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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 22 March 2026

March 22, 2026

साइलेंट रिवॉल्यूशन: हॉर्मुज़ से युआन की जीत, डॉलर की हार शुरू!

साइलेंट रिवॉल्यूशन: हॉर्मुज़ से युआन की जीत, डॉलर की हार शुरू!-Friday World March 22,2026
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य: डॉलर की कमर टूटने की शुरुआत? वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक तूफ़ान आ रहा है, और उसका केंद्र है स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़– वह संकरी जलधारा जो फारस की खाड़ी को खाड़ी से जोड़ती है। दुनिया का लगभग 20% तेल व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन अब यह सिर्फ़ एक शिपिंग रूट नहीं रहा – यह बन गया है डॉलर के वर्चस्व पर हमले का हथियार। ईरान ने हाल ही में एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जो पेट्रोडॉलर सिस्टम की नींव हिला सकता है: हॉर्मुज़ से तेल टैंकरों को सुरक्षित गुजरने की इजाज़त तभी मिलेगी, जब तेल का व्यापार चीनी युआन में हो।

 यह कोई छोटी-मोटी खबर नहीं है। यह एक भू-राजनीतिक भूकंप है, जिसकी लहरें अमेरिका, भारत, चीन, रूस और जापान तक पहुंच रही हैं। कई बड़े देश पहले से ही डॉलर को दरकिनार कर युआन में भुगतान कर रहे हैं, और अब हॉर्मुज़ इस बदलाव को और तेज़ कर रहा है। 

हॉर्मुज़ का महत्व: दुनिया का सबसे संवेदनशील गला

 स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ सिर्फ़ एक नदी नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा की धमनिका है। रोज़ाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल यहां से गुजरता है – सऊदी अरब, इराक, कुवैत, यूएई और ईरान के तेल का बड़ा हिस्सा। अगर यह रास्ता बंद हो जाए, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं – $120-150 प्रति बैरल तक। एशिया, खासकर चीन और भारत, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि इन देशों की ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है। लेकिन अब ईरान इस चोकपॉइंट को मौद्रिक हथियार बना रहा है। CNN और अन्य अंतरराष्ट्रीय मीडिया के अनुसार, ईरान आठ से ज्यादा देशों के साथ बातचीत कर रहा है – तेल टैंकरों को पास करने की शर्त सिर्फ़ युआन में व्यापार। अमेरिकी और इज़राइली जहाज़ों को पहले से ही रोक दिया गया है, लेकिन चीन, भारत और कुछ अन्य देशों के टैंकर युआन सेटलमेंट के साथ सुरक्षित गुजर रहे हैं। 
यह कदम पेट्रोडॉलर को सीधा चैलेंज है – वह सिस्टम जो 1970 के दशक से अमेरिका को वैश्विक आर्थिक ताकत बनाए रखता आया है। तेल हमेशा डॉलर में बिकता था, जिससे डॉलर की मांग बनी रहती थी और अमेरिका को सस्ते में कर्ज़ लेने की सुविधा मिलती थी। लेकिन अब युआन इस व्यवस्था को चुनौती दे रहा है। 

 भारत और अन्य देशों की युआन की ओर बढ़त भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पहले से ही इस बदलाव का हिस्सा बन चुके हैं। हाल के महीनों में भारतीय टैंकरों को हॉर्मुज़ से सुरक्षित गुजरने की इजाज़त मिली – लेकिन युआन में भुगतान करके। भारत रूस से तेल रुपये में खरीद रहा है, और अब गल्फ़ देशों से भी युआन का इस्तेमाल बढ़ रहा है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की 85-90% क्रूड ज़रूरत आयात पर निर्भर है, और आधा हिस्सा हॉर्मुज़ से आता है। 

चीन तो पहले से ही इस दिशा में आगे है। 2018 में शंघाई इंटरनेशनल एनर्जी एक्सचेंज पर पेट्रो-युआन कॉन्ट्रैक्ट लॉन्च हुआ। चीन का CIPS (क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम) 2025 में $245 ट्रिलियन के युआन ट्रांजेक्शन प्रोसेस कर चुका है। ईरान से चीन का तेल आयात भी ज्यादातर युआन में होता है। 

रूस के साथ भी यही कहानी है – रूसी तेल अब युआन या रुपये में बिक रहा है। और चौंकाने वाली बात: जापान जैसे अमेरिका के सहयोगी देश भी अब रूसी तेल युआन में खरीद रहे हैं। हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि जापान ने हॉर्मुज़ संकट के बीच युआन का इस्तेमाल शुरू किया है, ताकि ईरान की शर्तों पर टैंकर गुजर सकें। यह दिखाता है कि डी-डॉलराइजेशन अब सिर्फ़ BRICS देशों तक सीमित नहीं – बड़े पश्चिमी सहयोगी भी इसमें शामिल हो रहे हैं। 

डॉलर की कमर टूट रही है – सच या अतिशयोक्ति? कई लोग कहते हैं कि डॉलर खत्म हो रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि डॉलर अभी भी वैश्विक रिज़र्व करेंसी है – 60% से ज्यादा रिज़र्व डॉलर में हैं। फिर भी, दरारें साफ़ दिख रही हैं। 

- ईरान का युआन प्रस्ताव डी-डॉलराइजेशन को तेज़ कर रहा है। 

- चीन का CIPS सिस्टम SWIFT का विकल्प बन रहा है। - BRICS देश लोकल करेंसी में ट्रेड बढ़ा रहे हैं।

 - हॉर्मुज़ जैसे चोकपॉइंट अब मुद्रा युद्ध का मैदान बन गए हैं।

 अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो वैश्विक तेल व्यापार में युआन की हिस्सेदारी बढ़ेगी। इससे डॉलर की मांग घटेगी, अमेरिका के लिए कर्ज़ महंगा होगा, और वैश्विक आर्थिक संतुलन बदल जाएगा। 

 वैश्विक मीडिया का सन्नाटा क्यों? मुख्यधारा के पश्चिमी मीडिया इस खबर को ज्यादा हाईलाइट नहीं कर रहा। कारण साफ़ है – यह अमेरिकी हितों के खिलाफ़ है। लेकिन सोशल मीडिया, इंडिपेंडेंट रिपोर्ट्स और एशियाई मीडिया में यह चर्चा जोरों पर है। ईरान का यह कदम सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक है – चीन को मजबूत करके अमेरिकी दबाव का मुकाबला करना। 

एक नया युग शुरू हो रहा है हॉर्मुज़ अब सिर्फ़ तेल का रास्ता नहीं – यह मुद्रा युद्ध का नया मैदान है। ईरान की युआन शर्त, भारत-चीन-रूस-जापान जैसे देशों का बढ़ता युआन इस्तेमाल, और डॉलर की धीमी लेकिन लगातार कमजोर होती स्थिति – ये सब मिलकर एक बड़ा संदेश दे रहे हैं: 

एकध्रुवीय डॉलर वर्चस्व का अंत नज़दीक है। यह बदलाव रातोंरात नहीं होगा, लेकिन हॉर्मुज़ की इन लहरों ने साफ़ कर दिया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था अब पुरानी राह पर नहीं लौटेगी। युआन की बढ़ती ताकत, और डॉलर की कम होती पकड़

 – यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति हो सकती है। क्या आप तैयार हैं इस नए दौर के लिए?

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 22,2026
March 22, 2026

"डिमोना पर ईरानी तीर: न्यूक्लियर शहर हिला, लेकिन रिएक्टर सुरक्षित का दावा —अब क्या होगा अगला कदम?"

"डिमोना पर ईरानी तीर: न्यूक्लियर शहर हिला, लेकिन रिएक्टर सुरक्षित का दावा —अब क्या होगा अगला कदम?"-Friday World March-22026
21 मार्च 2026 की रात: ईरान ने इजराइल के दक्षिणी शहर डिमोना और अराद पर मिसाइलें दागीं। 100 से ज्यादा घायल, इमारतें तबाह, लेकिन डिमोना न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर पर कोई सीधा हमला या रेडिएशन लीक नहीं। यह नतांज पर हमले का जवाब था—अब रमजान के बाद ईद की खुशियां खत्म, युद्ध की आग भड़कने वाली है या थमने वाली? 

21 मार्च 2026, शनिवार की शाम। मध्य पूर्व में तनाव चरम पर। ईरान ने इजराइल के दक्षिणी इलाके में बैलिस्टिक मिसाइलों की बौछार की। निशाना: डिमोना और अराद—दो शहर जो नेगेव रेगिस्तान में बसे हैं। डिमोना खासतौर पर चर्चा में क्योंकि यहीं शिमोन पेरेज नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर है—इजराइल का वो गुप्त न्यूक्लियर हब, जहां दुनिया मानती है कि उसके 80-400 न्यूक्लियर हथियार बने हैं (हालांकि इजराइल कभी कबूल नहीं करता)।

 ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने इसे "नतांज पर हमले का बदला" बताया। नतांज—ईरान का मुख्य यूरेनियम संवर्धन केंद्र, जिस पर उसी दिन अमेरिका-इजराइल की तरफ से हमला हुआ था (इजराइल ने इनकार किया, लेकिन रिपोर्ट्स में यूएस-इजराइल स्ट्राइक्स का जिक्र)। ईरान ने कहा: "हमारे दुश्मन को सबक सिखाया गया। डिमोना क्षेत्र अब सुरक्षित नहीं।" 

क्या हुआ वास्तव में?

 - इजराइली एयर डिफेंस (आयरन डोम, एरो आदि) मिसाइल रोकने मे नाकाम 

- डिमोना में एक मिसाइल ने इमारत पर डायरेक्ट हिट किया—एक मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग ढह गई, आग लगी, मलबा बिखरा।

 - मेजेन डेविड अदोम (इजराइल की एम्बुलेंस सर्विस) के मुताबिक: डिमोना में 300-400+ घायल, अराद में 805+ 11 गंभीर हालत में। एक 10 साल का बच्चा क्रिटिकल, शार्पनेल से चोटें। 

- कई घर तबाह, लोग मलबे में फंसे। अस्पतालों में मास कैजुअल्टी अलर्ट। 

- लेकिन सबसे अहम: परमाणु संयंत्र पर डायरेक्ट हिट। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) ने ट्वीट किया—"डिमोना में मिसाइल इंपैक्ट की रिपोर्ट्स हैं, लेकिन न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर को कोई डैमेज नहीं, कोई रेडिएशन लीक नहीं।" 

- कुछ रिपोर्ट्स में फतह-2 हाइपरसोनिक मिसाइल का जिक्र (जो मैक 13+ स्पीड से उड़ती है और डिफेंस को चकमा दे सकती है), लेकिन ऑफिशियल में बैलिस्टिक मिसाइल्स कन्फर्म। 

यह हमला रणनीतिक था। पहली बार युद्ध में इजराइल का "न्यूक्लियर हार्ट" इतने करीब टारगेट हुआ। ईरान ने दिखाया—हमारी पहुंच अब तुम्हारे सबसे संवेदनशील इलाके तक है। इजराइली PM नेतन्याहू ने इसे "कठिन रात" बताया और वादा किया—"हम जवाब देंगे।" अगर जिंदा रहे!!

 अब सवाल वही: क्या यह शुरुआत है या अंत की ओर? 

- रमजान की आखिरी रातें। ईद हो चुकी या होने वाली। लोग नमाज, नए कपड़े, लेकिन दिल में डर और गुस्सा। 

- ईरान का ट्रैक रिकॉर्ड: "ट्रू प्रॉमिस" ऑपरेशंस, हाइपरसोनिक मिसाइल टेस्ट। अगर ईद के बाद बड़े हमले—ड्रोन स्वार्म, हिज्बुल्लाह से सपोर्ट, हूती से रेड सी ब्लॉक—तो समझ लीजिए ईरान "फाड़कर ठंडा" पड़ने के मूड में है। 

- अगर हमले सिंबॉलिक रहते हैं या कमजोर पड़ते हैं, तो युद्ध थम सकता है। ट्रंप के बयान—"हॉर्मुज की रक्षा अन्य देश करें"—और अमेरिका का डायरेक्ट इन्वॉल्वमेंट कम करना संकेत है कि बड़ा न्यूक्लियर युद्ध टालने की कोशिश हो रही है। 

- लेकिन ईरान पीछे नहीं हटेगा। IRGC ने कहा—"हमारी मिसाइलें अब डिमोना को निशाना बनाएंगी।" अगर अगले 24-48 घंटे में तगड़ा जवाब आया, तो जान लीजिए: यह सिर्फ बदला नहीं, फैसला है। 

जनता की आवाज:

 - सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल—धमाके, आग, चीखें।

 - एक तरफ "ईरान ने इजराइल को हिला दिया" की तारीफ। 

- दूसरी तरफ "न्यूक्लियर वॉर की शुरुआत?" का खौफ।

 - दुनिया भर से लोग पूछ रहे—क्या थर्ड वर्ल्ड वॉर आ रहा है? 

रात अभी बाकी है। डिमोना हिला, लेकिन रिएक्टर सुरक्षित ?—"डायरेक्ट हिट, रिएक्टर तबाह"—अब ईद के बाद का जोश देखना है—ईरान तूफान लाएगा या शांति की सुबह होगी?

 इतिहास गवाह बनेगा। अगला कदम तय करेगा—आग बुझेगी या और भड़केगी।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March-22026

Saturday, 21 March 2026

March 21, 2026

"बेबाकी की बिक्री: जब साइकिल निकालने वाले सितारे अब 'साइलेंस' की सवारी कर रहे हैं!"

"बेबाकी की बिक्री: जब साइकिल निकालने वाले सितारे अब 'साइलेंस' की सवारी कर रहे हैं!"
-Friday World- March- 22,2026
एक समय था जब पेट्रोल के 20 पैसे बढ़ने पर बॉलीवुड के बड़े-बड़े सितारे आग उगलते थे, साइकिल निकालने की बात करते थे, रुपए के गिरने पर रोते-धोते ट्वीट करते थे। आज पेट्रोल-डीजल दोगुने, डॉलर -94 के पार, रुपया डूबता जा रहा है—मगर इनकी जुबान पर ताला, आंवले पड़ गए!

 एक जमाना था जब अनुपम खेर, परेश रावल, अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और जूही चावला जैसे सितारे जनता के 'बोलने वाले' माने जाते थे। सोशल मीडिया पर उनकी बेबाकी की धूम रहती थी। कांग्रेस की यूपीए सरकार के समय अगर पेट्रोल-डीजल में महज 20-50 पैसे की बढ़ोतरी होती, तो ये लोग तुरंत ट्विटर (अब X) पर उतर आते। 

अनुपम खेर ने एक बार ट्वीट किया था: "अपने ड्राइवर से पूछा, 'देर क्यों हुई?' बोला, 'साइकिल से आया।' 'मोटरसाइकिल कहाँ है?' 'घर पर शोपीस बनकर रखी है, सर!'" हंसी-मजाक में सरकार पर तंज कसते हुए। अक्षय कुमार ने लिखा था, "लड़कों, अब साइकिल साफ कर लो, सड़क पर निकलने का समय आ गया!" अमिताभ बच्चन और जूही चावला भी रुपए के गिरते मूल्य पर चिंता जताते, व्यंग्य करते। परेश रावल तो खुलेआम सरकार की आलोचना में आगे रहते।

 उन दिनों इनकी आवाज में डर नहीं था। कोई सीबीआई, ईडी का डर नहीं। कोई केस, कोई नोटिस नहीं। ये लोग खुलकर बोलते थे क्योंकि वो जनता की आवाज बनना चाहते थे। जनता की तकलीफ उनकी तकलीफ लगती थी। पेट्रोल पंप पर 20 पैसे बढ़ने से गाड़ी में आग लगाने की बात तक हो जाती थी—बेशक मजाक में, लेकिन संदेश साफ था: "महंगाई बर्दाश्त नहीं!" 

फिर आया 2014। सत्ता बदली। मोदी सरकार आई। पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगे। 2014 में जहां पेट्रोल 70-72 रुपये था, आज 100 के पार कई राज्यों में। डीजल भी 90-95 के आसपास। घरेलू गैस सिलेंडर 800 से 1100+ हो गया। डॉलर 60 से बढ़कर 85-90 के बीच डांस कर रहा है, कभी-कभी 100 की ओर झांकता है। रुपया लगातार गिर रहा है—इकोनॉमिक सर्वे में भी चिंता जताई जा रही है।

 मगर इन सितारों की जुबान? खामोश। बिल्कुल खामोश। वो बेबाकी कहाँ गई जो पहले 20 पैसे पर फूट पड़ती थी? अब सैकड़ों रुपये की बढ़ोतरी पर भी एक शब्द नहीं। कोई ट्वीट नहीं, कोई स्टेटमेंट नहीं, कोई व्यंग्य नहीं। क्यों? 

क्योंकि अब सिक्कों की खनक बोल रही है।

 - अनुपम खेर अब सरकारी विज्ञापनों में आवाज देते हैं, प्रचार करते हैं। 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी फिल्मों में भूमिका निभाकर 'देशभक्ति' का ब्रांड बन चुके हैं। उनकी जुबान अब सिस्टम के साथ तालमेल बिठा चुकी है। 

- अक्षय कुमार 'प्रोपगैंडा' फिल्मों के बाद अब 'पैटriotिक' सिनेमा के बादशाह हैं। सरकारी इंटरव्यू, प्रचार, ब्रांड एम्बेसडर—सब कुछ चल रहा है। पुराने ट्वीट डिलीट कर दिए, मगर जनता की याददाश्त डिलीट नहीं हुई। 

- परेश रावल एक समय विपक्षी तंज कसते थे, आज भाजपा के करीबी, सांसद भी रहे। उनकी राजनीतिक सक्रियता अब सत्ता के साथ है।

 - अमिताभ बच्चन सरकारी ऐड में वॉयस-ओवर देकर मोटी कमाई कर रहे हैं। फेसबुक पर पोस्ट नंबरिंग करके खुश हैं।

 - जूही चावला भी अब चुप्पी साधे हुए हैं। पहले रुपए के गिरने पर चिंता जताती थीं, आज डॉलर के उछाल पर 'डॉलर का अंडरवियर' पहनने की बातें मजाक बन गई हैं—रुपया सरक न जाए, इस डर से! 

ये सितारे अब 'रस्सी को सांप' और 'सांप को रस्सी' बनाने में माहिर हो चुके हैं। मौजूदा सरकार की हर नीति को जायज ठहराते हैं, आलोचना करने वालों को 'देशद्रोही' कहते हैं, मगर खुद की पुरानी बेबाकी पर चुप्पी। उनकी निडरता अब 'नोटों की नदी' में बह गई है। मलाई चाटने में व्यस्त हैं—जनता की तकलीफ भूल चुके हैं। 

जनता पूछ रही है:

 - वो बेबाकी कहाँ गई जो महंगाई पर रोती थी?

 - वो निडरता कहाँ गई जो सरकार को आईना दिखाती थी? 

- आज जब आम आदमी पेट्रोल पंप पर सिर पकड़कर बैठा है, तब ये सितारे कहाँ हैं?

 जवाब साफ है—सत्ता की गोद में। सिक्कों की खनक ने उनकी आवाज खरीद ली है। जनता की चिंता अब उनकी प्राथमिकता नहीं रही। अब प्राथमिकता है—कैश, कॉन्ट्रैक्ट, और कंट्रोल।

 यह कहानी सिर्फ इन पांच सितारों की नहीं—यह उस पूरे सिस्टम की है जहां बेबाकी बिक जाती है, और निडरता 'नोटों' के आगे घुटने टेक देती है। जनता याद रखती है। पुराने ट्वीट याद रखती है। और एक दिन जवाब मांगेगी। 

क्योंकि इतिहास दोहराता नहीं, मगर याद जरूर रखता है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World- March- 22,2026
March 21, 2026

छत्तीसगढ़ का अल्पसंख्यक विरोधी धर्मांतरण-विरोधी कानून

छत्तीसगढ़ का अल्पसंख्यक विरोधी धर्मांतरण-विरोधी कानून-Friday World- March 22,2026
              नागरिक परिक्रमा
(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)

1. छत्तीसगढ़ का अल्पसंख्यक विरोधी धर्मांतरण-विरोधी कानून

छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार ने कांग्रेस के बहिर्गमन के बाद विधानसभा से धर्मांतरण विरोधी कानून पारित करा लिया है और अब यह राज्यपाल की मंजूरी के लिए उनके ऑफिस में है। भाजपा सरकार के अनुसार यह कानून प्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रहे जबरन और अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने के उद्देश्य से पारित किया गया है। मकसद सिर्फ इतना ही होता, तो वर्तमान कानूनों में ही इसकी पर्याप्त व्यवस्था है। लेकिन हाथी के दांत दिखाने और खाने के अलग-अलग होते हैं। असली बात यह है कि संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के जो मूल्य निहित हैं, उसको निष्प्रभावी करना, अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दमन करना और समाज में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को तेज करना। यह इससे भी साबित होता है कि इस विधेयक को पारित करते हुए जय श्रीराम का नारा लगाना भाजपाई नहीं भूले। "राम-राम" के सौम्य अभिवादन को कट्टर सांप्रदायिक, असहिष्णु और आक्रामक छवि वाले अल्पसंख्यक विरोधी "जय श्रीराम" में बदलने का श्रेय तो आखिर संघी गिरोह को ही जाता है। इसलिए, यदि सदन में भाजपा विधायक इस विधेयक को कानून बनाते हुए यह नारा लगाते हैं, तो उसके निहितार्थ और संदेश बहुत ही स्पष्ट हैं।

छत्तीसगढ़ में भाजपा राज में अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों पर बहुत तेजी से हमले बढ़े हैं। खासकर ईसाई समुदाय के खिलाफ, धर्मांतरण के छद्म मुद्दे को केंद्र में रखकर ये हमले किए जा रहे हैं। हर दिन छत्तीसगढ़ के किसी-न-किसी हिस्से में धर्मांतरण किए जाने के शक और अपुष्ट आरोपों पर, संघी गिरोह द्वारा ईसाई समुदाय की प्रार्थनाओं पर हमले किए जाने और उत्पात मचाने की खबरें आ रही हैं। इन हुड़दंगियों को सरकार और प्रशासन का पूरा संरक्षण मिल रहा है। महज शक और झूठे आरोपों में उन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है, उनकी प्रार्थना को रोका जा रहा है, जबकि हमारा संविधान सभी धर्मों के लोगों को अपनी आस्था और विश्वास के अनुसार पूजा-पाठ, प्रार्थना और नमाज की स्वतंत्रता देता है। इसी प्रकार, मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की के प्रेम-प्रसंगों को लव जिहाद का नाम दिया जा रहा है और मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि संविधान दो वयस्क लोगों को प्रेम करने और विवाह करने की छूट देता है।
अपने सार रूप में यह कानून वास्तव में महिलाओं और युवाओं के खिलाफ है, क्योंकि यह एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद से जीवन साथी चुनने की स्वतंत्रता पर हमला करता है। आज जब 18 वर्ष में युवाओं को मताधिकार दिया जा रहा है, यह मानना कि युवाओं में अपने जीवन साथी के बारे में सही फैसला लेने की समझ नहीं होती, पूरी तरह से पोंगापंथी सोच ही है, जिसे संघी गिरोह इस देश पर लादना चाहता है। यह कानून इस देश के नागरिकों की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का सीधा-सीधा उल्लंघन है, क्योंकि दो अलग-अलग धर्मों के व्यक्तियों के बीच विवाह को बाधित करने और रोकने की कोशिश करता है।

यह हास्यास्पद है कि जिस कानून को कथित “लव जिहाद” की आड़ में लाया जा रहा है, जिसके बारे में पिछले कुछ वर्षों से केवल भ्रामक प्रचार चल रहा है, उसके बारे सरकार के पास कोई ठोस तथ्य नहीं है। संसद में ही मोदी सरकार में अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय ने माना है कि लव जिहाद नाम की कोई चीज नहीं है और न ही इसे पुष्ट करने के लिए कोई आंकड़े है। इसका अर्थ यही है कि मुस्लिम और अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ संघी गिरोह का यह नफरती प्रचार है। 

छत्तीसगढ़ के इस कानून में अन्य भाजपा शासित राज्यों की तरह ही धर्मांतरण करने और अंतर्धार्मिक विवाह के संबंध में विशेष प्रावधान किए गए हैं, जिसकी प्रमुख बात यह है कि इन कामों के लिए सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेनी होगी। धर्म किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला और विश्वास है। इसी प्रकार, किसी व्यक्ति को किससे विवाह करना है, यह संबंधित व्यक्तियों की निजी पसंद का सवाल है और शुद्ध रूप से निजी मामला है। इसमें राज्य के हस्तक्षेप की अनुमति कैसे दी जा सकती है? यदि इस मामले में किसी कानून का उल्लंघन होता है या अपराध होता है, तो इससे निपटने के लिए भी वर्तमान कानूनों में पर्याप्त व्यवस्था है।

इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने की पूरी संभावना है। अन्य भाजपा शासित राज्यों में पारित इसी तरह के कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल ही रही है। ऐसे में छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसा कोई कानून बनाने से पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार करना चाहिए था, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार में धैर्य नहीं है, क्योंकि इस कानून का वास्तविक उद्देश्य तो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना और अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करना है।
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*2. ऐसे सुप्रीम कोर्ट की क्षय हो!*

मासिक धर्म पर महिलाओं को अवकाश दिए जाने की एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ ने कहा है कि इससे महिलाओं के रोजगार की संभावनाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, क्योंकि ऐसी बाध्यताओं के चलते मालिक व नियोक्ता रोजगार में महिलाओं को नियुक्त करने से वंचित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट की यह अवधारणा संविधान में निहित एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है, शोषण की प्रक्रिया और रूढ़िवादी विचारों को मजबूत करने वाली है और इसलिए सरासर महिला विरोधी टिप्पणी है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की यह पहली बार की गई महिला विरोधी टिप्पणी नहीं है। इससे पहले इसी पीठ द्वारा घरेलू कामगार महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी देने के लिए कानून बनाने के लिए दायर की गई याचिका को भी खारिज करते हुए टिप्पणी की थी कि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक का कानून बनाने का मतलब होगा कि ऐसे लोगों को काम मिलना बंद हो जाएगा।

संविधान का अनुच्छेद-14 और अनुच्छेद-21 हमारे देश के नागरिकों को समानता और गरिमा पूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है। इस अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसे नीतिगत विषयों पर नीति या कानून बनाने का आदेश दे सकती है। लेकिन उक्त दोनों याचिकाओं की खारिजी से ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस अधिकार को त्याग दिया है। इसके पहले खाद्यान्न सुरक्षा, मध्यान्ह भोजन सहित न जाने कितने विषय हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को नीति बनाने का आदेश दिया था।

महिलाओं के हित में दाखिल जनहित याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिन तर्कों का सहारा लिया है, वे अत्यंत ही आपत्तिजनक है। यदि इन तर्कों का सहारा लिया जाता, तो अतीत में इस दुनिया से न तो गुलामी की व्यवस्था का खात्मा होता और न ही बंधुआ गुलामी खत्म होती, न तो मजदूरों को 8 घंटे के काम का अधिकार मिलता और न ही न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार। ये सभी अधिकार इस दुनिया और हमारे देश के लोगों को एक समतापूर्ण और शोषणविहीन समाज के निर्माण के संघर्ष के क्रम में ही मिले हैं और एक सभ्य समाज की ओर बढ़ने के लिए यह संघर्ष आज भी जारी है। इन संघर्षों ने मेहनतकशों को जिस अनुपात में गुलामी और शोषण की बेड़ियों से मुक्त किया है, उसी अनुपात में शोषक वर्ग के सकल मुनाफों पर भी चोट की है।

समानता के अधिकार को तब तक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, जब तक कि हमारे समाज के विशेष रूप से कमजोर तबकों और लोगों की विशेष आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जाता। इसीलिए संविधान विकलांगों की विशेष देखभाल करने का निर्देश सरकारों को देता है। ठीक इसी प्रकार, जो लोग घरों में काम करते हैं, आठ घंटे काम करने के बाद उनको जीवन निर्वाह योग्य न्यूनतम मजदूरी प्राप्त हो, इसकी निगरानी संविधान की रक्षक सुप्रीम कोर्ट और सरकारें नहीं करेंगी, तो और कौन करेगा? क्या इन घरेलू मजदूरों के शोषण और उनको बदतर स्थिति में ही जीवन यापन करने की इजाजत इस आधार पर दी जा सकती है कि इससे इन घरों के मालिकों पर आर्थिक चोट पहुंचेगी? 

मासिक धर्म के मामले में भी यही बात है। प्राकृतिक रूप से महिलाओं की शारीरिक संरचना पुरुषों से भिन्न होती है, विशेषकर प्रसव के मामले में। इसलिए महिलाओं की शारीरिक संरचना को ध्यान में रखते हुए यदि उनकी शिक्षा और रोजगार के संबंध में विशेष प्रावधान नहीं किए जाएंगे, तो महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता की बात केवल जुबानी और कागजों तक ही सीमित रह जाएगी। इसलिए महिलाओं को मुफ्त पैड देने और मासिक धर्म के दिनों में उन्हें विशेष अवकाश देने की माग पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा होता दिख रहा है, ताकि वे इन दिनों थकान, बुखार, उल्टी, भंयकर दर्द, अत्यधिक रक्तस्राव जैसी स्वास्थ्य समस्याओं में आराम कर सकें। 

जापान, इंडोनेशिया, जांबिया, स्पेन, दक्षिण कोरिया और चीन सहित दुनिया के बहुत से देशों में मासिक धर्म के दिनों में महिलाओं के लिए अवकाश की व्यवस्था पहले से ही मौजूद है। दुनिया मातृत्व अवकाश से आगे बढ़कर पितृत्व अवकाश की ओर भी बढ़ रही है। भारत में भी बिहार और कर्नाटक में मासिक धर्म के दिनों में अवकाश दिया जा रहा है। कुछ निजी कंपनियां जैसे जोमैटो, स्विगी, एकर इंडिया, एलएनटी, ओरिएंट इलेक्ट्रिक आदि भी मासिक धर्म पर अवकाश की सुविधा प्रदान कर रही है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह मानना कि इस सुविधा की मांग पर करने पर नियोक्ता महिलाओं को रोजगार नहीं देंगे, असंगत और तथ्यों से परे है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के जीवन से जुड़े एक बहुत बड़े अधिकार के मामले में हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर मासिक धर्म अवकाश के लिए कानून का बनना आज की सबसे बड़ी जरूरत है, क्योंकि यह कदम पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक भेदभाव दूर करने और समानता की ओर बढ़ने वाला कदम है।
मोदी राज में जिस तरह बड़ी तेजी के साथ संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का क्षरण हो रहा है, सुप्रीम कोर्ट भी उससे अछूता नहीं है। दरअसल, हमारे देश में संघी गिरोह जिस सांप्रदायिक-कॉर्पोरेट राज को आगे बढ़ा रहा है, वह इस देश के नागरिकों के बुनियादी अधिकारों और मानवाधिकारों को कुचलकर ही आगे बढ़ सकता है। यही कारण है कि पूरी कोशिश यही हो रही है कि अधिकार प्राप्त नागरिकों को आज्ञपालक प्रजा में तब्दील कर दिया जाएं, ताकि वे कोई सवाल खड़े न करें, किसी भी प्रकार के अधिकारों की बात न करें और बिना किसी ना-नुकूर के मालिकों की तिजोरियों को भरने का 'राष्ट्रीय कर्तव्य' पूरा करते रहे। आज्ञापालक प्रजा असहमति व्यक्त नहीं करती, केवल कर्तव्य का पालन करती है। वह देशद्रोही नहीं, पूरी तरह राष्ट्रभक्ति का अंधानुसरण करती है। पूंजीवाद की कॉर्पोरेट व्यवस्था में नागरिक केवल 'माल' होते है, जिनकी मुनाफा पैदा करने के यज्ञ में आहुति ही दी जानी है।  

राहुल सांकृत्यायन होते, तो यही कहते कि : ऐसे सुप्रीम कोर्ट का क्षय हो!

(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)

Friday World- March 22,2026
March 21, 2026

સુરતના ટેક્સટાઈલ ઉદ્યોગ પર યુદ્ધનું કાળો વાદળ: 400+ મિલોમાં 'સ્વૈચ્છિક લોકડાઉન', અઠવાડિયામાં બે દિવસ બંધ, કોલસો માત્ર 20 દિવસનો, લાખો શ્રમિકો વતન તરફ પલાયન – ગેસ-કોલસા સંકટે ધમધમતો ઉદ્યોગ થંભ્યો!

સુરતના ટેક્સટાઈલ ઉદ્યોગ પર યુદ્ધનું કાળો વાદળ: 400+ મિલોમાં 'સ્વૈચ્છિક લોકડાઉન', અઠવાડિયામાં બે દિવસ બંધ, કોલસો માત્ર 20 દિવસનો, લાખો શ્રમિકો વતન તરફ પલાયન – ગેસ-કોલસા સંકટે ધમધમતો ઉદ્યોગ થંભ્યો!-Friday World March 22,2026
સુરત – ભારતનું ટેક્સટાઈલ કેપિટલ, જ્યાં કાપડની મિલો રાત-દિવસ ધમધમતી રહે છે અને લાખો પરિવારોની આજીવિકા ચાલે છે – આજે એક અભૂતપૂર્વ સંકટનો શિકાર બન્યું છે. ઈરાન-ઇઝરાયલ યુદ્ધની આગે વૈશ્વિક ઊર્જા બજારને હલાવી નાખ્યું છે, જેની સીધી અસર સુરતના ટેક્સટાઈલ પ્રોસેસિંગ ઉદ્યોગ પર પડી રહી છે. કોલસા, યાર્ન અને ગેસના ભાવમાં તોતિંગ વધારો, સપ્લાય ચેઈનનું ખોરવાણ અને LPG સિલિન્ડરની તીવ્ર અછતને કારણે 400થી વધુ મિલોમાં 'સ્વૈચ્છિક લોકડાઉન' લાગુ કરવામાં આવ્યું છે. અઠવાડિયામાં બે દિવસ મિલો બંધ રાખવાનો આ નિર્ણય ઉદ્યોગકારો માટે મજબૂરી બની ગયો છે, જ્યારે અઢી લાખથી વધુ શ્રમિકોની રોજગારી પર કાળો વાદળ છવાઈ ગયું છે. 

યુદ્ધની અસર: કોલસા-ગેસના ભાવમાં વિસ્ફોટક વધારો ફેબ્રુઆરી 2026માં શરૂ થયેલા ઈરાન-ઇઝરાયલ યુદ્ધે સ્ટ્રેટ ઓફ હોર્મુઝ અને રેડ સી જેવા મહત્વના શિપિંગ રૂટ્સને અવરોધિત કર્યા છે. વૈશ્વિક ક્રૂડ ઓઈલ અને એલએનજીના ભાવમાં 30-35%નો ઉછાળો આવ્યો છે. ભારત જેવા દેશો માટે આ બેવડો ઝટકો છે – એક તરફ આયાતી કોલસાના શિપિંગ ચાર્જમાં ટન દીઠ 8 ડોલરનો વધારો, બીજી તરફ ઇન્ડોનેશિયા જેવા મુખ્ય સ્ત્રોતમાંથી કોલસાની અછત. માત્ર 4 દિવસમાં કોલસાના ભાવમાં ટન દીઠ ₹800થી ₹1200નો વધારો થયો છે! 

સુરતની ટેક્સટાઈલ પ્રોસેસિંગ મિલોમાં કોલસો મુખ્ય બળતણ છે. દરરોજ 50,000 ટન કોલસાનો વપરાશ થાય છે, જેમાંથી દરેક મિલમાં 40-50 ટન બાળવામાં આવે છે. હાલમાં મિલ માલિકો પાસે માત્ર 10થી 20 દિવસ ચાલે એટલો જ કોલસાનો સ્ટોક છે. જો આ સ્થિતિ ચાલુ રહેશે તો ઉર્જા સંકટ અનિવાર્ય છે. યાર્નના ભાવમાં પણ સતત વધારો થઈ રહ્યો છે, જેથી ઉત્પાદન ખર્ચ 15% સુધી વધી શકે છે. પ્રોસેસિંગ ચાર્જમાં આટલો વધારો કરવો પડે તો નવા ઓર્ડર અટકી જશે અને વેપારી વાટાઘાટો થંભી જશે. 

 સ્વૈચ્છિક લોકડાઉન: અઠવાડિયામાં બે દિવસ બંધ રાખવાનો કડક નિર્ણય સાઉથ ગુજરાત ટેક્સટાઈલ પ્રોસેસર્સ એસોસિયેશન અને મિલ માલિકોએ ખર્ચને કાબૂમાં લાવવા અને સંસાધનો બચાવવા માટે અઠવાડિયામાં બે દિવસ મિલો બંધ રાખવાનો નિર્ણય લીધો છે. આને 'સ્વૈચ્છિક લોકડાઉન' કહેવામાં આવી રહ્યું છે, પરંતુ વાસ્તવમાં આ મજબૂરી છે. 400થી વધુ મિલો આ નિર્ણયથી અસરગ્રસ્ત થઈ છે. આ બંધથી ઉત્પાદનમાં ઘટાડો થશે, પરંતુ ઓછામાં ઓછું કોલસો અને ઊર્જા બચશે. 

આ સંકટ મોરબીના સિરામિક ઉદ્યોગ પછી સુરતમાં પણ પડ્યું છે. મોરબીમાં ગેસ અછતથી 400+ કારખાના બંધ થયા છે, અને હવે સુરતમાં પણ એ જ સ્થિતિ છે. કોમર્શિયલ ગેસ સપ્લાય ખોરવાતા 10,000થી વધુ વીવિંગ યુનિટ્સ બંધ થઈ ગયા છે, અને કાપડ ઉત્પાદન 50% ઘટ્યું છે. 

અઢી લાખ શ્રમિકોની આજીવિકા પર સંકટ: પલાયનની લહેર સુરતની ટેક્સટાઈલ મિલોમાં અઢી લાખથી વધુ શ્રમિકો કામ કરે છે – મોટા ભાગના ઉત્તર પ્રદેશ, બિહાર, ઝારખંડ, ઉત્તરાખંડ અને ઓડિશાથી આવેલા માઈગ્રન્ટ વર્કર્સ. મિલો બંધ રહેવાથી વેતનમાં ઘટાડો અને કામની અછતને કારણે હજારો શ્રમિકો દરરોજ વતન તરફ પરત ફરી રહ્યા છે. LPG સિલિન્ડરની અછતથી રસોઈની મુશ્કેલી વધી છે – ઘણા શ્રમિકો કહે છે કે "સિલિન્ડર રિફિલ કરવાનું પણ પોસાતું નથી." 

આ પલાયનને રોકવા માટે ઉદ્યોગકારોએ માનવીય પગલાં લીધા છે. કેટલીક મિલોમાં ભોજનાલયો શરૂ કરાયા છે, જ્યાં દરરોજ 5,000થી વધુ શ્રમિકોને મફત ભોજન આપવામાં આવે છે. આ પગલું શ્રમિકોને સુરતમાં રોકી રાખવા અને તેમના પરિવારોને ભૂખમરાથી બચાવવા માટે છે. પરંતુ જો સ્થિતિ લાંબી ચાલી તો મોટા પાયે બેરોજગારી અને આર્થિક અસ્થિરતા ઊભી થઈ શકે છે. 

 વધુ ઊંડાણમાં સંકટના કારણો

 - ગેસ સપ્લાય ઠપ્પ: યુદ્ધને કારણે કતાર અને ઈરાનના LNG ફેસિલિટીઝ પર હુમલા થયા છે, જેથી ભારતમાં કોમર્શિયલ ગેસ અને LPGનો પુરવઠો ખોરવાયો છે. ઘરગથ્થુ પ્રાથમિકતા મળતી હોવાથી ઉદ્યોગને ફટકો પડ્યો છે. 

- એક્સપોર્ટ પર અસર: સુરતનો કાપડ ઉદ્યોગ દુબઈ મારફતે 45 દેશોમાં નિકાસ કરે છે. પોર્ટ બંધ અને શિપિંગ ખર્ચ વધતા એક્સપોર્ટ અટક્યો છે.

 - રાજ્ય અને કેન્દ્ર પાસે માંગ: ઉદ્યોગકારો વૈકલ્પિક ઊર્જા સ્ત્રોત, ગેસ સપ્લાય વધારવા અને રાહત પેકેજની માંગ કરી રહ્યા છે. વડાપ્રધાન સાથેની બેઠકમાં પણ આ મુદ્દા ઉઠાવાયા છે. 

 આગળ શું? યુદ્ધ ત્રણ અઠવાડિયાથી ચાલી રહ્યું છે અને તેનો અંત દેખાતો નથી. જો સ્થિતિ સુધરી નહીં તો સુરતનો ટેક્સટાઈલ ઉદ્યોગ – જે ગુજરાતની અર્થવ્યવસ્થાની રીઢ છે – ભારે નુકસાન ભોગવશે. લાખો શ્રમિકોના પરિવારોની આજીવિકા, રાજ્યની આવક અને રાષ્ટ્રીય એક્સપોર્ટ પર અસર પડશે. આ સંકટ માત્ર સુરતનું નથી – તે વૈશ્વિક ઊર્જા સંકટ અને ભારતની આયાત નિર્ભરતાનું જીવંત ઉદાહરણ છે. 

આર્થિક આગની લપેટમાં સુરતના કાપડ ઉદ્યોગને તાત્કાલિક રાહતની જરૂર છે. જો યુદ્ધ લાંબો ચાલ્યો તો નુકસાન 100% સુધી પહોંચી શકે છે. સરકાર, ઉદ્યોગકારો અને શ્રમિકો સાથે મળીને આ સંકટને પહોંચી વળવું પડશે – નહીં તો 'વિશ્વ ગુરુ' બનવાના સપના ગુજરાતમાં જ ધૂળ ચઢી જશે.

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 22,2026
March 21, 2026

तुलसी गबार्ड का धमाकेदार खुलासा: ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 2025 में ही तबाह, फिर भी ट्रंप ने जंग क्यों शुरू की? वॉशिंगटन में बवाल, इंटेलिजेंस चीफ ने ट्रंप के दावों को दिया झटका

तुलसी गबार्ड का धमाकेदार खुलासा: ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम 2025 में ही तबाह, फिर भी ट्रंप ने जंग क्यों शुरू की? वॉशिंगटन में बवाल, इंटेलिजेंस चीफ ने ट्रंप के दावों को दिया झटका
-Friday World March 22,2026
वाशिंगटन डीसी में सीनेट इंटेलिजेंस कमेटी की सुनवाई ने अमेरिकी राजनीति में तूफान मचा दिया है। डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) तुलसी गबार्ड ने लिखित बयान में स्पष्ट किया कि जून 2025 में अमेरिका-इजरायल के संयुक्त हमले "ऑपरेशन मिडनाइट हैमर" के बाद ईरान का यूरेनियम एनरिचमेंट प्रोग्राम पूरी तरह से नष्ट हो गया था। उन्होंने लिखा: "ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के परिणामस्वरूप ईरान का न्यूक्लियर एनरिचमेंट प्रोग्राम तबाह हो गया। उसके बाद से इसे दोबारा बनाने की कोई कोशिश नहीं की गई। भूमिगत सुविधाओं के प्रवेश द्वार को बमबारी से मलबे से ढक दिया गया और सीमेंट से बंद कर दिया गया।"

 यह बयान सीधे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन दावों पर सवाल उठाता है, जिनमें उन्होंने ईरान के न्यूक्लियर खतरे को फरवरी 28, 2026 से शुरू हुए युद्ध की मुख्य वजह बताया था। ट्रंप ने बार-बार कहा कि ईरान अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम दोबारा शुरू कर रहा था और यह अमेरिका के लिए "इमिनेंट थ्रेट" (तत्काल खतरा) बन चुका था। लेकिन गबार्ड की गवाही से साफ होता है कि 2025 के हमलों के बाद ईरान ने एनरिचमेंट क्षमता बहाल करने की कोई कोशिश नहीं की। इससे युद्ध की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 

 सुनवाई में क्या हुआ? गबार्ड ने क्यों छोड़ा हिस्सा? 

18 मार्च 2026 को सीनेट सिलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलिजेंस (SSCI) के सामने गबार्ड ने अपना लिखित स्टेटमेंट सबमिट किया, लेकिन मौखिक बयान में उन्होंने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम के "नो एफर्ट्स टू रिबिल्ड" वाले हिस्से को पढ़ा ही नहीं। जब डेमोक्रेटिक सीनेटर मार्क वार्नर और जॉन ओसॉफ ने इस पर सवाल किया, तो गबार्ड ने कहा कि "समय कम था, इसलिए कुछ हिस्से छोड़ दिए गए।" उन्होंने अपने आकलन से इनकार नहीं किया और पुष्टि की कि इंटेलिजेंस कम्युनिटी (IC) का मूल्यांकन यही है कि ईरान ने एनरिचमेंट क्षमता बहाल नहीं की। 

यह omission (छोड़ना) विवादास्पद हो गया। डेमोक्रेट्स ने आरोप लगाया कि गबार्ड ने जानबूझकर ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जाने वाला हिस्सा छिपाया। सीनेटर वार्नर ने कहा, "यह ट्रंप के दावों को कमजोर करने वाला हिस्सा था, और इसे छोड़ना संयोग नहीं लगता।" गबार्ड ने जवाब में कहा कि IC का काम "इमिनेंट थ्रेट" तय करना नहीं है – यह राष्ट्रपति का फैसला है। लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान का प्रोग्राम 2025 में "obliterated" (नष्ट) हो चुका था। 

 ट्रंप के दावे vs इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स ट्रंप प्रशासन ने युद्ध की शुरुआत में कई वजहें बताईं – ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम दोबारा शुरू होना, मिसाइल खतरा, क्षेत्रीय अस्थिरता। लेकिन गबार्ड की गवाही और 2026 एनुअल थ्रेट असेसमेंट से कई विरोधाभास उजागर हुए हैं: 

- 2025 के हमलों के बाद ईरान ने एनरिचमेंट नहीं बहाल किया।

 - IAEA (इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी) ने भी कोई स्ट्रक्चर्ड न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम नहीं पाया। 

- इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स में ईरान को ICBM (इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल) विकसित करने में 2035 तक का समय लग सकता है।

 - ओमान के विदेश मंत्री (जो अमेरिका-ईरान बातचीत में मध्यस्थ थे) ने युद्ध से पहले कहा था कि डिप्लोमेसी में प्रगति हो रही थी और कोई तत्काल जरूरत नहीं थी।

 ट्रंप ने स्टेट ऑफ द यूनियन और अन्य बयानों में कहा कि ईरान "प्रोग्राम दोबारा शुरू कर रहा था," लेकिन IC का आकलन इससे अलग है। इससे युद्ध को "preventive strike" (रोकथाम हमला) बताने की वैधता पर सवाल उठ रहे हैं। 

 जो केंट का इस्तीफा: इंटरनल विरोध की पहली बड़ी आवाज विवाद को और बढ़ावा मिला जब तुलसी गबार्ड के करीबी सलाहकार और नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के डायरेक्टर जो केंट ने इस्तीफा दे दिया। केंट ने ट्रंप को लिखे पत्र में कहा: "ईरान अमेरिका के लिए कोई इमिनेंट थ्रेट नहीं था। यह युद्ध इजरायल और उसके अमेरिकी लॉबी के दबाव में शुरू हुआ।" केंट ने आरोप लगाया कि "मिसइनफॉर्मेशन कैंपेन" ने ट्रंप को गुमराह किया।

 केंट और गबार्ड दोनों पूर्व सैनिक हैं और "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत विदेशी हस्तक्षेप के विरोधी माने जाते हैं। गबार्ड ने युद्ध शुरू होने (28 फरवरी 2026) से चुप्पी साध रखी थी और अब उनकी गवाही से लगता है कि वे भी युद्ध के पूर्ण समर्थक नहीं हैं। 

युद्ध का वर्तमान हाल और ग्लोबल प्रभाव युद्ध अब तीसरे हफ्ते में है। "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत अमेरिका-इजरायल ने ईरान के नेतृत्व, मिसाइल साइट्स और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले किए। सुप्रीम लीडर अली खमेनेी की मौत के बाद ईरान ने जवाबी मिसाइल हमले किए, जिससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और रेड सी प्रभावित हुए। ग्लोबल शिपिंग, तेल कीमतें और इंटरनेट केबल्स पर खतरा बढ़ गया है।

 गबार्ड ने गवाही में कहा कि ईरानी रेजीम "intact लेकिन largely degraded" है – उसकी मिलिट्री प्रोजेक्शन क्षमता नष्ट हो गई है, लेकिन नेतृत्व बरकरार है। IC का अनुमान है कि अगर रेजीम बचा तो वह बदला लेगा। 

बड़ा सवाल: जंग की असली वजह क्या थी? गबार्ड के खुलासे ने वाशिंगटन में बहस छेड़ दी है। क्या युद्ध न्यूक्लियर खतरे से ज्यादा इजरायल के दबाव, क्षेत्रीय राजनीति या अन्य कारणों से हुआ? डेमोक्रेट्स इसे "war based on a lie" कह रहे हैं। रिपब्लिकन्स इसे "preventive action" बता रहे हैं। 

यह घटना ट्रंप प्रशासन में दरार दिखाती है। गबार्ड जैसी प्रमुख फिगर का बयान युद्ध की नैरेटिव को चुनौती दे रहा है। अगर इंटेलिजेंस कम्युनिटी और प्रशासन के बीच ऐसा अंतर है, तो अमेरिकी जनता और विश्व को सच्चाई जानने का हक है। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 22,2026
March 21, 2026

समंदर की गहराइयों में छिपी डिजिटल साजिश? ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच सबमरीन इंटरनेट केबल्स पर संदिग्ध छेड़छाड़ की आशंका -क्या ग्लोबल इंटरनेट ठप होने वाला है?

समंदर की गहराइयों में छिपी डिजिटल साजिश? ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच सबमरीन इंटरनेट केबल्स पर संदिग्ध छेड़छाड़ की आशंका -क्या ग्लोबल इंटरनेट ठप होने वाला है?-Friday World March 22,2026
मध्य पूर्व का तनाव अब सिर्फ तेल और मिसाइलों तक सीमित नहीं रहा। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ और रेड सी जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों के नीचे बिछीं सबमरीन फाइबर-ऑप्टिक केबल्स – जो दुनिया के 99% से अधिक अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट ट्रैफिक को संभालती हैं – अब युद्ध की चपेट में आ गई हैं। मार्च 2026 में जारी ईरान-अमेरिका-इज़राइल संघर्ष के बीच रिपोर्ट्स में संदिग्ध गतिविधियों और छेड़छाड़ की आशंका जताई जा रही है, जिससे बैंकिंग, कम्युनिकेशन, स्टॉक मार्केट और रोजमर्रा की डिजिटल जिंदगी पर भारी असर पड़ सकता है। 

 सबमरीन केबल्स क्या हैं और क्यों इतनी महत्वपूर्ण? दुनिया की इंटरनेट रीढ़ कहे जाने वाली ये केबल्स समंदर की तलहटी में हजारों किलोमीटर तक फैली हुई हैं। ये पतली, मजबूत फाइबर-ऑप्टिक तारें हैं जो महाद्वीपों को जोड़ती हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ (फारस की खाड़ी का संकरा रास्ता) और रेड सी से गुजरने वाली प्रमुख केबल्स में AAE-1, FALCON, Gulf Bridge International, Tata TGN Gulf, IMEWE, SMW4 जैसी सिस्टम शामिल हैं। ये केबल्स यूरोप, एशिया, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट को कनेक्ट करती हैं। 

एक अनुमान के मुताबिक, इनमें से किसी एक केबल के कटने से लाखों यूजर्स प्रभावित हो सकते हैं। 2024 और 2025 में रेड सी में हूती हमलों से जुड़ी घटनाओं में केबल्स क्षतिग्रस्त हुईं थीं, जिससे भारत, पाकिस्तान, यूएई और अन्य देशों में इंटरनेट स्पीड घंटों-दिनों तक धीमी हो गई थी। अब 2026 में युद्ध के कारण स्थिति और गंभीर हो गई है। 

 युद्ध ने क्यों बढ़ाई खतरे की आशंका? फरवरी 2026 के अंत में अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े हमले शुरू किए, जिसके जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में सी माइंस बिछा दिए और शिपिंग ट्रैफिक को पूरी तरह रोक दिया। IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) ने चेतावनी दी कि कोई भी जहाज गुजरने की कोशिश करेगा तो उसे आग लगा दी जाएगी। इससे 150 से ज्यादा जहाज फंसे हुए हैं, और कई टैंकर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

 रेड सी में हूती (ईरान समर्थित) ने फिर से हमले शुरू कर दिए हैं। दोनों चोक पॉइंट्स – होर्मुज़ और रेड सी – अब युद्ध क्षेत्र बन गए हैं। केबल्स खुद लक्ष्य नहीं हैं, लेकिन खतरा इनसे जुड़ा है:

 - एक्सीडेंटल डैमेज: हमलों से प्रभावित जहाजों के एंकर समंदर की तलहटी पर खींचे जाते हैं और केबल्स कट जाती हैं। 2024 में हूती हमले से एक जहाज डूबा और तीन केबल्स कट गईं, जिससे 25% ट्रैफिक प्रभावित हुआ।

 - माइंस और मिलिट्री एक्टिविटी: माइंस या मिसाइलों से केबल्स क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। 

- रिपेयर में दिक्कत: स्पेशलाइज्ड रिपेयर शिप्स अब इन इलाकों में नहीं जा सकतीं। पिछले मामलों में रिपेयर में महीनों लग गए थे। 

- संदिग्ध गतिविधियां: कुछ रिपोर्ट्स में जानबूझकर छेड़छाड़ या वांडलिज्म की आशंका जताई गई है, हालांकि अभी कोई ठोस सबूत नहीं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि मिसएडवेंचर (गलती से) ज्यादा संभावित है, लेकिन साजिश से इनकार नहीं किया जा सकता। 

 क्या होगा अगर केबल्स कट गईं? 

- इंटरनेट ब्लैकआउट: मिडिल ईस्ट, साउथ एशिया (भारत-पाकिस्तान सहित), अफ्रीका और यूरोप के कुछ हिस्सों में स्पीड ड्रॉप या आउटेज।

 - बैंकिंग और फाइनेंशियल सिस्टम: ट्रांजेक्शन रुक सकते हैं, स्टॉक मार्केट प्रभावित।

 - कम्युनिकेशन: वॉइस कॉल्स, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, क्लाउड सर्विसेज (जैसे Azure, AWS) प्रभावित। 

- AI और डेटा सेंटर्स: गल्फ में ट्रिलियन डॉलर के AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर असर, क्योंकि डेटा ट्रैफिक रूट्स ब्लॉक। 

- रिपेयर टाइम: महीनों लग सकते हैं, क्योंकि रिपेयर शिप्स नहीं पहुंच पाएंगी। 

Meta ने हाल ही में 2Africa प्रोजेक्ट (45,000 किमी लंबी केबल) का पर्शियन गल्फ सेगमेंट रोक दिया है। Alcatel Submarine Networks ने फोर्स मेज्योर घोषित किया, क्योंकि पर्शियन गल्फ में काम सुरक्षित नहीं। इससे अफ्रीका और एशिया की कनेक्टिविटी प्रभावित हो रही है। 

साजिश है या सिर्फ युद्ध का कोलैटरल डैमेज? अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं कि जानबूझकर छेड़छाड़ हुई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि ईरान खुद केबल्स काटने से हिचकेगा, क्योंकि इससे उसकी अपनी कनेक्टिविटी प्रभावित होगी। लेकिन युद्ध की अराजकता में एक्सीडेंटल डैमेज बहुत आसान है। कुछ विश्लेषक इसे "प्लॉजिबल डिनायबिलिटी" वाली स्ट्रैटेजी मानते हैं – जहां हमलावर कह सकता है कि "हमने नहीं किया"। 

पिछले उदाहरणों से साफ है कि ऐसे इलाकों में केबल्स बहुत कमजोर हैं। रेड सी में केबल्स शैलो वॉटर में हैं, इसलिए एंकर से आसानी से कट सकती हैं। होर्मुज़ में भी यही स्थिति है। 

आगे क्या?

 - रिस्क मैनेजमेंट: कंपनियां अल्टरनेटिव रूट्स (जैसे फुजैराह में लैंडिंग) का इस्तेमाल कर रही हैं, लेकिन क्षमता सीमित। 

- ग्लोबल इंपैक्ट: भारत जैसे देशों में GCC एक्सपोर्ट प्रभावित होने के साथ अब डिजिटल इकोनॉमी भी खतरे में। 

- सुरक्षा: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबमरीन केबल्स को क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर मानकर बेहतर प्रोटेक्शन की मांग बढ़ रही है। 

यह युद्ध सिर्फ तेल का नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया का भी है। अगर केबल्स पर असर पड़ा तो ग्लोबल इंटरनेट का एक बड़ा हिस्सा ठप हो सकता है। क्या यह एक बड़ी साजिश है या युद्ध की अनजानी कीमत? समय बताएगा, लेकिन तैयारी की जरूरत अभी है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 22,2026