February 15, 2026
"शंकराचार्य विवाद: अपमान या कानून का शासन? अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर साधा तीखा निशाना"
"शंकराचार्य विवाद: अपमान या कानून का शासन? अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर साधा तीखा निशाना" -Friday World 15th Feb 2026
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर धार्मिक भावनाओं और सत्ता की टकराहट ने जोर पकड़ा है। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच चल रहा विवाद अब सियासी रंग ले चुका है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर बीजेपी सरकार को घेरते हुए सवाल उठाया है—क्या शंकराचार्य के अपमान के लिए भी नया कानून लाएंगे?
विवाद की जड़: माघ मेले में रोका गया शाही स्नान सब कुछ शुरू हुआ प्रयागराज के माघ मेले से। जनवरी 2026 में मौनी अमावस्या के अवसर पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती संगम में पारंपरिक स्नान के लिए पहुंचे थे। लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें रोका, जिसके बाद वे धरने पर बैठ गए। उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। विवाद इतना बढ़ा कि शंकराचार्य ने दुखी मन से बिना स्नान किए माघ मेला छोड़ दिया और काशी लौट आए। उन्होंने इसे सनातन परंपरा के अपमान के रूप में देखा।
योगी आदित्यनाथ का विधानसभा में बयान फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पहली बार इस मुद्दे पर खुलकर बोले। उन्होंने कहा, "हर कोई शंकराचार्य नहीं बन सकता। कोई भी व्यक्ति किसी पीठ का आचार्य होने का दावा कर माहौल खराब नहीं कर सकता। कानून के शासन में सभी को मर्यादा में रहना पड़ता है।" योगी ने जोर दिया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है और धार्मिक आयोजनों में नियमों का पालन अनिवार्य है।
शंकराचार्य का पलटवार: मुकदमों का जिक्र कर साधा निशाना शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने योगी के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "नजीर है—आदित्यनाथ के ऊपर 40 से ज्यादा मुकदमे थे और जब वे मुख्यमंत्री बने तो सभी मुकदमे अपने ऊपर से हटवा लिए। ये कैसा कानून का पालन है? क्या कानून में लिखा है कि बड़े पद पर पहुंचने से मुकदमे गायब हो जाते हैं?" उन्होंने साफ कहा कि सनातन में शंकराचार्य की पहचान राजनीतिक प्रमाणपत्र से नहीं तय होती।
अखिलेश यादव का हमला: "ये शंकराचार्य का अपमान कर रहे हैं"
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने इस पूरे प्रकरण को 'शाब्दिक हिंसा' और 'पाप' करार दिया। लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पर उन्होंने कहा:
- "पहन ले कोई जैसे भी 'चोले', पर उसकी वाणी पोल खोले। परम पूज्य शंकराचार्य जी के बारे में घोर अपमानजनक अपशब्द बोलना शाब्दिक हिंसा है और पाप भी।"
- "आप इन लोगों से क्या उम्मीद कर सकते हैं? ये लोग शंकराचार्य का अपमान कर रहे हैं। क्या अब इसके लिए भी नया कानून लाओगे?"
- "किसे नहीं दिख रहा कि शंकराचार्य जी को खुलेआम अपमानित कर रहे हैं? बताइए आप, क्या हमारी या आपकी कोई हैसियत है कि पूजनीय शंकराचार्य जी के खिलाफ कुछ बोल दें?"
अखिलेश ने बीजेपी पर सनातन धर्म का ज्ञान न होने का आरोप लगाया और कहा कि संत परंपरा का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने योगी के 'योगी' होने पर भी चुटकी ली, "कोई कान के छेद करवा लेने से योगी नहीं बन जाता।"
राजनीतिक मायने: ब्राह्मण अस्मिता और सनातन बहस यह विवाद सिर्फ धार्मिक नहीं रहा—यह ब्राह्मण वोट बैंक, सनातन संस्कृति और कानून-व्यवस्था की बहस बन गया। अखिलेश यादव इसे 'ब्राह्मण अस्मिता' से जोड़कर सपा की रणनीति चला रहे हैं, जबकि योगी सरकार 'कानून का राज' और मर्यादा पर अड़ी है। शंकराचार्य के बयानों ने इसे और गरमा दिया, जहां उन्होंने राजनीतिक हस्तक्षेप को चुनौती दी।
यह मामला दिखाता है कि उत्तर प्रदेश में धार्मिक मुद्दे कितनी आसानी से सियासी हथियार बन जाते हैं। क्या यह विवाद शांत होगा या महाकुंभ 2025 की पूर्वपीठिका बनेगा? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल यह बहस जारी है—अपमान की या कानून की?
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 15th Feb 2026