए आम चुनाव के बाद राजनीतिक हवा बदलती दिख रही है। नेतन्याहू लंबे समय से प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में हैं, लेकिन इस बार उनके गठबंधन को चुनौती मिली है। एग्जिट पोल और शुरुआती रुझानों में विपक्षी ब्लॉक को बढ़त मिलने की खबरें आईं। तेल अवीव में विपक्षी पार्टियों के समर्थक सड़कों पर उतर आए। इजरायली झंडे लहराते हुए वे नारेबाजी कर रहे थे और नेतन्याहू के खिलाफ “बाइबाइ बीबी” जैसे नारे लगा रहे थे।

चुनावी सर्वे के अनुसार नेतन्याहू का दक्षिणपंथी-धार्मिक गठबंधन 61 सीटों के बहुमत से पीछे रह गया। विपक्षी खेमे, जिसमें गादी आइजनकोट जैसे नेताओं का प्रभाव है, और अरब पार्टियाँ मिलकर सत्ता का समीकरण तय कर सकती हैं। अरब पार्टियों की भूमिका इस बार और महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि बिना उनके समर्थन के किसी भी पक्ष के लिए स्थिर सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है।

नेतन्याहू और उनके सहयोगियों ने चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उन्होंने कुछ जगहों पर अनियमितताओं और वोट चोरी की आशंका जताई थी। लेकिन वोटिंग खत्म होते ही विरोधी खेमे में उत्साह छा गया। तेल अवीव के एक अखाड़े में आयोजित विपक्षी कार्यक्रम में समर्थक खुशी से नाच रहे थे। कई लोग कह रहे थे कि अब बदलाव का समय आ गया है। अक्टूबर 2023 की घटनाओं के बाद से देश में तनाव और विभाजन बढ़ा था। लोग सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता की मांग कर रहे थे। उच्च मतदान प्रतिशत ने भी इस बदलाव की ओर इशारा किया।

विपक्ष अब गठबंधन की बातचीत पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। अरब पार्टियाँ किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं। अगर विपक्षी ब्लॉक और अरब पार्टियाँ समझौता कर लेती हैं तो नेतन्याहू को सत्ता छोड़नी पड़ सकती है। हालांकि अंतिम नतीजे आने में कुछ समय लगेगा और वोट गिनती जारी है। कई विश्लेषक कहते हैं कि स्थिति अभी अनिश्चित है और कोई भी पक्ष आसानी से बहुमत नहीं हासिल कर पा रहा।

तेल अवीव में जश्न का माहौल देखकर लगता है कि विपक्षी समर्थक पहले से ही नेतन्याहू की विदाई मान बैठे हैं। सोशल मीडिया पर भी तस्वीरें और वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें लोग झंडे लहराते और एक-दूसरे को गले लगाते दिख रहे हैं। कुछ जगहों पर पार्टियाँ सजी हुई हैं और युवा उत्साह से भरे हुए हैं। यह दृश्य उन दिनों की याद दिलाता है जब नेतन्याहू के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए थे।

नेतन्याहू का गठबंधन कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। उनकी नीतियों पर विवाद, गठबंधन के भीतर मतभेद और अंतरराष्ट्रीय दबाव ने भी असर डाला है। विपक्ष का कहना है कि जनता ने बदलाव का संदेश दिया है। आइजनकोट जैसे नेताओं ने कहा कि लोगों ने नेतन्याहू पर अविश्वास जताया है और योग्य नेता को राजनीतिक जीवन से रिटायरमेंट ले लेना चाहिए।

अरब पार्टियों की भागीदारी इसराइल की राजनीति में नया अध्याय खोल सकती है। लंबे समय से उन्हें सत्ता से दूर रखा जाता रहा है, लेकिन इस बार उच्च मतदान और सीटों में बढ़ोतरी ने उनकी स्थिति मजबूत की है। अगर वे विपक्ष के साथ मिलते हैं तो सरकार बनाने का रास्ता खुल सकता है। वहीं नेतन्याहू का खेमा अभी भी दावा कर रहा है कि वे दाईं ओर बहुमत हासिल करेंगे और अरब पार्टियों पर निर्भर सरकार नहीं बनाएंगे।

अंतिम नतीजे आने तक तनाव बना रहेगा। वोट गिनती के दौरान आंकड़े बदल सकते हैं। कुछ रिपोर्ट्स में नेतन्याहू के ब्लॉक को थोड़ी बढ़त भी दिखाई गई, लेकिन बहुमत से दूर। ऐसे में गठबंधन वार्ता लंबी खिंच सकती है औरCaretaker सरकार का दौर भी चल सकता है। अगर कोई समझौता नहीं होता तो दोबारा चुनाव की संभावना भी बनी रहती है।

तेल अवीव का जश्न सिर्फ खुशी का नहीं बल्कि राजनीतिक बदलाव की आकांक्षा का प्रतीक है। लोग थके हुए हैं लंबे राजनीतिक संघर्ष से। वे स्थिरता, सुरक्षा और आर्थिक सुधार चाहते हैं। चाहे अंतिम परिणाम कुछ भी हो, इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि नेतन्याहू की सत्ता अब उतनी अटल नहीं रही जितनी पहले लगती थी।

विपक्षी समर्थक उम्मीद लगाए बैठे हैं कि जल्द ही नई सरकार का गठन होगा। अरब पार्टियाँ अपनी शर्तें रख सकती हैं। नेतन्याहू अगर हारते हैं तो यह उनके लंबे राजनीतिक करियर का महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा। कई देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं क्योंकि इसराइल की राजनीति मध्य पूर्व की स्थिरता से जुड़ी है।

अभी इंतजार है अंतिम आंकड़ों का। लेकिन तेल अवीव की सड़कों पर जो उत्साह दिख रहा है वह विपक्ष की जीत की आशा को मजबूत करता है। नेतन्याहू की विदाई की चर्चा अब जोर पकड़ रही है। चाहे वे सत्ता में रहें या नहीं, इस चुनाव ने इसराइल की राजनीति को नई दिशा दी है। जनता का फैसला अंतिम होगा और उसी के आधार पर नई सरकार का गठन होगा।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

ट्रम्प की चेतावनी: ईमानदार चुनाव होंगे तभी स्वीकार करेंगे मिडटर्म के नतीजे

ट्रम्प की चेतावनी: ईमानदार चुनाव होंगे तभी स्वीकार करेंगे मिडटर्म के नतीजे
-Friday World Oct 28,2026 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। एयर फोर्स वन में टेक्सास जाने से पहले पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि अगर मिडटर्म चुनाव ईमानदारी से होंगे, तभी वे नतीजों को स्वीकार करेंगे। 3 नवंबर को होने वाले इन चुनावों से पहले यह बयान अमेरिकी राजनीति में नई हलचल पैदा कर रहा है।

ट्रम्प ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं स्वीकार करूंगा, अगर चुनाव ईमानदार होंगे।” यह जवाब तब आया जब उनसे पूछा गया कि क्या वे नतीजों का सम्मान करेंगे, चाहे परिणाम कुछ भी हों। वर्तमान में रिपब्लिकन पार्टी के नियंत्रण वाले कांग्रेस के दोनों सदनों – हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट – में सत्ता का संतुलन बदल सकता है।

ट्रम्प टेक्सास पहुंचे हैं रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन के समर्थन में प्रचार करने। सीनेट सीट के लिए पैक्सटन का मुकाबला डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टालारिको से है। ट्रम्प पारंपरिक रूप से मजबूत रिपब्लिकन राज्यों में प्रचार तेज कर रहे हैं। वहीं पार्टी के कुछ रणनीतिकार अलास्का से लेकर साउथ कैरोलिना तक कई सीटों को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि टैरिफ नीतियों और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों के कारण महंगाई बढ़ने से मतदाताओं में असंतोष फैल सकता है।

इस मिडटर्म चुनाव में हाउस की सभी 435 सीटें और सीनेट की 35 सीटें दांव पर हैं। कुल मिलाकर कांग्रेस की लगभग 470 सीटों पर मतदान होगा। सर्वेक्षणों के अनुसार डेमोक्रेटिक पार्टी हाउस में बहुमत हासिल कर सकती है, जबकि सीनेट में कड़ी टक्कर की संभावना है।

वर्तमान में दोनों सदनों पर रिपब्लिकन नियंत्रण होने से ट्रम्प को अपनी नीतियों को आगे बढ़ाने में आसानी हो रही है। अगर डेमोक्रेट्स एक या दोनों सदनों पर कब्जा कर लेते हैं, तो ट्रम्प के एजेंडे को लागू करना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही डेमोक्रेट्स प्रशासन की जांच शुरू करने की स्थिति में भी आ सकते हैं।

ट्रम्प ने कहा कि अगर डेमोक्रेट्स नियंत्रण लेते हैं, तो वे वीटो पावर का इस्तेमाल करेंगे और सौदेबाजी का रास्ता निकालेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि कई राष्ट्रपतियों को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है।

यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रम्प लगातार चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने मतदाता धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं, हालांकि ठोस सबूत पेश नहीं किए। न्याय विभाग भी कुछ राज्यों में कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

3 नवंबर का चुनाव ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल का महत्वपूर्ण परीक्षण होगा। नतीजे न केवल कांग्रेस का स्वरूप तय करेंगे, बल्कि बाकी कार्यकाल की राजनीति को भी प्रभावित करेंगे। ट्रम्प का “ईमानदार चुनाव” वाला शर्त वाला बयान विपक्ष और आलोचकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। कुछ इसे संदेह फैलाने की रणनीति बता रहे हैं, तो कुछ इसे चुनाव की निष्पक्षता पर जोर मान रहे हैं।

अमेरिकी लोकतंत्र में मिडटर्म चुनाव हमेशा सत्ताधारी दल के लिए चुनौती भरे होते हैं। इस बार भी महंगाई, विदेश नीति और घरेलू मुद्दे मतदाताओं के मूड को प्रभावित कर रहे हैं। ट्रम्प लगातार रैलियां कर रहे हैं और अपने समर्थकों को प्रेरित करने की कोशिश में जुटे हैं।

नतीजे आने के बाद स्थिति और स्पष्ट होगी। फिलहाल ट्रम्प का यह बयान पूरे देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। क्या चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होंगे और नतीजे सर्वमान्य होंगे, यह देखने वाली बात है। अमेरिका की राजनीतिक हवा इन दिनों गरमाई हुई है और 3 नवंबर का दिन इतिहास रचने वाला साबित हो सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 28,2026 

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October 28, 2026

ब्राजील चुनाव हारने के बाद फ्लावियो बोल्सोनारो अमेरिका भागे, पासपोर्ट सरेंडर का आदेश टाला

ब्राजील चुनाव हारने के बाद फ्लावियो बोल्सोनारो अमेरिका भागे, पासपोर्ट सरेंडर का आदेश टाला
-Friday World Oct 28,2026 
ब्राजील में हाल ही में संपन्न राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चरण में हार का सामना करने वाले फ्लावियो बोल्सोनारो देश छोड़कर अमेरिका चले गए हैं। मंगलवार और बुधवार को विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया। उनके प्रवक्ता या आधिकारिक टीम की तरफ से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है।

२५ अक्टूबर २०२६ को हुए रन-ऑफ में मौजूदा राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा ने करीब ५१.८ प्रतिशत वोट हासिल कर चौथी बार राष्ट्रपति पद जीत लिया। फ्लावियो बोल्सोनारो को लगभग ४८.२ प्रतिशत वोट मिले। दोनों के बीच करीब ४४ लाख वोटों का अंतर रहा। पहले चरण में फ्लावियो आगे थे, लेकिन दूसरे चरण में लूला ने ऐतिहासिक वापसी की।

फ्लावियो ने हार स्वीकार नहीं की। उन्होंने मतदान प्रक्रिया में अनियमितताओं, खासकर मतदान समय बढ़ाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए चुनाव परिणाम रद्द करने और लूला व उपराष्ट्रपति गेराल्डो अल्कमिन की उम्मीदवारी रद्द करने की मांग की। बाद में उन्होंने कुछ हद तक रुख बदला और विपक्ष में रहने की बात कही, लेकिन कानूनी चुनौती जारी रखने का संकेत दिया।

सोमवार को अदालत ने उन्हें मंगलवार दोपहर तक अपना सामान्य और राजनयिक पासपोर्ट जमा कराने का आदेश दिया था। पासपोर्ट जमा कराने या न कराने की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई। रिपोर्ट्स के अनुसार उन्होंने आदेश की अवहेलना की और परिवार के साथ देश छोड़ दिया। रास्ता अर्जेंटीना और इक्वाडोर होते हुए निजी जेट से मियामी की ओर बताया जा रहा है। टेक्सास में रह रहे उनके भाई एडुआर्डो बोल्सोनारो से मुलाकात की संभावना जताई गई है। अमेरिकी अधिकारियों ने वीजा जारी करने की पुष्टि की है।

फ्लावियो बोल्सोनारो पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के पुत्र हैं। जायर बोल्सोनारो २०२२ के चुनाव हारने के बाद कथित तख्तापलट के प्रयास के मामले में २७ साल की सजा काट रहे हैं और नजरबंद हैं। फ्लावियो खुद भ्रष्टाचार, मनी लॉन्ड्रिंग और टैक्स से जुड़े मामलों में जांच का सामना कर रहे हैं। उन्होंने सभी आरोपों से इनकार किया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी बिना ठोस सबूत के ब्राजील चुनाव को “धांधली वाली” बताया था। लूला ट्रंप के आलोचक माने जाते हैं।

यह घटना ब्राजील की राजनीति में तनाव बढ़ा रही है। जांच एजेंसियां सक्रिय बताई जा रही हैं। फ्लावियो के अमेरिका पहुंचने के बाद आगे क्या रुख अपनाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा। ब्राजील की लोकतांत्रिक संस्थाएं और न्यायिक प्रक्रिया अब परीक्षा की घड़ी में हैं।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 28,2026 

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