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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Wednesday, 1 April 2026

April 01, 2026

आईआरजीसी की चुनौती: होर्मुज़ स्ट्रेट दुश्मनों के लिए बंद रहेगा – वैश्विक ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है

आईआरजीसी की चुनौती: होर्मुज़ स्ट्रेट दुश्मनों के लिए बंद रहेगा – वैश्विक ऊर्जा संकट गहराता जा रहा है
-Friday World – 2, April 2026 
मध्य पूर्व में जारी युद्ध ने अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे संवेदनशील बिंदु – होर्मुज़ स्ट्रेट – को केंद्र में ला दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं कि होर्मुज़ स्ट्रेट को तुरंत खोल दिया जाए, यहां तक कि सैन्य बल के उपयोग की धमकी भी दी जा रही है। लेकिन ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने साफ-साफ चुनौती देते हुए कहा है कि यह सामरिक जलमार्ग “इस देश के दुश्मनों” के लिए बंद ही रहेगा। 

सरकारी टीवी पर प्रसारित आईआरजीसी के बयान में कहा गया, “होर्मुज़ स्ट्रेट हमारी नौसेना के मजबूत और पूर्ण नियंत्रण में है। यह दुश्मनों के लिए नहीं खोला जाएगा।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब युद्ध के एक महीने से अधिक समय बीत चुका है और वैश्विक तेल आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित हो रही है। 

युद्ध की पृष्ठभूमि और होर्मुज़ का महत्व 

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल द्वारा शुरू किए गए बड़े हमलों के बाद ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। ड्रोन, मिसाइल और संभवतः बारूदी सुरंगों के माध्यम से ईरान ने इस जलमार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। दुनिया का लगभग 20% तेल और गैस इसी संकीर्ण जलमार्ग से गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है।

 ट्रंप प्रशासन ने बार-बार कहा है कि होर्मुज़ स्ट्रेट को खोलना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल है। ट्रंप ने हाल ही में राष्ट्र को संबोधित करते हुए दावा किया कि युद्ध दो-तीन हफ्तों में समाप्त हो जाएगा और स्ट्रेट “स्वाभाविक रूप से” खुल जाएगा। उन्होंने यहां तक कहा कि अमेरिका युद्ध के बाद स्ट्रेट खोलने की जिम्मेदारी अन्य देशों पर छोड़ सकता है। 

लेकिन आईआरजीसी का रुख पूरी तरह अलग है। उन्होंने साफ किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति के “हास्यास्पद प्रदर्शन” से स्ट्रेट दुश्मनों के लिए नहीं खोला जाएगा। ईरान का कहना है कि वह केवल अपने दुश्मनों (अमेरिका और इजराइल से जुड़े जहाजों) को ही रोक रहा है, जबकि अन्य देशों के लिए मार्ग खुला रखा गया है। 

 ब्रिटेन की कूटनीतिक पहल इस तनाव के बीच ब्रिटेन सक्रिय रूप से कूटनीति चला रहा है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने कहा कि बढ़ती महंगाई से निपटने का सबसे अच्छा तरीका तनाव कम करना और होर्मुज़ स्ट्रेट को फिर से खुलवाना है। उन्होंने चेतावनी दी कि आने वाले महीने आसान नहीं होंगे। 

ब्रिटिश विदेश मंत्री येवेट कूपर गुरुवार को लगभग 35 देशों की वर्चुअल बैठक की मेजबानी कर रही हैं। इस बैठक में स्ट्रेट को दोबारा खोलने के लिए व्यावहारिक कूटनीतिक और राजनीतिक उपायों पर चर्चा होगी। ब्रिटेन फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, जापान और कुछ खाड़ी देशों सहित एक गठबंधन के साथ मिलकर काम कर रहा है। 

स्टार्मर ने डाउनिंग स्ट्रीट में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि होर्मुज़ का बंद रहना ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डाल रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटेन युद्ध में सीधे शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वतंत्र नौवहन सुनिश्चित करने के लिए कूटनीतिक प्रयास तेज कर रहा है। 

 ईरानी राष्ट्रपति का संदेश ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने कहा है कि उनके देश में “युद्ध समाप्त करने की जरूरी इच्छाशक्ति” मौजूद है। उन्होंने यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष से फोन पर बातचीत में जोर दिया कि युद्ध खत्म करने का कोई भी फैसला ईरानी लोगों की सुरक्षा, गरिमा और हितों की रक्षा करने वाला होना चाहिए। पेजेश्कियन ने भविष्य में दोबारा आक्रमण न हो, इसके लिए ठोस गारंटी मांगी है।

 उनके बयान के बाद बाजार में कुछ राहत मिली। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गईं। हालांकि, विश्लेषक चेतावनी दे रहे हैं कि अगर स्ट्रेट मध्य अप्रैल तक नहीं खुला तो यूरोप में जेट ईंधन और डीजल की भारी कमी हो सकती है। 

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में 4-5 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी आई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के प्रमुख ने इसे “बहुत बड़ी बाधा” बताया है। तेल की कीमतें पहले 100 डॉलर से ऊपर जा चुकी थीं, जिससे हवाई यात्रा, परिवहन और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतें बढ़ गई हैं। 

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने दुश्मन देशों से जुड़े तीन कार्गो जहाजों को वापस लौटा दिया। आईआरजीसी की नौसेना पूरी तरह तैयार है और किसी भी उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। 

ट्रंप ने कहा था कि अगर ईरान समझौता नहीं करता तो अमेरिका उसके बिजली संयंत्रों, तेल कुओं और खार्ग द्वीप को पूरी तरह नष्ट कर सकता है। लेकिन हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ट्रंप प्रशासन युद्ध को 4-6 हफ्तों में समाप्त करने का लक्ष्य रख रहा है और होर्मुज़ को खोलने की जटिल ऑपरेशन को बाद के लिए टाल सकता है। 

आगे क्या? वर्तमान स्थिति में तीन बड़े मोर्चे सक्रिय हैं: 

1. सैन्य दबाव: अमेरिका और इजराइल ईरान पर दबाव बनाए हुए हैं। 

2. ईरानी प्रतिरोध: आईआरजीसी की मजबूत स्थिति और चुनौती। 

3. कूटनीतिक प्रयास: ब्रिटेन के नेतृत्व में 35 देशों की बैठक। 

विश्लेषकों का मानना है कि अगर कूटनीति कामयाब नहीं हुई तो युद्ध लंबा खिंच सकता है और वैश्विक महंगाई नई ऊंचाइयों को छू सकती है। ईरान का रुख साफ है – वह गरिमा और सुरक्षा की गारंटी के बिना पीछे नहीं हटेगा। वहीं पश्चिमी देश ऊर्जा संकट से बचने के लिए जल्द समाधान चाहते हैं। 

यह संकट न केवल मध्य पूर्व की स्थिरता, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। होर्मुज़ स्ट्रेट की नियति तय करेगी कि आने वाले महीनों में तेल की कीमतें कितनी ऊंची जाएंगी और आम लोगों पर इसका क्या असर पड़ेगा। 

Sajjadali Nayani ✍
Friday World – 2, April 2026 
April 01, 2026

Iranian President’s Open Letter to US Citizens: Is This War Truly “America First”?

Iranian President’s Open Letter to US Citizens: Is This War Truly “America First”?
-Friday World – April 2, 2026
The ongoing conflict in the Middle East has taken a dramatic new turn. More than a month after the US and Israel launched a major military offensive against Iran on February 28, 2026, Iranian President Masoud Pezeshkian has directly addressed the American people through an open letter. In it, he poses a pointed question: Is the current war genuinely serving “America First” priorities, or is the United States being drawn into a costly conflict driven by external influences, particularly Israel, at the expense of American lives and resources? 

The letter was released on Wednesday, April 1, 2026, just hours before US President Donald Trump was scheduled to deliver a national address on the war. Trump had earlier claimed that Iran was seeking a ceasefire, a statement that Tehran firmly denied. Pezeshkian’s message stands out because it appeals directly to ordinary Americans rather than their government, urging them to look beyond official narratives and media portrayals. 

Background of the Conflict: Operation Epic Fury 

On February 28, 2026, the United States and Israel initiated large-scale airstrikes on Iran under the US codename Operation Epic Fury (and Israel’s Operation Roaring Lion). The strikes targeted Iranian military sites, missile and drone facilities, air defense systems, leadership targets, and critical infrastructure including energy and industrial facilities. Reports indicate that Supreme Leader Ayatollah Ali Khamenei and several other high-ranking officials were killed in the initial waves of attacks. 

Iran responded with retaliatory missile and drone barrages targeting Israel and US assets in the region. The conflict has caused significant casualties on all sides, displaced millions, and disrupted regional stability. Iran has also exerted control over the Strait of Hormuz, affecting global oil flows, which has led to economic ripples worldwide, including higher fuel prices and concerns over energy security. 

In his letter, President Pezeshkian highlighted the human and economic cost: “Attacking Iran’s vital infrastructure — including energy and industrial facilities — directly targets the Iranian people. Beyond constituting a war crime, such actions carry consequences that extend far beyond Iran’s borders.” 

Key Messages in the Open Letter Pezeshkian appealed to Americans to question the official storyline and consider whose interests the war truly serves. He asked: 

- Is “America First” genuinely a priority of the US government in this conflict? 

- Which specific interests of the American people are being advanced by this war?

 - Is the United States acting as a proxy for Israel, fighting a battle that could consume “the last American soldier and the last American taxpayer dollar”? 

He emphasized that the Iranian people hold no inherent enmity toward Americans, Europeans, or their neighbors, despite repeated foreign interventions and pressures. “The Iranian people do not consider the American people as their enemy,” he wrote. 

The letter strongly criticized what Pezeshkian described as a “machinery of misinformation” and “flood of distortions” that paint Iran as an existential threat. He accused Israel of manufacturing an “Iranian danger” to divert attention from its own actions in Palestine and to advance its ambitions, placing the burden on Iran, the wider region, and even the United States.

 At the same time, the Iranian president presented a more positive image of his country. He encouraged Americans to speak with people who have visited Iran or with successful Iranian immigrants who teach at top universities, conduct research, or contribute to advanced technology companies in the West. These realities, he argued, do not match the negative portrayals being circulated. 

While not directly referencing Trump’s ceasefire claim, Pezeshkian noted that the path of confrontation is becoming increasingly costly and futile. Iran has maintained that its actions are defensive and that it was engaged in negotiations before the strikes began. 

Global and Economic Repercussions

 The war has extended beyond the battlefield. Iran’s actions in the Strait of Hormuz — a critical chokepoint for global oil shipments — have created uncertainty in energy markets. Some reports mention toll collection in Chinese yuan, signaling shifts in international trade patterns. Additional security surcharges have affected air travel, and several Gulf countries, including Kuwait, Bahrain, UAE, and Saudi Arabia, have been involved in intercepting missiles.

 European nations have deployed assets to Cyprus in response to regional threats. The conflict has also intensified fighting in Lebanon and kept the Palestinian issue in the spotlight. Analysts warn that the economic fallout — from fuel crises to broader instability — could impact economies far from the Middle East. 

Pezeshkian warned that attacks on Iran’s core infrastructure would have lasting effects not limited to his country, affecting global energy security and regional stability. 

A Battle of Narratives Many observers view the open letter as part of a “narrative war.” Iran is attempting to influence American public opinion directly, bypassing the US government and mainstream media. By addressing citizens rather than leaders, Pezeshkian aims to create a divide between the American people and policies that may not serve their long-term interests. 

Trump’s administration, on the other hand, has framed the operation as necessary to dismantle threats posed by Iran’s military capabilities, missile programs, and regional influence. In his national address, Trump indicated that core strategic objectives were nearing completion and suggested the conflict could wind down in the coming weeks, while maintaining a firm stance on keeping the Strait of Hormuz open. 

Public support for prolonged US involvement appears mixed, with growing concerns over costs, casualties, and potential mission creep. Pezeshkian referenced Iran’s history of resilience, noting that the nation has endured many aggressors in the past and will continue to do so. 

The Road Ahead: Dialogue or Continued Conflict? The letter leaves some space for diplomacy. Pezeshkian suggested that engagement could be more beneficial than confrontation for future generations. However, he also displayed firmness, reaffirming Iran’s right to self-defense.

 For Americans, the message invites reflection: Does the current foreign policy truly protect US interests, or is the country being pulled into expensive wars influenced by external agendas? The Iranian president’s core point is clear — “You are not our enemy.”

 As the war enters its second month, the situation remains fluid. Military operations continue alongside diplomatic maneuvering. Pezeshkian’s open letter may be remembered as a notable moment in which a leader in conflict spoke directly to the people of an adversary nation, appealing for understanding amid the fog of war. 

Whether it influences US public opinion or policy remains to be seen. In an era of information overload, direct appeals like this highlight the importance of critical thinking and questioning dominant narratives. 

Sajjadali Nayani ✍
Friday World – April 2, 2026


April 01, 2026

इरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी नागरिकों को खुला पत्र: क्या यह युद्ध सच में "अमेरिका फर्स्ट" है?

इरान के राष्ट्रपति का अमेरिकी नागरिकों को खुला पत्र: क्या यह युद्ध सच में "अमेरिका फर्स्ट" है?
-Friday World-April 2,2026 
दुनिया के सबसे जटिल और संवेदनशील क्षेत्र मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने एक नया मोड़ ले लिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल की संयुक्त सैन्य कार्रवाई से शुरू हुए युद्ध के एक महीने से अधिक समय बाद, इरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अमेरिकी जनता को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने सीधे सवाल किया है – क्या यह युद्ध वाकई अमेरिका के हितों को प्राथमिकता दे रहा है? क्या ट्रंप प्रशासन की नीतियां "अमेरिका फर्स्ट" के नारे को साकार कर रही हैं, या फिर इजराइल के प्रभाव में अमेरिका अपने नागरिकों की कीमत पर दूसरे के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है?

 यह पत्र ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध पर राष्ट्र को संबोधित करने वाले थे। ट्रंप ने दावा किया कि इरान युद्धविराम चाहता है, लेकिन तेहरान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। पेजेश्कियन के पत्र ने वैश्विक ध्यान खींच लिया है, क्योंकि इसमें इरान ने अमेरिकी लोगों को दुश्मन नहीं मानते हुए सीधा संवाद स्थापित करने की कोशिश की है। 

 युद्ध की पृष्ठभूमि: 28 फरवरी का हमला और उसके बाद 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल ने "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" के तहत इरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले शुरू किए। इन हमलों में इरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल सुविधाओं, वायु रक्षा प्रणालियों और ऊर्जा व औद्योगिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, इन हमलों में इरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई सहित कई उच्च अधिकारी मारे गए। इरान ने इसे आक्रामकता बताया और जवाबी कार्रवाई की, जिसमें इजराइल और क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले शामिल थे। 

युद्ध के परिणामस्वरूप मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ गई है। होर्मुज की खाड़ी में इरान ने तेल परिवहन प्रभावित किया, जिससे वैश्विक तेल की कीमतें प्रभावित हुईं और अर्थव्यवस्था में अशांति फैली। हवाई यात्रा पर अतिरिक्त सुरक्षा शुल्क लगे, कई देशों में ईंधन संकट की आशंका बढ़ी। हजारों लोग मारे गए, लाखों विस्थापित हुए। इरान का कहना है कि इन हमलों ने उसके लोगों को सीधे निशाना बनाया है। 

पेजेश्कियन के पत्र में इस पर जोर दिया गया: "इरान की महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाओं – ऊर्जा और औद्योगिक सुविधाओं – पर हमला सीधे तौर पर इरानी लोगों को निशाना बनाता है। यह न केवल युद्ध अपराध है, बल्कि इसके परिणाम इरान की सीमाओं से कहीं आगे तक फैलते हैं।" 

पत्र का मुख्य संदेश: अमेरिकी लोगों से सीधा अपील पेजेश्कियन ने अपने पत्र में अमेरिकी नागरिकों से अपील की कि वे मीडिया और सरकारी "गलत सूचना की मशीनरी" से परे जाकर सोचें। उन्होंने पूछा:

 - क्या यह युद्ध सच में "अमेरिका फर्स्ट" नीति को मजबूत कर रहा है? 

- अमेरिकी लोगों के कौन से हित इस युद्ध से पूरे हो रहे हैं? 

- क्या अमेरिका इजराइल का "प्रॉक्सी" बनकर लड़ रहा है, जहां इजराइल "आखिरी अमेरिकी सैनिक और आखिरी अमेरिकी टैक्सपेयर के डॉलर" तक लड़ना चाहता है? 

राष्ट्रपति ने जोर दिया कि इरानी लोग किसी भी राष्ट्र से, चाहे वह अमेरिका हो, यूरोप हो या पड़ोसी देश, दुश्मनी नहीं रखते। उन्होंने कहा, "इरानी लोग बार-बार विदेशी हस्तक्षेप और दबावों के बावजूद अमेरिकी लोगों को अपना दुश्मन नहीं मानते।" 

पत्र में इजराइल की भूमिका पर तीखा हमला किया गया। पेजेश्कियन ने आरोप लगाया कि इजराइल "ईरानी खतरे" को गढ़कर फिलिस्तीनियों के खिलाफ अपने अपराधों से विश्व का ध्यान भटका रहा है। उन्होंने लिखा कि इजराइल अपनी "भ्रमित महत्वाकांक्षाओं" का बोझ इरान, क्षेत्र और अमेरिका पर डाल रहा है। 

इसके अलावा, उन्होंने इरान की सकारात्मक छवि पेश की – इरानी आप्रवासी जो विश्व की बेहतरीन यूनिवर्सिटीज में पढ़ाते हैं, रिसर्च करते हैं या टेक्नोलॉजी कंपनियों में योगदान देते हैं। उन्होंने अमेरिकियों से कहा कि वे इरान आए लोगों या इरानी मूल के सफल व्यक्तियों से बात करें, न कि सिर्फ विकृत कथाओं पर विश्वास करें।

 ट्रंप के युद्धविराम वाले दावे का सीधा जिक्र नहीं किया गया, लेकिन पत्र में युद्ध को "अधिक महंगा और व्यर्थ" बताया गया। इरान ने बार-बार कहा कि उसकी कार्रवाई आत्मरक्षा पर आधारित है। 

वैश्विक प्रभाव और आर्थिक उथल-पुथल यह युद्ध सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक स्तर पर भी दुनिया को प्रभावित कर रहा है। तेल आपूर्ति प्रभावित होने से कीमतें बढ़ीं, हालांकि कुछ रिपोर्ट्स में बाद में गिरावट भी दर्ज की गई। हवाई यात्रा महंगी हुई, क्षेत्रीय हवाई अड्डों पर हमलों के बाद सुरक्षा बढ़ाई गई। कई देशों ने मिसाइलों को रोकने की कोशिश की, जिसमें कुवैत, बहरीन, यूएई और सऊदी अरब शामिल हैं।

 इरान ने होर्मुज स्ट्रेट में नियंत्रण का दावा किया और तेल परिवहन पर चीनी युआन में टोल लेना शुरू किया, जो वैश्विक ऊर्जा व्यापार को नया आयाम दे रहा है। यूरोपीय देशों ने साइप्रस में सैन्य संपत्तियां तैनात कीं। लेबनान में संघर्ष बढ़ा, फिलिस्तीन मुद्दा फिर चर्चा में आया। 

पेजेश्कियन ने चेतावनी दी कि इरान की बुनियादी सुविधाओं पर हमले के दूरगामी परिणाम होंगे, जो सिर्फ इरान तक सीमित नहीं रहेंगे। वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता सब प्रभावित हो रहे हैं। 

क्या कहते हैं विश्लेषक? यह पत्र युद्ध के "नैरेटिव वॉर" का हिस्सा माना जा रहा है। इरान अमेरिकी जनमत को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है, जबकि ट्रंप प्रशासन इरान को "आतंकवाद का प्रायोजक" बताकर अपनी कार्रवाई को न्यायोचित ठहरा रहा है। कुछ विश्लेषक इसे इरान की कूटनीतिक रणनीति मानते हैं, जिसमें सीधे अमेरिकी लोगों से बात कर सरकार और मीडिया के बीच दरार डालने की कोशिश है।

 ट्रंप के संबोधन से पहले यह पत्र जारी होना महत्वपूर्ण है। अमेरिका में युद्ध की लोकप्रियता घट रही है, आर्थिक चिंताएं बढ़ रही हैं। पेजेश्कियन ने इरान के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि इरान कई आक्रमणकारियों का सामना कर चुका है और आगे भी टिकेगा। 

 आगे का रास्ता: संवाद या संघर्ष? पेजेश्कियन के पत्र में शांति की गुंजाइश छोड़ी गई लगती है, लेकिन साथ ही दृढ़ता भी दिखाई गई। इरान का कहना है कि वह बातचीत के लिए तैयार था, समझौते का पालन किया, लेकिन अमेरिका ने टेबल छोड़ दी। अब युद्ध जारी है, और दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्थिति पर अड़े हुए हैं। 

यह पत्र अमेरिकी नागरिकों के लिए सोचने का विषय है – क्या विदेश नीति उनके हितों की रक्षा कर रही है, या बाहरी प्रभावों में फंसकर महंगे युद्धों में उन्हें झोंक रही है? इरान का संदेश साफ है: "आप हमारे दुश्मन नहीं हो।" 

युद्ध की जटिलता बढ़ती जा रही है। वैश्विक समुदाय को उम्मीद है कि कूटनीति से रास्ता निकले, लेकिन फिलहाल सैन्य कार्रवाइयां जारी हैं। पेजेश्कियन का यह खुला पत्र इतिहास में दर्ज हो सकता है – एक राष्ट्रपति द्वारा दूसरे देश की जनता से सीधा संवाद, जो युद्ध के बीच शांति और सत्य की अपील करता है। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 2,2026 
April 01, 2026

नो किंग्स-नो वार : हमले और प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता

नो किंग्स-नो वार : हमले और प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता
-Friday World ✍ April 2,2026 
आलेख : प्रभात पटनायक, अनुवाद : राजेंद्र शर्मा

जो भारत सरकार बहुत ही डरपोक साबित हुई है और जिसने ईरान पर अमेरिकी-इस्राइली हमले पर निंदा का एक शब्द तक नहीं बोला है, अब मीडिया में काम कर रहे अपने विभिन्न हमदर्दों के जरिए यह दिखाने में जुटी हुई है कि उसका इस लड़ाई में कोई भी पक्ष लेने से इंकार करना और उसका इस मामले में आम तौर पर चुप्पी साधे रखना, वास्तव में मास्टरस्ट्रोक है और ऐसा करना ही देश के बेहतरीन हित में है।

इसके लिए दलील यह दी जा रही है कि अमेरिकी-इस्राइली हमले की निंदा करना, नैतिक आधार पर तो सही प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन किसी देश को अपनी विदेश नीति तो राष्ट्रीय हितों की ठोस सचाई के आधार पर तय करनी होती है, न कि ‘‘हवा-हवाई’’ नैतिक आग्रहों के आधार पर। इसलिए, भारत के राष्ट्रीय स्वार्थ तो इसी का तकाजा करते हैं कि हम पश्चिम के साथ अपने रिश्ते बनाए रखें, न कि किसी अमूर्त तीसरी दुनिया की एकजुटता के नाम पर, जो नैतिक रूप से भले ही संतोषजनक हो, पर भौतिक रूप से हमें कोई फायदा नहीं देने वाली है, पश्चिम के साथ रिश्तों को बिगाड़ लें।

लेकिन, दो कारणों से यह बहुत ही खतरनाक दलील है। पहला तो यह कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में नैतिक आग्रहों का परित्याग करना खतरनाक है, क्योंकि यह तो दूसरे विश्व युद्ध के बाद की समूची अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के त्यागे जाने को औचित्य प्रदान करना हो जाता है। 

हमारे यह कहने का अर्थ यह कतई नहीं है कि युद्धोत्तर व्यवस्था ने, जिसमें संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था भी शामिल है, हर बार नैतिक तरीके से सही काम ही किया है। यह कहने का आशय सिर्फ इस तथ्य को रेखांकित करना है कि इस व्यवस्था को और इसके साथ जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को, बुनियादी तौर पर कुछ खास नैतिक आग्रहों से ही औचित्य हासिल होता था, जिनके आगे साम्राज्यवाद को सिर झुकाना पड़ा था, क्योंकि दूसरे विश्व युद्ध में वह कमजोर हो गया था। बेशक, इस पूरे दौर में ही वह बार-बार अपनी जानी-पहचानी कपट लीला भी करता रहा था, लेकिन ये प्रसंग जब-तब होते थे और उपयुक्त मौका हाथ आने पर निर्भर होते थे। सबसे बढक़र यह कि उसके कपट लीला के कुकृत्य, तीसरी दुनिया की अपने अनुकूल न पड़ने वाली सरकारों के खिलाफ घरेलू तख्तापलट के आवरण में पेश किए जाते थे और ये आम तौर पर नंगई से हमले का रूप नहीं लेते थे। इस व्यवस्था का परित्याग ही करने की दलील देना, जो काम अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में नैतिक आग्रहों का उपहास करना होता है, नंगे साम्राज्यवादी हमले को उचित ठहराने का ही काम करता है।

*हमलावर साम्राज्यवाद पर कमज़ोर हुआ अंकुश*

दूसरे, इस व्यवस्था का ही परित्याग करने की सूरत में हमें सिर्फ जब-तब साम्राज्यवादी हमले के प्रकरणों का ही सामना नहीं करना पड़ेगा, बल्कि हमलों की एक अविराम शृंखला का ही सामना करना पड़ रहा होगा, जो औपनिवेशिक शासन से औपचारिक स्वतंत्रता हासिल करने की तीसरी दुनिया की बहुत भारी उपलब्धि को ही पलट देगा। एक विशेष परिस्थिति-संयोग के चलते ही तीसरी दुनिया को औपनिवेशिक या अर्ध-औपनिवेशिक गुलामी से आजादी हासिल हुई थी। इस परिस्थिति-संयोग की पहचान उत्पीड़ित जनगण के एक वैश्विक ऐतिहासिक उभार से होती थी, जिसे बोल्शेविक क्रांति से जबर्दस्त बल मिला था। इस सचाई को तो अमेरिकी विदेश सचिव, मार्को रूबियो तक ने कुछ ही हफ्ते पहले यूरोपीय नेताओं के सामने अपने कुख्यात भाषण में स्वीकार किया था। इस परिस्थिति-संयोग के पराभव से, जिसका सबसे बढक़र द्योतक सोवियत संघ का पराभव था, साम्राज्यवादी हमले की पलट द्वंद्वात्मकता उन्मुक्त हो गयी है।

इस द्वंद्वात्मकता की पहचान अनेक घटना-विकास से होती है। जैसे विभिन्न ‘रंगीन क्रांतियों’ या कलर रिवोल्यूशन्स के जरिए पूर्व-सोवियत गणराज्यों में साम्राज्यवादी घुसपैठ। नाटो का रूस की सीमाओं तक विस्तार किया जाना। ग़ज़ा में भयावह नरसंहार। इस्राइली सैटलर उपनिवेशवाद का क्षेत्रीय विस्तार। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी का अमेरिका द्वारा अपहरण। क्यूबा में समाजवादी क्रांति को खत्म करने के लिए, क्यूबा में हस्तक्षेप करने की अमेरिका की खुली धमकी। और अब ईरान के खिलाफ खुल्लमखुल्ला युद्ध।
इस समय ईरान इस हमले का जो जोशीला प्रतिरोध कर रहा है, वह साम्राज्यवादी हमले की इस द्वंद्वात्मकता पर रोक का काम कर रहा है। अगर किसी तरह यह प्रतिरोध परास्त हो जाता है, तो साम्राज्यवादी हमले की यह द्वंद्वात्मकता और भी नंगई से तथा और भी दबंगई से आगे भी जारी रहेगी।

इसलिए, वर्तमान ईरानी निजाम की विचारधारा तथा उसकी संस्थाओं के प्रति हमारा रुख चाहे जो भी हो, आज साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ हमारा ईरान का समर्थन नहीं करना, हमारे अपने देश को कल को साम्राज्यवादी प्रभुत्व के लिए अरक्षित बनाना ही होगा। दूसरे शब्दों में साम्राज्यवाद के खिलाफ ईरान का समर्थन, सिर्फ नैतिक आग्रह का मामला नहीं है, बल्कि हमारी अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए, साम्राज्यवादी हमले की अनमनीय द्वंद्वात्मकता को रोकने के लिए जरूरी है। आज ईरान में क्या होता है, इसका असर सिर्फ ईरान पर नहीं पड़ेगा, बल्कि इसके साथ हमारी अपनी स्वतंत्रता भी जुड़ी हुई है।

*साम्राज्यवाद की कच्चे मालों और संसाधनों की भूख*

इस साम्राज्यवादी द्वंद्वात्मकता की अटलता डोनाल्ड ट्रंप के सनकीपन में निहित नहीं है, बल्कि यह तो पूंजीवाद की प्रकृति में अंतर्निहित है। लेनिन ने, जो ऐसे हालात में लिख रहे थे, जहां पूंजीवादी दुनिया को साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिद्वंद्विताओं ने टुकड़ों में बांट दिया था, साम्राज्यवादी बुलडोजर के इस अटल मार्च की ओर ध्यान खींचा था। इसके चलते बहुत बार यह समझ लिया जाता है कि इलाकों को हड़पने की साम्राज्यवाद की प्यास, सिर्फ साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिस्पर्धा से जुड़ी हुई है। लेकिन, यह भ्रांतिपूर्ण है।

इस तथ्य से कि वर्तमान परिस्थिति की पहचान साम्राज्यवाद की आपसी प्रतिस्पर्धा के शमन से होती है, साम्राज्यवाद के इस अटल मार्च में रत्ती भर कमी नहीं आती है। कच्चे मालों के वास्तविक या संभावित स्रोतों पर नियंत्रण की तलाश, जिसकी ओर लेनिन ने ध्यान खींचा था, साम्राज्यवाद के लिए आज भी उतनी ही प्रबल है, जितनी कि उनके जमाने में थी। इसलिए, कच्चे माल के इन वास्तविक या संभावित स्रोतों को, तीसरी दुनिया की स्वतंत्र सरकारों के नियंत्रण में जाने से रोकना, साम्राज्यवाद के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण मामला हो जाता है।

साम्राज्यवादी दुनिया की पहचान तो राजधानियों के बीच डार्विनवादी ढंग की प्रतिस्पर्धा से होती है और उसके कदम, इस तरह की प्रतिस्पर्धा के सर्वव्यापीपन से अनुशासित होते हैं। इस दुनिया में, साम्राज्यवाद कभी भी, स्थायी संतुलन की किसी अवस्था में टिका रह ही नहीं सकता है। और वह शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की किसी स्थायी अवस्था को भी मंजूर नहीं कर सकता है। लेनिन ने जिसे ‘आर्थिक इलाका’ या इकॉनमिक टेरेटरी कहा था, उस पर कब्जा करने की मुहिम, इसके अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए, साम्राज्यवाद का उस युद्धोत्तर व्यवस्था का अंर्तध्वंस करने की कोशिश करना, जो इस पर कुछ अंकुश लगाती थी, इसके अस्तित्व में ही अंतर्निहित है। और सोवियत संघ के पराभव के रूप में एक ‘जीत’ हासिल हो जाने के बाद, वे अब हमले की अपनी द्वंद्वात्मकता को आगे बढ़ाना चाहेंगे। तीसरी दुनिया के जनगण इस हमले की काट प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता से कर सकते हैं और इस मुकाम पर, इस द्वंद्वात्मकता के केंद्र में होना चाहिए, जो कोई भी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहा हो, उसका समर्थन करना।

इस्लामवाद के सामराजी इस्तेमाल की विडंबना

इस दलील का एक विशिष्ट संदर्भ भी है। समाजवाद के खिलाफ और तीसरी दुनिया में धर्मनिरपेक्ष, प्रगतिशील राष्ट्रवाद के खिलाफ अपने संघर्ष में, साम्राज्यवाद ने अपने हथियार के तौर पर इस्लामवाद का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। धुर-साम्राज्यवादी विन्स्टन चर्चिल के ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ भारतीय जनता के संघर्ष को नष्ट करने के औजार के रूप में, भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम अलगाववाद को समर्थन देने से लेकर; ईरान में मोहम्मद मुसद्देह के धर्मनिरपेक्ष तथा प्रगतिशील निजाम के खिलाफ तख्तापलट कराने के लिए अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा अयातुल्ला कासानी के साथ गठजोड़ कायम किये जाने तक ; अफगानिस्तान में सौर क्रांति के खिलाफ अमेरिका द्वारा इस्लामवादी ताकतों के इस्तेमाल तक, जिसने सोवियत संघ को थकाने का भी काम किया था ; एक जैसी कहानी है। यह कहानी है साम्राज्यवाद द्वारा तीसरी दुनिया में प्रगतिशील आंदोलनों को विफल करने के लिए, जनता को धार्मिक आधार पर विभाजित किए जाने की।

इसके बावजूद, पहली नजर में यह इतिहास की एक विडंबना लग सकती है, लेकिन वास्तव में हालात के तर्क पर आधारित सचाई यह है कि इस्लामवादी ताकतें भी जब सत्ता में आयी हैं, अक्सर वे भी साम्राज्यवाद के खिलाफ हो गयी हैं। ऐसे मुकाम पर साम्राज्यवाद ‘जनतंत्र’ तथा ‘स्वतंत्रताओं’ के रखवाले का बाना धारण कर के सामने आता है और उन्हीं निजामों के खिलाफ कदम उठाने लगता है, जिनकी खुद उसने सत्ता में आने में मदद की होती है। कभी-कभी तो उसने इससे उल्टा भी किया है और धर्मनिरपेक्ष निजामों का समर्थन किया है, जिन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ी हो गयी इस्लामवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी हों। ईरान-इराक युद्ध के दौरान उसने ऐसा ही किया था।

यह तो हमारे उपनिवेशविरोधी स्वतंत्रता संघर्ष का अपमान है

ऐसे निजामों के खिलाफ, जो साम्राज्यवाद से रंजिश मानते हैं या ऐसे निजामों के प्रति भी, जो साम्राज्यवाद के प्रति ज्यादा दोस्ताना रुख नहीं रखते हैं, असंतोष भड़काने के लिए साम्राज्यवाद हमेशा से ही नेशनल एंडाउमेंट फॉर डैमोक्रेसी (एनईडी) जैसे अपने औजारों का इस्तेमाल करता आया है। एनईडी को, जो यूक्रेन में विक्टर यानुकोविच के खिलाफ सक्रिय रहा था और उसके खिलाफ तथाकथित ‘जन-विद्रोह’ भड़काने में उसे सफलता भी मिली थी, ईरान में इस्लामी निजाम के खिलाफ ‘जन-विद्रोह’ में मदद करने तथा उसे बढ़ावा देने के लिए भी काम पर लगाया गया था। बहरहाल, ईरान में यह कोशिश नाकाम रही और इस नाकामी की पृष्ठभूमि में ही साम्राज्यवाद ने ईरान पर सीधे सैन्य हमला किया है।

आज जबकि ईरान पर हमला जारी है, इसे सारी दुनिया पर दबदबा कायम करने की साम्राज्यवाद की वृहत्तर परियोजना से अलग कर के देखना, एक आपराधिक भूल होगी। इस तरह की भूल करना, एक प्रकार से उसी गलती को दोहराना होगा, जो खुद इस्लामवादियों ने अतीत में की थी, जब उन्होंने तीसरी दुनिया के प्रगतिशील निजामों के खिलाफ साम्राज्यवाद के साथ गठजोड़ कायम किया था। इसलिए, साम्राज्यवाद के मंसूबों को विफल करने के लिए और साम्राज्यवाद की हमले की द्वंद्वात्मकता के खिलाफ प्रतिरोध की द्वंद्वात्मकता को खड़ा करने के लिए, तीसरी दुनिया के जनगण की एकता जरूरी है।

जाहिर है कि यह सब हिंदुत्ववादी तत्वों की समझ में नहीं आएगा। आखिरकार, उनके पूज्य-पुरुषों में से एक, वीडी सावरकर ने भारत में ‘‘द्विराष्ट्र’’ सिद्धांत का प्रवर्तन किया था, जिसका मोहम्मद अली जिन्ना ने प्रसार किया था और जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के तत्कालीन नेता, विंस्टन चर्चिल ने सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया था। हिंदुत्ववादी तत्वों का इस्राइल के साथ रब्त-जब्त रखना और अमेरिका की हां में हां मिलाना, ईरान के खिलाफ युद्ध के सवाल पर उनकी कायरतापूर्ण चुप्पी से पूरी तरह से मेल खाता है। यह चुप्पी, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष से निकली कोई भी प्रगतिशील राष्ट्रवादी धारा जो करती, उससे ठीक उल्टी है। यह स्वांग करना कि यह चुप्पी भारतीय जनता के बेहतरीन हित में है, सरासर बकवास है! यह सिर्फ साम्राज्यवाद की करतूतों की ओर से आंखें मूंदना ही नहीं है, हमारे देश के उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष का अपमान भी है।  

Friday World ✍ April 2,2026 

*(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं। अनुवादक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
April 01, 2026

हवाई चप्पल वाले विमान में या हवाई सेवाएं जमीन पर!

हवाई चप्पल वाले विमान में या हवाई सेवाएं जमीन पर!
-Friday World ✍ April 2,2026 
(आलेख : राजेंद्र शर्मा)

बुनियादी सुविधाओं के मामले में आर्थिक सामर्थ्य के इस संकट का, मांग का संकट बनकर इस तरह सामने आ खड़ा होना, खासतौर पर नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के अपनाए जाने का नतीजा है। जब तक बुनियादी सुविधाएं मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र में थीं, तब तक चूंकि उन्हें आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से संचालित नहीं किया जाता था, इन सुविधाओं की आपूर्ति की तंगी तो हो सकती थी, लेकिन उनके मांग की कमी की वजह से अनुपयोगी रह जाने का संकट नहीं हो सकता था। 

हैरानी की बात नहीं है कि हमारे उद्घाटन-वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, पांच विधानसभाई चुनावों के लिए अपने प्रचार के औपचारिक चरण के लिए दिल्ली से रवाना होने से ठीक पहले, एक धमाकेदार उद्घाटन करना जरूरी समझा। हम राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में निर्माणाधीन नये हवाई अड्डे के पहले चरण के उद्घाटन की बात कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने इस हवाई अड्डे के निर्माण को अपने राज में तेजी से हो रही प्रगति के साक्ष्य के रूप में ही पेश नहीं किया, देश के लिए जरूरी विकास के मॉडल के तौर पर भी पेश किया, जो उनकी पार्टी के डबल इंजन राज की ही कृपा से उत्तर प्रदेश को नसीब हो रहा है। यहां ढांचागत क्षेत्र के विकास के इस मॉडल की जरा नजदीक से पड़ताल करना अप्रासांगिक नहीं होगा, जिसे बहुत से विश्लेषणकर्ता नुमाइशी (वेनिटी) विकास मॉडल मानते हैं। 

स्वाभाविक रूप से शनिवार 28 मार्च के जेवर एअरपोर्ट के उद्घाटन की खबरों ने राजधानी में और खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी सुर्खियां बटोरीं। आखिरकार, राजधानी से दिल्ली के वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुछ ही दूर, 12 किलोमीटर की दूरी पर यह नया हवाई अड्डा बन रहा है, जिसे न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों के लिए हवाई यात्रा की सुगमता करने वाला बताया जा रहा था, बल्कि खबरों में तो 'देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा' कहकर भी प्रचारित किया जा रहा था। यह दूसरी बात है कि छोटे प्रिंट में दी जा रही जानकारियां, एक तरह से हाथ के हाथ इस दावे की अतिरंजना को भी उजागर कर रही थीं। सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री ने इस हवाई अड्डे के निर्माण के पहले चरण का ही उद्घाटन किया है, जिसमें कार्गो टर्मिनल तथा मरम्मत, रख-रखाव आदि से संबंधित हिस्से ही शामिल हैं। इस चरण पर करीब 11,200 करोड़ रुपए की लागत आई है। इस हवाई अड्डे का निर्माण चार चरणों में, 2040 तक पूरा होना है। फिलहाल, कुछ घरेलू उड़ानों के शुरू होने की चर्चा जरूर है, लेकिन उसकी भी कोई निश्चित तारीख तय नहीं की गयी है। हैरानी की बात नहीं होगी कि उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभाई चुनाव से पहलेे, प्रधानमंत्री एक बार फिर इस हवाई अड्डे के किसी हिस्से का उद्घाटन करने के लिए यहां लौटें।

जहां तक संबंधित परियोजना का सवाल है, प्रधानमंत्री ने कहा कि यह एक ढांचागत परियोजना ही नहीं है, बल्कि "'विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश' अभियान का नया अध्याय है। यह एअरपोर्ट उत्तर भारत के लिए लॉजिस्टिक गेटवे बनकर निवेश, व्यापार और निर्यात को नयी गति देगा।...पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए विकास का नया द्वार खोलेगा", आदि। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने यह दावा भी किया कि इससे, "किसानों, छोटे और लघु उद्योगों और युवाओं को व्यापक अवसर प्राप्त होंगे।" प्रधानमंत्री ने इस परियोजना के साकार होने के लिए किसानों के 'जमीन के योगदान' के लिए आभार ही व्यक्त नहीं किया, किसानों को यह सपना भी दिखाया कि उनके कृषि उत्पाद अब वैश्विक बाजारों तक पहुंच सकेंगे! प्रधानमंत्री ने यह दावा भी किया कि यह एअरपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं को रोजगार और अवसरों की नयी दिशा देगा। लेकिन कैसे, यह स्पष्ट करने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी। 

प्रधानमंत्री इस मौके पर गिनती को तर्क बनाने का खेल नहीं खेलते, यह तो संभव ही नहीं था। प्रधानमंत्री ने इसे अपने राज में उत्तर प्रदेश के तेजी से विकास कर रहे होने का पैमाना बनाया कि उत्तर प्रदेश अब पांच अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों वाला देश का पहला राज्य बन गया है। और यह भी कि मोदी के शासन संभालने से पहले, देश में कुल 74 हवाई अड्डे थे, जबकि अब तक यह संख्या बढ़कर 160 से अधिक हो चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या और विकास के इसी समीकरण को और पुख्ता करते हुए, 28 मार्च के उद्घाटन ईवेंट से ठीक पहले, 25 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए संशोधित उड़ान योजना को मंजूरी दी थी, जिसमें दस वर्ष में 100 हवाई अड्डे बनाने का ऐलान किया गया है। इस योजना के लिए 28,840 करोड़ रुपए के निवेश का लक्ष्य रखा गया है। अगर हवाई अड्डे बनना ही विकास का पैमाना है, तो जाहिर है कि मोदी राज में देश का बहुत तेजी से विकास हो रहा है।

लेकिन, यहीं उत्तर प्रदेश का ही एक और आंकड़ा सामने आकर खड़ा हो जाता है, जिसकी प्रधानमंत्री मोदी के हवाई क्षेत्र के विकास के दावों के जवाब में, समाजवादी पार्टी नेता, अखिलेश यादव ने याद दिलाई है। यह आंकड़ा जो वास्तव में एक आरटीआई के सरकारी जवाब में सामने आया है, यह दर्शाता है कि हवाई कनेक्टिविटी का विस्तार कर, अपेक्षाकृत कम आबादी के केंद्रों को उसके दायरे में लाने के इरादे से, पिछले पांच-छ: साल में उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर, 7 नये हवाई अड्डे शुरू किए गए थे। लेकिन, इनमें से पूरे 6 हवाई अड्डे बंद हो चुके हैं, जहां से नियमित रूप से कोई हवाई सेवा काम ही नहीं कर रही है। इनमें आजमगढ़, अलीगढ़, मुरादाबाद, आगरा, कुशीनगर, चित्रकूट आदि के हवाई अड्डे शामिल हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि सैकड़ों करोड़ रुपए की लागत से और कीमती जमीन लगाकर बनाए गए हवाई अड्डे अगर हवाई यातायात का ही काम नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें फिजूलखर्ची की निशानी भले माना जा सके, विकास की निशानी तो किसी भी तरह नहीं माना जा सकता है। 

यह सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही समस्या नहीं है। कम या ज्यादा, खासतौर पर पूरे ढांचागत क्षेत्र के विकास की यही समस्या है। चूंकि आम तौर पर यह माना जाता है कि ढांचागत सुविधाएं जितनी ज्यादा हों, उतना ही बेहतर है, जो कि ऐसे विकासशील देश में स्वाभाविक भी है, जहां सुविधाओं की हमेशा तंगी रही है, यह समीकरण ढांचागत क्षेत्र में निवेश को आसानी से विकास का पर्याय बना देता है। लेकिन, इसमें यह भुला ही दिया जाता है कि हमारे समाज में इन सुविधाओं के उपयोग की सामर्थ्य कितनी है? उपयोग की समुचित सामर्थ्य के बिना बुनियादी सुविधाएं खड़ी की जाती हैं, तो उनका वही हश्र होता है जो उत्तर प्रदेश के उक्त नये हवाई अड्डों का हो रहा है। सिर्फ प्रधानमंत्री के यह कहने से कि वह "हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करते देखना चाहते हैं", हवाई चप्पल वाले हवाई यात्रा नहीं करने लग जाएंगे। उल्टे ऐसे बुनियादी ढांचागत निर्माण सफेद हाथी ही साबित होते हैं, जिनका उपयोग तो कुछ नहीं है, बस जिनके रख-रखाव पर लगातार खर्चा और करना पड़ता है। 

बेशक, बुनियादी सुविधाओं के मामले में आर्थिक सामर्थ्य के इस संकट का, मांग का संकट बनकर इस तरह सामने आ खड़ा होना, खासतौर पर नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के अपनाए जाने का नतीजा है। जब तक बुनियादी सुविधाएं मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र में थीं, तब तक चूंकि उन्हें आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से संचालित नहीं किया जाता था, इन सुविधाओं की आपूर्ति की तंगी तो हो सकती थी, लेकिन उनके मांग की कमी की वजह से अनुपयोगी रह जाने का संकट नहीं हो सकता था। लेकिन, अब जबकि बुनियादी सुविधाओं का ज्यादा से ज्यादा निजीकरण होता जा रहा है, मांग की तंगी से इन सुविधाओं के खाली पड़े रहने का संकट इतना आम हो चुका है कि उसकी तरफ ध्यान तक नहीं जाता है। सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़ और निजी अस्पतालों में बैडों की बड़ी संख्या का किसी भी समय खाली पड़े होना, इसी का एक उदाहरण है। एक और इससे भी ताजा उदाहरण मोदी राज में शुरू की गयी नयी वंदे भारत आदि फैंसी ट्रेनों में बढ़ती संख्या में सीटें खाली जाना और साधारण ट्रेनों में भारी भीड़ें रहना है। 

यहीं से हम विकास के नुमाइशी मॉडल पर आ सकते हैं। नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के तीन दशक के बाद और खासतौर पर नरेंद्र मोदी के राज में, विकास की परिकल्पना से ही जिस तरह से आम जनता को यानी अपनी मेहनत की रोटी खाने वालों को बाहर कर दिया गया है, उसका नतीजा यह है कि जनता का जीवन सुगम बनाने में सीधे निवेश के अर्थ में विकास की जिम्मेदारी से, शासन ने छुट्टी ही प्राप्त कर ली है। ऐसे में विकास का मुख्य अर्थ तो, पूंजीपतियों द्वारा निवेश और शासन का इसके लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक संसाधन थमाना ही रह गया है। फिर भी चूंकि कारपोरेट अब भी पूरी उत्पादक अर्थव्यवस्था संभालने की स्थिति में नहीं हैं, शासन द्वारा बढ़ते पैमाने पर अपने संसाधनों का बुनियादी क्षेत्र में लगाया जाना भी इसका जरूरी हिस्सा है, क्योंकि इससे फौरी तौर पर मेहनतकशों की एक बड़ी संख्या को रोजगार मिलता है और धीरे-धीरे इन सार्वजनिक सुविधाओं को बनाकर निजी क्षेत्रों के हवाले किया जा रहा होता है। 

इसी की अगली विकृति, नुमाइशी परियोजनाओं के रूप में सामने आती है, जहां विकास का प्रतीक और वास्तव में झूठी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर, ऐसी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को थोपा जाता है, जिनका न सिर्फ आम लोगों के लिए कोई उपयोग नहीं होता है बल्कि जिनके लिए आम लोगों को, सीधे अपने हित के लिए उपलब्ध संसाधनों में कटौती के रूप में, असह्य कीमत भी चुकानी पड़ती है। नरेंद्र मोदी की बुलेट ट्रेन परियोजना, इस तरह की अकेली परियोजना नहीं है। विमानन से लेकर रेलवे तथा सड़क तक, मोदी राज की ज्यादा से ज्यादा बुनियादी सेवा विस्तार परियोजनाएं और शहरी क्षेत्र सुधार योजनाएं भी, ज्यादा से ज्यादा ऐसी नुमाइशी परियोजनाएं ही बनती जा रही हैं। यह विकास का ही अभिजातकरण है। 

Friday World ✍ April 2,2026 

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
April 01, 2026

विश्व गुरु न सही, विश्व मित्र तो मान लो यारो! : राजेंद्र शर्मा

विश्व गुरु न सही, विश्व मित्र तो मान लो यारो! : राजेंद्र शर्मा -
भाई ये तो सरासर चीटिंग है। मोदी जी के साथ, बल्कि उनके वाले भारत के साथ ही चीटिंग है। बताइए, ये लोग अब मोदी जी को विश्व मित्र मानने से भी इंकार कर रहे हैं। पहले कहते थे कि विश्व गुरु मानने में दिक्कत है। किसी के कहने भर से किसी को विश्व गुरु थोड़े ही मान लिया जाएगा? फिर खुद हमारे कहने से तो होगा भी क्या? खुद ही अपने मुंह से अपने को विश्व गुरु कहते फिरेंगे, तो क्या दुनिया मान लेगी? उल्टे अपने मुंह मियां मिट्ठू कहकर मजाक ही उड़ाएगी। 

वैसे भी विश्व गुरु वह, जिसे दुनिया गुरु माने। घूम-घूमकर दुनिया भर में राजनेताओं के गले पड़ने से और मुलाकातों के सारे वीडियो में ऑडियो वाला हिस्सा या तो म्यूट रखने या खी-खी, खी-खी या हो-हो, हो-हो से भरने से, दुनिया किसी को गुरु थोड़े ही मान लेगी। सिर्फ विरोधियों को ठोक-पीट कर गद्दी पर जमे रहने से भी नहीं। टीवी से लेकर हर सड़क, हर चौराहे, हर खंभे पर, एक देश-एक फोटो का विधान चलाने से भी नहीं। कुछ तो हो, जिसमें दुनिया आपको सबसे आगे माने और कहे कि हम आपसे सीख रहे हैं, आपके दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं! 

और तो और, जब से ट्रंप की अमेरिका की गद्दी पर वापसी हुई है, लंबी फेंकने तक में कोई अब हमें नंबर वन मानने के लिए तैयार नहीं है। उल्टे ट्रंप ने जब से बात-बात पर और बहुत बार तो बेबात भी, जमीन पर नाक रगड़वाना शुरू किया है, उसके बाद से तो विश्व गुरु वाले सारे डंके फट-फटा ही गए। 

सच पूछिए, तो इसी सब को देखकर मोदी जी ने खुद ही विश्व गुरु की गद्दी की तरफ देखना ही छोड़ दिया और विश्व मित्र पर आ गए। इसमें वैसे भी किसी चीज में सबसे आगे होने टाइप कोई टेंशन ही नहीं है। बस दिल बड़ा होना चाहिए, जिसमें सारी दुनिया समा सके। और दुनिया भर में घूमने का बजट भी होना चाहिए। और बंदे के पास फुर्सत होनी चाहिए, बस। बाकी इकतरफा प्यार की तरह, इकतरफा विश्व मित्र तो कोई भी हो सकता है। 

पर अब भाई लोगों को विश्व मित्र मानने में भी प्राब्लम है। कह रहे हैं कि काहे के विश्व मित्र, पड़ोसी ईरान से मित्रता तो निभाई नहीं गयी। उससे पहले वेनेजुएला से। उससे जरा सा हट के क्यूबा से। दो साल से फिलिस्तीन से। जरूरत पर किसी के काम आने का गूदा नहीं और दावा विश्व मित्र होने का!

लेकिन, यही तो चीटिंग है। कहां तो मोदी जी अपने भारत को विश्व मित्र बनाने में जुटे हुए हैं और कहां विरोधी उनसे इस या उस देश का मित्र बनकर दिखाने की, बल्कि मित्रता निभाने की मांग कर रहे हैं! क्या ये विरोधियों की छोटी सोच को ही नहीं दिखाता है। ये छोटे-मोटे देशों से दोस्ती करने, दोस्ती निभाने से बड़ी बात, इससे आगे की बात, सोच ही नहीं सकते हैं। पूरा जोर लगाने पर भी इनकी कल्पना तीसरी दुनिया के मित्र होने की बात से आगे जा ही नहीं सकती है। ये क्या जानेंगे विश्व मित्रता की कठिन साधना?

यह सच है कि अमेरीका-इस्राइल ने ईरान पर हमला किया। बातचीत के बीच में हमला किया। बातचीत के बीच में, साल भर में दूसरी बार हमला किया। लेकिन, यह भी तो सच है कि ईरान ने भी इस्राइल पर और खाड़ी देशों में अमेरिकी अड्डों पर जवाबी हमले किए। हिंसा दोनों तरफ से हुई, तो हम किसी को सही और किसी को गलत कैसे कह सकते थे? अब क्या सिर्फ इसलिए कि पहले ईरान पर हमला किया गया था, मोदी जी का भारत, अमेरिका और इस्राइल को हमलावर बताकर, ईरान के साथ खड़ा हो जाता? या सिर्फ इसलिए ईरान के साथ खड़ा हो जाता कि अमेरिका, हजारों किलोमीटर दूर से आकर यहां क्यों फौजी दखल दे रहा है, एशिया के अंगने में अमेरिका का क्या काम है? भारत अगर एक पाले में खड़ा हो जाता, तो फिर विश्व मित्रता का क्या होता? भारत अगर ईरान से दोस्ती निभाने जाता, तो अमेरिका और इस्राइल से मित्रता का क्या होता?

सच्ची बात यह है कि इस बात से हमारा विश्व मित्र होने का दावा और भी पुख्ता हो जाता है कि हम अब सही-गलत, न्याय-अन्याय, उचित-अनुचित, किसी चक्कर में नहीं पड़ते हैं। हम न किसी का समर्थन करते हैं, न किसी का विरोध। न किसी की निंदा करते हैं, न किसी की प्रशंसा। हम बस चुप रहते हैं। कोई किसी के राष्ट्राध्यक्ष की हत्या कर दे, हम चुप रहते हैं। कोई बच्चियों के स्कूल पर बम मारकर एक साथ पौने दो सौ बच्चियों और उनके शिक्षकों की हत्या कर दे, तब भी हम चुप रहते हैं। वैसे चुप तो हम तब भी रहते हैं, जब हमारा कोई मित्र ग़ज़ा की दस लाख की आबादी में से, 74 हजार लोगों की हत्या कर दे, जिसमें ज्यादा तादाद महिलाओं और बच्चों की ही हो। बेशक, कभी-कभी फोन-वोन कर के बोलते भी हैं, पर सभी को अपनी मित्रता का भरोसा दिलाने के लिए। और सारी दुनिया को यह बताने के लिए कि हम युद्ध के नहीं, बुद्ध के देश से हैं!

वैसे इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम मित्र भी सिर्फ फेसबुक फ्रेंड टाइप के हैं, दोस्ती निभाना नहीं जानते हैं। चाहे कोई यह इल्जाम तो लगा भी दे कि मोदी के भारत को पहले वालों की तरह दुश्मनियां पालना नहीं आता है और खासतौर पर पड़ौसियों को छोड़कर, समंदर पार वालों से दुश्मनियां पालना नहीं आता है -- मोदी जी को अजात-शत्रु कहा जाए, तो भी बेशक बुरा नहीं मानेंगे -- पर दोस्ती निभाना नहीं जानने का इल्जाम कोई कैसे लगा सकता है? मोदी जी और ट्रंप जी तथा नेतन्याहू जी की मोहब्बत की तो मिसालें आज सारी दुनिया देती है। ट्रंप जी और नेतन्याहू जी बार-बार उनकी मोहब्बत का इम्तिहान लेते हैं और मोदी जी हर बार साबित करते हैं कि उनकी दोस्ती नहीं टूटेगी। दोस्ती टूटने की छोड़ो, दोस्ती में ना कोई सॉरी और ना कोई थैंक यू! और हां, कोई शिकायत भी नहीं। इस तक की शिकायत नहीं कि ट्रंप जी दो शासनाध्यक्षों की फोन वार्ता में, खरबपति दोस्त एलन मस्क को क्यों घुसा लेते हैं। दोस्ती निभायी भी जाएगी, बस जरा दिल मिलने चाहिए। नफरत के लिए मिलें, तब भी चलेगा, पर दिल मिलें तो सही!

रही पाकिस्तान के ईरान और अमेरिका-इस्राइल की जंग रुकवाने के लिए हाथ-पैर मारने की बात, तो इसका मतलब न तो यह है कि अमेरिका-इस्राइल को मोदी जी की दोस्ती पर भरोसा नहीं है और न इसका मतलब यह है कि मोदी जी का भारत नहीं, पाकिस्तान विश्व मित्र है! ऐसा कुछ भी नहीं है। बात असल में सिर्फ इतनी है कि बातचीत से बात बन भी गयी, तो क्या होगा – लेन-देन ही तो होगा । और जयशंकर जी ने तो पहले ही बता दिया है कि लेन-देन करना/कराना तो दलालों का काम है। वॉर रुकवाने का हो तो क्या, दलाली का काम आखिर दलाली का काम है। ऐसा काम पाकिस्तान को ही मुबारक, मोदी जी का भारत दलाली का काम नहीं करेगा। अमेरिका-इस्राइल के पाले में गिने जाने के डर से भी नहीं। वॉर चाहे कोई भी रुकवाए, पर विश्व मित्र तो भारत ही कहलाएगा। नहीं क्या? 

Friday World ✍ April 2,2026 

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोक लहर' के संपादक हैं।)*
April 01, 2026

देशसेवा का धंधा : या सेवा?

देशसेवा का धंधा : या सेवा?
-Friday World ✍ April 2,2026
अब विश्वगुरु जी की एक पुरानी भक्तन जी ने भारतीय एपस्टीन फाइल खोल दी है। एक अमेरिकी फाइल अभी आधी खुली और आधी बंद पड़ी है। किसी दिन वाशिंगटन प्रभु ने चाहा तो वह पूरी की पूरी फाइल, पन्ने दर पन्ने, विडियो दर विडियो खुल जाएगी। एक फाइल जब वे जब गुजरात में हुआ करते थे, तब से अब तक चौपट खुली पड़ी है। उसका एक-एक पन्ना खुला हुआ है।उसे देख-देखकर लोग ऊब चुके हैं!

और भी फाइलें होंगी उनकी, जो समय-समय पर खुलती रहेंगी। कुछ फाइलों की चर्चा कानों-कान होती रहती है!हर मुंह में उनकी एक रंग-बिरंगी फाइल रखी हुई है, जो किसी न किसी के कान में खुलती रहती हैं! सारी फाइलें धमाकेदार हैं!

भाइयो-बहनो, इनकी किसिम-किसिम की फाइलें हैं और ढूंढने चलोगे, तो उनकी ऐसी फाइलों का इतना बड़ा अंबार लग जाएगा कि देखते-देखते आंखें थक जाएंगी। न जाने कितनी फाइलें कहां-कहां धूल खा रही होंगी। कुछ फाइलें ऐसी भी होंगी, जो आग में स्वाहा की जा चुकी होंगी। फिर भी बहुत सी फाइलें‌ अभी होंगी। मूल नहीं, तो उनकी फोटोकापी होगी। विडियो में नहीं, तो वे फ़ाइलें फोटो में होंगी। बहुत से चतुर सुजान आए और गए, मगर उनकी फ़ाइलें आज भी अटल-अविचल हैं।

फाइल-फाइल का खेल‌ अगर विश्वगुरु जी खेलना जानते हैं, तो दूसरे भी कम होशियार नहीं हैं। ऐसा भी नहीं कि सब कुछ इन्हें ही आता है। ठीक है, कुछ ने फाइल-फाइल खेलना इनसे भी सीखा होगा। हवा में ही इनके कंप्रोमाइज्ड होने की कहानी नहीं चल रही है। यूं ही ट्रंप नहीं कहता कि मैं चाहूं, तो इनका करियर बर्बाद कर सकता हूं और ये प्रतिवाद में एक शब्द तक नहीं बोलते! कंप्रोमाइज्ड नेता एक ऐसी शै होती है, जिसका फायदा वाशिंगटन से लेकर पेरिस तक और दिल्ली से लेकर मुंबई-अहमदाबाद तक सब बड़े-बड़े खिलाड़ी मजे से उठा सकते हैं। ऐसा विश्वगुरु भी हो, तो इनके लिए बहुत फायदेमंद है। जिसके पास भी आज इन गुरुजी की चाबी है, वे सुखी और निश्चिंत हैं। जब चाहे, जैसी चाहे, उसे घुमा दें, यहां तक कि उल्टी भी घुमा दें, तो ताला खुल जाएगा!

भाइयो-बहनो, सब जानते हैं कि यह भारत है और यहां फाइलें खुलने से अब कोई क्रांति नहीं होती, सत्ता परिवर्तन नहीं होता, वरना पिछले बारह साल में अनेक क्रांतियां हो चुकी होतीं! एक कोने में इनका विश्व होता और दूसरे में गुरुजी कहीं अंधेरे में पड़े मिलते!

विडियो जारी होने से भी अब कोई खास अंतर नहीं पड़ता। यहां रोज ही विडियो जारी होते रहते हैं। लोग आनंद लेते हैं। थोड़ी सी सुगबुगाहट होती है और सब पहले की तरह सामान्य हो जाता है! न कहीं आंधी आती है, न तूफान! कोई पेड़ तक नहीं गिरता। पत्ते तक नीचे नहीं गिरते! बलात्कारियों और हत्यारों का यहां कुछ नहीं होता, इतनी सावधानी जरूरी है कि वे सही समय पर सही साइड में हों और वे होते हैं! विश्वगुरु की तरफ़ होते हैं, तो यह उनकी योग्यता में शामिल हो जाता है। विधायक-सांसद से लेकर मंत्री बनने तक के अवसर बढ़ जाते हैं।

जब से ये चाल, चरित्र और चेहरे वाले आए हैं, तब से तो इतना पक्का प्रबंध है कि कोई इनकी चाल देखता रह जाता है। इनका चरित्र और चेहरा नहीं  देख पाता!

आप-हम अच्छी तरह जानते हैं कि जिन्हें हम अपना विधायक-सांसद आदि चुन रहे हैं, वे आगे कई-कई तरह के गुल खिलाएंगे। हमें कोई भ्रम नहीं होता कि हम इन्हें जनसेवा करने के लिए चुन रहे हैं। ये इस बीच इतना कमाएंगे कि कोई तस्कर भी इतना कमा नहीं सकता! हम जानते हैं कि ये पहले भी काफी गुल खिला चुके थे, इसीलिए आज चुनाव मैदान में हैं और आगे ये गुलों का पूरा बगीचा खड़ा कर देंगे। कुछ तो इतने होशियार निकलेंगे कि गुलों का पूरा वन खड़ा कर देंगे और उसकी सुगंध में इतने गुम हो जाएंगे कि अगले चुनाव से पहले नजर नहीं आएंगे और फिर भी हम इन्हें चुनेंगे, क्योंकि हमारा उद्देश्य या तो मुल्लों को सेट करना है या हमें हमारी जाति का झंडा बुलंद रखना है और इनका एकमात्र उद्देश्य कमाई करना है। एक मंत्री जी पूरी तरह देशसेवा में लगे रहते हैं,सांस लेने तक की उन्हें फुरसत नहीं, मगर उनकी संपत्ति 2012 में लगभग 12 करोड़ थी, जो देशसेवा करते-करते बारह साल बाद 65 करोड़ से ज्यादा हो गई, मतलब पांच गुना से भी अधिक हो गई और उनके बेटे की संपत्ति आज 100 से 150 करोड़ के बीच बताई जाती है! अर्थ यह कि देशसेवा भी बेहद मुनाफे का धंधा है!

एडीआर की रिपोर्ट बताती है कि हमारे लगभग आधे सांसद हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे मामलों में फंसे हैं। और वे ऐसे मामलों में फंसे थे, इसीलिए उन्हें टिकट मिला है और हमने उन्हें चुना है। इसलिए कोई भ्रम में न रहे कि फाइलें खोलकर विश्वगुरु जी का कोई कुछ बिगड़ सकता है। जितनी फाइलें खोलना हो, खोल लो। जितनी तरह की फाइलें खोलना हो, खोल दो। एपस्टीन फाइल खोल‌ लो या कोई और धांसू टाइप फाइल खोल‌ लो!उनकी चाल, चरित्र और चेहरा साबुत रहेगा! तुम्हारे पास फाइल है, उनके पास पूरा तंत्र और मंत्र है।

हां, जब भी उनका बिगड़ेगा तो फिर इतना बिगड़ेगा, इतना बिगड़ेगा कि जय श्रीराम भी सुधार नहीं पाएंगे। पर अभी उन पर बड़ी पूंजी का साया है। इतना सस्ता, इतना भीरू, इतना एपस्टीन उन्हें आज कोई और उपलब्ध नहीं है। जिस दिन वह मिल गया, इनकी छुट्टी करने में वे देरी नहीं करेंगे! इनके नान बायोलॉजिकल और अवतारी पुरुष होने की हवा निकल जाएगी!

Friday World ✍ April 2,2026


*(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)*
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