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Wednesday, 24 June 2026

June 24, 2026

"करबला की रेत से उठी इन्सानियत की आवाज़: हुसैन — जो सिर्फ़ एक मज़हब के नहीं, पूरी इंसानियत के हैं"

करबला की रेत से उठी इन्सानियत की आवाज़: हुसैन — जो सिर्फ़ एक मज़हब के नहीं, पूरी इंसानियत के हैं"
- Friday World 24 Jun 2026
नदी जब बहती है तो रास्ते की हर ज़मीन को सींचती चलती है। कहीं बंजर धरती हरी हो जाती है, कहीं प्यासे कंठों को जीवन मिलता है। इमाम हुसैन की शहादत भी वैसी ही एक नदी है। 680 ईस्वी में करबला की तपती रेत पर जो खून बहा, उसने सिर्फ़ एक क़ौम को नहीं, पूरी इंसानियत के ज़मीर को हरा-भरा कर दिया। 10 मोहर्रम हिजरी 1448, 26 जून 2026 को जब हम उनकी याद मनाते हैं, तो यह याद किसी एक समुदाय की विरासत नहीं है। यह उस हर इंसान की धरोहर है जो अन्याय के सामने सिर झुकाने से इनकार करता है।

1. सत्याग्रह जो 7वीं सदी में ही बराबरी सिखा गया

मुंशी प्रेमचंद ने कहा था, "दुनिया जिस समानता और बंधुत्व की गुत्थी आज तक सुलझा नहीं पाई, उसे इमाम हुसैन ने सातवीं सदी में ही अपने सत्याग्रह से सुलझा दिया था।" सोचिए, आज हम 'लिबर्टी, इक्वालिटी, फ्रेटरनिटी' की बात 18वीं सदी की फ्रांसीसी क्रांति से जोड़ते हैं। मगर करबला के मैदान में हुसैन ने 72 भूखे-प्यासे साथियों के साथ खड़े होकर तानाशाह यजीद को बता दिया था कि सत्ता का मतलब गुलामी नहीं, जिम्मेदारी है। उन्होंने तलवार के ज़ोर पर बैयत यानी वफादारी से इनकार किया। क्योंकि हुसैन के लिए ख़लीफ़ा का तख्त उसूलों से बड़ा नहीं था। उनका सत्याग्रह किसी ताज के लिए नहीं था। वह जनकल्याण के लिए था — ऐसी हुकूमत के लिए जो समानता, स्वतंत्रता और न्याय पर टिकी हो।

यही वजह है कि करबला की घटना को दुनिया की सबसे महान ऐतिहासिक घटनाओं में गिना जाता है। यह लड़ाई फ़ौजों की नहीं थी, ज़मीर की थी। 30 हज़ार की यजीदी सेना के सामने 72 लोग। फिर भी इतिहास ने सलाम 72 को किया, 30 हज़ार को नहीं।

2. 'हुसैन' एक नाम नहीं, एक विचार है

रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा: "In the world of humanity 'Husain' belongs to all"। हुसैन को शिया, सुन्नी, हिंदू, ईसाई के खांचों में नहीं बांटा जा सकता। वे 'सार्वकालिक और सार्वभौमिक' हैं। हर उस दौर में हुसैन दिखते हैं जहां कोई कमज़ोर, किसी ताकतवर की ज़्यादती के खिलाफ खड़ा होता है। डॉ. क्रिस हडसन अपनी किताब _Husain and Struggle for Justice_ में लिखते हैं कि सदियों से हुसैन ने लोगों को सच्चाई, न्याय, निर्भयता और सम्मान के साथ जीने के लिए प्रेरित किया है।

10 मोहर्रम 61 हिजरी को जो हुआ, वह सिर्फ़ एक जंग नहीं थी। वह 'नज़ीर' थी — एक मिसाल। यजीद ने हुकूमत को अपनी जागीर समझा। शरीयत के नाम पर शराब, जुआ, ज़ुल्म सब जायज़ कर दिया। हुसैन ने कहा, "मुझ जैसा, तुझ जैसे की बैयत नहीं कर सकता"। यह इनकार सिर्फ़ यजीद से नहीं था। यह हर उस निज़ाम से इनकार था जो इंसान को इंसान न समझे। इसलिए टैगोर ने फिर कहा: "Imam Husain was the Symbol of Truth - Freedom and Sacrifice for all Mankind"।

3. करबला: जहां भूख ने इतिहास को सींचा

करबला का सच रोंगटे खड़े कर देता है। हुसैन अपने परिवार और 72 साथियों के साथ मक्का से कूफ़ा जा रहे थे। रास्ते में यजीद की फौज ने उन्हें फुरात नदी के किनारे घेर लिया। पानी बंद कर दिया गया। 7 मोहर्रम से 10 मोहर्रम तक — तीन दिन — छोटे-छोटे बच्चे 'अल-अतश, अल-अतश' यानी 'प्यास-प्यास' पुकारते रहे। 6 महीने के अली असग़र को भी प्यासा शहीद कर दिए। हुसैन ने अपने भाई अब्बास, बेटे अली अकबर, भतीजे क़ासिम सबको एक-एक कर कुर्बान होते देखा। 

10 मोहर्रम की दोपहर हुसैन अकेले बचे। उन्होंने फिर भी झुकना मंज़ूर नहीं किया। यजीदी सेना ने उन पर तीर, भाले, तलवार से हमला किया। वे सजदे में शहीद हुए। उनके जिस्म पर अनगिनत भालों और तलवारों के ज़ख्म थे। यह कुर्बानी किसी सल्तनत के लिए नहीं थी। यह उस आवाज़ के लिए थी जो कहती है कि ज़ुल्म के आगे नही सिर सिर्फ़ अल्लाह के सामने झुकता है।

इसीलिए कहा जाता है कि इस्लाम ज़िंदा होता है हर करबला के बाद। हुसैन ने अपना सब कुछ देकर दीन को बचाया, और इंसानियत को रास्ता दिखाया।

4. करबला से निकली क्रांतियों की मशाल

करबला एक दिन में खत्म नहीं हुआ। वह एक शुरुआत थी। हुसैन की शहादत ने ऐसी चिंगारी लगाई कि सदियों तक बुझी नहीं। इतिहासकार मानते हैं कि फ्रांसीसी क्रांति, अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम, भारत का स्वाधीनता आंदोलन — सब पर कहीं न कहीं करबला की छाप है। महात्मा गांधी ने कहा था, "मैंने हुसैन से सीखा कि कैसे जीत हासिल की जाती है, जबकि मैं मज़लूम हूं"। नेल्सन मंडेला ने जेल में करबला की दास्तान पढ़ी और रंगभेद के खिलाफ 27 साल की कैद काट ली, पर झुके नहीं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का कथन इसीलिए बहुत अहम है: "The sacrifice of Imam Husain is not limited to one country, or nation, but it is the hereditary state of the brotherhood of all mankind"। हुसैन की विरासत सरहदों में नहीं बंधती। वह हर उस दिल में है जो इंसाफ़ चाहता है।

5. आज के दौर में हुसैन का पैग़ाम क्या है?

आज 2026 में जब हम 10 मोहर्रम मना रहे हैं, तो दुनिया फिर उसी दोराहे पर खड़ी है। कहीं युद्ध, कहीं नफ़रत, कहीं ताकत का नशा। ऐसे में हुसैन हमें तीन सबक देते हैं।

पहला: सिद्धांत पर समझौता नहीं
 हुसैन के पास विकल्प था। यजीद की बैयत कर लेते, जान बच जाती, परिवार सलामत रहता। मगर उन्होंने कहा कि अगर मैं आज झुक गया, तो कल हर सच्चा इंसान झुकने को मजबूर होगा। इसलिए उन्होंने मौत चुनी, ज़िल्लत नहीं।

दूसरा: कमज़ोर के साथ खड़े होना
 करबला में हुसैन के साथ औरतें, बच्चे, बीमार, बुज़ुर्ग थे। उन्होंने सबको बचाने की कोशिश की। अपने 6 महीने के बेटे को भी मैदान में ले गए ताकि दुनिया देखे कि ज़ुल्म की कोई हद नहीं होती। यह हमें सिखाता है कि नेतृत्व का मतलब ताकत नहीं, ज़िम्मेदारी है।

तीसरा: नतीजे से बड़ी होती है नीयत
। ज़ाहिरी तौर पर करबला में हुसैन हार गए। उनका पूरा कुनबा शहीद हो गया। मगर असल में जीत हुसैन की हुई। यजीद का नाम मिट गया, हुसैन का पैग़ाम अमर हो गया। डॉ. राधाकृष्णन ने ठीक कहा: "Though Imam Husain gave his life almost 1300 years ago, but his indestructible soul rules the hearts of people even today"।

6. मोहर्रम: न्याय ओर इन्सानियत का मिशन का नाम

हम अक्सर मोहर्रम को सिर्फ़ मातम से जोड़ देते हैं। काले कपड़े, ताज़िए, ज़ंजीर का मातम। मगर मोहर्रम का असल पैग़ाम मातम से बहुत बड़ा है। यह 'मिशन' है। यह पूछता है कि आज का यजीद कौन है? आज का हुसैन कौन बनेगा? यजीद सिर्फ़ एक शख्स नहीं था। वह एक सोच थी — ताकत के नशे की, झूठ को सच बनाने की, अवाम की आवाज़ दबाने की। हुसैन भी सिर्फ़ एक शख्स नहीं थे। वह उस सोच का नाम हैं जो कहती है, "मर जाऊंगा, पर बेईमान नहीं बनूंगा"।

इसलिए जब आप किसी ताज़िए को देखें, तो उसे सिर्फ़ लकड़ी और कागज़ का ढांचा न समझें। वह उस काफिले की याद है जो हक़ के लिए चला था। जब 'या हुसैन' की सदाएं सुनें, तो समझें कि यह सदियां पुराना नारा आज भी ज़िंदा है क्योंकि ज़ुल्म आज भी ज़िंदा है।

 हर दिल में एक करबला

हुसैन ने हमें सिखाया कि जिंदगी की कीमत सांसों से नहीं, उसूलों से तय होती है। करबला की रेत पर लिखा गया खून का वह खत, हर दौर के इंसान के नाम है। वह कहता है कि अगर तुम्हारे सामने कोई यजीद खड़ा हो — चाहे वह नफ़रत के रूप में हो, भ्रष्टाचार के रूप में हो, या बेईमानी के रूप में — तो तुम्हें हुसैन बनना होगा। 

72 के मुकाबले 30 हज़ार का अनुपात आज भी नहीं बदला। सच्चाई के साथ हमेशा मुट्ठी भर लोग होते हैं। मगर इतिहास गवाह है, जीत हमेशा हुसैन की होती है। क्योंकि तलवारें थक जाती हैं, पर विचार नहीं मरते।

तो इस मोहर्रम, आइए आंसू बहाने के साथ एक अहद भी लें। अहद कि हम अपने भीतर के यजीद को मारेंगे। अहद कि हम अपने घर, दफ्तर, समाज में जहां भी नाइंसाफी देखेंगे, आवाज़ उठाएंगे। क्योंकि हुसैन का पैग़ाम यही है: ज़िंदा कौमें मातम नहीं मनातीं, वे मिशन को आगे बढ़ाती हैं।

और हां, हुसैन सिर्फ़ 'उनके' नहीं हैं। हुसैन 'सबके' हैं। शहीदे इंसानियत सबकी साझी विरासत है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 Jun 2026
June 24, 2026

નર્મદા જિલ્લા પંચાયતમાં AAPની એન્ટ્રીથી ભાજપમાં હલચલ: ચૈતર વસાવા પર દબાણ અને કાવતરાનો આરોપ

નર્મદા જિલ્લા પંચાયતમાં AAPની એન્ટ્રીથી ભાજપમાં હલચલ: ચૈતર વસાવા પર દબાણ અને કાવતરાનો આરોપ -Friday World | 24 જૂન 2026

જામનગર, 24 જુન 2026 – ગુજરાતની રાજકીય અખાડામાં નવી હલચલ સર્જાઈ છે. આમ આદમી પાર્ટી (AAP)ના નર્મદા જિલ્લા પંચાયતમાં મળેલા સફળતાના પગલે ભાજપમાં ગભરાટનો માહોલ જોવા મળી રહ્યો છે. AAPના આગેવાનોએ આરોપ લગાવ્યો છે કે આદિવાસી નેતા ચૈતર વસાવાની વધતી લોકપ્રિયતાથી ભાજપ હાલકી અવસ્થામાં છે અને તેમને ભાજપમાં જોડાવા માટે સામ, દામ, દંડ અને ભેદની નીતિ અપનાવવામાં આવી રહી છે.

જામજોધપુરથી AAP ધારાસભ્યે આ મુદ્દે વિગતવાર પ્રેસ કોન્ફરન્સમાં આક્ષેપો કર્યા છે અને ચૈતર વસાવાને નિર્દોષ સાબિત કરવા માટે કાનૂની લડત લડવાની પ્રતિબદ્ધતા વ્યક્ત કરી છે.

શું છે આખી વાર્તા?

બે વર્ષ પહેલા ખેડૂતોના પાકને નુકસાનના મુદ્દે રજૂઆત કરવા બદલ ચૈતર વસાવા સામે કથિત રીતે ખોટો કેસ નોંધવામાં આવ્યો હતો. AAPના આગેવાનોનું કહેવું છે કે આ કેસ રાજકીય પ્રતિકાર કરવા માટે બનાવવામાં આવ્યો હતો. તે સમયે ચૈતર વસાવા જેલમાં હતા ત્યારે તેમને ભાજપમાં જોડાવા માટે માનસિક દબાણ લાવવામાં આવ્યું હતું.

AAP ધારાસભ્યે કહ્યું, “ચૈતર વસાવા આદિવાસી અને યુવાનોના હક્ક માટે સતત લડતા રહ્યા છે. તેમની વધતી લોકપ્રિયતા ભાજપને ખાવા લાગી છે. તેથી જ તેમને ફરી જેલમાં મોકલવાની કાર્યવાહી થઈ રહી છે.”

 નર્મદા જિલ્લામાં AAPની ઐતિહાસિક સફળતા

તાજેતરમાં જિલ્લા અને તાલુકા પંચાયતની ચૂંટણીમાં AAPએ નર્મદા જિલ્લામાં અપ્રત્યાશિત સફળતા મેળવી છે. પાર્ટીના નેતાઓનું કહેવું છે કે આ વિસ્તારમાં આદિવાસી અને યુવા વર્ગમાં AAPની વધતી સ્વીકાર્યતા ભાજપ માટે માથાનો દુખાવો બની ગઈ છે.

“નર્મદા જિલ્લા પંચાયતમાં AAPનું શાસન સ્થપાયું છે. આ લોકોની જીત છે, આદિવાસીઓની જીત છે,” AAPના નેતાઓએ જણાવ્યું.

ભાજપ પર ગંભીર આરોપો

AAPએ ભાજપ સરકાર પર ચારેય ‘ઉપાયો’ (સામ, દામ, દંડ, ભેદ) અપનાવવાનો આરોપ મૂક્યો છે. 

- સામ: લાલચ આપીને ભાજપમાં જોડાવાનું આમંત્રણ  

- દામ: આર્થિક લાભના વચન  

- દંડ: ખોટા કેસ અને જેલની ધમકી  

- ભેદ: વિભાજનની રાજનીતિ  

AAPના ધારાસભ્યે કહ્યું કે ચૈતર વસાવાને ધારાસભ્ય પદ જોખમાય તે હેતુથી બોગસ કેસમાં ફસાવવાની કોશિશ કરવામાં આવી રહી છે.

 આદિવાસી સમાજનો રોષ

આ મુદ્દે આદિવાસી સમાજમાં ભારે નારાજગી જોવા મળી રહી છે. AAPએ ચેતવણી આપી છે કે જો ચૈતર વસાવા સામે કોઈ અન્યાય થશે તો આદિવાસી સમાજ અને AAP મળીને મોટા આંદોલનની તૈયારી કરશે.

“અમે તમામ ઉચ્ચ અદાલતોમાં કાનૂની લડત લડીશું અને ચૈતર વસાવાને નિર્દોષ સાબિત કરીશું,” AAPના નેતાઓએ સ્પષ્ટ કર્યું.

 ચૈતર વસાવા: આદિવાસીઓનો અવાજ

ચૈતર વસાવા આ વિસ્તારમાં આદિવાસી અને યુવાનો વચ્ચે લોકપ્રિય નેતા તરીકે ઓળખાય છે. તેઓ ખેડૂતોના પાક નુકસાન, વન અધિકાર, પાણી અને જમીનના મુદ્દાઓ પર સતત અવાજ ઉઠાવતા રહ્યા છે. AAPના મતે તેમની લોકપ્રિયતા જ ભાજપ માટે મોટી મુશ્કેલી બની ગઈ છે.

 રાજકીય વિશ્લેષણ

ગુજરાતમાં AAPનો વિસ્તાર વધી રહ્યો છે. ખાસ કરીને આદિવાસી વિસ્તારોમાં પાર્ટી મજબૂત પગપેસણ કરી રહી છે. નર્મદા જિલ્લા પંચાયતની સફળતા AAP માટે મહત્વનું સ્ટેપ માનવામાં આવી રહ્યું છે. આ સફળતા ભાજપની પરંપરાગત ગઢમાં પણ પાર્ટીના વિસ્તારનું સંકેત આપે છે.

ભાજપ તરફથી હજુ સુધી આ આરોપો પર કોઈ સત્તાવાર પ્રતિક્રિયા આવી નથી. અધિકારીઓએ આને ‘રાજકીય ષડ્યંત્ર’ તરીકે ખારીજ કર્યું છે.

 આગળ શું?

AAPએ સ્પષ્ટ કર્યું છે કે તેઓ આ મુદ્દે લગાતાર સંઘર્ષ કરશે. આદિવાસી સમાજને સાથે લઈને મોટા પ્રમાણમાં આંદોલન અને કાનૂની લડાઈ લડવાની તૈયારીઓ ચાલી રહી છે. તેમજ ચૈતર વસાવાની સુરક્ષા અને ન્યાય માટે તમામ કાયદાકીય વિકલ્પો અજમાવવામાં આવશે.



નર્મદા જિલ્લા પંચાયતમાં AAPની સફળતા અને ચૈતર વસાવા વિરુદ્ધના કથિત કાવતરાનો મુદ્દો ગુજરાતની રાજનીતિમાં નવું તાપમાન વધારી રહ્યો છે. આ મામલો માત્ર એક વ્યક્તિનો નહીં, પરંતુ આદિવાસી સમાજના અધિકારો, લોકશાહી અને ન્યાય વ્યવસ્થાનો પણ છે.

AAPના આગેવાનોનું કહેવું છે કે “લોકોના અવાજને દબાવવાની કોઈપણ કોશિશ સફળ નહીં થાય.” આ મુદ્દે આગામી દિવસોમાં વધુ વિકાસ જોવા મળી શકે છે.


સજ્જાદ અલી નયાની ✍  
Friday World | 24 જૂન 2026


June 24, 2026

मेक इन इंडिया' या 'मेड इन इज़राइल'? सूर्यास्त्र विवाद ने उजागर की रक्षा खरीद की पोल

मेक इन इंडिया' या 'मेड इन इज़राइल'? सूर्यास्त्र विवाद ने उजागर की रक्षा खरीद की पोल
-Friday World | 24 June 2026
नई दिल्ली, 24 जून 2026– भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक नया विवाद गरमा गया है। 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे के बीच 'सूर्यास्त्र' यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम की कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार और कंपनी इसे 300 किलोमीटर रेंज का स्वदेशी हथियार बता रही है, वहीं दूसरी तरफ ट्रायल में हुई कथित असफलता और इजरायली तकनीकी निर्भरता ने 'व्हाइट लेबलिंग' के आरोपों को हवा दी है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने शिरडी में इस सिस्टम को फ्लैग ऑफ करते हुए इसे भारत की रक्षा क्षमता का गेम चेंजर बताया था। गोदी मीडिया ने इसे पाकिस्तान के लिए खतरे की घंटी बताया। लेकिन ग्राउंड रियलिटी क्या है?

 दावा बनाम हकीकत

सरकार और NIBE लिमिटेड का दावा था कि सूर्यास्त्र 300 किलोमीटर तक सटीक हमला करने में सक्षम है। लेकिन कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2026 में ओडिशा के चांदीपुर इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज में हुए ट्रायल के दौरान एक रॉकेट मात्र 15 किलोमीटर उड़ान भरने के बाद टूटकर गिर गया। यह घटना उन दावों पर सवालिया निशान लगाती है जो इसे स्वदेशी मिसाइल के रूप में पेश कर रहे थे।

NIBE लिमिटेड ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि दोनों 150 किमी और 300 किमी वेरिएंट के ट्रायल सफल रहे। कंपनी का कहना है कि सिस्टम भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा करता है। लेकिन सवाल उठता है — पूरी पारदर्शिता कहां है?

इजरायली टेक्नोलॉजी, भारतीय नाम

सूर्यास्त्र असल में इजरायली डिफेंस कंपनी **एल्बिट सिस्टम्स** के PULS (Precise & Universal Launching System) पर आधारित है। भारत में NIBE लिमिटेड के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और विनिर्माण साझेदारी के तहत इसे 'सूर्यास्त्र' नाम दिया गया। 

- डिजाइन और मूल तकनीक: इजरायल  
- असेंबली और उत्पादन: भारत (NIBE, शिरडी प्लांट)  
- मार्केटिंग: 'मेक इन इंडिया'  

यह मॉडल कई देशों में 'व्हाइट लेबलिंग' के रूप में जाना जाता है — विदेशी डिजाइन पर स्थानीय नाम चिपकाकर बेचना। सवाल यह है कि क्या यह वाकई आत्मनिर्भरता है या सिर्फ असेंबली?

 293 करोड़ का इमरजेंसी ऑर्डर

जनवरी 2026 में भारतीय सेना ने इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के तहत NIBE को लगभग 293 करोड़ रुपये का ऑर्डर दिया। इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का प्रावधान युद्ध या तत्काल खतरे की स्थिति में सामान्य टेंडर प्रक्रिया, लंबी जांच और ऑडिट को बायपास करने के लिए होता है। 

आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि बिना पर्याप्त स्वतंत्र टेक्निकल वेरिफिकेशन के दी गई। जब सिस्टम की परफॉर्मेंस पर सवाल उठे तो जवाबदेही का मुद्दा और गंभीर हो जाता है।

सेना के जवानों के साथ न्याय?

भारतीय जवान सीमा पर दुश्मन का सामना करते हैं। उन्हें ऐसे हथियार चाहिए जो भरोसेमंद हों — जो 300 किमी मार सकें, न कि 15 किमी में टूट जाएं। 

DRDO जैसे संगठन दशकों से अग्नि, ब्रह्मोस, तेजस और अन्य स्वदेशी प्रणालियों पर काम कर रहे हैं। इनकी सफलता असली 'मेक इन इंडिया' की मिसाल है। लेकिन जब इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट के नाम पर विदेशी सहयोग वाले सिस्टम्स को प्राथमिकता दी जाती है, तो DRDO वैज्ञानिकों की मेहनत और टैक्सपेयर्स के पैसे का सही उपयोग पर सवाल उठना लाजमी है।

 बड़े सवाल जो जवाब मांगते हैं

1. सूर्यास्त्र पर 293 करोड़ रुपये किस प्रक्रिया से मंजूर किए गए?
2. इमरजेंसी प्रोक्योरमेंट का आधार क्या था?
3. ट्रायल में हुई कथित असफलता की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
4. भविष्य में पूर्ण स्वदेशीकरण का रोडमैप क्या है?
5. ELBIT और NIBE के बीच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर कितना गहरा और स्थायी है?

NIBE ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कानूनी कार्रवाई की बात कही है और दावा किया है कि सिस्टम उच्च सटीकता (CEP) के साथ सफल रहा। कंपनी का कहना है कि उत्पादन शिरडी के डिफेंस कॉम्प्लेक्स में हो रहा है और इंडिजनाइजेशन की दिशा में काम जारी है।

 आत्मनिर्भरता की सच्ची राह

भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है तो जरूरत है:

- DRDO को ज्यादा बजट और स्वायत्तता  
- निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन, लेकिन सख्त क्वालिटी कंट्रोल  
- विदेशी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ 100% इंडिजनाइजेशन का सख्त टाइमलाइन  
- हर प्रोजेक्ट की स्वतंत्र ऑडिट और पारदर्शी रिपोर्टिंग  

सूर्यास्त्र विवाद एक सबक है। रक्षा खरीद सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

 पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी

'मेक इन इंडिया' एक सराहनीय पहल है, लेकिन इसे सिर्फ नाम और मार्केटिंग तक सीमित नहीं रखना चाहिए। असली स्वदेशी वह है जो डिजाइन से लेकर उत्पादन और परफॉर्मेंस तक भारतीय हो। 

सूर्यास्त्र प्रकरण से सीख लेते हुए रक्षा मंत्रालय को चाहिए कि सभी बड़े प्रोक्योरमेंट की पूरी डिटेल्स, ट्रायल रिपोर्ट्स और स्वदेशीकरण प्रतिशत सार्वजनिक करें। ताकि टैक्सपेयर का पैसा सुरक्षित रहे और हमारे जवान सबसे बेहतर हथियारों से लैस हों।

देश की सुरक्षा से ऊपर कुछ नहीं। विवादों से ऊपर उठकर सच्ची आत्मनिर्भरता हासिल करने का समय आ गया है।


Sajjad Ali Nayani ✍  
Friday World | 24 June 2026

#MakeInIndia #Suryastra #AtmanirbharBharat #DefenceProcurement #IndianArmy #NationalSecurity

June 24, 2026

Iran’s Major Call: Islamic Nations Unite for a New Regional Security Architecture – Historic Initiative Launched in Pakistan

Iran’s Major Call: Islamic Nations Unite for a New Regional Security Architecture – Historic Initiative Launched in Pakistan
-Friday World 24 June 2026
Islamabad, June 24, 2026 – Iranian President Masoud Pezeshkian has made a landmark appeal for Muslim unity, calling upon Islamic countries to come together and build a **new regional security architecture**. Speaking in Pakistan’s capital, he extended Iran’s “hand of friendship” towards key nations including Pakistan, Qatar, Saudi Arabia, Egypt, and Türkiye to promote mutual understanding and lay the foundation of a collective security framework.

This significant statement comes at a crucial time — just after Pakistan-mediated peace talks between Iran and the United States in Switzerland. Analysts view it as the beginning of a major geopolitical shift in the Middle East and the broader Islamic world.

President Pezeshkian’s Historic Statement

On a one-day official visit to Islamabad at the invitation of Prime Minister Shehbaz Sharif, President Masoud Pezeshkian addressed the media after bilateral and delegation-level talks at the Prime Minister’s House. He declared:

> “Iran has extended a hand of friendship towards Islamic countries, including Pakistan, Qatar, Saudi Arabia, Egypt, and Türkiye. We aim to enhance mutual understanding and lay the foundation for a new regional security architecture.”

Pezeshkian emphasized that Muslim nations should no longer depend on external powers for their security. Instead, they must create a united front to protect their collective interests and sovereignty. He described the proposed framework as “a new model of Islamic unity.”

Momentum Towards an ‘Islamic NATO’

For the past several months, Pakistan, Saudi Arabia, Egypt, and Türkiye have been actively discussing the creation of an **Islamic NATO** — a joint security alliance. President Pezeshkian’s statement sends a clear signal that Iran is now ready to actively participate in this initiative.

According to Pakistani sources, the new regional security architecture was discussed in detail during the meetings. Prime Minister Shehbaz Sharif welcomed Iran’s proposal and assured full support, stating that Pakistan will spare no effort in advancing regional stability and Islamic cooperation.

 Context and Significance of the Visit

This visit follows immediately after President Pezeshkian’s two-day talks with the United States in Switzerland. Upon arrival at Nur Khan Airbase aboard the Iranian presidential aircraft **Minab 168**, he was given a grand welcome. Pakistani President Asif Ali Zardari, Prime Minister Shehbaz Sharif, and other senior officials received him on the red carpet.

Key topics discussed during the high-level meetings included:

- Drafting a blueprint for the new regional security architecture

- Implementation of the Iran-US peace agreement

- Enhancing bilateral trade, energy, and security cooperation

- Accelerating the Pakistan-Iran Free Trade Agreement

- Stability in the Middle East, Gulf security, and coordination among Islamic nations

 Why a New Regional Security Architecture is Needed

Experts believe that years of conflict — including Iran-Israel tensions, the Gaza crisis, instability in Lebanon, and the situation in Afghanistan — have compelled Islamic countries to pursue greater unity. President Pezeshkian’s call carries far-reaching implications:

1. Reducing External Interference; Muslim nations should build their own security mechanisms.

2. Economic Collaboration: Greater interdependence in energy, trade, and technology.

3. Collective Security: Joint strategies against terrorism, drug trafficking, and maritime threats.

4. Islamic Unity: Rising above sectarian differences for broader cooperation.

Pakistan is playing a pivotal bridging role in this process. Its strong diplomatic ties with the United States, Saudi Arabia, and Iran make it an ideal mediator.

Pakistan-Iran Relations Reaching New Heights

The two nations share deep historical, cultural, and religious bonds. In recent years, cooperation has grown in border security, trade, and energy projects such as the Iran-Pakistan gas pipeline. President Pezeshkian’s visit is expected to give fresh momentum to these ties.

Prime Minister Shehbaz Sharif remarked, “Pakistan and Iran are bound by fraternal relations. We will work together for regional peace and prosperity.”

 Global Reactions

- Saudi Arabia & Türkiye: Both countries have given positive signals.

- Qatar: Already playing an active mediating role.

- United States: The Trump administration is watching the growing unity among Islamic nations with caution but sees it as compatible with the ongoing Iran peace process.

- China & Russia: Both powers are likely to view the new framework favorably in line with their regional strategies.

Challenges Ahead

Creating an effective security architecture will not be easy. Sectarian differences, competing regional ambitions, and external influences remain major hurdles. However, Iran’s active involvement as a major regional power adds significant weight to the initiative.

High-level meetings are expected in Islamabad, Riyadh, Ankara, and Doha in the coming months. If successful, this process could be remembered in history as the “Islamabad Declaration” or the “Pezeshkian Initiative.”

 A New Chapter for the Islamic World

President Masoud Pezeshkian’s visit to Islamabad and his bold call for a new security framework is far more than a routine state visit. It represents a new direction of unity, self-reliance, and peace in the Muslim world.

Pakistan’s diplomatic maturity combined with Iran’s constructive new foreign policy is steadily moving the region from conflict toward stability. The world is now watching whether other Islamic nations will grasp this “hand of friendship” and succeed in building a strong, independent regional security structure.



Sajjad Ali Nayani ✍  
Friday World 24 June 2026

#MuslimCountries #Iran #Pakistan #MiddleEast #IslamicUnity #RegionalSecurity #WorldNews


June 24, 2026

ईरान का बड़ा आह्वान: इस्लामिक देशों का 'नया सुरक्षा ढांचा' – पाकिस्तान में शुरू हुई ऐतिहासिक पहल

ईरान का बड़ा आह्वान: इस्लामिक देशों का 'नया सुरक्षा ढांचा' – पाकिस्तान में शुरू हुई ऐतिहासिक पहल
- Friday World 24 Jun 2026
इस्लामाबाद, 24 जून 2026– ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने पाकिस्तान की राजधानी में मुस्लिम दुनिया को एकजुट होने का ऐतिहासिक आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि ईरान इस्लामिक देशों की ओर “दोस्ती का हाथ” बढ़ा रहा है ताकि एक **नया क्षेत्रीय सुरक्षा आर्किटेक्चर** बनाया जा सके। पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की जैसे प्रमुख देशों को शामिल करते हुए पेजेश्कियान ने “संयुक्त मोर्चा” बनाने की वकालत की।

यह बयान ठीक उसी समय आया है जब ईरान और अमेरिका के बीच स्विट्जरलैंड में पाकिस्तानी मध्यस्थता से शांति वार्ता चल रही है। विश्लेषक इसे मध्य पूर्व और इस्लामी दुनिया में भू-राजनीतिक समीकरणों में बड़े बदलाव की शुरुआत मान रहे हैं।

 पेजेश्कियान का ऐतिहासिक बयान

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के निमंत्रण पर एक दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर इस्लामाबाद पहुंचे ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने प्रधानमंत्री हाउस में द्विपक्षीय और प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता के बाद मीडिया से बात की। उन्होंने जोर देकर कहा:

> “ईरान ने इस्लामिक देशों की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया है जिसमें पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की शामिल हैं। हम आपसी समझ को बढ़ावा देना चाहते हैं और नए रीजनल सिक्योरिटी आर्किटेक्चर की नींव रखना चाहते हैं।”

पेजेश्कियान ने आगे कहा कि मुस्लिम देशों को अब बाहरी ताकतों पर निर्भर रहने की बजाय खुद की सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए एक संयुक्त मोर्चा बनाना चाहिए। उन्होंने इस नए ढांचे को “इस्लामी एकता की नई मिसाल” बताया।

'इस्लामिक नाटो' की दिशा में तेजी

पिछले कुछ महीनों से पाकिस्तान, सऊदी अरब, मिस्र और तुर्की जैसे देश इस्लामिक नाटो (Islamic NATO) या एक संयुक्त सुरक्षा गठबंधन बनाने की चर्चा कर रहे थे। ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान इस प्रक्रिया में ईरान के सक्रिय शामिल होने का स्पष्ट संकेत है।

पाकिस्तानी सूत्रों के अनुसार, दोनों देशों के बीच हुई बैठक में इस नए सुरक्षा आर्किटेक्चर पर विस्तृत चर्चा हुई। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरान के प्रस्ताव का स्वागत किया और कहा कि पाकिस्तान क्षेत्रीय स्थिरता और इस्लामी सहयोग के लिए हर संभव प्रयास करेगा।

यात्रा का संदर्भ और महत्व

यह यात्रा ईरानी राष्ट्रपति की स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ दो दिवसीय वार्ता के ठीक बाद हुई। नूर खान एयरबेस पर राष्ट्रपति पेजेश्कियान का विमान “Minab 168” (ईरानी राष्ट्रपति विशेष विमान) भव्य स्वागत के साथ उतरा। लाल कार्पेट पर पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उच्च अधिकारियों ने उनका स्वागत किया।

दोनों नेताओं की बैठक में निम्नलिखित मुद्दों पर गहन चर्चा हुई:

- नए क्षेत्रीय सुरक्षा आर्किटेक्चर का खाका तैयार करना
- ईरान-अमेरिका शांति समझौते का क्रियान्वयन
- द्विपक्षीय व्यापार, ऊर्जा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाना
- पाकिस्तान-ईरान फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को तेजी देना
- मध्य पूर्व में स्थिरता, खाड़ी सुरक्षा और इस्लामी देशों के बीच समन्वय

क्षेत्रीय सुरक्षा आर्किटेक्चर की आवश्यकता क्यों?

विश्लेषकों के अनुसार, मध्य पूर्व में पिछले वर्षों के संघर्षों — ईरान-इजराइल तनाव, गाजा संकट, लेबनान की अस्थिरता और अफगानिस्तान की स्थिति — ने इस्लामी देशों को एकजुट होने की मजबूरी दी है। अमेरिका-ईरान शांति प्रक्रिया के बीच ईरान का यह आह्वान कई मायनों में दूरगामी है:

1. बाहरी हस्तक्षेप कम करना: मुस्लिम देश खुद अपनी सुरक्षा व्यवस्था बनाएं।

2. आर्थिक सहयोग; ऊर्जा, व्यापार और प्रौद्योगिकी में आपसी निर्भरता बढ़ाना।

3. सामूहिक सुरक्षा: आतंकवाद, ड्रग तस्करी और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर संयुक्त रणनीति।

4. इस्लामी एकता: सांप्रदायिक विभाजन से ऊपर उठकर व्यापक सहयोग।

पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में पुल की भूमिका निभा रहा है। उसकी अमेरिका, सऊदी अरब और ईरान तीनों के साथ अच्छी कूटनीतिक पहुंच इसे आदर्श मध्यस्थ बनाती है।

पाकिस्तान-ईरान संबंध: नई ऊंचाइयां

दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक समानताएं हैं। हाल के वर्षों में सीमा सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा परियोजनाओं (जैसे आईपी गैस पाइपलाइन) में सहयोग बढ़ा है। पेजेश्कियान की इस यात्रा को संबंधों को नई गति देने वाला माना जा रहा है।

प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा, “पाकिस्तान और ईरान भाईचारे के रिश्ते हैं। हम क्षेत्रीय शांति और समृद्धि के लिए साथ काम करेंगे।”

 वैश्विक प्रतिक्रियाएं

- सऊदी अरब और तुर्की: दोनों देशों ने सकारात्मक संकेत दिए हैं।

- कतर: पहले से ही मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।

- अमेरिका: ट्रंप प्रशासन इस्लामिक देशों के बीच एकजुटता को सतर्कता से देख रहा है, लेकिन ईरान शांति प्रक्रिया के साथ इसे सकारात्मक मान रहा है।

- चीन और रूस: दोनों देश इस नए ढांचे को अपनी क्षेत्रीय रणनीति के अनुकूल मान सकते हैं।

 चुनौतियां और आगे का रास्ता

नया सुरक्षा आर्किटेक्चर बनाने में कई चुनौतियां हैं — सांप्रदायिक मतभेद, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं, और बाहरी शक्तियों का प्रभाव। फिर भी, ईरान जैसे बड़े देश का शामिल होना इस पहल को मजबूती देगा।

अगले कुछ महीनों में इस्लामाबाद, रियाद, अंकारा और दोहा में उच्चस्तरीय बैठकें होने की संभावना है। अगर यह प्रक्रिया सफल हुई तो यह “इस्लामाबाद घोषणा” या “पेजेश्कियान पहल” के नाम से इतिहास में दर्ज हो सकती है।

इस्लामी दुनिया का नया अध्याय

ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का इस्लामाबाद दौरा और उनका सुरक्षा आर्किटेक्चर का आह्वान सिर्फ एक राजकीय यात्रा नहीं है। यह मुस्लिम दुनिया में एकता, आत्मनिर्भरता और शांति की नई दिशा का संकेत है।

पाकिस्तान की कूटनीतिक परिपक्वता और ईरान की नई सरकार की रचनात्मक नीति मिलकर क्षेत्र को युद्ध से शांति की ओर ले जा रही है। दुनिया अब देख रही है कि क्या इस “दोस्ती के हाथ” को अन्य इस्लामी देश थामेंगे और एक मजबूत, स्वतंत्र क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा कर पाएंगे।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 Jun 2026
June 24, 2026

ईरान-अमेरिका शांति की नई सुबह: पाकिस्तान की मध्यस्थता में ऐतिहासिक मोड़, राष्ट्रपति पेजेश्कियान इस्लामाबाद पहुंचे

ईरान-अमेरिका शांति की नई सुबह: पाकिस्तान की मध्यस्थता में ऐतिहासिक मोड़, राष्ट्रपति पेजेश्कियान इस्लामाबाद पहुंचे -Friday World 24 Jun 2026

इस्लामाबाद, 24 जून 2026 – वर्षों के तनाव, संघर्ष और युद्ध की छाया के बाद मध्य पूर्व में शांति की एक नई किरण दिखाई दे रही है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान स्विट्जरलैंड में अमेरिका के साथ दो दिवसीय महत्वपूर्ण वार्ता के ठीक बाद मंगलवार को पाकिस्तान पहुंचे। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुए इस प्रक्रिया को क्षेत्रीय कूटनीति का मील का पत्थर माना जा रहा है। विदेश मंत्री अब्बास अराघची सहित उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के साथ पेजेश्कियान का यह दौरा न केवल कृतज्ञता का प्रतीक है, बल्कि स्थायी शांति समझौते की दिशा में आगे बढ़ने का भी संकेत देता है।

 : युद्ध से बातचीत तक का सफर

फरवरी 2026 में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमलों के बाद क्षेत्र में अस्थिरता चरम पर पहुंच गई थी। होर्मुज की खाड़ी बंद होने का खतरा, तेल की कीमतों में उछाल, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव – इन सबने दुनिया को चिंतित कर दिया। ऐसे में पाकिस्तान ने एक साहसिक कदम उठाया और दोनों पक्षों के बीच संवाद का पुल बनने की भूमिका निभाई।

स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में रविवार और सोमवार को हुई वार्ता में पाकिस्तान की मध्यस्थता ने अहम भूमिका निभाई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसदीय स्पीकर मोहम्मद बागेर कालिबाफ के बीच हुई इन बैठकों के बाद 60 दिनों का रोडमैप तैयार हुआ, जिसमें ईरान पर लगी कुछ प्रतिबंधों में 60 दिनों की राहत और परमाणु कार्यक्रम की निगरानी जैसे मुद्दे शामिल हैं। ईरान ने स्पष्ट किया कि उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम वार्ता का हिस्सा नहीं था और रहेगा भी नहीं।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस प्रक्रिया को “इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग” का नाम दिया, जिस पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने डिजिटल माध्यम से हस्ताक्षर किए। पाकिस्तान और कतर दोनों मध्यस्थ के रूप में सक्रिय रहे।

 इस्लामाबाद में भव्य स्वागत

ईरानी राष्ट्रपति का विमान नूर खान एयरबेस पर उतरा तो पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार समेत उच्च अधिकारी छाता लेकर स्वागत के लिए मौजूद थे। सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे। सड़कों पर स्वागत बैनर लगे हुए थे, जो इस दौरे के महत्व को दर्शाते थे।

यह पेजेश्कियान की राष्ट्रपति बनने के बाद पहली विदेश यात्रा है, जो युद्ध शुरू होने के बाद का उनका पहला विदेश दौरा भी है। उन्होंने पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने ईरान के साथ “चट्टान की तरह” खड़े होकर समर्थन दिया। प्रधानमंत्री शरीफ ने आश्वासन दिया कि पाकिस्तान ईरान को कभी निराश नहीं करेगा।

 वार्ता के प्रमुख मुद्दे

इस्लामाबाद में पेजेश्कियान और शरीफ के बीच हुई बैठक में निम्नलिखित मुद्दों पर चर्चा हुई:

- ईरान-अमेरिका शांति समझौते का क्रियान्वयन: 60 दिनों के अंदर स्थायी समझौते के लिए तकनीकी टीमों की बैठकें जारी रखना।

- क्षेत्रीय सुरक्षा: मध्य पूर्व में स्थिरता, लेबनान में हिंसा रोकना, और होर्मुज की खाड़ी को खुला रखना।

- द्विपक्षीय सहयोग: व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा, कृषि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी और सीमा प्रबंधन में बढ़ोतरी। पाकिस्तान-ईरान फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के मसौदे पर काम तेज करने का फैसला।

- इस्लामी देशों का नया सुरक्षा फ्रेमवर्क: मुस्लिम देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर जोर।

विदेश मंत्री अब्बास अराघची, जो स्विट्जरलैंड में ईरान के प्रमुख वार्ताकार थे, ने पाकिस्तानी अधिकारियों से विस्तृत ब्रिफिंग साझा की।

पाकिस्तान की कूटनीतिक जीत

पाकिस्तान ने इस पूरे मामले में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाकर अपनी कूटनीतिक परिपक्वता साबित की है। प्रधानमंत्री शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर दोनों ने सक्रिय भूमिका निभाई। अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंधों में सुधार और ईरान के साथ पारंपरिक दोस्ती को संतुलित रखते हुए इस्लामाबाद ने एक दुर्लभ कूटनीतिक सफलता हासिल की।

विश्लेषक मानते हैं कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति, दोनों देशों से उसके संबंध और क्षेत्रीय प्रभाव ने इसे इस भूमिका के लिए आदर्श बनाया। कतर के साथ मिलकर पाकिस्तान ने “ट्रैक-वन” कूटनीति को नई ऊंचाई दी।

 क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव

यह विकास मध्य पूर्व के लिए राहत की खबर है। तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं, व्यापारिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं, और मानवीय संकट कम हो सकता है। लेबनान, गाजा और अन्य क्षेत्रों में तनाव कम करने के प्रयास तेज होंगे।

भारत, चीन, रूस और सऊदी अरब जैसे देश इस प्रक्रिया को बारीकी से देख रहे हैं। भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र में स्थिरता ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। चीन के लिए भी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के प्रोजेक्ट्स प्रभावित हो सकते हैं।

 चुनौतियां आगे भी हैं

हालांकि उत्साह है, लेकिन चुनौतियां कम नहीं। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, इजराइल का रुख, और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन जैसे मुद्दे जटिल बने हुए हैं। ट्रंप प्रशासन ने साफ कहा है कि अगर ईरान समझौते का पालन नहीं करता तो “जो करना पड़ेगा” किया जाएगा। ईरान ने अपने रक्षात्मक मिसाइल कार्यक्रम को अटूट बताया है।

फिर भी, बातचीत का रास्ता खुलना ही बड़ी उपलब्धि है।

शांति की उम्मीद

पेजेश्कियान का पाकिस्तान दौरा सिर्फ एक राजकीय यात्रा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शांति की नई शुरुआत का प्रतीक है। पाकिस्तान ने साबित किया कि कूटनीति और संवाद से सबसे जटिल समस्याओं का हल निकाला जा सकता है।

दुनिया अब अगले 60 दिनों की ओर देख रही है। अगर यह रोडमैप सफल रहा तो इतिहास में “इस्लामाबाद-बर्गेनस्टॉक प्रक्रिया” शांति कूटनीति का सुनहरा अध्याय बनेगी।

ईरान और पाकिस्तान के बीच भाईचारे के रिश्ते, साझा संस्कृति और भविष्य के सहयोग की संभावनाएं इस यात्रा को और यादगार बनाती हैं। उम्मीद है कि यह दौरा न केवल दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र को स्थिरता की ओर ले जाएगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 24 Jun 2026

Tuesday, 23 June 2026

June 23, 2026

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में 'रिवर्स ऑपरेशन लोटस' का धमाका: BJP+JDS के 11 विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस को 5 सीटें, NDA सिमटी 2 पर, आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष को दिल्ली तलब किया

कर्नाटक विधान परिषद चुनाव में 'रिवर्स ऑपरेशन लोटस' का धमाका: BJP+JDS के 11 विधायकों की क्रॉस वोटिंग से कांग्रेस को 5 सीटें, NDA सिमटी 2 पर, आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष को दिल्ली तलब किया
- Friday World 24 Jun 2026
बेंगलुरु: कर्नाटक की सियासत में शुक्रवार को वो हुआ जिसकी कल्पना शायद BJP ने भी नहीं की थी। विधान परिषद की 7 सीटों के लिए हुए चुनाव में ‘ऑपरेशन लोटस’ का मंत्र देने वाली BJP को उसी के हथियार से मात खानी पड़ी। NDA गठबंधन, जिसमें BJP और JDS शामिल हैं, के 11 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग कर कांग्रेस के पक्ष में मतदान कर दिया। इस सियासी उलटफेर ने न सिर्फ चुनावी गणित बदला, बल्कि राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया। 

क्या है पूरा मामला: आंकड़ों का खेल और 11 विधायकों की बगावत
कर्नाटक विधान परिषद की 7 सीटों पर चुनाव हुआ था। जीत के लिए किसी भी उम्मीदवार को 28 विधायकों का समर्थन चाहिए था। विधानसभा में दलीय स्थिति कुछ ऐसी थी: 

- कांग्रेस: 4 सीटें आसानी से जीतने की स्थिति में थी। उसके पास 5वीं सीट के लिए 23 विधायक थे, यानी 5 और वोट चाहिए थे। 
- NDA (BJP+JDS): 2 सीटें पक्की थीं। 7वीं सीट के लिए उसके पास 25 विधायक थे, यानी जीत के लिए 3 वोट की जरूरत थी। 

कागज पर NDA का पलड़ा भारी दिख रहा था। लेकिन वोटिंग के दिन खेल पलट गया। NDA के 11 विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर कांग्रेस के उम्मीदवार को वोट दे दिया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस 4 की बजाय 5 सीटें जीत गई और NDA 3 की उम्मीद के बावजूद सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गया। 

'रिवर्स ऑपरेशन लोटस' क्यों कहा जा रहा है
‘ऑपरेशन लोटस’ BJP की उस रणनीति को कहा जाता है जिसमें विपक्षी दलों के विधायकों को तोड़कर अपनी सरकार बनाना या मजबूत करना शामिल है। कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में BJP पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं। 

लेकिन इस बार कांग्रेस ने BJP को उसी की भाषा में जवाब दिया। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस ने NDA के असंतुष्ट विधायकों से संपर्क साधा। इनमें वो विधायक शामिल थे जिन्हें टिकट वितरण, मंत्रिमंडल विस्तार या क्षेत्र के विकास कार्यों में नजरअंदाज किए जाने की शिकायत थी। कांग्रेस ने ‘रिवर्स ऑपरेशन लोटस’ चलाकर 11 विधायकों को अपने पाले में कर लिया। इसे ही राजनीतिक गलियारों में ‘घर में ही सेंधमारी’ कहा जा रहा है। 

किसके-किसके नाम चर्चा में 
हालांकि क्रॉस वोटिंग गुप्त मतदान से होती है, इसलिए आधिकारिक तौर पर 11 नाम सामने नहीं आए हैं। लेकिन राजनीतिक हलकों में कुछ BJP और JDS विधायकों के नामों की चर्चा तेज है। बताया जा रहा है कि उत्तरी कर्नाटक और पुराने मैसूर क्षेत्र के कुछ विधायक नाराज चल रहे थे। टिकट न मिलने, विकास निधि में भेदभाव और स्थानीय BJP नेतृत्व से खींचतान इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है। 

JDS के लिए यह डबल झटका है। पार्टी पहले ही विधानसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। अब उसके कुछ विधायकों का कांग्रेस के साथ जाना, कुमारस्वामी की मुश्किलें और बढ़ा सकता है। 

BJP में हड़कंप: आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष को दिल्ली बुलाया
इस शर्मनाक हार के बाद BJP आलाकमान तुरंत हरकत में आया। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय नेतृत्व ने कर्नाटक BJP अध्यक्ष को तत्काल दिल्ली तलब किया है। उनसे इस ‘बड़ी चूक’ पर जवाब मांगा जाएगा। 

पार्टी के अंदर भी घमासान मचा है। एक धड़े का कहना है कि प्रदेश नेतृत्व विधायकों की नाराजगी भांपने में नाकाम रहा। टिकट बंटवारे से लेकर संगठन में सबको साथ लेकर चलने में विफलता इस हार की वजह बनी। वहीं दूसरा धड़ा इसे कांग्रेस की ‘धनबल और छल’ की राजनीति बता रहा है। BJP अब बागी विधायकों की पहचान कर उनके खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की तैयारी कर रही है। 

कांग्रेस खेमे में जश्न: ‘जनता ने अहंकार को हराया’
दूसरी तरफ कांग्रेस कैंप में जश्न का माहौल है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने इसे ‘जनता की जीत’ बताया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह परिणाम BJP के ‘अहंकार’ और ‘विधायकों की अनदेखी’ के खिलाफ जनादेश है। 

डीके शिवकुमार, जिन्हें कर्नाटक में कांग्रेस का ‘चाणक्य’ माना जाता है, एक बार फिर अपने सियासी प्रबंधन का लोहा मनवाने में कामयाब रहे। उन्होंने कहा, “ये सिर्फ शुरुआत है। BJP को समझना चाहिए कि विधायकों को डरा-धमकाकर या खरीद-फरोख्त से लोकतंत्र नहीं चलता।” 

आगे क्या: सियासी समीकरणों पर असर

1. राज्यसभा चुनाव पर नजर: विधान परिषद के इस नतीजे का असर आने वाले राज्यसभा चुनाव पर भी पड़ सकता है। कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है। 
2. 
2. BJP में अंतर्कलह: हार के बाद BJP में गुटबाजी खुलकर सामने आ सकती है। प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा रहा है। 
3. 
3. JDS का भविष्य: JDS के लिए यह अस्तित्व का संकट है। अगर विधायक टूटते हैं तो पार्टी का विलय कांग्रेस या BJP में होने की अटकलें तेज हो जाएंगी। 
4. 
4. 2028 विधानसभा की पटकथा: कांग्रेस इस जीत को 2028 के विधानसभा चुनाव के लिए नैरेटिव सेट करने में इस्तेमाल करेगी। ‘BJP के गढ़ में सेंध’ का संदेश कार्यकर्ताओं में जोश भरेगा। 

विश्लेषण: सिर्फ आंकड़े नहीं, संदेश भी बड़ा है
यह चुनाव सिर्फ 5 बनाम 2 सीटों की लड़ाई नहीं थी। यह संदेश था कि कर्नाटक में BJP का ‘अजेय’ वाला तिलिस्म टूट रहा है। 2023 विधानसभा में हार, फिर लोकसभा में उम्मीद से कम प्रदर्शन और अब विधान परिषद में अपने ही विधायकों की बगावत, यह BJP के लिए खतरे की घंटी है। 

कांग्रेस के लिए यह जीत सियासी ही नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है। पार्टी ने दिखा दिया कि वह अब सिर्फ बचाव नहीं, आक्रामक खेल भी खेल सकती है। ‘रिवर्स ऑपरेशन लोटस’ ने BJP को उसी के घर में घेरा है। 


कर्नाटक की सियासत में ‘वफादारी’ सबसे बड़ा सियासी करेंसी बन गई है। जो पार्टी अपने विधायकों को संभाल नहीं पाई, वो चुनाव हार गई। BJP के लिए यह आत्ममंथन का वक्त है। क्या वह असंतोष को दूर कर पाएगी या बगावत की चिंगारी और भड़केगी? वहीं कांग्रेस के लिए चुनौती होगी कि इस जीत को जमीन पर विकास में कैसे बदले। फिलहाल तो कर्नाटक की सियासत में ‘पिक्चर अभी बाकी है’। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 24 Jun 2026