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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Wednesday, 7 October 2026

October 07, 2026

महाराष्ट्र-आंध्र प्रदेश में भीषण सूखा: जलवायु परिवर्तन का कहर और हमें मिलने वाले सबक

महाराष्ट्र-आंध्र प्रदेश में भीषण सूखा: जलवायु परिवर्तन का कहर और हमें मिलने वाले सबक
-Friday World Oct 7,2026 
जल ही जीवन है। जब आसमान से पानी बरसना बंद हो जाता है, तो सिर्फ खेत ही नहीं सूखते, बल्कि इंसानों का स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग और पूरा अर्थव्यवस्था भी थम-सा जाता है। साल 2026 में भारत के दो महत्वपूर्ण राज्य—महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश—गंभीर जलसंकट और सूखे की चपेट में हैं। कमजोर मानसून ने खेतों को सूखा दिया है, जलाशयों के तल दिखने लगे हैं और लाखों लोगों की जिंदगी प्रभावित हो गई है। यह सूखा सिर्फ कृषि तक सीमित नहीं है। यह स्वास्थ्य, रोजगार, उद्योग और पूरे आर्थिक ढांचे पर भारी पड़ रहा है। आइए विस्तार से समझते हैं कि इसकी वजह क्या है, स्थिति कितनी गंभीर है और इससे हमें क्या सबक मिलते हैं। 

सूखे का मुख्य कारण: अल नीनो और कमजोर मानसून इस साल के भीषण सूखे के पीछे सबसे बड़ा कारक अल नीनो (El Niño) है। यह एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जिसमें प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में देशभर में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश हुई है। यह 2015 के बाद का सबसे कमजोर मानसून है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा, विदर्भ और पश्चिमी महाराष्ट्र के कई जिलों में तथा आंध्र प्रदेश के रायलसीमा और तटीय क्षेत्रों में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई। कई जगहों पर जून से सितंबर के बीच सामान्य बारिश का आधा भी नहीं हुआ। नदियां सूखने लगीं, बांधों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक गिर गया और भूजल स्तर भी तेजी से नीचे चला गया। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम के पैटर्न बदल रहे हैं। कभी अतिवृष्टि तो कभी सूखा—यह चक्र तेज हो रहा है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं रोका गया तो ऐसे सूखे और अधिक बार तथा अधिक तीव्रता से आएंगे। 

 स्थिति कितनी गंभीर है? महाराष्ट्र में कई जिलों को सूखा प्रभावित घोषित किया जा चुका है। सोलापुर, बीड, लातूर, उस्मानाबाद, अमरावती और यवतमाल जैसे क्षेत्रों में किसानों की फसलें लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई हैं। कपास, सोयाबीन, तूर, ज्वार और गन्ने की फसलें सूखकर रह गईं। आंध्र प्रदेश में भी अनंतपुर, कडपा, कुरनूल और चित्तूर जिलों में हालात बदतर हैं। कई गांवों में पीने का पानी टैंकरों से पहुंचाया जा रहा है। स्कूलों में मिड-डे मील प्रभावित हो रहा है क्योंकि पानी की कमी से रसोई नहीं चल पा रही। पशुओं के लिए चारे और पानी की भारी किल्लत है, जिससे कई जगहों पर पशुओं की मौतें भी हो रही हैं। स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है। पानी की कमी से स्वच्छता प्रभावित हो रही है। दस्त, त्वचा संक्रमण और अन्य बीमारियों के मामले बढ़ रहे हैं। महिलाओं और बच्चों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे उनका स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों प्रभावित हो रहे हैं। 

 अर्थव्यवस्था और रोजगार पर बड़ा झटका महाराष्ट्र भारत की अर्थव्यवस्था में लगभग 14 प्रतिशत का योगदान देता है। पानी की कमी ने उद्योगों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। कई फैक्टरियों को 30 प्रतिशत पानी रीसायकल करने के आदेश दिए गए हैं, जिससे उत्पादन लागत बढ़ रही है। तेल और दाल मिलें तथा चीनी मिलें धीमी गति से चल रही हैं। सोयाबीन और तूर की कमी के कारण खाद्य तेल और दालों के भाव आसमान छू सकते हैं, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। आंध्र प्रदेश में छोटे व्यापारी, खेतिहर मजदूर और परिवहन से जुड़े लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। उनकी आय घट गई है। कई परिवार पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। सरकारों को हजारों करोड़ रुपये के राहत पैकेज घोषित करने पड़े हैं—फसल ऋण माफी, बिजली बिल में राहत, मुफ्त या सस्ता चारा और पानी टैंकर जैसी व्यवस्था। इन राहत उपायों से सरकारी खजाने पर भारी दबाव पड़ा है। कृषि क्षेत्र में रोजगार का बड़ा नुकसान हुआ है। खेतिहर मजदूरों को काम नहीं मिल रहा। महिलाओं की आय खासकर प्रभावित हुई है क्योंकि कई कृषि कार्य उनके हाथ में होते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप पड़ने के कगार पर है। 

 जलवायु परिवर्तन का सबक और आगे का रास्ता यह सूखा हमें साफ संदेश दे रहा है कि जलवायु परिवर्तन अब कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि आज की हकीकत है। हमें दीर्घकालिक समाधान अपनाने होंगे। जल संरक्षण सबसे जरूरी है। वर्षा जल संचयन, तालाबों और कुओं का पुनर्जीवन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकें बड़े पैमाने पर अपनानी होंगी। फसल पैटर्न बदलने की जरूरत है—कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना होगा। वन क्षेत्र बढ़ाने और मिट्टी की नमी बनाए रखने वाले उपायों पर जोर देना होगा। सरकारों को जलवायु अनुकूल कृषि नीतियां बनानी होंगी। किसानों को मौसम पूर्वानुमान, बीमा और नई तकनीकों की ट्रेनिंग देनी होगी। उद्योगों को जल कुशल बनाना होगा। नागरिक स्तर पर भी पानी बचाने की आदत डालनी होगी। हर बूंद कीमती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को जलवायु न्याय की मांग मजबूती से करनी चाहिए। विकसित देश जो ऐतिहासिक रूप से अधिक उत्सर्जन के जिम्मेदार हैं, उन्हें विकासशील देशों को वित्तीय और तकनीकी सहायता देनी चाहिए। 

  महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश का वर्तमान सूखा सिर्फ मौसम की मार नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ चेतावनी है। अगर हम अभी ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले सालों में ऐसे संकट और बढ़ेंगे। जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि और जलवायु अनुकूल विकास ही इसका समाधान है। हमें याद रखना होगा—जल ही जीवन है। इसे बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। समय रहते कार्रवाई करें, वरना आने वाली पीढ़ियों को और भी कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 7,2026 

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October 07, 2026

लाल सागर पर अंसारुल्लाह परचम: ईरान की निवेशित ताकत का फल और दुनिया के दो हिस्से

लाल सागर पर अंसारुल्लाह परचम: ईरान की निवेशित ताकत का फल और दुनिया के दो हिस्से
-Friday World Oct 7,2026 
यमन के पश्चिमी तट पर पिछले कुछ हफ्तों में जो तेजी आई है, वह सिर्फ एक स्थानीय संघर्ष नहीं लगती। यह एक ऐसी रणनीतिक सफलता है जिसकी जड़ें सालों पहले ईरान द्वारा यमनी लड़कों को दिए गए प्रशिक्षण, हथियार और समर्थन में छिपी हैं। आज लाल सागर की लगभग पूरी यमनी तटीय रेखा पर अंसारुल्लाह झंडा लहरा रहा है। मोखा बंदरगाह से लेकर बाब अल-मंदब के पास के द्वीपों तक—पेरिम (मयून) समेत—अंसारुल्लाह ने तेज अभियान चलाकर नियंत्रण हासिल कर लिया।

यह सफलता अचानक नहीं आई। ईरान ने लंबे समय से अंसारुल्लाह को प्रशिक्षित किया, मिसाइल और ड्रोन तकनीक दी तथा समुद्री हमलों की क्षमता विकसित करने में मदद की। आज उसी निवेश की एक-एक बूंद काम आ रही है। अंसारुल्लाह अब सिर्फ यमन के अंदर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शिपिंग लेन पर भी असर डालने की स्थिति में हैं।

**दो चोकपॉइंट्स का समीकरण**

दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारों पर अब ईरानी प्रभाव साफ दिख रहा है। पहला है जलडमरूमध्य हॉर्मूज—जहां ईरान खुद सीधा दबाव बना सकता है। दूसरा है बाब अल-मंदब, जहां ईरान के सहयोगी अंसारुल्लाह अब मजबूत स्थिति में बैठे हैं। यदि दोनों मार्ग एक साथ बाधित या नियंत्रित हो जाएं, तो वैश्विक व्यापार का नक्शा बदल जाता है।

एक तरफ बाजार और उपभोक्ता अर्थव्यवस्थाएं, दूसरी तरफ उत्पादन इकाइयां और ऊर्जा आपूर्ति। बीच में ईरानी प्रभाव वाला गलियारा। तेल, गैस और कंटेनर जहाजों का बड़ा हिस्सा इन दो मार्गों से गुजरता है। सऊदी अरब समेत कई देशों ने हॉर्मूज पर दबाव बढ़ने के बाद लाल सागर वाले रास्ते पर ज्यादा निर्भरता बढ़ाई थी। अब वही रास्ता भी अंसारुल्लाह के प्रभाव क्षेत्र में आ गया है।

**सऊदी राजशाही की कोशिश और सीमाएं**

सऊदी अरब पिछले एक दशक से यमन में अंसारुल्लाह को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। हवाई हमले, ग्राउंड सहयोग और राजनयिक प्रयास—सब कुछ आजमाया गया। फिर भी पश्चिमी तट पर हालिया तेजी के सामने सऊदी समर्थित बल पीछे हटते दिखे। कुछ इलाकों में जवाबी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन अंसारुल्लाह का तटीय कब्जा और द्वीपों पर पहुंच साफ संकेत देती है कि सऊदी की पूरी ताकत के बावजूद यमन को पूरी तरह अपने नियंत्रण में लाना आसान नहीं रहा।

यह स्थिति सिर्फ सैन्य नहीं, आर्थिक और राजनयिक भी है। लाल सागर में शिपिंग की सुरक्षा पर सवाल उठने से बीमा लागत बढ़ती है, रास्ते बदलने पड़ते हैं और ऊर्जा कीमतों पर दबाव बनता है। वैश्विक बाजार पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव झेल रहे हैं। ऐसे में यमन का यह विकास नया आयाम जोड़ रहा है।

**रणनीतिक संदेश**

अंसारुल्लाह की यह सफलता ईरान की क्षेत्रीय रणनीति का व्यावहारिक प्रदर्शन है। प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय सहयोगी समूहों के जरिए प्रभाव फैलाने का मॉडल यहां काम करता दिख रहा है। यमन के लड़के अब सिर्फ स्थानीय विद्रोही नहीं रह गए; वे एक बड़े गलियारे के द्वारपाल बन गए हैं। बाब अल-मंदब पर नियंत्रण का मतलब है कि जहाजों पर नजर रखना, दबाव बनाना या चुनिंदा लक्ष्य तय करना आसान हो जाता है।

साथ ही यह याद रखना जरूरी है कि यमन का आंतरिक संघर्ष जटिल है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार, स्थानीय शक्तियां और क्षेत्रीय खिलाड़ी सभी अपनी भूमिका निभा रहे हैं। अंसारुल्लाह का विस्तार स्थायी शांति लाएगा या नया दौर खोलेगा—यह आने वाले समय में तय होगा। फिलहाल तथ्य यह है कि लाल सागर की यमनी तटीय रेखा पर अंसारुल्लाह परचम लहरा रहा है और दो महत्वपूर्ण चोकपॉइंट्स पर ईरानी प्रभाव का समीकरण मजबूत हुआ है।

बाजार एक तरफ, उत्पादन दूसरी तरफ और बीच में वह शक्ति जो दोनों को जोड़ने वाले मार्गों पर असर डाल सकती है। यमन की हालिया घटनाएं यही संदेश दे रही हैं। क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल रहा है और वैश्विक व्यापार के लिए इसके निहितार्थ दूरगामी हैं।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 7,2026 

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October 07, 2026

राहुल-प्रियंका की जबरदस्ती अटकायत, जंतर-मंतर पर भारी घर्षण: CEC के इस्तीफे की मांग पर INDIA ब्लॉक का हाई-वोल्टेज प्रदर्शन

राहुल-प्रियंका की जबरदस्ती अटकायत, जंतर-मंतर पर भारी घर्षण: CEC के इस्तीफे की मांग पर INDIA ब्लॉक का हाई-वोल्टेज प्रदर्शन
-Friday World Oct 7,2026 
नई दिल्ली। बुधवार को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर इलाके में विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक का प्रदर्शन एक बड़े नाटकीय और तनावपूर्ण मंजर में बदल गया। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर निकली विपक्षी सांसदों की कूच को दिल्ली पुलिस ने बीच रास्ते में रोक दिया। इसके बाद जो दृश्य बने, वे सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गए। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा समेत कई वरिष्ठ नेताओं को पुलिस ने बलपूर्वक हिरासत में ले लिया। प्रियंका गांधी ने महिला पुलिस कर्मियों पर नाखून मारने और जमीन पर पटक देने का गंभीर आरोप लगाया तथा विरोध स्वरूप सड़क पर लेट गईं। घटना की शुरुआत तब हुई जब INDIA ब्लॉक के सांसद CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर की ओर कूच निकालने निकले। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और हाल के फैसले पर सवाल उठाते हुए विपक्ष लंबे समय से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब तक CEC इस्तीफा नहीं देते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था का हवाला देते हुए कूच को बीच में ही रोकने की कोशिश की। दोनों पक्षों के बीच जोरदार धक्का-मुक्की और घर्षण शुरू हो गया। नारेबाजी के बीच पुलिसकर्मियों और विपक्षी नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच शारीरिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी को हिरासत में लेते समय पुलिस बसों का इस्तेमाल किया गया। इन बसों में विपक्षी नेताओं को बैठाकर सुरक्षित स्थान की ओर ले जाया जा रहा था। तभी कांग्रेस के गुस्साए कार्यकर्ताओं ने एक बस को घेर लिया और आगे बढ़ने से रोकने के लिए उसके टायर पंचर कर दिए। इस आक्रामक विरोध के कारण सड़क पर अफरातफरी मच गई। पुलिस काफिला कुछ देर तक वहीं थम गया। आसपास के इलाके में यातायात प्रभावित हुआ और भारी पुलिस बल तैनात करना पड़ा। प्रियंका गांधी वाड्रा के आरोपों ने घटना को और गंभीर बना दिया। उन्होंने महिला पुलिस कर्मियों पर नाखून मारने और जबरन जमीन पर पटक देने का आरोप लगाया। विरोध जताते हुए वे सड़क पर लेट गईं। यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने अत्यधिक बल का इस्तेमाल किया, जबकि प्रशासन का पक्ष है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई। अटकायत के बावजूद INDIA ब्लॉक का रुख सख्त बना रहा। हिरासत में लिए गए सांसदों ने साफ कहा कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक विरोध जारी रहेगा। चुनाव आयोग के खिलाफ यह मोर्चा सिर्फ एक दिन का नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही असंतुष्टि का नतीजा है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया में निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं और CEC पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। सत्ता पक्ष की ओर से इन आरोपों को राजनीतिक साजिश करार दिया जाता रहा है। घटना के बाद राहुल गांधी समेत सभी वरिष्ठ विपक्षी सांसदों को भरी हुई दिल्ली पुलिस की बसों में भरकर घटनास्थल से रवाना कर दिया गया। उन्हें सुरक्षित स्थान पर कस्टडी में स्थानांतरित किया गया। इस बीच जंतर-मंतर इलाके में तनाव बरकरार रहा। पुलिस ने इलाके को सील करने और अतिरिक्त बल तैनात करने के कदम उठाए। यह घटना भारतीय राजनीति में विपक्ष और सत्ता के बीच बढ़ते टकराव का प्रतीक बन गई है। एक ओर विपक्ष लोकतंत्र की रक्षा और संस्थाओं की स्वतंत्रता का नारा लगा रहा है, तो दूसरी ओर सरकार कानून व्यवस्था और प्रदर्शन की अनुमति की शर्तों का हवाला दे रही है। जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक स्थल पर इस तरह का घर्षण दिल्ली की सड़कों को एक बार फिर राजनीतिक अखाड़ा बना देता है। विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक ने स्पष्ट संदेश दिया है कि CEC के इस्तीफे की मांग पर कोई समझौता नहीं होगा। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे चेहरे इस आंदोलन के केंद्र में हैं। प्रियंका गांधी का सड़क पर लेटना और राहुल गांधी की बस का टायर पंचर होना—ये दृश्य आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का हिस्सा बनने वाले हैं। चुनाव आयोग भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आधार स्तंभ है। ऐसे में किसी भी CEC के खिलाफ इस्तीफे की मांग उठना सामान्य बात नहीं। विपक्ष इसे संस्था की विश्वसनीयता से जोड़ रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक दबाव बता रहा है। दोनों पक्षों के बीच विश्वास की खाई गहरी होती जा रही है। दिल्ली पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। विपक्ष का आरोप है कि पुलिस ने विपक्षी नेताओं के साथ कठोर व्यवहार किया, जबकि पुलिस का दावा है कि प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया गया। महिला पुलिस कर्मियों से जुड़े आरोपों की जांच की मांग भी उठाई जा रही है। इस घटना ने एक बार फिर याद दिलाया कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार कितना महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही कानून व्यवस्था बनाए रखना भी उतना ही जरूरी। जंतर-मंतर पर हुआ यह हाई-वोल्टेज ड्रामा आने वाले दिनों में संसद और सड़क दोनों जगह चर्चा का विषय बना रहेगा। INDIA ब्लॉक के सांसदों का कहना है कि वे हार नहीं मानेंगे। CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक आंदोलन जारी रहेगा। चाहे हिरासत हो, चाहे टकराव हो, मांग एक ही है—इस्तीफा। इस दृढ़ता ने विपक्ष को एकजुट दिखाया है, लेकिन सत्ता पक्ष इसे अस्थिरता फैलाने की कोशिश मान रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी घटनाएं चुनावी मौसम में और तेज हो सकती हैं। जनता इन घटनाओं को किस नजरिए से देखती है, यह भविष्य के चुनावी नतीजों पर असर डाल सकता है। फिलहाल जंतर-मंतर का यह घर्षण दिल्ली की राजनीति का केंद्रबिंदु बना हुआ है। राहुल गांधी को ले जा रही बस के टायर पंचर होने की घटना ने कार्यकर्ताओं के आक्रोश को साफ दिखाया। पुलिस काफिले का थम जाना और अफरातफरी का मंजर याद रखने लायक था। प्रियंका गांधी का सड़क पर लेटना महिलाओं के खिलाफ बल प्रयोग के आरोपों को और मजबूत बनाता है। अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली की सड़कों पर बुधवार का दिन सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि विपक्ष और सत्ता के बीच गहरे राजनीतिक टकराव का आईना बन गया। CEC के इस्तीफे की मांग अब सिर्फ नारा नहीं, बल्कि एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुकी है। आगे क्या होता है, यह देखने वाली बात होगी।

 Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 7,2026 

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October 07, 2026

मक्का समझौता एक्टिव: पाकिस्तान-तुर्की की सेनाएं सऊदी अरब पहुंचेंगी, हूती हमलों के खिलाफ नया मोर्चा

मक्का समझौता एक्टिव: पाकिस्तान-तुर्की की सेनाएं सऊदी अरब पहुंचेंगी, हूती हमलों के खिलाफ नया मोर्चा
-Friday World Oct 7,2026 
रियाद। मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव आ गया है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने सोमवार को मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (मक्का अलायंस फॉर डिफेंस) को औपचारिक रूप से सक्रिय कर दिया है। 5 अक्टूबर 2026 को सऊदी राजधानी रियाद में हुई मक्का अलायंस की स्ट्रैटेजिक-पॉलिटिकल और डिफेंस कमेटी की आपातकालीन बैठक में यह फैसला लिया गया। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय द्वारा जारी संयुक्त बयान में इसकी पुष्टि की गई है। तीनों देशों ने स्पष्ट किया है कि सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं को तुरंत व्यवहारिक रूप में लागू किया जाएगा। सऊदी अरब में सैन्य बल और क्षमताएं तेजी से उपलब्ध कराई जाएंगी तथा उनकी त्वरित तैनाती सुनिश्चित की जाएगी। यह कदम यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए जा रहे लगातार हमलों के जवाब में उठाया गया है। इन हमलों में पवित्र शहरों मक्का और मदीना के आसपास के क्षेत्रों तथा नागरिक व आर्थिक ठिकानों को भी निशाना बनाया गया। ### समझौते की पृष्ठभूमि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त 2026 को मक्का में हस्ताक्षर हुए थे। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और तुर्की के राष्ट्रपति रेजेप तैयप एर्दोगन ने इस ऐतिहासिक समझौते पर दस्तखत किए थे। यह समझौता नाटो के आर्टिकल-5 की तर्ज पर बनाया गया है, जिसमें कहा गया है कि तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला तीनों पर हमला माना जाएगा। इससे पहले सितंबर 2025 में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौता हो चुका था। मक्का समझौते ने इसमें तुर्की को भी शामिल कर त्रिपक्षीय ढांचा खड़ा कर दिया। समझौते के तहत खुफिया जानकारी साझा करना, संयुक्त प्रशिक्षण, रक्षा उद्योग सहयोग और सामूहिक निरोध (collective deterrence) को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। ### रियाद बैठक और फैसले 5 अक्टूबर की बैठक में तीनों देशों के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और सैन्य प्रमुख मौजूद रहे। बैठक के बाद जारी संयुक्त बयान में कहा गया कि कमेटी ने सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धताओं के व्यावहारिक क्रियान्वयन की दिशा में तुरंत कदम उठाने का फैसला किया है। सऊदी अरब में सहमत सैन्य बल और क्षमताएं उपलब्ध कराने तथा उनकी तेजी से तैनाती के लिए आवश्यक उपाय किए जाएंगे। यह सब स्वीकृत व्यवस्थाओं और प्रत्येक देश के राष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप होगा। सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कमेटी ने हमलों और उनके जिम्मेदारों के खिलाफ गठबंधन के ढांचे में सामूहिक निरोध उपायों को सक्रिय करने पर सहमति जताई। उन्होंने तीनों देशों की एकजुटता और पवित्र स्थलों की सुरक्षा पर जोर दिया। पाकिस्तानी अधिकारियों ने भी पुष्टि की कि पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब जाएंगे। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि तुर्की और पाकिस्तान की सेनाएं सहायक भूमिका निभा रही हैं, जिसमें टोही और अन्य गतिविधियां शामिल हैं, जबकि मुख्य लड़ाई सऊदी बल लड़ रहे हैं। बैठक में पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) नौमान महमूद को अलायंस का पहला महासचिव तीन साल के लिए नियुक्त करने का भी फैसला लिया गया। सचिवालय रियाद में स्थापित है। ### हूती हमले और क्षेत्रीय संदर्भ हूती विद्रोही पिछले कुछ महीनों से सऊदी अरब पर ड्रोन और मिसाइल हमले बढ़ा रहे हैं। इनमें एयरपोर्ट, तेल सुविधाएं, सैन्य ठिकाने और यहां तक कि मदीना में बिजली वितरण केंद्र भी शामिल रहे। इन हमलों ने पवित्र स्थलों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी थी। यमन में भी सऊदी समर्थित सरकार की सेनाओं ने जवाबी कार्रवाई शुरू की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है। तीनों देशों की संयुक्त सैन्य क्षमता काफी मजबूत है। इसमें लगभग 14 लाख सक्रिय सैनिक, हजारों लड़ाकू विमान, टैंक और नौसैनिक संपत्तियां शामिल हैं। तुर्की नाटो का दूसरा सबसे बड़ा सैन्य बल वाला सदस्य है, पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है और सऊदी अरब ऊर्जा व वित्तीय शक्ति है। ### आगे क्या? अभी तैनाती के आकार, सटीक भूमिका या समय-सारिणी का खुलासा नहीं किया गया है। तुर्की संसद में समझौते का अनुमोदन प्रक्रियाधीन बताया जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार मदद एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, खुफिया सहयोग और सीमित सैन्य उपस्थिति के रूप में हो सकती है। सीधा युद्ध में शामिल होने की बजाय निरोध क्षमता बढ़ाने पर जोर रहेगा। यह विकास मध्य पूर्व में नई सुरक्षा संरचना की ओर इशारा करता है। अमेरिका की भूमिका बदलने और क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सहयोग बढ़ने के बीच मक्का अलायंस एक महत्वपूर्ण मंच बनकर उभर रहा है। तीनों देश बार-बार दोहरा रहे हैं कि समझौता रक्षात्मक है और किसी देश के खिलाफ नहीं है। सऊदी अरब में पाकिस्तानी और तुर्की सैनिकों की संभावित तैनाती न केवल सैन्य सहयोग का प्रतीक है, बल्कि मुस्लिम दुनिया में सामूहिक सुरक्षा की नई सोच को भी मजबूत करती है। हूती हमलों के बीच यह फैसला क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयासों को नई दिशा दे सकता है। आगे की घटनाएं बताएंगी कि यह गठबंधन कितना प्रभावी साबित होता है।

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 7,2026 

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October 07, 2026

અમરેલીના પૂર્વ સાંસદ વિરજી ઠુમ્મરનું અવસાન: સૌરાષ્ટ્રની કોંગ્રેસને લાગ્યો મોટો ફટકો, સાંજે પાંચ વાગ્યે અંતિમયાત્રા

અમરેલીના પૂર્વ સાંસદ વિરજી ઠુમ્મરનું અવસાન: સૌરાષ્ટ્રની કોંગ્રેસને લાગ્યો મોટો ફટકો, સાંજે પાંચ વાગ્યે અંતિમયાત્રા
-Friday World Oct 7,2026 
અમરેલીના રાજકીય વર્તુળમાં આજે ગહન શોક છવાયો છે. જિલ્લાના લાંબા સમયના કોંગ્રેસ નેતા અને પૂર્વ સાંસદ વિરજી ઠુમ્મરનું ટૂંકી બીમારી બાદ નિધન થયું છે. જિલ્લા કોંગ્રેસ પ્રમુખ પ્રતાપ દુધાતે આ માહિતી આપી છે. મળતી વિગતો મુજબ તેઓ કેન્સર સામે લડી રહ્યા હતા અને અમરેલીમાં જ તેમણે અંતિમ શ્વાસ લીધા. તેમના પાર્થિવ દેહને અંતિમ દર્શન માટે મૂકવામાં આવ્યા છે અને આજે સાંજે પાંચ વાગ્યે અમરેલીથી અંતિમ સ્મશાનયાત્રા નીકળશે. સમાચાર પ્રસરતાં જ કોંગ્રેસના કાર્યકરો, સ્થાનિક નેતાઓ અને સમર્થકોમાં દુઃખની લાગણી ફેલાઈ છે.

વિરજી ઠુમ્મર અમરેલી અને સૌરાષ્ટ્રના કોંગ્રેસ રાજકારણમાં આક્રમક અને સીધી વાત કરનાર નેતા તરીકે જાણીતા હતા. તેમની રાજકીય સફર લાંબી અને સતત કોંગ્રેસ સાથે જોડાયેલી રહી. વર્ષ 2004ની લોકસભા ચૂંટણીમાં તેમણે અમરેલી બેઠક પરથી કોંગ્રેસના ઉમેદવાર તરીકે ચૂંટણી લડી હતી. તેમને 2,20,649 મત મળ્યા હતા અને તેમણે ભાજપના અનુભવી નેતા દિલીપ સંઘાણીને જંગી મતથી હરાવ્યા હતા. આ વિજય પછી તેઓ 2004થી 2009 સુધી અમરેલીના સાંસદ રહ્યા. સંસદમાં તેમણે સ્થાનિક મુદ્દાઓ અને ખેડૂતો સંબંધિત પ્રશ્નો ઉઠાવ્યા હતા.

સાંસદ તરીકેની કાર્યકાળ પૂરો થયા પછી પણ તેમનું સંગઠન સાથેનું જોડાણ ચાલુ રહ્યું. વર્ષ 2017ની ગુજરાત વિધાનસભા ચૂંટણીમાં તેમણે લાઠી બેઠક પરથી કોંગ્રેસના ટિકિટ પર ચૂંટણી લડી અને જીત મેળવી. 2017થી 2022 સુધી તેઓ લાઠી મતવિસ્તારના ધારાસભ્ય રહ્યા. આ સમયગાળા દરમિયાન તેમણે વિધાનસભામાં પણ સક્રિય ભૂમિકા ભજવી. અમરેલી જિલ્લામાં કોંગ્રેસના સંગઠનને મજબૂત કરવામાં તેમનો ફાળો નોંધપાત્ર રહ્યો હતો. તેઓ માત્ર ચૂંટાયેલા પ્રતિનિધિ નહોતા, પણ જિલ્લાના સહકારી ક્ષેત્ર સાથે પણ લાંબા સમયથી જોડાયેલા હતા. વિવિધ સહકારી સંસ્થાઓમાં તેમણે જવાબદારીઓ સંભાળી હતી અને સ્થાનિક સ્તરે લોકો સાથે સીધો સંપર્ક જાળવી રાખ્યો હતો.

અમરેલી જિલ્લાના રાજકારણમાં વિરજી ઠુમ્મરની ઓળખ એક લડાયક અને સ્પષ્ટવક્તા નેતા તરીકે રહી. તેઓ પક્ષની અંદર અને બહાર પોતાની વાત મક્કમતાથી મૂકતા. સ્થાનિક મુદ્દાઓ પર તેમની સક્રિયતા કાર્યકરોમાં લોકપ્રિય રહી. તેમના નિધનના સમાચાર પછી જિલ્લા કોંગ્રેસના કાર્યકરોએ શોક વ્યક્ત કર્યો છે અને પાર્ટી માટે આ ખોટને મોટી ગણાવી છે. સમગ્ર સૌરાષ્ટ્રના કોંગ્રેસ વર્તુળમાં પણ આ સમાચારથી દુઃખની લાગણી જોવા મળી રહી છે.

તેમની અંતિમયાત્રા આજે સાંજે પાંચ વાગ્યે નીકળવાની છે. અપેક્ષા છે કે સ્થાનિક નેતાઓ, કાર્યકરો અને નાગરિકો મોટી સંખ્યામાં ઉપસ્થિત રહીને શ્રદ્ધાંજલિ અર્પણ કરશે. વિરજી ઠુમ્મરની રાજકીય કારકિર્દી અમરેલી બેઠકના ઇતિહાસ સાથે જોડાયેલી રહી. 2004માં દિલીપ સંઘાણીને હરાવીને મેળવેલી જીત તેમની રાજકીય સફરનો મહત્વનો તબક્કો હતો. ત્યારબાદ ધારાસભ્ય તરીકે પણ તેમણે પોતાની હાજરી જાળવી રાખી. સહકારી ક્ષેત્રમાં તેમનું યોગદાન પણ જિલ્લાના લોકોને યાદ રહેશે.

આવા નેતાના અવસાનથી અમરેલીના કોંગ્રેસ સંગઠનને એક અનુભવી આગેવાન ગુમાવવાનો વારો આવ્યો છે. તેમના પરિવાર, સમર્થકો અને પક્ષના કાર્યકરો પ્રત્યે સહાનુભૂતિ વ્યક્ત કરવામાં આવી રહી છે. અંતિમયાત્રા દરમિયાન જિલ્લામાં શોકનું વાતાવરણ રહેવાની શક્યતા છે. વિરજી ઠુમ્મરની સ્મૃતિ સ્થાનિક રાજકારણ અને સહકારી કાર્યો સાથે જોડાયેલી રહેશે.

Sajjadali Nayani ✍
Friday World Oct 7,2026 

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Tuesday, 6 October 2026

October 06, 2026

ગુજરાતમાં સરકારી કર્મચારીઓનો વિરોધ: 15 દિવસના અલ્ટિમેટમ સાથે કામકાજ ઠપ થવાની ચીમકી, બેરોજગાર યુવાનોનો પણ હલ્લાબોલ

ગુજરાતમાં સરકારી કર્મચારીઓનો વિરોધ: 15 દિવસના અલ્ટિમેટમ સાથે કામકાજ ઠપ થવાની ચીમકી, બેરોજગાર યુવાનોનો પણ હલ્લાબોલ
- Friday World Oct 7,2026 
ગુજરાત રાજ્યમાં સરકારી કામકાજ ઠપ થવાના સંકેતો મજબૂત બની રહ્યા છે. ખેડૂતો અને આંગણવાડી કાર્યકરો પછી હવે સરકારી કર્મચારીઓએ પણ લાંબા સમયથી લટકતા પ્રશ્નોને લઈને સરકાર સામે મોરચો ખોલ્યો છે. ગુજરાત રાજ્ય કર્મચારી મહામંડળે રાજ્ય સરકારને 15 દિવસનું સ્પષ્ટ અલ્ટિમેટમ આપ્યું છે. જો આ સમયગાળામાં પડતર મુદ્દાઓનું સંતોષકારક નિરાકરણ નહીં આવે તો સમગ્ર રાજ્યમાં ગાંધીવાદી માર્ગે ઉગ્ર આંદોલન શરૂ કરવામાં આવશે અને સરકારી કામકાજ ઠપ થઈ શકે છે. આ ચીમકી સાથે વહીવટી તંત્રમાં ચિંતા વધી છે.

કર્મચારીઓનો મુખ્ય આક્ષેપ છે કે તેઓ દિવસ-રાત મહેનત કરીને સરકારી યોજનાઓને જમીની સ્તરે પહોંચાડે છે, પરંતુ તેમના પોતાના હકોની વારંવાર અવગણના થઈ રહી છે. વર્ષોથી ચાલતી ફિક્સ પગાર પ્રથાને સંપૂર્ણપણે બંધ કરવાની માંગ સૌથી મોટી છે. કર્મચારીઓ કહે છે કે આ પ્રથા શોષણ સમાન છે અને તેને તાત્કાલિક નાબૂદ કરવી જોઈએ. સાથે સાથે જૂની પેન્શન યોજનાને ફરી અમલમાં મૂકવાની માંગ પણ મજબૂત છે. સામાજિક સુરક્ષાના હિતમાં આ યોજના જરૂરી માનવામાં આવે છે.

પ્રમોશનની પ્રક્રિયામાં વિલંબ અને ખાલી પડેલી જગ્યાઓ ભરવાની માંગ પણ મહત્ત્વની છે. વર્કલોડ વધી રહ્યો છે કારણ કે મહેકમ પૂરતો નથી. 50 વર્ષથી વધુ વયના વરિષ્ઠ કર્મચારીઓને ખાતાકીય પરીક્ષામાંથી કાયમી મુક્તિ આપવાની માંગ કરવામાં આવી છે. પંચાયત, બોર્ડ, નિગમો અને નગરપાલિકાના કર્મચારીઓને પણ સરકારી કર્મચારી તરીકે સમાન દરજ્જો અને લાભો આપવાની માંગ છે. મહામંડળના હોદ્દેદારો કહે છે કે આ માંગણીઓ વર્ષોથી લટકી રહી છે અને વારંવારની રજૂઆતો છતાં કોઈ નક્કર પરિણામ નથી મળ્યું.

આ અલ્ટિમેટમ સાથે જ ગાંધીનગરમાં બેરોજગાર યુવાનોનો પણ મોટો વિરોધ જોવા મળ્યો. ઉત્તર ગુજરાતના એપ્રેન્ટિસ કરેલા યુવાનો મોટી સંખ્યામાં એકઠા થયા અને સરકાર સામે આક્રોશ વ્યક્ત કર્યો. તેમનો આક્ષેપ છે કે સરકાર પરીક્ષા લે છે પણ સમયસર અને પૂરતી ભરતી કરતી નથી. છ મહિના પહેલાં લેવાયેલી પરીક્ષામાં આશરે 4800 ઉમેદવારો પાસ થયા હોવા છતાં માત્ર 183 લોકોનો એક રાઉન્ડ જાહેર કરીને પ્રક્રિયા અટકાવી દેવામાં આવી છે. ભરતીની જાહેરાત વખતે કુલ જગ્યાઓનો સ્પષ્ટ આંકડો પણ નથી આપવામાં આવતો, જેને લઈને અનિશ્ચિતતા વધી છે.

યુવાનોની માંગ છે કે કોન્ટ્રાક્ટ અને આઉટસોર્સિંગ પ્રથા સંપૂર્ણપણે બંધ કરીને કાયમી ભરતી કરવામાં આવે. પરીક્ષા પાસ કરનાર વધુમાં વધુ યુવાનોને તાત્કાલિક નોકરી આપવામાં આવે અને આગામી રાઉન્ડનો સમયપત્રક સ્પષ્ટ કરવામાં આવે. રોજગારીના પ્રશ્ને રાજ્યમાં પહેલેથી જ ચિંતા છે અને આ વિરોધ તેને વધુ ઉઘાડો પાડે છે.

આ બંને વિકાસો સાથે જોડાયેલા છે. એક તરફ હાલના કર્મચારીઓ તેમના હકો માટે લડી રહ્યા છે, તો બીજી તરફ નવા યુવાનો કાયમી નોકરી માટે રાહ જોઈ રહ્યા છે. જો સરકારી વિભાગોમાં ખાલી જગ્યાઓ ભરાય તો વર્કલોડ ઘટે અને યુવાનોને રોજગારી મળે. ફિક્સ પગાર અને આઉટસોર્સિંગની પ્રથા બંનેને લઈને અસંતોષ છે કારણ કે તે કર્મચારીઓને અસુરક્ષિત બનાવે છે અને લાંબા ગાળે સેવાની ગુણવત્તા પર અસર કરે છે.

સરકારી કર્મચારીઓ રાજ્યના વિકાસના મહત્ત્વના સ્તંભ છે. તેઓ યોજનાઓનું અમલીકરણ કરે છે, જાહેર સેવાઓ પહોંચાડે છે અને નાગરિકોને સીધા જોડાય છે. જ્યારે તેમના પ્રશ્નો લાંબા સમય સુધી વણઉકેલ્યા રહે છે ત્યારે માત્ર તેમનું મનોબળ જ નહીં, પરંતુ સમગ્ર વહીવટી તંત્રની કાર્યક્ષમતા પણ અસરગ્રસ્ત થાય છે. 15 દિવસનું અલ્ટિમેટમ એ ચેતવણી છે કે સમસ્યાને હવે વધુ અવગણી શકાય નહીં.

જો આંદોલન શરૂ થાય તો રાજ્યભરની સરકારી કચેરીઓ, મહેસૂલી કામકાજ, વિકાસ યોજનાઓ અને જાહેર સેવાઓ પર અસર પડી શકે છે. નાગરિકોને પરેશાની થઈ શકે છે. તેથી સરકારે આ મુદ્દાને ગંભીરતાથી લેવાની જરૂર છે. સંવાદ, સ્પષ્ટ સમયપત્રક અને નક્કર નિર્ણયો જ આ તણાવને ઓછો કરી શકે છે.

કર્મચારીઓની માંગણીઓમાં કેટલીક વાજબી છે અને કેટલીકને વહીવટી અને નાણાકીય પાસાઓ સાથે સંતુલિત કરવાની જરૂર પડે છે. જૂની પેન્શન યોજના નાણાકીય બોજ વધારી શકે છે, જ્યારે ફિક્સ પગાર બંધ કરવાથી અને કાયમી ભરતીથી સેવાની ગુણવત્તા સુધરી શકે છે. ખાલી જગ્યાઓ ભરવાથી વર્કલોડ ઘટે અને યુવાનોને તક મળે. 50 વર્ષથી વધુ વયના કર્મચારીઓને પરીક્ષામાંથી મુક્તિ આપવી એ અનુભવને માન્યતા આપવા સમાન છે.

બેરોજગાર યુવાનોનો વિરોધ પણ સમાન મહત્ત્વનો છે. પરીક્ષા પાસ કર્યા પછી મહિનાઓ સ 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 7,2026 

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October 06, 2026

ગુજરાતમાં 41 લાખથી વધુ ખખડધજ વાહનોનો રાફડો: રોડ ટેક્સની રાહત છતાં સ્ક્રેપ પોલિસી કેમ ફ્લોપ થઈ રહી છે?

ગુજરાતમાં 41 લાખથી વધુ ખખડધજ વાહનોનો રાફડો: રોડ ટેક્સની રાહત છતાં સ્ક્રેપ પોલિસી કેમ ફ્લોપ થઈ રહી છે?
-Friday World Oct 7,2026 
ગુજરાત રાજ્યમાં આજે રસ્તાઓ પર 15 વર્ષથી વધુ જૂના અને ખખડધજ વાહનોની સંખ્યા 41.20 લાખને પાર કરી ગઈ છે. આ આંકડો માત્ર આંકડા નથી, પરંતુ રાજ્યના પર્યાવરણ, જાહેર સુરક્ષા અને આર્થિક વ્યવસ્થા માટે મોટો ચિંતાનો વિષય બની ગયો છે. રાજ્ય સરકારે વારંવાર વાહન સ્ક્રેપ પોલિસી જાહેર કરી છે અને તાજેતરમાં નવા વાહન ખરીદતી વખતે મોટર વ્હીકલ ટેક્સમાં 50 ટકા સુધીની રાહતનું આકર્ષક ગાજર લટકાવ્યું છે. છતાં પણ પરિસ્થિતિ જ્યેની ત્યે જ રહી છે. જૂના વાહનોનો રાફડો ઘટવાને બદલે વધી રહ્યો છે.

મોટા શહેરોમાં સૌથી વધુ ભાર છે. અમદાવાદ જિલ્લામાં એકલા 20.58 લાખથી વધુ 15 વર્ષ જૂના વાહનો નોંધાયેલા છે. રાજકોટમાં આશરે 7.36 લાખ, સુરતમાં લગભગ 2 લાખ અને વડોદરામાં 1.35 લાખથી વધુ જૂના વાહનો ફરી રહ્યા છે. આ કુલ 41 લાખથી વધુ વાહનોમાં 6.34 લાખથી વધુ કાર, 1.76 લાખ ટ્રક, 1.11 લાખથી વધુ ટ્રેક્ટર અને 1.34 લાખથી વધુ પેસેન્જર રિક્ષાઓનો સમાવેશ થાય છે. આ વાહનો માત્ર ધૂળ અને ધુમાડો ફેલાવતા નથી, પરંતુ માર્ગ અકસ્માતોનું જોખમ પણ વધારે છે. જૂના બ્રેક્સ, નબળા એન્જિન અને કાટ લાગેલા ભાગો મુસાફરો અને અન્ય વાહનચાલકો માટે ખતરનાક સાબિત થઈ શકે છે.

સરકારી વાહનો માટે કેટલીક પ્રગતિ જોવા મળી છે. રાજ્ય સરકાર હસ્તકના 15 વર્ષથી જૂના સરકારી વાહનો, એસ.ટી. બસો અને નગરપાલિકા-કોર્પોરેશનના વાહનોને ધીરે ધીરે સ્ક્રેપ કરવાની પ્રક્રિયા ચાલુ છે. ખાનગી વાહનો માટે પણ 15 વર્ષ પૂર્ણ થયા બાદ ફિટનેસ સર્ટિફિકેટ મેળવવાના નિયમો કડક બનાવવામાં આવ્યા છે અને રી-રજિસ્ટ્રેશનની ફીમાં વધારો કરવામાં આવ્યો છે. હેતુ સ્પષ્ટ છે – લોકોને જૂના વાહનો છોડીને નવા, સ્વચ્છ અને વધુ કાર્યક્ષમ વાહનો તરફ વળવા પ્રેરિત કરવા. છતાં પણ ખાનગી માલિકોમાં ઉત્સાહ ઓછો જોવા મળે છે.

તાજેતરમાં જાહેર કરાયેલી નવી વ્યવસ્થા હેઠળ પાત્ર જૂના વાહનને અધિકૃત સ્ક્રેપિંગ સેન્ટર પર સ્ક્રેપ કરાવ્યા બાદ મળતા સર્ટિફિકેટ ઓફ ડિપોઝિટ (COD)ના આધારે નવા વાહનના મોટર વ્હીકલ ટેક્સમાં 50 ટકા સુધીની રાહત મળી શકે છે. આ લાભ માર્ચ 2027 સુધીના COD માટે ઉપલબ્ધ રહેશે. BS-I અને તેનાથી જૂના ધોરણોના વાહનો તેમજ કેટલાક BS-II મધ્યમ અને ભારે વાહનો આ યોજના હેઠળ આવે છે. કાગળ પર આ યોજના આકર્ષક લાગે છે. પરંતુ વાસ્તવિકતામાં તે અપેક્ષા મુજબ અસરકારક સાબિત થઈ રહી નથી.

શા માટે આ પોલિસી નિષ્ફળ રહી છે? પ્રથમ કારણ છે સ્ક્રેપ વેલ્યૂની નીચી કિંમત. જૂના વાહનને સ્ક્રેપ કરાવતાં માલિકને મળતી રકમ ઘણી વખત અપેક્ષા કરતાં ઓછી હોય છે. તેની સામે નવી ગાડીની કિંમત અને વ્યાજના દરો વધારે છે. બીજું, સ્ક્રેપિંગ સેન્ટર્સની સંખ્યા અને સરળતા હજુ પૂરતી નથી. ગ્રામ્ય અને અર્ધ-શહેરી વિસ્તારોમાં લોકોને નજીકમાં અધિકૃત સેન્ટર મળતું નથી. ત્રીજું, જાગૃતિનો અભાવ. ઘણા વાહન માલિકોને હજુ પણ યોજનાના લાભો અને પ્રક્રિયા વિશે પૂરતી માહિતી નથી. ચોથું, ભાવનાત્મક જોડાણ. ઘણા લોકો પોતાની જૂની ગાડીને પારિવારિક વારસો અથવા યાદો સાથે જોડે છે અને તેને છોડવા તૈયાર નથી.

પર્યાવરણીય અસર ગંભીર છે. જૂના વાહનો વધુ પ્રદૂષણ ફેલાવે છે. તેમના એન્જિનમાંથી નીકળતો ધુમાડો PM2.5 અને અન્ય હાનિકારક કણો વધારે છે, જે શહેરી હવાની ગુણવત્તાને બગાડે છે. અમદાવાદ, સુરત અને રાજકોટ જેવા શહેરોમાં શિયાળામાં પહેલેથી જ હવા પ્રદૂષણની સમસ્યા ગંભીર છે. આ જૂના વાહનો તેમાં વધારો કરે છે. સાથે સાથે ઇંધણની બગાડ પણ થાય છે. નવા BS-VI વાહનોની તુલનામાં જૂના વાહનો વધુ પેટ્રોલ કે ડીઝલ વાપરે છે, જે આર્થિક અને પર્યાવરણીય બંને રીતે નુકસાનકારક છે.

સુરક્ષાની દૃષ્ટિએ પણ ચિંતા છે. જૂના વાહનોમાં સલામતી સુવિધાઓ મર્યાદિત હોય છે. એબીએસ, એરબેગ્સ અને મજબૂત બોડી સ્ટ્રક્ચરની અછતને કારણે અકસ્માતમાં જાનહાનીનું જોખમ વધે છે. ટ્રક અને રિક્ષા જેવા વાહનો જો ખરાબ હાલતમાં હોય તો તે વધુ ખતરનાક બને છે. રોડ સેફ્ટીના કાર્યક્રમો ચાલુ હોવા છતાં જૂના વાહનોનો મોટો હિસ્સો હજુ પણ રસ્તા પર છે.

આ સમસ્યાનો ઉકેલ માત્ર રાહતની જાહેરાતથી નહીં, પરંતુ વ્યાપક અમલીકરણથી આવશે. સરકારે સ્ક્રેપિંગ સેન્ટર્સની સંખ્યા વધારવી જોઈએ અને તેમને ગ્રામ્ય વિસ્તારો સુધી પહોંચાડવા જોઈએ. સ્ક્રેપ વેલ્યૂને વધુ આકર્ષક બનાવવા માટે સ્ટીલ અને અન્ય મટિરિયલના ભાવ સાથે જોડાયેલી વધુ સારી કિંમતની ગેરંટી આપી શકાય. જાહેર જાગૃતિ અભિયાનો મજબૂત બનાવવા જોઈએ. સ્કૂલો, કોલેજો અને સોશિયલ મીડિયા દ્વારા લોકોને સમજાવવું જોઈએ કે જૂના વાહનને રાખવું એ માત્ર પોતાનું નુકસાન નથી, પરંતુ સમાજ અને પર્યાવરણનું પણ નુકસાન છે.

નવા વાહનોની ખરીદીને વધુ સહાયક બનાવવા માટે બેંકો અને ફાઇનાન્સ કંપનીઓ સાથે સહયોગ વધારી શકાય. નીચા વ્યાજ દરે લોન અને સરળ પ્રક્રિયા લોકોને આકર્ષિત કરી શકે. સાથે સાથે ઇલેક્ટ્રિક વાહનો તરફ વળવા માટે વધારાની પ્રોત્સાહનો આપી શકાય, જેથી પર્યાવરણીય લાભ વધુ મળે.

ગુજરાત ઔદ્યોગિક અને આર્થિક વિકાસમાં આગળ છે. પરંતુ સ્વચ્છ હવા અને સુરક્ષિત રસ્તા વિના આ વિકાસ અધૂરો રહેશે. 41 લાખથી વધુ જૂના વાહનોનો આ રાફડો દૂર કરવો એ માત્ર સરકારની જવાબદારી નથી. નાગરિકો, વાહન ઉદ્યોગ અને સ્થાનિક સંસ્થાઓ સહિત સૌએ સાથે મળીને કામ કરવું પડશે. જો રાહતો સાથે સાથે અમલીકરણ, જાગૃતિ અને વાસ્તવિક આર્થિક લાભ મજબૂત બનશે તો જ આ પોલિસી સફળ થઈ શકે છે.

આજે જરૂર છે કે સરકાર માત્ર નીતિ જાહેર ન કરે, પરંતુ તેને ગ્રાઉન્ડ લેવલ પર અસરકારક બનાવે. લોકો પણ સમજે કે જૂની ગાડી રાખવી એ ટૂંકા ગાળાની સગવડ હોઈ શકે, પરંતુ લાંબા ગાળે તે આરોગ્ય, સુરક્ષા અને પર્યાવરણ માટે મોંઘી પડે છે. ગુજરાતને સ્વચ્છ અને સુરક્ષિત રસ્તાઓની જરૂર છે. તે માટે જૂના વાહનોનો રાફડો ઘટાડવો અનિવાર્ય છે. સમયસર પગલાં લેવામાં આવે તો આ સમસ્યાને નિયંત્રિત કરી શકાય છે. અન્યથા આ 41 લાખ વાહનો રાજ્યના વિકાસના માર્ગમાં મોટો અવરોધ બની રહેશે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 7,2026 

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