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June 06, 2026
ममता बनर्जी की बड़ी भूल सुधार! TMC में बगावत के बाद 'भतीजे' अभिषेक का कद घटाया — दो नए संयुक्त महासचिवों की नियुक्ति से संगठन में नया संतुलन
ममता बनर्जी की बड़ी भूल सुधार! TMC में बगावत के बाद 'भतीजे' अभिषेक का कद घटाया — दो नए संयुक्त महासचिवों की नियुक्ति से संगठन में नया संतुलन
- Friday World 6 Jun 2026
कोलकाता। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में पिछले कई हफ्तों से चल रहे अभूतपूर्व आंतरिक विद्रोह के बीच पार्टी सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संगठन में व्यापक बदलाव करके शिस्त बहाल करने और असंतोष को शांत करने का प्रयास किया है। 2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद पार्टी में फूट साफ दिख रही थी, जिसमें ज्यादातर गुस्सा ममता के भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर केंद्रित था।
ममता बनर्जी ने अब 'भाईपो' के एकछत्र दबदबे को कम करते हुए दो अनुभवी नेताओं — डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन— को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव (National Joint Secretaries) बनाकर अभिषेक के साथ काम करने को कहा है। यह फैसला पार्टी के राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक के बाद लिया गया, जिसमें ममता ने स्पष्ट संदेश दिया कि अब कोई भी एक व्यक्ति अकेले फैसले नहीं ले पाएगा।
बगावत की पृष्ठभूमि: चुनावी हार और 'अभिषेक फोबिया'
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में TMC को भारी हार का सामना करना पड़ा। भाजपा ने 208 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि TMC मात्र 80 सीटों तक सिमट गई। इस हार के बाद पार्टी के अंदर लंबे समय से दबा असंतोष फूट पड़ा। ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता अभिषेक बनर्जी की 'कॉर्पोरेट स्टाइल' वाली कार्यपद्धति, उम्मीदवार चयन और युवा नेताओं को तरजीह देने को हार का प्रमुख कारण मानते थे।
विद्रोह इतना गहरा था कि 80 विधायकों में से 58 ने विद्रोह का झंडा उठाया। कई सांसदों और नेताओं ने खुलकर अभिषेक की आलोचना की। 'भाईपो चोर' जैसे नारे लगे और पार्टी में 'अभिषेक बनर्जी बनाम पुराने गार्ड' का टकराव साफ नजर आने लगा। ममता बनर्जी की कलकत्ता स्थित कालीघाट आवास पर हुई बैठक में भी बेहद कम उपस्थिति रही, जो पार्टी की स्थिति की गंभीरता दर्शाती थी।
ममता का मास्टर स्ट्रोक: अभिषेक का कद घटाया, लेकिन हटाया नहीं
ममता बनर्जी ने समझदारी दिखाते हुए अभिषेक को पूरी तरह हटाने के बजाय उनका कद संतुलित करने का रास्ता चुना।
- **अभिषेक बनर्जी राष्ट्रीय महासचिव बने रहेंगे।
- डेरेक ओ'ब्रायन (राज्यसभा सांसद और संसदीय दल के नेता) और **डोला सेन** (राज्यसभा सांसद) को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव बनाया गया। दोनों ममता के करीबी और अनुभवी नेता माने जाते हैं।
- अब अभिषेक अकेले फैसले नहीं ले सकेंगे। तीनों नेताओं के बीच समन्वय से संगठनात्मक कामकाज चलेगा।
इसके अलावा, पश्चिम बंगाल TMC की अध्यक्षता में भी बदलाव किया गया। सबrata बख्शी के अस्वस्थ होने के कारण **चंद्रिमा भट्टाचार्य** को नई अध्यक्ष बनाया गया। पार्टी की सभी कमेटियों को भंग कर नई टीम गठित करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
क्यों जरूरी था यह बदलाव?
TMC के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर कई शिकायतें थीं:
- युवा नेताओं को अत्यधिक तरजीह और पुराने, अनुभवी नेताओं को किनारे करने का आरोप।
- उम्मीदवार चयन में परिवारवाद और निकटतम सहयोगियों को प्राथमिकता।
- पार्टी को 'कॉर्पोरेट हाउस' की तरह चलाने की कोशिश, जबकि बंगाल की राजनीति स्थानीय मुद्दों और जन-संपर्क पर आधारित है।
- कुछ नेताओं ने तो यह तक कहा कि अभिषेक की वजह से पार्टी 'धीरे-धीरे खत्म' हो रही थी।
ममता बनर्जी ने इन शिकायतों को गंभीरता से लिया। उन्होंने पुराने नेताओं को फिर से महत्व देने और संगठन को लोकतांत्रिक ढंग से चलाने का संकेत दिया है।
TMC के भविष्य पर असर
यह बदलाव पार्टी को एकजुट रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, विद्रोही विधायकों का एक गुट अभी भी अलग रुख अपनाए हुए है। ममता बनर्जी ने स्पष्ट किया है कि पार्टी एक रहेगी और वे सभी को साथ लेकर चलेंगी।
डेरेक ओ'ब्रायन और डोला सेन जैसे नेताओं की नियुक्ति से पार्टी के संसदीय अनुभव वाले नेताओं को महत्व मिला है, जो युवा-पुराने संतुलन को बहाल करने में मदद करेगा।
ममता बनर्जी की राजनीतिक समझदारी
ममता बनर्जी लंबे समय से बंगाल की राजनीति की 'अजेय' नेता मानी जाती हैं। 2011 में वामपंथी शासन का 34 साल पुराना किला तोड़ने वाली ममता ने कई संकटों का सामना किया है। इस बार भी उन्होंने संकट को अवसर में बदलने की कोशिश की है।
उनके समर्थक कहते हैं कि यह फैसला 'भूल सुधार' है। उन्होंने परिवारवाद की आलोचना को ध्यान में रखते हुए संगठन को मजबूत करने का रास्ता चुना। विपक्षी भाजपा इसे TMC के टूटने का संकेत बता रही है, लेकिन ममता का कहना है कि पार्टी मजबूत होकर उभरेगी।
TMC अब विधानसभा में विपक्ष की भूमिका निभाएगी। पार्टी का फोकस 2029 के लोकसभा चुनाव और भविष्य की रणनीति पर होगा। संगठनात्मक बदलाव के साथ ममता बनर्जी जन-संपर्क बढ़ाने और कार्यकर्ताओं को फिर से जोड़ने की कोशिश करेंगी।
अभिषेक बनर्जी के लिए भी यह सबक है — अब उन्हें टीम वर्क के साथ काम करना होगा।
TMC में यह 360 डिग्री का बदलाव ममता बनर्जी की सूझबूझ को दर्शाता है। 'भतीजे' का कद घटाकर उन्होंने पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को संदेश दिया कि कोई भी अपरिहार्य नहीं है। चाहे कितनी भी बगावत हो, ममता अभी भी TMC की धुरी हैं।
यह फैसला न केवल आंतरिक विद्रोह को नियंत्रित करने का प्रयास है, बल्कि TMC को नई ऊर्जा और नई दिशा देने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। बंगाल की राजनीति में अब देखना यह होगा कि यह नया संतुलन कितना टिकता है और पार्टी कितनी जल्दी खुद को फिर से खड़ा कर पाती है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 6 Jun 2026