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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Friday, 2 October 2026

October 02, 2026

હોર્મુઝમાં મિસાઈલનો કહેર - MT કાઝીમા-3 પર હુમલો, 5 ભારતીયોનો આબાદ બચાવ, પર્શિયન ગલ્ફમાં 4500 ભારતીય ખલાસીઓ હજુ ફસાયા!

હોર્મુઝમાં મિસાઈલનો કહેર - MT કાઝીમા-3 પર હુમલો, 5 ભારતીયોનો આબાદ બચાવ, પર્શિયન ગલ્ફમાં 4500 ભારતીય ખલાસીઓ હજુ ફસાયા!
-Friday World Oct 3,2026 
મિડલ ઈસ્ટમાં યુદ્ધના વાદળો ઘેરાયેલા છે અને તેની સીધી અસર દુનિયાના સૌથી મહત્વના દરિયાઈ માર્ગ - હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ પર દેખાઈ રહી છે. આ એ જ સ્ટ્રેટ છે જ્યાંથી દુનિયાનું 20% તેલ પસાર થાય છે. અને હવે આ જ માર્ગ આગનો દરિયો બની ગયો છે.

તાજી ઘટનામાં કુવૈતનો ધ્વજ ધરાવતા ક્રૂડ ઓઈલ ટેન્કર MT કાઝીમા-3 પર મિસાઈલ હુમલો થયો છે. આ ટેન્કર ક્રૂડ ઓઈલ લઈને આફ્રિકાના ટોગો દેશના લોમે બંદર તરફ જઈ રહ્યું હતું. હુમલા સમયે આ જહાજ પર 5 ભારતીય ખલાસીઓ સવાર હતા. સદનસીબે ભારતીય મિશન અને ઓમાન કોસ્ટ ગાર્ડની ત્વરિત કાર્યવાહીથી તમામ 5 ભારતીયોને સુરક્ષિત બચાવી લેવામાં આવ્યા છે.

શું થયું હોર્મુઝમાં?

પ્રાથમિક અહેવાલો મુજબ, જ્યારે MT કાઝીમા-3 હોર્મુઝના સાંકડા માર્ગમાંથી પસાર થઈ રહ્યું હતું ત્યારે અચાનક તેના પર મિસાઈલ ત્રાટકી. ધડાકો એટલો જોરદાર હતો કે ટેન્કરના હલમાં મોટું છિદ્ર પડી ગયું અને આગ ફાટી નીકળી. ટેન્કરનો ક્રૂ ગભરાઈ ગયો. જો કે ટેન્કરમાં ક્રૂડ હતું એટલે મોટી દુર્ઘટના થવાની શક્યતા હતી.

તરત જ મસ્કત સ્થિત ભારતીય દૂતાવાસને જાણ કરવામાં આવી. ભારતીય દૂતાવાસે તરત જ ઓમાન નૌકાદળનો સંપર્ક કર્યો. શનિવારે સવારે એક સંયુક્ત રેસ્ક્યૂ ઓપરેશન હાથ ધરાયું અને પાંચેય ભારતીયોને લાઈફ જેકેટ પહેરાવીને સુરક્ષિત રીતે કિનારે લાવવામાં આવ્યા. હાલ તમામ ખલાસીઓ મસ્કતમાં સુરક્ષિત છે અને તેમની તબીબી તપાસ ચાલી રહી છે.

ભારતીય દૂતાવાસે સોશિયલ મીડિયા X પર પોસ્ટ કરીને ઓમાન સરકારનો આભાર માન્યો છે અને કહ્યું છે કે "અમારા નાગરિકોની સુરક્ષા અમારી પ્રથમ પ્રાથમિકતા છે."

4500 ભારતીયો હજુ પણ જોખમમાં

આ ઘટના એકલી નથી. વિદેશ મંત્રાલયના પ્રવક્તા રણધીર જયસ્વાલે થોડા દિવસ પહેલા જ ચોંકાવનારો ખુલાસો કર્યો હતો. તેમણે કહ્યું હતું કે પર્શિયન ગલ્ફ અને આસપાસના વિસ્તારમાં 4500થી વધુ ભારતીય ખલાસીઓ અલગ-અલગ કોમર્શિયલ જહાજો પર કામ કરી રહ્યા છે.

તેમાંથી 12 જહાજો સીધા ભારત માટે માલ લઈ જઈ રહ્યા છે, જેમાં 163 ભારતીયો છે. આ 12માંથી 6 જહાજો ભારતીય ધ્વજવાળા છે અને 6 વિદેશી ધ્વજવાળા છે. એટલે કે હોર્મુઝમાં તણાવ વધશે તો ભારતની એનર્જી સુરક્ષા અને ભારતીયોની જાન બંને જોખમમાં આવશે.

કોણ કરી રહ્યું છે હુમલા?

હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં છેલ્લા 2 મહિનાથી સતત જહાજો પર હુમલા થઈ રહ્યા છે. આ હુમલાઓ પાછળ હુથી બળવાખોરો અથવા ઈરાન સમર્થિત જૂથો હોવાની આશંકા છે. અમેરિકા અને ઈરાન વચ્ચેનો તણાવ જેમ જેમ વધી રહ્યો છે, તેમ તેમ આ જૂથો વ્યાપારી જહાજોને નિશાન બનાવીને દુનિયા પર દબાણ બનાવવા માંગે છે.

ભારત માટે સ્થિતિ ખૂબ જ સંવેદનશીલ છે. ભારત પોતાનું 85% તેલ આ જ વિસ્તારમાંથી મંગાવે છે. જો હોર્મુઝ બંધ થશે તો ભારતમાં તેલના ભાવ આસમાને પહોંચી જશે.

ભારતની આગળની રણનીતિ શું?

ભારતીય નૌકાદળે પહેલાથી જ અરબી સમુદ્રમાં INS વિક્રાંત અને અન્ય યુદ્ધ જહાજો તૈનાત કર્યા છે. ઓપરેશન સંકલ્પ હેઠળ ભારતીય જહાજોને સુરક્ષા આપવામાં આવી રહી છે. પરંતુ 4500 નાગરિકોને સુરક્ષિત રાખવા એ મોટો પડકાર છે.

સરકારે તમામ શિપિંગ કંપનીઓને એડવાઈઝરી આપી છે કે તેઓ હોર્મુઝમાંથી પસાર થતી વખતે અત્યંત સાવધાની રાખે અને ભારતીય મિશનના સંપર્કમાં રહે.

MT કાઝીમા-3 પરનો હુમલો એક ચેતવણી છે. તે બતાવે છે કે યુદ્ધ હવે માત્ર જમીન પર નથી, સમુદ્રમાં પણ ફેલાઈ ગયું છે અને તેની કિંમત સામાન્ય ખલાસીઓએ ચૂકવવી પડી રહી છે. 5 ભારતીયોનો બચાવ થયો એ રાહતની વાત છે, પણ 4500 લોકો હજુ પણ એ જ આગના દરિયામાં ફસાયેલા છે.

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 3,2026 

#HormuzStrait #MTKazima3 #IndianSailors #OmanRescue #MiddleEastCrisis #OilTankerAttack #PersianGulf #IndianNavy #CrudeOil #BreakingNews
October 02, 2026

UPSC के मंच से PM मोदी का सुभाष बोस वाला बयान और भतीजे की आपत्ति - क्या ICS परीक्षा संस्कृत में हुई थी? इतिहास क्या कहता है

UPSC के मंच से PM मोदी का सुभाष बोस वाला बयान और भतीजे की आपत्ति - क्या ICS परीक्षा संस्कृत में हुई थी? इतिहास क्या कहता है
-Friday World Oct 3,2026 
1 अक्टूबर 2026, नई दिल्ली का भारत मंडपम। मौका था UPSC के 100 साल पूरे होने के शताब्दी समारोह का। देश भर के नौकरशाह, टॉपर और इतिहास के जानकार मौजूद थे। इसी मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ऐतिहासिक किस्सा सुनाया और देखते ही देखते वह किस्सा विवाद का विषय बन गया।

पीएम मोदी ने कहा कि 1920 में जब सुभाष चंद्र बोस ने ICS (Indian Civil Service) की परीक्षा दी थी, तब उस परीक्षा में संस्कृत का पेपर होता था और नेताजी ने वह पेपर संस्कृत में लिखा था। उनका आशय यह था कि भारतीय भाषाओं में भी प्रशासनिक क्षमता है, और सुभाष बाबू जैसे मेधावी छात्र ने हमारी प्राचीन भाषा को गर्व के साथ अपनाया।

भाषण खत्म होते ही विवाद शुरू हो गया।

प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस की आपत्ति

सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र और खुद भाजपा से जुड़े रहे चंद्र कुमार बोस ने इस बयान पर सार्वजनिक आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, "नेताजी कई भाषाओं के जानकार थे, इसमें कोई शक नहीं। वो बांग्ला, अंग्रेजी, हिंदी, संस्कृत सब जानते थे। लेकिन ICS परीक्षा की भाषा अंग्रेजी थी। प्रधानमंत्री को यह जानकारी किस स्रोत से मिली, यह स्पष्ट होना चाहिए।"

चंद्र कुमार बोस ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए और नेताजी के बारे में कोई भी तथ्य पूरी रिसर्च के साथ रखना चाहिए।

इतिहास के पन्नों में सच्चाई क्या है?

अब असली सवाल यह है कि 1920 की ICS परीक्षा का फॉर्मेट क्या था?

ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि सुभाष चंद्र बोस ने 1920 में लंदन में हुई ICS की प्रतियोगी परीक्षा में चौथा स्थान हासिल किया था। यह परीक्षा ब्रिटिश सरकार कराती थी और इसकी मुख्य भाषा अंग्रेजी ही थी।

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उस समय ICS के ऑप्शनल विषयों की लिस्ट में संस्कृत भी शामिल थी। खुद चंद्र कुमार बोस की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर नेताजी के परीक्षा-विषयों की लिस्ट में English और Sanskrit दोनों का उल्लेख है। यानी अंग्रेजी अनिवार्य थी, और संस्कृत एक वैकल्पिक विषय के रूप में थी।

कुछ इतिहासकारों का कहना है कि सुभाष बाबू ने संस्कृत को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना था और उसमें बहुत अच्छे अंक लाए थे। लेकिन यह कहना कि "पूरी परीक्षा संस्कृत में थी" या "उन्होंने पूरा पेपर संस्कृत में लिखा", तथ्यात्मक रूप से सही नहीं लगता।

यहीं पर विवाद का मुख्य बिंदु है - क्या पीएम मोदी का आशय था कि एक पेपर संस्कृत का था जिसे नेताजी ने संस्कृत में लिखा, या पूरी ICS परीक्षा ही संस्कृत में थी?

दो नजरिए

सरकार समर्थक इतिहासकारों का तर्क है कि पीएम मोदी का उद्देश्य संस्कृत के गौरव को बताना था। अगर नेताजी ने संस्कृत विषय का पेपर संस्कृत भाषा में लिखा तो यह गर्व की बात है और इसे तोड़-मरोड़ कर नहीं देखना चाहिए।

वहीं आलोचकों का कहना है कि प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद पर बोले गए हर ऐतिहासिक तथ्य का रिकॉर्ड सही होना चाहिए। ICS जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा की भाषा को लेकर भ्रम नहीं फैलना चाहिए।

UPSC के मंच से यह बहस क्यों महत्वपूर्ण है?

यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह UPSC के मंच से उठी है। UPSC आज भी भाषा को लेकर जूझ रहा है। क्या सिविल सेवा परीक्षा भारतीय भाषाओं में होनी चाहिए? क्या अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होनी चाहिए? पीएम मोदी का बयान इसी संदर्भ में था कि 100 साल पहले भी भारतीय भाषा में क्षमता थी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ICS में चौथा स्थान लाने के बाद भी नौकरी छोड़ दी थी और देश की आजादी के लिए अपना जीवन लगा दिया। उनका त्याग किसी एक पेपर की भाषा से बड़ा है।

अब जरूरत है कि PMO या संस्कृति मंत्रालय इस पर अपना स्रोत स्पष्ट करे, ताकि इतिहास के छात्र भ्रमित न हों। चंद्र कुमार बोस ने जो सवाल उठाया है, वह परिवार के सदस्य के नाते जायज है, और इसका जवाब तथ्यों के साथ आना चाहिए, राजनीति के साथ नहीं।

क्योंकि सुभाष बोस सिर्फ एक परिवार के नहीं, पूरे देश के नेताजी हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 3,2026 

#SubhasChandraBose #PMModi #UPSC #UPSC100Years #ICSExam #ChandraKumarBose #BharatMandapam #IndianHistory #Netaji #Controversy
October 02, 2026

इराक में अमेरिका का 20 साल का अंत - आखिरी बेस से वापसी, 4500 जवानों की कुर्बानी के बाद खाली होगा मैदान, ईरान की जीत और ISIS के लौटने का डर

इराक में अमेरिका का 20 साल का अंत - आखिरी बेस से वापसी, 4500 जवानों की कुर्बानी के बाद खाली होगा मैदान, ईरान की जीत और ISIS के लौटने का डर
-Friday World Oct 3,2026 
बुधवार, 30 सितंबर। इराक की रेतीली जमीन पर एक युग का अंत होने जा रहा है। अमेरिकी सेना अपने आखिरी ठिकाने, अपने आखिरी बंकर, अपने आखिरी झंडे को समेट कर इराक छोड़ने वाली है। 2003 में जो काफिला बगदाद में दाखिल हुआ था, वो 20 साल से ज्यादा की खूनी जंग, 4500 अमेरिकी सैनिकों की मौत और खरबों डॉलर खर्च करने के बाद अब वापस जा रहा है।

यह वापसी कोई अचानक नहीं है। इस वापसी पर मुहर 2024 में ही लग गई थी, जब राष्ट्रपति जो बाइडन के कार्यकाल में वाशिंगटन और बगदाद के बीच सहमति बनी थी कि अब अमेरिकी मिशन को इराक में कॉम्बैट से एडवाइजरी में बदला जाएगा और धीरे-धीरे सैनिक हटेंगे। लेकिन यह संयोग ही है कि यह आखिरी वापसी ऐसे समय में हो रही है जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ अपना सैन्य अभियान तेज कर रखा है।

ईरान में जश्न, तेहरान में जीत का ऐलान

जैसे ही अमेरिकी वापसी की खबर पक्की हुई, तेहरान से लेकर बेरूत तक ईरान और उसके सहयोगी गुटों में जश्न का माहौल है। ईरानी मीडिया इसे "बड़ी शैतान की हार" और "प्रतिरोध की जीत" बता रहा है। ईरान समर्थित हशद अल-शाबी जैसे मिलिशिया ग्रुप के नेताओं ने कहा कि यह वही दिन है जिसका इंतजार जनरल कासिम सुलेमानी ने किया था।

ईरान का तर्क साफ है - हमने अमेरिका को इराक से निकाल दिया। सालों तक रॉकेट हमले, ड्रोन हमले, राजनीतिक दबाव बनाकर आखिरकार हमने अमेरिका को मजबूर कर दिया।

लेकिन क्या सच में यह ईरान की जीत है? अमेरिका खुद कहता है कि यह हार नहीं, रणनीति में बदलाव है। अब अमेरिका इराक में जमीन पर सैनिक नहीं रखना चाहता, बल्कि वह खाड़ी के अपने बड़े बेसों से, हवा से और इंटेलिजेंस से इराक पर नजर रखेगा।

4500 मौतें, एक अधूरा सपना

इराक युद्ध अमेरिका के इतिहास का सबसे लंबा और विवादित युद्धों में से एक है। 2003 में सद्दाम हुसैन के पास वेपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन हैं, इस दावे के साथ शुरू हुई जंग में अमेरिका ने सोचा था कि वह इराक में लोकतंत्र लाएगा।

लेकिन 20 साल बाद हिसाब क्या है? 4500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए, 32 हजार से ज्यादा घायल हुए। लाखों इराकी नागरिकों की जान गई। और इराक आज भी पूरी तरह स्थिर नहीं है। अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए, लेकिन इराक की संसद में आज सबसे ज्यादा प्रभाव ईरान समर्थित दलों का ही है। यह अमेरिका के लिए एक कड़वी सच्चाई है।

इराक की दोहरी भावना - स्वागत भी, डर भी

बगदाद सरकार ने आधिकारिक तौर पर अमेरिकी वापसी का स्वागत किया है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा कि यह इराक की संप्रभुता की जीत है और अब इराकी सेना खुद अपने देश की सुरक्षा करने में सक्षम है। इराक अब नहीं चाहता कि वह अमेरिका और ईरान की जंग का मैदान बने।

लेकिन पर्दे के पीछे, इराकी जनरलों और खुफिया अधिकारियों में गहरा डर है। डर है एक खालीपन का - वैक्यूम का।

पिछले 10 सालों से अमेरिकी सेना भले ही फ्रंट पर नहीं लड़ रही थी, लेकिन वह इराकी सेना को इंटेलिजेंस, ड्रोन सर्विलांस, एयर सपोर्ट और लॉजिस्टिक्स दे रही थी। उसी की मदद से इस्लामिक स्टेट (ISIS) को हराया गया था।

अब जब अमेरिका हटेगा तो क्या होगा?

पहला खतरा - ISIS की वापसी। रिपोर्ट्स कह रही हैं कि ISIS के स्लीपर सेल अभी भी पश्चिमी इराक के रेगिस्तान और सीरिया बॉर्डर पर सक्रिय हैं। अमेरिकी एयर पावर हटते ही उनके संगठित होने का खतरा बढ़ जाएगा।

दूसरा खतरा - अमेरिका के दुश्मनों को खुला मौका। ईरान समर्थित गुट और ज्यादा ताकतवर हो जाएंगे, जिससे इराक फिर से एक प्रॉक्सी वॉर का अखाड़ा बन सकता है।

आगे क्या?

30 सितंबर के बाद इराक में अमेरिकी बूट जमीन पर नहीं होंगे, लेकिन अमेरिकी प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा। अमेरिका कुर्दिस्तान में और कुवैत, कतर, जॉर्डन में अपने बेस रखेगा। जरूरत पड़ने पर वह हवा से हमला कर सकता है।

लेकिन एक बात तय है - इराक में अमेरिकी जमीन पर मौजूदगी का एक अध्याय बंद हो गया है। यह अध्याय खून, तेल, जियोपॉलिटिक्स और धोखे से भरा था।

अब देखना यह है कि क्या इराक इस खालीपन को भर पाता है, या फिर यह देश एक बार फिर उसी अंधेरे में जाता है जहाँ से वह 2017 में ISIS को हराकर निकला था। अमेरिकी वापसी एक अंत है, लेकिन एक नए, ज्यादा खतरनाक संघर्ष की शुरुआत भी हो सकती है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 3,2026 

#USArmy #IraqWar #USTroopsWithdrawal #Iran #ISIS #MiddleEast #TrumpAdministration #JoeBiden #Baghdad #Geopolitics
October 02, 2026

ज्ञानेश्वर रहें या जाएं, मुसलमानों को फर्क नहीं पड़ना चाहिए - कुर्सी की लड़ाई में अब्दुल को मोहरा बनाना बंद करो, बच्चों की शिक्षा ही असली जीत है

ज्ञानेश्वर रहें या जाएं, मुसलमानों को फर्क नहीं पड़ना चाहिए - कुर्सी की लड़ाई में अब्दुल को मोहरा बनाना बंद करो, बच्चों की शिक्षा ही असली जीत है
- Friday World Oct 3,2026 
एक बहुत सच्ची बात सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है - "ज्ञानेश्वर जी रहें या जाएं..इससे मुसलमानों को कोई फर्क नहीं पड़ता है।"

यह एक लाइन पूरे राजनीतिक खेल को नंगा कर देती है।

आज देश में हर छोटी-बड़ी घटना में एक ही किरदार को जबरदस्ती घसीटा जाता है - मुसलमान को। कोई ज्ञानेश्वर महाराज हटे, कोई रामेश्वर महाराज आए, कोई कुर्सी पर बैठा, कोई कुर्सी से उतरा, लेकिन हर खबर के बीच में अब्दुल का नाम जरूर डाल दिया जाता है। क्यों?

क्योंकि इस देश की राजनीति की सबसे आसान सीढ़ी अब्दुल का कंधा बन गया है।

दोनों तरफ एक ही कहानी

 - पक्ष हो या विपक्ष दोनों अब्दुल के कंधे पर चढ़ कर सत्ता तक पहुँचते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई अब्दुल को नीचा दिखा कर, डरा कर, उसे विलेन बना कर कुर्सी पर कब्जा करता है, तो दूसरा उसे सपना दिखा कर, हमदर्दी का नाटक करके, वोट का सौदा करके कुर्सी तक पहुंचना चाहता है।

नतीजा दोनों में एक ही है - कुर्सी मिल जाती है नेताओं को, और अब्दुल बेचारा वही का वही खड़ा रह जाता है। उसी टूटी सड़क पर, उसी बेरोजगारी में, उसी स्कूल की फीस की चिंता में।

सोचिए, ज्ञानेश्वर जी हटेंगे तो क्या होगा? कुछ नहीं। उनकी जगह कोई और रामेश्वर महाराज आ जाएंगे। सिस्टम वही रहेगा, फाइलें वही रहेंगी, ठेके वही बंटेंगे। लेकिन इस पूरे ड्रामे में मुसलमानों को घसीट कर दो धर्मों के बीच नफरत की दीवार और ऊंची कर दी जाएगी।

जागो मुसलमानों जागो - तुम्हारी लड़ाई एज्युकेशन है

यह सबसे महत्वपूर्ण अपील है। मुसलमानों को समझना होगा कि यह कुर्सी की जंग तुम्हारी जंग नहीं है। यह सत्ता के भूखे लोगों की जंग है।

जब-जब तुम उनकी रैली में नारा लगाओगे, उनके लिए पोस्टर लगाओगे, उनके लिए दूसरे समुदाय से लड़ोगे, तब-तब तुम्हारा ही नुकसान होगा। तुम्हारा बेटा जो शाम को पढ़ना चाहिए था, वो व्हाट्सएप पर बहस में अपना वक्त बर्बाद कर देगा। तुम्हारी दुकान जो ईमानदारी से चलनी चाहिए थी, वो बंद हो जाएगी।

आज सबसे बड़ी जरूरत क्या है? क्या यह जानना जरूरी है कि ज्ञानेश्वर जी कौन हैं? नहीं। सबसे बड़ी जरूरत है यह पूछना कि मेरे बच्चे का स्कूल कैसा है? मेरे मोहल्ले में सरकारी अस्पताल में डॉक्टर है या नहीं? मेरे बच्चे को कंप्यूटर आता है या नहीं?

असली सफलता का रास्ता

लेखक ने जो आखिरी लाइनें लिखी हैं, वही इस कौम के लिए सबसे बड़ा रोडमैप है:

1. मेहनत और ईमानदारी से अपना काम करो: अब्दुल की सबसे बड़ी पहचान उसकी मेहनत है। चाहे वो पंचर की दुकान हो, कपड़े का कारोबार हो, या इंजीनियर की नौकरी हो। ईमानदारी से काम करोगे तो कोई तुम्हें नीचा नहीं दिखा पाएगा।

2. बच्चों की शिक्षा को प्राथमिकता दो: आज एक मुसलमान परिवार अगर अपनी पूरी ताकत लगा दे कि मेरा बेटा-बेटी डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर, अफसर बने, तो 20 साल बाद उसे किसी ज्ञानेश्वर या रामेश्वर के सामने हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मदरसे के साथ-साथ मॉडर्न एजुकेशन, साइंस, मैथ, अंग्रेजी पर जोर देना होगा।

3. राजनीतिक दलों की चाकरी छोड़ो: किसी भी दल का झंडा उठाने से पहले सोचो - क्या इस पार्टी ने मेरे बच्चे की फीस के लिए कुछ किया? क्या इस नेता ने मेरे इलाके में लाइब्रेरी बनवाई? अगर नहीं, तो उसके लिए अपना वक्त क्यों बर्बाद करना?

4. देश हित में ध्यान केंद्रित करो: जब तुम शिक्षित बनोगे, ईमानदार कारोबारी बनोगे, टैक्स दोगे, तो तुम खुद देश हित में काम कर रहे होगे। तुम्हें किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट देने की जरूरत नहीं है।

ज्ञानेश्वर जी का आना-जाना एक कुर्सी का खेल है। वह कुर्सी आज उसकी है, कल किसी और की होगी। लेकिन तुम्हारे बच्चों का भविष्य हमेशा तुम्हारा है। उसे किसी नेता के हवाले मत करो।

अब्दुल को अब समझना होगा - वो मोहरा नहीं, इस देश का नागरिक है। और उसकी असली ताकत वोट उसके हुनर और उसके बच्चों की तालीम में है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 3,2026 

#MuslimCommunity #EducationFirst #IndianPolitics #KnowledgeIsPower #YouthFuture #HonestWork #AvoidPolitics #ChildEducation #DeshHit #JagMusalman
October 02, 2026

"हे राम" सिंहस्थ से पहले उज्जैन में 250 करोड़ का करंट घोटाला और शाही मस्जिद पर बुलडोजर का डबल खेल - जंग लगे पोल पर सिल्वर पेंट, गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था

"हे राम" सिंहस्थ से पहले उज्जैन में 250 करोड़ का करंट घोटाला और शाही मस्जिद पर बुलडोजर का डबल खेल - जंग लगे पोल पर सिल्वर पेंट, गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था
-Friday World Oct 3,2026 
उज्जैन, महाकाल की नगरी। 2028 में यहाँ सिंहस्थ महाकुंभ लगना है, जहाँ 10 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालुओं के आने की उम्मीद है। सरकार के बड़े-बड़े दावे हैं - वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर, रोड वाइडनिंग, 24 घंटे बिजली। लेकिन पर्दे के पीछे क्या चल रहा है? दो तस्वीरें एक साथ सामने आ रही हैं - एक तरफ जंग लगे बिजली के पोल पर चमकता सिल्वर पेंट, दूसरी तरफ मलबे में तब्दील होती 600 साल पुरानी उज्जैन शाही मस्जिद।

और आरोप ये है कि ये दोनों तस्वीरें आपस में जुड़ी हुई हैं।

पहला खेल - 250 करोड़ का करंट घोटाला

सिंहस्थ 2028 की तैयारी के लिए विद्युत विभाग और नगर निगम को लगभग 250 करोड़ रुपये का फंड दिया गया। इस फंड से शिप्रा घाटों, महाकाल लोक से लेकर छत्री चौक और दत्त अखाड़ा तक नई अंडरग्राउंड लाइन, नए जीआई पोल, हाई मास्ट और फैंसी लाइटें लगनी थीं।

लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और कहती है। हमारे सूत्रों और स्थानीय पत्रकारों द्वारा ली गई तस्वीरों में साफ दिखता है कि ठेकेदारों ने नए पोल लगाने के बजाय 2008-2010 में लगे पुराने, पूरी तरह जंग खाए पोलों को ही दोबारा खड़ा कर दिया। ऊपर से सस्ता सिल्वर पेंट मार दिया ताकि दूर से नया लगे। कई जगह तो पोल के अंदर का सरिया दिख रहा है, फाउंडेशन में एक इंच सीमेंट नहीं है।

एक रिटायर्ड इंजीनियर ने बताया, "एक नए जीआई पोल की कीमत 45 से 60 हजार है। पुराने पर पेंट करने का खर्च 400 रुपये। बिल नए का बन रहा है, काम पुराने पर हो रहा है। 250 करोड़ में से अगर 70% भी खा लिया गया तो सोचिए कितना बड़ा घोटाला है।"

सवाल ये है कि सिंहस्थ में जब लाखों लोग एक घाट पर होंगे, तब अगर ये जर्जर पोल शॉर्ट सर्किट या हवा से गिर गया तो हादसा कितना बड़ा होगा? क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?

दूसरा खेल - शाही मस्जिद का डिमोलिशन, ध्यान भटकाने की स्क्रिप्ट?

ठीक इसी समय जब कुछ RTI कार्यकर्ताओं ने इस बिजली घोटाले के बिल, वर्क ऑर्डर और जियो-टैग फोटो मांगने शुरू किए, तभी अचानक उज्जैन शाही मस्जिद का मुद्दा गरमा गया।

उज्जैन की शाही मस्जिद लगभग 636 साल पुरानी बताई जाती है, जो छत्री चौक इलाके में है। प्रशासन का कहना है कि सिंहस्थ 2028 के रोड वाइडनिंग प्लान के तहत मस्जिद का कुछ अवैध हिस्सा और आसपास के अतिक्रमण हटाने हैं। इसमें मुख्यमंत्री मोहन यादव के पुश्तैनी मकान का हिस्सा भी चिन्हित किया गया है, ताकि निष्पक्षता दिखे।

लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप दूसरा है। उनका कहना है कि मस्जिद का मामला सालों से कोर्ट में है, हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने की खबरें भी हैं, लेकिन बुलडोजर की कार्रवाई का टाइमिंग बेहद संदिग्ध है। आरोप है कि जैसे ही 250 करोड़ के घोटाले की फाइलें मीडिया में लीक होने लगीं, वैसे ही जानबूझकर शाही मस्जिद के डिमोलिशन को प्राइम टाइम डिबेट बना दिया गया।

एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, "ये क्लासिक डायवर्जन पॉलिटिक्स है। जनता को हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद में उलझा दो, ताकि कोई ये न पूछे कि 250 करोड़ कहाँ गया? जो लोग बिजली के पोल की बात कर रहे थे, वो अब मस्जिद-मंदिर पर बहस कर रहे हैं। भ्रष्टाचार का करंट तो जमीन में ही दब गया।"

गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था

सबसे ज्यादा शर्म की बात ये है कि ये दोनों काम गांधी जयंती के आसपास ही हुए। 2 अक्टूबर को देश स्वच्छता और सत्य की बात कर रहा था, और उज्जैन में जंग को चमकाकर सच को दफनाया जा रहा था। क्या यही बापू के सपनों का भारत है? जहाँ सिंहस्थ जैसे पवित्र मेले में भी कमीशनखोरी हो?

अब उज्जैन की जनता तीन चीजों की मांग कर रही है:

1. 250 करोड़ के विद्युत कार्यों की CAG या लोकायुक्त से स्वतंत्र जांच हो, हर पोल की जियो-टैगिंग और लैब टेस्ट हो।

2. शाही मस्जिद सहित सभी 636 साल पुरानी धरोहरों के लिए रोड वाइडनिंग का निष्पक्ष पुनर्मूल्यांकन हो, क्या कोई दूसरा विकल्प नहीं था?

3. ये जांच हो कि क्या वाकई मस्जिद के डिमोलिशन के टाइमिंग का इस्तेमाल घोटाले से ध्यान हटाने के लिए किया गया? इसके लिए SIT बने।

महाकाल सब देख रहे हैं। सिंहस्थ आस्था का मेला है, घोटाले का नहीं। अगर अभी भी चांदी के पेंट से जंग छुपाई गई, तो 2028 में उज्जैन रोशनी से नहीं, बल्कि इन दोहरे घोटालों की बदनामी से दुनिया में जाना जाएगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 3,2026 

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October 02, 2026

"हे राम"! सिंहस्थ से पहले उज्जैन में 250 करोड़ का करंट वाला घोटाला, जंग लगे पोल पर सिल्वर पेंट का खेल, गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था

"हे राम"! सिंहस्थ से पहले उज्जैन में 250 करोड़ का करंट वाला घोटाला, जंग लगे पोल पर सिल्वर पेंट का खेल, गांधी जयंती पर शर्मसार व्यवस्था
-Friday World Oct 3,2026
हे "राम" - आज गांधी जयंती है, और बापू कहते थे - भ्रष्टाचार और असत्य, हिंसा से भी बड़ा पाप है। आज उसी बापू की जयंती पर मध्यप्रदेश के उज्जैन से ऐसी खबर आई है जिसने महाकाल की नगरी को शर्मसार कर दिया है।

अहिल्या वाणी डॉट कॉम की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, 2028 में होने वाले पवित्र सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों में 250 करोड़ की बिजली लाइन शिफ्टिंग में बड़ा घोटाला सामने आया है।

क्या है पूरा मामला?

सिंहस्थ 2028 के लिए सरकार ने 5000 करोड़ का बजट पास किया है। इसमें से अकेले 75 बिजली लाइनों को शिफ्ट करने के लिए पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी को 250 करोड़ दिए गए हैं। नियम था कि 100% नया सामान लगेगा - नए पोल, नई केबल, नया कंडक्टर।

लेकिन जब सिर्फ 3 लाइनों की पड़ताल हुई तो होश उड़ गए:

- सिर्फ 20% नए पोल लगे, 80% पुराने, जंग लगे, वेल्डिंग वाले पोल पर सिल्वर पेंट पोतकर नया बना दिया गया। पेंट हाथ से खुरचने पर निकल रहा है।
- 40 ट्रांसफॉर्मर गायब हैं - कागजों में लगे दिखाए गए, जमीन पर है ही नहीं।
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- पुराने केबल और तारही दोबारा लगा दिए गए।

- GIS सर्वे और जियो-टैगिंग - जो अनिवार्य था, उसका 95% काम ही नहीं हुआ। ताकि पुराना सामान छुपाया जा सके।

अफसर ही निकले ठेकेदार

सबसे बड़ा खुलासा - कागजों पर A-क्लास ठेकेदार हैं, लेकिन असल में बिजली कंपनी के अफसरों ने ही बैकडोर से पेटी कॉन्ट्रैक्ट ले लिया। अपने करीबियों से घटिया काम करवाया और बिना काम के 4.51 करोड़ का भुगतान भी कर दिया गया।

कार्रवाई क्या हुई?

मामला उजागर होने पर हड़कंप मचा है। शुरूआती कार्रवाई में 2 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है और AE समेत 4 अफसरों पर कार्रवाई हुई है। लेकिन सवाल उठ रहा है - सस्पेंड अफसर अगले ही दिन ड्यूटी पर कैसे दिख गया? क्या ये सिर्फ दिखावे की कार्रवाई है?

स्थानीय दुकानदार इब्राहिम ने बताया - "9 साल पुरानी DP मेरी दुकान के शटर से सटी है, करंट का डर है। लाइन शिफ्टिंग में नई DP की जगह उसी पुरानी को लगा दिया।"

सुरक्षा मानकों की भी धज्जियां उड़ी हैं - 11 KV लाइन की घरों से दूरी 5 फीट होनी चाहिए, यहां 1-2 फीट है, न कंक्रीट बेस है। आंधी में पोल गिर सकता है।

गांधी जयंती पर सवाल

राम - गांधी जी ने कहा था अंत्योदय - आखिरी आदमी तक न्याय। सिंहस्थ करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का पर्व है। वहां अगर बिजली के पोल में ही भ्रष्टाचार होगा तो किसकी जान जाएगी? आम श्रद्धालु की।

क्या महाकाल की नगरी में, गांधी की जयंती पर, यही सच्ची श्रद्धांजलि है? जंग लगे पोल पर सिल्वर पेंट करना, ये सिर्फ घोटाला नहीं, आस्था और सत्य दोनों पर हमला है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 3,2026

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October 02, 2026

"हे राम"! सत्य और अहिंसा के लिए शहीद हुए इमाम हुसैन और सत्याग्रही गांधी - जयंती पर झूठ की फैक्ट्री देख दुनिया हैरान

"हे राम"! सत्य और अहिंसा के लिए शहीद हुए इमाम हुसैन और सत्याग्रही गांधी - जयंती पर झूठ की फैक्ट्री देख दुनिया हैरान
-Friday World Oct 2,2026 

हे "राम" -आज 2 अक्टूबर गांधी जयंती है। आज का दिन दो महान आत्माओं की याद का दिन है। एक वो जो सत्य के लिए कर्बला में शहीद हो गए - इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, और दूसरे वो जिन्होंने उन्हीं की प्रेरणा से सत्य और अहिंसा का आंदोलन पूरी दुनिया को सिखाया - महात्मा गांधी। गांधी जी ने खुद कहा था कि हुसैन की कुर्बानी से मैंने सीखा कि हक के लिए कैसे खड़ा हुआ जाता है।

लेकिन इसी पाक दिन पर दुनिया हैरान-परेशान है कि कुछ बिके हुए लोग जो अपने आप को मुस्लिम कहते हैं, वो कितना बड़ा झूठ फैला रहे हैं।

क्या है झूठ?

पिछले दो हफ्ते से सोशल मीडिया पर दो बड़े झूठ फैलाए गए:

1. पहला झूठ: कहा गया कि यमन के अंसारुल्लाह (हूती) ने काबा शरीफ पर हमला किया है।

2. दूसरा और ताजा झूठ: कल सऊदी गठबंधन ने दावा किया कि अंसारुल्लाह ने मदीना के तैयबा पावर प्लांट पर ड्रोन हमला किया है, जो मस्जिद-ए-नबवी को बिजली सप्लाई करता है।

सऊदी गठबंधन के प्रवक्ता तुर्की अल-मालिकी ने कहा कि एक ट्रांसफार्मर बंद हो गया है। लेकिन सनआ से तुरंत जवाब आया।

यमन के राष्ट्रपति महदी अल-मशात और अंसारुल्लाह के पॉलिटिकल ब्यूरो के मेंबर हिजाम अल-असद ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा - "ये बड़ा झूठ और घटिया प्रोपगेंडा है।"

यमनी अधिकारियों ने कहा कि हम काबा और मदीना के सच्चे रक्षक हैं, हमारी रूहें काबा पर कुर्बान हैं। हम कभी मुकद्दस जगहों पर हमला नहीं कर सकते। ये सऊदी हुकूमत अपनी नाकामी छुपाने के लिए मुस्लिम दुनिया के जज्बात भड़काना चाहती है। 

सनआ में लोगों ने काबा की तस्वीर वाले पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया जिस पर लिखा था "Our souls are sacrificed for it "। अंसारुल्लाह ने साफ कहा कि उनका निशाना हमेशा मिलिट्री बेस और तेल कंपनियां रही हैं, इबादतगाह नहीं।[Kaaba] 

गांधी और हुसैन की सीख क्या है?

इमाम हुसैन ने यजीद के झूठ और जुल्म के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी। गांधी जी ने अंग्रेजों के झूठ के खिलाफ सत्याग्रह किया। दोनों ने एक ही बात कही - सत्य ही ईश्वर है, हक ही खुदा है।

आज गांधी जयंती पर अगर हम सच में बापू और हुसैन को याद करना चाहते हैं तो हमें झूठ फैलाने वालों को पहचानना होगा। जो लोग बिक कर काबा और मदीना जैसी पाक जगहों पर हमले का झूठा इल्जाम लगाते हैं, वो न तो इस्लाम के हैं, न इंसानियत के।

सऊदी अधिकारियों ने खुद पहले भी कबूल किया है कि काबा पर बम हमले की खबरें फर्जी थीं, एक आदमी सिर्फ लोगों को डरा रहा था। 

इस गांधी जयंती पर जरूरत है कि हम फेक न्यूज को क्रॉस करें और सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलें।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 2,2026 

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