March 24, 2026
ट्रंप को इंडोनेशिया का तगड़ा झटका: “1 अरब डॉलर नहीं देंगे”, बोर्ड ऑफ पीस में स्थायी सदस्यता से साफ इनकार
ट्रंप को इंडोनेशिया का तगड़ा झटका: “1 अरब डॉलर नहीं देंगे”, बोर्ड ऑफ पीस में स्थायी सदस्यता से साफ इनकार-Friday World March 24,2026
विश्व के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी ‘बोर्ड ऑफ पीस’ योजना को सीधा झटका दे दिया है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने रविवार को अपने आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर जारी एक वीडियो बयान में स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनका देश 1 अरब डॉलर की कोई फीस नहीं देगा और बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए यह राशि चुकाने को तैयार नहीं है।
प्रबोवो ने कहा, “हमने कभी यह नहीं कहा कि हम 1 अरब डॉलर का योगदान देंगे। हमने केवल शांति बनाए रखने के लिए सैनिक भेजने की प्रतिबद्धता जताई थी।” उनका यह बयान ट्रंप प्रशासन के लिए न सिर्फ राजनयिक झटका है, बल्कि मुस्लिम दुनिया में अमेरिकी पहल के प्रति बढ़ते असंतोष का भी स्पष्ट संकेत है।
प्रबोवो का सख्त रुख: “फिलिस्तीन के हित न हों तो बाहर निकल जाएंगे” राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने आगे चेतावनी देते हुए कहा कि अगर यह बोर्ड फिलिस्तीनियों के हित में काम नहीं करता या इंडोनेशिया के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ जाता है, तो इंडोनेशिया तुरंत इस पहल से बाहर निकल जाएगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि इंडोनेशिया की भागीदारी सिर्फ शांति स्थापना तक सीमित है, न कि किसी वित्तीय दबाव या शर्तों के अधीन।
यह बयान ऐसे समय आया है जब इंडोनेशिया में मुस्लिम संगठनों का प्रबोवो सरकार पर भारी दबाव है। कई इस्लामी संगठन गाजा में 8000 शांति सैनिक भेजने के फैसले का खुलकर विरोध कर रहे हैं और इसे “ट्रंप-इजराइल की योजना में फंसने” के रूप में देख रहे हैं।
ट्रंप की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ क्या है और क्यों हो रही है आलोचना? ट्रंप प्रशासन ने कतर और मिस्र के साथ मिलकर अक्टूबर 2025 में गाजा युद्ध के लिए युद्धविराम कराया था। उसी युद्धविराम का हिस्सा है ‘बोर्ड ऑफ पीस’। इस बोर्ड का उद्देश्य गाजा में स्थायी शांति स्थापित करना और क्षेत्र का पुनर्निर्माण करना बताया गया है। लेकिन बोर्ड में स्थायी सदस्य बनने के लिए हर देश को 1 अरब डॉलर (लगभग 8,400 करोड़ रुपये) की फीस चुकानी होगी।
यह ‘पे-टू-प्ले’ मॉडल वैश्विक स्तर पर तीखी आलोचना का विषय बन गया है। कई देश और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे “शांति के नाम पर व्यापार” बता रहे हैं। इंडोनेशिया जैसे बड़े मुस्लिम देश का इनकार इस योजना की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।
घरेलू दबाव और मुस्लिम दुनिया का असंतोष इंडोनेशिया में पूर्व सेना प्रमुख प्रबोवो सुबियांतो को सत्ता संभालते ही मुस्लिम संगठनों से विरोध का सामना करना पड़ रहा है। गाजा में हजारों शांति सैनिक भेजने के वादे पर कई जिहादी और इस्लामी समूह सवाल उठा रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या इंडोनेशिया अमेरिका और इजराइल के दबाव में फिलिस्तीनी मुद्दे पर समझौता कर रहा है?
प्रबोवो ने इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए कहा कि इंडोनेशिया की भागीदारी केवल फिलिस्तीनियों की मदद के लिए है। अगर बोर्ड फिलिस्तीन के हितों के खिलाफ काम करता दिखा तो वे पूरी तरह बाहर निकल जाएंगे। यह बयान घरेलू स्तर पर उनकी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
वैश्विक प्रभाव: मुस्लिम देशों में ट्रंप की चुनौती बढ़ी इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश है, जहां 24 करोड़ से ज्यादा मुसलमान रहते हैं। इसका इनकार ट्रंप की विदेश नीति के लिए बड़ा संकेत है। गाजा युद्ध, ईरान पर हमले और मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका को मुस्लिम देशों का समर्थन चाहिए, लेकिन इंडोनेशिया जैसे प्रभावशाली देश अब सवाल पूछ रहे हैं और शर्तें लगा रहे हैं।
कई विश्लेषक मानते हैं कि ‘बोर्ड ऑफ पीस’ असल में गाजा के पुनर्निर्माण के नाम पर इजराइल की सुरक्षा सुनिश्चित करने और हमास को कमजोर करने का एक नया मंच है। इंडोनेशिया का कहना है कि वह केवल शांति सैनिक भेज सकता है, लेकिन 1 अरब डॉलर की भारी फीस चुकाने को तैयार नहीं।
यह फैसला अन्य मुस्लिम देशों — जैसे मलेशिया, पाकिस्तान, तुर्की आदि — को भी प्रभावित कर सकता है। अगर बड़े मुस्लिम देश ट्रंप की इस योजना से दूरी बनाते रहे तो बोर्ड की साख और कमजोर हो जाएगी।
इंडोनेशिया की रणनीति: शांति हां, लेकिन पैसे नहीं प्रबोवो सुबियांतो ने स्पष्ट किया कि इंडोनेशिया ने बोर्ड की स्थापना बैठक में भी वित्तीय योगदान की कोई चर्चा नहीं की थी। उन्होंने कहा, “हमने केवल शांति बनाए रखने के लिए सैनिकों की प्रतिबद्धता दिखाई है।” यह बयान ट्रंप प्रशासन के दावों से सीधे टकराता है, जो इंडोनेशिया को बड़े योगदानकर्ता के रूप में पेश कर रहा था।
इंडोनेशिया की यह मजबूत मुद्रा दिखाती है कि बड़े मुस्लिम देश अब अमेरिकी योजनाओं में बिना शर्त शामिल होने को तैयार नहीं हैं। प्रबोवो ने साथ ही कहा कि अगर बोर्ड फिलिस्तीनियों के लिए फायदेमंद नहीं रहा तो वे पूरी तरह बाहर निकल जाएंगे।
आगे क्या? ट्रंप प्रशासन अब इंडोनेशिया के इस इनकार पर प्रतिक्रिया देने की तैयारी में है। अमेरिका इंडोनेशिया के साथ व्यापार समझौते और रक्षा सहयोग की बात भी कर रहा था, लेकिन यह झटका उन चर्चाओं को भी प्रभावित कर सकता है।
दुनिया भर के मुस्लिम देश अब इस घटनाक्रम को ध्यान से देख रहे हैं। इंडोनेशिया का फैसला साबित करता है कि शांति की आड़ में वित्तीय दबाव अब आसानी से काम नहीं करेगा। गाजा में चल रहे संघर्ष, ईरान पर हमले और मध्य पूर्व की अस्थिरता के बीच इंडोनेशिया का यह कदम मुस्लिम दुनिया में एक नई स्वतंत्र आवाज के रूप में उभर रहा है।
ट्रंप की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ योजना को पहला बड़ा झटका इंडोनेशिया से लगा है। अब देखना यह है कि अन्य देश क्या रुख अपनाते हैं। क्या यह बोर्ड सिर्फ अमीर देशों का क्लब बनकर रह जाएगा, या ट्रंप को अपनी योजना में बदलाव करना पड़ेगा?
इंडोनेशिया का संदेश बहुत साफ है — शांति के लिए सैनिक भेज सकते हैं, लेकिन 1 अरब डॉलर नहीं देंगे। यह फैसला न सिर्फ ट्रंप के लिए, बल्कि पूरी वैश्विक कूटनीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 24,2026