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Friday, 12 June 2026

June 12, 2026

एक साल बीता, घाव नहीं भरा: प्लेन क्रैश में बेटी खोने वाली मां का दिल दहला देने वाला आक्रोश

एक साल बीता, घाव नहीं भरा: प्लेन क्रैश में बेटी खोने वाली मां का दिल दहला देने वाला आक्रोश
- Friday World 12 Jun 2026
अमदावाद। 12 जून 2026। ठीक एक साल पहले आज के दिन अहमदाबाद एयरपोर्ट से उड़ान भरते ही एक विमान दुर्घटना ने न सिर्फ दर्जनों परिवारों की दुनिया उजाड़ दी, बल्कि कई मांओं की कोख हमेशा के लिए सूनी कर दी। उनमें से एक हैं अमरेली की गीताबहन पडसाला। उनकी इकलौती लाडली, 25 वर्षीय रिद्धि पडसाला उस विमान में सवार थी, जो लंदन जा रही थी। 

रिद्धि की मां आज भी उस आखिरी विदाई को याद करके टूट जाती हैं। एयरपोर्ट पर बेटी ने मुस्कुराते हुए कहा था- “तुम सब आधी रात तक जागे हो, अब घर जाकर सो जाओ। मैं प्लेन में सो जाऊंगी और लंदन पहुंचकर फोन करूंगी।” लेकिन वो फोन कभी नहीं आया। उसके बजाय मौत का संदेश आया।

 आखिरी मुलाकात और अनंत विदाई

मई 2025 में रिद्धि भारत आई थी। लंदन में स्थायी रूप से बस चुकी अपनी सास-ससुर और पति से मिलने के बाद वह परिवार के साथ कुछ दिन बिताने अमरेली आई थी। 12 जून की सुबह परिवार उसे छोड़ने एयरपोर्ट पहुंचा। सामान चेक-इन कराने के बाद रिद्धि ने मां को गले लगाया और कहा, “चिंता मत करना मम्मी, सब ठीक रहेगा।”

परिवार अभी सड़क पर ही था कि खबर आ गई- प्लेन क्रैश हो गया है। 

गीताबहन की आवाज अभी भी कांपती है जब वे बताती हैं, “हम कार में थे। अचानक फोन पर खबर आई। लगा जैसे आसमान फट पड़ा हो। हम भागते हुए वापस एयरपोर्ट पहुंचे, लेकिन वहां तो सिर्फ धुआं और चीख-पुकार थी।”

पांच दिन तक परिवार ने मौत की घड़ी में सांसें रोके रखीं। डीएनए टेस्ट के बाद ही रिद्धि की शिनाख्त हो सकी। अमरेली लाकर अंतिम संस्कार किया गया। पूरा गांव और आसपास के इलाके शोक में डूब गए। रिद्धि परिवार की इकलौती बेटी थी- पढ़ी-लिखी, होनहार और सपनों से भरी।

 जामाई का नया जीवन, मां का टूटा सपना

सबसे दर्दनाक मोड़ कहानी का वो हिस्सा है जिसे सुनकर किसी का भी कलेजा कांप जाए। 

गीताबहन आंसू पोछते हुए बताती हैं, “दुनिया कहती है समय के साथ सब ठीक हो जाता है। लेकिन मां के लिए समय रुक गया है। हमारी बेटी चली गई, लेकिन उसका पति... उसने तो सिर्फ छह महीने में दूसरी शादी कर ली।”

रिद्धि के पति, जो मूल रूप से राजकोट के रहने वाले हैं और लंदन में रहते हैं, को पत्नी की मौत पर विमान कंपनी और सरकार की तरफ से कुल **1.25 करोड़ रुपये** का मुआवजा मिला। गीताबहन आरोप लगाती हैं कि यह राशि मिलते ही जामाई ने नया जीवन शुरू कर दिया। 

“प्रो-वेडिंग फोटोशूट भी करा लिया। हमारा सब कुछ लुट गया। बेटी गई, सपने गए, और जो थोड़ा बहुत सहारा था, वो भी चला गया। हमने कुछ नहीं मांगा, न पैसा, न सहायता। बस सच जानना चाहते हैं।”

ब्लैक बॉक्स की मांग, क्यों छिपा रहे हैं सच?

गीताबहन पडसाला अब सिर्फ एक मां नहीं, बल्कि कई पीड़ित परिवारों की आवाज बन गई हैं। उन्होंने सरकार से सख्त मांग की है- प्लेन का ब्लैक बॉक्स सार्वजनिक किया जाए।

“हमें आर्थिक मदद नहीं चाहिए। हमें सिर्फ सच चाहिए। यह दुर्घटना क्यों हुई? पायलट की गलती? तकनीकी खराबी? या कोई बड़ी लापरवाही? अगर हम जान लें तो शायद भविष्य में किसी दूसरी मां की गोद खाली न हो।”

विमान दुर्घटना की जांच अभी भी चल रही है। लेकिन पीड़ित परिवारों का कहना है कि पारदर्शिता की कमी उन्हें और अधिक पीड़ा दे रही है। एक साल बीत गया, लेकिन ब्लैक बॉक्स डेटा या अंतिम रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है।

 रिद्धि कैसी थी?

परिवार वाले रिद्धि को “घर की रोशनी” कहते थे। स्कूल-कॉलेज में हमेशा टॉपर रही। शादी के बाद लंदन में नौकरी भी करने लगी थी। सपना था कि कुछ साल बाद मां-बाप को भी लंदन बुलाकर रखेंगी। 

“वह कहती थी- मम्मी, तुम वहां आकर आराम से रहना। मैं सब संभाल लूंगी।” गीताबहन मुस्कुराते हुए याद करती हैं, फिर उनकी आंखें भर आती हैं।

 ऐसे होते हैं मां के आंसू

एक साल बाद भी गीताबहन की आंखों में आंसू नहीं सूखे। घर में रिद्धि की तस्वीरें हर तरफ हैं। उसकी अलमारी अभी भी वैसी की वैसी है। कपड़े, किताबें, छोटी-छोटी चीजें- सब कुछ मौजूद है, बस वह खुद नहीं है।

“रात को नींद नहीं आती। सपने में आती है और कहती है- मम्मी मत रोना। लेकिन मैं कैसे न रोऊं? मेरा तो पूरा जहां उजड़ गया।”

पड़ोस की महिलाएं बताती हैं कि गीताबहन पहले बहुत हंसमुख थीं। अब चुप रहती हैं। कभी-कभी अकेले में रिद्धि की पुरानी वीडियो देखती हैं और रोती हैं।

aviation safety पर सवाल

यह दुर्घटना सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे aviation क्षेत्र के लिए बड़े सवाल खड़े करती है। भारत में बढ़ते एयर ट्रैफिक के बीच सुरक्षा मानकों पर कितना ध्यान दिया जा रहा है? पायलट ट्रेनिंग, विमान रखरखाव, एयर ट्रैफिक कंट्रोल- हर कड़ी पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

पीड़ित परिवारों का कहना है कि मुआवजे के नाम पर उन्हें चुप करा दिया जाता है, लेकिन असली न्याय तो सच का पता लगना और दोषियों पर कार्रवाई होना है।

अंतिम अपील

गीताबहन पडसाला की अपील साफ है:

“सरकार से गुजारिश है- ब्लैक बॉक्स खोलिए। रिपोर्ट जारी कीजिए। दोषी चाहे कोई भी हो, सजा दीजिए। ताकि कोई दूसरी रिद्धि इस तरह अपनी जिंदगी न गंवाए।”

एक मां का यह दर्द, एक परिवार का यह टूटना, सिर्फ शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। यह समाज के लिए सबक है कि विकास के साथ सुरक्षा को भी उतना ही महत्व देना चाहिए। 

रिद्धि चली गई, लेकिन उसकी यादें और उसकी मां का आक्रोश आज भी जिंदा है। 

एक साल बीत गया... लेकिन दर्द आज भी ताजा है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 12 Jun 2026
June 12, 2026

कोलकाता में 4000 EVM जलकर राख: आग की रहस्यमयी छलांग या साजिश की आंधी?

कोलकाता में 4000 EVM जलकर राख: आग की रहस्यमयी छलांग या साजिश की आंधी?
- Friday World 12 Jun 2026
कोलकाता के अलीपुर इलाके में एक सरकारी इमारत में लगी भीषण आग ने न केवल हजारों इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को भस्म कर दिया, बल्कि लोकतंत्र की credibility पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां आग की असामान्य फैलाव की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, वहीं विपक्ष और कुछ मंत्री खुद साजिश की आशंका जता रहे हैं। क्या यह महज एक दुर्घटना थी या चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की कोई बड़ी चाल? इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है।

 घटना का क्रम: जब आग ने मंजिलें छलांग लगाईं

बुधवार सुबह दक्षिण कोलकाता के अलीपुर क्षेत्र में दक्षिण 24 परगना जिला परिषद की नौ-दस मंजिला प्रशासनिक इमारत में आग लगी। शुरुआती रिपोर्ट्स के मुताबिक आग दूसरी और तीसरी मंजिल पर भड़की, लेकिन जल्द ही यह सातवीं, आठवीं, नवीं और दसवीं मंजिल तक पहुंच गई—जहां EVM मशीनें संग्रहित थीं। चौथी, पांचवीं और छठी मंजिल अपेक्षाकृत कम प्रभावित रहीं। यह पैटर्न सामान्य आग की भौतिकी से मेल नहीं खाता।

पश्चिम बंगाल के अग्निशमन एवं आपातकालीन सेवाओं के राज्य मंत्री **कौशिक चौधरी** ने खुद घटनास्थल का दौरा किया और हैरान कर देने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा, “यह सामान्य आग नहीं लगती। हम जांच कर रहे हैं कि इसमें कोई sabotage (तोड़-फोड़) तो नहीं है। आग कैसे नीचे की मंजिलों से ऊपर पहुंची, जबकि बीच की मंजिलें बची रहीं?” 

मंत्री के इस बयान ने आग को राजनीतिक रंग दे दिया। FIR दर्ज हो चुकी है, फॉरेंसिक टीम सैंपल ले रही है, और पूरी इमारत को सील कर दिया गया है।

 4000 EVM का नुकसान: लोकतंत्र की कीमत

इस आग में करीब **4000 EVM** पूरी तरह नष्ट हो गए। ये मशीनें हाल ही में संपन्न पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में 10 विधानसभा क्षेत्रों में इस्तेमाल हुई थीं। इनमें कंट्रोल यूनिट, बैलट यूनिट और VVPAT मशीनें शामिल हैं। चुनाव आयोग के लिए EVM सुरक्षा हमेशा से संवेदनशील मुद्दा रहा है। इतनी बड़ी संख्या में मशीनों का नाश न केवल आर्थिक नुकसान है, बल्कि चुनावी रिकॉर्ड्स और संभावित recount की जरूरत पर भी असर डाल सकता है।

विपक्षी दलों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। भाजपा समेत अन्य विपक्षी नेताओं ने इसे “बड़ी साजिश” करार दिया। कुछ ने पूछा—क्या हारने वाले पक्ष ने सबूत मिटाने की कोशिश की? दूसरी तरफ सत्ताधारी पक्ष ने इसे दुर्घटना बताया, लेकिन मंत्री का बयान उनके अपने तंत्र में उठे सवालों को उजागर करता है।

 आग की वजह: दुर्घटना, लापरवाही या साजिश?

आग के कारणों पर अभी फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार है। संभावित वजहें हो सकती हैं:

- बिजली शॉर्ट सर्किट: पुरानी इमारत में वायरिंग की हालत खराब हो सकती है।

- स्टोरेज में लापरवाही: EVM रखने की जगह पर inflammable सामग्री का होना।

- बाहरी हस्तक्षेप: कोई जानबूझकर आग लगाना।

मंत्री चौधरी ने जोर देकर कहा कि आग की “skip floor” पैटर्न असामान्य है। आग भौतिक रूप से नीचे से ऊपर चढ़ती है, लेकिन बीच की मंजिलें बची रहना वाकई संदेहास्पद है। फॉरेंसिक लैब में आग के पॉइंट ऑफ ओरिजिन, accelerant (आग फैलाने वाले पदार्थ) के निशान और CCTV फुटेज की जांच हो रही है।

ऐसी घटनाओं का इतिहास: क्या EVM हमेशा विवादों में रहती हैं?

EVM मशीनें भारत में लोकतंत्र का आधार बनी हैं, लेकिन हर चुनाव के बाद उन पर सवाल उठते रहते हैं। 2019 के लोकसभा चुनावों से लेकर विभिन्न राज्य चुनावों तक, विपक्ष ने EVM हैकिंग, tampering के आरोप लगाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार VVPAT स्लिप वेरिफिकेशन पर दिशा-निर्देश दिए हैं।

पश्चिम बंगाल में हालिया चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत की चर्चा के बीच यह आग और भी संदिग्ध लग रही है। क्या यह हार का बदला था? या फिर नई सरकार के लिए पुराने रिकॉर्ड मिटाने की कोशिश? राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि EVM जलने से recount की संभावना कम हो जाती है, जिससे विवाद और बढ़ सकता है।

 सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल

सरकारी इमारत में इतनी महत्वपूर्ण मशीनें रखना और उनकी सुरक्षा का जिम्मा किसका था? CCTV काम कर रहा था या नहीं? फायर सेफ्टी नॉर्म्स का पालन हुआ था? क्या स्टोरेज रूम fire-proof था? ये सवाल न केवल पश्चिम बंगाल सरकार बल्कि पूरे देश के चुनाव आयोग और गृह मंत्रालय के समक्ष हैं।

चुनाव आयोग को अब नए सिरे से EVM स्टोरेज गाइडलाइंस जारी करने की जरूरत है। देशभर में हजारों EVM भंडारित हैं। अगर एक जगह इतनी बड़ी घटना हो सकती है, तो दूसरी जगहों पर क्या सुरक्षा है?

 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: हंगामा और आरोप-प्रत्यारोप

घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई। 
- भाजपा नेताओं ने इसे “TMC की साजिश” बताया।
- कुछ कांग्रेस नेताओं ने कहा कि लोकतंत्र पर हमला हुआ है।
- TMC की ओर से कुछ नेताओं ने इसे “दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना” करार दिया, लेकिन मंत्री का बयान उनके पक्ष को कमजोर कर रहा है।

सोशल मीडिया पर #KolkataEVMFire और #EVMSabotage जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। लोग अपनी-अपनी थ्योरी दे रहे हैं—कुछ कहते हैं यह climate change से जुड़ी घटना है (जो बेतुका है), तो कुछ इसे deep state की चाल मानते हैं।

 आगे क्या? जांच और सबक

पुलिस और फॉरेंसिक टीम की रिपोर्ट आने में कुछ दिन लग सकते हैं। अगर sabotage साबित होता है तो यह बड़ा राजनीतिक भूचाल ला सकता है। अगर दुर्घटना है तो लापरवाही की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

इस घटना से कई सबक निकलते हैं:
1. EVM स्टोरेज को और मजबूत fire-proof बंकरों में किया जाए।
2. डिजिटल बैकअप और VVPAT पेपर ट्रेल को प्राथमिकता दी जाए।
3. सरकारी इमारतों की फायर ऑडिट नियमित हो।
4. राजनीतिक दलों को चुनावी हार-जीत को स्वीकार करने की परिपक्वता दिखानी चाहिए।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की रक्षा सबकी जिम्मेदारी

4000 EVM जलकर राख होना सिर्फ मशीनों का नुकसान नहीं, बल्कि जनता के विश्वास का सवाल है। भारत का चुनावी ढांचा दुनिया का सबसे बड़ा है। इसमें पारदर्शिता और सुरक्षा बनाए रखना हर नागरिक, राजनीतिक दल और सरकार की जिम्मेदारी है।

जब तक फॉरेंसिक रिपोर्ट नहीं आती, अटकलें जारी रहेंगी। लेकिन एक बात तय है—ऐसी घटनाएं लोकतंत्र को कमजोर करती हैं। हमें सतर्क रहना होगा। आग बुझ गई, लेकिन उठे सवाल अभी लंबे समय तक जलते रहेंगे।

क्या आपकी राय क्या है? क्या यह साजिश थी या महज लापरवाही? कमेंट में जरूर बताएं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 12 Jun 2026
June 12, 2026

प. बंगाल : आधी रात को बुलडोज़र और बेदख़ली के खिलाफ जन प्रतिरोध

प. बंगाल : आधी रात को बुलडोज़र और बेदख़ली के खिलाफ जन प्रतिरोध
-Friday World 12 Jun 2026
आलेख : संपृक्ता बोस, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते
जून 2026 के पहले हफ़्ते में, दक्षिण कोलकाता में जादवपुर विश्वविद्यालय के पास स्थित जादवपुर रेलवे स्टेशन सिर्फ़ एक व्यस्त ट्रांसपोर्ट हब नहीं रह गया। जैसा कि पश्चिम बंगाल में हाल के दिनों में देखा गया है, यह जगह भी राज्य की जोर-जबर्दस्ती के खिलाफ लोगों की आजीविका और शहर पर अधिकार को लेकर हुए तनावपूर्ण टकराव का केंद्र बन गया है। जिसे राज्य ने एक आम "अतिक्रमण-विरोधी" अभियान बताते हुए औचित्यपूर्ण ठहराया है, उसके खिलाफ तेज़ी से अलग-अलग तबकों के लोगों ने मिलकर एक बड़ा विरोध आंदोलन खड़ा कर दिया। इस अभियान ने असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों, सड़क किनारे सामान बेचने वालों, सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले वामपंथी कार्यकर्ताओं, विश्वविद्यालय के छात्रों और बंगाल के सांस्कृतिक जगत के लोगों को एक साथ ला दिया। जादवपुर की लड़ाई ने भाजपा राज में उभरते हुए 'बुलडोज़र राज' के तहत शहरी विकास की क्रूर सच्चाइयों को उजागर कर दिया है। वामपंथी नेताओं — जिनमें पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती, एसएफआई के महासचिव सृजन भट्टाचार्य और मशहूर रंगमंच कलाकार जॉयराज भट्टाचार्य शामिल थे — ने अनगिनत कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और केंद्रीय बलों की लाठियों का डटकर सामना किया। दक्षिण कोलकाता की खून से सनी ज़मीन से वामपंथियों ने साफ़-साफ चेतावनी दी है कि बंगाल में बुलडोज़र की राजनीति का कोई राज नहीं चलेगा।

मानवीय लागत

इस संघर्ष के केंद्र में सैकड़ों फेरी वाले और छोटे व्यापारी हैं, जिनका जीवन स्टेशन परिसर के आसपास घूमता है। चाय बेचने वाले, फल बेचने वाले, खाने की दुकान के मालिक, दर्जी और मोची ने पीढ़ियों के निरंतर श्रम से अपनी मामूली आजीविका बनाई है। टिन की चादरों, बांस के खंभों और तिरपाल से बने उनके स्टॉल, कामकाजी लोगों के घरों की नाजुक आर्थिक नींव का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये अनौपचारिक उद्यम स्कूल की फीस, जीवन रक्षक दवाओं, किराया और दैनिक भोजन के लिए भुगतान करते हैं, जिसका अर्थ है कि पूरा परिवार जीवित रहने के लिए उन पर निर्भर है।

मंगलवार, 2 जून को प्रशासन ने अपना पहला खुला कदम उठाया और घोषणा की कि वे इस इलाके में बुलडोज़र भेज रहे हैं, जबकि इसके लिए औपचारिक नोटिस उसी दोपहर दिया गया था। इसके बाद, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले कई संगठनों ने पूरे इलाके में घर-घर जाकर लोगों को एकजुट करना शुरू कर दिया। सृजन भट्टाचार्य और जाने-माने वकील समीम अहमद के नेतृत्व में ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। किसी युद्ध क्षेत्र जैसी स्थिति बनाते हुए, प्रशासन ने सैकड़ों पुलिस और सीआरपीएफ जवानों की सुरक्षा में इलाके में बुलडोज़र भेजे। जादवपुर का यह मामला सिर्फ़ फेरी वालों का मामला नहीं है — यह लोगों के रहने की जगह से जुड़ा एक बुनियादी सवाल है। हाई कोर्ट के आदेश का सामना करने के बाद, रेलवे अधिकारियों और पुलिस प्रशासन ने नरमी बरती और वादा किया कि 8 जून को हाई कोर्ट खुलने के बाद वे इस फ़ैसले पर विचार करेंगे और उस तारीख़ से 21 दिन का समय देंगे। धरना-प्रदर्शन और विरोध देर शाम तक जारी रहा। आख़िरकार, तर्क और कानूनी मिसाल के आगे झुकते हुए, बुलडोज़रों को उस दिन के लिए पीछे हटना पड़ा। इस अस्थायी राहत से चिंताएँ कम नहीं हुईं ; बल्कि इससे यह संकेत मिला कि सरकार की ओर से और भी सख़्त कार्रवाई होने वाली है। जादवपुर में रात भर पूरी तरह से चौकसी का माहौल बन गया।

इस बेदखली अभियान की गुस्ताखी को समझने के लिए, पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक माहौल को देखना ज़रूरी है। हाल ही में बनी भाजपा सरकार ने शहरी योजना के मामले में आम जनता से कटकर एक तरह का बेपरवाह रवैया अपनाया है। वे खुले आम सवाल उठाते हैं कि सड़क किनारे सामान बेचने वालों को अपनी चीज़ें बेचने की इजाज़त क्यों दी जानी चाहिए ; वे उन्हें बिना सोचे-समझे गैर-कानूनी कब्ज़ा करने वाला मानकर शहरी इलाकों से हटाने की बात करते हैं। इसी अहंकारी सोच का फ़ायदा उठाते हुए, रेलवे प्रशासन ने विकास का एक ऐसा मॉडल अपनाया है, जो कॉर्पोरेट घरानों पर केंद्रित है। बिना कहे भी यह साफ़ है कि रेलवे की ज़मीन से कॉर्पोरेट कंपनियों को फ़ायदा होगा, न कि मेहनत-मज़दूरी करने वाले गरीब लोगों को। जवाबदेही की कमी और राजनीतिक बढ़त की उम्मीद के कारण, केंद्र सरकार ने तय किया है कि बुलडोज़र चलाकर स्टेशन के पास बनी झुग्गियों को हटाने और गरीबों की रोज़ी-रोटी छीनकर अपनी 'डबल-इंजन' वाली ताक़त दिखाने का यही सही समय है।

आधी रात को हमला

पहले किए गए सभी वादों को दरकिनार करते हुए, कल दोपहर (7 जून) से ही पूरी रेलवे साइडिंग वाली जगह को ऊँची रेलिंग लगाकर घेर लिया गया। खबर फैल गई कि बुलडोज़र वापस आ रहे हैं। रात करीब 9 बजे, भारी तैनाती के साथ पुलिस, सीआरपीएफ और आरएएफ के जवानों ने कई मुख्य सड़कों पर गश्त शुरू कर दी। रात 9 बजे के बाद से, सीपीआई(एम) और वामपंथी विचारधारा वाले दूसरे संगठनों के नेताओं ने माइक पर बार-बार अपील की कि वे किसी रेलवे अधिकारी से मिलना चाहते हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि लोगों को ज़बरदस्ती हटाने की यह अनैतिक कार्रवाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। पुलिस ने साफ़ तौर पर पीछे हटने से इंकार कर दिया और कहा कि वे कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि उन्हें डीसी साउथ से सख़्त आदेश मिले हैं कि यह कार्रवाई उसी रात पूरी करनी है।

आधी रात के बाद हालात तनावपूर्ण हो गए। तब तक पूरा इलाका मानो जंग का मैदान बन चुका था, जहाँ पुलिस और सरकारी तंत्र की भारी-भरकम सुरक्षा-व्यवस्था तैनात थी। रेलवे साइडिंग के ठीक सामने, सीपीआई(एम) और वामपंथी व लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं ने एक मानव-श्रृंखला बनाई और बुलडोज़रों को अंदर आने से रोकने के लिए डटकर खड़े हो गए। उनके साथ स्थानीय निवासियों और प्रभावित फेरीवालों का एक समूह भी शामिल हुआ — ये सभी पूरी तरह निहत्थे थे और उनकी बस एक ही मांग थी कि बातचीत की जाए।

रात करीब 12:45 बजे, पुलिस ने बुलडोज़र के इंजन चालू करने का आदेश दिया, जिससे तनाव चरम पर पहुँच गया। पुलिस ने पास आ रही भीड़ को बैरिकेड लगाकर रोक दिया। तुरंत ही, बेरहमी से लाठीचार्ज शुरू हो गया। पुलिस ने बिना किसी भेदभाव के लाठियाँ बरसाईं, जिसमें न तो पुरुषों को बख्शा गया और न ही महिलाओं को। लगभग चालीस मिनट तक बेकाबू और हिंसक लाठीचार्ज चलता रहा। पुलिस ने मुख्य प्रदर्शनकारियों को काबू में कर लिया। तब तक, बुलडोज़र ज़बरदस्ती अंदर घुस चुके थे। एक के बाद एक, दुकानें और घर भयानक आवाज़ के साथ ढहने लगे। इस बीच, सड़कों पर पुलिस का आतंक जारी रहा ; वे बेगुनाह और निहत्थे नागरिकों पर लाठियाँ और बंदूकें तानकर डराते-धमकाते रहे।

सांस्कृतिक और लैंगिक संघर्ष

आधी रात को हुई हिंसा ने आंदोलन को कुचलने के बजाय, पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर जवाबी लामबंदी को भड़का दिया। 8 जून को आधी रात को 2:30 बजे से, स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया, कोलकाता के नेतृत्व में सैकड़ों छात्रों ने हिरासत में लिए गए लोगों की तुरंत रिहाई और अवैध तोड़-फोड़ को रोकने की मांग करते हुए लगातार घेराबंदी जारी रखी। इस प्रतिरोध को बंगाल के सांस्कृतिक समुदाय से तुरंत और मज़बूत समर्थन मिला। ऐसे इलाके में जहाँ कला लंबे समय से असहमति की भाषा रही है, वहाँ उनके गीतों और मौजूदगी ने विरोध प्रदर्शन के कैंप को नैतिक प्रतिरोध के गढ़ में बदल दिया।

इसी दौरान, कामकाजी वर्ग की महिलाएं भी आगे आईं और उन्होंने दक्षिण कोलकाता में बड़े पैमाने पर विरोध रैलियां आयोजित कीं। उन्होंने 'बुलडोज़र राज' की लिंग-आधारित क्रूरता को उजागर करते हुए तर्क दिया कि किसी स्टॉल को तोड़ने से न केवल एक व्यवसाय खत्म होता है, बल्कि परिवार की नाजुक आंतरिक अर्थव्यवस्था भी चरमरा जाती है, जिससे बच्चों के पोषण, स्वास्थ्य और शिक्षा पर सीधा खतरा पैदा होता है। कानूनी मोर्चे पर, वकील समीम अहमद ने इस कार्रवाई के कानूनी आधार को सार्वजनिक रूप से चुनौती दी। उन्होंने कहा कि रेलवे कोई भी ऐसा औपचारिक नियम पेश करने में विफल रहा है, जिससे ऐसी बेदखली को वह सही ठहरा सके। उन्होंने तर्क दिया कि अनधिकृत कब्जे के मामलों में भी, उचित प्रक्रिया, सही नोटिस और कानूनी प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना अनिवार्य है।

वरिष्ठ नेताओं ने वैचारिक आलोचना को और तीखा किया। सीपीआई(एम) की केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने तर्क दिया कि प्रशासनिक सुविधा या कॉर्पोरेट मुनाफ़े के लिए अनौपचारिक कामगारों को शहरी जीवन से बस यूं ही मिटाया नहीं जा सकता।

लगातार वापसी

सोमवार, 8 जून को कोर्ट ने सृजन भट्टाचार्य और हिरासत में लिए गए चार अन्य कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत मुचलके पर ज़मानत दे दी। हिरासत से बाहर आते ही, वामपंथियों ने बिना समय गंवाए विकास के सरकारी मॉडल की ज़ोरदार आलोचना की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तरक्की सिर्फ़ अमीर और ताकतवर लोगों के लिए है, जबकि छोटे-मोटे कारोबार से गुज़ारा करने वालों को नागरिकों के तौर पर उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। इसके बाद, जाधवपुर की सड़कों पर प्रभावित इलाकों से गुज़रता हुआ एक ज़बरदस्त और जोश भरा मार्च निकला, जिसमें 'बेदखली से पहले पुनर्वास' के मुख्य नारे के साथ लोगों की भीड़ दोगुनी हो गई।

रेल हॉकर्स और रेलवे बस्तियों के अस्तित्व के पीछे गहरा सामाजिक-ऐतिहासिक और आर्थिक संदर्भ है -- वामपंथ का यह रुख़ स्पष्ट और ऐतिहासिक रूप से ठोस रहा है। कोई भी व्यक्ति शौक या मर्जी से प्लेटफॉर्म के किनारे अनिश्चित और बेहद मुश्किल ज़िंदगी नहीं चुनता। कई मामलों में, खासकर जाधवपुर इलाके में, इन कामों के पीछे दशकों से चले आ रहे शहरी जीवन-संघर्ष, शरणार्थियों के पुनर्वास और संरचनात्मक पिछड़ेपन जैसे ठोस और कानूनी रूप से मान्य आधार हैं।

अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और शहरी इलाकों को आधुनिक बनाने के लिए अतिक्रमण-विरोधी ये कदम ज़रूरी हैं। लेकिन जाधवपुर में मलबे के ढेर एक बुनियादी सवाल खड़ा करते हैं, जो संवैधानिक लोकतंत्र की जड़ तक जाता है : शहर पर कब्ज़ा करने का अधिकार किसका है और किसकी कानूनी दावेदारी को मान्यता दी जानी चाहिए? जाधवपुर, श्यामनगर और पूरे राज्य में वामपंथियों के नेतृत्व में हुए ज़बरदस्त और डटकर किए गए विरोध ने एक स्पष्ट लकीर खींच दी है। इससे नई सरकार को यह संदेश गया है कि राज्य के दमन की 'डबल-इंजन' ताक़त के बावजूद, बंगाल में बुलडोज़र का मनमाना राज नहीं चलेगा, उसे हर तरफ से चुनौती मिलेगी, जरूर मिलेगी।

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650

Friday World 12 Jun 2026

Thursday, 11 June 2026

June 11, 2026

12 साल, 0 प्रेस कॉन्फ्रेंस, 1 रिकॉर्ड : लोकतंत्र का 'साइलेंट मोड' ऑन!

12 साल, 0 प्रेस कॉन्फ्रेंस, 1 रिकॉर्ड : लोकतंत्र का 'साइलेंट मोड' ऑन!
-Friday World 11 Jun 2026
दुनिया गोल है, इतिहास गवाह है, और रिकॉर्ड टूटने के लिए ही बनते हैं। लेकिन कुछ रिकॉर्ड ऐसे बनते हैं कि Guinness Book वाले भी पन्ने पलटते-पलटते रुक जाएं और पूछें, "भाई, ये किया कैसे?" 

ऐसा ही एक रिकॉर्ड बन गया है। "एक भी पत्रकार परिषद के बिना कोई व्यक्ति बारह साल तक प्रधानमंत्री पद पर बना रहा!"

वाह! क्या बात है। ये रिकॉर्ड तोड़ना मतलब ओलंपिक में बिना दौड़े गोल्ड जीतना। क्रिकेट में बिना बैट पकड़े सेंचुरी मारना। शादी में बिना फेरे लिए सात जन्मों का साथ निभाना। 

रिकॉर्ड का पोस्टमार्टम: 12 साल = 4380 दिन = 0 सवाल-जवाब

पहले गणित समझते हैं। 12 साल मतलब 144 महीने। 624 हफ्ते। 4380 दिन। 1,05,120 घंटे। और इन सवा लाख घंटों में एक भी बार कैमरे के सामने बैठकर ये नहीं कहा गया, "आइए, आपके सवालों का जवाब दूं।" 

पत्रकार परिषद क्या होती है? वो जगह जहाँ नेता बैठता है, पत्रकार पूछते हैं, नेता घूम-फिरकर जवाब देता है, और जनता टीवी पर समोसे खाते हुए ताली बजाती है। ये लोकतंत्र का बेसिक इंस्टाग्राम लाइव है। लेकिन यहाँ तो अकाउंट ही प्राइवेट रखा गया। फॉलोअर रिक्वेस्ट पेंडिंग, DM बंद, कमेंट सेक्शन ऑफ। 

सोचिए, स्कूल में बच्चा 12 साल पढ़े और एक भी बार टीचर उससे सवाल न पूछे। या तो बच्चा जीनियस है, या टीचर को डर है कि जवाब सुनकर बेहोश हो जाएगा। यहाँ मामला दूसरा लगता है।

'साइलेंट मोड' के फायदे: एक शोधपत्र

इस अभूतपूर्व रणनीति पर IIM वालों को केस स्टडी करनी चाहिए। टॉपिक होगा: "How to Lead a Nation on Mute"। 

फायदा नंबर 1: कभी गलत नहीं बोलोगे
जो बोलेगा ही नहीं, वो फिसलेगा कैसे? पत्रकार परिषद में फिसलने के 100% चांस होते हैं। किसी ने पूछ लिया, "महंगाई कब कम होगी?" और मुँह से निकल गया, "अगले मंगलवार"। लो, हो गया बवाल। इसलिए सबसे सेफ है, माइक ही न पकड़ो। मन की बात रेडियो पर करो। वन-वे ट्रैफिक। कोई हॉर्न नहीं, कोई जाम नहीं।

फायदा नंबर 2: समय ही समय है
पत्रकार परिषद की तैयारी में कितना समय बर्बाद होता है। फाइलें पढ़ो, डेटा याद करो, विपक्ष के संभावित सवालों के जवाब रटो। 12 साल में अगर महीने में एक भी PC होती, तो 144 दिन सिर्फ तैयारी में जाते। इतने समय में तो 144 नए एयरपोर्ट की आधारशिला रखी जा सकती है। सो प्रेस कॉन्फ्रेंस स्किप करो, विकास ऑटो-पायलट पर डालो।

फायदा नंबर 3: मिस्ट्री बनी रहती है
जो दिखता है वो बिकता है, पर जो नहीं दिखता वो 'ब्रांड' बनता है। रोज-रोज मीडिया के सामने आओगे तो एक्साइटमेंट खत्म। 12 साल तक चुप रहने से एक आभा बन गई। जनता सोचती रही, "अंदर ही अंदर कितना काम हो रहा होगा।" ये वही लॉजिक है कि शर्माजी का बेटा हमेशा चुप रहता है, तो मोहल्ले वाले मान लेते हैं कि बहुत होशियार है। बोलने लगा तो पोल खुल जाए।

पत्रकारों का दर्द: माइक लिए खड़े रहे, साहब कभी आए ही नहीं

बेचारे पत्रकार। 12 साल से माइक पर फूंक मार-मारकर चेक कर रहे हैं, "हैलो, टेस्टिंग 1, 2, 3"। पर उधर से आवाज़ ही नहीं आई। 

नए रिपोर्टर आए, असाइनमेंट मिला "PMO बीट"। सोचा, चलो करियर बन गया। 5 साल बाद वो ही रिपोर्टर इस्तीफा देकर यूट्यूब पर रेसिपी चैनल चला रहा है। उसका कहना है, "वहाँ कम से कम कमेंट तो आते हैं।" 

प्रेस क्लब में अब नए पत्रकारों को ट्रेनिंग दी जाती है: "बेटा, PM की प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर करना तुम्हारे बस का नहीं। ये काम तुम्हारे दादाजी के जमाने में होता था। तुम रील बनाओ।" 

विश्वगुरु के सामने विश्व रिकॉर्ड शरमा जाए

दुनिया में नेताओं ने रिकॉर्ड तो बहुत बनाए। चर्चिल ने भाषणों का रिकॉर्ड बनाया। ओबामा ने टाउनहॉल का। ट्रंप ने ट्वीट का। 

पर "बिना बोले राज करने" का रिकॉर्ड? ये तो आउट ऑफ सिलेबस था। 

अमेरिकी राष्ट्रपति को हफ्ते में दो बार प्रेस को फेस करना पड़ता है। ब्रिटिश PM को हर बुधवार PMQs में विपक्ष की झाड़ सुननी पड़ती है। बेचारे। उन्हें किसी ने बताया ही नहीं कि एक 'साइलेंट मोड' का ऑप्शन भी होता है सेटिंग्स में। 

UN में अब नया प्रस्ताव लाना चाहिए: "Right to Not Answer"। लोकतंत्र का नया चैप्टर।

विपक्ष की हालत: सवाल पूछें तो किससे पूछें?

विपक्ष का तो सबसे बुरा हाल है। मुद्दा उठाओ, संसद में हंगामा करो, प्रेस रिलीज निकालो। पर जवाब देगा कौन? 

ये ऐसा है जैसे आप दीवार से कुश्ती लड़ रहे हों। ऊर्जा आपकी खर्च हो रही है, चोट आपको लग रही है, और दीवार मजे से खड़ी है। 12 साल से विपक्ष दीवार को घूंसे मार रहा है और दीवार ने एक बार भी उफ्फ नहीं की। 

ट्विटर पर ट्रेंड कराओ #PMAnswer, उधर से लाइक भी नहीं आता। ये लोकतंत्र है या 'सीन कर दिया, रिप्लाई नहीं किया' वाला रिलेशनशिप स्टेटस?

जनता जनार्दन: हमने भी एडजस्ट कर लिया

शुरू-शुरू में जनता को अजीब लगा। "अरे, भाईसाहब तो कुछ बोलते ही नहीं।" फिर धीरे-धीरे आदत हो गई। 

अब हाल ये है कि अगर गलती से PC की घोषणा हो जाए, तो जनता घबरा जाएगी। "अरे, सब ठीक तो है न? 12 साल से चुप थे, आज अचानक क्यों बोलेंगे? कहीं युद्ध तो नहीं होने वाला?" 

हम भारतीय एडजस्टमेंट के मास्टर हैं। ट्रेन लेट हो तो चाय पी लेते हैं। ट्रैफिक हो तो गाने सुन लेते हैं। PM चुप हो तो व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर भरोसा कर लेते हैं। 'सूत्रों के हवाले से' ही हमारा न्यूज चैनल है।


बोलना ही है तो विदेश यात्रा से बोलो, मुँह से क्या बोलना

अंत में सारी बात का लब्बोलुआब ये है कि इस रिकॉर्ड ने लोकतंत्र की परिभाषा ही बदल दी। 

हमें सिखाया गया था: "Of the people, By the people, For the people"। नया वर्जन है: "Of the people, By the people, Without talking to the people"। 

हो सकता है आने वाली पीढ़ियां स्कूल में पढ़ें कि 21वीं सदी में 'कम्युनिकेशन' का मतलब बदल गया था। पहले नेता जनता से बात करते थे। फिर नेताओं ने जनता को बताया, और जनता ने मान लिया। 

तो आइए, इस ऐतिहासिक, अद्वितीय, अकल्पनीय रिकॉर्ड का जश्न मनाते हैं। ताली बजाइए। वैसे भी, सवाल पूछने का रिवाज तो अब रहा नहीं। 

डिस्क्लेमर: इस लेख का किसी जीवित या मौन राजनेता से कोई संबंध शुद्ध रूप से संयोग हो सकता है। अगर ठेस पहुँची हो, तो माफ़ी मांगने के लिए भी हम प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करेंगे। समझदार को इशारा काफी है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 11 Jun 2026

Wednesday, 10 June 2026

June 10, 2026

અમારું મિશન પૂર્ણ થયું...’ હોર્મુઝમાં અમેરિકાના હુમલા બાદ ઈરાનનો વળતો પ્રહાર: અબ્રાહમ લિંકનને નિશાન

અમારું મિશન પૂર્ણ થયું...’ હોર્મુઝમાં અમેરિકાના હુમલા બાદ ઈરાનનો વળતો પ્રહાર: અબ્રાહમ લિંકનને નિશાન
- Friday World 10 Jun 2026
હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ — વિશ્વના તેલ પરિવહનનું હૃદય — હવે યુદ્ધના અગ્નિમાં સળગી રહ્યું છે. અમેરિકા અને ઈરાન વચ્ચે તણાવ ચરમસીમાએ પહોંચ્યો છે. અમેરિકન સેનાએ ઈરાનના મુખ્ય સૈન્ય ઠેકાણાઓ પર ચોકસાઈપૂર્વકના હુમલા કર્યા છે, જેના પછી CENTCOMએ સ્પષ્ટ નિવેદન આપ્યું: “અમારું મિશન પૂર્ણ થયું છે.” પરંતુ ઈરાને આને સ્વીકારવાની તૈયારી નથી. તેણે તરત જ વળતો પ્રહાર કરીને અમેરિકાના વિશાળ યુદ્ધ જહાજ USS અબ્રાહમ લિંકનને નિશાન બનાવ્યું છે.

 હુમલાની પૃષ્ઠભૂમિ અને અપાચે હેલિકોપ્ટરની ઘટના

તાજેતરમાં અમેરિકાએ દાવો કર્યો હતો કે ઈરાને હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં અમેરિકાના અપાચે હેલિકોપ્ટરને તોડી પાડ્યું છે. આ ઘટનાને લઈને રાષ્ટ્રપતિ ડોનાલ્ડ ટ્રમ્પે તરત જ કાર્યવાહીનો આદેશ આપ્યો. 9 જૂનના રોજ અમેરિકન વાયુસેના અને નૌસેનાના લડાકુ વિમાનોએ ઈરાનના અબ્બાસ (Bandar Abbas), જાસ્ક (Jask/Sirik) અને કેશમ (Qeshm) ટાપુ પર સ્થિત મુખ્ય સૈન્ય ઠેકાણાઓને નિશાન બનાવ્યા. 

પ્રિસિઝન મ્યુનિશનનો ઉપયોગ કરીને કરવામાં આવેલા આ હુમલાઓમાં મિસાઈલ લોન્ચ સાઈટ્સ, રડાર સ્ટેશનો અને નૌસેના સંબંધિત સુવિધાઓને નુકસાન પહોંચાડવામાં આવ્યું હોવાના અહેવાલો છે. અમેરિકન સેન્ટ્રલ કમાન્ડ (CENTCOM)એ આ કાર્યવાહીને “સ્વ-રક્ષણ” તરીકે વર્ણવીને કહ્યું કે આ હુમલા પ્રમાણસર અને જરૂરી હતા.

ઈરાને આ આરોપોને સંપૂર્ણપણે નકારી કાઢ્યા છે. તેણે કહ્યું છે કે અમેરિકાએ હેલિકોપ્ટરની ઘટનાનો ઉપયોગ માત્ર બહાના તરીકે કર્યો છે અને આ હુમલાઓ વિના પ્રોવોકેશન છે.

 ઈરાનનો વળતો પ્રહાર: અબ્રાહમ લિંકન પર ડ્રોન અને મિસાઈલોનો વરસાદ

અમેરિકાના હુમલાના તરત જ જવાબમાં ઈરાને અસંખ્ય ડ્રોન અને મિસાઈલો છોડીને USS અબ્રાહમ લિંકનને સીધું નિશાન બનાવ્યું. ઈરાની ક્રાંતિકારી ગાર્ડ્સ (IRGC)એ દાવો કર્યો છે કે તેઓએ અબ્રાહમ લિંકનને ટાર્ગેટ કર્યું છે. જો કે અત્યાર સુધી અમેરિકન તરફથી કોઈ મોટા જાનમાલના નુકસાનની પુષ્ટિ થઈ નથી. અનેક મિસાઈલો અને ડ્રોન અબ્રાહમ લિંકનની રેન્જની બહાર જતા રહ્યા હોવાના અહેવાલો છે.

ઈરાનનો સ્પષ્ટ ઈરાદો અબ્રાહમ લિંકન જેવા વિશાળ કેરિયરને નુકસાન પહોંચાડવાનો અને તેના ઉપર કબ્જો અથવા તેને પાછું હઠાવવાનો છે. આ કાર્યવાહીએ વિશ્વને એક વખત ફરી યાદ અપાવ્યું છે કે હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં કોઈ પણ પ્રકારની અસ્થિરતા વૈશ્વિક અર્થતંત્રને હચમચાવી શકે છે.

હોર્મુઝ: વિશ્વનું તેલી હૃદય અને યુદ્ધનું કેન્દ્ર

સ્ટ્રેટ ઓફ હોર્મુઝ વિશ્વના લગભગ 20% ક્રૂડ ઓઈલ અને મોટા ભાગના LNGના પરિવહન માટે જાણીતું છે. આ 33 કિલોમીટરના狭窄 માર્ગ પર અમેરિકા-ઈરાન તણાવ વધતાં જ વીમા ખર્ચ વધી ગયા છે, તેલના ભાવમાં વધઘટ થઈ રહી છે અને શિપિંગ કંપનીઓ વૈકલ્પિક માર્ગો શોધી રહી છે.

આ ઘટનાઓએ વૈશ્વિક સ્તરે ચિંતા વધારી દીધી છે. ભારત, ચીન, જાપાન અને યુરોપ જેવા મોટા તેલ આયાતકાર દેશો આ સ્થિતિને ચોક્કસ નજરે જોઈ રહ્યા છે. ભારત માટે આ ઊર્જા સુરક્ષાનો મોટો પ્રશ્ન છે, કારણ કે તે ઈરાન અને ખાડી દેશો પાસેથી મોટા પ્રમાણમાં ક્રૂડ ઓઈલ આયાત કરે છે.

વૈશ્વિક અસરો અને ભવિષ્યની સંભાવનાઓ

આ તાજેતરની કાર્યવાહી 2026ના ઈરાન-યુએસ તણાવના વધતા ક્રમને દર્શાવે છે. અમેરિકા તરફથી “મિશન પૂર્ણ” જાહેર કરવામાં આવ્યું હોવા છતાં ઈરાનના વળતા હુમલાઓ સૂચવે છે કે આ લડાઈ હજુ સમાપ્ત થઈ નથી. બંને પક્ષો વચ્ચે વધુ વધઘટ થવાની સંભાવના છે.

નિષ્ણાતો કહે છે કે:
- તેલના ભાવ વધુ વધી શકે છે.
- વૈકલ્પિક ઊર્જા અને માર્ગો તરફ વધુ ધ્યાન જશે.
- BRICS જેવા પ્લેટફોર્મ પર નોન-ડોલર વેપારને વેગ મળશે.

આ સંઘર્ષ માત્ર બે દેશો વચ્ચે નથી, પરંતુ વૈશ્વિક ઊર્જા, અર્થતંત્ર અને ભૂ-રાજનીતિનું કેન્દ્ર બની ગયું છે. હોર્મુઝમાં ગેટ બંધ થવાની સ્થિતિ છે, પરંતુ તેલનું પરિવહન અને તણાવ બંને ચાલુ જ છે.

આ ઘટનાઓ વિકસતી છે. વૈશ્વિક શાંતિ અને સ્થિરતા માટે બંને પક્ષો વચ્ચે સંવાદ અને સમજૂતીની જરૂર છે, નહીંતર આ અગ્નિ વધુ વિસ્તરી શકે છે.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 10 Jun 2026
June 10, 2026

અમેરિકાએ હોર્મુઝ નો ગેટ બંધ કર્યો, તો ઈરાને બારીઓ ખોલી દીધી: હોર્મુઝમાં ઓઇલ ટેન્કરોની અવરજવર જારી

અમેરિકાએ હોર્મુઝ નો ગેટ બંધ કર્યો, તો ઈરાને બારીઓ ખોલી દીધી: હોર્મુઝમાં ઓઇલ ટેન્કરોની અવરજવર જારી - Friday World 10 Jun 2026
વિશ્વના સૌથી મહત્વના દરિયાઈ માર્ગ — હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ — પર અમેરિકા અને ઈરાન વચ્ચે ચાલતા તણાવ અને નાકાબંધીએ વૈશ્વિક ઊર્જા વ્યવસ્થાને હચમચાવી નાખી છે. છતાં આ સંકટ વચ્ચે પણ એક અદ્ભુત વાર્તા લખાઈ રહી છે — જ્યાં ‘ડાર્ક મોડ’માં ચાલતા તેલના જહાજો અમેરિકાની આંખોમાં ધૂળ નાખીને એશિયાના મોટા દેશોને તેલ પહોંચાડી રહ્યા છે. ભારત, ચીન અને પાકિસ્તાનને આ ગુપ્ત સપ્લાયથી મોટો ફાયદો થઈ રહ્યો છે, જ્યારે અમેરિકા આ ક્રાંતિને જોતું રહી ગયું છે.

 હોર્મુઝ: વિશ્વની ઊર્જાનું હૃદય અને આજનું યુદ્ધક્ષેત્ર

હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ વિશ્વના લગભગ 20% તેલ અને મોટા ભાગના LNGના પરિવહન માટે જાણીતું છે. પર્શિયન ગલ્ફમાંથી નીકળતા તેલના ટેન્કરો માટે આ 33 કિલોમીટરનો狭窄 માર્ગ અનિવાર્ય છે. 2026માં અમેરિકા-ઈરાન તણાવ વધતાં અમેરિકાએ ઈરાનીયન પોર્ટ્સ પર નાવિક નાકાબંધી લાગુ કરી, જ્યારે ઈરાને પણ પોતાની તરફથી નિયંત્રણો વધાર્યા. પરિણામે સામાન્ય ટ્રાફિક 90-95% ઘટી ગયો છે.

પરંતુ અહીં જ વાર્તા રસપ્રદ બને છે. મેરીટાઈમ ડેટા અનુસાર, મે મહિને આ વિસ્તારમાંથી પસાર થતા આશરે 65.2% તેલ ટેન્કરોએ svો AIS (ઓટોમેટિક આઈડેન્ટિફિકેશન સિસ્ટમ) બંધ કરીને ‘ડાર્ક મોડ’ અપનાવ્યો. આ આંકડો અગાઉના મહિનાઓમાં 57% હતો. જહાજો svો લોકેશન ટ્રેકિંગ, રડાર અને ટ્રાન્સપોન્ડર બંધ કરીને અંધારામાં પસાર થાય છે, જે સુરક્ષાની દૃષ્ટિએ જોખમી પણ વ્યવહારુ છે.

ડાર્ક ફ્લીટની વ્યૂહરચના: કેવી રીતે થાય છે આ ‘ગુપ્ત પરિવહન’?

અગાઉ માત્ર ઈરાન સાથે જોડાયેલા ‘શેડો ફ્લીટ’ જ આ યુક્તિ અપનાવતા હતા. હવે સામાન્ય વ્યાપારી જહાજો પણ આમ કરે છે. કારણો અનેક છે:

- અમેરિકી નાકાબંધી અને સંભવિત હુમલાથી બચવું.
- ઓપરેશનલ અનિશ્ચિતતા અને વીમા કંપનીઓની અચકાત.
- ખાડી દેશોમાંથી તેલ લોડ કરીને સુરક્ષિત રીતે બહાર કાઢવું.

આ જહાજો ગલ્ફમાં પ્રવેશતી વખતે અથવા બહાર નીકળતી વખતે AIS બંધ કરે છે. કેટલાક કિસ્સામાં સ્ટેલાઈટ ઈમેજરી અને અન્ય ટ્રેકિંગથી પણ તેઓ અસ્પષ્ટ રહે છે. આનાથી વૈશ્વિક બજારને રિયલ-ટાઈમમાં સપ્લાય ટ્રેક કરવું અશક્ય બની ગયું છે. નિષ્ણાતો કહે છે કે આ હવે માત્ર સેન્ક્શન્સ એવોઇડન્સ નથી, પરંતુ કોમર્શિયલ સર્વાઈવલ સ્ટ્રેટેજી છે.

એશિયાના દેશોને મળતો ‘ગુપ્ત ફાયદો’

આ સંકટ વચ્ચે ભારત, ચીન અને પાકિસ્તાન જેવા દેશોને ખાસ રૂટ્સ અને કોરિડોર્સ દ્વારા તેલ મળી રહ્યું છે. ઈરાન પાસે આ વિસ્તાર પર મજબૂત કંટ્રોલ છે, જેના કારણે તે પોતાના મિત્ર અને સહયોગી દેશોને પસાર થવાની મંજૂરી આપે છે. 

- ચીન: ઈરાની તેલનો સૌથી મોટો ખરીદનાર. અનેક સુપરટેન્કર્સ ચીન તરફ જઈ રહ્યા છે. યુઆનમાં વેપાર વધારતાં ડોલરનું વર્ચસ્વ ઘટે છે.

- ભારત: ઊર્જા સુરક્ષાની દૃષ્ટિએ મહત્વનું. કેટલાક કિસ્સામાં ખાસ વ્યવસ્થા દ્વારા સપ્લાય મળે છે. આનાથી ભારતને સસ્તું તેલ મળે છે અને રૂપિયા-રૂપિયા અથવા અન્ય કરન્સીમાં વ્યવહાર થાય છે.

- પાકિસ્તાન: પણ આ ગુપ્ત માર્ગોનો લાભ લઈ રહ્યું છે.

આ વેપારમાં ડોલરની જગ્યાએ યુઆન અથવા અન્ય કરન્સીનો ઉપયોગ વધતાં અમેરિકાને ‘ટોલ ટેક્સ’ જેવી અસર થાય છે. પરંપરાગત ડોલર-આધારિત વ્યવસ્થા બદલાઈ રહી છે, જે વૈશ્વિક અર્થતંત્ર માટે નવો વલણ સર્જે છે.

વૈશ્વિક અસરો અને પડકારો

આ સ્થિતિને કારણે તેલના ભાવમાં વધઘટ થઈ છે. વીમા પ્રીમિયમ આસમાને છે. હજારો જહાજો સ્ટ્રાન્ડ થયા છે. પરંતુ એશિયન દેશોની વ્યૂહરચનાએ તેમને સ્થિરતા આપી છે. ભારત જેવા દેશો માટે આ ઊર્જા વિવિધતા અને ડિપ્લોમેટિક સંબંધોનું પરિણામ છે.

નિષ્ણાતો કહે છે કે આ ‘ડાર્ક શિપિંગ’ વૈશ્વિક સપ્લાય ચેઈનને અદ્રશ્ય રાખે છે. તપાસ એજન્સીઓ માટે આ મોટો પડકાર છે. આ ઉપરાંત પર્યાવરણીય જોખમ પણ વધે છે, કારણ કે અંધારામાં ચાલતા જહાજો અકસ્માતની સંભાવના વધારે છે.

ભવિષ્યની તૈયારી: શું કરવું જોઈએ?

આ કટોકટીએ વિશ્વને યાદ અપાવ્યું છે કે એક જ માર્ગ પર આધારિત રહેવું જોખમી છે. ભારત સરકારે વૈકલ્પિક માર્ગો, પાઈપલાઈન્સ (જેમ કે ઓમાનથી ગુજરાત) અને નવી ઊર્જા સ્ત્રોતો તરફ વધુ ધ્યાન આપવું જોઈએ. BRICS જેવા પ્લેટફોર્મ્સ પર નોન-ડોલર વેપારને પ્રોત્સાહન મળી રહ્યું છે.

આ સંકટમાં એક વાત સ્પષ્ટ છે — જીઓપોલિટિક્સમાં કોઈ સ્થિર નથી. અમેરિકાની નાકાબંધી હોવા છતાં એશિયાના દેશોએ પોતાની ચાલાકી અને કૂટનીતિથી તેલનો પુરવઠો જાળવી રાખ્યો છે. હોર્મુઝનું અંધારું હવે માત્ર જોખમ નથી, પરંતુ નવી વૈશ્વિક વ્યવસ્થાનું પ્રતીક બની ગયું છે.

આ પરિસ્થિતિ કેટલો સમય ચાલશે તે અનિશ્ચિત છે, પરંતુ એક વાત નક્કી છે: તેલના રમતમાં એશિયા પાછળ નથી, પરંતુ આગળ વધી રહ્યું છે — અંધારામાં પણ!

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 10 Jun 2026
June 10, 2026

सपनों की चिता पर जल रहा युवा भारत – महंगाई, बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों की सच्चाई

सपनों की चिता पर जल रहा युवा भारत – महंगाई, बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों की सच्चाई
- Friday World 10 Jun 2026
भारत का युवा आज सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है। महंगाई की आग में जल रहा है, बेरोजगारी की मार झेल रहा है, रुपए की गिरावट उसके खर्चों को और भारी बना रही है। ऊपर से शिक्षा व्यवस्था में घोटालों की बाढ़ – NEET जैसे बड़े एग्जाम में पेपर लीक, अनियमितताएं और रद्दीकरण युवाओं का मॉरल तोड़ रही हैं। उत्तर प्रदेश में B.Ed परीक्षा देने पहुंचे हजारों छात्र-छात्राएं और उनके परिजन रेलवे स्टेशनों पर फर्श पर सोकर 500 से 1000 रुपये होटल खर्च बचा रहे हैं। यह दृश्य न सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष की तस्वीर है, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता को उजागर करता है। "मोदी है तो मुमकिन है" का नारा आज युवाओं के लिए तीखा व्यंग्य बन गया है।

 युवा भारत का दर्द: आंकड़े जो चुप नहीं रहते

भारत की आबादी में युवा (15-29 वर्ष) सबसे बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन अवसरों की कमी उन्हें हताशा की ओर धकेल रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, युवा बेरोजगारी दर 15% के आसपास पहुंच चुकी है, कुछ रिपोर्ट्स में तो यह 25% तक बताई जा रही है। ग्रेजुएट्स में 40% बेरोजगार हैं और सिर्फ 42% ही पूरी तरह employable माने जाते हैं। महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है – खाने-पीने, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन सब महंगे हो गए हैं। रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार गिरावट पर है, 2026 में यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल रहा। इससे आयात महंगे हो रहे हैं, जिसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल, खाद्य पदार्थों और दैनिक जरूरतों पर पड़ रहा है।

ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं, लाखों परिवारों की कहानियां हैं। एक ग्रामीण युवक जो शहर में नौकरी की तलाश में भटक रहा है, या एक मध्यम वर्गीय परिवार जो बेटी की कोचिंग फीस जुटाने के लिए कर्ज ले रहा है – यह हकीकत हर घर में गूंज रही है।

 NEET घोटाला: सपनों पर प्रहार

मई 2026 में NEET-UG परीक्षा का मामला पूरे देश को झकझोर गया। 22.8 लाख से ज्यादा छात्र-छात्राओं ने परीक्षा दी, लेकिन पेपर लीक और 'गेस पेपर' की अफवाहों के बाद NTA ने परीक्षा रद्द कर दी। CBI जांच चल रही है, गिरफ्तारियां हो रही हैं, लेकिन छात्रों का नुकसान कौन भरपाई करेगा? कई छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली। कोचिंग माफिया, पैसे का खेल और सिस्टम की लापरवाही ने मेडिकल के सपने देखने वाले युवाओं को तोड़ दिया।

NEET सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों की उम्मीद है। ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के छात्र पहले ही कोचिंग की भारी फीस, यात्रा और रहन-सहन का खर्च उठाते हैं। जब इस स्तर पर धांधली होती है, तो विश्वास टूट जाता है। सरकार बार-बार "सुधार" की बात करती है, लेकिन बार-बार घोटाले दोहराए जाते हैं। CUET, NET और अन्य परीक्षाओं में भी इसी तरह की समस्याएं देखी गई हैं। क्या यह संयोग है या व्यवस्था की जड़ों में सड़न?

 UP B.Ed परीक्षा: स्टेशन पर सोने की मजबूरी

उत्तर प्रदेश B.Ed प्रवेश परीक्षा का दृश्य और भी दिल दहला देने वाला है। हजारों छात्र और उनके माता-पिता, भाई-बहन परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने के लिए ट्रेन पकड़ते हैं। होटल का खर्च बचाने के लिए रेलवे स्टेशन के फर्श पर चादर बिछाकर रात गुजारते हैं। प्रत्येक व्यक्ति 500 से 1000 रुपये बचाता है – लेकिन इस बचत की कीमत क्या है? आराम की नींद, सुरक्षा, स्वच्छता और मानसिक शांति का त्याग।

ये छात्र शिक्षक बनने का सपना देखते हैं। शिक्षा क्षेत्र में नौकरी की तलाश में वे इतना कष्ट सह रहे हैं। वायरल वीडियो में दिख रहे दृश्य देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सोचने पर मजबूर हो जाता है – क्या हमारा युवा वर्ग इतना असहाय हो गया है? जहां अमीर छात्र हॉटल में आराम से रहकर तैयारी करते हैं, वहीं गरीब छात्र स्टेशन की बेंच या फर्श पर लेटे हैं। यह शिक्षा की असमानता का जीवंत प्रमाण है।

"मोदी है तो मुमकिन है" – यह नारा 2019 चुनावों में दिया गया था। विकास, सुशासन और हर संभव काम को संभव बनाने का दावा। लेकिन आज जब युवा स्टेशन पर सो रहे हैं, NEET घोटाले से जूझ रहे हैं, नौकरी नहीं मिल रही, महंगाई से परेशान हैं, तो यह नारा व्यंग्य बन गया है। क्या स्टेशन पर सोना भी "मुमकिन" इसी नारे का हिस्सा है?

गहरी जड़ें: शिक्षा, अर्थव्यवस्था और नीतियों का विश्लेषण

भारतीय शिक्षा व्यवस्था में केंद्रीकरण बढ़ा है। NTA जैसे संस्थानों पर भारी जिम्मेदारी, लेकिन जवाबदेही कम। पेपर लीक रोकने के लिए कंप्यूटर आधारित परीक्षाएं प्रस्तावित हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट, बिजली और डिजिटल पहुंच की कमी इसे और चुनौतीपूर्ण बनाती है।

अर्थव्यवस्था की बात करें तो युवा बेरोजगारी का मुख्य कारण स्किल गैप, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की धीमी गति और नौकरियों का निर्माण न होना है। रुपए की गिरावट निर्यात को तो बढ़ावा दे सकती है, लेकिन आयात पर निर्भर भारत में यह महंगाई बढ़ाती है। तेल की कीमतें बढ़ीं, विदेशी पूंजी का बहाव हुआ – इन सबका असर सबसे ज्यादा युवा वर्ग पर पड़ रहा है।

परिवार स्तर पर प्रभाव: एक छात्र की परीक्षा तैयारी पूरे परिवार को प्रभावित करती है। माता-पिता छुट्टी लेकर साथ जाते हैं, खर्च जुटाते हैं। जब परिणाम घोटालों से प्रभावित होते हैं, तो पूरे परिवार की उम्मीदें धराशायी हो जाती हैं। महिलाओं की स्थिति और बदतर – ग्रामीण युवती बेरोजगारी और सुरक्षा की दोहरी मार झेल रही हैं।

 समाधान की राह: क्या करना चाहिए?

1. परीक्षा सुधार: NTA का पुनर्गठन, पारदर्शी प्रक्रिया, राज्य स्तर पर विकेंद्रीकरण और सख्त सजा का प्रावधान।

2. रोजगार सृजन: स्किल डेवलपमेंट को प्रभावी बनाना, MSME को बढ़ावा, मैन्युफैक्चरिंग में निवेश।

3. महंगाई नियंत्रण: कृषि उत्पादकता बढ़ाना, सप्लाई चेन मजबूत करना, आयात पर निर्भरता कम करना।

4. छात्र कल्याण: परीक्षा केंद्रों के पास सस्ते हॉस्टल/गेस्ट हाउस, यात्रा सब्सिडी, छात्रवृत्ति में वृद्धि।

5. मानसिक स्वास्थ्य: हताशा और आत्महत्या रोकने के लिए काउंसलिंग सेंटर।

सरकार को युवा आवाजों को सुनना चाहिए। विपक्ष को भी सिर्फ आलोचना नहीं, ठोस विकल्प देना चाहिए। मीडिया को सनसनीखेज खबरों के साथ-साथ गहन विश्लेषण देना चाहिए।

 आशा की किरण अभी बाकी है

यह लेख युवाओं की पीड़ा को दर्ज करने का प्रयास है। स्टेशन के फर्श पर सोते छात्र, NEET घोटाले से टूटे सपने, महंगाई की चक्की में पिसते परिवार – ये तस्वीरें भारत के भविष्य को चुनौती दे रही हैं। लेकिन भारतीय युवा resilient है। इतिहास गवाह है कि कठिनाइयों से निकलकर उन्होंने नई ऊंचाइयां छुई हैं।

जरूरत है सही नीतियों, पारदर्शिता और युवा-केंद्रित विकास की। जब तक हर छात्र को बिना किसी भेदभाव के अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक "सबका साथ, सबका विकास" अधूरा रहेगा। युवा भारत जाग रहा है – अब समय है कि सिस्टम भी उसके साथ खड़ा हो।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 10 Jun 2026