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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 22 June 2026

June 22, 2026

ભાવનગર વડવા બ વોર્ડના લોકપ્રિય પ્રમુખ શ્રી જયદીપસિંહ ગોહિલને જન્મદિવસની હાર્દિક શુભકામનાઓ

ભાવનગર વડવા બ વોર્ડના લોકપ્રિય પ્રમુખ શ્રી જયદીપસિંહ ગોહિલને જન્મદિવસની હાર્દિક શુભકામનાઓ
-Friday World 22 Jun 2026
ભાવનગર શહેરના વિકાસમાં સતત કાર્યરત અને વડવા બ વોર્ડના પ્રજાવત્સલ પ્રમુખ શ્રી જયદીપસિંહ ગોહિલ આજે પોતાના જન્મદિવસની ઉજવણી કરી રહ્યા છે. યુવાનોના પ્રેરણાસ્ત્રોત, સમાજસેવાના પર્યાય અને દરેક નાગરિકના પ્રશ્નોને પોતાના ગણી ઉકેલવા માટે સદૈવ તત્પર રહેતા જયદીપસિંહભાઈને આજે ચોતરફથી શુભેચ્છાઓનો ધોધ વરસી રહ્યો છે.

કર્મનિષ્ઠ નેતૃત્વની ઓળખ
જયદીપસિંહ ગોહિલે વડવા બ વોર્ડની જવાબદારી સંભાળી ત્યારથી વોર્ડમાં વિકાસની નવી દિશા ખુલી છે. રસ્તા, પાણી, સ્ટ્રીટ લાઈટ, સ્વચ્છતા અભિયાન કે પછી સરકારી યોજનાઓને છેવાડાના માનવી સુધી પહોંચાડવી – દરેક કામમાં તેમની નિષ્ઠા દેખાય છે. કોઈપણ નાગરિક ફોન કરે કે રૂબરૂ મળે, તેમના પ્રશ્નનું ત્વરિત નિરાકરણ લાવવું એ જ તેમની કાર્યશૈલી બની ગઈ છે. યુવાનોને રોજગારી, બહેનોને સ્વાવલંબન અને વડીલોને સન્માન મળે તે માટે તેઓ સતત પ્રયત્નશીલ રહ્યા છે.

સમાજસેવા એ જ જીવનમંત્ર  
રાજકારણને સેવાનું માધ્યમ બનાવનાર જયદીપસિંહભાઈ ધાર્મિક, સામાજિક અને શૈક્ષણિક કાર્યોમાં પણ અગ્રેસર રહે છે. કોરોના કાળમાં તેમણે કરેલી સેવા, તહેવારો પર જરૂરિયાતમંદોને સહાય કે બ્લડ ડોનેશન કેમ્પ – દરેક જગ્યાએ તેઓ મોખરે જોવા મળે છે. તેમનું વર્તન નાનામાં નાના કાર્યકરને પણ પોતીકાપણું ભર્યું લાગે છે, એટલે જ આજે વડવા બ વોર્ડનો દરેક નાગરિક તેમને પોતાના પરિવારના સભ્ય માને છે.

જન્મદિવસે શુભકામનાનો ધોધ
આજના તેમના જન્મદિવસ નિમિત્તે વોર્ડના નાગરિકો, સામાજિક સંસ્થાઓ, યુવા મંડળો અને શુભચિંતકો દ્વારા ઠેર ઠેર કેક કાપી, વૃક્ષારોપણ કરી અને સેવાકીય પ્રવૃત્તિઓ થકી ઉજવણી કરવામાં આવી રહી છે. સોશિયલ મીડિયા પણ "હેપ્પી બર્થડે જયદીપભાઈ" ના મેસેજથી ઉભરાઈ રહ્યું છે.

ઈશ્વરને પ્રાર્થના કે શ્રી જયદીપસિંહ ગોહિલને ઉત્તમ સ્વાસ્થ્ય, દીર્ઘાયુ અને વોર્ડની વધુ સેવા કરવાનું બળ મળે. તેમનું નેતૃત્વ આવનારા વર્ષોમાં પણ વડવા બ વોર્ડને પ્રગતિના નવા શિખરે લઈ જાય એવી અંત:કરણપૂર્વકની શુભેચ્છા. 

જય માતાજી. જન્મદિવસ મુબારક હો જયદીપ સિંહ ગોહિલ!

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 22 Jun 2026
June 22, 2026

ब्रिटेन में सियासी भूकंप: PM कीर स्टार्मर ने दिया इस्तीफा, लेबर पार्टी का अध्यक्ष पद भी छोड़ा

ब्रिटेन में सियासी भूकंप: PM कीर स्टार्मर ने दिया इस्तीफा, लेबर पार्टी का अध्यक्ष पद भी छोड़ा
-Friday World 22 Jun 2026
लंदन से सोमवार, 22 जून 2026 को आई सबसे बड़ी खबर ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टार्मर ने सिर्फ दो साल के कार्यकाल के बाद प्रधानमंत्री पद और सत्ताधारी लेबर पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया है। 10 डाउनिंग स्ट्रीट के बाहर भावुक होते हुए उन्होंने कहा, "मैंने जो भी फैसला लिया, वह अपने प्यारे देश को पहले रखने के लिए लिया। इसलिए मैं लेबर पार्टी के नेता के तौर पर इस्तीफा दे रहा हूं"।

इस्तीफे की 5 बड़ी वजहें

- पार्टी में बगावत: पिछले कुछ महीनों से लेबर पार्टी में अंदरूनी कलह चरम पर थी। 100 से ज्यादा सांसदों ने खुलकर विरोध किया था। 4 मंत्रियों और 4 सहायक मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया।
- स्थानीय चुनाव में करारी हार
- मई में हुए स्थानीय चुनावों में लेबर ने 1,500 से ज्यादा काउंसिल सीटें और 25 से अधिक काउंसिल गंवा दीं। नाइजेल फराज की रिफॉर्म UK ने लेबर के गढ़ में सेंध लगा दी।
- डोनाल्ड ट्रंप से तनाव: ईरान संघर्ष में ब्रिटिश बेस के इस्तेमाल को लेकर स्टार्मर ने पहले अमेरिका का साथ देने से इनकार किया। ट्रंप ने Truth Social पर लिखा: "कीर स्टार्मर यूनाइटेड किंगडम के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देंगे। वह दो बहुत अहम मुद्दों- इमिग्रेशन और एनर्जी पर बुरी तरह नाकाम रहे"।

- नीतिगत यू-टर्न: पेंशनरों के लिए विंटर फ्यूल बेनिफिट अचानक बंद करना, चुनावी वादे के बावजूद सबसे बड़े टैक्स बढ़ाना और दानदाता से मुफ्त कपड़े लेने के खुलासे ने छवि खराब की।
- जनता का भरोसा टूटा
- YouGov सर्वे में मतदाताओं ने स्टार्मर को "कमजोर" और "अनिर्णायक" बताया। 2024 में लेबर को वोट देने वाले आधे लोग पार्टी छोड़ चुके हैं।

अब आगे क्या? सत्ता हस्तांतरण का शेड्यूल

स्टार्मर ने किंग चार्ल्स को अपने फैसले की जानकारी दे दी है। लेबर पार्टी के नए नेता के लिए 9 जुलाई से नामांकन शुरू होगा। अगर मुकाबला हुआ तो सितंबर तक नया नेता चुन लिया जाएगा। तब तक स्टार्मर कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे। यह 10 साल में ब्रिटेन का 7वां प्रधानमंत्री होगा।

नए PM की रेस: एंडी बर्नहैम सबसे आगे

ग्रेटर मैनचेस्टर के मेयर एंडी बर्नहैम नए प्रधानमंत्री के सबसे मजबूत दावेदार हैं। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री वेस स्ट्रीटिंग ने भी बर्नहैम को समर्थन देकर खुद को रेस से हटा लिया है।

भावुक विदाई: "अब परिवार सबसे बड़ा काम"

भाषण के अंत में स्टार्मर की आवाज भर्रा गई। उन्होंने कहा, "देश की सबसे बड़ी नौकरी छोड़ने के बाद मैं सबसे अहम काम पर ध्यान दूंगा - अपनी शानदार पत्नी विक का सबसे अच्छा पति और अपने खूबसूरत बच्चों का सबसे अच्छा पिता बनना"। उन्होंने 10 डाउनिंग स्ट्रीट के स्टाफ और सिविल सर्विस का भी शुक्रिया अदा किया।

वैश्विक असर: शांतिपूर्ण सत्ता पलट

इस्तीफे की खबर के बाद FTSE 250 इंडेक्स 0.7% गिरा और पाउंड कमजोर हुआ। EU ने 22 जुलाई को होने वाली EU-UK समिट पर फिर से विचार शुरू कर दिया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने कहा, "यूरोपीय और यूक्रेनी सुरक्षा आपकी वजह से मजबूत है"।

भारत पर क्या असर?

स्टार्मर सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि UK-India फ्री ट्रेड एग्रीमेंट 15 जुलाई से लागू होना है। नए नेतृत्व में भी इसके जारी रहने की उम्मीद है, लेकिन नए PM की प्राथमिकताओं पर नजर रहेगी।

 लोकतंत्र की ताकत

ब्रिटेन ने फिर दिखा दिया कि लोकतंत्र में सत्ता पलट बुलेट से नहीं, बैलेट से होता है। जहां दुनिया भर में भ्रष्टाचार और सत्ता के लिए खूनी जंग होती है, वहां ब्रिटेन ने शांतिपूर्वक नेतृत्व बदलकर मिसाल पेश की है। स्टार्मर का पतन यह भी बताता है कि भारी बहुमत के बावजूद जनता का विश्वास टूटे तो कुर्सी नहीं टिकती।

अब सवाल यह है कि क्या एंडी बर्नहैम लेबर को 2029 का चुनाव जिता पाएंगे, या नाइजेल फराज की रिफॉर्म UK ब्रिटेन की दो-दलीय व्यवस्था को हमेशा के लिए तोड़ देगी? जवाब वक्त देगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 22 Jun 2026
June 22, 2026

भीषण गर्मी से झुलसा फ्रांस: जी-7 के बाद रेड अलर्ट, पेरिस समेत 33% देश में इमरजेंसी जैसे हालात, आउटडोर बैन

भीषण गर्मी से झुलसा फ्रांस: जी-7 के बाद रेड अलर्ट, पेरिस समेत 33% देश में इमरजेंसी जैसे हालात, आउटडोर बैन -Friday World 22 Jun 2026
पेरिस समेत पूरा फ्रांस इस वक्त इतिहास की सबसे खतरनाक हीटवेव में से एक का सामना कर रहा है। जी-7 शिखर सम्मेलन खत्म होते ही देश के एक तिहाई हिस्से पर रेड अलर्ट लगा दिया गया है। तापमान 40 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है और सरकार ने लोगों से घरों में रहने की अपील की है। 

1. हालात क्यों हुए बेकाबू?
जी-7 मीटिंग के तुरंत बाद यूरोप पर पड़ी प्रचंड गर्मी की मार फ्रांस पर सबसे भारी पड़ी। मौसम विभाग के मुताबिक सोमवार को पारा और चढ़ने की आशंका है। देश के 33% हिस्से में रेड अलर्ट है। यानी हालात जानलेवा हो सकते हैं। 2003 की हीटवेव में फ्रांस ने 15,000 बुजुर्ग खो दिए थे। वही डर फिर लौट आया है।

2. सरकार के इमरजेंसी कदम
गर्मी को देखते हुए फ्रांसीसी सरकार ने तुरंत कई बड़े फैसले लिए:

- आउटडोर गेम्स पूरी तरह बंद: फुटबॉल, टेनिस से लेकर बच्चों के स्कूल स्पोर्ट्स तक सब रोक दिए गए।
- जंगल की आग का खतरा: हीटवेव से जंगलों में आग लगने का डर है। इसलिए फायर ब्रिगेड और सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
- शराब पर रोक: अस्पतालों पर बोझ कम करने के लिए सार्वजनिक जगहों पर शराब पीने और बेचने पर पाबंदी लगा दी गई है। ताकि मेडिकल टीमें सिर्फ हीट स्ट्रोक के मरीजों पर ध्यान दे सकें।
- कूलिंग स्टेशन्स चालू*: पेरिस समेत बड़े शहरों में जगह-जगह कूलिंग स्टेशन बनाए गए हैं। यहां पानी की फुहारें और धुंध छोड़ी जा रही है। एफिल टावर पर खास इंतजाम किए गए हैं ताकि टूरिस्ट बेहाल न हों।

3. आम लोगों के लिए एडवाइजरी जारी
हर घर में AC नहीं है। इसलिए सरकार ने लोगों को सलाह दी है:

1. दोपहर 12 से शाम 5 बजे तक घर से बाहर न निकलें।

2. बुजुर्ग और बच्चों का खास ध्यान रखें। 2003 में सबसे ज्यादा मौतें इन्हीं की हुई थीं।

3. पंखे, कूलर का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करें।

4. पानी और लिक्विड लेते रहें। डिहाइड्रेशन से बचें।

4. जनजीवन पर असर
गर्मी ने फ्रांस की रफ्तार रोक दी है। हर साल होने वाले म्यूजिक फेस्टिवल अब सिर्फ रात में हो रहे हैं। भीड़ भी कम आ रही है। एफिल टावर देखने आने वाले टूरिस्ट परेशान हैं। ऑफिस जाने वाले लोग सुबह जल्दी निकल रहे हैं या वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। 

5. क्यों डरा रहा है 2003 का जख्म?
फ्रांस के लोग 2003 की हीटवेव भूले नहीं हैं। तब अगस्त में 15,000 से ज्यादा बुजुर्गों की मौत सिर्फ गर्मी की वजह से हो गई थी। अस्पताल भर गए थे। उस वक्त तैयारी नहीं थी। इस बार सरकार कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। इसलिए पहले ही रेड अलर्ट और इमरजेंसी जैसे कदम उठा लिए गए।

6. यूरोप क्यों बन रहा है 'हीट चैंबर'?
क्लाइमेट एक्सपर्ट्स मानते हैं कि क्लाइमेट चेंज की वजह से यूरोप दुनिया के बाकी हिस्सों से दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है। पहले यूरोप में AC कल्चर नहीं था। घर मोटी दीवारों के बनते थे ताकि सर्दी से बचाव हो। अब वही घर गर्मी में तंदूर बन जाते हैं। फ्रांस, स्पेन, इटली हर साल नई हीटवेव झेल रहे हैं।

7. भारत के लिए सबक
फ्रांस के हालात भारत के लिए भी चेतावनी हैं। हमारे यहां हर साल लू से सैकड़ों मौतें होती हैं। फ्रांस की तरह हमें भी हीट एक्शन प्लान मजबूत करना होगा। कूलिंग शेल्टर, पानी की व्यवस्था और बुजुर्गों के लिए खास इंतजाम वक्त की जरूरत है।

8. आगे क्या?
मौसम विभाग का कहना है कि अगले 48 घंटे बेहद अहम हैं। अगर तापमान 42 पार गया तो हालात और बिगड़ सकते हैं। स्कूल-कॉलेज पहले ही बंद हैं। दफ्तरों में शिफ्ट बदली जा रही है। फ्रांस की इकोनॉमी पर भी इसका असर दिखना शुरू हो गया है। टूरिज्म सेक्टर को बड़ा झटका लगा है।

गर्मी सिर्फ मौसम नहीं है। ये अब पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी बन चुकी है। फ्रांस की ये तस्वीरें बताती हैं कि क्लाइमेट चेंज अब भविष्य की बात नहीं है। ये आज की कड़वी हकीकत है। घर में रहें, सुरक्षित रहें। क्योंकि जान है तो जहान है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 22 Jun 2026
June 22, 2026

हिजाब की सियासत: वादों का शोर और मैदान की हकीकत, मटेरा में AIMIM के दोहरे दांव पर सवाल

हिजाब की सियासत: वादों का शोर और मैदान की हकीकत, मटेरा में AIMIM के दोहरे दांव पर सवाल
-Friday World 22 Jun 2026
उत्तर प्रदेश की सियासत में नारे और ज़मीनी अमल के बीच की खाई अक्सर जनता की नज़र में आ जाती है। कुछ महीने पहले ही उत्तर प्रदेश AIMIM के सदर शौकत अली साहब ने एक बड़ा ऐलान किया था। मंच से पूरे फख्र के साथ उन्होंने कहा था कि, “हम उत्तर प्रदेश में एक हिजाब वाली बेटी को मुख्यमंत्री बनाएंगे।” यह बयान सिर्फ एक सियासी जुमला नहीं था। यह एक विज़न था, एक वादा था, और सबसे बढ़कर मुस्लिम खवातीन की सियासी नुमाइंदगी का बुलंद नारा था। 

इस नारे ने कई तबकों में उम्मीद जगाई। हिजाब को पहचान, अस्मिता और सियासी हक़ के प्रतीक के तौर पर पेश किया गया। लगा कि AIMIM उत्तर प्रदेश में मुस्लिम महिलाओं को सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि लीडरशिप में हिस्सेदार बनाने की बात कर रही है।

मटेरा विधानसभा: वही मैदान, बदले हुए किरदार

आज वक़्त का पहिया घूमकर मटेरा विधानसभा पर आकर रुका है। दिलचस्प बात यह है कि यहां पहले से एक हिजाब पहनने वाली मुस्लिम महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में मौजूद हैं। वह अपनी पहचान, अपने एजेंडे और अपने समर्थकों के साथ जनता के बीच हैं। 

लेकिन सियासी मंज़र अब कुछ और ही कहानी कह रहा है। खबरों और सियासी गलियारों में चर्चा है कि AIMIM उसी मटेरा सीट से खुद अपना उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। यानी जिस हिजाब वाली बेटी को आगे बढ़ाने का नारा दिया गया था, अब उसी जैसी दूसरी हिजाब वाली उम्मीदवार के मुकाबले में पार्टी खड़ी नज़र आ रही है।
सवाल जो अवाम पूछ रही है

यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है। और ये सवाल किसी पार्टी दफ्तर में नहीं, बल्कि नुक्कड़ों, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया पर आम लोग पूछ रहे हैं।

1. नारा बनाम अमल: अगर असल मकसद हिजाब वाली बेटी को सियासी ताकत देना था, तो फिर पहले से मैदान में मौजूद हिजाब वाली उम्मीदवार को मज़बूत क्यों नहीं किया जा रहा? 

2. नुमाइंदगी या टकराव: क्या हिजाब वाली नुमाइंदगी का मतलब सिर्फ अपनी पार्टी के बैनर तले नुमाइंदगी है? अगर मकसद कौम की बेटी को आगे लाना है, तो पार्टी की दीवारें बीच में क्यों आ रही हैं?

3. सियासी गणित: क्या यह फैसला विशुद्ध सियासी मजबूरी है? क्या वोटों के बंटवारे का डर या अपनी सियासी ज़मीन तैयार करने की कोशिश, विचारधारा पर भारी पड़ रही है?

दावों और हकीकत का फासला

सियासत में बयान देना आसान है, लेकिन उन बयानों को ज़मीन पर उतारना सबसे मुश्किल काम होता है। जनता अब सियासी शोर से ज्यादा अमल देखना चाहती है। जब कोई नेता “हिजाब वाली बेटी को मुख्यमंत्री” बनाने की बात करता है, तो अवाम उसे सिर्फ लफ्ज़ नहीं, बल्कि एक वादा मानती है। 

मटेरा का मौजूदा हाल उसी वादे का इम्तिहान है। यहां सवाल सिर्फ AIMIM से नहीं है। यह सवाल हर उस सियासी जमात से है जो औरतों की नुमाइंदगी की बात करती है, लेकिन मौका आने पर सियासी समीकरणों में उलझ जाती है। 

नतीजा क्या होगा?

फिलहाल मटेरा की सियासी तस्वीर साफ नहीं है। आधिकारिक ऐलान का इंतज़ार है। लेकिन एक बात तय है: अवाम अब खामोश नहीं है। वह नारों को याद रखती है और अमल को तौलती है। 

“हिजाब वाली बेटी” का नारा भावनात्मक था, ताकतवर था। अब देखना यह है कि क्या यह नारा सिर्फ चुनावी सभाओं की ज़ीनत बनकर रह जाएगा, या फिर वाकई किसी हिजाब वाली बेटी की सियासी तकदीर बदलेगा। फिलहाल तो दावों और हकीकत के बीच का फर्क, मटेरा के मैदान में सबसे ज़्यादा दिखाई दे रहा है। जनता की अदालत में यह मुकदमा पेश हो चुका है, और फैसला आने वाले वक्त में EVM से निकलेगा।


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 22 Jun 2026
June 22, 2026

लंदन ट्रेन में नस्लभेदी टिप्पणी पड़ी उल्टी, ब्रिटिश डॉक्टर को "वापस जाओ" कहने वाली महिला खुद निकली अवैध प्रवासी

लंदन ट्रेन में नस्लभेदी टिप्पणी पड़ी उल्टी, ब्रिटिश डॉक्टर को "वापस जाओ" कहने वाली महिला खुद निकली अवैध प्रवासी
- Friday World 22 Jun 2026
सोशल मीडिया पर वायरल एक घटना ने लंदन में नस्लवाद और नागरिकता को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है। दावा किया जा रहा है कि लंदन की एक ट्रेन में एक महिला ने अरब मूल के युवक को निशाना बनाते हुए कहा, "अपने देश वापस जाओ, मोरक्को या ट्यूनीशिया।" 

क्या हुआ था ट्रेन में?
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, युवक ने बेहद शांति से जवाब दिया। उसने बताया कि वह ब्रिटिश नागरिक है और NHS यानी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा में डॉक्टर के तौर पर काम करता है। यानी वह उसी देश की सेवा कर रहा है जहां उसे "वापस जाने" को कहा गया। 

युवक ने पलटकर महिला से पूछा, "क्या आप ब्रिटिश नागरिक हैं?" इस सवाल पर महिला चुप हो गई। जवाब देने के बजाय उसने युवक को सुरक्षाकर्मियों से शिकायत करने की धमकी दी।

ट्विस्ट: आरोप लगाने वाली खुद निकली गैर-नागरिक
मामला तब पलट गया जब पुलिस मौके पर पहुंची। जांच में सामने आया कि महिला का नाम उषा पटेल बताया जा रहा है। दावा है कि वह भारतीय मूल की हिंदू महिला थी और उसके पास ब्रिटेन की नागरिकता थी ही नहीं। पुलिस ने महिला को हिरासत में लिया और बाद में उसे देश से निकाल दिया गया। 

वहीं जिस डॉक्टर को "बाहरी" कहा गया, वह कानूनी रूप से ब्रिटेन का नागरिक निकला और देश की स्वास्थ्य सेवा में योगदान दे रहा था।

इस घटना ने दिए 3 बड़े सबक

1. चेहरा देखकर नागरिकता मत तय करो: किसी का रंग, नाम या पहनावा उसकी राष्ट्रीयता तय नहीं करता। ब्रिटेन जैसा देश प्रवासियों के योगदान से ही बना है। NHS में 20% से ज्यादा स्टाफ विदेशी मूल का है।

2. नफरत का बूमरैंग: अक्सर नफरत फैलाने वाला खुद कानून के शिकंजे में फंस जाता है। इस मामले में महिला ने दूसरे की नागरिकता पर सवाल उठाया, लेकिन जांच में वह खुद अवैध निकली। 

3. कानून सबसे ऊपर: ब्रिटेन में नस्लीय टिप्पणी करना अपराध है। पुलिस ने तत्काल कार्रवाई कर साफ संदेश दिया कि किसी को भी उसके मूल के आधार पर टारगेट नहीं किया जा सकता।

क्यों जरूरी है यह चर्चा?
यूरोप और अमेरिका में "अपने देश वापस जाओ" जैसा जुमला अक्सर प्रवासियों के खिलाफ इस्तेमाल होता है। लेकिन यह घटना याद दिलाती है कि "अपना देश" कौन सा है, यह पासपोर्ट तय करता है, चमड़ी का रंग नहीं। 

डॉक्टर ने गुस्से के बजाय तथ्यों से जवाब दिया। उसने साबित किया कि असली देशभक्ति नफरत फैलाने में नहीं, देश की सेवा करने में है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 22 Jun 2026

Sunday, 21 June 2026

June 21, 2026

નલ સે જલમાં 123 કરોડનું ગાબડું: મહીસાગરમાં ભાજપ નેતા સહિત 40 ઝબ્બે, ભ્રષ્ટાચાર આગળ દેશપ્રેમ વામણો

નલ સે જલમાં 123 કરોડનું ગાબડું: મહીસાગરમાં ભાજપ નેતા સહિત 40 ઝબ્બે, ભ્રષ્ટાચાર આગળ દેશપ્રેમ વામણો -Friday World 22 Jun 2026
મહીસાગર જિલ્લામાં "નલ સે જલ" યોજના હેઠળ થયેલા 123 કરોડના મહાકૌભાંડે રાજ્યભરમાં ચકચાર જગાવી છે. પાણી જેવી પાયાની સુવિધાના નામે થયેલી ઉચાપતમાં CID ક્રાઈમે કાર્યવાહીનો દોર વધુ કડક કર્યો છે. તાજેતરમાં ભાજપ સાથે જોડાયેલા કોન્ટ્રાક્ટર સહિત વધુ 3 આરોપીઓની ધરપકડ સાથે કુલ આંકડો 40 પર પહોંચ્યો છે. 

કોણ છે નવા ઝડપાયેલા ત્રણ આરોપી?

1. મુકેશ પુના પટેલ: APMCમાં ભાજપના ડિરેક્ટર. લુણાવાડા અને સંતરામપુરના 14 ગામોમાં કામના નામે 1.78 કરોડની ઉચાપતનો આરોપ. હલકી ગુણવત્તાનું કામ અથવા કામ કર્યા વગર જ ખોટા બિલો મૂકીને સરકારી ગ્રાન્ટ ચાંઉ કરી ગયા. અનેક સરકારી ખાતામાં બાંધકામના કોન્ટ્રાક્ટ ધરાવે છે.

2. હેમેન્દ્રસિંહ સોલંકી: 7 ગામોમાં કામગીરી બતાવી. સરકારની 60 લાખની રીકવરી બાકી.

3. સુભાષચંદ્ર રેવાભાઈ પટેલ: S.R. કન્સ્ટ્રકશનના માલિક. સરકારને 2.46 કરોડની રીકવરી બાકી. આ પેઢી અનેક સરકારી પ્રોજેક્ટમાં કામ કરે છે. જો ઊંડી તપાસ થાય તો વધુ કૌભાંડ બહાર આવે તેવી શક્યતા છે.

કૌભાંડની મોડસ ઓપરેન્ડી શું હતી?
"હર ઘર જલ" એ કેન્દ્ર સરકારની મહત્વાકાંક્ષી યોજના છે. તેનો હેતુ દરેક ઘર સુધી નળ દ્વારા શુદ્ધ પીવાનું પાણી પહોંચાડવાનો છે. મહીસાગરમાં કોન્ટ્રાક્ટરોએ આ યોજનાને કમાણીનું સાધન બનાવી દીધું. કાગળ પર કામ પૂરું બતાવ્યું, ખોટા બિલો મૂક્યા, હલકી ગુણવત્તાની પાઈપલાઈન નાખી અને ઘણી જગ્યાએ તો કામ કર્યા વગર જ પૂરા નાણાં ઉપાડી લીધા. પરિણામ: 123 કરોડની ગ્રાન્ટનું સીધું નુકસાન અને ગામડાં પાણી વગર ટળવળતાં રહ્યાં.

રાજકીય ખળભળાટ કેમ?
મુકેશ પટેલની ધરપકડે ભાજપના સહકારી અને રાજકીય વર્તુળમાં સન્નાટો ફેલાવ્યો છે. APMC જેવી સંસ્થામાં ડિરેક્ટર પદે રહેલી વ્યક્તિ જ જ્યારે ભ્રષ્ટાચારમાં સંડોવાય ત્યારે સવાલ થાય કે "ભ્રષ્ટાચાર સામે ઝીરો ટોલરન્સ"ની વાતોનું શું? આ ઘટના ફરી સાબિત કરે છે કે પૈસાની લાલચ સામે ઘણીવાર પક્ષ, ધર્મ અને દેશપ્રેમની વાતો બાજુ પર રહી જાય છે.

હવે આગળ શું?
CID ક્રાઈમ હવે આ કોન્ટ્રાક્ટરોના અન્ય સરકારી પ્રોજેક્ટની પણ તપાસ કરે તો વધુ મોટા કૌભાંડ બહાર આવી શકે છે. 40 આરોપી પકડાયા તે સારી શરૂઆત છે, પણ મુખ્ય સવાલ એ છે કે 123 કરોડની રીકવરી ક્યારે થશે અને જે ગામોને પાણીથી વંચિત રાખ્યા તેમને ન્યાય ક્યારે મળશે? 

જ્યાં સુધી કડક સજા અને ઝડપી રીકવરી ન થાય ત્યાં સુધી "નલ સે જલ" જેવી યોજનાઓ કાગળ પર જ રહેશે અને ભ્રષ્ટાચારીઓની તિજોરી ભરાતી રહેશે. લોકોની નજર હવે તંત્રની આગામી કાર્યવાહી પર છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 22 Jun 2026
June 21, 2026

इमाम हुसैन (अ.स.) पर गीरया-ओ-मातम: क़ुरान और सुन्नी आलीम की किताबों की रौशनी में

इमाम हुसैन (अ.स.) पर गीरया-ओ-मातम: क़ुरान और सुन्नी आलीमो की किताबों की रौशनी में
- Friday World 22 Jun 2026
इमाम हुसैन (अ.स.) पर गीरया-ओ-मातम: क़ुरान और सुन्नी किताबों की रौशनी में

1. क्या क़ुरान पैग़म्बरों के रोने को बयान करता है?
जो लोग कहते हैं “किताब काफी है” उन्होंने शायद क़ुरान को ग़ौर से नहीं पढ़ा। क़ुरान खुद कई नबियों के ग़म और आँसुओं का ज़िक्र करता है:

- हज़रत याक़ूब (अ.स.): बेटे यूसुफ़ (अ.स.) के फ़िराक़ में इतना रोए कि “उनकी आँखें सफ़ेद हो गईं” और ग़म से नाबीना होने लगे। क़ुरान कहता है: “और उनकी आँखें ग़म से सफ़ेद हो गईं और वह ग़म को दबाए हुए थे” (सूरह यूसुफ़ 12:84)। 10 बेटों के होते हुए एक बेटे के लिए यह हाल था।
- हज़रत नूह (अ.स.): आप का लक़ब “नूह” ही इसलिए पड़ा कि आप अपनी क़ौम के गुमराह होने पर बहुत “नौहा” यानी रोया करते थे। “नूह” नाम का मतलब ही गिरया-ओ-ज़ारी करने वाला है।
- रसूलुल्लाह (स.अ.व.): अहले-सुन्नत की रिवायतों में है कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) बचपन में रोए तो आप (स.अ.व.) घर में दाख़िल हुए और फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हुसैन के रोने से मुझे तकलीफ़ पहुँचती है”। आप (स.अ.व.) ने खुद भी इमाम हुसैन की शहादत की ख़बर सुनकर आँसू बहाए। 

जब अल्लाह के नबी ग़म में रो सकते हैं, तो नवासा-ए-रसूल (स.अ.व.) की मज़लूमाना शहादत पर रोना “बिदअत” कैसे हो गया?

2. इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की पेशीनगोई सुन्नी किताबों में
सुन्नी अहादीस की मोतबर किताबें गवाह हैं कि रसूल (स.अ.व.) ने कर्बला की ख़बर पहले ही दे दी थी:

1. जिब्रईल का पैग़ाम: उम्मुल फ़ज़्ल से रिवायत है कि रसूल (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “जिब्रईल आए थे और मुझे ख़बर दे गए कि मेरी ही उम्मत के कुछ लोग मेरे बेटे को शहीद कर देंगे” और वह कर्बला की लाल मिट्टी भी दे गए। हाकिम नेशापूरी ने इसे “सही” कहा है।

2. कर्बला का नाम: जिब्रईल ने कहा: “इस जगह का नाम ‘तफ़’ यानी कर्बला है जहाँ हुसैन को शहीद किया जाएगा”।

3. रसूल का ग़म: जब जिब्रईल ने यह ख़बर दी तो रसूल (स.अ.व.) रो पड़े और सहाबा को बुलाकर बताया कि “मेरी उम्मत मेरे बाद हुसैन को कर्बला में शहीद कर देगी”। 

सवाल यह है: अगर रसूल (स.अ.व.) हुसैन (अ.स.) के लिए पहले से रोए, तो उम्मती का रोना गुनाह कैसे?

3. “हुसैन मुझसे है, मैं हुसैन से हूँ”
तिर्मिज़ी शरीफ़ की हदीस है: रसूल (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। जो हुसैन से मोहब्बत करेगा, अल्लाह उससे मोहब्बत करेगा”। यानी हुसैन पर ज़ुल्म रसूल पर ज़ुल्म है।  10 मुहर्रम को हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों को भूखा-प्यासा शहीद किया गया। 

4. तो मातम से तकलीफ़ किसे और क्यों?

1. क़ुरान का उसूल: क़ुरान कहता है ज़ालिमों से बेज़ारी ज़रूरी है। सूरह शूरा 42:23 में “क़ुर्बा की मोहब्बत” को अज्र-ए-रिसालत कहा गया। हुसैन (अ.स.) अहलेबैत में सबसे अफ़ज़ल “क़ुर्बा” हैं।

2. तारीख़ी हक़ीक़त: यज़ीद ने ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा किया और इमाम हुसैन ने बैअत से इनकार किया क्योंकि यज़ीद शराब-जुए का आदी ज़ालिम हुक्मरान था। कर्बला की जंग हक़ और बातिल के दरमियान थी।

3. मातम छुपाने की कोशिश?: इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं: “मोहर्रम वह महीना है जिसमें जाहिलियत में जंग हराम थी, लेकिन दुश्मनों ने इसी महीने में हमारा ख़ून बहाया… और हमारे हक़ में पैग़म्बर के एहतराम का ख़याल नहीं किया”। जो लोग मातम को रोकते हैं, कहीं वह क़ातिलों की पहचान तो नहीं छुपाना चाहते? 

5. अहले-सुन्नत में भी अज़ादारी की रिवायत

1. ख़ुलफ़ा का गिरया: हज़रत उस्मान एक क़ब्र पर बैठकर इतना रोए कि दाढ़ी भीग गई।

2. सहाबा का मामूल: रसूल (स.अ.व.) की वफ़ात पर हज़रत अबू-बक्र और सहाबा भी रोए। मदीने की औरतें शहीदों पर नौहा करती थीं।

3. सुन्नी उलमा की किताबें: महाराजा सर किशन परसाद ‘शाद’ ने “मातम-ए-हुसैन” किताब लिखी। यानी मातम का तसव्वुर सुन्नी अदब में भी मौजूद है। 

नतीजा: रोना इंसानियत है, चुप रहना ज़ुल्म की हिमायत
क़ुरान नूह पैगंबर साहब, और याक़ूब पैगम्बर स, आँसुओं को बयान करके बताता है कि मज़लूम पर रोना फ़ितरत और दीन दोनों है। रसूल (स.अ.व.) ने हुसैन (अ.स.) की शहादत पर पहले से आँसू बहाए और उम्मत को आगाह किया।

आज अगर कोई हुसैन (अ.स.) के ग़म पर रोने वालों से तकलीफ़ महसूस करता है तो उसे अपने दिल से सवाल करना चाहिए: क्या मैं उस रसूल के नवासे के क़त्ल पर राज़ी हूँ जिसके लिए रसूल ख़ुद रोए? क्या मैं यज़ीद के ज़ुल्म को जस्टिफ़ाई करना चाहता हूँ?

इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया: “मिस्ले-मन मिस्ले-यज़ीद की बैअत नहीं कर सकता”। हुसैनी बनो, हक़ के लिए खड़ा होना ही असल अज़ादारी है। और आँसू वह एलान हैं कि हम ज़ालिम के साथ नहीं, मज़लूम के साथ हैं। 

लब्बैक या हुसैन (अ.स.)

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 22 Jun 2026