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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Tuesday, 17 March 2026

March 17, 2026

ट्रंप प्रशासन में बड़ा झटका: ईरान युद्ध के विरोध में काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने दिया इस्तीफा कहा "इज़राइल लॉबी ने राष्ट्रपति को गुमराह किया"

ट्रंप प्रशासन में बड़ा झटका: ईरान युद्ध के विरोध में काउंटरटेररिज्म सेंटर के निदेशक जो केंट ने दिया इस्तीफा कहा "इज़राइल लॉबी ने राष्ट्रपति को गुमराह किया"-Friday World March 17,2026 

"ट्रंप के 'अमेरिका फर्स्ट' पर सवाल! ईरान युद्ध के खिलाफ अमेरिकी विशेष बलों के अनुभवी अधिकारी जो केंट का इस्तीफा – 
"यह युद्ध इज़राइल लॉबी के दबाव में शुरू हुआ, ईरान कोई तत्काल खतरा नहीं था" 
मार्च 2026 में अमेरिकी राजनीति में तूफान मचा हुआ है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमले शुरू किए हैं। ऑपरेशन "एपिक फ्यूरी" के नाम से जाना जाने वाला यह अभियान ईरान की परमाणु सुविधाओं, सैन्य ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बना रहा है। 

ईरान ने जवाबी हमले तेज कर दिए हैं, होर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। 
लेकिन इस युद्ध के बीच ट्रंप प्रशासन में एक बड़ा विद्रोह सामने आया है – काउंटरटेररिज्म सेंटर (CTC) के निदेशक जो केंट ने इस्तीफा दे दिया है। 

जो केंट कौन हैं? 45 वर्षीय जो केंट अमेरिकी विशेष बलों (Special Forces) और सीआईए के एक अनुभवी अधिकारी हैं। उन्हें 11 बार विदेशों में तैनात किया गया। उनकी पत्नी शैनन केंट अमेरिकी नौसेना की क्रिप्टोलॉजिक तकनीशियन थीं। साल 2019 में सीरिया में एक आत्मघाती बम विस्फोट में शैनन की मौत हो गई थी। जो केंट लंबे समय से ट्रंप के समर्थक रहे हैं। उन्होंने ट्रंप के "अमेरिका फर्स्ट" एजेंडे का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन अब यही व्यक्ति ट्रंप के सबसे बड़े फैसले – ईरान युद्ध – के खिलाफ खड़ा हो गया है। 

इस्तीफे का पत्र: क्या लिखा जो केंट ने?** जो केंट ने अपने एक्स अकाउंट पर एक लंबा पत्र पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने इस्तीफा देने का ऐलान किया और ट्रंप से "रुख बदलने" की अपील की। पत्र के मुख्य अंश:

 - "जून 2025 तक मुझे लगता था कि राष्ट्रपति ट्रंप समझ गए हैं कि मध्य पूर्व के युद्धों ने अमेरिका को हमारे देशभक्तों के अनमोल जीवन से वंचित कर दिया है और राष्ट्र की संपत्ति व समृद्धि को कम किया है।" 

- "लेकिन उच्च पदस्थ इज़राइली अधिकारियों और प्रभावशाली अमेरिकी पत्रकारों ने गलत सूचना फैलाई, जिससे ट्रंप को अपने 'अमेरिका फर्स्ट' मंच को कमजोर करना पड़ा।" 

- "इन लोगों ने आपको यह यकीन दिलाया कि ईरान अमेरिका के लिए बड़ा खतरा पैदा कर रहा है। यह झूठ था। ईरान कोई तत्काल खतरा नहीं था।" 

- "यह युद्ध इज़राइल और उसकी शक्तिशाली अमेरिकी लॉबी के दबाव में शुरू किया गया। इससे अमेरिकी सैनिकों की जान जा रही है और हमारी अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ रहा है।" 

केंट ने स्पष्ट कहा कि उन्होंने इस्तीफा इसलिए दिया क्योंकि वे इस युद्ध के नैतिक और रणनीतिक औचित्य से सहमत नहीं हैं। उन्होंने ट्रंप से अपील की कि वे तुरंत युद्ध रोकें और डिप्लोमेसी का रास्ता अपनाएं। 

ट्रंप की प्रतिक्रिया: "उनका जाना अच्छा है" राष्ट्रपति ट्रंप ने जो केंट के इस्तीफे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। ट्रुथ सोशल पर उन्होंने लिखा:

 ट्रंप के करीबी सहयोगी स्टीव बैनन और माइक पेंस ने भी केंट की आलोचना की। बैनन ने कहा कि "यह इज़राइल विरोधी प्रचार है, जो केंट अब वामपंथी एजेंडे में शामिल हो गए हैं।" 

अमेरिका में विरोध की लहर- जो केंट का इस्तीफा अकेला नहीं है। अमेरिका में ईरान युद्ध के खिलाफ विरोध तेज हो रहा है।

 - वाशिंगटन डीसी, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो में हजारों लोग सड़कों पर उतरे हैं।

 - "No War with Iran" और "America First, Not Israel First" के नारे लग रहे हैं। 

- कई पूर्व सैनिक और खुफिया अधिकारी भी विरोध में शामिल हुए हैं। 

- डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता जैसे एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज और बर्नी सैंडर्स ने ट्रंप पर हमला बोला – "यह युद्ध इज़राइल लॉबी के लिए है, अमेरिकी जनता के लिए नहीं।"

 केंट के इस्तीफे ने इन विरोधों को और बल दिया है। कई लोग इसे ट्रंप प्रशासन में "क्रैक" का संकेत मान रहे हैं। 

युद्ध की पृष्ठभूमि और केंट का दावा ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा था और अमेरिकी सैनिकों पर हमले की साजिश रच रहा था। लेकिन केंट का कहना है कि खुफिया रिपोर्ट्स में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि इज़राइल की मोसाद और अमेरिकी प्रो-इज़राइल लॉबी (जैसे AIPAC) ने गलत जानकारी फैलाई। 

केंट ने लिखा: "मैंने 11 विदेशी तैनाती में देखा कि मध्य पूर्व युद्ध अमेरिका के लिए कितने घातक हैं। मेरी पत्नी शैनन की मौत सीरिया में हुई। अब फिर वही गलती दोहराई जा रही है।" 

अमेरिका में क्या हो रहा है?- कांग्रेस में कुछ रिपब्लिकन सांसद भी सवाल उठा रहे हैं।

 - पेंटागन और सीआईए के कुछ अधिकारी चुपके-चुपके विरोध जता रहे हैं। 

- मीडिया में बहस छिड़ी है – क्या यह युद्ध "अमेरिका फर्स्ट" है या "इज़राइल फर्स्ट"?

 - ट्रंप के समर्थक आधार में भी दरार दिख रही है। कई MAGA समर्थक कह रहे हैं – "हम ईरान से युद्ध नहीं चाहते।" *: 

ट्रंप के लिए बड़ा संकट? जो केंट का इस्तीफा सिर्फ एक व्यक्ति का फैसला नहीं है। यह ट्रंप प्रशासन में असंतोष की आवाज है। एक अनुभवी काउंटरटेररिज्म विशेषज्ञ, पूर्व सैनिक और ट्रंप समर्थक का यह कदम युद्ध की वैधता पर गंभीर सवाल उठाता है। ट्रंप ने इसे "अच्छा हुआ" कहकर खारिज किया, लेकिन विरोध की लहर बढ़ रही है। 

अब सवाल ये है – क्या ट्रंप युद्ध जारी रखेंगे या डिप्लोमेसी का रास्ता अपनाएंगे? क्या केंट जैसे और अधिकारी सामने आएंगे? अमेरिका में "अमेरिका फर्स्ट" और "इज़राइल फर्स्ट" की बहस तेज हो गई है। आने वाले दिन बताएंगे कि ट्रंप इस संकट से कैसे निपटते हैं। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 17,2026 
March 17, 2026

"आरएसएस और रॉ पर अमेरिकी प्रतिबंध की सिफारिश! यूएससीआईआरएफ की 2026 रिपोर्ट में भारत पर गंभीर आरोप

"आरएसएस और रॉ पर अमेरिकी प्रतिबंध की सिफारिश! यूएससीआईआरएफ की 2026 रिपोर्ट में भारत पर गंभीर आरोप
-Friday World March 17,2026
यूएससीआईआरएफ की 2026 रिपोर्ट का सच: आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध की मांग – क्या है रिपोर्ट में और क्यों भारत ने ठुकराया?

– धार्मिक स्वतंत्रता उल्लंघन, संपत्ति फ्रीज और हथियार बिक्री रोकने की मांग; भारत सरकार ने कहा – पक्षपाती और प्रेरित!" 

मार्च 2026 में जारी अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (यूएससीआईआरएफ) की वार्षिक रिपोर्ट ने भारत को फिर से निशाने पर लिया है। इस रिपोर्ट में आयोग ने भारत को "विशेष चिंता वाला देश" (Country of Particular Concern - CPC) घोषित करने की सिफारिश की है। सबसे चौंकाने वाली बात 

– आयोग ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) पर लक्षित प्रतिबंध (targeted sanctions) लगाने की मांग की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये संगठन "धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं या उन्हें सहन करते हैं"। 

यूएससीआईआरएफ एक स्वतंत्र, द्विदलीय (बाइपार्टिसन) संघीय आयोग है, जो 1998 के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत काम करता है। यह अमेरिकी विदेश मंत्रालय से अलग है और राष्ट्रपति, विदेश मंत्री तथा कांग्रेस को नीतिगत सिफारिशें देता है। रिपोर्ट में 2025 में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति "निरंतर बिगड़ती" बताई गई है। आयोग ने आरोप लगाया कि सरकार ने नए कानून लागू किए, जो धार्मिक अल्पसंख्यकों (खासकर मुस्लिम और ईसाई) को निशाना बनाते हैं। 

रिपोर्ट में आरएसएस और रॉ पर क्या आरोप?
 रिपोर्ट के भारत अध्याय में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आरएसएस और रॉ "धार्मिक स्वतंत्रता के गंभीर उल्लंघनों के लिए जिम्मेदार हैं या उन्हें बर्दाश्त करते हैं"। आयोग का दावा है कि:

 - आरएसएस हिंदू राष्ट्रवादी समूहों के माध्यम से मुस्लिम और ईसाई समुदायों के खिलाफ उत्पीड़न और हिंसा को बढ़ावा देता है या सहन करता है। 

- रॉ ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमन (transnational repression) में भूमिका निभाई है, जैसे अमेरिका में सिख अलगाववादियों या अन्य अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं पर कथित हमले।

 - रिपोर्ट में 2025 में CAA, NRC, UAPA, वक्फ बिल और राज्य स्तर के एंटी-कन्वर्जन/गौ-हत्या कानूनों का जिक्र है, जिन्हें अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताया गया। आयोग ने सिफारिश की कि अमेरिका सरकार: 

- आरएसएस और रॉ से जुड़े व्यक्तियों/संस्थाओं की संपत्ति फ्रीज करे। 

- उन्हें अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगाए।

 - हथियार निर्यात नियंत्रण अधिनियम (Arms Export Control Act) की धारा 6 लागू कर भारत को हथियार बिक्री रोक दे, क्योंकि अमेरिकी नागरिकों और अल्पसंख्यकों पर "धमकी और उत्पीड़न" जारी है। 

- भविष्य की सुरक्षा सहायता और द्विपक्षीय व्यापार को धार्मिक स्वतंत्रता में सुधार से जोड़े। ये सिर्फ सिफारिशें हैं 

– अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इन्हें अभी स्वीकार नहीं किया है। पिछले सालों में भी यूएससीआईआरएफ ने भारत को CPC बनाने की मांग की, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इसे लागू नहीं किया। 

भारत सरकार की कड़ी प्रतिक्रिया विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को "पक्षपाती, प्रेरित और विकृत" बताया। प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा: 

- यूएससीआईआरएफ कई सालों से भारत के खिलाफ "विकृत और चुनिंदा चित्रण" पेश कर रहा है।

 - रिपोर्ट में "संदिग्ध स्रोतों और वैचारिक कथानकों" पर आधारित आरोप हैं, न कि तथ्यों पर।

 - भारत "कड़े शब्दों में" रिपोर्ट को खारिज करता है। 

बीजेपी ने भी रिपोर्ट को "बेबुनियाद" कहा और कांग्रेस पर निशाना साधा कि वो अमेरिकी आयोग के साथ खड़ी है। कांग्रेस ने रिपोर्ट को "आरएसएस के खिलाफ सबूत" बताया और कहा कि ये संगठन राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा है। 

आरएसएस ने अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। केशव कुंज मीडिया विभाग ने कहा कि कोई बयान जारी नहीं हुआ है। 

रिपोर्ट में भारत के अलावा कौन-कौन?
यूएससीआईआरएफ ने 18 देशों को CPC बनाने की सिफारिश की, जिनमें पहले से शामिल हैं – चीन, ईरान, उत्तर कोरिया, पाकिस्तान, रूस, सऊदी अरब आदि। नई सिफारिशों में भारत, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया और वियतनाम शामिल हैं। नाइजीरिया को 2025 में ट्रंप ने फिर CPC में डाला था। 

यूएससीआईआरएफ की विश्वसनीयता पर सवाल भारत सरकार इसे "पक्षपाती" मानती है। कई विश्लेषकों का कहना है कि आयोग में कुछ सदस्यों के विचारधारा-आधारित पूर्वाग्रह हैं। रिपोर्ट में भारत के खिलाफ आरोप अक्सर कुछ एनजीओ, मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों के दावों पर आधारित होते हैं। 

सिफारिशें या दबाव? यूएससीआईआरएफ की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं। ट्रंप प्रशासन ने पहले भी इन्हें नजरअंदाज किया है। लेकिन रिपोर्ट भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव पैदा कर सकती है, खासकर जब दोनों देश रणनीतिक साझेदार हैं। आरएसएस और रॉ पर प्रतिबंध की मांग पहली बार इतनी स्पष्ट रूप से आई है – ये वैश्विक स्तर पर हिंदू राष्ट्रवाद और भारतीय खुफिया एजेंसी के खिलाफ बड़ा कदम है। 

भारत ने इसे "भारत विरोधी" करार दिया है। अब देखना है कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय क्या फैसला लेता है। रिपोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर राजनीतिक दबाव का हथियार बन सकती है या सिर्फ कागजी सिफारिश रह जाएगी। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 17,2026 

(यह लेख सार्वजनिक रिपोर्ट्स, यूएससीआईआरएफ की आधिकारिक दस्तावेज और मीडिया कवरेज पर आधारित है।)
March 17, 2026

मोरबी का सिरेमिक हब मिडिल ईस्ट युद्ध की चपेट में: प्रोपेन गैस संकट से 250 से ज्यादा फैक्टरियां बंद, 4 लाख मजदूरों का भविष्य अंधकार में – ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष की सीधी मार गुजरात पर!

मोरबी का सिरेमिक हब मिडिल ईस्ट युद्ध की चपेट में: प्रोपेन गैस संकट से 250 से ज्यादा फैक्टरियां बंद, 4 लाख मजदूरों का भविष्य अंधकार में – ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष की सीधी मार गुजरात पर!
-Friday World March 17,2026 
इज़राइल की दोस्ती की भारी कीमत: ईरान-इज़राइल युद्ध की आग ने मोरबी के 250+ सिरेमिक फैक्टरियों पर ताला लगवा दिया – प्रोपेन गैस की कमी से लाखों मजदूर बेरोजगार, गुजरात की अर्थव्यवस्था पर भयंकर असर!

→ परिचय: वैश्विक युद्ध की चपेट में स्थानीय उद्योग** मार्च 2026 के मध्य में पूरी दुनिया की नजर मिडिल ईस्ट पर टिकी हुई है। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए हैं। जवाब में ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर प्रतिबंध लगा दिया है – यह वह महत्वपूर्ण मार्ग है जिससे दुनिया का 20% से ज्यादा तेल और गैस गुजरता है। जहाजों की आवाजाही लगभग थम गई है। प्रोपेन और नेचुरल गैस की आयात में भारी व्यवधान आ गया है। इस अंतरराष्ट्रीय संकट का सबसे भयानक स्थानीय असर अब गुजरात के मोरबी पर पड़ रहा है – भारत का सिरेमिक और टाइल्स का सबसे बड़ा केंद्र। 

→ मोरबी: भारत का सिरेमिक साम्राज्य 
मोरबी को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सिरेमिक उत्पादन केंद्र माना जाता है। यहां लगभग 750-800 सिरेमिक फैक्टरियां हैं। देश का 90% से ज्यादा टाइल्स और सैनिटरी वेयर का उत्पादन यहीं होता है। इस उद्योग का वार्षिक टर्नओवर अरबों रुपये में है। सीधे और परोक्ष रूप से 4 लाख से ज्यादा मजदूर इससे जुड़े हैं। यह उद्योग मोरबी की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है – ट्रांसपोर्ट, होटल, दुकानें, बैंकिंग और स्थानीय व्यापार सब इसी पर टिका है। लेकिन आज यह पूरा औद्योगिक ढांचा ढहने के कगार पर खड़ा है। 

→ प्रोपेन गैस की कमी से उद्योग पर घातक प्रहार सिरेमिक टाइल्स बनाने के लिए किल्न (भट्टियां) को 1200-1400 डिग्री सेल्सियस तक गर्म रखना पड़ता है। इसके लिए प्रोपेन गैस और नेचुरल गैस मुख्य ईंधन हैं। प्रोपेन तेजी से जलता है और बहुत अधिक गर्मी देता है, इसलिए यह औद्योगिक उपयोग के लिए आदर्श है। मोरबी में रोजाना लगभग 55 लाख क्यूबिक मीटर प्रोपेन का इस्तेमाल होता है। ईरान-अमेरिका-इज़राइल युद्ध शुरू होने के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही रुक गई। प्रोपेन और एलएनजी टैंकर अटक गए। गुजरात गैस और इंडियन ऑयल जैसी कंपनियों ने सप्लाई रोक दी। नतीजा – मोरबी में 250 से ज्यादा फैक्टरियों ने तुरंत उत्पादन बंद कर दिया। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक 170-225 यूनिट पहले ही बंद हो चुकी हैं और संख्या बढ़ रही है। मोरबी सिरेमिक एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज अरवाड़िया और अन्य उद्योगपतियों ने चेतावनी दी है कि अगर 15 मार्च तक सप्लाई सामान्य नहीं हुई तो पूरा उद्योग सामूहिक रूप से बंद (कलेक्टिव शटडाउन) हो जाएगा। 

→ उत्पादन और निर्यात में भारी नुकसान 
एक महीने का शटडाउन करोड़ों रुपये का नुकसान पहुंचा सकता है। निर्यात – जो उत्पादन का बड़ा हिस्सा है – 25% से ज्यादा गिर चुका है। आने वाले महीनों में टाइल्स की कीमतों में 15% तक बढ़ोतरी संभव है। राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 7 बिलियन डॉलर का यह उद्योग कई जगहों पर सिर्फ 20% क्षमता पर चल रहा है। आयातित प्रोपेन पर निर्भर फैक्टरियां सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। 

→ मजदूरों का पलायन और रोजगार संकट फैक्टरियां बंद होने से सबसे ज्यादा मार मजदूरों पर पड़ी है। मोरबी में काम करने वाले अधिकांश मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और झारखंड से आते हैं। काम न होने से वे अपने गांव लौट रहे हैं। मोरबी रेलवे स्टेशन पर टिकट के लिए लंबी कतारें लग रही हैं। फैक्टरियों में रहने-खाने की व्यवस्था करने वाले परिवार अब अनिश्चितता का सामना कर रहे हैं। अगर संकट लंबा चला तो हजारों कुशल और अकुशल मजदूर बेरोजगार हो जाएंगे। इसका असर पूरे शहर पर पड़ेगा – छोटे व्यापारी से लेकर ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर तक। 

→ इज़राइल से दोस्ती और भारत पर असर भारत की इज़राइल के साथ रक्षा, तकनीक और कूटनीति में मजबूत दोस्ती है। लेकिन वर्तमान संघर्ष में अमेरिका-इज़राइल के साथ खड़े होने से मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा है। ईरान ने होर्मुज़ को बंद करके वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को निशाना बनाया है – जिसका सीधा असर भारत जैसे देशों पर पड़ रहा है। तेल-गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं। औद्योगिक उत्पादन ठप है। मोरबी के उद्योगपति सवाल उठा रहे हैं – "हमारी दोस्ती की कीमत इतनी भारी क्यों?" गुजरात सरकार ने समस्या के समाधान के लिए कमिटी बनाई है। केंद्र सरकार वैकल्पिक स्रोत तलाश रही है। लेकिन स्थिति अभी भी गंभीर है। 

→ आगे क्या होगा? अगर युद्ध जल्दी खत्म नहीं हुआ तो मोरबी का सिरेमिक उद्योग महीनों तक बंद रह सकता है। रोजगार के नुकसान बढ़ेंगे। गुजरात की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगेगा। यह संकट एक कड़वा सबक दे रहा है – वैश्विक राजनीति और युद्ध की आग स्थानीय उद्योगों और आम आदमी तक पहुंचती है। मोरबी के मजदूर और उद्योगपति अब सिर्फ एक चीज की उम्मीद कर रहे हैं – जल्द शांति बहाल हो और गैस सप्लाई सामान्य हो जाए। 

→ सामूहिक प्रयास की जरूरत यह समय है कि सरकार, उद्योग और समाज मिलकर काम करें। मोरबी का भविष्य गुजरात और भारत के औद्योगिक विकास से जुड़ा है। इस संकट को जल्द हल करना जरूरी है – वरना नुकसान अपूरणीय हो जाएगा। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 17,2026 
March 17, 2026

Morbi's Ceramic Hub Under Fire from Middle East War: Propane Gas Crunch Forces 250+ Factories to Close, Threatening 4 Lakh Jobs – Gujarat's $7 Billion Tile Industry on Brink of Total Shutdown!

Morbi's Ceramic Hub Under Fire from Middle East War: Propane Gas Crunch Forces 250+ Factories to Close, Threatening 4 Lakh Jobs – Gujarat's $7 Billion Tile Industry on Brink of Total Shutdown!
-Friday World March 17, 2026
The Cost of Israel's Friendship: Iran-Israel War Ignites Crisis in Morbi – Over 250 Ceramic Factories Shut Down Due to Propane Gas Shortage, Leaving Lakhs of Workers in Darkness – Direct Impact of Iran-America-Israel Conflict on Gujarat!  

→ Introduction: Global War Hits Local Industry** In mid-March 2026, the world's attention is fixed on the Middle East. The United States and Israel launched large-scale attacks on Iran. In retaliation, Iran imposed restrictions on the Strait of Hormuz – the critical chokepoint through which over 20% of the world's oil and gas shipments pass. Shipping traffic has come to a near standstill. Propane and natural gas imports have faced massive disruptions. The most severe local fallout from this international crisis is now hitting Gujarat's Morbi – India's undisputed ceramic and tiles capital. 

→ Morbi: The Ceramic Powerhouse of India

Morbi is recognized as the world's second-largest ceramic production hub. The town hosts approximately 750-800 ceramic factories. It accounts for over 90% of India's tile and sanitaryware production. The industry's annual turnover runs into billions of rupees. Directly and indirectly, it employs more than 4 lakh workers. The sector is the backbone of Morbi's economy – supporting transport, hotels, shops, banking, and local trade. But today, this vibrant industrial ecosystem stands on the edge of collapse. 

→ Propane Gas Shortage Delivers Heavy Blow
 Ceramic tiles require kilns (bhattis) to be heated to 1200-1400 degrees Celsius for firing. Propane gas and natural gas are the primary fuels used for this process. Propane burns quickly and delivers high heat, making it ideal for industrial kilns. Morbi consumes around 55 lakh cubic meters of propane daily. 
After the Iran conflict escalated, shipments through the Strait of Hormuz halted. Tankers carrying propane and LNG are stuck. Major suppliers like Gujarat Gas and Indian Oil Corporation have curtailed or stopped deliveries. As a result, over 250 factories have already shut down production immediately. Some reports indicate 170-225 units closed earlier, with the number rising daily. Morbi Ceramic Association President Manoj Arvadiya and other leaders have warned that if supplies do not normalize by March 15, the entire industry may face a collective shutdown. 

→ Massive Production and Export Losses

A one-month shutdown could cause losses worth crores of rupees. Exports – which form a significant portion of output – have dropped by more than 25%. Tile prices are expected to rise by up to 15% in the coming months. The industry, valued at around $7 billion nationally, is seeing production fall to just 20% capacity in many cases. Factories dependent on imported propane are the hardest hit, with many unable to operate even partially. 

→ Migration of Workers and Employment Crisis
The closures are hitting workers the hardest. Most laborers in Morbi come from states like Bihar, Uttar Pradesh, Odisha, and Jharkhand. With no work, many are returning to their native villages. Long queues are visible at Morbi railway station for train tickets. Families who lived on-site with food and lodging provided by factories are now facing uncertainty. If the crisis drags on, thousands of skilled and unskilled workers will lose jobs. The ripple effect will hit the entire town – from small vendors to transport operators. 

→ India's Friendship with Israel and Its Price
India maintains strong ties with Israel in defense, technology, and diplomacy. However, the ongoing alignment in the current conflict has contributed to heightened tensions in the Middle East. Iran's blockade of the Strait of Hormuz targets global energy supplies – directly affecting countries like India that rely on these routes. Oil and gas prices have surged. Industrial production has stalled. Morbi's factory owners are asking a painful question: "Why is our friendship costing us so dearly?" The Gujarat government has formed a committee to address the issue. The central government is exploring alternative sources. But the situation remains critical. 

→ What Lies Ahead? If the war does not end soon, Morbi's ceramic industry could remain shut for months. Job losses will mount. Gujarat's economy will suffer a major setback. The crisis teaches a hard lesson: Global politics and wars reach deep into local industries and ordinary people's lives. Workers and industrialists in Morbi now pin their hopes on one thing – early restoration of peace and normal gas supplies. 

→ Call for Collective Action This is the time for government, industry, and society to work together. Morbi's future is tied to Gujarat's and India's industrial growth. The crisis must be resolved quickly – otherwise, the damage could become irreversible. 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 17, 2026
March 17, 2026

"મોરબીના સિરામિક હબ પર મિડલ ઈસ્ટની યુદ્ધની આગ: પ્રોપેન ગેસની અછતથી 250થી વધુ ફેક્ટરીઓ બંધ, 4 લાખ કામદારોનું ભવિષ્ય અંધારામાં – ઈરાન-અમેરિકા-ઈઝરાયલ સંઘર્ષની સીધી અસર ગુજરાત પર!"

"મોરબીના સિરામિક હબ પર મિડલ ઈસ્ટની યુદ્ધની આગ: પ્રોપેન ગેસની અછતથી 250થી વધુ ફેક્ટરીઓ બંધ, 4 લાખ કામદારોનું ભવિષ્ય અંધારામાં – ઈરાન-અમેરિકા-ઈઝરાયલ સંઘર્ષની સીધી અસર ગુજરાત પર!"
-Friday World March 17,2026 
ઇઝરાયલની દોસ્તીની કિંમત: ઈરાન-ઈઝરાયલ યુદ્ધની આગે મોરબીના 250+ સિરામિક ફેક્ટરીઓને લગાવ્યા તાળા – ગેસની અછતથી હજારો મજૂરો બેરોજગાર, અર્થતંત્ર પર ભારે પડી આગ!

 માર્ચ 2026ના મધ્યમાં વિશ્વની નજર મિડલ ઈસ્ટ પર ટકેલી છે. અમેરિકા-ઈઝરાયલે ઈરાન પર મોટા પાયે હુમલા કર્યા છે. ઈરાને જવાબી કાર્યવાહીમાં હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ (Strait of Hormuz) પર પ્રતિબંધ મૂક્યો છે. આ સ્ટ્રેટ વિશ્વના 20%થી વધુ તેલ અને ગેસના પરિવહનનો મુખ્ય માર્ગ છે. જહાજોની અવરજવર થંભી ગઈ છે. પ્રોપેન અને નેચરલ ગેસની આયાતમાં ભારે વિક્ષેપ પડ્યો છે. આ આંતરરાષ્ટ્રીય સંકટની સૌથી ભયાનક અસર હવે ગુજરાતના મોરબી પર પડી રહી છે. 

મોરબી – ભારતનું સિરામિક અને ટાઈલ્સનું વિશ્વમાં બીજા ક્રમનું સૌથી મોટું કેન્દ્ર. અહીં આશરે 750-800 સિરામિક ફેક્ટરીઓ છે. દેશના 90%થી વધુ ટાઈલ્સ અને સેનિટરી વેરનું ઉત્પાદન અહીં થાય છે. આ ઉદ્યોગનું વાર્ષિક ટર્નઓવર અબજો રૂપિયામાં છે. લગભગ 4 લાખથી વધુ મજૂરો સીધા અને પરોક્ષ રીતે આ ઉદ્યોગ સાથે જોડાયેલા છે. પરંતુ હવે આ સમગ્ર અર્થતંત્ર ધરાશાયી થવાના આરે છે. 

પ્રોપેન ગેસની અછતથી ઉદ્યોગ પર ભારે આઘાત
સિરામિક ટાઈલ્સ બનાવવા માટે કિલ્ન (ભઠ્ઠી)ને 1200-1400 ડિગ્રી સેલ્સિયસ સુધી ગરમ રાખવી પડે છે. આ માટે પ્રોપેન ગેસ અને નેચરલ ગેસનો મુખ્ય ઉપયોગ થાય છે. પ્રોપેન ગેસ ઝડપથી સળગે છે અને ઊંચી ગરમી આપે છે, જેના કારણે તે ઔદ્યોગિક ઉપયોગ માટે આદર્શ છે. મોરબીમાં દરરોજ લગભગ 55 લાખ ક્યુબિક મીટર પ્રોપેનનો ઉપયોગ થાય છે. 

ઈરાન-અમેરિકા-ઈઝરાયલ યુદ્ધ શરૂ થયા પછી હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં જહાજોની હિલચાલ થંભી ગઈ. પ્રોપેન અને નેચરલ ગેસના ટેન્કરો અટકી ગયા. ગુજરાત ગેસ અને ઈન્ડિયન ઓઈલ કોર્પોરેશન જેવી કંપનીઓએ સપ્લાય બંધ કરી દીધી. પરિણામે મોરબીમાં 250થી વધુ ફેક્ટરીઓએ ઉત્પાદન તાત્કાલિક બંધ કરી દીધું છે. કેટલીક રિપોર્ટ્સ અનુસાર 170થી 225 ફેક્ટરીઓ પહેલેથી જ બંધ થઈ ગઈ છે અને આંકડો વધી રહ્યો છે.

 મોરબી સિરામિક એસોસિયેશનના પ્રમુખ મનોજ અરવાડિયા અને અન્ય ઉદ્યોગકારોએ જણાવ્યું છે કે જો 15 માર્ચ સુધીમાં સપ્લાય સામાન્ય નહીં થાય તો સમગ્ર ઉદ્યોગ કલેક્ટિવ શટડાઉન (સામૂહિક બંધ) કરવો પડશે. એક મહિનાના શટડાઉનથી ઉદ્યોગને કરોડો રૂપિયાનું નુકસાન થશે. એક્સપોર્ટ પણ 25%થી વધુ અટકી ગયું છે. 

મજૂરોનું પલાયન અને રોજગારી પર સંકટ ફેક્ટરીઓ બંધ થતાં સૌથી વધુ અસર મજૂરો પર પડી છે. મોરબીમાં કામ કરતા મોટાભાગના મજૂરો બિહાર, ઉત્તર પ્રદેશ, ઓડિશા, ઝારખંડ જેવા રાજ્યોમાંથી આવે છે. હવે કામ ન હોવાથી તેઓ પોતાના વતન પરત જઈ રહ્યા છે. રેલવે સ્ટેશન પર ટિકિટ માટે લાંબી લાઈનો જોવા મળી રહી છે. ઘણા મજૂરો પરિવાર સાથે અહીં રહે છે. ફેક્ટરીઓમાં ખાવા-રહેવાની વ્યવસ્થા કરવામાં આવી હતી, પરંતુ હવે તે પણ અટકી ગઈ છે.

 ઉદ્યોગકારો કહે છે કે આ સંકટ લાંબો ચાલશે તો હજારો કુશળ અને અકુશળ મજૂરો બેરોજગાર થશે. મોરબીની અર્થવ્યવસ્થા આ ઉદ્યોગ પર ટકેલી છે. ટ્રાન્સપોર્ટ, હોટેલ, દુકાનો, બેંકિંગ – બધું આ ઉદ્યોગ સાથે જોડાયેલું છે. સંકટ વધશે તો આખું શહેર પ્રભાવિત થશે. 

ઈઝરાયલની દોસ્તી અને ભારત પર અસર ભારતની ઈઝરાયલ સાથે મજબૂત દોસ્તી છે. ડિફેન્સ, ટેક્નોલોજી અને ડિપ્લોમસીમાં સહયોગ છે.

 પરંતુ આ યુદ્ધમાં અમેરિકા-ઈઝરાયલની સાથે ભારતની પ્રતિક્રિયા અને નીતિને કારણે મિડલ ઈસ્ટમાં તણાવ વધ્યો છે. ઈરાને હોર્મુઝ બંધ કરીને વૈશ્વિક ઊર્જા સપ્લાયને નિશાન બનાવ્યું છે. ભારત જેવા દેશોને આની સીધી અસર પડી રહી છે. તેલ-ગેસની કિંમતો વધી છે. ઔદ્યોગિક ઉત્પાદન અટક્યું છે. 

મોરબીના ઉદ્યોગકારો પૂછે છે – "આપણી દોસ્તીની કિંમત આટલી મોંઘી કેમ?" રાજ્ય સરકારે સમસ્યા ઉકેલવા માટે કમિટી બનાવી છે. કેન્દ્ર સરકાર પણ વૈકલ્પિક સ્ત્રોતો શોધી રહી છે. પરંતુ હાલમાં સ્થિતિ ગંભીર છે. 

શું છે આગળનું ભવિષ્ય? જો યુદ્ધ ટૂંક સમયમાં બંધ નહીં થાય તો મોરબીનો સિરામિક ઉદ્યોગ મહિનાઓ સુધી બંધ રહી શકે છે. ટાઈલ્સના ભાવમાં 15% સુધી વધારો થઈ શકે છે. એક્સપોર્ટ અટકશે. રોજગારી ગુમાવનારા મજૂરોની સમસ્યા વધશે. ગુજરાતની અર્થવ્યવસ્થા પર પણ ભારે અસર પડશે. 

આ સંકટ આપણને એક મોટો પાઠ આપે છે – વૈશ્વિક રાજકારણ અને યુદ્ધની અસર સ્થાનિક ઉદ્યોગ અને સામાન્ય માણસ સુધી પહોંચે છે. મોરબીના ઉદ્યોગકારો અને મજૂરો હવે ફક્ત એક જ વાતની આશા રાખે છે – શાંતિ જલ્દી પાછી આવે અને ગેસની સપ્લાય સામાન્ય થાય. 

આ સમયે સરકાર, ઉદ્યોગ અને સમાજ સાથે મળીને કામ કરવાની જરૂર છે. મોરબીનું ભવિષ્ય આખા ગુજરાત અને ભારતના ઔદ્યોગિક વિકાસ સાથે જોડાયેલું છે. આ સંકટને જલ્દી ઉકેલવું જરૂરી છે, નહીં તો નુકસાન અપૂર્ણ રહેશે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 17,2026 
March 17, 2026

"ट्रंप को बड़ा झटका: ईरान युद्ध में सहयोगी ढूंढते अमेरिका को जर्मनी ने दिया साफ इनकार – "ये नाटो का युद्ध नहीं है!"

"ट्रंप को बड़ा झटका: ईरान युद्ध में सहयोगी ढूंढते अमेरिका को जर्मनी ने दिया साफ इनकार – "ये नाटो का युद्ध नहीं है!"-Friday World March 17,2026 
"ईरान के खिलाफ अमेरिका-इज़राइल युद्ध में यूरोपीय साथी पीछे हटे: जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने कहा – 'बमबारी से नहीं, बातचीत से होगा समाधान'; 

ट्रंप की मित्र राष्ट्रों की अपील ठुकराई गई, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलने में भी मदद से इनकार!"

मार्च 2026 का मध्य। मध्य पूर्व में आग भड़क रही है। अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू की है। ऑपरेशन के नाम से जाना जाने वाला ये हमला ईरान की परमाणु सुविधाओं, सैन्य ठिकानों और नेतृत्व पर केंद्रित है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे "ईरान की आक्रामकता का अंत" बताया है। लेकिन युद्ध अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा। ईरान ने जवाबी हमले तेज कर दिए हैं। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य – दुनिया के तेल का 20% से ज्यादा गुजरने वाला रास्ता – ईरानी हमलों से प्रभावित हो गया है। तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है।

 ट्रंप ने इस संकट में सहयोगी देशों से मदद मांगी है। नाटो सहयोगियों से, खासकर यूरोपीय देशों से, उन्होंने अपील की कि वे हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने में अमेरिकी नौसेना के साथ शामिल हों। ट्रंप ने चेतावनी भी दी – अगर सहयोगी मदद नहीं करेंगे, तो नाटो का भविष्य "बहुत बुरा" होगा। लेकिन जवाब मिला है ठंडा। जर्मनी ने सबसे सख्त रुख अपनाया है। 

जर्मनी का स्पष्ट इनकार जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने बर्लिन में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा – "जर्मनी इस युद्ध में शामिल नहीं होगा।" उन्होंने कहा, "ये युद्ध नाटो का मामला नहीं है। नाटो के लिए ये युद्ध नहीं है।" मेर्ज़ ने सवाल उठाया – "क्या अमेरिका और इज़राइल ने इस सैन्य कार्रवाई शुरू करने से पहले हमारी सहमति ली थी? क्या संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ या नाटो से कोई मंजूरी ली गई?" जवाब में उन्होंने कहा – नहीं। इसलिए जर्मनी की सेना इसमें शामिल नहीं होगी। 

जर्मन सरकार के प्रवक्ता स्टीफन कोर्नेलियस ने और साफ किया – "जब तक युद्ध चल रहा है, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को सैन्य रूप से सुरक्षित करने में भी कोई मदद नहीं दी जाएगी।" जर्मनी ने स्पष्ट कर दिया कि वो अमेरिकी मांग को मानने के मूड में नहीं है। यहां तक कि डिफेंस मिनिस्टर बोरिस पिस्टोरियस ने भी कहा कि यूरोपीय नौसेनाओं से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ेगा। 

चांसलर मेर्ज़ का जोर: बातचीत पर, बमबारी नहीं 
मेर्ज़ ने बार-बार दोहराया कि किसी भी समस्या का हल बम गिराकर नहीं, बल्कि बातचीत से निकलता है। उन्होंने कहा – "सत्ता परिवर्तन सिर्फ हमलों से नहीं हो सकता।" जर्मनी चिंतित है कि युद्ध लंबा खिंचेगा। कोई स्पष्ट एग्जिट प्लान नहीं दिख रहा। अमेरिका और इज़राइल के पास "युद्ध को तेजी से और निर्णायक तरीके से खत्म करने की कोई संयुक्त योजना" नहीं है। मेर्ज़ ने चेतावनी दी – "ये खतरनाक वृद्धि है। लंबा युद्ध मध्य पूर्व और यूरोप दोनों के लिए हानिकारक होगा।"

 जर्मनी पहले भी नॉर्वे और कनाडा के नेताओं के साथ बैठक में यही मांग कर चुका है – युद्ध खत्म करने की ठोस रणनीति होनी चाहिए। 

अन्य यूरोपीय देशों का रुख** जर्मनी अकेला नहीं है। स्पेन और इटली ने भी दूरी बनाई है। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने इसे "अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन" बताया और कहा – "बमों से समस्याएं हल नहीं होतीं।" इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तजानी ने कूटनीति पर जोर दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि वो "बड़े युद्ध में खिंचे नहीं जाएंगे।" हालांकि ब्रिटेन और डेनमार्क अभी सोच-विचार में हैं। फ्रांस ने कुछ मदद की तैयारी दिखाई है, लेकिन वो भी सीमित है। 

कई यूरोपीय नेता मानते हैं कि ईरान का खतरा है, लेकिन ट्रंप की एकतरफा कार्रवाई और कोई प्लान न होने से वो सतर्क हैं। 

ट्रंप की निराशा और धमकी** ट्रंप ने फाइनेंशियल टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा – "जो देश हॉर्मुज़ से सबसे ज्यादा फायदा उठाते हैं, उन्हें मदद करनी चाहिए।" उन्होंने जापान (95% तेल), चीन (90%) और दक्षिण कोरिया का जिक्र किया। ट्रंप ने कहा – "अमेरिका को बहुत कम तेल वहां से मिलता है, लेकिन हम लड़ रहे हैं। सहयोगी मदद क्यों नहीं कर रहे?" उन्होंने नाटो पर हमला बोला – "अगर नकारात्मक जवाब मिला, तो नाटो का भविष्य बहुत बुरा होगा।" 

ट्रंप ने 7 देशों से मदद मांगी, लेकिन ज्यादातर ने मना कर दिया। यूरोपीय सहयोगी ट्रंप की धमकियों से नहीं डरे। वो कह रहे हैं – "ये हमारा युद्ध नहीं है।" 

क्यों है ये झटका बड़ा?** ट्रंप ईरान युद्ध में अकेले पड़ गए हैं। अमेरिका और इज़राइल के अलावा कोई बड़ा सहयोगी नहीं है। पहले के युद्धों में (जैसे इराक, अफगानिस्तान) नाटो साथ था। अब नहीं। यूरोप में युद्ध थकान है। यूक्रेन युद्ध चल रहा है। आर्थिक संकट है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी। यूरोपीय जनता युद्ध नहीं चाहती। 

ईरान के नए सुप्रीम लीडर ने हॉर्मुज़ बंद रखने की धमकी दी है। ये वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा कर सकता है। लेकिन यूरोप कह रहा है – पहले डिप्लोमेसी, फिर कोई फैसला। 

भारत और दुनिया पर असर** भारत जैसे देशों के लिए ये चिंता की बात है। खाड़ी से तेल आता है। भारतीय प्रवासी वहां फंसे हैं। युद्ध लंबा चला तो अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति अब यूरोप को अलग कर रही है। नाटो में दरार दिख रही है।

 ट्रंप को सहयोगी ढूंढने में मुश्किल हो रही है। जर्मनी का इनकार सबसे बड़ा झटका है। मेर्ज़ जैसे नेता कह रहे हैं – "बमबारी से नहीं, बातचीत से।" दुनिया देख रही है कि क्या ट्रंप पीछे हटते हैं या युद्ध और फैलाते हैं।

 ये घटनाक्रम बताता है – दोस्ती और गठबंधन आसान नहीं होते। जब जरूरत पड़ती है, तो साथी अपना हित देखते हैं। ट्रंप के लिए ये सबक है। दुनिया के लिए चेतावनी – युद्ध की आग कहीं भी फैल सकती है।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 17,2026 
March 17, 2026

भयंकर साजिश का पर्दाफाश: NIA ने 6 यूक्रेनियाई और 1 अमेरिकी नागरिक को किया गिरफ्तार – भारत के खिलाफ आतंकी षड्यंत्र, म्यांमार से ड्रोन और हथियार ट्रेनिंग का खुलासा!

भयंकर साजिश का पर्दाफाश: NIA ने 6 यूक्रेनियाई और 1 अमेरिकी नागरिक को किया गिरफ्तार – भारत के खिलाफ आतंकी षड्यंत्र, म्यांमार से ड्रोन और हथियार ट्रेनिंग का खुलासा!
-Friday World March 17,2026 
"यूक्रेन-रूस युद्ध के भाड़े के सैनिक भारत में घुसे! NIA की बड़ी कार्रवाई: 7 विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी, मिजोरम से म्यांमार बॉर्डर क्रॉस कर आतंकी ट्रेनिंग और ड्रोन सप्लाई का बड़ा नेटवर्क उजागर"

 देश की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने एक बार फिर अपनी सतर्कता और साहस से साबित किया है कि भारत की आंतरिक सुरक्षा को कोई चुनौती नहीं दे सकता। मार्च 2026 में NIA ने एक अंतरराष्ट्रीय आतंकी साजिश को नाकाम करते हुए 7 विदेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनमें 6 यूक्रेनियाई और 1 अमेरिकी नागरिक शामिल हैं। ये सभी लोग वैध वीजा पर भारत आए थे, लेकिन उनका मकसद कुछ और ही था – भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देना, खासकर पूर्वोत्तर के संवेदनशील इलाकों में अशांति फैलाना। 

गिरफ्तारी का पूरा घटनाक्रम
 गिरफ्तारी दिल्ली, लखनऊ और कोलकाता एयरपोर्ट पर हुई। कोलकाता एयरपोर्ट से अमेरिकी नागरिक को पकड़ा गया, जबकि दिल्ली और लखनऊ से तीन-तीन यूक्रेनियाई नागरिकों को हिरासत में लिया गया। इमीग्रेशन ब्यूरो की सतर्कता से ये लोग फ्लाइट पकड़ने से पहले ही पकड़े गए। NIA ने इन्हें UAPA की धारा 18 (आतंकी कृत्यों की साजिश) सहित अन्य गंभीर धाराओं के तहत गिरफ्तार किया। पटियाला हाउस कोर्ट, दिल्ली में विशेष NIA अदालत ने सभी 7 आरोपियों को 11 दिनों की NIA हिरासत में भेज दिया है, जो 27 मार्च तक चलेगी। जांच एजेंसी को इनसे गहन पूछताछ करने और साजिश के पूरे नेटवर्क को उजागर करने का मौका मिला है। 

मिजोरम से म्यांमार तक का खतरनाक रास्ता** जांच में सामने आया है कि ये सभी आरोपी वैध वीजा पर भारत में दाखिल हुए, लेकिन मिजोरम जैसे प्रतिबंधित क्षेत्र (Restricted Area) में बिना आवश्यक Restricted Area Permit (RAP) के घुस गए। मिजोरम भारत-म्यांमार बॉर्डर पर स्थित है, जहां से अवैध रूप से म्यांमार में प्रवेश करना आसान हो जाता है। आरोपियों ने इसी रास्ते का इस्तेमाल किया और म्यांमार में जाकर उन जातीय सशस्त्र समूहों (ethnic armed groups) से संपर्क किया, जो भारत विरोधी हैं और पूर्वोत्तर भारत में सक्रिय आतंकी संगठनों को समर्थन देते हैं।

 NIA के अनुसार, ये लोग म्यांमार में हथियारों की ट्रेनिंग ले रहे थे और दूसरों को ट्रेनिंग दे रहे थे। इनमें ड्रोन ऑपरेशन, हथियार हैंडलिंग और युद्धक कौशल शामिल थे। खास बात ये है कि कई आरोपी पहले रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल रह चुके हैं। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने विधानसभा में पहले ही चेतावनी दी थी कि अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों के नागरिक मिजोरम के रास्ते म्यांमार जा रहे हैं और वहां विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। उनकी ये बात अब हकीकत साबित हो गई है। 

ड्रोन सप्लाई का बड़ा खेल
 सबसे चौंकाने वाला खुलासा ड्रोन से जुड़ा है। NIA ने पाया कि आरोपी यूरोप से बड़ी मात्रा में ड्रोन मंगवा रहे थे और इन्हें भारत के रास्ते म्यांमार पहुंचा रहे थे। ये ड्रोन उन जातीय सशस्त्र समूहों को दिए जा रहे थे, जो भारत के खिलाफ हिंसा में शामिल हैं। ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, हमले और हथियार सप्लाई के लिए किया जा सकता है। ये एक क्रॉस-बॉर्डर ड्रोन थ्रेट का स्पष्ट संकेत है, जो भारत की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। जांच एजेंसी अब ये पता लगा रही है कि ये ड्रोन किसके फंडिंग से आए, कौन-कौन से समूह शामिल हैं और क्या कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क इसके पीछे है। 

क्यों है ये साजिश इतनी खतरनाक?
  पूर्वोत्तर भारत पहले से ही संवेदनशील है। मणिपुर, मिजोरम, असम जैसे राज्यों में जातीय तनाव और विद्रोही गतिविधियां चल रही हैं। म्यांमार में जारी गृहयुद्ध ने बॉर्डर को और कमजोर कर दिया है। ऐसे में विदेशी नागरिकों का आना और आतंकी ट्रेनिंग देना सीधे भारत की संप्रभुता पर हमला है। NIA का मानना है कि ये लोग भारतीय insurgent groups को हथियार, तकनीक और ट्रेनिंग सप्लाई कर रहे थे। अगर ये साजिश कामयाब हो जाती, तो पूर्वोत्तर में बड़े पैमाने पर अशांति फैल सकती थी। 

मिजोरम CM की पुरानी चेतावनी अब सच्चाई बनी 
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने 2025 में ही विधानसभा में खुलासा किया था कि विदेशी नागरिक (खासकर अमेरिका और ब्रिटेन के) मिजोरम के रास्ते म्यांमार जा रहे हैं और वहां विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि कुछ लोग रूस-यूक्रेन युद्ध में शामिल रह चुके हैं। अब NIA की कार्रवाई से उनकी बात सही साबित हुई है। ये सवाल भी उठता है कि बॉर्डर सिक्योरिटी में इतनी बड़ी चूक कैसे हुई? क्या स्थानीय प्रशासन और केंद्र सरकार को पहले से जानकारी थी? 

NIA की सफलता और आगे की जांच** NIA की ये कार्रवाई भारत की काउंटर-टेररिज्म क्षमता का प्रमाण है। एजेंसी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले नेटवर्क को पहचाना और उसे समय रहते रोक दिया।अब जांच में ये पता लगाया जा रहा है –

 - ड्रोन की फंडिंग और सप्लाई चेन कौन संभाल रहा था? 

- क्या कोई विदेशी खुफिया एजेंसी या NGO इसमें शामिल है? 

- म्यांमार के कौन-कौन से ग्रुप भारत विरोधी गतिविधियों में लगे हैं? 

- क्या पूर्वोत्तर के किसी आतंकी संगठन से डायरेक्ट लिंक है? 

देश के लिए सबक ये घटना बताती है कि आतंकवाद अब सीमाओं में नहीं बंधा। ड्रोन, साइबर और विदेशी mercenaries के जरिए खतरा बढ़ गया है। भारत को बॉर्डर मैनेजमेंट, खुफिया जानकारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और मजबूत करना होगा। NIA जैसे एजेंसियां दिन-रात काम कर रही हैं, लेकिन हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि संदिग्ध गतिविधि देखकर तुरंत सूचित करें। NIA की इस सफलता से एक बात साफ है – भारत अब किसी भी साजिश को बर्दाश्त नहीं करेगा। चाहे वो पड़ोसी देश से आए या दूर के विदेशी नागरिकों से। सुरक्षा हमारे लिए सर्वोपरि है।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 17,2026