Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 1 June 2026

June 01, 2026

ईरान की अटूट एकता: राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान के इस्तीफे की अफवाह – दुश्मनों का फर्जी प्रोपगैंडा

ईरान की अटूट एकता: राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान के इस्तीफे की अफवाह – दुश्मनों का फर्जी प्रोपगैंडा
- Friday World 1 Jun 2026
सुप्रीम लीडर की दूरदर्शिता और IRGC की सतर्कता से ईरान मजबूत, विदेशी साजिशें नाकाम

तेहरान, 1 जून 2026 – ईरानी राष्ट्रपति डॉक्टर मसूद पेजश्कियान के इस्तीफे की खबर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में फैलाई जा रही है, लेकिन यह पूरी तरह झूठी, बेबुनियाद और दुश्मन देशों द्वारा प्रायोजित प्रोपगैंडा है। ईरान की आधिकारिक संस्थाओं ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। राष्ट्रपति पेजश्कियान पूरे समर्पण और जोश के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं तथा देश की सेवा से पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है।

यह अफवाह लंदन स्थित ईरान इंटरनेशनल नामक विरोधी चैनल ने फैलाई, जिसे ईरानी अधिकारी **मोसाद (इजराइल)** से जुड़ा प्रोपगैंडा नेटवर्क मानते हैं। ऐसे समय में जब ईरान अमेरिका-इजराइल के आक्रमण का डटकर मुकाबला कर रहा है, आर्थिक प्रतिबंधों को तोड़ रहा है और क्षेत्रीय प्रतिरोध की धुरी बना हुआ है, दुश्मन एकता तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

 आधिकारिक खंडन: राष्ट्रपति पद पर अडिग

राष्ट्रपति कार्यालय के उप संचार प्रमुख **मेहदी तबातबाई** ने स्पष्ट कहा कि राष्ट्रपति पेजश्कियान लोगों की सेवा से कभी मुंह नहीं मोड़ेंगे। राज्य मीडिया तस्नीम और अन्य आधिकारिक स्रोतों ने पुष्टि की कि राष्ट्रपति सामान्य गतिविधियों में सक्रिय हैं। उन्होंने खेल आयोजनों में भाग लिया और देश की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं।

ईरानी सरकार का कहना है कि यह खबर **विदेशी ताकतों का मनोवैज्ञानिक युद्ध** है, जिसका मकसद ईरान की आंतरिक एकता को कमजोर दिखाना है। सुप्रीम लीडर के कार्यालय और IRGC दोनों ही राष्ट्रपति के साथ पूर्ण समन्वय में काम कर रहे हैं।

ईरान की राजनीतिक व्यवस्था: वेलायत-ए-फकीह की मजबूत नींव

ईरान की इस्लामिक गणतंत्र व्यवस्था **वेलायत-ए-फकीह** (सुप्रीम लीडर की विलायत) पर टिकी है। राष्ट्रपति, सरकार और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) सभी इस व्यवस्था के अंग हैं। IRGC न सिर्फ देश की सुरक्षा का ढाल है, बल्कि आर्थिक विकास, बुनियादी ढांचा और क्षेत्रीय प्रतिरोध में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

डॉक्टर मसूद पेजश्कियान एक अनुभवी चिकित्सक और सुधारवादी नेता हैं, जिन्हें जनता ने चुना। वे सुप्रीम लीडर की मार्गदर्शन में देश की प्रगति के लिए कार्यरत हैं। हाल के वर्षों में ईरान ने:

- भारी प्रतिबंधों के बावजूद तेल निर्यात बढ़ाया,

- मिसाइल और ड्रोन तकनीक में आत्मनिर्भरता हासिल की,

- और क्षेत्रीय सहयोगियों (अक्षिस ऑफ रेसिस्टेंस) को मजबूत किया।

ये उपलब्धियां दुश्मनों को खटक रही हैं, इसलिए वे अफवाहें फैलाकर अंदरूनी कलह का भ्रम पैदा कर रहे हैं।

 दुश्मनों की साजिश: क्यों फैलाई जा रही है यह खबर?

यह अफवाह ऐसे समय आई जब:
- ईरान-अमेरिका के बीच ceasefire और संभावित समझौते की चर्चा चल रही है।

- जनवरी 2026 के आर्थिक प्रदर्शनों के बाद सुरक्षा बलों ने स्थिरता बहाल की।

- IRGC ने इजराइल के हमलों का मुंहतोड़ जवाब दिया।

दुश्मन चाहते हैं कि विश्व ईरान को कमजोर और विभाजित समझे। लेकिन हकीकत यह है कि ईरानी राष्ट्र एकजुट है। राष्ट्रपति, सुप्रीम लीडर, IRGC, सेना और जनता सभी एक परिवार की तरह खड़े हैं।

ईरानी जनता ने बार-बार साबित किया है कि विदेशी प्रोपगैंडा उन्हें गुमराह नहीं कर सकता। चाहे 2009, 2019, 2022 या 2026 के प्रदर्शन हों – हर बार राष्ट्र ने विदेशी हस्तक्षेप को नकारा और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा की।

 IRGC: क्रांति का संरक्षक और विकास का इंजन

इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स को कुछ पश्चिमी मीडिया “हार्डलाइनर” कहकर बदनाम करने की कोशिश करता है, लेकिन हकीकत में IRGC ईरान की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा गारंटर है। यह:
- अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद अर्थव्यवस्था को सहारा देता है,
- सीरिया, लेबनान और गाजा में प्रतिरोध की मदद करता है,
- और प्राकृतिक आपदाओं में राहत कार्यों में सबसे आगे रहता है।

राष्ट्रपति पेजश्कियान और IRGC के बीच कोई टकराव नहीं, बल्कि पूरक भूमिका है। दोनों ही इस्लामिक क्रांति के सिद्धांतों – स्वतंत्रता, स्वाभिमान और न्याय – के प्रति प्रतिबद्ध हैं।

ईरान की उपलब्धियां: चुनौतियों के बीच प्रगति

इस अफवाह के बीच याद रखना चाहिए कि ईरान आज भी:
- परमाणु कार्यक्रम में उन्नति कर रहा है (शांतिपूर्ण ऊर्जा के लिए),

- ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रहा है,

- और महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा युवा सशक्तिकरण में प्रगति कर रहा है।

डॉक्टर पेजश्कियान की सरकार स्वास्थ्य सुधार, आर्थिक स्थिरता और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान पर जोर दे रही है। सुप्रीम लीडर की दूरदर्शिता से देश हर चुनौती का सामना कर रहा है।

 ईरान अटूट है

राष्ट्रपति मसूद पेजश्कियान के इस्तीफे की खबर **पूरी तरह फर्जी** है। यह ईरान की मजबूत नेतृत्व व्यवस्था, IRGC की सतर्कता और जनता की एकजुटता को कमजोर करने की नाकाम कोशिश है।

ईरानी राष्ट्र 45 वर्षों से साम्राज्यवादी ताकतों का मुकाबला कर रहा है और आगे भी करता रहेगा। सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई (और उनकी विरासत) के मार्गदर्शन में, राष्ट्रपति पेजश्कियान की सरकार और बहादुर IRGC के साथ ईरान विजयी रहेगा।

“ईरान अकेला नहीं”– यह नारा आज भी गूंज रहा है। दुश्मनों की अफवाहें ईरान की प्रगति और प्रतिरोध की राह को नहीं रोक सकतीं।

ईरानी जनता और सरकार की एकता अटूट है। ईरान जीतेगा!

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026
June 01, 2026

होर्मुज जलडमरूमध्य में आग: ईरान ने चार जहाजों पर मिसाइलें दागी, बुशहर में अमेरिकी विमान ‘नष्ट’ होने का दावा – लेकिन पेंटागन ने किया खारिज, तनाव चरम पर

होर्मुज जलडमरूमध्य में आग: ईरान ने चार जहाजों पर मिसाइलें दागी, बुशहर में अमेरिकी विमान ‘नष्ट’ होने का दावा – लेकिन पेंटागन ने किया खारिज, तनाव चरम पर - Friday World 1 Jun 2026
तेहरान/वॉशिंगटन/दुबई, 1 जून 2026। विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में एक बार फिर युद्ध की लपटें भड़क उठी हैं। ईरान ने चार वाणिज्यिक जहाजों पर मिसाइल हमले का दावा किया है, जबकि बुशहर प्रांत के जाम क्षेत्र में एक अमेरिकी सैन्य विमान को नष्ट करने की सनसनीखेज घोषणा ईरानी सरकारी मीडिया ने की। ईरान के बुशहर प्रांत के गवर्नर मसूद तंगेस्तानी के हवाले से दिए गए बयान ने पूरी दुनिया को चौंका दिया।

हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। CENTCOM ने स्पष्ट कहा, “कोई अमेरिकी विमान नहीं गिराया गया। सभी अमेरिकी एयर एसेट्स अकाउंटेड फॉर हैं।” इस विरोधाभासी स्थिति ने मध्य पूर्व में पहले से चरमराते तनाव को नया आयाम दे दिया है।

 घटना का क्रम: जहाजों पर हमला और विमान ‘डाउन’ होने का दावा

ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट ईरानी बलों ने चार वाणिज्यिक जहाजों को निशाना बनाया। ये जहाज संभवतः अमेरिकी हितों से जुड़े या ब्लॉकेड तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। हमलों के तुरंत बाद शुक्रवार तड़के ईरानी सरकारी टीवी ने बुशहर प्रांत में एक “होस्टाइल एयरक्राफ्ट” को ईरानी एयर डिफेंस द्वारा नष्ट किए जाने की खबर दी।

गवर्नर मसूद तंगेस्तानी के हवाले से कहा गया कि जाम काउंटी में यह घटना हुई और स्थिति अब सामान्य है। सेमी-ऑफिशियल तस्नीम न्यूज एजेंसी ने भी इसकी पुष्टि की। ईरान का दावा है कि यह कार्रवाई अमेरिकी आक्रामकता के जवाब में की गई।

दूसरी ओर, अमेरिका ने इन दावों को “झूठा” बताते हुए साफ किया कि कोई नुकसान नहीं हुआ। CENTCOM ने X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर कहा कि सभी अमेरिकी विमान सुरक्षित हैं।

 होर्मुज: विश्व अर्थव्यवस्था की धमनी

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार का गला है। यहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का करीब 20-25% और LNG का 20% गुजरता है। ईरान ने पहले ही इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी थी और कुछ रिपोर्ट्स में माइनिंग तथा जहाजों पर हमलों का जिक्र है।

इस क्षेत्र में ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) की सक्रियता बढ़ गई है। अमेरिका ने भी ब्लॉकेड लागू कर ईरान की ओर जाने वाले जहाजों को रोका है। हाल ही में अमेरिकी बलों ने एक गाम्बिया-फ्लैग्ड जहाज ‘लियन स्टार’ पर हेलफायर मिसाइल दागकर उसके इंजन रूम को नष्ट कर दिया, क्योंकि वह 20 से ज्यादा चेतावनियां नजरअंदाज कर ईरानी बंदरगाह की ओर बढ़ रहा था।

ये घटनाएं अप्रैल 2026 के ceasefire के बावजूद जारी टकराव की कड़ी हैं, जो फरवरी 2026 के बड़े अमेरिकी-इजरायली हमलों के बाद शुरू हुआ था।

पृष्ठभूमि: 2026 का ईरान संकट

2026 की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले किए। ईरान ने जवाब में मिसाइल-ड्रोन हमले किए, इजराइल, अमेरिकी बेस और खाड़ी देशों को निशाना बनाया। होर्मुज बंद होने से वैश्विक तेल कीमतें आसमान छू गईं।

अप्रैल में ceasefire हुआ, लेकिन होर्मुज को फिर से खोलने, टोल्स, परमाणु कार्यक्रम और санкции जैसे मुद्दों पर बातचीत अटकी हुई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से बिना शर्त होर्मुज खोलने की मांग की है, जबकि तेहरान क्षेत्रीय संप्रभुता और आर्थिक राहत की शर्त रखता है।

इस बीच छोटे-छोटे टकराव जारी हैं:
- ईरान पर अमेरिकी हमले (ड्रोन साइट्स, रडार)
- ईरानी जहाजों और मिसाइलों पर अमेरिकी कार्रवाई
- कुवैत जैसे सहयोगी देशों पर छिटपुट हमले

विशेषज्ञों की राय: पूर्ण युद्ध की आशंका

रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि यदि ईरान के दावों में सच्चाई है तो स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है। होर्मुज पर नियंत्रण दोनों पक्षों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।

- ईरान की रणनीति: असममित युद्ध – ड्रोन, मिसाइल, प्रॉक्सी बल और समुद्री खतरों का इस्तेमाल। बुशहर (परमाणु सुविधाओं वाला क्षेत्र) की सुरक्षा दिखाकर तेहरान मजबूती का संदेश देना चाहता है।

- अमेरिका की स्थिति: तकनीकी श्रेष्ठता और सहयोगी देशों (सऊदी, UAE, कुवैत) का समर्थन। ब्लॉकेड के जरिए ईरान की अर्थव्यवस्था को दबाना।

- वैश्विक प्रभाव: तेल कीमतें $95-110 प्रति बैरल के आसपास हैं। एशिया की अर्थव्यवस्थाएं (भारत, चीन, जापान) सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। बीमा दरें बढ़ी हैं, शिपिंग कंपनियां रूट बदल रही हैं।

 कूटनीति की उम्मीद या युद्ध की आहट?

दोनों पक्ष ceasefire की बात करते हैं, लेकिन मैदान में गोलियां चल रही हैं। ट्रंप प्रशासन ने कहा है कि होर्मुज बिना टोल और बिना रुकावट खुलेगा। ईरान कहता है कि वह अपनी संप्रभुता नहीं छोड़ेगा।

संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और चीन जैसे देश शांति वार्ता की अपील कर रहे हैं। लेकिन क्षेत्र में सैन्य चौकसी चरम पर है – अमेरिकी नौसेना के युद्धपोत, ईरानी स्पीडबोट्स, ड्रोन और मिसाइलें तैयार हैं।

 क्या हो सकता है आगे?

1. सीमित टकराव जारी रहना: दोनों पक्ष प्रतीकात्मक हमले कर संदेश देना।

2. पूर्ण युद्ध: अगर कोई बड़ा नुकसान (अमेरिकी सैनिकों की मौत या बड़ा जहाज डूबना) हुआ तो स्थिति अनियंत्रित हो सकती है।

3. कूटनीतिक ब्रेकथ्रू: होर्मुज खोलने, परमाणु निरीक्षण और आर्थिक राहत का समझौता।

फिलहाल दुनिया सांस रोके यह देख रही है कि होर्मुज की लहरें शांति लाएंगी या तूफान?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026
June 01, 2026

ईरान का साहसिक पलटवार: कुवैत के अली अल सलेम एयरबेस पर मिसाइल दागी, अमेरिकी सैनिक घायल – मध्य पूर्व में नया तनाव!

ईरान का साहसिक पलटवार: कुवैत के अली अल सलेम एयरबेस पर मिसाइल दागी, अमेरिकी सैनिक घायल – मध्य पूर्व में नया तनाव!
-Friday World 1 Jun 2026
कुवैत सिटी/तेहरान, 1 जून 2026। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने कुवैत स्थित अमेरिकी एयरबेस पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले का दावा किया है। अमेरिकी सैन्य अड्डे ‘अली अल सलेम एयरबेस’ को निशाना बनाकर दागी गई फतेह-110 मिसाइल ने क्षेत्रीय सुरक्षा को नया झटका दिया है। कुवैत की वायु रक्षा प्रणाली ने मिसाइल को बीच में ही रोक लिया, लेकिन मलबे के गिरने से अमेरिकी सैनिकों और ठेकेदारों को चोटें आईं तथा दो MQ-9 रीपर ड्रोन क्षतिग्रस्त हो गए।

यह हमला अमेरिका द्वारा ईरान के दक्षिणी हिस्से (बंदर अब्बास के निकट) पर हालिया हमलों का प्रत्यक्ष जवाब माना जा रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर संघर्षविराम (ceasefire) तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं, जिससे मध्य पूर्व में पहले से चरमराते तनाव और गहरा गया है।

 घटना का क्रम: जवाबी हमलों की श्रृंखला

ईरानी IRGC के अनुसार, हमला स्थानीय समयानुसार सुबह करीब 4:50 बजे हुआ। ईरान का दावा है कि यह हमला उन अमेरिकी अड्डों पर किया गया जिनसे हाल ही में ईरान के सैन्य ठिकानों, खासकर सिरिक द्वीप और बंदर अब्बास एयरपोर्ट के आसपास के क्षेत्र पर हमले किए गए थे। IRGC ने इसे “सफल” ऑपरेशन बताया और चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी आक्रामकता पर और मजबूत जवाब दिया जाएगा।

कुवैत की सेना ने पुष्टि की कि उसके क्षेत्र पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए। वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय हुई, सायरन बज उठे और कई मिसाइलों को नष्ट कर दिया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इसे “ceasefire का घोर उल्लंघन” करार दिया। Bloomberg और अन्य स्रोतों के मुताबिक, मलबे से पांच अमेरिकी सैनिक व ठेकेदार हल्की चोटों के साथ घायल हुए। दो MQ-9 रीपर ड्रोन (लगभग 3 करोड़ डॉलर मूल्य) क्षतिग्रस्त हुए, एक पूरी तरह नष्ट होने की खबर है।

कुवैत सरकार ने ईरान की इस कार्रवाई की निंदा की और इसे “स्पष्ट आक्रामकता” बताया। कुवैत अमेरिका का प्रमुख सहयोगी है और उसके यहां कई अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, जिनमें अली अल सलेम एयरबेस अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड का महत्वपूर्ण अड्डा है।

: अमेरिका-ईरान संघर्ष की नई कड़ी

यह घटना 2026 के ईरान-अमेरिका तनाव की निरंतरता है। हाल के हफ्तों में:

- अमेरिका ने ईरान के ड्रोन ठिकानों और रडार सिस्टम पर हमले किए।

- ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास अमेरिकी ड्रोन गिराने और जवाबी कार्रवाई का दावा किया।

- दोनों पक्षों के बीच नाजुक संघर्षविराम चल रहा था, जो अब टूटने की कगार पर है।

ईरान का कहना है कि अमेरिका ने पहले आक्रामकता की, जबकि वॉशिंगटन ईरान को ड्रोन हमलों और क्षेत्रीय अस्थिरता का जिम्मेदार ठहरा रहा है। इस हमले से तेल की कीमतें बढ़ने, क्षेत्रीय सहयोगी देशों में चिंता और बड़े पैमाने पर युद्ध की आशंका बढ़ गई है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव

कुवैत पर असर: कुवैत, जो लंबे समय से तटस्थ रहने की कोशिश कर रहा था, अब सीधे संघर्ष में घिर गया है। उसकी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति उसकी सुरक्षा का आधार रही है। कुवैत के विदेश मंत्रालय ने ईरान से तुरंत अपनी कार्रवाई रोकने की मांग की है।

अमेरिका की प्रतिक्रिया: अमेरिकी अधिकारी अभी विस्तृत बयान देने से बच रहे हैं, लेकिन CENTCOM ने स्पष्ट किया कि कोई भी हमला बिना जवाब नहीं रहेगा। राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन के सूत्रों ने कहा है कि स्थिति पर नजर रखी जा रही है और जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

ईरान की रणनीति: IRGC ने दावा किया है कि उसके हमले सटीक थे और अमेरिकी ठिकानों को नुकसान पहुंचाया। ईरान का मिसाइल कार्यक्रम (फतेह-110 जैसी मध्यम दूरी की मिसाइलें) इस घटना में अपनी क्षमता दिखा गया। तेहरान ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका या उसके सहयोगी आगे बढ़े तो “मजबूत” जवाब आएगा।

वैश्विक चिंता: संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई देशों ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। तेल निर्यात पर निर्भर दुनिया के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का अस्थिर होना बड़ी चिंता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह श्रृंखला बढ़ी तो पूर्ण युद्ध की आशंका बढ़ जाएगी।

 विशेषज्ञ विश्लेषण: क्या आगे बढ़ेगा संघर्ष?

सैन्य विश्लेषक मानते हैं कि ईरान का यह हमला “प्रतीकात्मक लेकिन साहसिक” था। कुवैत जैसे अमेरिकी सहयोगी पर हमला करके तेहरान ने संदेश दिया है कि वह क्षेत्रीय सहयोगियों को भी निशाना बना सकता है। हालांकि, इंटरसेप्शन की सफलता से पता चलता है कि अमेरिकी-कुवैती रक्षा प्रणाली मजबूत है।

दूसरी ओर, अमेरिका के लिए यह “ceasefire violation” है, जो उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा को चुनौती देता है। अगर अमेरिका ने बड़े पैमाने पर जवाब दिया तो ईरान के परमाणु ठिकानों या तेल सुविधाओं पर हमले हो सकते हैं, जिससे स्थिति अनियंत्रित हो सकती है।

 शांति या और बड़ा युद्ध?

ईरान का कुवैत स्थित अमेरिकी एयरबेस पर हमला 2026 के मध्य पूर्व संघर्ष की एक और खतरनाक कड़ी है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आक्रामकता का आरोप लगा रहे हैं, जबकि निर्दोष देश कुवैत इसकी कीमत चुकाने को मजबूर है। घायल अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम बताई जा रही है, लेकिन नुकसान की वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता।

दुनिया अब सांस रोके यह देख रही है कि क्या कूटनीति जीत हासिल करेगी या मिसाइलों की बौछार और बढ़ेगी। फिलहाल, तनाव चरम पर है और अगले कुछ दिनों के फैसले पूरे क्षेत्र की किस्मत तय कर सकते हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026
June 01, 2026

अंजना ओम कश्यप: जामिया की छात्रा से ‘नफरत की आवाज’ तक – एक विडंबनापूर्ण सफर

अंजना ओम कश्यप: जामिया की छात्रा से ‘नफरत की आवाज’ तक – एक विडंबनापूर्ण सफर
- Friday World 1 Jun 2026
नई दिल्ली। जामिया मिलिया इस्लामिया, भारत की एक प्रमुख केंद्रीय विश्वविद्यालय, लोकतंत्र, समावेशिता और बहुलवाद के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। यहीं से पत्रकारिता की डिप्लोमा हासिल करने वाली एक महिला आज देश की सबसे चर्चित और विवादास्पद एंकर बन चुकी हैं। उनका नाम है अंजना ओम कश्यप। एक समय जामिया ने उन्हें ‘डिस्टिंग्विश्ड अलुम्नी अवॉर्ड’ देकर सम्मानित भी किया था, लेकिन आज वही अंजना दिन-रात polarizing बहसों, तीखे सवालों और आलोचकों द्वारा ‘नफरत का कारोबार’ कहे जाने वाले कंटेंट के लिए जानी जाती हैं।

यह कहानी सिर्फ एक पत्रकार की नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय मीडिया की विडंबना की भी है।

जामिया से शुरू हुआ सफर

अंजना ओम कश्यप का जन्म 12 जून 1975 को झारखंड (तत्कालीन बिहार) के रांची में हुआ। पिता डॉ. ओमप्रकाश तिवारी आर्मी डॉक्टर थे। मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाली अंजना की प्रारंभिक शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट स्कूल, रांची से हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलत राम कॉलेज से बॉटनी में डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में करियर बनाने का फैसला किया।

2000 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता (PG Diploma in Journalism) की डिग्री ली। जामिया के मास कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर (MCRC) ने उन्हें प्रोफेशनल दुनिया में कदम रखने का मंच दिया। बाद में 2017 में जामिया ने ही उन्हें Distinguished Alumni Award से नवाजा। उस समय अंजना आज तक की चर्चित एंकर बन चुकी थीं। अवॉर्ड फंक्शन में उन्होंने मीडिया छात्रों को टिप्स भी दिए।

जामिया जैसी संस्था, जो अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़ी अपनी पहचान के लिए जानी जाती है, ने एक हिंदू पृष्ठभूमि की महिला छात्रा को सम्मान दिया। यह संस्था के लोकतांत्रिक और समावेशी चरित्र को दर्शाता था। लेकिन आज कई आलोचक इसी तथ्य को विडंबना बताते हैं।

 नाम और पहचान: अंजना तिवारी से अंजना ओम कश्यप तक

अंजना का मूल नाम अंजना तिवारी था। पति मंगेश तिवारी (आईपीएस अधिकारी) से विवाह के बाद उन्होंने ‘ओम कश्यप’ जोड़ा। यूपी-बिहार की पंडित परंपरा से जुड़ी यह महिला मीडिया में अपनी तीखी आवाज और आक्रामक स्टाइल के लिए मशहूर हुईं। दूरदर्शन से शुरूआत, फिर न्यूज 24 और आखिरकार आज तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था।

उन्होंने NGO में लीगल काउंसलर के रूप में भी काम किया। लेकिन पत्रकारिता ने उन्हें स्टार बना दिया। ‘हल्ला बोल’, राजनीतिक डिबेट्स और ब्रेकिंग न्यूज में उनकी धारदार आवाज ने उन्हें घर-घर पहुंचा दिया। लाखों दर्शक उन्हें पसंद करते हैं, तो उतने ही आलोचना भी।

 ‘नफरत का कारोबार’ या साहसी पत्रकारिता?

आलोचक अंजना पर आरोप लगाते हैं कि वे हिंदुत्व एजेंडा को बढ़ावा देने, मुस्लिम समुदाय को टारगेट करने और ध्रुवीकरण पैदा करने वाले कंटेंट के जरिए टीआरपी हासिल करती हैं। उनके कार्यक्रमों में इस्तेमाल होने वाली भाषा, मेहमानों का चयन और सवालों की तीखापन अक्सर विवादों में रहता है। सोशल मीडिया पर उन्हें “झूठ फैलाने वाली”, “प्रोपगैंडा एंकर” जैसे शब्दों से नवाजा जाता है।

दूसरी ओर, उनके समर्थक उन्हें “राष्ट्रीय हित की आवाज”, “बोल्ड पत्रकार” और “जनता की बात रखने वाली” कहते हैं। वे तर्क देते हैं कि मुख्यधारा के मीडिया में लंबे समय तक एक तरफा नैरेटिव चला, अंजना ने उसका मुकाबला किया। राम मंदिर, CAA-NRC, Article 370 जैसे मुद्दों पर उनकी कवरेज को वे “सच्चाई उजागर करना” मानते हैं।

जामिया मिलिया इस्लामिया के संदर्भ में यह सवाल स्वाभाविक है: क्या एक संस्था जो ‘इस्लामिया’ नाम के साथ सेकुलर लोकतंत्र की मिसाल बनती है, अपनी पूर्व छात्रा की पत्रकारिता शैली को लेकर कुछ महसूस करती है? या फिर शिक्षा संस्थान सिर्फ शिक्षा देते हैं, बाद का सफर व्यक्ति की अपनी जिम्मेदारी है?

मीडिया, राजनीति और ध्रुवीकरण का खेल

आज के ट्रायल-बाय-मीडिया युग में अंजना ओम कश्यप जैसी एंकर्स सिर्फ न्यूज नहीं, ओपिनियन भी बेचती हैं। उनके कार्यक्रमों में मेहमान अक्सर दो खेमों में बंटे दिखते हैं – एक तरफ “राष्ट्रवादी”, दूसरी तरफ “लीब्रल/वामपंथी/पसमांदा”। इस बाइनरी ने दर्शकों को भी बांट दिया है।

कुछ सवाल जो उठते हैं:

- क्या जामिया जैसी संस्था से शिक्षा लेने के बाद भी धार्मिक-राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना संभव है?

- क्या टीआरपी और राजनीतिक दबाव ने पत्रकारिता को नफरत फैलाने का हथियार बना दिया है?

- अंजना की सफलता व्यक्तिगत मेहनत है या सिस्टम द्वारा चुने गए नैरेटिव का हिस्सा?

अंजना खुद को हमेशा “निष्पक्ष” बताती रही हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि वे सिर्फ सवाल पूछती हैं, जवाब दर्शक तय करते हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि सवालों में ही पूर्वाग्रह छिपा होता है।

 विडंबना का सार

जामिया मिलिया इस्लामिया ने अंजना को डिग्री दी, सम्मान दिया। आज वही अंजना उन मूल्यों की आलोचना करती दिखती हैं जो जामिया का आधार माने जाते हैं – सेकुलरिज्म, अल्पसंख्यक अधिकार आदि। यह विडंबना है या फिर लोकतंत्र की खूबसूरती कि एक संस्था अपनी छात्रा को आलोचना का अधिकार भी देती है?

पत्रकारिता का काम सत्य की खोज है, न कि नफरत का प्रचार। लेकिन वर्तमान समय में दोनों के बीच की लाइन धुंधली हो चुकी है। अंजना ओम कश्यप इस धुंधले माहौल की सबसे चमकती मिसाल हैं – जहां एक तरफ करोड़ों दर्शक उन्हें अपना हीरो मानते हैं, दूसरी तरफ लाखों उन्हें विलेन।

अंतिम विचार

अंजना तिवारी से अंजना ओम कश्यप बनने का सफर सामान्य नहीं। जामिया की बेंच से आज तक के स्टूडियो तक पहुंचना संघर्ष का परिणाम है। लेकिन सफलता के साथ जिम्मेदारी भी आती है। दिन-रात स्क्रीन पर जो कुछ बोला जाता है, उसका समाज पर असर पड़ता है।

जामिया ने उन्हें सम्मान दिया था। अब समय है कि समाज भी तय करे – क्या अंजना ओम कश्यप सच्ची पत्रकारिता कर रही हैं या सिर्फ नफरत का कारोबार? जवाब आसान नहीं, लेकिन सवाल जरूरी है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026
June 01, 2026

अमेरिका के नए हमलों के बाद ईरान का पलटवार: कुवैत पर मिसाइल-ड्रोन हमले, क़ालीबाफ़ बोले- 'अमेरिका सीज़फायर तोड़ रहा है'

अमेरिका के नए हमलों के बाद ईरान का पलटवार: कुवैत पर मिसाइल-ड्रोन हमले, क़ालीबाफ़ बोले- 'अमेरिका सीज़फायर तोड़ रहा है'
- Friday World 1 Jun 2026
तेहरान/कुवैत सिटी, 01 जून 2026
अमेरिका और ईरान के बीच अप्रैल 2026 से लागू नाज़ुक संघर्ष-विराम के बीच तनाव फिर चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी सेना द्वारा दक्षिणी ईरान में रडार और ड्रोन ठिकानों पर ताज़ा हमलों के बाद ईरान ने कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। ईरानी संसद के सभापति और शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बाग़िर क़ालीबाफ़ ने लेबनान में इज़राइल की बढ़त को 'अमेरिका द्वारा सीज़फायर का पालन न करने का स्पष्ट प्रमाण' बताया है।

क्या हुआ कुवैत में?
कुवैत की सेना ने सोमवार सुबह पुष्टि की कि उसके वायु रक्षा सिस्टम ने "शत्रुतापूर्ण मिसाइल और ड्रोन हमलों" को रोका। कुवैत आर्मी ने X पर कहा कि धमाकों की आवाज़ वायु रक्षा द्वारा हमलों को रोकने के कारण थी। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स, IRGC ने दावा किया कि उसने दक्षिणी ईरान पर अमेरिकी हमले के जवाब में एक अमेरिकी एयर बेस को निशाना बनाया। कुवैत ने ईरान पर हमलों का आरोप लगाते हुए इसे "खतरनाक बढ़ोतरी" बताया। 

अमेरिकी सेंट्रल कमांड, CENTCOM ने कहा कि कुवैत ने बुधवार रात ईरान से दागी गई मिसाइलों को रोका और इसे "सीज़फायर का घोर उल्लंघन" करार दिया। CENTCOM के मुताबिक यह हमला ईरानी बलों द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के पास 5 आत्मघाती ड्रोन लॉन्च करने के कुछ घंटे बाद हुआ। 

हमले में नुकसान
रिपोर्टों के मुताबिक कुवैत में एक सैन्य अड्डे पर ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल हमले में कई अमेरिकी नागरिक घायल हुए। इंटरसेप्शन के मलबे से करीब 5 लोग घायल हुए, जिनमें सैन्यकर्मी और कॉन्ट्रैक्टर शामिल हैं। एक MQ-9 रीपर ड्रोन नष्ट हुआ और दूसरा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ। हर ड्रोन की कीमत लगभग 3 करोड़ डॉलर है। 2119

अमेरिका-ईरान: किसने क्या कहा
1. अमेरिका: CENTCOM ने कहा कि उसने शनिवार-रविवार को गेरुक और केशम द्वीप पर ईरानी रडार और ड्रोन कंट्रोल साइटों पर "नपे-तुले और जानबूझकर" आत्मरक्षा हमले किए। यह कार्रवाई ईरान द्वारा अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अमेरिकी MQ-1 ड्रोन गिराने के जवाब में थी। अमेरिका ने कहा कि ईरानी ड्रोन जहाज़ों के लिए खतरा थे।

2. ईरान: IRGC एयरोस्पेस फोर्स ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिकी "आक्रामकता" जारी रही तो जवाब "पूरी तरह अलग" होगा। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने अमेरिकी हमलों को सीज़फायर का उल्लंघन बताया। ब्रिगेडियर जनरल माजिद एब्न अल-रज़ा ने कहा, "हमारी उंगली ट्रिगर पर है" और "नए सरप्राइज़ रास्ते में हैं"।

3. क़ालीबाफ़ का बयान: ईरानी संसद सभापति मोहम्मद बाग़िर क़ालीबाफ़ ने कहा कि लेबनान में इज़राइल की प्रगति अमेरिका द्वारा सीज़फायर का पालन न करने का स्पष्ट प्रमाण है। इज़राइल ने दक्षिणी बेरूत के शोएफ़ात इलाके में एक अपार्टमेंट पर हमला किया। क़ालीबाफ़ का इशारा है कि अमेरिका इज़राइल को रोक नहीं रहा, जो सीज़फायर की भावना के खिलाफ है। 

3 महीने का युद्ध और नाज़ुक सीज़फायर
अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी 2026 को ईरान पर युद्ध शुरू किया था। अप्रैल 2026 की शुरुआत में सीज़फायर लागू हुआ। तब से दोनों पक्ष एक-दूसरे पर उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं। मौजूदा टकराव तब शुरू हुआ जब ईरान ने एक अमेरिकी MQ-1 रीपर ड्रोन को मार गिराया। जवाब में अमेरिका ने केशम द्वीप पर "मिसाइल सिटी" और बंदर अब्बास में ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन पर हमला किया। 

कुवैत क्यों निशाने पर?
कुवैत में अमेरिका के कई सैन्य ठिकाने हैं, जिनमें कैंप आरिफजान और अली अल-सलेम एयर बेस शामिल हैं। IRGC ने कहा कि उसने अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किए गए एयर बेस को निशाना बनाया। कुवैत पहले भी सीज़फायर के दौरान हमलों का शिकार हुआ है। पिछले हफ़्ते भी कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन हमले हुए थे। 5d684c4bc556

क्षेत्रीय असर और कूटनीति
1. तेल बाज़ार: हमलों के बाद तेल की कीमतें 3% से ज़्यादा बढ़ गईं। ईरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद कर रखा है, जिससे दुनिया के तेल और LNG व्यापार का पांचवां हिस्सा प्रभावित है।
2. वार्ता: अमेरिका और ईरान सीज़फायर को 60 दिन बढ़ाने के लिए समझौता ज्ञापन पर चर्चा कर रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि डील करीब है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध राहत पर मतभेद बाकी हैं। ट्रंप की 5 शर्तों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम खत्म करना और होर्मुज़ खोलना शामिल है।
3. लेबनान फ्रंट: इज़राइल ने हिज़्बुल्लाह के खिलाफ लेबनान में सैनिकों को और अंदर भेजने का आदेश दिया। क़ालीबाफ़ इसे अमेरिका-इज़राइल गठजोड़ का हिस्सा बता रहे हैं। 

IRGC का इनकार और आरोप
IRGC ने फारस की खाड़ी के देशों पर हमले से इनकार करते हुए अमेरिका और इज़राइल को दोषी ठहराया। उसका कहना है कि अगर मीडिया रिपोर्ट सही हैं तो "बिना शक यह यहूदी दुश्मन या अमेरिका का काम है"। हालांकि कुवैत ने साफ तौर पर ईरान और उसके प्रॉक्सी पर ड्रोन हमलों का आरोप लगाया। 

आगे क्या?
रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि अमेरिका "ईरान के साथ युद्ध फिर शुरू करने में पूरी तरह सक्षम" है। वहीं ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि फिलहाल परमाणु मुद्दे पर अमेरिका से कोई बातचीत नहीं हो रही, प्राथमिकता "युद्ध खत्म करना" है। 

विश्लेषकों का मानना है कि कुवैत पर हमला सीज़फायर को पूरी तरह खत्म कर सकता है। पाकिस्तान मध्यस्थता कर रहा है, पर ज़मीनी हालात बिगड़ रहे हैं। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026

Sunday, 31 May 2026

May 31, 2026

व्हाइट हाउस की अग्निपरीक्षा: ईरान की शर्तों के आगे ट्रंप की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती

व्हाइट हाउस की अग्निपरीक्षा: ईरान की शर्तों के आगे ट्रंप की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
- Friday World 1 Jun 2026
वॉशिंगटन, 1 जून 2026
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने राजनीतिक करियर के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। व्हाइट हाउस के सामने संकट बाहर से कम, अपने ही फैसलों से ज्यादा गहरा दिख रहा है।

हालिया सैन्य टकराव के बाद ईरान ने न सिर्फ कड़ा रुख अपनाया है, बल्कि तीन शर्तों को मजबूती से सामने रखा है: युद्ध के नुकसान का मुआवजा, सभी आर्थिक पाबंदियों को पूरी तरह हटाना, और होर्मुज़ स्ट्रेट के प्रबंधन में अपनी भूमिका बढ़ाना। तेहरान का कहना है कि बिना इन मुद्दों पर बात हुए कोई भी कूटनीतिक पहल अधूरी रहेगी।

अमेरिका के सामने तीन मोर्चे
1. घरेलू दबाव: कांग्रेस में दोनों दलों के कुछ सांसद मध्य-पूर्व में दोबारा सैन्य खर्च बढ़ाने के खिलाफ हैं। मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भी अब "विदेश में कम दखल" की नीति चाहता है।  
2. कूटनीतिक गतिरोध: यूरोपीय सहयोगी पाबंदियां हटाने पर बंटे हुए हैं। फ्रांस और जर्मनी बातचीत के पक्ष में हैं, जबकि पूर्वी यूरोप के देश ईरान पर और दबाव चाहते हैं।  
3. आर्थिक असर: होर्मुज़ स्ट्रेट से दुनिया का लगभग 20% तेल गुजरता है। ईरान के सख्त रुख के बाद कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता बढ़ी है। अमेरिकी बाजार में महंगाई की चिंता फिर लौट आई है।

व्हाइट हाउस की रणनीति क्या?
प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप टीम "दबाव और बातचीत" दोनों विकल्प खुले रखना चाहती है। एक तरफ नए प्रतिबंधों का मसौदा तैयार है, दूसरी तरफ ओमान और कतर के जरिए बैकचैनल संपर्क भी सक्रिय हैं। मगर ईरान ने सार्वजनिक तौर पर मुआवजे की मांग रखकर डील की गुंजाइश को मुश्किल बना दिया है।

जानकार क्या कहते हैं
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल ओ'हैनलन मानते हैं कि यह संकट सैन्य से ज्यादा राजनीतिक है। "ट्रंप को अपने बेस को दिखाना है कि वे झुक नहीं रहे, और साथ ही युद्ध से बचना है। ये दोनों काम एक साथ मुश्किल हैं।" 

वहीं, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट की रीना शाह का आकलन है कि ईरान घरेलू समर्थन जुटाने के लिए कड़ा रुख दिखा रहा है। "पाबंदियों ने उनकी अर्थव्यवस्था को तोड़ा है। मुआवजे की बात करके वे अपनी जनता को संदेश दे रहे हैं।"

आगे का रास्ता
व्हाइट हाउस के पास फिलहाल तीन रास्ते हैं: सख्त प्रतिबंध बढ़ाना, सीमित समझौते पर आना, या तीसरे पक्ष के जरिए तनाव कम करना। तीनों में राजनीतिक जोखिम है। अगर ट्रंप पाबंदियां हटाते हैं तो रिपब्लिकन खेमे में नाराजगी बढ़ेगी। अगर सैन्य कार्रवाई बढ़ती है तो चुनावी साल में जनता का मूड खराब हो सकता है।

अगले 60 दिन निर्णायक माने जा रहे हैं। तेल बाजार, कांग्रेस का बजट सत्र, और G20 शिखर सम्मेलन, तीनों पर ईरान नीति की छाया पड़ेगी। व्हाइट हाउस इस "खुद के बनाए" जाल से निकल पाता है या नहीं, ये ट्रंप की विरासत तय करेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026
May 31, 2026

બેરોજગારીનો દાવાનળ: યુવાનોની આંખમાં સપના, હાથમાં ડિગ્રી, પણ રોજગાર ક્યાં? વિશ્વભરના આંદોલનો આપે છે ચેતવણી

બેરોજગારીનો દાવાનળ: યુવાનોની આંખમાં સપના, હાથમાં ડિગ્રી, પણ રોજગાર ક્યાં? વિશ્વભરના આંદોલનો આપે છે ચેતવણી
- Friday World 1 Jun 2026
જ્યારે પેટમાં ભૂખનો અગ્નિ સળગતો હોય અને હાથ ખાલી હોય, ત્યારે માણસ ચૂપ કેવી રીતે રહે? આજે દેશનો યુવાન ડિગ્રીના કાગળ લઈને શહેરે-શહેરે, દરવાજે-દરવાજે ઠોકરો ખાઈ રહ્યો છે. સરકારી ભરતીના પેપર ફૂટે છે, ખાનગી કંપનીઓ અનુભવ માંગે છે, અને સ્ટાર્ટઅપના સપના ફંડિંગ વગર દમ તોડે છે. આ હાલતમાં જો જનતા રોડ પર ઉતરી આવે તો નવાઈ શું? ઇતિહાસ સાક્ષી છે કે બેરોજગારીની ચિનગારી ક્રાંતિની જ્વાળા બની શકે છે. ચાલો જોઈએ, દુનિયાના ખૂણે-ખૂણે યુવાનોએ બેરોજગારી સામે કેવી રીતે અવાજ ઉઠાવ્યો.  

1. જ્યારે ડિગ્રી બોજ બની જાય: ભારતની ધરતી પરથી
NCRBના આંકડા કહે છે કે દર કલાકે એક શિક્ષિત યુવાન નોકરી ન મળવાના કારણે આત્મહત્યા કરે છે. SSC, બેંકિંગ, રેલવેની એક-એક જગ્યા માટે લાખો અરજીઓ આવે છે. ગુજરાતમાં જ તલાટીની 3500 જગ્યા માટે 17 લાખ ફોર્મ ભરાયા હતા. MPમાં પટાવાળાની 10 જગ્યા માટે PhD, એન્જિનિયરો લાઈનમાં ઉભા રહ્યા. આ માત્ર આંકડા નથી, આ દરેક ઘરની કહાણી છે.  

કોચિંગ ક્લાસમાં વર્ષો ગાળ્યા પછી પણ જ્યારે હાથમાં નોકરીનો પત્ર નથી આવતો, ત્યારે યુવાનનો ગુસ્સો રસ્તા પર દેખાય છે. 2022માં રેલવે ભરતી આંદોલન હોય કે પછી વિવિધ રાજ્યોમાં પેપર લીક સામેના દેખાવો, યુવાનોએ બતાવી દીધું કે સહનશક્તિની પણ એક હદ હોય છે.  

યુવાનોનો સવાલ સીધો છે:

- નવી નોકરી ક્યાં છે? સરકારી વિભાગોમાં લાખો જગ્યાઓ ખાલી છે, પણ ભરતી નથી.  
- કૌશલ્ય કે ડિગ્રી? કંપનીઓ કહે છે 'સ્કિલ નથી', કોલેજો કહે છે 'ડિગ્રી પૂરતી છે'. પીસાશે કોણ?  
- સ્ટાર્ટઅપ ઇન્ડિયા કે શટડાઉન ઇન્ડિયા? ફંડિંગ વિન્ટરમાં હજારો યુવાનોની નોકરીઓ એક ઝાટકે ગઈ.  

2. દુનિયાએ જોયા બેરોજગારીના વિસ્ફોટ: જીવતા-જાગતા નમૂના

અરબ સ્પ્રિંગ, 2010-2012: એક ફેરિયાની ચિનગારીથી સળગ્યા દેશ 
ટ્યુનિશિયાના મોહમ્મદ બૌઝીઝી. યુનિવર્સિટીની ડિગ્રી હોવા છતાં શાકભાજીની લારી ચલાવતો હતો. પોલીસે લારી જપ્ત કરી, ઈજ્જતનું ધોવાણ કર્યું. બૌઝીઝીએ પોતાની જાતને આગ લગાડી દીધી. બસ, આ એક ચિનગારી હતી. ટ્યુનિશિયાથી શરૂ થયેલો આક્રોશ ઇજિપ્ત, લિબિયા, સીરિયા સુધી ફેલાયો. સરકારો પડી ગઈ. મૂળ કારણ? 24% યુવા બેરોજગારી અને ભ્રષ્ટાચાર. જ્યારે પેટ ખાલી હોય ત્યારે બંદૂકની ગોળીનો પણ ડર નથી લાગતો.  

ગ્રીસ, 2008-2015: 'લોસ્ટ જનરેશન' નો વિદ્રોહ
આર્થિક મંદી આવી અને ગ્રીસમાં યુવા બેરોજગારી 60% ને પાર પહોંચી ગઈ. ડિગ્રીધારક યુવાનો પિઝા ડિલિવરી કરવા મજબૂર બન્યા. એથેન્સના સિંટાગ્મા સ્ક્વેર મહિનાઓ સુધી યુવાનોથી ભરેલો રહ્યો. 'અમે 400 યુરોની પેઢી છીએ' ના બેનરો સાથે લાખો લોકો રસ્તા પર ઉતર્યા. પરિણામ? સરકારો બદલાઈ, આખા યુરોપની આર્થિક નીતિઓ હચમચી ગઈ.  

સ્પેન: 'ઇન્ડિગ્નાડોસ' એટલે કે 'આક્રોશિતો'નું આંદોલન
2011માં સ્પેનમાં 50% થી વધુ યુવાનો બેરોજગાર હતા. મે મહિનામાં મેડ્રિડના પુએર્તા ડેલ સોલ ચોકમાં હજારો યુવાનોએ તંબુ તાણી દીધા. તેમનું સૂત્ર હતું: "અમારી પાસે ઘર નથી, નોકરી નથી, પેન્શન નથી, પણ ડર પણ નથી." આ આંદોલનમાંથી 'પોડેમોસ' પાર્ટીનો જન્મ થયો જે આજે સ્પેનની સરકારનો ભાગ છે.  

ચિલી, 2019: 30 પેસો માટે સળગ્યું રાષ્ટ્ર
મેટ્રોના ભાડામાં માત્ર 30 પેસોનો વધારો થયો. સ્કૂલ-કોલેજના વિદ્યાર્થીઓએ મેટ્રો સ્ટેશનના દરવાજા તોડી નાખ્યા. જોતજોતામાં આખો દેશ સળગી ઉઠ્યો. કારણ? 30 પેસો નહોતું. કારણ હતું વર્ષોથી દબાયેલો ગુસ્સો. મોંઘુ શિક્ષણ, ઓછો પગાર, અને ભવિષ્યની અનિશ્ચિતતા. રાષ્ટ્રપતિએ કબૂલ્યું, "અમે લોકોની વેદના સમજી ન શક્યા."  

શ્રીલંકા, 2022: 'ગોટા ગો ગામા' એટલે ઘરે જાવ
આર્થિક પાયમાલી, બેફામ મોંઘવારી અને બેરોજગારીથી કંટાળીને શ્રીલંકાની જનતા રાષ્ટ્રપતિ ભવનમાં ઘુસી ગઈ. કોલંબોના ગાલે ફેસ ગ્રીન પર મહિનાઓ સુધી 'અરાગલય' એટલે કે સંઘર્ષ ચાલ્યો. યુવાનો, મધ્યમ વર્ગ, બધા એક થયા. રાષ્ટ્રપતિને દેશ છોડીને ભાગવું પડ્યું. પેટ પર લાત પડે ત્યારે ખુરશી કોઈને બચાવી શકતી નથી.  

3. બેરોજગારી માત્ર આંકડો નથી, બોમ્બ છે
ILOનો રિપોર્ટ કહે છે કે દુનિયામાં 73 મિલિયન યુવાનો બેરોજગાર છે. ભારતમાં CMIE મુજબ યુવા બેરોજગારી દર 40% ની આસપાસ છે. આ ખતરનાક છે. કેમ?  

- ગુના વધે: ખાલી મગજ શેતાનનું ઘર. નોકરી ન મળે તો યુવાન ગુના તરફ વળે છે.  
- માનસિક બીમારી: ડિપ્રેશન, એન્ઝાયટી આજે દરેક ત્રીજા યુવાનની સમસ્યા છે.  
- સામાજિક અસ્થિરતા: જ્યારે મોટો વર્ગ નિરાશ થાય, ત્યારે સમાજમાં વિદ્રોહ, હિંસા અને ધ્રુવીકરણ વધે છે.  
- પલાયન: લાખો યુવાનો દર વર્ષે દેશ છોડીને વિદેશ જાય છે. આ 'બ્રેઈન ડ્રેઈન' દેશને વર્ષો પાછળ ધકેલી દે છે.  

4. રસ્તો ક્યાં છે? ફક્ત આંદોલન કે સમાધાન પણ?
રોડ પર ઉતરવું એ સમસ્યાનું લક્ષણ છે, ઉકેલ નહીં. ઉકેલ માટે સરકાર, ઉદ્યોગ અને સમાજ એ ત્રણેયે સાથે બેસવું પડશે.  

સરકારે શું કરવું જોઈએ?

1. ખાલી જગ્યા ભરો: સરકારી વિભાગોમાં 30 લાખથી વધુ જગ્યાઓ ખાલી છે. તાત્કાલિક ભરતી કેલેન્ડર જાહેર કરો.  

2. સ્કિલ મિશનમાં ધાર કાઢો: માત્ર સર્ટિફિકેટ નહીં, રોજગાર મળે એવી તાલીમ આપો. ITI અને કોલેજોને ઇન્ડસ્ટ્રી સાથે જોડો.  

3. નાના ધંધાને વેગ: MSME એટલે કે નાના ઉદ્યોગો સૌથી વધુ રોજગારી આપે છે. તેમને લોન, ટેક્સમાં રાહત અને બજાર મળે તો કરોડો નોકરીઓ પેદા થાય.  

4. પેપર લીક પર ફાંસી જેવી સજા: યુવાનોના સપનાના સોદાગરોને એવી સજા મળે કે કોઈ ફરી આવું કરતા 100 વાર વિચારે.  

ઉદ્યોગ જગતે શું કરવું જોઈએ? 

1. *ફ્રેશર' ને ચાન્સ આપો: 2 વર્ષનો અનુભવ માંગશો તો નવો છોકરો અનુભવ લાવશે ક્યાંથી? તાલીમ આપીને તૈયાર કરો.  

2. એપ્રેન્ટિસશિપ વધારો: કોલેજના છેલ્લા વર્ષમાં જ વિદ્યાર્થીને ઇન્ડસ્ટ્રીમાં કામ શીખવા દો. સ્ટાઈપેન્ડ આપો.  

3. ટિયર-2, ટિયર-3 શહેરોમાં જાવ: બધી કંપનીઓ બેંગ્લોર, પુણે, ગુરુગ્રામમાં જ કેમ? નાના શહેરોમાં ઓફિસ ખોલો તો સ્થાનિક યુવાનોને ત્યાં જ કામ મળે.  

યુવાનોએ શું કરવું જોઈએ?

1. ડિગ્રી સાથે સ્કિલ:*म કોલેજની ડિગ્રીની સાથે કોડિંગ, ડિજિટલ માર્કેટિંગ, AI, ડેટા એનાલિટિક્સ, કે પછી પ્લમ્બિંગ, ઇલેક્ટ્રિકલ જેવી એક સ્કિલ જરૂર શીખો.  

2. સરકારી નોકરીનો મોહ છોડો: દુનિયા બદલાઈ ગઈ છે. ગીગ ઇકોનોમી, ફ્રીલાન્સિંગ, કન્ટેન્ટ ક્રિએશનમાં પણ લાખોની કમાણી છે.  

3. નેટવર્ક બનાવો: લિંક્ડઇન પર એક્ટિવ રહો. તમારા ક્ષેત્રના લોકોને મળો. 70% નોકરીઓ રેફરન્સથી મળે છે.  

બેરોજગારીની આગમાં સૌથી પહેલો ભોગ સપનાનો લેવાય છે. આજનો યુવાન આંદોલન કરવા નથી માંગતો, એ કામ કરવા માંગે છે. એને તક જોઈએ છે, ભીખ નહીં. જો સમયસર આગને ઠારવામાં નહીં આવે, તો આ દાવાનળ કોને-કોને લપેટમાં લેશે એ કોઈ નથી જાણતું. દુનિયાના દાખલા ચેતવણી આપે છે: જ્યારે યુવાનોની ધીરજ ખૂટે છે, ત્યારે સિંહાસનો ડગમગી જાય છે.  

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 1 Jun 2026