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August 09, 2026
मरीन ड्राइव का अनसुना बादशाह: हबीब इस्माइल, जिसने दौलत को इंसानियत के नाम कर दिया
मरीन ड्राइव का अनसुना बादशाह: हबीब इस्माइल, जिसने दौलत को इंसानियत के नाम कर दिया
- Friday World 9 Aug 2026
मुंबई। इस शहर की पहचान सिर्फ ऊंची इमारतों और चमचमाती सड़कों से नहीं है। इसकी असली पहचान उन लोगों से है जिन्होंने अपनी दौलत को दीवारों में नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी में लगाया। ऐसे ही एक नाम है - हबीब इस्माइल। 16 अगस्त 1931 को दुनिया को अलविदा कहने वाले इस उद्योगपति-परोपकारी की 95वीं पुण्यतिथि इस बार मुंबई में 'संस्थापक दिवस' के रूप में मनाई जाएगी।
आज जब हम मरीन ड्राइव पर टहलते हैं और अरब सागर की लहरों को देखते हैं, तो शायद ही कोई जानता हो कि यहाँ खड़ी एक इमारत कभी हज यात्रियों का ठिकाना थी। उस इमारत का नाम था 'दार-उल-हबीब'।
कुरान की एक आयत और एक जिंदगी बदल गई
कहानी शुरू होती है 19वीं सदी के आखिरी दौर में। हबीब इस्माइल, जो 1878 में जन्मे, एक साधारण परिवार से थे। उनके पिता इस्माइल अली जामनगर के रहने वाले थे। 13 साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया। उस उम्र में ज्यादातर बच्चे स्कूल जाते हैं, लेकिन हबीब ने बॉम्बे में एक छोटी धातु की फैक्ट्री संभाली। फिर एक ऐसी फर्म में काम किया जो सिर्फ 5 रुपये सालाना में तांबे और पीतल के बर्तन बेचती थी।
लेकिन हबीब में कुछ अलग था। उन्होंने सीखने की ठान ली थी। व्यापार के गुर सीखे, आयात-निर्यात समझा और बैंकिंग की दुनिया में कदम रखा। धीरे-धीरे वे धातु निर्माण, व्यापार और बैंकिंग में उस दौर के सबसे बड़े नाम बन गए। 1941 में उनके चार बेटों ने 'हबीब बैंक' की स्थापना की, जो बाद में विभाजन के बाद कराची चली गई। ऑक्सफोर्ड के इतिहासकार दानिश खान कहते हैं, "उस समय किसी मुस्लिम व्यावसायिक परिवार ने बैंक खोलने के बारे में नहीं सोचा था। हबीब इस्माइल ने वह रास्ता दिखाया।"
लेकिन पैसा कमाना ही उनकी मंजिल नहीं थी। एक दिन उन्होंने कुरान की यह आयत पढ़ी: "तुम तब तक नेकी को नहीं पा सकते जब तक तुम उसमें से खर्च न करो जिसे तुम सबसे ज्यादा प्यार करते हो।" यह एक लाइन उनके दिल में उतर गई।
मरीन ड्राइव पर बसा एक ख्वाब: दार-उल-हबीब
ब्रिटिश भारत में जब उनका कारोबार फला-फूला, तो उन्होंने अपनी सबसे कीमती चीज चुनी - मरीन ड्राइव पर अरब सागर के किनारे बनी खूबसूरत इमारत 'दार-उल-हबीब'। यह सिर्फ एक घर नहीं था। यह उनकी मोहब्बत थी।
1931 में अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने अपने चार बेटों को वसीयत में कहा: "इस संपत्ति का इस्तेमाल हज पर जाने वाले यात्रियों के लिए करो।" उस समय हज का सफर आसान नहीं था। बॉम्बे से जहाज पकड़ने आने वाले हजारों जायरीनों के लिए यह इमारत एक सराय बन गई।
समय के साथ 'दार-उल-हबीब' का रूप बदला। प्रसिद्ध वास्तुकार अब्दुलहुसैन एम थारियानी ने इसे "होटल बॉम्बे इंटरनेशनल' में तब्दील किया। 1980 में अभिनेत्री सबीरा मर्चेंट ने यहाँ 'स्टूडियो 29' नाम का नाइट क्लब खोला, जो न्यूयॉर्क के मशहूर 'स्टूडियो 54' से प्रेरित था। आज वही जगह 'होटल मरीन प्लाजा' के नाम से जानी जाती है।
सबीरा मर्चेंट आज भी याद करती हैं, "वह मेरे सगे पिता थे। उन्होंने कभी एक पैसा नहीं लिया। होटल बॉम्बे इंटरनेशनल की यादें आज भी मेरे दिल में हैं।"
एक विरासत जो इमारतों से बड़ी है
हबीब इस्माइल का नाम भले ही किताबों में कम मिले, लेकिन उनकी विरासत मुंबई की हर गली में जिंदा है। उनके द्वारा स्थापित हबीब ग्रुप ऑफ ट्रस्ट्स आज भी हजारों लोगों की मदद कर रहा है।
1. रहमतबाई मैटरनिटी होम: डोंगरी में शुरू हुआ यह अस्पताल आज हबीब हॉस्पिटल के नाम से गरीबों का इलाज करता है।
2. शैक्षणिक संस्थान: डोंगरी और आसपास के इलाकों में स्कूल और कॉलेज, जहाँ आज भी मुफ्त या कम फीस में शिक्षा दी जाती है।
3. हबीब कोर्ट, कोलाबा: यह ट्रस्ट की सबसे प्रतिष्ठित संपत्तियों में से एक है। यहाँ पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल विष्णु भागवत और उनकी पत्नी वकील निलोफर भागवत जैसे लोग रहते हैं। एडमिरल भागवत 1974 से यहाँ रह रहे हैं। वे कहते हैं, "हबीब इस्माइल एक दूरदर्शी थे। जावेद श्रॉफ और ट्रस्ट जिस तरह संस्थाओं को चला रहे हैं, वह काबिले तारीफ है।"
ट्रस्ट्स के अध्यक्ष जावेद श्रॉफ बताते हैं कि इसी वजह से इस साल 16 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि को 'संस्थापक दिवस' के रूप में मनाने का फैसला किया गया है। कार्यक्रमों के जरिए नई पीढ़ी को उनके कामों से रूबरू कराया जाएगा।
वो कौन थे हबीब इस्माइल?
इतिहासकारों के लिए हबीब इस्माइल सिर्फ एक व्यापारी नहीं थे। वे एक सोच थे। 19वीं और 20वीं सदी के बॉम्बे के बोहरा, खोजा और मेमन समुदाय के उन चुनिंदा व्यापारियों में से थे जिन्होंने सिर्फ मुनाफा नहीं, बल्कि समाज को साथ लेकर चलने का रास्ता चुना।
शिया विद्वान मौलाना अहमद आबिदी एक किस्सा सुनाते हैं। एक बार इस्माइल किसी संपत्ति को देखकर सोच में पड़ गए। वे चाहते थे कि उनके मरने के बाद वह संपत्ति लोगों के काम आए। आबिदी कहते हैं, "वह एक नेक इंसान थे। आज भी उनकी यादें जिंदा हैं।"
आज के दौर में उनकी सीख
आज जब दुनिया 'CSR' और 'फिलैंथ्रोपी' की बात करती है, तब 100 साल पहले हबीब इस्माइल ने यह करके दिखाया था। उन्होंने साबित किया कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि इस बात में है कि आपने कितने लोगों की जिंदगी बदली।
मुंबई एक ऐसा शहर है जो भूलने में माहिर है। लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जो समय की धूल के बावजूद चमकते रहते हैं। हबीब इस्माइल का नाम उनमें से एक है।
इस 16 अगस्त को जब ट्रस्ट 'संस्थापक दिवस' मनाएगा, तो यह सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं होगी। यह उस सोच को सलाम होगा जिसने कहा था कि दौलत का असली मकसद इंसानियत की सेवा है।
अगली बार जब आप मरीन ड्राइव पर जाएं और होटल मरीन प्लाजा को देखें, तो एक पल रुकिए। उस इमारत की दीवारों में एक शख्स की दुआएं आज भी गूंजती होंगी - एक ऐसा शख्स जिसने सब कुछ देकर भी अपना नाम पीछे छोड़ दिया।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 9 Aug 2026
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