April 26, 2026
चरण स्पर्श की राजनीति: एक माँ के पैर छूकर वोट माँगना, दूसरी माँओं की पीड़ा को अनदेखा करना
चरण स्पर्श की राजनीति: एक माँ के पैर छूकर वोट माँगना, दूसरी माँओं की पीड़ा को अनदेखा करना
-Friday World-April 27,2026
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार-हत्या की शिकार डॉक्टर की माँ रत्ना देबनाथ के पैर छुए। यह दृश्य भावुक था। महिला शक्ति का सम्मान दिखाने वाला भी। माँ के प्रति आदर का प्रतीक। लेकिन इस एक घटना ने देशभर में तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या चरण वंदना सिर्फ चुनावी रणभूमि में ही दिखाई जाती है? जब सत्ता की जरूरत हो, तब माँ के पैर छूना और जब सत्ता अपने हाथ में हो, तब अन्य बलात्कार पीड़िताओं और उनकी माँओं की पीड़ा को क्यों अनदेखा किया जाता है?
यह सवाल राजनीतिक दोहरे मापदंड का है, न कि किसी एक घटना का।
आरजी कर मामला: चुनावी मंच पर सम्मान
अगस्त 2024 में आरजी कर अस्पताल में एक युवा डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या हो गई थी। पूरे देश में आक्रोश फैला। पीड़िता की माँ रत्ना देबनाथ ने न्याय की लड़ाई लड़ी। टीएमसी शासन पर आरोप लगाए। भाजपा ने उन्हें पानिहाटी सीट से उम्मीदवार बनाया।
24 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने पानिहाटी और दमदम में रैलियों में रत्ना देबनाथ के साथ मंच साझा किया। उन्होंने उनकी हिम्मत की सराहना की, सिर पर हाथ रखा और टीएमसी के “जंगल राज” को दोषी ठहराया। यह दृश्य वायरल हुआ। भाजपा इसे महिलाओं की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बता रही है।
महिलाओं का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। माँ के प्रति श्रद्धा दिखाना सराहनीय है। लेकिन सवाल उठता है – यह सम्मान चुनिंदा क्यों?
वो मामले जब चुप्पी साध ली गई
भारत में कई भयानक बलात्कार-हत्या के मामले सामने आए हैं। कुछ में आरोपी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे या सत्ताधारी दलों से जुड़े थे। आइए उन मामलों को याद करें जहां प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार की ओर से ऐसी भावुक चरण स्पर्श जैसी कोई कार्रवाई नहीं हुई:
1. बिलकिस बानो मामला (2002)
गुजरात दंगों के दौरान गर्भवती बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। उनके परिवार के 14 सदस्यों की हत्या कर दी गई। 11 दोषियों को सजा हुई। लेकिन 2022 में (जब मोदी सरकार केंद्र में थी) गुजरात सरकार ने उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया। दोषियों का स्वागत मिठाई और पैर छूकर किया गया। बिलकिस ने न्याय की गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रिहाई रद्द की। लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी बिलकिस या उनकी माँ के पैर नहीं छुए, न ही सार्वजनिक रूप से माफी माँगी।
2. कठुआ (आसिफा) मामला (2018)
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 वर्षीय मुस्लिम बच्ची आसिफा का मंदिर में सामूहिक बलात्कार और हत्या की गई। आरोपी हिंदू थे। भाजपा के दो मंत्रियों ने आरोपी पक्ष का समर्थन किया और प्रदर्शन किए। प्रधानमंत्री मोदी ने काफी देर बाद चुप्पी तोड़ी और कहा कि “हमारी बेटियों को न्याय मिलेगा”। लेकिन पीड़िता की माँ के पैर छूने या व्यक्तिगत संवेदना व्यक्त करने जैसा कोई भावुक दृश्य नहीं देखा गया।
3. उन्नाव बलात्कार मामला (2017)
उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर 16 वर्षीय लड़की से बलात्कार का आरोप लगा। पीड़िता की माँ ने न्याय की लड़ाई लड़ी। बाद में पीड़िता के पिता की हत्या का आरोप भी लगा। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। सेंगर को सजा हुई, लेकिन पीड़िता और उनकी माँ को बार-बार धमकियाँ मिलीं। 2025 में भी पीड़िता की माँ को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान रोका गया। प्रधानमंत्री ने कभी उन्नाव की माँ के पैर नहीं छुए।
4. हाथरस मामला (2020)
उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 वर्षीय दलित लड़की से सामूहिक बलात्कार हुआ। वह दिल्ली के अस्पताल में मर गई। परिवार का आरोप था कि पुलिस ने आधी रात (2:45 बजे) जबरन शव का दाह संस्कार कर दिया, परिवार को अंतिम विदाई तक नहीं दी गई। ऊपरी जाति के आरोपी थे। पूरे देश में आक्रोश फैला। विपक्ष ने योगी सरकार की इस्तीफे की माँग की। प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री से बात की और “सख्त कार्रवाई” की बात कही, लेकिन पीड़िता की माँ के पैर छूने या व्यक्तिगत रूप से मिलने जैसा कोई संकेत नहीं दिया।
ये मामले अलग-अलग राज्यों और समय के हैं। लेकिन एक पैटर्न साफ दिखता है – जब आरोपी सत्ताधारी पक्ष से जुड़े दिखते हैं, तो चुप्पी या औपचारिक बयान। जब विपक्षी राज्य में मामला हो, तो भावुक चरण स्पर्श और “जंगल राज” का नारा।
राजनीति और पीड़ा का शोषण
राजनीति में भावनाओं का इस्तेमाल होता है। लेकिन जब एक पीड़िता की माँ को उम्मीदवार बनाकर वोट माँगे जाएं और दूसरी पीड़िताओं को सिर्फ वोट बैंक समझा जाए, तो यह दोगलापन कहलाता है।
आरजी कर मामले में न्याय की माँग जायज है। लेकिन क्या बिलकिस, आसिफा, उन्नाव और हाथरस की माँओं का दर्द कम था? क्या उनकी बेटियों की जान सत्ता के खेल में कम कीमती थी?
एक अकेली जान सत्ता के लिए कितना कुछ कर रही है – यह सवाल गंभीर है। लेकिन सवाल यह भी है कि हजारों अन्य जानों के साथ क्या हो रहा है? क्या महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी मुद्दा है या हर राज्य, हर सरकार में समान रूप से लागू होना चाहिए?
सच्ची महिला शक्ति का सम्मान कब?
महिला शक्ति का सम्मान तभी सार्थक होगा जब:
- हर बलात्कार पीड़िता को बिना भेदभाव के न्याय मिले
- दोषी चाहे किसी भी दल या जाति से हो, सजा हो
- पीड़ित परिवार को राजनीतिक हथियार न बनाया जाए, बल्कि न्याय दिलाया जाए
- चरण स्पर्श दिखावा न हो, बल्कि हर पीड़िता की माँ के प्रति सच्ची संवेदना हो
प्रधानमंत्री का आरजी कर पीड़िता की माँ के प्रति सम्मान सराहनीय है। लेकिन देश की अन्य माँओं – बिलकिस, आसिफा, उन्नाव और हाथरस की माँओं – की पीड़ा को भी उसी नजर से देखा जाना चाहिए।
चुनाव आते-जाते रहते हैं। लेकिन न्याय और महिला सुरक्षा का मुद्दा स्थायी होना चाहिए। अगर एक माँ के पैर छूकर वोट माँगे जा सकते हैं, तो सभी माँओं के दर्द को समझकर न्याय सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।
देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर हर पीड़िता को समान न्याय दे। तभी “माँ तुझे सलाम” का नारा सच्चा लगेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 27,2026