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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 15 March 2026

March 15, 2026

होर्मुज में फंसे 778 भारतीय नाविक: "स्पेशल पास" की अफवाहें vs हकीकत का कड़वा सच

होर्मुज में फंसे 778 भारतीय नाविक: "स्पेशल पास" की अफवाहें vs हकीकत का कड़वा सच
-Friday World March 15, 2026 
दोस्तों, कल्पना कीजिए – समंदर के बीच में, मौत के साए तले, हमारे 778 बहादुर नाविक दिन-रात जहाजों पर कैद हैं। जहाज हिलते हैं, लहरें मारती हैं, और ऊपर से ड्रोन, मिसाइलें, हमलों की आहट। होर्मुज स्ट्रेट – दुनिया का वो गलियारा जहां से 20% ग्लोबल तेल गुजरता है – अब जंग का मैदान बन चुका है। ईरान-अमेरिका-इजरायल की छिड़ी जंग ने यहां ट्रैफिक ठप कर दिया है। सैकड़ों जहाज एंकर डाले खड़े हैं, तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, भारत में एलपीजी सिलेंडर महंगा हो रहा है, महंगाई की मार आम आदमी पर पड़ रही है।

 फिर भी, कुछ टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है? "ईरान ने भारत को स्पेशल पास दे दिया!" "जयशंकर जी की एक कॉल पर ईरान ने गेट खोल दिया!" "हमारे टैंकर निकल गए, वाह रे कूटनीति!" 🔥🇮🇳 ऐसे जश्न मनाए जा रहे हैं जैसे कोई बड़ी जीत हो गई हो। लेकिन सच्चाई क्या है? आइए, सरकारी बयानों, आधिकारिक ब्रिफिंग और विश्वसनीय रिपोर्ट्स से हकीकत समझते हैं। 

 सरकारी बयान: अभी भी ज्यादातर जहाज फंसे हैं 

12-14 मार्च 2026 की इंटर-मिनिस्टीरियल प्रेस कॉन्फ्रेंस में शिपिंग मिनिस्ट्री के स्पेशल सेक्रेटरी राजेश कुमार सिन्हा ने साफ-साफ कहा:

 - कुल 28 भारतीय ध्वज वाले जहाज फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में फंसे हैं। 

- इन पर 778 भारतीय नाविक सवार हैं। 

- इनमें से 24 जहाज होर्मुज स्ट्रेट के पश्चिम में (Persian Gulf के अंदर) हैं, जहां 677 नाविक हैं। 

- 4 जहाज स्ट्रेट के पूर्व* में (Gulf of Oman क्षेत्र) हैं, जहां 101 नाविक हैं।

 - सभी नाविक सुरक्षित हैं, पिछले 24 घंटों में कोई अनहोनी नहीं हुई, लेकिन ज्यादातर जहाज अभी भी अटके हुए हैं – मूवमेंट नहीं कर पा रहे।

 सिन्हा ने आगे बताया कि दो भारतीय ध्वज वाले LPG कैरियर – शिवालिक (Shivalik) और नंदा देवी (Nanda Devi) – ने स्ट्रेट क्रॉस कर लिया है। ये जहाज भारतीय ऑयल कॉर्पोरेशन के चार्टर्ड हैं, कुल 92,700 मीट्रिक टन LPG लेकर मुंद्रा और कांडला पोर्ट की ओर बढ़ रहे हैं। अनुमानित पहुंच: 16-17 मार्च 2026। 

एक और जहाज **जग प्रकाश (Jag Prakash)** – जो ओमान से अफ्रीका जा रहा था – पूर्वी हिस्से से मूवमेंट शुरू कर चुका है। लेकिन बाकी **22-24 जहाज** (मुख्य रूप से क्रूड ऑयल, LPG और LNG कैरियर) अभी भी फंसे हैं। भारत सरकार इनके लिए ईरान और अन्य पक्षों से सुरक्षित पासेज की मांग कर रही है। 

 ईरान की तरफ से क्या कहा गया? ईरान के भारत में राजदूत **मोहम्मद फतहाली** ने कन्फर्म किया कि ईरान ने कुछ भारतीय जहाजों को "रेयर एक्सेप्शन" के तौर पर पास करने की इजाजत दी है। उन्होंने कहा, "भारत और ईरान दोस्त हैं, हमने कुछ जहाजों को सुरक्षित ट्रांजिट दिया।" लेकिन उन्होंने ये साफ नहीं किया कि ये कोई "स्पेशल पास" पॉलिसी है या सिर्फ चुनिंदा मामलों में छूट।

 ईरान ने बार-बार कहा है कि वो अमेरिका और उसके सहयोगियों के जहाजों को नहीं छोड़ेगा, लेकिन भारत जैसे "फ्रेंडली" देशों के साथ अलग व्यवहार हो सकता है। फिर भी, कोई ऑफिशियल "भारत को फ्री पास" वाली लिस्ट जारी नहीं हुई। कुछ जहाज खुद को "चाइना क्रू" बताकर निकलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरानी सूत्रों ने ऐसी अफवाहों को खारिज किया है। 

गोदी मीडिया vs हकीकत: फर्जी जीत का जश्न कुछ चैनलों पर "स्पेशल पास" का ढोल पीटा जा रहा है 

– जैसे पूरा संकट खत्म हो गया। लेकिन: 

- कुल 28 में से सिर्फ 2-3 जहाज निकले हैं (शिवालिक, नंदा देवी, जग प्रकाश)। 

- बाकी 22+ जहाज और सैकड़ों नाविक अभी भी खतरे में हैं।

 - होर्मुज में ट्रैफिक लगभग जीरो है – हजारों जहाज एंकर पर खड़े हैं। 

- हाल के हमलों में थाईलैंड का जहाज जल गया, क्रू मेंबर मारे गए; कई जहाजों पर आग लगी, नाविकों की जान गई।

 - ईरान अभी भी ईंधन टैंकरों को टारगेट कर रहा है।

 ये "जीत" नहीं, बल्कि आंशिक राहत है। सरकार कूटनीति से (MEA, नेवी) काम कर रही है – भारतीय नेवी के युद्धपोत ओमान तट के पास निगरानी कर रहे हैं, ऑपरेशन संकल्प के तहत तैयार हैं। लेकिन कोई "फ्री पास" या "एक कॉल पर गेट खुल गया" जैसा चमत्कार नहीं हुआ। 

 नाविकों की मजबूरी और परिवारों का दर्द ये 778 नाविक सिर्फ नंबर नहीं – ये परिवारों के भाई, बेटे, पति हैं। जहाज पर रहना, हमलों का डर, अनिश्चितता – ये सब मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देने वाला है। कुछ रिपोर्ट्स में नाविकों ने शिपिंग कंपनियों पर दबाव डालने की बात कही है, लेकिन सरकार ने उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।

 महंगाई की मार तो पड़ रही है – LPG की कमी से सिलेंडर महंगे, तेल की कीमतें बढ़ रही हैं। लेकिन मीडिया में "वाह रे मोदी-जयशंकर" का नैरेटिव चल रहा है, जबकि हकीकत में संकट बरकरार है। 
 

अफवाहों से ऊपर उठकर सच देखें होर्मुज का संकट अभी खत्म नहीं हुआ। हमारे नाविक अभी भी फंसे हैं, सरकार पूरी कोशिश कर रही है। "स्पेशल पास" की खबरें आंशिक सच्चाई पर आधारित हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं।

 ये हमारे नाविकों की जान का सवाल है। अफवाहें फैलाकर, फर्जी जश्न मनाकर हम उनके परिवारों के साथ अन्याय नहीं कर सकते। सच सामने रखें, सरकार पर दबाव बनाएं कि बाकी जहाजों को भी सुरक्षित निकालें। क्योंकि जब तक 778 नाविक घर नहीं लौटेंगे, तब तक कोई "बड़ी जीत" नहीं है। 

सच्चाई का आईना हमेशा कड़वा होता है, लेकिन यही हमें मजबूत बनाता है।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 15, 2026 
March 15, 2026

ईरान का 'कर्रार' ड्रोन: वेस्ट एशिया के आसमान में उड़ता हुआ खौफ – जेट-स्पीड, मल्टी-रोल और एयर डिफेंस का सिरदर्द

ईरान का 'कर्रार' ड्रोन: वेस्ट एशिया के आसमान में उड़ता हुआ खौफ – जेट-स्पीड, मल्टी-रोल और एयर डिफेंस का सिरदर्द 
-Friday World March 15, 2026
पश्चिम एशिया के आकाश में एक ऐसा हथियार घूम रहा है जो दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं को रातों की नींद उड़ा रहा है। यह कोई सामान्य ड्रोन नहीं, बल्कि ईरान का **कर्रार (Karrar)** जेट-पावर्ड यूएवी है – जो अब एक साधारण निगरानी प्लेटफॉर्म से आगे बढ़कर इंटरसेप्टर, बॉम्बर, सुसाइड अटैक और एयर-टू-एयर कॉम्बैट का मल्टी-रोल हथियार बन चुका है। 

ईरान ने 2010 में पहली बार इस ड्रोन को दुनिया के सामने पेश किया था, लेकिन हाल के वर्षों में इसके अपग्रेड वर्जन ने इसे और घातक बना दिया है। कर्रार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह कम लागत में उच्च मारक क्षमता प्रदान करता है – ठीक वैसा ही जो ईरान की A2/AD (Anti-Access/Area Denial) रणनीति के लिए जरूरी है। 

कर्रार की तकनीकी ताकत: स्पीड, रेंज और पेलोड
 कर्रार एक टर्बोजेट इंजन से संचालित है, जो इसे पारंपरिक प्रोपेलर वाले ड्रोनों से कहीं तेज बनाता है। मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं: 

- अधिकतम गति  लगभग 900 किमी/घंटा (कुछ रिपोर्ट्स में 950 किमी/घंटा तक का जिक्र) – यह इसे सबसोनिक स्पीड पर उड़ने वाला दुश्मन के लिए मुश्किल लक्ष्य बनाता है। 

- रेंज: 1,000 किमी तक – यानी यह ईरान से दूर स्थित लक्ष्यों तक पहुंच सकता है, जैसे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना के जहाज या इजरायली ठिकाने। 

- पेलोड क्षमता: 227-500 किलो तक – इसमें Mk 82 (500 पाउंड) जनरल पर्पस बम, Nasr-1 या Kowsar एंटी-शिप मिसाइलें, Balaban ग्लाइड बम, या दो 250 पाउंड Mk 81 बम ले जा सकता है। 

- ऑपरेशनल ऊंचाई: 7.5 से 15 किमी तक (कुछ अपग्रेड वर्जन में 40,000 फीट तक) – उच्च ऊंचाई से यह रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकता है। 

यह ड्रोन रनवे की जरूरत नहीं रखता। इसे मोबाइल रेल-लॉन्चर से रॉकेट असिस्टेड टेकऑफ (RATO) बूस्टर की मदद से लॉन्च किया जाता है – बस एक ट्रक या लॉन्चर से सीधे हवा में। मिशन पूरा होने पर पैराशूट से सुरक्षित लैंडिंग भी संभव है, खासकर रेकॉन्सेंस मिशन में। 

मल्टी-रोल क्षमता: एक ड्रोन, कई भूमिकाएं कर्रार की असली ताकत इसकी बहुमुखी प्रतिभा में है। ईरान ने इसे तीन मुख्य भूमिकाओं के लिए डिजाइन किया: 

1. इंटरसेप्टर: हाल के अपग्रेड में मजीद (Majid) हीट-सीकिंग एयर-टू-एयर मिसाइल (8 किमी रेंज) इंटीग्रेट की गई है। यह दुश्मन के ड्रोनों, हेलीकॉप्टरों या कम ऊंचाई वाले विमानों को हवा में ही नष्ट कर सकता है। ईरानी आर्मी एयर डिफेंस फोर्स ने इसे इंडक्ट किया है, जहां यह दुश्मन एयरक्राफ्ट को ट्रैक, लॉक और डिस्ट्रॉय करता है।

 2. बॉम्बर/स्ट्राइक* यह प्रेसिजन गाइडेड बम या एंटी-शिप मिसाइलें ले जाकर ग्राउंड या नौसैनिक लक्ष्यों पर हमला कर सकता है। 

3. सुसाइड/वन-वे अटैक: अगर इसे क्रूज मिसाइल मोड में इस्तेमाल किया जाए तो यह लक्ष्य से टकराकर विस्फोट कर सकता है – ठीक एक क्रूज मिसाइल की तरह, लेकिन बहुत सस्ता और बड़े पैमाने पर उत्पादित। 

A2/AD रणनीति में कर्रार की भूमिका ईरान की रणनीति पारंपरिक युद्ध में अमेरिका या इजरायल जैसी ताकतों से सीधा मुकाबला करने की नहीं, बल्कि उन्हें महंगा और मुश्किल बनाना है। कर्रार इसमें अहम भूमिका निभाता है: 

-स्वार्म अटैक (झुंड हमला): कम लागत और आसान उत्पादन के कारण इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सकता है। दर्जनों या सैकड़ों कर्रार एक साथ लॉन्च होने पर दुश्मन के एयर डिफेंस (जैसे पैट्रियट, THAAD या आयरन डोम) को ओवरलोड कर सकते हैं – क्योंकि महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों से सस्ते ड्रोनों को मारना आर्थिक नुकसान है। 

- एंटी-एक्सेस/एरिया डिनायल: खाड़ी में अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स को दूर रखने के लिए यह तेज स्पीड और लंबी रेंज से खतरा पैदा करता है। अगर इसे एंटी-रडार मिसाइल के साथ इस्तेमाल किया जाए तो यह दुश्मन के रडार को ब्लाइंड कर सकता है। 

- असिमेट्रिक वारफेयर: ईरान जानता है कि पारंपरिक हवाई शक्ति में वह पिछड़ सकता है, इसलिए ड्रोन जैसे सस्ते, डिस्पोजेबल हथियारों से दुश्मन को लगातार परेशान करना उसकी रणनीति है। कर्रार इसी का उन्नत रूप है। 

 दुनिया के लिए खतरा क्यों? कर्रार सिर्फ ईरान का हथियार नहीं रहा – इसकी तकनीक प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हूती, हिजबुल्लाह) तक पहुंच सकती है। हाल के वर्षों में ईरान ने ड्रोन स्वार्म अटैक्स में महारत हासिल की है, जहां सैकड़ों सस्ते ड्रोन से दुश्मन की डिफेंस को भ्रमित किया जाता है। कर्रार की जेट स्पीड और एयर-टू-एयर क्षमता इसे और घातक बनाती है – यह न सिर्फ ग्राउंड टारगेट्स, बल्कि हवाई लक्ष्यों को भी निशाना बना सकता है।

 पश्चिमी खुफिया एजेंसियां और सेनाएं इसे "गेम-चेंजर" मान रही हैं। क्योंकि यह साबित करता है कि कम संसाधनों वाले देश भी उच्च तकनीक वाले हथियार बना सकते हैं जो महंगे सिस्टम्स को चुनौती दे सकें। 

भविष्य का युद्ध ड्रोनों से तय होगा? कर्रार ईरान की ड्रोन क्रांति का प्रतीक है – जहां जेट पावर, मोबाइल लॉन्च और मल्टी-रोल क्षमता मिलकर एक ऐसा हथियार बनाते हैं जो सस्ता, घातक और मुश्किल से रोका जा सके। वेस्ट एशिया के आसमान में यह अब सिर्फ उड़ नहीं रहा, बल्कि दुश्मन की रणनीतियों को बदल रहा है। 

जब तक दुनिया महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों पर निर्भर रहेगी, तब तक ऐसे सस्ते लेकिन शक्तिशाली ड्रोनों से "एक्सपोनेंशियल कॉस्ट" का सामना करना पड़ेगा। कर्रार इसी का जीता-जागता सबूत है – एक छोटा सा ड्रोन जो बड़े साम्राज्यों की नींद उड़ा सकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15, 2026
March 15, 2026

Propaganda: The Art of Twisting Truth – When Monsters Become Gods and Gods Become Monsters What is Propaganda?

Propaganda: The Art of Twisting Truth – When Monsters Become Gods and Gods Become Monsters What is Propaganda?
-Friday World March 15, 2026
Propaganda is the systematic and deliberate dissemination of information—using facts, half-truths, outright lies, rumors, or emotional appeals—to shape people's opinions, beliefs, and behaviors. It is not merely about informing; it is about selectively presenting information so that the target audience reaches a specific conclusion, no matter how far removed from reality that conclusion may be.

 The history of propaganda is ancient, but its modern form was shaped by Edward Bernays, often called the "father of public relations." In his 1928 book *Propaganda*, Bernays wrote: “The conscious and intelligent manipulation of the organized habits and opinions of the masses is an important element in democratic society.” As Sigmund Freud's nephew, Bernays drew on psychology to "engineer" public consent through techniques like stirring emotions, repetition, symbolic imagery, and leveraging celebrities or authority figures. 

Nazi Propaganda Minister Joseph Goebbels studied Bernays' works and built Nazi propaganda on them. Goebbels' famous principle: “Make the lie big, make it simple, keep saying it, and eventually they will believe it.” Today, these same tactics thrive on social media, TV channels, and political campaigns—fake news, selective facts, fear-mongering, and "us vs. them" narratives dominate. 

The World's Most Dangerous Man: Kim Jong Un vs. America's "Peace Champion" Image

North Korea's leader Kim Jong Un is branded worldwide as a "dictator," "madman," and "global threat." Media portrayals often caricature him—short, overweight, comical. But what is the reality? Kim has never bombed a foreign city, invaded another country's territory, or caused millions of deaths abroad. North Korea's nuclear program is largely defensive—a response to U.S. and South Korean military presence on its doorstep, including joint exercises viewed as invasion rehearsals.

 Yet Western media and global narratives paint Kim as the "biggest danger to the world." Why? Propaganda has engineered this image through relentless repetition and demonization. 

On the other side, the United States positions itself as the "champion of peace." Several U.S. presidents have received Nobel Peace Prizes—Theodore Roosevelt, Jimmy Carter, Barack Obama (awarded in 2009, shortly after taking office). But Obama's presidency saw massive expansion of drone strikes and airstrikes. Estimates from sources like the Bureau of Investigative Journalism indicate hundreds of civilian deaths in Pakistan, Yemen, Somalia, and elsewhere under Obama. In 2016 alone, the U.S. dropped over 26,000 bombs across seven countries (Afghanistan, Iraq, Libya, Pakistan, Somalia, Syria, Yemen)—roughly three bombs every hour, every day. Interventions in Iraq, Afghanistan, Libya, and Syria resulted in hundreds of thousands of civilian deaths overall. 

This is propaganda in action: "Our violence is justice; their violence is terrorism." Media, Hollywood, and international institutions reinforce this double standard relentlessly. 

The Propaganda Game Against Muslims in India

 In India, violence against Muslims has surged in the last decade. Cow-related vigilantism from 2010 to mid-2017 saw 63 attacks, killing 28 people—24 of them Muslims (about 86% of deaths)—and injuring 124, according to Reuters and IndiaSpend data. Many reports note a sharp rise after 2014, with incidents of mob lynchings, mosque and madrasa vandalism, and rumor-fueled assaults. 

Yet the mainstream narrative labels Muslims as "jihadis," "extremists," or "anti-national." Meanwhile, those involved in mob violence are often portrayed as "cultured," followers of "Ahimsa Paramo Dharma" (non-violence is the highest duty), chanting "Vasudhaiva Kutumbakam" (the world is one family) while justifying attacks as "cow protection" or "nationalism."

 Propaganda techniques here are clear: 

→ **Fear-mongering**: Terms like "love jihad," "population jihad," or "land jihad" spread panic. 

→ **Selective reporting**: Victims are depicted as criminals or lawbreakers; perpetrators as reacting to "provocation" or "crowd anger." 

→ **Repetition**: TV debates, social media, WhatsApp forwards hammer the same narrative daily. 

→ **Othering**: Muslims are framed as the "internal enemy." The result? Violence becomes normalized, and victims are blamed. **How to Protect Yourself from Propaganda?** Propaganda works best on emotions, making it hard to spot. Ask these key questions: 

→ Who is the source? Is it credible and unbiased? 

→ Is only one side of the story being shown? 

→ Are emotions like fear, anger, or hatred being deliberately stirred? 

→ What do the facts say, beyond the narrative? Seek multiple sources, study history, and above all, control your emotions. Propaganda succeeds only when we accept without questioning.

 In this age of information, it is also the age of propaganda. Those who understand it will reach the truth. Otherwise, we all become part of someone else's "engineered consent." 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15, 2026
March 15, 2026

प्रोपगंडा: सत्य को मोड़ने की कला – जब राक्षस देवता और देवता राक्षस बन जाते हैं

प्रोपगंडा: सत्य को मोड़ने की कला – जब राक्षस देवता और देवता राक्षस बन जाते हैं
-Friday World March 15,2026
प्रोपगंडा क्या है?

 प्रोपगंडा वह व्यवस्थित और जानबूझकर की जाने वाली सूचना का प्रसार है, जिसमें तथ्यों, आधे-सच, झूठ, अफवाहों या भावनात्मक अपील का इस्तेमाल करके लोगों की राय, विश्वास और व्यवहार को प्रभावित किया जाता है। यह केवल सूचना देना नहीं, बल्कि उसे इस तरह चुनिंदा तरीके से पेश करना है कि लक्षित व्यक्ति या समाज एक खास निष्कर्ष पर पहुंचे – चाहे वह निष्कर्ष सत्य से कितना भी दूर क्यों न हो। 

प्रोपगंडा का इतिहास पुराना है, लेकिन आधुनिक रूप में इसे एडवर्ड बर्नेज़ ने "पब्लिक रिलेशंस" के पिता के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने अपनी किताब *Propaganda* (1928) में लिखा कि "इंटेलिजेंट लोग समझते हैं कि प्रोपगंडा आधुनिक समाज का आवश्यक उपकरण है।" बर्नेज़ ने सिगमंड फ्रायड के भतीजे होने के नाते मनोविज्ञान का इस्तेमाल करके जनमत को "इंजीनियर" करने की तकनीकें विकसित कीं – जैसे भावनाओं को उकसाना, दोहराव, प्रतीकों का उपयोग और सेलिब्रिटी या अथॉरिटी फिगर के जरिए विश्वास बनाना। 

नाजी प्रचार मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने बर्नेज़ की किताबों को पढ़ा और उन्हें नाजी प्रोपगंडा का आधार बनाया। गोएबल्स का मशहूर सिद्धांत था: "झूठ इतना बड़ा हो कि लोग उसे सच मान लें, और उसे बार-बार दोहराओ।" आज के सोशल मीडिया, टीवी चैनल और राजनीतिक कैंपेन में यही तकनीकें काम करती हैं – फेक न्यूज, सेलेक्टिव फैक्ट्स, फियर मॉन्गरिंग और "असली बनाम नकली" का नैरेटिव। 

दुनिया का सबसे खतरनाक इंसान: किम जोंग उन vs अमेरिका का "शांति दूत" चेहरा

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन को दुनिया भर में "तानाशाह", "पागल", "खतरनाक" कहा जाता है। मीडिया में उनकी तस्वीरें कार्टून जैसी बनाई जाती हैं – मोटा, छोटा, हास्यास्पद। लेकिन सच्चाई क्या है? किम ने किसी विदेशी शहर पर बम नहीं गिराया, किसी देश की जमीन पर कब्जा नहीं किया, लाखों-करोड़ों लोगों की मौत नहीं करवाई। उत्तर कोरिया का न्यूक्लियर प्रोग्राम डिफेंसिव है – अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सैन्य मौजूदगी के सामने अस्तित्व की लड़ाई। 

फिर भी, पश्चिमी मीडिया और ग्लोबल नैरेटिव में किम "दुनिया का सबसे बड़ा खतरा" है। क्यों? क्योंकि प्रोपगंडा ने उन्हें ऐसा बना दिया। 

दूसरी तरफ अमेरिका खुद को "शांति का पैरोकार" बताता है। कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों को नोबेल शांति पुरस्कार मिला – जैसे थियोडोर रूजवेल्ट, जिमी कार्टर, बराक ओबामा। ओबामा को 2009 में पुरस्कार मिला, जब वे अभी राष्ट्रपति बने ही थे। लेकिन उनके कार्यकाल में ड्रोन हमलों से हजारों निर्दोष मारे गए

 – पाकिस्तान, यमन, सोमालिया, अफगानिस्तान में। ओबामा के समय अमेरिका ने 26,000 से ज्यादा बम गिराए। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया – अमेरिकी हस्तक्षेप से लाखों नागरिक मारे गए। फिर भी अमेरिका "मानवाधिकारों का रक्षक" बना रहता है। 

यह प्रोपगंडा है: "हमारी हिंसा न्याय है, उनकी हिंसा आतंकवाद।" मीडिया, हॉलीवुड, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं – सब इस नैरेटिव को दोहराती हैं। 

भारत में मुसलमानों के साथ प्रोपगंडा का खेल भारत में पिछले दस सालों में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। गाय से जुड़ी हिंसा में 2010 से 2017 तक 86% मृतक मुसलमान थे। मोब लिंचिंग, मस्जिद-मदरसा तोड़फोड़, अफवाहों पर हमले – सैकड़ों मामले दर्ज हुए। कई रिपोर्ट्स में 2014 के बाद हिंसा में तेज उछाल आया। 

फिर भी मुख्यधारा का नैरेटिव क्या कहता है? मुसलमान "जिहादी", "कट्टरपंथी", "देशद्रोही"। एक तरफ मोब लिंचिंग करने वाले "संस्कारवान", "अहिंसा परमो धर्म" मानने वाले बताए जाते हैं। "वसुधैव कुटुंबकम" का नारा लगाते हुए भीड़ हिंसा को "गौ-रक्षा" या "राष्ट्रभक्ति" का नाम दे दिया जाता है। 

प्रोपगंडा की तकनीकें यहां साफ दिखती हैं: 

- फियर मॉन्गरिंग: "लव जिहाद", "पॉपुलेशन जिहाद", "लैंड जिहाद" जैसे शब्द फैलाकर डर पैदा करना।

 - सेलेक्टिव रिपोर्टिंग: हिंसा के पीड़ितों को "गैरकानूनी काम" करने वाला दिखाना, जबकि अपराधियों को "भीड़ का गुस्सा"। 

- दोहराव: टीवी डिबेट, सोशल मीडिया, व्हाट्सएप फॉरवर्ड्स से एक ही नैरेटिव बार-बार। 

- अन्यीकरण: मुसलमानों को "अंदर का दुश्मन" बनाना।

 परिणाम? हिंसा सामान्य हो जाती है, और पीड़ित दोषी ठहराए जाते हैं। 

प्रोपगंडा से कैसे बचें? प्रोपगंडा को पहचानना आसान नहीं, क्योंकि यह भावनाओं से काम करता है। लेकिन कुछ सवाल पूछें: 

- सूचना किसने दी? क्या स्रोत विश्वसनीय है?

 - क्या सिर्फ एक तरफ की बात दिखाई जा रही है? 

- भावनाएं उकसाई जा रही हैं – डर, गुस्सा, घृणा?

 - तथ्य क्या कहते हैं, न कि सिर्फ नैरेटिव? 

सच की तलाश में कई स्रोत पढ़ें, इतिहास देखें, और सबसे महत्वपूर्ण – अपनी भावनाओं पर काबू रखें। क्योंकि प्रोपगंडा तभी काम करता है, जब हम बिना सोचे मान लेते हैं। 

आज का दौर सूचना का युग है, लेकिन प्रोपगंडा का भी युग है। जो इसे समझ लेगा, वही सच तक पहुंचेगा। अन्यथा, हम सब किसी न किसी के "इंजीनियर्ड कंसेंट" का हिस्सा बन जाते हैं। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15,2026 
March 15, 2026

"चाय से प्रधानमंत्री तक का सफर: मोदी का 'कर्ज उतारने' का वादा और बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज – असम के चाय बागान मजदूरों ने उठाए सवाल"

"चाय से प्रधानमंत्री तक का सफर: मोदी का 'कर्ज उतारने' का वादा और बढ़ता राष्ट्रीय कर्ज – असम के चाय बागान मजदूरों ने उठाए सवाल"
-Friday World March 15,2026
हाल ही में असम के चाय बागानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा ने एक बार फिर राजनीतिक बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री ने वहां चाय बागान श्रमिकों को भूमि अधिकार (पट्टा) वितरित करते हुए कहा कि वे चाय बेचकर बड़ा हुआ हूं और अब इस समुदाय का "कर्ज उतारने" आए हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा, "आपके द्वारा उगाई गई चाय गुजरात पहुंची, जहां मैंने उसे बेचा। आज मुझे आपके सम्मान का अवसर मिला है, यह मेरे लिए कर्ज चुकाने जैसा है।" यह बयान सुनने में भावुक और प्रेरणादायक लगता है, लेकिन असम के आम नागरिकों और चाय बागान श्रमिकों ने इसे खारिज करते हुए कड़ी आपत्ति जताई। एक श्रमिक ने मीडिया से कहा, 

"आप गुजरात के मुख्यमंत्री बने तब गुजरात का कर्ज कितना था और अब कितना है? प्रधानमंत्री बने तब भारत का कर्ज कितना था और अब कितना है? आप कर्ज उतारने नहीं, कर्ज में डुबोने आए हो। जुमले नहीं, हकीकत पर बात करें।" उन्होंने मीडिया से अपील की कि सच्चाई दिखाए, वरना जन आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है और रोकना मुश्किल हो जाएगा। 

यह घटना सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक नीतियों, कर्ज प्रबंधन और राजनीतिक दावों की गहराई को उजागर करती है। आइए तथ्यों के आधार पर इसकी पड़ताल करें। 

मोदी का चाय बेचने से प्रधानमंत्री बनने का सफर** प्रधानमंत्री मोदी अक्सर अपनी शुरुआती जिंदगी का जिक्र करते हैं – बचपन में चाय बेचना, रेलवे स्टेशन पर काम करना और संघर्ष से ऊपर उठना। असम के चाय बागान मजदूरों से बात करते हुए उन्होंने इसे व्यक्तिगत कनेक्शन बताया। चाय उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, खासकर असम में जहां लाखों मजदूर पीढ़ियों से काम करते आ रहे हैं। इन मजदूरों की स्थिति दयनीय रही है – कम मजदूरी, बुनियादी सुविधाओं की कमी और भूमि अधिकारों से वंचित होना। मोदी सरकार ने अब इन्हें पट्टा देकर "ऐतिहासिक अन्याय" सुधारने का दावा किया है। यह कदम सराहनीय है, लेकिन सवाल कर्ज और आर्थिक प्रबंधन पर हैं। 

गुजरात का कर्ज: मोदी के मुख्यमंत्री काल में क्या हुआ?

 नरेंद्र मोदी अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बने। उस समय राज्य का सार्वजनिक कर्ज लगभग 45,000 से 53,000 करोड़ रुपये के आसपास था (विभिन्न स्रोतों के अनुसार 45,301 करोड़ या 53,000 करोड़)। 2014 में जब वे प्रधानमंत्री बने, तब गुजरात का कर्ज बढ़कर लगभग 2.21 लाख करोड़ रुपये हो गया था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे 1.65 लाख करोड़ से 2.21 लाख करोड़ तक बताया गया है। 

यह वृद्धि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, औद्योगिक विकास और "गुजरात मॉडल" के नाम पर हुई। आलोचक कहते हैं कि यह विकास दिखावटी था, जबकि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्रों पर खर्च कम रहा। गुजरात में कर्ज बढ़ा, लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई – हालांकि कर्ज-जीडीपी अनुपात भी प्रभावित हुआ। 

भारत का राष्ट्रीय कर्ज: 2014 से अब तक का सफर** 2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने, केंद्र सरकार का कुल कर्ज (आंतरिक + बाहरी) लगभग 55-58 लाख करोड़ रुपये था। विभिन्न आधिकारिक और रिपोर्ट्स के अनुसार: 

- मार्च 2014 में केंद्र का कर्ज करीब 58.6 लाख करोड़ रुपये (जीडीपी का 52.2%)। 

- कुछ स्रोतों में 55 लाख करोड़ या 54-58 लाख करोड़ के बीच। 

2025-2026 तक स्थिति: 

- मार्च 2025 तक केंद्र का कर्ज 181-200 लाख करोड़ रुपये पार कर चुका है। 

- 2026 के अंत तक अनुमानित 197-214 लाख करोड़ रुपये (बजट अनुमानों के अनुसार)। 

- जीडीपी के प्रतिशत में कर्ज 56-81% के बीच रहा, कोविड के दौरान 89% तक पहुंचा, अब घटकर 80% के आसपास। 

- बाहरी कर्ज 2014 में करीब 457 बिलियन डॉलर (लगभग 30 लाख करोड़ रुपये) से बढ़कर 2023-2025 में 646-736 बिलियन डॉलर हो गया। 

यह वृद्धि तीन गुना से अधिक है। कोविड महामारी, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, सब्सिडी और आर्थिक पैकेज के कारण कर्ज बढ़ा। सरकार का दावा है कि यह निवेश विकास के लिए जरूरी था – जीडीपी ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर और गरीबी उन्मूलन में प्रगति हुई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि कर्ज का बोझ आम आदमी पर पड़ रहा है – प्रति व्यक्ति कर्ज 2014 के 43,000 रुपये से बढ़कर अब 1.3-1.5 लाख रुपये के आसपास। **श्रमिकों का सवाल जायज क्यों है?

श्रमिकों ने ठीक कहा – अगर चाय बेचकर प्रधानमंत्री बने, तो कर्ज क्यों बढ़ा? गुजरात में मुख्यमंत्री बनने पर कर्ज बढ़ा, देश में प्रधानमंत्री बनने पर और ज्यादा। "कर्ज उतारने" का दावा भावुक लगता है, लेकिन आंकड़े उलटे कहानी बयां करते हैं। असम के चाय बागान मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए पट्टा वितरण अच्छा कदम है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक नीतियां मजदूरों, किसानों और आम नागरिकों के लिए कितनी फायदेमंद हैं? 

आगे क्या?** यह बहस सिर्फ असम तक सीमित नहीं। मीडिया को चाहिए कि हकीकत दिखाए – कर्ज बढ़ने के कारण, विकास के फायदे और नुकसान दोनों। अगर नागरिक आक्रोश सड़कों पर उतरा, तो लोकतंत्र में सवाल उठाना उनका हक है। राजनीति में जुमले चल सकते हैं, लेकिन हकीकत से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।

 भारत एक उभरती अर्थव्यवस्था है। कर्ज प्रबंधन, निवेश और विकास का संतुलन जरूरी है। असम के इस संवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है – क्या हम विकास के नाम पर कर्ज के बोझ तले दब रहे हैं? समय है पारदर्शी बहस का, ताकि "चाय वाला" का सपना सच हो, न कि सिर्फ कहानी बने।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 15,2026
March 15, 2026

Unemployment in India: The Reality in BJP-Ruled States and the Role of Political Opposition

Unemployment in India: The Reality in BJP-Ruled States and the Role of Political Opposition-Friday World March 15, 2026
Unemployment has remained a central issue in India's political discourse for over a decade. In the 2014 Lok Sabha elections, the Bharatiya Janata Party (BJP) promised to create 2 crore new jobs every year. While additions to EPFO (Employees' Provident Fund Organisation) and NPS (National Pension System) showed some progress, the annual target of 2 crore jobs was never achieved. In 2022, the Prime Minister's Office announced plans to fill 10 lakh government vacancies, far short of the original promise. At the national level, millions of positions in the public sector remain vacant. 

This situation extends beyond the central government. Several states ruled by the BJP, including Gujarat and Madhya Pradesh—considered strongholds—continue to face significant unemployment challenges. Young people in these states often struggle to find stable employment. Corruption scandals, such as the Vyapam scam in Madhya Pradesh and recent allegations related to MGNREGA in Gujarat, have further complicated the picture. At the same time, questions arise about the effectiveness of the main opposition party, Congress, in highlighting and addressing these issues. 

Unemployment in BJP-Ruled States: Examples from Gujarat and Madhya Pradesh

→ Gujarat is frequently cited as a model of development. According to state government data and the Periodic Labour Force Survey (PLFS) for 2023-24, the unemployment rate in Gujarat remained low, ranging between 1.1% and 2.2%, well below the national average. Recent updates (as of early 2026) indicate Gujarat's unemployment rate stands at around 1.1%, reflecting strong efforts in employment generation across sectors. 

→ However, these figures primarily cover the formal sector. In rural and informal areas, the situation differs. Youth continue to face shortages in government jobs, ITI placements, and private sector opportunities. Despite industrial growth, skill mismatches and limited quality jobs persist. The state has emphasized skilling programs, with projections needing nearly one crore additional skilled workers by 2030. 

→ In Madhya Pradesh, industrial development has taken place, but unemployment rates have occasionally exceeded the national average in past surveys. Educated youth compete fiercely for positions in SSC, Patwari, police recruitment, and similar exams, yet irregularities and scams disrupt the process for millions. 

→ In both states, BJP governments have been in power for extended periods. The failure to fully meet national job creation targets has increased pressure on state-level initiatives. EPFO additions have been notable in organized sectors, but the informal sector—where most Indians work—lacks quality and stability in employment. 

The Vyapam Scam in Madhya Pradesh: Deep-Rooted Corruption

→ The Vyapam (Madhya Pradesh Professional Examination Board) scam ranks among India's largest corruption cases. Originating in the 1990s, it involved irregularities in admissions and recruitments for medical, engineering, police, and other government jobs. Middlemen, officials, politicians, and candidates colluded to manipulate ranks for money. 

→ Investigations led to over 2,000 arrests. The most shocking aspect was the series of unnatural deaths—official figures cite 23 to 40, while unofficial estimates exceed 100. These included murders of witnesses, road accidents, and suicides involving accused individuals, witnesses, journalists, and officials. In 2015, the Supreme Court transferred all cases to the CBI. 

→ The scam symbolized betrayal of youth aspirations. Millions worked hard, only for merit to be overridden by money and connections. It surfaced during BJP's tenure in the state, raising ongoing questions about the pace of investigation and accountability for the deaths. 

Congress's Role: Neglect or Weak Opposition?

→ In major scandals like Vyapam, Congress's performance as opposition has faced criticism. The party demanded CBI probes and pushed for SITs, but failed to elevate the issue to a national or international level to draw widespread public attention. In Madhya Pradesh and at the Centre, Congress struggled to build sustained pressure with concrete evidence and campaigns. 

→ In Gujarat, Congress's image has been controversial, with frequent accusations of "settings" or tacit understandings with BJP. From older cases linked to Vanvasi Kalyan Ashram to recent MGNREGA allegations, Congress raised charges but lagged in follow-through, public mobilization, or decisive action. 

→ A notable recent example is the MGNREGA scam in Dahod district, Gujarat (2025), where sons of a BJP minister were arrested in connection with a ₹71 crore fraud involving fake payments and forged documents. Multiple FIRs were filed, and wage liabilities mounted. Congress demanded the minister's resignation and highlighted the issue, but its success in turning it into a major national campaign remained limited. Earlier MGNREGA irregularities also saw similar patterns—allegations raised, but often confined to rhetoric. 

→ Congress needed to play a stronger opposition role by consistently pursuing investigations and building public awareness. The inability to do so effectively has impacted its credibility on governance and anti-corruption fronts. **The Way Forward: Solutions to the Unemployment Crisis** 

→ **Transparent Recruitment Processes** → Examinations for SSC, PSC, Railways, and similar bodies require enhanced digital monitoring, CCTV surveillance, and strict anti-leakage measures to restore trust.

 → Skill Development Focus

 → Emphasis on industry growth in the private sector, along with widespread skill training, re-skilling, and up-skilling programs to bridge mismatches between education and job market needs. 

→ Informal Sector Reforms

 → Schemes like MGNREGA demand greater transparency through biometric attendance, direct benefit transfers, and audits to prevent leakages and ensure genuine employment. 

→ Opposition Responsibility

→ Beyond accusations, the opposition must pursue rigorous investigations, launch public movements, and hold governments accountable through sustained campaigns. 

→ Government Challenge

 → Moving beyond unfulfilled promises like 2 crore annual jobs, focus on measurable, real job creation across sectors, including MSMEs and rural industries. India's youth are no longer swayed by slogans alone—they seek tangible results. States like Gujarat and Madhya Pradesh have seen development, but shadows of unemployment and corruption linger. The opposition must also reflect on its shortcomings. True change will come when all political parties prioritize employment over short-term political gains, working together for sustainable job creation and transparent governance. 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 15, 2026
March 15, 2026

भारत में बेरोजगारी का सवाल: BJP शासित राज्यों की हकीकत और राजनीतिक विपक्ष की विवादास्पद भूमिका

भारत में बेरोजगारी का सवाल: BJP शासित राज्यों की हकीकत और राजनीतिक विपक्ष की विवादास्पद भूमिका-Friday World March 15,3026
भारत में रोजगार का मुद्दा पिछले एक दशक से राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बड़े वादे किए थे – हर साल 2 करोड़ नई नौकरियां। लेकिन EPFO (Employees' Provident Fund Organisation) और NPS (National Pension System) में नए जोड़ दिखे जरूर, पर वार्षिक 2 करोड़ का लक्ष्य कभी पूरा नहीं हुआ। 2022 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने 10 लाख सरकारी नौकरियां भरने की बात कही, जबकि मूल वादा इससे कहीं बड़ा था। राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक क्षेत्र में अभी भी लाखों पद खाली पड़े हैं।

 यह स्थिति सिर्फ केंद्र तक सीमित नहीं है। BJP शासित कई राज्यों में भी बेरोजगारी एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्य, जो BJP के मजबूत गढ़ माने जाते हैं, वहां भी युवा रोजगार की तलाश में भटकते नजर आते हैं। इन राज्यों में भ्रष्टाचार के मामले भी समय-समय पर सुर्खियां बटोरते रहे हैं, जैसे मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला और गुजरात में मनरेगा से जुड़े हालिया आरोप। साथ ही, कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं – क्या वह इन मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा पाई है? 

BJP शासित राज्यों में बेरोजगारी: गुजरात और मध्य प्रदेश का उदाहरण 

गुजरात को अक्सर विकास का मॉडल बताया जाता है। राज्य सरकार के आंकड़ों और PLFS (Periodic Labour Force Survey) के अनुसार, 2023-24 में गुजरात में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी कम रही – लगभग 1.1% से 2.2% के बीच। लेकिन यह आंकड़े औपचारिक क्षेत्र पर ज्यादा केंद्रित हैं। ग्रामीण और असंगठित क्षेत्र में स्थिति अलग है। युवा अभी भी सरकारी नौकरियों, ITI जॉब्स और प्राइवेट सेक्टर में अवसरों की कमी से जूझ रहे हैं। 

मध्य प्रदेश में भी स्थिति बेहतर नहीं है। राज्य में औद्योगिक विकास हुआ है, लेकिन बेरोजगारी दर कई बार राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही। शिक्षित युवा SSC, पटवारी, पुलिस भर्ती जैसी परीक्षाओं में भाग लेते हैं, लेकिन घोटालों और अनियमितताओं के कारण लाखों प्रभावित होते हैं। 

इन राज्यों में BJP की सरकारें लंबे समय से हैं, फिर भी रोजगार सृजन के बड़े वादे पूरे नहीं हो पाए। केंद्र का 2 करोड़ वार्षिक लक्ष्य अधूरा रहने से राज्यों पर भी दबाव बढ़ा। EPFO में नए सदस्य जुड़े, लेकिन यह मुख्य रूप से संगठित क्षेत्र तक सीमित रहा। असंगठित क्षेत्र, जहां अधिकांश भारतीय काम करते हैं, वहां रोजगार की गुणवत्ता और स्थिरता की कमी बनी हुई है। 

मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला: भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें मध्य प्रदेश का Vyapam (मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल) घोटाला भारतीय इतिहास के सबसे बड़े भ्रष्टाचार कांडों में से एक है। 1990 के दशक से चला यह घोटाला मेडिकल, इंजीनियरिंग, पुलिस और अन्य सरकारी नौकरियों में अनुचित तरीके से प्रवेश और भर्ती से जुड़ा था। मध्यस्थ, अधिकारी, राजनेता और उम्मीदवार मिलकर पैसे लेकर रैंक बदलते थे।

 इस घोटाले की जांच में 2000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन सबसे चौंकाने वाली बात 23 से 40 (औपचारिक आंकड़े) से ज्यादा 'अप्राकृतिक मौतें' थीं – आरोपी, गवाह, पत्रकार और अधिकारी शामिल। अनौपचारिक अनुमान 100 से ऊपर बताते हैं। इनमें गवाहों की हत्या, सड़क हादसे, आत्महत्या जैसी मौतें शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में सभी मामलों को CBI को सौंप दिया था।

 यह घोटाला युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का प्रतीक बना। लाखों उम्मीदवारों ने मेहनत की, लेकिन योग्यता के बजाय पैसे और सेटिंग ने फैसला किया। BJP सरकार के समय यह घोटाला उजागर हुआ, लेकिन जांच की गति और मौतों पर सवाल बने रहे। 

कांग्रेस की भूमिका: नजरअंदाज या कमजोर विरोध? व्यापम जैसे बड़े घोटाले में कांग्रेस की भूमिका पर गंभीर सवाल हैं। कांग्रेस ने CBI जांच की मांग की, SIT बनवाई, लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने में नाकाम रही। विपक्ष के रूप में कांग्रेस मध्य प्रदेश और केंद्र में मजबूत आवाज नहीं उठा पाई। कई नेता आरोप लगाते रहे, लेकिन ठोस सबूतों के साथ लगातार दबाव बनाने में कमी रही। 

गुजरात में भी कांग्रेस की छवि विवादास्पद रही। BJP के साथ 'सेटिंग' के आरोप आम हैं। पुरानी वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े मामलों से लेकर हाल के मनरेगा घोटाले तक, कांग्रेस ने आरोप लगाए, लेकिन कार्रवाई या जन-जागरण में पीछे रही।

 हाल ही में गुजरात के दाहोद जिले में मनरेगा (MGNREGA) से जुड़े घोटाले के आरोप लगे – एक BJP मंत्री के बेटों की गिरफ्तारी हुई, करोड़ों की हेराफेरी का दावा। कांग्रेस ने मंत्री के इस्तीफे की मांग की, लेकिन इसे बड़ा मुद्दा बनाने में सीमित सफलता मिली। पहले भी मनरेगा में अनियमितताओं के आरोप लगे, लेकिन कांग्रेस मुख्य रूप से 'सेटिंग' तक सीमित रही। 

कांग्रेस को विपक्ष की भूमिका में मजबूत होकर इन मुद्दों को उठाना चाहिए था। राष्ट्रीय स्तर पर व्यापम जैसा मामला उठाकर आम नागरिक का ध्यान खींच सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल उठे।

आगे की राह: रोजगार संकट का समाधान क्या? 

- **पारदर्शी भर्ती**: SSC, PSC, रेलवे जैसी परीक्षाओं में डिजिटल और CCTV निगरानी बढ़ानी चाहिए। 

- **स्किल डेवलपमेंट**: प्राइवेट सेक्टर में इंडस्ट्री ग्रोथ और स्किल ट्रेनिंग पर फोकस। 

- **असंगठित क्षेत्र**: मनरेगा जैसी योजनाओं में पारदर्शिता, बायोमेट्रिक अटेंडेंस।

 - **विपक्ष की जिम्मेदारी**: सिर्फ आरोप नहीं, ठोस जांच और जन-आंदोलन जरूरी।

 - **सरकार की चुनौती**: 2 करोड़ वाले वादे से आगे बढ़कर वास्तविक रोजगार सृजन। 

भारत के युवा अब जुमलों से नहीं, परिणामों से प्रभावित होते हैं। गुजरात-मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में विकास हुआ है, लेकिन बेरोजगारी और भ्रष्टाचार की छाया बनी हुई है। विपक्ष को भी अपनी कमजोरियों पर विचार करना होगा। असली बदलाव तब आएगा जब सभी दल मिलकर रोजगार को प्राथमिकता देंगे, न कि राजनीतिक लाभ के लिए। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 15,3026