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Sunday, 24 May 2026

May 24, 2026

कॉकरोच जनता पार्टी पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा: CJI की टिप्पणी का ‘व्यावसायिक शोषण’ या युवा असंतोष की नई आवाज?

कॉकरोच जनता पार्टी पर सुप्रीम कोर्ट का शिकंजा: CJI की टिप्पणी का ‘व्यावसायिक शोषण’ या युवा असंतोष की नई आवाज?
-Friday World- 24 May 2026
नई दिल्ली। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्या कांत की एक मौखिक टिप्पणी ने पूरे देश में तूफान खड़ा कर दिया। एक तरफ जहां यह टिप्पणी युवाओं के बीच गुस्से और व्यंग्य की लहर बन गई, वहीं दूसरी तरफ उसी टिप्पणी को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (Cockroach Janta Party - CJP) के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इस संगठन ने अदालत की टिप्पणी का गलत और व्यावसायिक इस्तेमाल किया है।

यह घटनाक्रम न केवल न्यायपालिका की गरिमा, मौखिक टिप्पणियों की सीमा और सोशल मीडिया के युग में व्यंग्य की शक्ति को रेखांकित करता है, बल्कि बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था और युवा निराशा जैसे गहरे सामाजिक मुद्दों को भी फिर से चर्चा में ला रहा है।

 CJI की टिप्पणी: क्या कहा था और क्या विवाद हुआ?

15 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट की नियुक्ति से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान CJI सूर्या कांत ने कुछ मौखिक टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि “कुछ युवा कॉकरोच की तरह हैं, जो नौकरी नहीं पाते और प्रोफेशन में जगह नहीं बना पाते। वे मीडिया, सोशल मीडिया, RTI एक्टिविस्ट या अन्य एक्टिविस्ट बनकर सिस्टम पर हमला करते हैं।” साथ ही उन्होंने “परजीवी” (parasites) शब्द का भी इस्तेमाल किया।

ये टिप्पणियां जल्द ही वायरल हो गईं। मीडिया और सोशल मीडिया पर इसे युवाओं के प्रति अपमान के रूप में देखा गया। भारी आलोचना के बाद CJI ने स्पष्टीकरण जारी किया कि उनकी टिप्पणी फर्जी डिग्री लेकर वकालत जैसे पेशों में घुसने वालों पर थी, न कि पूरे युवा वर्ग पर। उन्होंने युवाओं को “विकसित भारत के स्तंभ” बताया।

लेकिन स्पष्टीकरण के बावजूद क्षति हो चुकी थी। टिप्पणी ने युवाओं के गुस्से को भड़का दिया, खासकर बेरोजगारी (कई रिपोर्ट्स में 80% से ज्यादा युवा बेरोजगारी का जिक्र), NEET-UG पेपर लीक जैसे घोटालों और सिस्टम में भ्रष्टाचार की पृष्ठभूमि में।

कॉकरोच जनता पार्टी का उदय: व्यंग्य से आंदोलन तक

टिप्पणी के ठीक बाद बॉस्टन यूनिवर्सिटी के 30 वर्षीय छात्र अभिजीत दीपके ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) की शुरुआत की। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि एक व्यंग्यात्मक, मीम-आधारित सोशल मीडिया मूवमेंट है। इसने मॉक मेनिफेस्टो, मीम्स, रील्स और युवा-केंद्रित कैंपेन के जरिए तेजी से लोकप्रियता हासिल की।

कुछ दिनों में CJP के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स लाखों-करोड़ों में पहुंच गए (कुछ रिपोर्ट्स में 10-20 मिलियन का आंकड़ा)। युवा इसे बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की खामियों और संस्थानों पर सवाल उठाने का माध्यम मानने लगे। “भारत इतना नफरत भरा हो गया है कि कॉकरोच जनता पार्टी ताजी हवा की तरह लगती है,” जैसी टिप्पणियां आम हो गईं।

CJP ने खुद को “परजीवियों” और “कॉकरोचों” के रूप में प्रस्तुत कर व्यंग्य का हथियार बनाया। यह Gen-Z का असंतोष था, जो मीम्स और डिजिटल भाषा में व्यक्त हो रहा था।

 सुप्रीम कोर्ट में याचिका: क्या हैं मांगें?

24 मई 2026 को एडवोकेट राजा चौधरी द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) में मुख्य आरोप है कि CJP ने सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों का “गलत और व्यावसायिक शोषण” किया है। याचिका में कहा गया है:

- CJP ने अदालती टिप्पणियों को ब्रांडिंग, पब्लिसिटी, ट्रेडमार्क और डिजिटल मोनेटाइजेशन के लिए इस्तेमाल किया।

- यह संवैधानिक कार्यवाही का “खतरनाक commodification” है।

- साथ ही फर्जी डिग्री वाले “फेक एडवोकेट्स” की जांच के लिए CBI जांच की मांग की गई है।

- याचिका में सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और CBI को रेस्पॉन्डेंट बनाया गया है।

याचिका का तर्क है कि अदालत की गरिमा बनाए रखना जरूरी है और मौखिक टिप्पणियों को व्यावसायिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

 बहस के दोनों पक्ष

विरोधियों का तर्क:
मौखिक टिप्पणियां (oral observations) अंतिम फैसला नहीं होतीं। इन्हें संदर्भ से बाहर निकालकर व्यंग्य या मोनेटाइजेशन के लिए इस्तेमाल करना अदालत का अपमान है। सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स बढ़ाने, विदेशी फंडिंग या बॉट्स के आरोप भी लगे हैं। कुछ नेता इसे विदेशी ताकतों (पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि) का साजिश बताते हैं।

समर्थकों का तर्क:
यह शुद्ध व्यंग्य है। CJI की टिप्पणी ने युवा पीढ़ी की पीड़ा को छुआ, जिसे CJP ने सकारात्मक रूप से व्यक्त किया। बेरोजगारी, पेपर लीक और सिस्टमिक फेल्योर जैसे मुद्दे असली हैं। युवाओं का यह डिजिटल प्रतिरोध लोकतंत्र की ताकत है, न कि अपराध। अभिजीत दीपके ने बार-बार स्पष्ट किया कि यह भारतीय युवाओं का आंदोलन है।

 : युवा भारत की पीड़ा

यह विवाद सिर्फ एक टिप्पणी या एक पार्टी का नहीं है। भारत में युवा बेरोजगारी, उच्च शिक्षा की गुणवत्ता, परीक्षा घोटालों और नौकरी बाजार की कठोरता लंबे समय से मुद्दे हैं। CJP का उदय इन गहरी दरारों का प्रतीक है। जब पारंपरिक राजनीतिक दलों में युवा जुड़ाव कम होता है, तब व्यंग्य और मीम्स नई राजनीतिक भाषा बन जाते हैं।

न्यायपालिका के लिए भी यह चुनौती है। मौखिक टिप्पणियों की शक्ति और उनकी सीमाएं क्या हैं? क्या सोशल मीडिया युग में अदालतों को अपनी छवि और संवाद को और सावधानी से संभालना चाहिए?


सुप्रीम कोर्ट अब इस PIL पर सुनवाई करेगा। फैसला न केवल CJP की किस्मत तय करेगा, बल्कि व्यंग्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक गरिमा के बीच संतुलन भी तय करेगा।

कॉकरोच जनता पार्टी चाहे व्यंग्यात्मक हो, लेकिन उसने एक सच्चाई उजागर की है — युवा भारत चुप नहीं रहना चाहता। वह सवाल पूछ रहा है, बदलाव मांग रहा है। चाहे मीम्स के जरिए हो या आंदोलन के रूप में।

भारत का भविष्य इसी युवा ऊर्जा पर निर्भर है। सवाल यह है कि हम इसे दबाएंगे या उसकी पीड़ा को समझकर समाधान निकालेंगे?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World- 24 May 2026
May 24, 2026

हिमालय की गर्जना: बद्रीनाथ के पास कंचनगंगा में हिमस्खलन, प्रकृति की शक्ति और प्रशासन की सतर्कता

हिमालय की गर्जना: बद्रीनाथ के पास कंचनगंगा में हिमस्खलन, प्रकृति की शक्ति और प्रशासन की सतर्कता -Friday World 24 May 2026

उत्तराखंड के पावन बद्रीनाथ धाम के निकट हिमालय की ऊंची चोटियों पर एक बार फिर प्रकृति ने अपनी विशाल शक्ति का प्रदर्शन किया है। रविवार सुबह कंचनगंगा क्षेत्र में हुए हिमस्खलन का खौफनाक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें बर्फ के विशाल खंड टूटते हुए नीचे की ओर लुढ़कते दिख रहे हैं। बर्फ का गुबार, हवा में उड़ती चट्टानें और तेज बहाव देखकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो सकते हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि इस घटना में किसी प्रकार की जनहानि या संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ है।

 घटना का विवरण
चमोली जिले में बद्रीनाथ धाम से लगभग 2 किलोमीटर पहले कुबेर भंडार (कुबेर पर्वत) शिखर से यह हिमस्खलन हुआ। ग्लेशियर टूटने के साथ भारी मात्रा में बर्फ़ और चट्टानें कंचनगंगा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में गिरों। वीडियो में देखा जा सकता है कि ऊंचाई से बर्फ़ का विशाल सैलाब तेजी से नीचे आ रहा है, मानो पहाड़ स्वयं हिल रहा हो।

स्थानीय लोगों और यात्रियों में शुरुआती क्षणों में हड़कंप मच गया, लेकिन घटना उच्च ऊंचाई पर होने के कारण सड़क या बस्ती तक नहीं पहुंची। हिमस्खलन खाई वाले हिस्से में ही रुक गया, जिससे यातायात और बद्रीनाथ यात्रा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

प्रशासन का बयान: “प्राकृतिक प्रक्रिया”
चमोली के जिलाधिकारी गौरव कुमार ने स्पष्ट किया, “कंचनगंगा क्षेत्र में हुआ हिमस्खलन एक प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। इस तरह की घटनाएं हिमालयी क्षेत्र में समय-समय पर होती रहती हैं।” उन्होंने आश्वासन दिया कि प्रशासन क्षेत्र की लगातार निगरानी कर रहा है और फिलहाल स्थिति पूरी तरह सामान्य है।

जिलाधिकारी ने आगे बताया कि हिमस्खलन सड़क तक नहीं पहुंचा और खाई में ही सीमित रहा, इसलिए आम जनजीवन या तीर्थयात्रियों पर कोई असर नहीं पड़ा। आपदा प्रबंधन टीम और स्थानीय प्रशासन अलर्ट मोड पर है।

 बद्रीनाथ धाम और कंचनगंगा का महत्व
बद्रीनाथ धाम भगवान विष्णु के भव्य मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह चार धाम यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। बद्रीनाथ हिमालय की गोद में बसा है, जहां चारों तरफ बर्फीली चोटियां और ग्लेशियर मौजूद हैं। कंचनगंगा क्षेत्र बद्रीनाथ के ठीक ऊपर स्थित है और यहां कई छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं।

ये ग्लेशियर न केवल दृश्य सौंदर्य बढ़ाते हैं, बल्कि अलकनंदा नदी की सहायक धाराओं का स्रोत भी हैं। गर्मियों में बढ़ती तापमान के कारण ग्लेशियरों में पिघलाव और टूटने की घटनाएं आम हो गई हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से हिमालयी क्षेत्र में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं।

हिमालय में हिमस्खलन: जोखिम और वास्तविकता
हिमालय दुनिया का सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है, जहां भूगर्भीय गतिविधियां सक्रिय हैं। हिमस्खलन यहां की सामान्य प्रक्रिया है, खासकर वसंत और ग्रीष्म ऋतु में जब बर्फ पिघलती है और नई बर्फ जमा होती है।

- 2021 चमोली आपदा: रोंती गढ़ में हुई बड़ी घटना में रॉक-आइस एवलांच ने बड़ी तबाही मचाई थी, जो याद दिलाती है कि सतर्कता कितनी जरूरी है।

- हाल के वर्षों में बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर कई छोटी-बड़ी घटनाएं हुई हैं, लेकिन समय पर प्रशासनिक हस्तक्षेप से नुकसान कम रहा।

विशेषज्ञों का कहना है कि पर्यटन बढ़ने और जलवायु परिवर्तन के साथ जोखिम भी बढ़ा है। इसलिए, SDRF, ITBP और स्थानीय प्रशासन की टीमें 24x7 तैयार रहती हैं।

यात्री और स्थानीयों की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर वीडियो देखकर कई लोगों ने चिंता जताई, लेकिन प्रशासन के आश्वासन के बाद यात्रा सामान्य रूप से चल रही है। बद्रीनाथ में तीर्थयात्रा पूरे जोरों पर है। स्थानीय गाइडों का कहना है कि ऐसी घटनाएं हिमालय की जीवंतता का हिस्सा हैं और डरने की बजाय सावधानी बरतनी चाहिए।

भविष्य की चुनौतियां और उपाय

- निगरानी: सैटेलाइट, ड्रोन और मौसम स्टेशनों से ग्लेशियरों की निरंतर मॉनिटरिंग।

- जागरूकता: यात्रियों को हाई अलर्ट वाले इलाकों में सावधानी बरतने की सलाह।

- सस्टेनेबल टूरिज्म: पर्यावरण संरक्षण के साथ तीर्थयात्रा को बढ़ावा।

- जलवायु कार्रवाई: ग्लोबल वार्मिंग रोकने के प्रयास।

उत्तराखंड सरकार और केंद्र सरकार इन क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के साथ आपदा प्रबंधन को मजबूत कर रही है। हेलीपैड, बेहतर सड़कें, वेबकास्टिंग और रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम मददगार साबित हो रहे हैं।

प्रकृति के साथ सामंजस्य
यह हिमस्खलन हमें हिमालय की भव्यता और उसकी अस्थिरता दोनों की याद दिलाता है। बद्रीनाथ के पास कंचनगंगा की यह घटना प्रकृति की शक्ति का प्रमाण है, लेकिन प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया और कोई नुकसान न होने से राहत भी मिली है।

जब तक हम पर्यावरण का सम्मान करेंगे और सतर्क रहेंगे, तब तक चार धाम यात्रा सुरक्षित और पावन बनी रहेगी। हिमालय हमें चुनौतियां देता है, लेकिन आशीर्वाद भी। यात्रियों से अपील है कि आधिकारिक सूचनाओं पर भरोसा करें और यात्रा का आनंद लें।

प्रशासन का संदेश साफ है— स्थिति नियंत्रण में है, यात्रा सामान्य है। प्रकृति की इस लीला को समझते हुए आगे बढ़ें।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 24 May 2026
May 24, 2026

ईरान-अमेरिका समझौते पर अंतिम मोड़: तसनीम ने खोला राज, 1-2 मुद्दों पर अटका पूरा डील अमेरिका की अड़चन” ने रोका समझौता,

ईरान-अमेरिका समझौते पर अंतिम मोड़: तसनीम ने खोला राज, 1-2 मुद्दों पर अटका पूरा डील अमेरिका की अड़चन” ने रोका समझौता,
-Friday World 24 May 2026
तेहरान/ ईरान और अमेरिका के बीच संभावित परमाणु समझौते को लेकर ईरानी सरकारी मीडिया ने साफ संकेत दिया है कि बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, लेकिन अभी भी 1 या 2 अहम मुद्दों पर गतिरोध बना हुआ है। ईरानी पक्ष अमेरिका पर अड़ियल रवैया अपनाने का आरोप लगा रहा है।

ईरान की प्रमुख सरकारी समाचार एजेंसी तसनीम ने रिपोर्ट में खुलासा किया है कि दोनों पक्षों के बीच “एक या दो” मुद्दों पर अभी भी मतभेद बने हुए हैं। एजेंसी के अनुसार, इन मुद्दों पर अमेरिका की तरफ से अड़चन के कारण समझौता अभी अंतिम रूप नहीं ले पाया है।

 पाकिस्तान मध्यस्थ को दी गई जानकारी
तसनीम ने आगे बताया कि ईरान ने मध्यस्थ भूमिका निभा रहे पाकिस्तान को अपने रुख के बारे में पूरी जानकारी दे दी है। यदि अमेरिका अपनी अड़चन जारी रखता है तो समझौते को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता।

दूसरी ओर, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी समाचार एजेंसी फार्स ने उन मुद्दों का स्पष्ट जिक्र किया है जिन पर सहमति नहीं बन पाई है। फार्स के मुताबिक, विवाद के मुख्य बिंदु हैं:

- ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां (frozen assets)


- तेल और तेल से जुड़े उत्पादों पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध**

 पृष्ठभूमि: लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध
ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव 2015 के JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौते के अमेरिका द्वारा 2018 में एकतरफा तरीके से बाहर निकलने के बाद बढ़ गया था। ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगा दिए, जिसके कारण ईरानी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा।

बाइडेन प्रशासन के दौरान कुछ दौर की अप्रत्यक्ष बातचीत हुई, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। अब 2026 में नई अमेरिकी प्रशासन के साथ ईरान फिर से डील की संभावना तलाश रहा है। ईरानी मीडिया की ताजा रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि दोनों पक्ष काफी करीब पहुंच चुके हैं, लेकिन आखिरी बाधा अभी बाकी है।

ईरान का रुख सख्त क्यों?
ईरानी नेतृत्व बार-बार कह चुका है कि वह किसी भी समझौते में अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा। खासतौर पर:

- फ्रीज की गई अरबों डॉलर की संपत्ति को तुरंत रिलीज किए बिना कोई डील स्वीकार्य नहीं।

- तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों में पूर्ण छूट।

- IRGC को आतंकवादी संगठन की सूची से हटाने या कम से कम आर्थिक प्रतिबंध हटाने की मांग।

फार्स एजेंसी की रिपोर्ट में इन मुद्दों को “मुख्य अड़चन” बताया गया है।

 क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
यह संभावित समझौता न केवल ईरान-अमेरिका संबंधों को प्रभावित करेगा बल्कि पूरे मध्य पूर्व की जियो-पॉलिटिक्स को बदल सकता है। 

- इजराइल इस डील का कड़ा विरोधी रहा है।

- सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश भी सतर्क नजर आ रहे हैं।

- चीन और रूस ईरान के करीबी सहयोगी के रूप में इस प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं।

यदि समझौता हो जाता है तो ईरानी तेल बाजार में वापसी से वैश्विक तेल कीमतों पर असर पड़ेगा। वहीं, अगर बातचीत विफल होती है तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।

ईरानी मीडिया का संदेश
तसनीम और फार्स जैसी सरकारी एजेंसियां आमतौर पर ईरानी सरकार के आधिकारिक रुख को ही प्रतिबिंबित करती हैं। इसलिए इन रिपोर्ट्स को ईरान की विदेश नीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। ईरान स्पष्ट रूप से कह रहा है कि वह **“सम्मानजनक और निष्पक्ष”** समझौते को तैयार है, लेकिन अमेरिका को अपनी “अड़ियल” नीति छोड़नी होगी।

 क्या है आगे का रास्ता?
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के अलावा ओमान और कतर जैसे देश भी मध्यस्थता की भूमिका में सक्रिय हैं। दोनों पक्षों के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता (indirect talks) जारी बताई जा रही है।

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह खामेनेई और राष्ट्रपति ने पहले ही साफ कर दिया है कि देश की परमाणु गतिविधियां और क्षेत्रीय प्रभाव “अपनी जगह” पर रहेंगे। कोई भी समझौता इन लाल रेखाओं के अंदर ही हो सकता है।


ईरानी सरकारी मीडिया की ताजा रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि ईरान-अमेरिका समझौता अब “अंतिम चरण” में है, लेकिन **अमेरिका की अड़चन** अभी भी बाधा बन रही है। फ्रीज संपत्तियों और तेल प्रतिबंधों जैसे मुद्दों का हल निकलता है तो डील हो सकती है, अन्यथा बातचीत फिर लंबी खिंच सकती है।

यह घटनाक्रम न केवल ईरान के 90 मिलियन नागरिकों के आर्थिक भविष्य को प्रभावित करेगा बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और मध्य पूर्व की स्थिरता को भी आकार देगा।

क्या अमेरिका अपनी जिद छोड़ेगा या ईरान और कड़ा रुख अपनाएगा? आने वाले दिनों में होने वाली कूटनीतिक गतिविधियां इस सवाल का जवाब तय करेंगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 May 2026
May 24, 2026

दिल को छू लेने वाली कहानी: 90 वर्षीय सास को पीठ पर लादकर 9 किलोमीटर का पथरीला सफर तय कर बहू ने जताया स्नेह का अनुपम उदाहरण

दिल को छू लेने वाली कहानी: 90 वर्षीय सास को पीठ पर लादकर 9 किलोमीटर का पथरीला सफर तय कर बहू ने जताया स्नेह का अनुपम उदाहरण
-Friday World 24 May 2026
छत्तीसगढ़ के सुदूर जंगलों में बहू की ममता ने सबको भावुक कर दिया

रायपुर। मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक कर्तव्य की मिसाल पेश करने वाली एक मार्मिक घटना छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट क्षेत्र से सामने आई है। जहां एक बहू ने अपनी 90 वर्षीय बीमार सास को पीठ पर लादकर करीब 9 किलोमीटर लंबे पथरीले रास्ते, नाले और जंगलों को पार करते हुए बैंक पहुंचाया, ताकि उनकी रुकी हुई वृद्धा पेंशन निकल सके।

यह कहानी है सोमारी बाई और उनकी बहू रुकमनिया की।

संघर्ष की मिसाल बनी तस्वीर

जंगलपारा गांव, जहां सड़कें नहीं, बिजली-इंटरनेट की पहुंच सीमित और आवागमन का कोई साधन नहीं है। यहां रहने वाली सोमारी बाई आदिवासी समाज से हैं। उम्र 90 वर्ष, स्वास्थ्य ठीक नहीं। तीन महीने से उनकी 1500 रुपये मासिक वृद्धा पेंशन रुकी हुई थी। परिवार के लिए यह राशि बहुत महत्वपूर्ण थी।

जब समस्या बढ़ी तो बहू रुकमनिया ने कोई बहाना नहीं बनाया। उन्होंने अपनी सास को पीठ पर लादा, पथरीले रास्तों और नाले को पार किया और मैनपाट स्थित सेंट्रल बैंक तक पहुंची। इस पूरे सफर में रुकमनिया का दृढ़ संकल्प और सास के प्रति अटूट लगाव देखने लायक था।

 बैंक पहुंचकर क्या हुआ?

बैंक प्रबंधक अल्ताफ मिर्जा ने बताया कि केवाईसी (KYC) प्रक्रिया पूरी न होने के कारण खाता फ्रीज हो गया था। रुकमनिया की मेहनत रंग लाई। बैंक स्टाफ ने तुरंत केवाईसी पूरी की, मोबाइल नंबर लिंक किया और आगे से पेंशन राशि बैंक मित्र के माध्यम से घर पहुंचाने का भरोसा दिया।

 प्रशासन की त्वरित प्रतिक्रिया

मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद प्रशासन भी सक्रिय हो गया। मैनपाट के एसडीएम फागेश सिन्हा की टीम गांव पहुंची। उन्होंने सोमारी बाई और रुकमनिया से मुलाकात की। एसडीएम ने घोषणा की कि अब रुकमनिया को अधिकृत किया जाएगा, ताकि भविष्य में बुजुर्ग महिला को इस कष्टदायक सफर से न गुजरना पड़े।

ग्रामीण भारत की हकीकत

यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह पूरे ग्रामीण और आदिवासी भारत की हकीकत को उजागर करती है। जहां विकास की मुख्यधारा से दूर बसे गांवों में सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं। 

छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन जैसी योजनाएं चली आ रही हैं, लेकिन पहुंच और क्रियान्वयन में कमी स्पष्ट दिखती है। सड़कों की कमी, परिवहन सुविधाओं का अभाव और जागरूकता की कमी कई बुजुर्गों को पेंशन से वंचित रखती है।

रुकमनिया जैसी बहुएं इस समाज की रीढ़ हैं। जो न केवल अपने परिवार की देखभाल करती हैं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारियों को भी निभाती हैं। उनकी इस ममता ने साबित कर दिया कि रिश्तों की मधुरता अभी भी जिंदा है।

 क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं कि ऐसी घटनाओं से दो बातें स्पष्ट होती हैं:

1. ग्रामीण क्षेत्रों में डोर-स्टेप डिलीवरी सिस्टम को और मजबूत करने की जरूरत है।

2. पेंशन जैसी योजनाओं में केवाईसी और अन्य प्रक्रियाओं को और सरल बनाना चाहिए, खासकर बुजुर्गों और आदिवासी समुदायों के लिए।

सकारात्मक निष्कर्ष

सोमारी बाई की पेंशन अब नियमित रूप से घर पहुंचेगी। लेकिन सबसे बड़ी जीत यह है कि एक बहू की लगन ने पूरे सिस्टम को जागृत कर दिया। 

रुकमनिया ने साबित किया कि "रिश्ते खून के नहीं, प्यार के होते हैं" । उनकी इस यात्रा ने न केवल अपनी सास की समस्या हल की बल्कि हजारों लोगों के दिलों को छू लिया।

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि विकास की असली मापदंड सड़कें, पुल और इमारतें नहीं, बल्कि इंसानियत, संवेदना और पारिवारिक मूल्य हैं।

जंगलपारा गांव की यह घटना अब पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है। उम्मीद है कि ऐसी कहानियां और आएंगी, लेकिन अगली बार किसी को 9 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक न जाना पड़े।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 May 2026
May 24, 2026

ईरान का स्पष्ट संदेश: परमाणु हथियार नहीं, शांति और गरिमा जरूर!

ईरान का स्पष्ट संदेश: परमाणु हथियार नहीं, शांति और गरिमा जरूर! -Friday World 24 May 2026

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने एक बार फिर दुनिया को भरोसा दिलाया है कि उनका देश परमाणु हथियार हासिल करने की कोई कोशिश नहीं कर रहा है। इस्लामिक रिपब्लिक न्यूज एजेंसी (IRNA) के मुताबिक, राष्ट्रपति ने अपने टेलीग्राम पोस्ट में दिवंगत सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के फतवे का हवाला देते हुए कहा कि ईरान न केवल परमाणु हथियारों से दूर रहना चाहता है, बल्कि इसकी पुष्टि के लिए कोई भी सत्यापन प्रक्रिया स्वीकार करने को तैयार है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता तेज हो गई है और क्षेत्रीय तनाव चरम पर है।

 ईरानी राष्ट्रपति का ऐतिहासिक संदेश

राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई ने अपनी शहादत से पहले घोषणा की थी और हम अब भी इसे दोहराते हैं कि हम दुनिया को यह भरोसा दिलाने के लिए तैयार हैं कि हम परमाणु हथियार नहीं चाहते।” उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान क्षेत्रीय अस्थिरता नहीं चाहता, बल्कि इसराइली शासन ही इस इलाके में अशांति फैलाने का जिम्मेदार है।

यह बयान महज एक साधारण घोषणा नहीं है। यह ईरान की लंबे समय से चली आ रही नीति का प्रतिबिंब है, जिसमें खामेनेई का फतवा (धार्मिक आदेश) परमाणु हथियारों को इस्लामी सिद्धांतों के खिलाफ मानता है। राष्ट्रपति ने वार्ताकारों को निर्देश दिया कि वे देश की गरिमा और सम्मान पर कोई समझौता न करें, लेकिन शांतिपूर्ण संवाद का रास्ता हमेशा खुला रखें।

 ईरान का परमाणु कार्यक्रम और वैश्विक संदेह

ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले दो दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु रहा है। 2015 में JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) समझौते के तहत ईरान ने अपने कार्यक्रम पर कुछ प्रतिबंध स्वीकार किए थे, जिसके बदले प्रतिबंध हटाए गए थे। लेकिन 2018 में अमेरिका (तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप) के एकतरफा निकलने के बाद तनाव बढ़ गया। ईरान ने फिर यूरेनियम संवर्धन बढ़ाया, लेकिन बार-बार कहा कि यह शांतिपूर्ण उद्देश्यों — चिकित्सा, कृषि और ऊर्जा — के लिए है।

2026 में स्थिति और जटिल हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर सत्ता में हैं और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने संकेत दिए हैं कि ट्रंप जल्द ही ईरान के साथ बातचीत पर कोई बड़ा ऐलान कर सकते हैं। ईरान ने हमेशा दावा किया है कि उसका कार्यक्रम पारदर्शी है और IAEA (International Atomic Energy Agency) के निरीक्षकों को पहुंच दी गई है। फिर भी, इजराइल और कुछ पश्चिमी देश इसे हथियार कार्यक्रम मानते हैं।

पेज़ेश्कियान सरकार इस संदेह को दूर करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि ईरान “क्षेत्रीय अस्थिरता” नहीं फैलाना चाहता, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व पर जोर देता है।

खामेनेई का फतवा: धार्मिक और रणनीतिक आधार

आयतुल्लाह खामेनेई का फतवा ईरान की परमाणु नीति की रीढ़ है। उन्होंने परमाणु हथियारों को मानवता के खिलाफ मानते हुए इसे प्रतिबंधित किया था। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने इसे दोहराते हुए कहा कि सुप्रीम लीडर झूठ नहीं बोल सकते। यह बयान ईरान के अंदरूनी राजनीतिक एकजुटता को भी दर्शाता है — जहां सुधारवादी और रूढ़िवादी दोनों परमाणु हथियारों के खिलाफ खड़े हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फतवा ईरान को नैतिक उच्चता प्रदान करता है। जब भी पश्चिमी देश आरोप लगाते हैं, ईरान इसे धार्मिक और नैतिक आधार पर खारिज कर देता है।

वर्तमान भू-राजनीतिक संदर्भ

2026 में मध्य पूर्व की स्थिति बेहद नाजुक है। इजराइल-ईरान के बीच छिटपुट टकराव, गाजा और लेबनान में जारी संघर्ष, और अमेरिका की सैन्य उपस्थिति ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर रखा है। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान ने इजराइल को क्षेत्र की अस्थिरता का मुख्य कारण बताया।

ट्रंप प्रशासन की “मैक्सिमम प्रेशर” नीति फिर सक्रिय हो रही है। अमेरिका ईरान से पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों (जैसे हिजबुल्लाह, हमास) से दूरी की मांग कर रहा है। ईरान का जवाब साफ है — हम संवाद के लिए तैयार हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता और शांतिपूर्ण अधिकारों पर कोई समझौता नहीं।

राष्ट्रपति ने कहा, “हमारी वार्ता टीम देश की गरिमा और सम्मान की रक्षा करेगी।” यह बयान घरेलू स्तर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि ईरानी जनता आर्थिक प्रतिबंधों से थक चुकी है और शांतिपूर्ण समाधान चाहती है।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और प्रभाव

इस बयान पर विश्व स्तर पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं। पश्चिमी देशों ने इसे सकारात्मक कदम माना है, लेकिन सत्यापन की मांग दोहराई है। इजराइल ने इसे “धोखा” करार दिया है। चीन और रूस जैसे देशों ने ईरान के शांतिपूर्ण कार्यक्रम का समर्थन किया है।

भारत के लिए यह विकास महत्वपूर्ण है। भारत ईरान से तेल आयात करता रहा है और चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है। स्थिर मध्य पूर्व भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों के लिए जरूरी है।

 ईरान की चुनौतियां और संभावनाएं

ईरान की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों के कारण दबाव में है। मुद्रास्फीति, मुद्रा अवमूल्यन और युवाओं की बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं। राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान सुधारवादी छवि वाले नेता हैं, जो संवाद और आर्थिक राहत पर जोर देते हैं।

परमाणु वार्ता सफल हुई तो ईरान को राहत मिल सकती है, लेकिन विफलता से नया संघर्ष शुरू हो सकता है। ईरान का बल्कि मजबूत मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव इसे मजबूत स्थिति में रखता है।

शांति की राह: संवाद या टकराव?

ईरान का यह बयान संवाद का निमंत्रण है। दुनिया को अब फैसला करना है — क्या वह ईरान के शब्दों पर भरोसा करेगा या पुराने संदेहों में उलझा रहेगा? 

राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान का संदेश स्पष्ट है: ईरान परमाणु हथियार नहीं चाहता, लेकिन अपनी गरिमा, संप्रभुता और शांतिपूर्ण विकास के अधिकार से कभी पीछे नहीं हटेगा। 

यह बयान न केवल परमाणु मुद्दे पर है, बल्कि बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय शांति, आर्थिक सहयोग और कूटनीतिक समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अगर अमेरिका और अन्य देश इसे सकारात्मक रूप से लें, तो मध्य पूर्व में नया अध्याय शुरू हो सकता है।

ईरान का परमाणु कार्यक्रम विवादास्पद रहा है, लेकिन राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान का हालिया बयान उम्मीद की किरण दिखाता है। अब समय है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय सत्यापन और संवाद के माध्यम से विश्वास निर्माण करे। शांति की राह चुनौतीपूर्ण है, लेकिन असंभव नहीं। ईरान तैयार है — बाकी दुनिया पर निर्भर करता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 24 May 2026
May 24, 2026

रूस का भयंकर प्रहार: हाइपरसोनिक 'ओरेशनिक' मिसाइलों से यूक्रेन में तबाही, कीव काँप उठा

रूस का भयंकर प्रहार: हाइपरसोनिक 'ओरेशनिक' मिसाइलों से यूक्रेन में तबाही, कीव काँप उठा
- Friday World 24 May 2026
कीव, 24 मई 2026– रूस ने यूक्रेन पर एक बार फिर भारी हमले किए हैं। शनिवार-रविवार की दरमियानी रात सैकड़ों ड्रोन और दर्जनों मिसाइलें, जिनमें घातक हाइपरसोनिक 'ओरेशनिक' मिसाइलें भी शामिल हैं, यूक्रेनी आकाश में गूँज उठीं। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने इसे "बड़े पैमाने का हमला" बताया, जिसमें राजधानी कीव मुख्य निशाना था, लेकिन पूरे देश के कई इलाकों में धमाकों की भयानक आवाजें गूँजीं।

इस हमले में अब तक कम से कम 83 लोग घायल हो चुके हैं, जबकि कीव और आसपास के इलाकों में चार लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। रिहायशी इमारतें, स्कूल और नागरिक बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचा है। कई इलाकों में बिजली और पानी की आपूर्ति ठप हो गई है।

रूस का दावा: जवाबी कार्रवाई
रूस के रक्षा मंत्रालय ने हमलों की जिम्मेदारी ली और कहा कि यह यूक्रेन की तरफ से "नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर" पर किए गए हमलों का जवाब है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने शुक्रवार को स्टारोबिल्स्क शहर में एक छात्रावास पर हुए हमले का हवाला दिया, जिसमें 21 लोगों की मौत हो गई थी। पुतिन ने इसे "बार्बेरिक आतंकवादी कार्रवाई" करार दिया।

यूक्रेन की सशस्त्र सेनाओं के जनरल स्टाफ ने स्वीकार किया कि शुक्रवार रात स्टारोबिल्स्क के पास एक हमला किया गया था, लेकिन दावा किया कि निशाना रूसी सेना की एक विशेष सैन्य इकाई थी, न कि नागरिक इमारत।

 हाइपरसोनिक 'ओरेशनिक' – मौत की बेजोड़ रफ्तार
इस हमले को खास बनाने वाली बात 'ओरेशनिक' हाइपरसोनिक मिसाइल का इस्तेमाल है। रूस का दावा है कि यह मिसाइल आवाज की रफ्तार से 10 गुना से भी ज्यादा तेज़ (मैक 10+) चलती है। इतनी तेज रफ्तार और अनोखी उड़ान पथ के कारण इसे रोक पाना लगभग असंभव माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मिसाइल पारंपरिक एंटी-मिसाइल सिस्टम को चकमा देने में सक्षम है।

ज़ेलेंस्की ने कुछ दिन पहले ही चेतावनी दी थी कि रूस बड़े हमले की तैयारी कर रहा है और हो सकता है कि 'ओरेशनिक' मिसाइल का इस्तेमाल किया जाए। उनकी चेतावनी सही साबित हुई।

मैदान पर स्थिति
यूक्रेन के विभिन्न शहरों और क्षेत्रों से धमाकों और आग की लपटों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। कीव में रात भर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय रहा, लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइलों के सामने पारंपरिक बचाव नाकाफी साबित हुआ। कई इलाकों में बचाव दल अभी भी मलबे में फंसे लोगों को निकालने की कोशिश कर रहे हैं।

यूक्रेनी अधिकारियों ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे आश्रय स्थलों में रहें और अनावश्यक रूप से बाहर न निकलें। अस्पतालों में आपात स्थिति घोषित कर दी गई है।

 युद्ध का नया अध्याय
यह हमला रूस-यूक्रेन युद्ध के अब तक के सबसे तीव्र चरणों में से एक है। युद्ध शुरू हुए चार साल से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच कोई ठोस शांति वार्ता नहीं हो पाई है। रूस का कहना है कि वह अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए लड़ रहा है, जबकि यूक्रेन और पश्चिमी देश इसे बिना उकसावे की आक्रामकता मानते हैं।

पिछले कुछ महीनों में यूक्रेन ने रूसी क्षेत्रों में गहरे हमले किए हैं, जिनमें ड्रोन हमले और मिसाइल हमले शामिल हैं। रूस इन्हें "नागरिकों पर हमला" बता रहा है, जबकि यूक्रेन इन्हें सैन्य लक्ष्यों पर कार्रवाई बताता है।

 अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ
संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने दोनों पक्षों से तुरंत हिंसा रोकने की अपील की है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने रूस की निंदा की है और यूक्रेन के साथ एकजुटता जताई है। वहीं चीन और भारत जैसे देशों ने संयम बरतने की सलाह दी है।

यूरोपीय संघ ने रूस पर नए प्रतिबंध लगाने की चर्चा शुरू कर दी है। NATO के महासचिव ने कहा, "यह हमला यूक्रेन की संप्रभुता पर हमला है और पूरे यूरोप की सुरक्षा को चुनौती है।"

 मानवीय संकट गहराता जा रहा है
युद्ध के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। ऊर्जा संकट, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी असर पड़ा है। सर्दियों में पहले भी यूक्रेन में बिजली की कमी से लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था। अब नए हमलों से बुनियादी ढांचे को और नुकसान होने की आशंका है।

मानवाधिकार संगठन इस हमले में नागरिकों की मौत और घायलों पर चिंता जता रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) पहले ही दोनों पक्षों के कुछ नेताओं और कमांडरों के खिलाफ वारंट जारी कर चुका है।

 भविष्य की संभावनाएँ
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस की हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल युद्ध की प्रकृति बदल रहा है। पारंपरिक रक्षा प्रणालियाँ इनके सामने कमजोर पड़ रही हैं। यूक्रेन अब पश्चिमी देशों से उन्नत एंटी-मिसाइल सिस्टम और हवाई सुरक्षा की मांग तेज करेगा।

दूसरी ओर, रूस अपने सैन्य उत्पादन को बढ़ा रहा है और लंबे समय तक युद्ध जारी रखने की तैयारी दिखा रहा है।


यह हमला सिर्फ सैन्य टकराव नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी का नया अध्याय है। दोनों देशों के आम नागरिक इस युद्ध की भारी कीमत चुका रहे हैं। कीव की सड़कें, स्टारोबिल्स्क का छात्रावास, और हजारों परिवारों की चीखें याद दिलाती हैं कि युद्ध में कोई विजेता नहीं होता – सिर्फ हार और विनाश होता है।

शांति वार्ता की मांग हर तरफ से उठ रही है, लेकिन विश्वास की कमी और जिद दोनों पक्षों को आगे बढ़ने से रोक रही है। क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस चक्र को तोड़ पाएगा? या युद्ध और गहराता जाएगा? समय ही बताएगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 May 2026
May 24, 2026

ગુજરાતના રાજ્યસભા સાંસદોનું ‘કંજૂસપણું’ કે વહીવટી અવરોધ? ૨૦૮ કરોડની વિકાસ ગ્રાન્ટમાંથી માત્ર ૨૫% જ ખર્ચ, લોકોના પૈસા વેડફાયા!

ગુજરાતના રાજ્યસભા સાંસદોનું ‘કંજૂસપણું’ કે વહીવટી અવરોધ? ૨૦૮ કરોડની વિકાસ ગ્રાન્ટમાંથી માત્ર ૨૫% જ ખર્ચ, લોકોના પૈસા વેડફાયા!
-Friday World 24 May 2026
ગુજરાતના વિકાસના સપનાં સાથે જોડાયેલી એક મહત્વની યોજના MPLADS (મેમ્બર્સ ઓફ પાર્લામેન્ટ લોકલ એરિયા ડેવલપમેન્ટ સ્કીમ)ના આંકડા આ વખતે ચોંકાવનારા સામે આવ્યા છે. રાજ્યસભાના ૧૧ સાંસદોને વિકાસ કાર્યો માટે કુલ ૨૦૮.૧૫ કરોડ રૂપિયાની ગ્રાન્ટ મળી, પરંતુ તેમાંથી માત્ર ૫૨.૧ કરોડ રૂપિયા જ ખર્ચાયા છે. એટલે કે માત્ર ૨૫ ટકા જ ઉપયોગ! આ આંકડો ગુજરાતના ગામડાં અને શહેરી વિસ્તારોમાં મૂળભૂત સુવિધાઓની અછત વચ્ચે મોટો સવાલ ઊભો કરે છે — સાંસદો વિકાસ માટે કેટલા સક્રિય છે?

જૂન મહિનામાં ચાર સાંસદોની ટર્મ પૂરી થવાની છે. આ સમયે તેમના કાર્યકાળનું મૂલ્યાંકન કરવું અત્યંત જરૂરી બની ગયું છે. આ લેખમાં અમે આ આંકડાઓનું વિગતવાર વિશ્લેષણ કરીશું, સારા અને નબળા પ્રદર્શનને ઉજાગર કરીશું અને વિકાસની આ તકને વેડફવા પાછળના કારણો પણ તપાસીશું.

 MPLADS યોજના શું છે અને તેનું મહત્વ

MPLADS એ કેન્દ્ર સરકારની એક મહત્વની યોજના છે જે હેઠળ દરેક સાંસદને દર વર્ષે ૫ કરોડ રૂપિયા સુધીની રકમ પોતાના વિસ્તાર અથવા રાજ્યમાં વિકાસ કાર્યો માટે ભલામણ કરવાનો અધિકાર આપવામાં આવે છે. આ રકમ સીધી સાંસદના ખાતામાં આવતી નથી. તે જિલ્લા કલેક્ટર અને સ્થાનિક તંત્ર દ્વારા અમલમાં મૂકવામાં આવે છે.

આ ફંડથી નાના-મોટા કામો થઈ શકે છે:
- ગામ્ય અને શહેરી રસ્તાઓનું નિર્માણ
- શાળા રૂમ અને લેબોરેટરીઝ
- આરોગ્ય કેન્દ્ર અને હોસ્પિટલ સુવિધાઓ
- પાણીની ટાંકી, પાઈપલાઈન અને પુરવઠા વ્યવસ્થા
- સ્ટ્રીટ લાઈટ, સોલાર લાઈટિંગ
- કોમ્યુનિટી હોલ, સ્મશાન અને કબ્રસ્તાન સુધારણા
- રમતગમતના મેદાન અને પાર્ક

આ યોજના લોકસભા અને રાજ્યસભા બંનેના સાંસદોને લાગુ પડે છે અને તેનો હેતુ સ્થાનિક સમસ્યાઓનું ઝડપી નિરાકરણ કરવાનો છે.

 ગુજરાતના સાંસદોનું પ્રદર્શન: વાસ્તવિક આંકડા

ગુજરાતના ૧૧ રાજ્યસભા સાંસદોને કુલ ૨૦૮.૧૫ કરોડ રૂપિયાની ગ્રાન્ટ મળી હતી. તેમાંથી માત્ર ૫૨.૧ કરોડ રૂપિયા (૨૫%) જ ખર્ચાયા છે. આમાંથી સૌથી સારું પ્રદર્શન કરનાર સાંસદો આ પ્રમાણે છે:

ટોપ પર્ફોર્મર્સ:

- રમીલાબેન બારા: ૧૯.૬૦ કરોડમાંથી ૧૫.૩૮ કરોડ (૭૮.૫%) — અદ્ભુત પ્રદર્શન

- બાબુભાઈ જે. દેસાઈ: ૪૪.૪૦%

- નરહરિ અમીન: ૪૧.૧૦%

સરેરાશ અને નબળું પ્રદર્શન:
- શક્તિસિંહ ગોહિલ: ૩૨.૬૦%

- રામભાઈ મોકરિયા: ૨૬.૨૦%

- જશવંતસિંહ પરમાર: ૧૮.૨૦%

- એસ. જયશંકર: ૧૩.૨૦%

- ગોવિંદભાઈ ધોળકિયા: ૧૨.૮૦%

- મયંક નાયક: ૯.૧૦%

- કેસરીદેવસિંહ ઝાલા: ૭.૧૦%

- જગતપ્રકાશ નડ્ડા: ૧૪.૭૦ કરોડમાંથી ૦% ખર્ચ 
— સૌથી નબળું પ્રદર્શન

માત્ર ત્રણ સાંસદોએ ૪૦ ટકાથી વધુ ઉપયોગ કર્યો છે, જ્યારે આઠ સાંસદોનું પ્રદર્શન ૪૦ ટકાથી નીચે છે.

જૂનમાં ટર્મ પૂરી થનારા સાંસદોનું મૂલ્યાંકન

આ મહિને નીચેના ચાર સાંસદોની ટર્મ પૂરી થઈ રહી છે:
- શક્તિસિંહ ગોહિલ (૩૨.૬૦%)
- નરહરિ અમીન (૪૧.૧૦%)
- રામભાઈ મોકરિયા (૨૬.૨૦%)
- રમીલાબેન બારા (૭૮.૫%)

રમીલાબેન બારા સિવાય અન્ય ત્રણના આંકડા સરેરાશથી નીચે છે. આ સાંસદો જ્યારે ફરીથી ટિકિટ મેળવવા અથવા લોકો સમક્ષ જવાના હોય ત્યારે આ પ્રદર્શન તેમના માટે પડકાર બની શકે છે.

 ફંડ વાપરવામાં વિલંબના મુખ્ય કારણો

આટલી ઓછી ખર્ચની પાછળ અનેક કારણો છે:

1. વહીવટી વિલંબ: ભલામણ કર્યા પછી જિલ્લા તંત્રમાં ફાઈલ અટવાઈ જાય છે.

2. ટેન્ડર પ્રક્રિયાની જટિલતા: યોગ્ય કોન્ટ્રાક્ટર શોધવામાં વાર લાગે છે.

3. રાજકીય કારણો: વિરોધી વિસ્તારોમાં કામ કરવામાં અચકાવું.

4. ઓડિટ અને પારદર્શિતાનો ભય: અનિયમિતતાના આક્ષેપથી બચવા માટે ફંડ વાપરવામાં ડર.

5. સાંસદોની સક્રિયતાની કમી: કેટલાક સાંસદો સ્થાનિક મુલાકાતો અને ફોલો-અપમાં ધ્યાન આપતા નથી.

વિકાસ પર થતી અસર

જો આ ફંડ પૂર્ણ ક્ષમતાથી વપરાય તો ગુજરાતના દરેક જિલ્લામાં સેંકડો નાના-મોટા કામો થઈ શકે. ખાસ કરીને પાણીની અછત, રસ્તાઓની ખરાબ સ્થિતિ અને શિક્ષણ-આરોગ્ય ક્ષેત્રે આ ફંડ મોટો ફરક લાવી શકે. પરંતુ ૭૫% ફંડ વાપર્યા વિના રહી જાય તો લાખો લોકો મૂળભૂત સુવિધાઓથી વંચિત રહી જાય છે.

 શું સુધારા થઈ શકે?

- સાંસદો માટે વાર્ષિક વિકાસ યોજના ફરજિયાત બનાવવી.
- ઓનલાઈન રીઅલ-ટાઈમ ડેશબોર્ડ દ્વારા પ્રગતિનું મોનિટરિંગ.

- જિલ્લા કલેક્ટર કચેરીમાં વિશેષ MPLADS સેલ.

- સારા પ્રદર્શન કરનાર સાંસદોને પ્રોત્સાહન.

- નબળા પ્રદર્શનની જાહેર ચર્ચા અને જવાબદારી નક્કી કરવી.

 જવાબદારીનો સમય

રમીલાબેન બારા જેવા સાંસદો દર્શાવે છે કે સારી ઇચ્છા અને સક્રિયતાથી આ ફંડને અસરકારક બનાવી શકાય છે. પરંતુ જ્યારે મોટા ભાગના સાંસદો આટલું ઓછું ખર્ચ કરે ત્યારે લોકોને પૂછવું પડે કે — અમારા કરમાંથી મળેલા આ પૈસાનો વાજબી ઉપયોગ કેમ નથી થતો?

ગુજરાત વિકાસના પાથે આગળ વધી રહ્યું છે. આવા ફંડને વેડફવાને બદલે તેને પૂર્ણ ક્ષમતાથી વાપરવું જોઈએ. લોકોને પણ આ આંકડાઓને ધ્યાનમાં રાખીને આગામી ચૂંટણીઓમાં યોગ્ય નિર્ણય લેવો જોઈએ. વિકાસ એક જવાબદારી છે — તેને અવગણી શકાય નહીં.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 May 2026