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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Friday, 25 September 2026

September 25, 2026

સંપત્તિ વેચીને તિજોરી ભરતી AMC - 15 દિવસમાં 2550 કરોડના પ્લોટ વેચાણમાં, બોડકદેવમાં 3.10 લાખ પ્રતિ મીટરનો બમ્પર ભાવ!

સંપત્તિ વેચીને તિજોરી ભરતી AMC - 15 દિવસમાં 2550 કરોડના પ્લોટ વેચાણમાં, બોડકદેવમાં 3.10 લાખ પ્રતિ મીટરનો બમ્પર ભાવ!
-Friday World September 26,2016 
અમદાવાદ: એસ.પી. રિંગ રોડની આસપાસ આવેલા નવા વિસ્તારો અમદાવાદ મ્યુનિસિપલ કોર્પોરેશન (AMC) માટે સોનાની મરઘી સાબિત થઈ રહ્યા છે. જ્યાં 10 વર્ષ પહેલા ખેતરો અને ખુલ્લી જમીન હતી, આજે ત્યાંના પ્લોટ કરોડોના ભાવે વેચાઈ રહ્યા છે.

AMCએ છેલ્લા 15 દિવસમાં જ કુલ 2550 કરોડ રૂપિયાના પ્લોટ વેચવા કાઢ્યા છે, જેમાં હવે વધુ 11 પ્લોટનું લિસ્ટ જાહેર કર્યું છે.

 ક્યાં કેટલા પ્લોટ અને શું ભાવ?

તાજેતરમાં ગોતા, આંબલી, જગતપુર સહિત 9 પ્લોટ વેચીને 1000 કરોડ લાવવાનું આયોજન કર્યા બાદ હવે AMCએ સોલા, થલતેજ, બોડકદેવ અને મોટેરા વિસ્તારના 11 પ્રાઇમ પ્લોટ હરાજીમાં મૂક્યા છે. આમાંથી 1550 કરોડ રૂપિયાની આવક થવાની આશા છે.

આ 11 પ્લોટમાંથી 6 પ્લોટ પર શોપિંગ કોમ્પ્લેક્સ અને કોર્પોરેટ ઓફિસ બનશે, જ્યારે 5 પ્લોટ પર લક્ઝુરિયસ ફ્લેટ અને બંગલોઝ બનશે.

ભાવની વિગત:
- બોડકદેવ: સૌથી મોંઘો - રહેણાંક માટે પ્રતિ ચોરસ મીટર 3.10 લાખ રૂપિયા
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- થલતેજ, સોલા, મોટેરા: પ્રતિ ચોરસ મીટર *2.50 થી 2.75 લાખ રૂપિયા

આટલા ઊંચા ભાવ હોવા છતાં બિલ્ડરોની લાઈન લાગી છે, કારણ કે આ વિસ્તારો SG હાઈવે અને મેટ્રો કનેક્ટિવિટીથી પ્રાઇમ બની ગયા છે.

 વિકાસ કે સંપત્તિ વેચાણ? નાગરિકોનો સવાલ

આટલા વર્ષોથી શાસન કરતી ભાજપ વિકાસના બણગા ફૂંકે છે, તો પછી સંપત્તિઓ કેમ વેચવી પડે છે? આ સવાલ હવે સામાન્ય અમદાવાદી પૂછી રહ્યો છે.

નિષ્ણાતો કહે છે કે AMC પાસે ટેક્સ અને ગ્રાન્ટની આવક છે, પરંતુ નવા વિસ્તારોમાં રોડ, ડ્રેનેજ, સ્ટોર્મ વોટર લાઈન અને સ્ટ્રીટ લાઈટ જેવી પ્રાથમિક સુવિધાઓ પહોંચાડવા માટે હજારો કરોડની જરૂર છે. તેના માટે જમીન વેચાણ એ સૌથી સરળ રસ્તો છે.

AMCનું કહેવું છે કે આ પૈસો શહેરના ઈન્ફ્રાસ્ટ્રક્ચર, સ્માર્ટ સિટી પ્રોજેક્ટ અને પાર્ક, શાળા, હોસ્પિટલ જેવી જાહેર સુવિધાઓ પાછળ વપરાશે.

પરંતુ સામે નાગરિકોનું કહેવું છે કે - પ્લોટ વેચાઈ જાય છે, તિજોરી ભરાઈ જાય છે, પણ સુવિધાઓ ક્યારે પહોંચશે તે મોટો પ્રશ્ન છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 26,2016 

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September 25, 2026

सूरत टेक्सटाइल मार्केट में भीषण आग - ₹10 हजार की सैलरी के विवाद में ₹24 करोड़ स्वाहा!

सूरत टेक्सटाइल मार्केट में भीषण आग - ₹10 हजार की सैलरी के विवाद में ₹24 करोड़ स्वाहा!
- Friday World September 26,2016 
सूरत: गुजरात के सूरत के मशहूर टेक्सटाइल मार्केट में लगी भीषण आग ने पूरे व्यापारी वर्ग को हिला कर रख दिया है। पुलिस के अनुसार, यह आग कोई हादसा नहीं बल्कि बदले की कार्रवाई थी।

सूरत पुलिस के मुताबिक, मार्केट की एक दुकान के पूर्व कर्मचारी का मालिक से ₹10 हजार की कथित बकाया सैलरी को लेकर विवाद चल रहा था। कई बार मांगने के बाद भी पैसे नहीं मिलने पर गुस्से में आकर पूर्व कर्मचारी ने मार्केट में आग लगा दी।

देखते ही देखते आग ने विकराल रूप ले लिया और कई दुकानों को अपनी चपेट में ले लिया। फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियों ने घंटों मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक करीब ₹24 करोड़ का कपड़ा और माल जलकर राख हो चुका था। मार्केट में अफरा-तफरी मच गई।

पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और आगे की जांच जारी है।

क्या ₹10 हजार के लिए ₹24 करोड़ का नुकसान जायज?

यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है - क्या छोटा सा पैसों का विवाद इतने बड़े अपराध को सही ठहरा सकता है?

₹10 हजार के लिए एक व्यक्ति ने न सिर्फ अपना भविष्य खराब किया, बल्कि सैकड़ों व्यापारियों की रोजी-रोटी पर भी संकट खड़ा कर दिया। जिन व्यापारियों का कोई लेना-देना भी नहीं था, उनका भी लाखों का नुकसान हो गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत, लेबर कोर्ट या कानूनी नोटिस से किया जा सकता था। गुस्से में उठाया गया एक गलत कदम कई जिंदगियों को तबाह कर देता है।

यह घटना सभी मालिकों और कर्मचारियों के लिए सबक है - समय पर सैलरी का भुगतान और सम्मानजनक व्यवहार जरूरी है, और गुस्से पर काबू रखना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 26,2016 

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September 25, 2026

"परमाणु बम नापाक है, हराम है" - UN में ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान का बड़ा ऐलान, कहा हम आतंकवाद के शिकार हैं

"परमाणु बम नापाक है, हराम है" - UN में ईरान के राष्ट्रपति पेजेश्कियान का बड़ा ऐलान, कहा हम आतंकवाद के शिकार हैं
-Friday World September 26,2016 
न्यूयॉर्क: संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया को एक बड़ा संदेश दिया है। उन्होंने परमाणु बम को "नापाक" और "गैर-कानूनी" बताते हुए उसे बनाने की किसी भी महत्वाकांक्षा को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

अमेरिकी टीवी चैनल फॉक्स न्यूज को दिए एक इंटरव्यू और UNGA में अपने संबोधन के दौरान पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

 सुप्रीम लीडर का फतवा

राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने कहा, "बिल्कुल नहीं, बिल्कुल नहीं। हमारे शहीद और सम्मानित सुप्रीम लीडर [आयतुल्लाह खामेनेई] ने धार्मिक आदेश जारी करके कई बार यह घोषणा की थी कि परमाणु हथियार नापाक है। यह गैर कानूनी है।"

उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर कभी भी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा। यह ईरान की आधिकारिक और धार्मिक नीति है।

 जांच के लिए तैयार है ईरान

ईरानी राष्ट्रपति ने एक बड़ा प्रस्ताव भी रखा। उन्होंने कहा कि तेहरान अंतरराष्ट्रीय जांचकर्ताओं (IAEA) को अपने परमाणु कार्यक्रम की जांच करने की अनुमति देने को तैयार है। इसमें संवर्धित यूरेनियम को हल्का करने के लिए कदम उठाना भी शामिल है।

पेजेश्कियान ने कहा, "तेहरान पहले भी अंतरराष्ट्रीय जांच के लिए तैयार था और आज भी है। हम चाहते हैं कि दुनिया देखे कि हमारा कार्यक्रम पारदर्शी है।"

 "हम अमेरिका-इजरायल के आतंकवाद के शिकार हैं"

अपने UNGA संबोधन में पेजेश्कियान ने पश्चिम पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, "ईरान आतंकवादी नहीं है, बल्कि हम आतंकवाद और आक्रामकता के शिकार हैं।"

उन्होंने कहा कि अपनी रक्षा-क्षमता को बढ़ाना ही आजादी बनाए रखने और हमलावरों की आक्रामकता को रोकने का एकमात्र तरीका है। तेहरान बातचीत को तैयार है, लेकिन धमकियों की भाषा स्वीकार नहीं करेगा।

ईरान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर परमाणु बम बनाने की कोशिश का आरोप लगाते रहे हैं और प्रतिबंधों को और कड़ा करने की मांग कर रहे हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 26,2016 

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September 25, 2026

UN में नेतन्याहू की स्पीच पर ऐतिहासिक वॉकआउट - 77 देशों ने किया बायकॉट, UAE समेत 4 मुस्लिम देश हॉल में रहे मौजूद

UN में नेतन्याहू की स्पीच पर ऐतिहासिक वॉकआउट - 77 देशों ने किया बायकॉट, UAE समेत 4 मुस्लिम देश हॉल में रहे मौजूद
-Friday World September 26,2016 
न्यूयॉर्क / संयुक्त राष्ट्र: इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में स्पीच के दौरान इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक बगावत देखने को मिली। इजरायली मीडिया के मुताबिक, 77 देशों के प्रतिनिधियों ने नेतन्याहू के मंच पर आते ही हॉल से वॉकआउट कर दिया।

वायरल हो रहे वीडियो में दिख रहा है कि जैसे ही नेतन्याहू पोडियम पर आए, बड़ी संख्या में डेलीगेट्स अपनी सीटें छोड़कर बाहर निकल गए। हॉल में कई खाली सीटें नजर आईं। इस दौरान कुछ लोगों ने 'फ्री फिलिस्तीन' के नारे भी लगाए।

नेतन्याहू ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मंच से कहा - "अगर कोई और नैतिक कायर हॉल में बचा है, तो अभी चला जाए।"

कौन से देश बाहर निकले?

इजरायल की गिनती के मुताबिक, 77 देशों की लिस्ट में सऊदी अरब, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, मिस्र, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, स्पेन और कई अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश शामिल थे। यह विरोध गाजा में चल रहे युद्ध और बढ़ते मानवीय संकट के खिलाफ सांकेतिक विरोध के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि एक स्पष्टीकरण भी है - इन 77 में से सभी ने जानबूझकर वॉकआउट नहीं किया। कुछ देश सुबह के सेशन में पहले से ही मौजूद नहीं थे।

 UAE, बहरीन, मोरक्को और अजरबैजान ने नहीं किया बायकॉट

इस वॉकआउट में सबसे ज्यादा चर्चा 4 मुस्लिम बहुल देशों की हो रही है जो हॉल में बने रहे - 

संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और अजरबैजान।

इन चारों देशों ने नेतन्याहू की स्पीच का बायकॉट नहीं किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे कूटनीतिक कारण हैं:

UAE, बहरीन और मोरक्को ने 2020 के अब्राहम समझौते (Abraham Accords) के तहत इजरायल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। अजरबैजान का इजरायल के साथ दशकों पुराना रणनीतिक, रक्षा और ऊर्जा साझेदारी है।

इन देशों ने गाजा युद्ध पर चिंता जताई है, लेकिन उन्होंने इजरायल के साथ अपने कूटनीतिक चैनल खुले रखे हैं।

 दुनिया भर में प्रतिक्रिया

इजरायली चैनल 14 ने इसे "इजरायल के मुंह पर थूक" बताया, जबकि वाशिंगटन पोस्ट ने इसे इजरायल के खिलाफ "भयंकर वैश्विक बैकलैश" कहा।

नेतन्याहू इस समय अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (ICC) के गिरफ्तारी वारंट का सामना कर रहे हैं, फिर भी वे UN में भाषण देने पहुंचे।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 26,2016 

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September 25, 2026

चुनाव आयोग से HDFC बैंक तक - पूर्व CEC राजीव कुमार कहाँ हैं और क्या है उनकी नई भूमिका?

चुनाव आयोग से HDFC बैंक तक - पूर्व CEC राजीव कुमार कहाँ हैं और क्या है उनकी नई भूमिका?
- Friday World September 26,2016 
                       प्रतीकात्मक तस्वीर 

नई दिल्ली: जब से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विवाद शुरू हुआ है, तब से एक नाम फिर से चर्चा में है - पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार। लोग पूछ रहे हैं कि 2024 का ऐतिहासिक लोकसभा चुनाव कराने वाले 25वें CEC अब कहाँ हैं?

राजीव कुमार 18 फरवरी 2025 को रिटायर हुए थे। रिटायरमेंट के बाद वे एकदम लो-प्रोफाइल हो गए, जैसे कभी थे ही नहीं। लेकिन 2026 में वे फिर सुर्खियों में लौटे।

HDFC बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन बने

HDFC बैंक के बोर्ड ने 29 जून 2026 को उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी। बोर्ड ने उन्हें 30 जून 2026 से 4 साल के लिए एडिशनल इंडिपेंडेंट डायरेक्टर बनाया।

इसके बाद RBI की मंजूरी के बाद उन्होंने 15 जुलाई 2026 से 3 साल के लिए बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन का पद संभाल लिया है। यह जानकारी बैंक की स्टॉक एक्सचेंज फाइलिंग और कई राष्ट्रीय अखबारों में प्रकाशित हुई है। 

वे अब HDFC बैंक के पूर्व चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती की जगह लेंगे, जिन्होंने मार्च 2026 में इस्तीफा दिया था।

कौन हैं राजीव कुमार?

राजीव कुमार 1984 बैच के IAS अफसर हैं। ECI में आने से पहले वे फाइनेंस सेक्रेटरी और डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंशियल सर्विसेज (2017-2020) के सेक्रेटरी थे। उनके कार्यकाल में बैंकों के NPA की सफाई और शेल कंपनियों पर कार्रवाई के लिए उन्हें जाना जाता है। 

2024 लोकसभा चुनाव, जिसमें 64 करोड़ से ज्यादा लोगों ने वोट डाला, उनके ही नेतृत्व में हुआ था।

रिटायरमेंट के बाद के फायदे कितने?

इस पर काफी चर्चा है:

 1. HDFC बैंक से: बैंक की AGM नोटिस के अनुसार, पार्ट-टाइम चेयरमैन के रूप में उन्हें लगभग 50 लाख रुपये की सालाना फिक्स्ड सैलरी, बैंक कार और सिटिंग फीस मिलती है। यह एक नॉन-एग्जीक्यूटिव रोल है।

 2. सरकार से: नए CEC और EC एक्ट 2023 के तहत, पूर्व CEC को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर पेंशन और रिटायरमेंट बेनिफिट्स मिलते हैं। इसमें IAS पेंशन (लगभग 15-18 लाख सालाना + DA), ग्रेच्युटी, PF और लीव एनकैशमेंट शामिल हैं।

इस हिसाब से उनकी आधिकारिक सालाना आय लगभग 65-70 लाख के आसपास बैठती है।

सोशल मीडिया पर कुछ लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने BJP को फायदा पहुँचाकर यह पद हासिल किया, लेकिन इन आरोपों का कोई आधिकारिक या कानूनी सबूत नहीं है। चुनाव आयोग ने 2024 चुनाव को पूरी पारदर्शिता से कराया था और सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनावी प्रक्रिया को वैध ठहराया था। HDFC बैंक में उनकी नियुक्ति पूरी तरह से बोर्ड और RBI की मंजूरी से हुई एक पेशेवर नियुक्ति है।

फिलहाल राजीव कुमार बैंकिंग सेक्टर में अपनी नई पारी पर फोकस कर रहे हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 26,2016 

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September 25, 2026

फसल काटने वाले पर हमला, बीज बोने वाले पर खामोशी - क्या जनता का न्याय एकतरफा है?

फसल काटने वाले पर हमला, बीज बोने वाले पर खामोशी - क्या जनता का न्याय एकतरफा है?
- Friday World September 25,2026 
जनता का न्याय भी गजब है! आज सब हाथ धोकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के पीछे पड़े हैं। हर तरफ एक ही नारा, एक ही मांग। लेकिन इस शोर में एक बड़ा सवाल कहीं खो गया है।

अरे भाई, जरा सोचिए।

ज्ञानेश जी तो चुनाव से ठीक पहले आए थे। वो तो बस पकी-पकाई फसल काट रहे हैं। अगर फसल में कीड़े निकलें तो क्या गालियां सिर्फ फसल काटने वाले मजदूर को दी जाएंगी?

असली किसान कौन?

इस पूरी चुनावी प्रक्रिया के असली "किसान" तो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार जी हैं। वही हैं जिन्होंने सालों तक खेत जोता, उसकी रूपरेखा बनाई, खाद-पानी का इंतजाम किया और बीज बोए।

SIR (Special Intensive Revision) की रूपरेखा, वोटर लिस्ट की सफाई का खाका, IT सिस्टम को सेंट्रलाइज करने की नीति - इन सब की नींव तो राजीव कुमार जी के कार्यकाल में ही रखी गई थी। उन्होंने ही 2022 से 2025 तक पूरे तंत्र को इस दिशा में तैयार किया।

ज्ञानेश कुमार तो फरवरी 2025 में आए, जब खेत में फसल लगभग तैयार खड़ी थी। उनका काम तो बस उसे काटना था।

 फसल में कीड़े तो माली जिम्मेदार?

अब अगर आज 13 करोड़ नाम कटने का विवाद है, अगर 14 बार आपत्तियां उठने की खबरें हैं, तो क्या इसकी जिम्मेदारी सिर्फ उस व्यक्ति की है जो अंत में कुर्सी पर बैठा है?

न्याय कहता है कि अगर बीज में ही खोट था, तो माली से भी तो पूछा जाना चाहिए। अगर नीति पहले बनी, तो नीति बनाने वाले को क्यों भुला दिया गया?

आज की राजनीति का यही ट्रेंड बन गया है। जो सामने है, उसी को घेर लो। जो पर्दे के पीछे था, उसे छोड़ दो। ज्ञानेश कुमार आसान टारगेट हैं क्योंकि वे वर्तमान हैं। राजीव कुमार पूर्व हो चुके हैं, इसलिए उन पर बात करना कोई नहीं चाहता।

लेकिन लोकतंत्र में न्याय एकतरफा नहीं होना चाहिए। अगर जांच होनी है तो पूरी फसल चक्र की होनी चाहिए - बीज बोने से लेकर फसल काटने तक। सिर्फ फसल काटने वाले को गाली देकर हम असली सवाल से बच रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि इस्तीफा किसका हो। सवाल यह है कि सिस्टम में खोट कहां से आया? और इसका जवाब सिर्फ वर्तमान में नहीं, अतीत में भी तलाशना होगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 25,2026 

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September 25, 2026

जब चुनावी लोकतंत्र खुद ही सवालों के घेरे में आ जाए

जब चुनावी लोकतंत्र खुद ही सवालों के घेरे में आ जाए
-Friday World September 26,2016
आलेख : संपृक्ता बोस, अनुवाद : संजय पराते

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनावों के इर्द-गिर्द जो हो रहा है, वह आम राजनीतिक दुश्मनी से कहीं ज़्यादा है। उम्मीदवारों का अचानक अपना नाम वापस लेना, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नाम और चुनाव-चिन्ह पर रोक लगाना, विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार करने के लिए दशकों पुराने पुलिस प्रकरणों को फिर से शुरू करना, और भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) के अंदर बढ़ता अंदरूनी संकट, ये सब मिलकर एक गंभीर व्यवस्थागत खतरे की ओर इशारा करते हैं। हमारे गणतंत्र के सामने स्पष्ट रूप से सबसे बड़ा सवाल यह है कि : चुनावी लोकतंत्र का कैसे बचेगा, जब इसे सुरक्षित रखने वाले संस्थान ही पक्षपातपूर्ण नियंत्रण का हथियार बन जाएंगे?

*राज्य मशीनरी का हथियार के रूप में उपयोग* 

हालांकि टीएमसी के शासन का जो रिकॉर्ड है, उसके कारण उसके प्रति कोई राजनैतिक सहानुभूति नहीं हो सकती, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की पूरी तरह से रक्षा करना ज़रूरी है। मतदान, प्रतिनिधित्व और चुनाव-चिन्ह का अधिकार बुनियादी लोकतांत्रिक गारंटी हैं, न कि सत्ताधारी सरकार की सुविधा के हिसाब से स्वीकृत शर्तों के अधीन दिए गए अधिकार। जब राज्य मशीनरी का इस्तेमाल आज किसी एक राजनैतिक ताकत की चुनाव में हिस्सेदारी को रोकने के लिए किया जाता है, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक विपक्ष को निशाना बनाने के लिए कल एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है।

हाल की घटनाओं में चुनाव से संबंधित मामलों में छेड़छाड़ साफ़ तौर पर दिख रही है :

*चुनाव-चिन्ह की जब्ती* : चुनाव आयोग ने गुटीय झगड़े के बीच टीएमसी के ‘जोरा घास फूल’ निशान पर रोक लगा दी है, ममता बनर्जी के गुट को ‘फ़ुटबॉल खिलाड़ी’ चुनाव-चिन्ह दे दिया है और दूसरे गुट को ‘लिफ़ाफ़ा’ चुनाव-चिन्ह दे दिया है।

*नंदीग्राम में लक्षित गिरफ्तारी* : टीएमसी उम्मीदवार संचिता प्रधान डे के नाम वापस लेने के बाद और ममता बनर्जी द्वारा कांग्रेस के उम्मीदवार मिलन प्रधान का समर्थन करने के बाद, राज्य पुलिस ने 2007 के भूमि अधिग्रहण आंदोलन के वारंट का इस्तेमाल करके प्रधान को तुरंत गिरफ्तार कर लिया।

*रेजीनगर में दमन* : निर्दलीय उम्मीदवार सैफुल इस्लाम को 2021 के एक मामले में गिरफ्तार किया गया, जबकि हुमायूं कबीर और एजेयूपी के राज्य सचिव आशिक इकबाल को एकदम अलग, पुराने आरोपों को लेकर अचानक पुलिस की ज़बरदस्ती वाली कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।

हालांकि आपराधिक मामलों को राजनैतिक मक़सद से अलग रखना चाहिए, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इन गिरफ्तारियों को सोचे-समझे समय पर करना प्रशासनिक दबाव के ज़रिए राजनैतिक माहौल बदलने की एक साफ़ रणनीति को दिखाता है।

*सांस्थानिक संकट*

लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए अब सबसे बड़ा खतरा खुद चुनाव आयोग से है। एक संवैधानिक निकाय, जिसकी विश्वसनीयता पूरी तरह से उसकी निष्पक्षता पर टिकी है, वह अभी ऐसे अंदरूनी कलह में फंसी हुई है, जो पहले कभी नहीं हुई। हाल की जांच रिपोर्टों से पता चलता है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बारे में दस महीनों में कम से कम 14 बार अपनी आधिकारिक आपत्तियां दर्ज करवाई हैं। 

असहमति रखने वाले आयुक्तों ने बिना इजाज़त चुनावी ढांचे में किए गए बदलावों पर गंभीर रूप से लाल झंडी दिखाई है। ऐसे मामलों में शामिल हैं :
• मतदाताओं के नामों को "गैर-कानूनी" रूप से और बिना इजाज़त के जोड़ना और हटाना।
• प्रपत्र 6 पंजीकरण प्रक्रिया में मनमाने बदलाव किए गए।
• मतदाताओं के डेटाबेस पहुंच का नई दिल्ली के स्तर पर केंद्रीकरण, जिससे क्षेत्रीय और ज़िला स्तर की जांच को आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सके।

इस तीन-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में औपचारिक रूप से और बार-बार असहमति होने से संस्था की ईमानदारी का भ्रम टूट जाता है। अपनी प्रतिक्रिया में, सीपीआई(एम) पोलिट ब्यूरो ने सही मांग की है कि ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर बने नहीं रहना चाहिए। पार्टी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को तुरंत निलंबित करने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में तुरंत ढांचागत बदलाव करने की मांग की है। एक संस्था, जिसका काम निष्पक्ष अंपायर का काम करना है, वह सत्ताधारी पार्टी का हिस्सा बनकर काम नहीं कर सकती।

*नव फासीवादी परियोजना* 

इन सांस्थानिक गड़बड़ियों को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता ; ये आरएसएस-भाजपा शासन के मॉडल को परिभाषित करने वाली व्यापक नव-फासीवादी विशेषताओं के लक्षण हैं। यह परियोजना शक्तियों के व्यवस्थित संकेंद्रण, डेमोक्रेटिक स्पेस के सिकुड़ने और भयावह तानाशाही पर निर्भर करती है।

केंद्रीकरण की यह मुहिम ‘एक राज्य, एक चुनाव’ और आगामी परिसीमन की कवायद में पूरी तरह से दिखाई देती है। चुनावों को एक ही चक्र में एक साथ करना कोई प्रशासनिक सुविधा नहीं है ; यह प्रचार के संसाधनों पर एकाधिकार जमाने, राजनैतिक विचार-विमर्श पर प्रभुत्व जमाने और सरकारों को बार-बार जवाबदेह ठहराने के अधिकार से मतदाताओं को वंचित करने की एक सोची-समझी चाल है। इसी तरह, परिसीमन के लक्षित जनसांख्यिकी और इलाकों के राजनैतिक रसूख को व्यवस्थित तरीके से कम करने का एक औजार बनने का खतरा है। अगर वोटर डेटाबेस, चुनाव की समय-सारिणी और चुनाव क्षेत्र की सीमाओं पर नियंत्रण पूरी तरह से केंद्रीकृत है, तो यह रास्ता बिना किसी शक के लोकतंत्र विरोधी है।

*संप्रभु मतदाता की रक्षा* 

सांस्थानिक कब्ज़े की इस पृष्ठभूमि में, आगामी 6 अक्टूबर को होने जा रहे उपचुनावों में वामपंथ एक स्पष्ट, सैद्धांतिक राजनैतिक विकल्प के साथ हस्तक्षेप कर रहा है। सीपीआई(एम) ने रेजिनगर से सईद असद अली को, जबकि सीपीआई ने नंदीग्राम से शांति गोपाल गिरी को मैदान में उतारा है, और मतगणना 9 अक्टूबर को होनी है।

मुख्य लड़ाई इस बात से कहीं ज़्यादा है कि कौन-सा गुट चुनाव-चिन्ह हासिल करता है या कौन सी पार्टी स्थानीय मुकाबला जीतती है। यह दरअसल मतदाता के संप्रभुता की लड़ाई है। लोकतंत्र को एक कमजोर प्रशासन की छाया में इलेक्ट्रॉनिक बटन दबाने की यांत्रिक रस्म तक सीमित नहीं किया जा सकता। मतदाता बिना किसी शर्त के मतदाता सूची में सुरक्षित रूप से बने रहने, चुनाव के लिए बराबरी के मैदान में वास्तविक राजनैतिक विकल्प की जांच पड़ताल करने, और चुनावी मशीनरी के पूरी तरह स्वतंत्र रहने पर भरोसा करने का अधिकार चाहते हैं। जब इन बुनियादी गारंटियों को खत्म कर दिया जाता है, तो लड़ाई सिर्फ़ एक चुनाव के लिए नहीं रह जाती, बल्कि खुद गणतंत्र को बचाने की हो जाती है।

Friday World September 26,2016

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650