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Wednesday, 13 May 2026

May 13, 2026

डॉ. मनमोहन सिंह: शांत स्वभाव का वह महान अर्थशास्त्री, जिसने भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया

डॉ. मनमोहन सिंह: शांत स्वभाव का वह महान अर्थशास्त्री, जिसने भारत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया
-Friday World-14 May 2026
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एक ऐसा व्यक्तित्व थे, जिन्होंने चुपचाप लेकिन दृढ़तापूर्वक देश की सेवा की। “मौन का महानायक” कहे जाने वाले इस महामानव ने 2004 से 2014 तक प्रधानमंत्री के रूप में न केवल आर्थिक सुधारों को गति दी, बल्कि आम आदमी को सीधे छूने वाली क्रांतिकारी योजनाओं को भी मूर्त रूप दिया। उनका योगदान सिर्फ आंकड़ों में नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के जीवन में बदलाव लाने वाली नीतियों में दर्ज है। आज जब हम उनके कार्यकाल को याद करते हैं, तो एक सच्चे देशभक्त और दूरदर्शी नेता की छवि उभरती है, जिसका ऋण हम कभी नहीं चुका सकते।

 आम आदमी की जेब को राहत: सब्सिडी वाली आवश्यक वस्तुएं

डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने आम नागरिकों को दैनिक जरूरतों पर भारी राहत दी। यूरिया मात्र 240 रुपये, अमोनिया 450 रुपये और डीएपी 600 रुपये प्रति बैग की दर पर उपलब्ध कराई गई। घरेलू गैस सिलेंडर 350 रुपये में मिलता था। पेट्रोल 60 रुपये और डीजल मात्र 55 रुपये प्रति लीटर पर आम आदमी की पहुंच में था। इन सब्सिडी वाली कीमतों ने किसानों, मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों को महंगाई के बोझ से काफी हद तक बचाया। 

विश्व बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, फिर भी सरकार ने आम आदमी पर बोझ नहीं पड़ने दिया। ईंधन और उर्वरक सब्सिडी को प्राथमिकता दी गई, ताकि खेती-किसानी और परिवहन व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहे। यह दृष्टिकोण दिखाता है कि डॉ. सिंह की सरकार विकास के साथ-साथ समावेशी विकास पर भी ध्यान दे रही थी।

अधिकार-आधारित क्रांतिकारी कानून: RTI, RTE, FRA और Food Security

डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि “अधिकार-आधारित” कानूनों की श्रृंखला है, जो आम आदमी को सशक्त बनाने वाली थीं:

- Right to Information (RTI) Act 2005: भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने वाला यह कानून नागरिकों को सरकार की जानकारी मांगने का अधिकार देता है। अपनी ही सरकार में भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने में RTI ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पारदर्शिता और जवाबदेही की नई संस्कृति की नींव पड़ी।

- Right to Education (RTE) Act 2009: 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार मिला। गरीब बच्चों के लिए निजी स्कूलों में 25% आरक्षण सुनिश्चित किया गया।

- Forest Rights Act (FRA) 2006: आदिवासी और वनवासी समुदायों को उनके पारंपरिक अधिकार दिए गए, जिससे लाखों परिवारों को वन भूमि पर अधिकार मिला।

- National Food Security Act 2013: करोड़ों गरीब परिवारों को सस्ता अनाज उपलब्ध कराने वाला यह कानून भुखमरी और कुपोषण से लड़ने का बड़ा हथियार बना।

- Aadhaar Card: डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) की नींव रखी, जिससे सब्सिडी लीकेज कम हुआ और पात्र लाभार्थियों तक सीधा पहुंच सुनिश्चित हुई।

- Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA): ग्रामीण क्षेत्रों में 100 दिनों का गारंटीड रोजगार। लाखों गरीब परिवारों की आय बढ़ी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिला।

इन योजनाओं को बिना किसी बड़े फर्जीवाड़े या भ्रष्टाचार के लागू करने पर जोर दिया गया। हालांकि कुछ घोटालों की चर्चा हुई, लेकिन RTI जैसे कानून ने स्वयं सरकार को जवाबदेह बनाया।

 किसानों का सच्चा हितैषी: कर्ज माफी और रिकॉर्ड MSP

2008 में डॉ. मनमोहन सिंह सरकार ने ₹71,000 करोड़ का ऐतिहासिक किसान कर्ज माफी पैकेज घोषित किया, जो पूरे देश के करोड़ों किसानों को राहत पहुंचाने वाला था। कपास और मूंगफली जैसे नकदी फसलों पर रिकॉर्ड तोड़ समर्थन मूल्य (MSP) दिए गए। न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति को मजबूत किया गया, ताकि किसान मेहनत का उचित दाम पा सकें। 

कृषि ऋण बढ़ाया गया, सिंचाई और ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर निवेश बढ़ा। यह सब दिखाता है कि उनकी सरकार कृषि और किसान को विकास की मुख्यधारा में लाना चाहती थी।

2008 की वैश्विक मंदी से भारत की रक्षा

जब पूरी दुनिया 2008 की वैश्विक वित्तीय संकट की चपेट में थी, तब डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने साहसिक कदम उठाए। बैंकों को मजबूत रखा, तरलता बढ़ाई, स्टिमुलस पैकेज दिए और घरेलू मांग को बढ़ावा दिया। नतीजा यह रहा कि भारत मंदी की गहरी खाई में नहीं गिरा। विकास दर अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बेहतर रही। 

उनके अर्थशास्त्री व्यक्तित्व ने संकट को अवसर में बदल दिया। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत किए गए और नीतिगत स्थिरता बनाए रखी गई।

पारदर्शी और साहसी नेतृत्व: प्रेस और विदेश नीति

डॉ. सिंह “कम बोलने वाले” नेता थे, लेकिन जब बोलते थे तो सख्त और स्पष्ट बोलते थे। उन्होंने मीडिया के सामने सीधे संबोधन किए, प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और सवालों का सामना किया। अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने 100 से अधिक प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं।

विदेश नीति में भी उन्होंने मजबूत स्टैंड लिया। भारत-अमेरिका परमाणु समझौता (Nuclear Deal) उनके कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि थी, जिसने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी। पड़ोसी देशों और विश्व नेताओं के साथ संबंध मजबूत किए। किसी से डरे बिना राष्ट्रीय हितों की रक्षा की।

 विरासत जो कभी फीकी नहीं पड़ेगी

डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल चुनौतियों से भरा था – गठबंधन सरकार चलाना, वैश्विक संकट, घरेलू मुद्दे। फिर भी उन्होंने शांति, गरिमा और बौद्धिकता के साथ नेतृत्व किया। वे सादगी के प्रतीक थे। कोई दिखावा नहीं, सिर्फ काम।

उनकी नीतियों ने लाखों युवाओं, किसानों, महिलाओं और गरीबों के जीवन को छुआ। RTI ने लोकतंत्र को मजबूत किया, MGNREGA ने ग्रामीण भारत को सशक्त बनाया, Food Security ने भूख से लड़ाई लड़ी। 

आज जब हम पेपर लीक, महंगाई और युवा बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं, तब मनमोहन सिंह की विरासत हमें याद दिलाती है कि सच्चा नेतृत्व वह है जो आम आदमी के हित में चुपचाप काम करता है।

: सरदार मनमोहन सिंह एक महामानव थे। उनका योगदान सिर्फ योजनाओं या आंकड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि एक ऐसे भारत की नींव रखने में है जहां समावेशी विकास, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय प्रमुख हों। हम उनका ऋण कभी नहीं चुका सकते। उनकी याद हमें प्रेरित करती रहेगी कि शांत और बौद्धिक नेतृत्व भी देश को नई दिशा दे सकता है। 

भारत माता के इस सपूत को सलाम। उनकी विरासत सदैव अमर रहेगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-14 May 2026
May 13, 2026

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का भारत आगमन: BRICS में नई कूटनीतिक ऊर्जा और भारत-ईरान की मजबूत दोस्ती का प्रतीक

ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का भारत आगमन: BRICS में नई कूटनीतिक ऊर्जा और भारत-ईरान की मजबूत दोस्ती का प्रतीक
-Friday World-14 May 2026
नई दिल्ली। आज इंडिया गेट्स इंटरनेशनल (IGI) हवाई अड्डे पर ईरान के विदेश मंत्री डॉ. सैयद अब्बास अराघची का गर्मजोशी भरा स्वागत किया गया। भारत सरकार की ओर से उनके स्वागत में जो उत्साह और सम्मान दिखाया गया, वह न केवल द्विपक्षीय संबंधों की गहराई को दर्शाता है बल्कि BRICS जैसे महत्वपूर्ण मंच पर बहुपक्षीय सहयोग की नई संभावनाओं को भी रेखांकित करता है।

अराघची साहब BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने के लिए नई दिल्ली पहुंचे हैं। यह बैठक 14 और 15 मई 2026 को भारत की अध्यक्षता में हो रही है, जिसमें वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और बहुपक्षीय संस्थाओं के सुधार जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा होने वाली है।

स्वागत का भावपूर्ण क्षण
हवाई अड्डे पर ईरानी विदेश मंत्री का स्वागत विदेश मंत्रालय के अधिकारियों, ईरान के राजदूत और भारतीय गणमान्य व्यक्तियों ने किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया पर लिखा, “ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची का BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए नई दिल्ली पहुंचने पर बहुत गर्मजोशी से स्वागत।” यह स्वागत शब्दों से कहीं ज्यादा प्रतीकात्मक है – यह भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना और पड़ोसी क्षेत्र के साथ मजबूत कूटनीतिक संबंधों का जीवंत उदाहरण है।

अराघची साहब का विमान ‘मिनाब168’ नाम से आया, जो हाल की घटनाओं में मिनाब शहर में हुई एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना का प्रतीक बन गया है। इस नाम ने ईरान में राष्ट्रीय भावनाओं को छुआ है और वैश्विक मंच पर शांति की अपील को मजबूत किया है।

 अब्बास अराघची: अनुभवी कूटनीतिज्ञ की जीवनी
सैयद अब्बास अराघची ईरान के अनुभवी राजनयिक हैं। 5 दिसंबर 1962 को तेहरान में जन्मे अराघची ने ईरान-इराक युद्ध में स्वेच्छा से सेवा की, जिसने उनकी विश्वदृष्टि को आकार दिया। उन्होंने ईरान के विदेश मंत्रालय के इंटरनेशनल रिलेशंस स्कूल से स्नातक किया, इस्लामिक आजाद यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री हासिल की और यूनिवर्सिटी ऑफ केंट (इंग्लैंड) से राजनीतिक विचारधारा पर पीएचडी पूरी की।

उनकी थीसिस “20वीं सदी में इस्लामी राजनीतिक विचार में राजनीतिक भागीदारी की अवधारणा का विकास” ने इस्लामी मूल्यों और पश्चिमी लोकतंत्र के बीच सामंजस्य की संभावनाओं पर गहराई से चर्चा की। अराघची JCPOA (2015 का न्यूक्लियर डील) के प्रमुख वार्ताकारों में शामिल रहे और बाद में भी परमाणु मुद्दों पर ईरान की आवाज बने। अगस्त 2024 में वे ईरान के विदेश मंत्री बने। उनकी कूटनीति ‘रिवोल्यूशनरी’ जड़ों और व्यावहारिक संवाद दोनों को संतुलित करती है।

 भारत-ईरान संबंध: ऐतिहासिक गहराई और वर्तमान प्रासंगिकता
भारत और ईरान के बीच संबंध सदियों पुराने हैं। सभ्यतागत, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों की यह यात्रा आज भू-राजनीतिक महत्व भी रखती है। चाबहार बंदरगाह परियोजना दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी का प्रतीक है, जो मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करती है और अफगानिस्तान को बाईपास करने का विकल्प देती है।

हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग, व्यापार और रक्षा क्षेत्र में चर्चाएं बढ़ी हैं। ईरान भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत रहा है, जबकि भारत ईरान के लिए प्रौद्योगिकी, दवा और कृषि क्षेत्र में भागीदार है। BRICS में ईरान की पूर्ण सदस्यता (2024 से) ने इन संबंधों को नया आयाम दिया है।

वर्तमान में पश्चिम एशिया में तनाव के बीच यह यात्रा खास महत्व रखती है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले भारतीय जहाजों की सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दे स्वाभाविक रूप से चर्चा में रहेंगे। भारत ने हमेशा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है – दोस्ती निभाते हुए शांति और संवाद की वकालत की है।

 BRICS 2026: भारत की अध्यक्षता में नई दिशा
भारत 2026 में BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। थीम “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” (BRICS@20) वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने पर केंद्रित है। इस बैठक में रूस के सर्गेई लावरोव समेत कई प्रमुख विदेश मंत्री शामिल होंगे। चीन के वांग यी इस बार नहीं आ रहे, लेकिन अन्य सदस्य देश सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं।

BRICS अब विस्तारित रूप में 11 सदस्यों वाला मंच है – ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान आदि। यह मंच बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में काम कर रहा है। अराघची की यात्रा BRICS की एकता को परखेगी, खासकर जब क्षेत्रीय संकट चर्चा का केंद्र हैं।

भारत वैश्विक मुद्दों पर ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व करते हुए सभी पक्षों के बीच पुल का काम कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से BRICS मंत्रियों की मुलाकात इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगी।

 वैश्विक संदर्भ: चुनौतियां और अवसर
वर्तमान समय में BRICS की बैठक कई चुनौतियों के बीच हो रही है – पश्चिम एशिया का तनाव, ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव, बहुपक्षीय संस्थाओं (UN, WTO आदि) में सुधार की मांग और आर्थिक सहयोग। ईरान BRICS से मजबूत समर्थन की उम्मीद रखता है, जबकि भारत संतुलन और संवाद पर जोर दे रहा है।

भारत ने होर्मुज से LPG टैंकरों की सुरक्षित निकासी में भी सफलता हासिल की है, जो कूटनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है। अराघची की यात्रा इन मुद्दों पर गहन चर्चा का अवसर प्रदान करेगी।

 सांस्कृतिक और जन-जन संबंध
केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, भारत और ईरान के बीच लोग-लोग संबंध भी मजबूत हैं। फारसी भाषा, सूफी परंपरा, कला, साहित्य और सिनेमा दोनों समाजों को जोड़ते हैं। हजारों ईरानी छात्र भारत के विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं और भारतीय पर्यटक ईरान की ऐतिहासिक जगहों को देखने जाते हैं।

 भविष्य की दिशा
अराघची साहब की इस यात्रा से उम्मीद है कि भारत-ईरान द्विपक्षीय संबंध और मजबूत होंगे। चाबहार परियोजना को नई गति मिलेगी, व्यापार बढ़ेगा और BRICS के माध्यम से क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयास तेज होंगे।

भारत की विदेश नीति ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ पर आधारित है। ईरान जैसे महत्वपूर्ण देश के साथ यह साझेदारी न केवल द्विपक्षीय बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक शांति के लिए फायदेमंद साबित होगी।


सैयद अब्बास अराघची का भारत आगमन महज एक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि सभ्यतागत दोस्ती, रणनीतिक साझेदारी और बहुपक्षीय सहयोग की नई शुरुआत है। BRICS मंच पर भारत की अध्यक्षता में हो रही यह बैठक विश्व को यह संदेश देगी कि उभरती शक्तियां साथ मिलकर चुनौतियों का सामना कर सकती हैं और शांतिपूर्ण, समृद्ध विश्व का निर्माण कर सकती हैं।

दोनों देशों के बीच यह यात्रा नई संभावनाओं के द्वार खोलेगी। शांति, समृद्धि और सहयोग की इस यात्रा में भारत और ईरान साथ-साथ आगे बढ़ें – यही पूरे क्षेत्र और विश्व के लिए शुभ है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-14 May 2026
May 13, 2026

ट्रंप की बीजिंग विजय: विश्व शक्ति के महासंगम में अमेरिकी राष्ट्रपति की ऐतिहासिक चीन यात्रा

ट्रंप की बीजिंग विजय: विश्व शक्ति के महासंगम में अमेरिकी राष्ट्रपति की ऐतिहासिक चीन यात्रा
-Friday World-14 May 2026
बीजिंग, 13 मई 2026। एयर फोर्स वन के पहिए जब बीजिंग कैपिटल इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर स्पर्श करते हैं, तो पूरी दुनिया की निगाहें एक बार फिर से दो महाशक्तियों के बीच के इस नाटकीय मंच पर केंद्रित हो जाती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी उच्च स्तरीय टीम के साथ चीन की राजधानी पहुंच चुके हैं। यह यात्रा महज एक राजकीय दौरा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, व्यापार, प्रौद्योगिकी और भू-राजनीति का एक ऐसा मोड़ है जो आने वाले दशकों की दिशा तय कर सकता है।

 भव्य स्वागत और कूटनीतिक माहौल

ट्रंप का स्वागत चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग ने भव्य समारोह के साथ किया। लाल कालीन, सम्मान गार्ड, राष्ट्रगान और पारंपरिक चीनी संस्कृति के रंग-बिरंगे प्रदर्शन ने इस यात्रा को यादगार बना दिया। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल में विदेश मंत्री, वाणिज्य सचिव, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और प्रमुख व्यापारिक नेता शामिल हैं। यह उच्च स्तरीय टीम दर्शाती है कि वाशिंगटन इस यात्रा को कितना महत्वपूर्ण मान रहा है।

बीजिंग की सड़कें आज खास तौर पर सजी हुई हैं। टेम्पल ऑफ हेवन जैसी ऐतिहासिक जगहों पर कल होने वाले कार्यक्रमों की तैयारी जोरों पर है। कल यानी 14 मई को ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय वार्ता, औपचारिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर शुरू होगा। दोनों नेता ईरान संकट, व्यापार घाटा, ताइवान मुद्दा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करेंगे।

 ट्रंप का विजन: "अमेरिका फर्स्ट" और चीन के साथ नया अध्याय

डोनाल्ड ट्रंप हमेशा से चीन को अमेरिका के लिए सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिद्वंद्वी मानते आए हैं। अपनी पिछली presidency में उन्होंने व्यापार युद्ध छेड़ा था, टैरिफ लगाए थे और टेक कंपनियों पर पाबंदियां थोपी थीं। अब दूसरे कार्यकाल में वे मजबूत स्थिति के साथ बीजिंग पहुंचे हैं। लेकिन दुनिया बदल गई है। ईरान युद्ध की छाया, वैश्विक मुद्रास्फीति और AI की दौड़ ने दोनों देशों को एक-दूसरे के करीब ला दिया है।

ट्रंप ने यात्रा से पहले कहा था, "चीन के साथ अच्छा डील करना अमेरिका के लिए फायदेमंद है, लेकिन यह मजबूत और स्मार्ट डील होना चाहिए।" चीनी पक्ष ने भी "win-win" सहयोग की बात कही है। दोनों पक्षों के बीच व्यापार संतुलन, कृषि उत्पादों, ऊर्जा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर बड़े समझौते संभव हैं।

साथ में उच्च अधिकारी: पूरी ताकत का प्रदर्शन

ट्रंप के साथ जो टीम है, वह कोई साधारण नहीं। इसमें शामिल प्रमुख चेहरे:

- विदेश मंत्री: कूटनीतिक मोर्चे पर अनुभवी नेता, जो ताइवान और दक्षिण चीन सागर जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अमेरिकी हितों की रक्षा करेंगे।

- वाणिज्य और अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ: ट्रेड डील पर फोकस।

- टेक और AI सलाहकार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर चर्चा।

- बड़े बिजनेस लीडर्स: Apple, Tesla, Boeing जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि, जो चीन बाजार में और गहरी पैठ चाहते हैं।

यह टीम दर्शाती है कि ट्रंप न सिर्फ राजनीतिक, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर भी पूरा दबदबा बनाना चाहते हैं।

 ऐतिहासिक संदर्भ: 2017 से 2026 तक का सफर

2017 में ट्रंप की पहली चीन यात्रा "बीजिंग ट्रिप" के नाम से प्रसिद्ध हुई थी, जहां शी जिनपिंग ने भव्य स्वागत किया था। उसके बाद दोनों देशों के बीच संबंध उतार-चढ़ाव भरे रहे। COVID-19, व्यापार युद्ध, ताइवान तनाव और यूक्रेन संकट ने दुनिया को दो खेमों में बांट दिया। लेकिन 2026 में ट्रंप की वापसी अलग माहौल में हो रही है।

अमेरिका में आर्थिक चुनौतियां हैं, जबकि चीन अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और Belt and Road Initiative को आगे बढ़ाने में लगा है। दोनों नेता जानते हैं कि टकराव की बजाय संवाद बेहतर विकल्प है।

प्रमुख मुद्दे जो दुनिया की सांसें रोक रहे हैं

1. ईरान और मध्य पूर्व संकट: ईरान युद्ध ने ऊर्जा कीमतों को प्रभावित किया है। दोनों देश इस पर सहयोग कर सकते हैं।

2. व्यापार और टैरिफ: अमेरिका का चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट कम करना प्रमुख लक्ष्य।

3. ताइवान: अमेरिका के हथियार बिक्री पर चीन का विरोध। संतुलित दृष्टिकोण संभव।

4. AI और टेक्नोलॉजी भविष्य की दौड़ में दोनों देश आगे रहना चाहते हैं।

5. जलवायु और हरित ऊर्जा: सहयोग की गुंजाइश।

चीनी परिप्रेक्ष्य: सम्मान और मजबूत संदेश

चीन ने इस यात्रा को "State Visit-Plus" का दर्जा दिया है। बीजिंग की सड़कें, ग्रैंड हाल ऑफ द पीपल और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस बात के गवाह हैं कि चीन अमेरिका के साथ संबंधों को महत्व देता है, लेकिन अपनी संप्रभुता और "एक चीन" नीति पर कोई समझौता नहीं करेगा। चीनी मीडिया में ट्रंप को "प्रैग्मेटिक लीडर" कहा जा रहा है।

वैश्विक प्रभाव: एशिया-प्रशांत से लेकर यूरोप तक

यह यात्रा सिर्फ द्विपक्षीय नहीं है। पूरी दुनिया देख रही है। भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, यूरोपीय संघ सभी प्रभावित होंगे। अगर ट्रंप-शी डील सफल हुई तो वैश्विक बाजारों में स्थिरता आएगी। विफलता की स्थिति में नई टेंशन खड़ी हो सकती है।

 ट्रंप की व्यक्तिगत शैली: डीलमेकर इन एक्शन

ट्रंप की कूटनीति हमेशा अनोखी रही है। वे ट्वीट्स, व्यक्तिगत रिश्ते और अप्रत्याशित फैसलों के लिए जाने जाते हैं। शी जिनपिंग के साथ उनका केमिस्ट्री पिछले अनुभवों से अच्छा रहा है। दोनों मजबूत राष्ट्रवादी नेता हैं जो अपने देशों को सर्वोच्च रखना चाहते हैं।

बीजिंग पहुंचते ही ट्रंप ने कहा, "यह यात्रा इतिहास रचेगी।" उनकी टीम 24 घंटे काम कर रही है ताकि ठोस परिणाम निकलें।

 सांस्कृतिक पुल: भोजन, कला और परंपराएं

कल का कार्यक्रम सिर्फ मीटिंग नहीं होगा। ट्रंप और उनकी टीम टेम्पल ऑफ हेवन जाएंगे, जहां प्राचीन चीनी सम्राट फसल की कामना करते थे। औपचारिक भोज में चीनी व्यंजनों के साथ अमेरिकी टच भी होगा। यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान दोनों देशों के बीच विश्वास बढ़ाने का माध्यम बनेगा।

 चुनौतियां और उम्मीदें

चुनौतियां कम नहीं हैं। ताइवान पर तनाव, मानवाधिकार, दक्षिण चीन सागर और घरेलू राजनीति दोनों पक्षों को बांधे हुए है। फिर भी, pragmatism की जीत हो सकती है। व्यापारिक समुदाय उम्मीद लगाए बैठा है कि नई डील से निवेश बढ़ेगा।

 निष्कर्ष: नया युग का आरंभ?

ट्रंप की यह बीजिंग यात्रा 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक आयोजनों में से एक साबित हो सकती है। दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अगर एक-दूसरे को समझकर आगे बढ़ें तो पूरी दुनिया को फायदा होगा। "अमेरिका फर्स्ट" और "चीनी सपना" के बीच संतुलन अगर मिल गया तो शांति और समृद्धि का नया दौर शुरू हो सकता है।

दुनिया इस यात्रा के नतीजों का इंतजार कर रही है। क्या ट्रंप फिर से "द ग्रेट डीलमेकर" साबित होंगे? या भू-राजनीतिक तनाव और गहरा जाएगा? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल बीजिंग में इतिहास रचा जा रहा है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-14 May 2026
May 13, 2026

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का भारत दौरा: BRICS मंच पर रणनीतिक संवाद, हार्मुज की सुरक्षा और चाबहार की मजबूती

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का भारत दौरा: BRICS मंच पर रणनीतिक संवाद, हार्मुज की सुरक्षा और चाबहार की मजबूती
-Friday World-14 May 2026
भावनगर यात्रा की संभावना: गुजरात कनेक्शन क्यों महत्वपूर्ण?
“संवाद से स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा से साझा भविष्य” – पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत-ईरान की मजबूत कूटनीति

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची 13 मई 2026 को भारत पहुंच रहे हैं। उनका यह दौरा 14-15 मई को नई दिल्ली में आयोजित BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए है, जो भारत की 2026 BRICS अध्यक्षता की महत्वपूर्ण पूर्व बैठक है। इस यात्रा में द्विपक्षीय और बहुपक्षीय मुद्दों पर गहन चर्चा होने वाली है, जिसमें स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही, चाबहार पोर्ट का विकास, ऊर्जा सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और BRICS के भविष्य जैसे अहम विषय शामिल हैं।

यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि यह अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद अराघची की पहली प्रमुख भारत यात्रा है। दोनों देशों के बीच सदियों पुरानी सभ्यतागत और सांस्कृतिक गहराई को आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदलने का यह मौका है।

 दौरा क्यों महत्वपूर्ण? पृष्ठभूमि और संदर्भ

ईरान 2024 से BRICS का पूर्ण सदस्य है। भारत इस साल BRICS की अध्यक्षता कर रहा है, इसलिए नई दिल्ली बैठक का मेजबान है। अराघची की यात्रा BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक (14-15 मई) का हिस्सा है, जो सितंबर 2026 में होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन की तैयारी है।

पश्चिम एशिया में फरवरी 2026 से शुरू हुए संघर्ष के बाद हार्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ा है। यह जलमार्ग भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है – यहां से भारत के लगभग 40% कच्चे तेल आयात और 90% LPG आयात गुजरता है। संघर्ष के कारण कई भारतीय जहाज फंस गए थे। भारत ने कूटनीतिक प्रयासों से 11 जहाजों को निकाल लिया, लेकिन 13 अभी भी चुनौतीपूर्ण स्थिति में हैं। इसी मुद्दे पर अराघची के साथ विशेष चर्चा होने वाली है।

क्या-क्या होंगी मुख्य बातें?

1. स्ट्रेट ऑफ हार्मुज की सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा 
भारत इस यात्रा में हार्मुज से भारतीय झंडे वाले टैंकरों और जहाजों की सुरक्षित आवाजाही की गारंटी मांगेगा। दोनों देश इस पर द्विपक्षीय वार्ता करेंगे। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुकी हैं, जिसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ईरान से भारत को यह आश्वासन चाहिए कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।

2. चाबहार पोर्ट का विकास
चाबहार भारत की मध्य एशिया पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है। यह पाकिस्तान को बाईपास करने वाला रास्ता भी है। अराघची के साथ चाबहार प्रोजेक्ट की प्रगति, निवेश सुरक्षा और आगे की योजनाओं पर चर्चा होगी। दोनों देश इस पर मजबूती से काम कर रहे हैं, भले ही अमेरिकी प्रतिबंधों का दबाव हो।


3. व्यापार, आर्थिक सहयोग और कनेक्टिविटी
- द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाना  
- ऊर्जा सहयोग (क्रूड ऑयल, LPG)  
- INSTC (International North-South Transport Corridor) को तेज करना  
- फार्मा, आईटी और कृषि क्षेत्रों में नई संभावनाएं  

4. क्षेत्रीय स्थिरता और पश्चिम एशिया संकट 
BRICS मंच पर पश्चिम एशिया की स्थिति, बहुपक्षीय सहयोग, आतंकवाद विरोध और क्षेत्रीय सुरक्षा पर चर्चा होगी। भारत मध्यस्थता की भूमिका निभा सकता है। अराघची विदेश मंत्री एस. जयशंकर से द्विपक्षीय बैठक करेंगे और संभवतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात होगी।

5. BRICS सहयो
BRICS में बहुपक्षीय सुधार, वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करना, सस्टेनेबल डेवलपमेंट और मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर पर विचार-विमर्श। ईरान, भारत, रूस, चीन जैसे देशों के बीच समन्वय बढ़ेगा।

 भारत-ईरान संबंधों का ऐतिहासिक और वर्तमान महत्व

भारत और ईरान के संबंध प्राचीन काल से हैं – सभ्यता, संस्कृति, व्यापार और आध्यात्मिक जुड़ाव। आधुनिक समय में दोनों देश 75 वर्ष पूरे कर चुके हैं।  

- ऊर्जा: ईरान भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है।  

- कनेक्टिविटी: चाबहार पोर्ट अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाता है।  

- BRICS और SCO: दोनों मंचों पर सक्रिय सहयोग।  

- चुनौतियां: अमेरिकी प्रतिबंध, क्षेत्रीय तनाव, लेकिन दोनों देश व्यावहारिक कूटनीति अपनाते रहे हैं।

अराघची की पिछली यात्रा (मई 2025) में 20वें भारत-ईरान संयुक्त आयोग की बैठक हुई थी, जिसमें राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग पर जोर दिया गया।

 संभावित परिणाम और आगे की राह

इस यात्रा से उम्मीद है कि:  
- हार्मुज मुद्दे पर ठोस आश्वासन मिलेगा।  
- चाबहार परियोजना को नई गति मिलेगी।  
- BRICS में सामूहिक रुख मजबूत होगा।  
- द्विपक्षीय व्यापार और निवेश बढ़ेगा।  

भारत की विदेश नीति “सभी के साथ, किसी के विरुद्ध नहीं” पर आधारित है। पश्चिम एशिया के संकट में भारत ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सक्रिय कूटनीति चला रहा है।

 : रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय

अब्बास अराघची का भारत दौरा सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि वैश्विक अनिश्चितता के समय में विश्वसनीय साझेदार की तलाश का प्रतीक है। BRICS मंच पर उभरती शक्तियां मिलकर बहुपक्षीय व्यवस्था को मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।  

भावनगर यात्रा की संभावना: गुजरात कनेक्शन क्यों महत्वपूर्ण?

यदि समय मिला तो अराघची गुजरात के भावनगर का दौरा कर सकते हैं। यह संभावित यात्रा कई कारणों से खास है:

औद्योगिक और व्यापारिक केंद्र: भावनगर गुजरात का प्रमुख औद्योगिक शहर है, जो जहाज निर्माण, रसायन उद्योग, डायमंड पॉलिशिंग और कृषि उत्पादों के लिए जाना जाता है। ईरान के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए यह शहर रणनीतिक महत्व रखता है।

कनेक्टिविटी और लॉजिस्टिक्स: चाबहार पोर्ट से जुड़े माल भावनगर या गुजरात के अन्य बंदरगाहों तक आ सकता है। भावनगर बंदरगाह क्षेत्रीय व्यापार का हिस्सा है। अराघची यहां स्थानीय उद्योगपतियों, व्यापारिक संगठनों और बंदरगाह अधिकारियों से मुलाकात कर सहयोग के नए रास्ते तलाश सकते हैं।

सांस्कृतिक और लोगों का संपर्क: गुजरात में ईरानी मूल के कुछ समुदाय और व्यापारिक संबंध पहले से मौजूद हैं। भावनगर का दौरा लोगों के बीच विश्वास बढ़ाने और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकता है।

भारत और ईरान के बीच विश्वास, व्यावहारिकता और साझा हितों पर आधारित यह संबंध न केवल दोनों देशों के लिए, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए भी महत्वपूर्ण है। हार्मुज की शांति, चाबहार की सफलता और BRICS की एकजुटता – ये तीनों इस यात्रा के प्रमुख स्तंभ हैं।

देवभूमि से लेकर फारस की खाड़ी तक, भारत-ईरान की दोस्ती नई ऊंचाइयों को छूने के लिए तैयार है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-14 May 2026
May 13, 2026

आरएसएस सरकार्यवाह का पाकिस्तान पर संतुलित स्वर: संवाद की खिड़की खुली रखो, लेकिन सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं

आरएसएस सरकार्यवाह का पाकिस्तान पर संतुलित स्वर: संवाद की खिड़की खुली रखो, लेकिन सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं-Friday World-14 May 2026

आतंक का जवाब मजबूती से, बातचीत का रास्ता खुला” – होसबोले का बयान और भारतीय राजनीति का दोहरा मापदंड

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने पाकिस्तान के साथ संबंधों पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान भले ही ‘चुभन’ (pinprick) की तरह बार-बार आतंकी घटनाएं कराए, लेकिन भारत को संवाद के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। कूटनीतिक संबंध, व्यापार, वीजा और खेल गतिविधियां जारी रखनी चाहिए ताकि लोगों के बीच संपर्क बना रहे। उन्होंने जोर दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए भी बातचीत की खिड़की खुली रखनी चाहिए।

यह बयान उन दिनों में आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव चरम पर है। फिर भी, आरएसएस जैसे संगठन के शीर्ष नेता का यह रुख राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।

 होसबोले का पूरा बयान: सुरक्षा और संवाद का दोहरा रास्ता

होसबोले ने पीटीआई को दिए साक्षात्कार में स्पष्ट किया:

- पाकिस्तान पुलवामा जैसे हमलों के पीछे है, इसलिए सुरक्षा बलों को मजबूत जवाब देना चाहिए।
- लेकिन साथ ही, दरवाजे बंद नहीं करने चाहिए। हमेशा संवाद के लिए तैयार रहना चाहिए।
- कूटनीतिक संबंध, व्यापार-वाणिज्य, वीजा जारी रखें।
- खेल आयोजन भी हो सकते हैं।
- लोगों के बीच संपर्क (people-to-people) बढ़ाएं, क्योंकि सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व पर भरोसा नहीं, लेकिन सिविल सोसाइटी, वैज्ञानिक और खिलाड़ी शांति की दिशा में काम कर सकते हैं।

उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा का उदाहरण भी दिया और कहा कि हम एक राष्ट्र थे, सांस्कृतिक संबंध हैं, इन्हें मजबूत करना चाहिए।

यह दृष्टिकोण आरएसएस की पारंपरिक सोच से मेल खाता है – दृढ़ राष्ट्रवाद के साथ व्यावहारिक कूटनीति।

 अगर यही बयान विपक्षी नेता देता तो?

प्रश्न उठता है – अगर यही बात किसी कांग्रेस, सपा, या अन्य विपक्षी नेता ने कही होती तो क्या होता? 

भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य यह है कि मुद्दों पर प्रतिक्रिया अक्सर पक्ष-विपक्ष पर निर्भर करती है, न कि मुद्दे की गुणवत्ता पर। विपक्षी नेताओं के समान बयानों पर भाजपा और समर्थक मीडिया अक्सर तीखी प्रतिक्रिया देते हैं – “देशद्रोही”, “पाकिस्तान प्रेमी”, “राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़” जैसे आरोप लगते हैं। कई बार टीवी डिबेट्स में तूफान खड़ा हो जाता है।

होसबोले के बयान पर कांग्रेस ने तंज कसा कि अगर यह किसी अन्य ने कहा होता तो “भक्त ब्रिगेड और टीवी एंकर” भड़क उठते। Jairam Ramesh ने इसे होसबोले की हालिया अमेरिका यात्रा का प्रभाव बताया।

यह दोहरा मापदंड (double standard) भारतीय लोकतंत्र की कमजोरी है। जब सत्ता पक्ष कहे तो “राष्ट्रीय हित में व्यावहारिकता”, जब विपक्ष कहे तो “नरम रुख”। वास्तविकता यह है कि भारत की पाकिस्तान नीति लंबे समय से “आतंक और बातचीत” का मिश्रण रही है – चाहे कोई भी सरकार हो।

ऐतिहासिक संदर्भ: भारत की पाकिस्तान नीति

- वाजपेयी युग: लाहौर बस यात्रा, अग्नि-वीर, कारगिल युद्ध के बावजूद संवाद।
- मनमोहन सिंह: शांतिपूर्ण संबंधों की कोशिश, लेकिन 26/11 हमले ने सब बर्बाद कर दिया।
- मोदी युग: शुरुआती स्वागत (नवाज शरीफ का शपथ समारोह), फिर सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट, Article 370 के बाद “आतंक खत्म होने तक कोई बात नहीं” की नीति। फिर भी, कुछ मौकों पर बैक-चैनल संवाद और सीजफायर समझौते होते रहे।

कोई भी जिम्मेदार सरकार पूर्ण अलगाव नहीं चाह सकती। पड़ोसी देश से पूर्ण विराम का मतलब क्षेत्रीय अस्थिरता, आर्थिक नुकसान और मानवीय समस्याएं बढ़ना है। लेकिन आतंक पर कोई समझौता भी घातक है।

 होसबोले के सुझाव का महत्व

आरएसएस भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक है। ऐसे में होसबोले का बयान सरकार के लिए संकेत हो सकता है। फायदे:

1. लोगों का संपर्क: सांस्कृतिक, खेल और व्यापार से आम पाकिस्तानी नागरिकों तक पहुंच बनाना।


2. दबाव निर्माण: पाकिस्तान की सिविल सोसाइटी को जिम्मेदारी देना, सेना और ISI पर दबाव।

3. व्यावहारिक कूटनीति: पूर्ण बहिष्कार से पहले विकल्प खुला रखना।


4. आर्थिक लाभ: सीमित व्यापार से दोनों देशों को फायदा।

चुनौतियां:
- पाकिस्तान की सेना और ISI का आतंक निर्यात जारी रखना।
- भारत में आंतरिक सुरक्षा खतरे।
- राजनीतिक विपक्ष का दोहरा मापदंड आरोप।

 राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और मीडिया रोल

अभी तक भाजपा की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जो दर्शाता है कि संगठनात्मक स्तर पर यह बयान आंतरिक चर्चा का विषय हो सकता है। कुछ समर्थक इसे “परिपक्व दृष्टिकोण” बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे “नरम” मान रहे हैं।

विपक्ष इसे “भाजपा-आरएसएस में फूट” या “नीति में बदलाव” बताने की कोशिश कर रहा है। मीडिया में बहस तेज है – कुछ चैनल इसे संतुलित बता रहे हैं, कुछ विवाद बना रहे हैं।

यह भारतीय राजनीति की सच्चाई है। जब सत्ता में हों तो नीति लचीली, विपक्ष में हों तो आलोचना।

 आगे का रास्ता: क्या होना चाहिए?

1. सुरक्षा पहले: आतंक पर जीरो टॉलरेंस। सीमा पर घुसपैठ और प्रॉक्सी वॉर का करारा जवाब।

2. संवाद की खिड़की: बैक-चैनल, ट्रैक-II डिप्लोमेसी, सीमित व्यापार और क्रिकेट जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में संपर्क।

3. आंतरिक एकता: पाकिस्तान नीति पर राजनीतिक दलों में न्यूनतम सहमति विकसित करना।

4. लोगों का रोल: दोनों देशों के नागरिक, कलाकार, व्यापारी और युवा शांति के दूत बनें।

5. मीडिया की जिम्मेदारी: पक्षपात छोड़कर मुद्दे पर वस्तुनिष्ठ बहस।

होसबोले का बयान न तो “पाकिस्तान प्रेम” है और न ही “कमजोरी”। यह व्यावहारिक राष्ट्रवाद का उदाहरण है – जहां सुरक्षा और संवाद साथ-साथ चलते हैं।

 निष्कर्ष: परिपक्व राजनीति की जरूरत

भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है। पाकिस्तान के साथ संबंधों में भावनाओं के साथ-साथ रणनीति भी जरूरी है। आरएसएस सरकार्यवाह का बयान इस बात की याद दिलाता है कि राष्ट्र हित में लचीलापन और दृढ़ता दोनों जरूरी हैं।

अगर विपक्षी नेता यही कहते तो शायद तूफान आ जाता। लेकिन सवाल यह है – क्या हम मुद्दे पर बहस करेंगे या व्यक्ति/पक्ष पर? 

दोहरा मापदंड छोड़कर, राष्ट्रीय सुरक्षा और दीर्घकालिक हित को प्राथमिकता दें। पाकिस्तान समस्या है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान संवाद, दबाव और आंतरिक मजबूती से ही निकलेगा।

“आतंक का मुकाबला, संवाद का रास्ता” – यह फॉर्मूला नया नहीं, लेकिन इसे लागू करने की परिपक्वता भारत को दिखानी होगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-14 May 2026
May 13, 2026

उत्तराखंड के सर्राफा व्यापारियों का शांतिपूर्ण विद्रोह: सोने पर बढ़े शुल्क और पीएम की अपील के खिलाफ मोमबत्ती मार्च सोना नहीं, रोजगार बचाओ” – देवभूमि में ज्वेलर्स का एकजुट आक्रोश

उत्तराखंड के सर्राफा व्यापारियों का शांतिपूर्ण विद्रोह: सोने पर बढ़े शुल्क और पीएम की अपील के खिलाफ मोमबत्ती मार्च सोना नहीं, रोजगार बचाओ” – देवभूमि में ज्वेलर्स का एकजुट आक्रोश
-Friday World-14 May 2016
देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड की पवित्र धरा पर, जहां आस्था और परंपरा सदियों से सोने-चांदी से जुड़ी रही है, वहां सर्राफा व्यापारियों ने एक अनोखा और शांतिपूर्ण विरोध का आह्वान किया है। बढ़े हुए आयात शुल्क और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “एक साल सोना न खरीदें” वाली अपील के खिलाफ 14 मई को प्रदेशभर में मोमबत्ती जलाकर सांकेतिक प्रदर्शन किया जाएगा। राजधानी देहरादून के प्रसिद्ध धामावाला सर्राफा बाजार में शाम 7 बजे व्यापारी एकत्र होकर इस मुद्दे पर अपनी चिंताओं को व्यक्त करेंगे।

यह प्रदर्शन न केवल व्यापारियों की पीड़ा को बयां करेगा, बल्कि पूरे ज्वेलरी उद्योग की आर्थिक हकीकत को राष्ट्रीय पटल पर लाएगा। आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं – इसके कारण, प्रभाव, व्यापारियों की मांगें और भविष्य की संभावनाएं।

 पृष्ठभूमि: क्यों बढ़ा सोने पर शुल्क और क्यों आई अपील?

हाल ही में केंद्र सरकार ने सोने और चांदी के आयात शुल्क को 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया है। इसके साथ ही 5% एग्रीकल्चर इंफ्रा एंड डेवलपमेंट सेस भी लगाया गया, जिससे कुल प्रभावी शुल्क 18% के आसपास पहुंच गया। यह कदम प्रधानमंत्री मोदी की हालिया अपील के ठीक बाद उठाया गया, जिसमें उन्होंने नागरिकों से अपील की थी कि शादियों, त्योहारों या अन्य अवसरों पर एक साल के लिए सोने की खरीदारी टाल दें।

इस अपील का मुख्य कारण वैश्विक परिस्थितियां बताई जा रही हैं – पश्चिम एशिया (ईरान संबंधी) संकट के चलते कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपए पर दबाव और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने की जरूरत। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना आयातक देश है। वित्तीय वर्ष 2026 में सोने के आयात ने रिकॉर्ड $72 बिलियन का आंकड़ा छू लिया। सरकार का मानना है कि गैर-जरूरी सोने के आयात को कम करके विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है, जो जरूरी आयात (कच्चा तेल, उर्वरक आदि) के लिए इस्तेमाल हो।

लेकिन इस नीति का असर जमीनी स्तर पर सर्राफा व्यापारियों और लाखों जुड़े कामगारों पर पड़ रहा है।

 उत्तराखंड में सर्राफा उद्योग की अहमियत

उत्तराखंड में सर्राफा व्यापार सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, नैनीताल, रुड़की और कोटद्वार जैसे शहरों में सैकड़ों सर्राफा दुकानें हैं। हजारों कारीगर, डिजाइनर, विक्रेता और सप्लाई चेन से जुड़े लोग इस उद्योग पर निर्भर हैं।

- रोजगार: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों को रोजगार।
- महिलाओं की भागीदारी: ज्वेलरी खरीदारी मुख्य रूप से महिलाओं से जुड़ी है, लेकिन बिक्री, डिजाइन और हैंडक्राफ्ट में भी बड़ी संख्या में महिलाएं सक्रिय हैं।
- पर्यटन और सांस्कृतिक महत्व: चारधाम यात्रा, कावड़ यात्रा, विवाह सीजन और त्योहारों में सोने-चांदी की मांग बढ़ती है।

व्यापारियों का कहना है कि अचानक शुल्क वृद्धि और अपील से मांग में 30-50% तक की गिरावट आ सकती है। शादी का सीजन करीब है। अगर लोग सोना टाल देंगे तो न केवल दुकानदारों का नुकसान होगा, बल्कि कारीगरों की मजदूरी भी प्रभावित होगी। कई छोटे व्यापारी लॉकडाउन जैसी स्थिति का सामना कर सकते हैं।

 व्यापारियों की चिंताएं और मांगें

उत्तराखंड सर्राफा एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि वे सरकार की चिंताओं का सम्मान करते हैं, लेकिन समाधान मांगते हैं:

1. शुल्क में समीक्षा: अस्थायी बढ़ोतरी को जल्द समाप्त किया जाए।

2. गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को मजबूत करना: घरों में पड़े सोने को अर्थव्यवस्था में लाने के लिए बेहतर योजनाएं।

3. स्थानीय कारीगरों को संरक्षण: आयात पर निर्भरता कम कर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा।

4. राहत पैकेज: छोटे व्यापारियों के लिए लोन, सब्सिडी या टैक्स में छूट।

5. जागरूकता: अपील के बजाय वैकल्पिक निवेश (म्यूचुअल फंड, गोल्ड ETF आदि) को बढ़ावा।

14 मई का प्रदर्शन इन्हीं मांगों को लेकर है। मोमबत्ती जलाकर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना व्यापारियों की परिपक्वता दर्शाता है। वे हिंसा या बंद का रास्ता नहीं चुन रहे, बल्कि संवाद चाहते हैं।

राष्ट्रीय परिदृश्य: अन्य राज्यों में भी विरोध

उत्तर प्रदेश के लखनऊ समेत कई जगहों पर ज्वेलर्स पहले ही प्रदर्शन कर चुके हैं। ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्डस्मिथ फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि मांग कम होने से पूरे उद्योग पर असर पड़ेगा। ज्वेलरी शेयरों में गिरावट देखी गई – टाइटन, कल्याण ज्वेलर्स आदि कंपनियों के शेयर प्रभावित हुए।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अपील का उल्टा असर भी हुआ। कई लोग कीमत बढ़ने से पहले सोना खरीद रहे हैं, जिससे शॉर्ट टर्म में मांग बढ़ी है। लेकिन लंबे समय में नुकसान तय है।

 सोने का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व

भारत में सोना सिर्फ धातु नहीं, बल्कि भावनाओं का प्रतीक है। विवाह में “कन्यादान” के साथ सोना, त्योहारों पर गिफ्टिंग, निवेश के रूप में सुरक्षा – ये सब गहरे जुड़े हैं। अचानक रोक या महंगा करना लाखों परिवारों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

दूसरी ओर, आर्थिक तर्क भी मजबूत है। भारत का करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार को संभालना जरूरी है। सवाल यह है – क्या मांग दबाने के बजाय सप्लाई साइड सुधार (रिकवरी, रिसाइक्लिंग, घरेलू खनन) बेहतर विकल्प नहीं हो सकता?

 उत्तराखंड सरकार की भूमिका

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और राज्य सरकार से व्यापारियों को उम्मीद है कि वे केंद्र के साथ बातचीत करेंगे। उत्तराखंड पर्यटन और छोटे उद्योगों पर निर्भर राज्य है। यहां ज्वेलरी सेक्टर को मजबूत रखना रोजगार सृजन के लिए जरूरी है।

 आगे का रास्ता: संतुलित समाधान की जरूरत

- व्यापारियों के लिए: डिजिटल मार्केटिंग, नए डिजाइन, सिल्वर और डायमंड ज्वेलरी पर फोकस, गोल्ड ETF को प्रमोट करना।
- सरकार के लिए: नीति में लचीलापन, स्कीम्स को प्रभावी बनाना, कारीगरों का कौशल विकास।
- उपभोक्ताओं के लिए: जिम्मेदार खरीदारी – जरूरत के अनुसार, रिसाइकल्ड गोल्ड चुनना।

14 मई का मोमबत्ती प्रदर्शन सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि संवाद का माध्यम है। देवभूमि के शांत स्वभाव वाले व्यापारी उम्मीद करते हैं कि उनकी आवाज सुनी जाएगी।

निष्कर्ष: अर्थव्यवस्था और आस्था का सामंजस्य

सोना भारत की आत्मा है। इसे बचाने की अपील सही हो सकती है, लेकिन अचानक और बिना तैयारी के लागू करने से छोटे उद्योग प्रभावित होते हैं। उत्तराखंड के सर्राफा व्यापारी विकास की राह पर चलते हुए भी अपनी परंपराओं और रोजगार की रक्षा चाहते हैं।

14 मई को धामावाला बाजार में जलने वाली मोमबत्तियां न सिर्फ अंधेरे को दूर करेंगी, बल्कि नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर करेंगी। “सोना नहीं, रोजगार बचाओ” का नारा पूरे देश के ज्वेलर्स की आवाज बन रहा है।

देवभूमि की इस मुहिम को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन मिले, यही कामना है। आर्थिक मजबूती और सांस्कृतिक गरिमा – दोनों साथ चलें, तभी भारत सही मायने में विकसित होगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-14 May 2016
May 13, 2026

क्या अमेरिका-ईरान तनाव दुनिया को नए आर्थिक संकट की आग में झोंक रहा है? भारत की जेब पर पड़ेगा सबसे गहरा वार!

क्या अमेरिका-ईरान तनाव दुनिया को नए आर्थिक संकट की आग में झोंक रहा है? भारत की जेब पर पड़ेगा सबसे गहरा वार!
-Friday World-13 May 2026
दुनिया एक बार फिर से उन पुरानी यादों को जी रही है जब तेल की कीमतें आसमान छूती थीं, महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी थी और वैश्विक अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी थी। मई 2026 के इस महीने में अमेरिका-ईरान तनाव न सिर्फ मध्य पूर्व की सीमाओं तक सिमटा हुआ है, बल्कि इसकी लपटें अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले रही हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज — दुनिया के तेल व्यापार का गला — लगभग बंद पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें $100 से ऊपर घूम रही हैं, और विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर हालात बिगड़े तो यह 2008 या 2022 से भी बदतर आर्थिक संकट साबित हो सकता है।

भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, इस आग से अछूता नहीं रह सकता। पेट्रोल-डीजल की कीमतें अभी नियंत्रित दिख रही हैं, लेकिन सरकारी तेल कंपनियां रोजाना हजारों करोड़ का नुकसान उठा रही हैं। आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ बढ़ रहा है — किराना, ट्रांसपोर्ट, बिजली बिल — सब पर असर। क्या यह सिर्फ शुरुआत है? क्या दुनिया वाकई एक नए आर्थिक संकट की ओर बढ़ रही है? इस विस्तृत विश्लेषण में हम हर पहलू को खोलकर रखेंगे।

 तनाव की जड़ और वर्तमान स्थिति

2026 की शुरुआत में अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ "ऑपरेशन एपिक फ्यूरी" शुरू किया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामenei समेत कई प्रमुख ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान ने जवाबी हमले किए, मिसाइलें दागीं और सबसे खतरनाक कदम उठाया — स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावively ब्लॉक कर दिया। यह जलडमरूमध्य दुनिया के 20% से अधिक समुद्री तेल व्यापार और LNG का रास्ता है।

अप्रैल में दो सप्ताह का सीजफायर हुआ, पाकिस्तान और चीन की मध्यस्थता से, लेकिन मई 2026 तक यह "लाइफ सपोर्ट" पर है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के प्रस्तावों को "गार्बेज" करार दिया है, जबकि डिफेंस सेक्रेटरी ने "एस्केलेशन" की योजना की बात कही है। ईरान भी आक्रामक रुख अपनाए हुए है। नतीजा? मध्य पूर्व के तेल उत्पादन में 10 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक की कमी, जहाजों की आवाजाही ठप, और वैश्विक सप्लाई चेन में अराजकता।

 तेल की कीमतें: आग का सबसे बड़ा गोला

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने के बाद ब्रेंट क्रूड $120-140 प्रति बैरल तक पहुंच गया था। वर्तमान में $100-110 के आसपास है, लेकिन अनिश्चितता बनी हुई है। IEA और EIA के अनुसार, 2026 में ग्लोबल ऑयल सप्लाई में 3.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन की कमी आ सकती है। इन्वेंट्री तेजी से खाली हो रही हैं।

भारत पर सीधा असर:
- भारत अपनी 85% से अधिक तेल जरूरतें आयात करता है, जिसमें मध्य पूर्व का बड़ा हिस्सा है।
- राज्य तेल कंपनियां (IOC, BPCL, HPCL) रोजाना ₹1,000 करोड़ से अधिक का घाटा उठा रही हैं।
- अगर कीमतें ऊंची रहीं तो सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा या फिर पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, जो ट्रांसपोर्ट और खाद्य महंगाई को बढ़ावा देगा।
- रुपया कमजोर हो रहा है, करेंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ सकता है। Morgan Stanley जैसे संस्थानों का अनुमान है कि हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत की GDP ग्रोथ पर 20-30 बेसिस पॉइंट्स का नकारात्मक असर डाल सकती है।

केवल तेल ही नहीं, LNG और यूरिया (खाद) की सप्लाई भी प्रभावित है। किसानों के लिए उर्वरक महंगा होना फसल लागत बढ़ाएगा, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी हो जाएंगी।

 वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता खतरा

यह संकट सिर्फ ऊर्जा तक सीमित नहीं। 

1. महंगाई का तूफान: विकसित देशों में भी इन्फ्लेशन बढ़ेगा। यूरोप और एशिया में 0.5-1% अतिरिक्त महंगाई संभव।

2. स्टॉक मार्केट्स में उथल-पुथल: Nifty50 पहले ही 7% गिर चुका है। अनिश्चितता निवेशकों को डरा रही है।

3. सप्लाई चेन डिसरप्शन: जहाजों की देरी, बीमा दरों में उछाल, एयरलाइंस पर असर (टिकट महंगे)।

4. रिकेशन का खतरा: अगर युद्ध लंबा चला तो ग्लोबल ग्रोथ 1-2% तक घट सकती है। विकासशील देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

5. भू-राजनीतिक प्रभाव: चीन, भारत, जापान जैसे आयातक देशों पर दबाव। रूस और सऊदी जैसे उत्पादक कुछ हद तक फायदे में, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता सबको नुकसान पहुंचाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज जून तक बंद रहा तो कीमतें $150 पार कर सकती हैं, जो 1970 के दशक के ऑयल शॉक की याद दिलाता है। IMF और विश्व बैंक पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ऊर्जा कीमतें वैश्विक रिकवरी को पटरी से उतार सकती हैं।

 भारत की रणनीति: चुनौतियां और अवसर

भारत इस संकट में सतर्क कूटनीति अपना रहा है। ईरान के साथ पुराने संबंध, चाबहार पोर्ट, और रूस-ईरान से सस्ता तेल आयात के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। सरकार ने 60 दिनों का स्टॉक बनाए रखा है, लेकिन लंबे समय तक यह टिकाऊ नहीं।

संभावित उपाय:
- रूस, अमेरिका, सऊदी से आयात बढ़ाना।
- रिन्यूएबल एनर्जी और डोमेस्टिक प्रोडक्शन को तेज करना।
- स्ट्रैटेजिक रिजर्व का स्मार्ट यूज।
- किसानों और आम लोगों के लिए सब्सिडी टारगेटेड रखना।

फिर भी, आम आदमी महसूस कर रहा है — बस किराया बढ़ा, सब्जी-दाल महंगी। मध्यम वर्ग की बचत घट रही है, निवेश प्रभावित हो रहा है।

क्या नया आर्थिक संकट अनिवार्य है?

नहीं, अगर डिप्लोमेसी कामयाब हुई। ट्रंप-ईरान बातचीत जारी है, चीन मध्यस्थता कर रहा है। लेकिन "लाइफ सपोर्ट" वाले सीजफायर में कोई भी गलती बड़े युद्ध में बदल सकती है।

सकारात्मक परिदृश्य: जल्द समझौता, होर्मुज खुला, कीमतें $80-90 पर आ गईं। भारत की ग्रोथ 7%+ पर बनी रही।
नकारात्मक परिदृश्य: युद्ध बढ़ा, कीमतें $150+, रिकेशन, भारत में 5-6% महंगाई, बेरोजगारी बढ़ोतरी।

इतिहास गवाह है — 1973, 1990, 2008, 2022 के संकटों ने दिखाया कि जियो-पॉलिटिक्स अर्थव्यवस्था को कितना हिला सकता है। आज की इंटरकनेक्टेड दुनिया में एक क्षेत्र का आग का धुआं पूरे ग्लोब को प्रभावित करता है।

 निष्कर्ष: सतर्कता और एकजुटता का वक्त

अमेरिका-ईरान तनाव सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का संकट है। भारत जैसे देशों को विविधीकरण, ऊर्जा स्वतंत्रता और सशक्त कूटनीति पर जोर देना होगा। आम लोगों को महंगाई से बचाने के लिए सरकार, उद्योग और नागरिक — सबको मिलकर प्रयास करना पड़ेगा।

दुनिया नए आर्थिक संकट की तरफ बढ़ रही है या नहीं, यह अगले कुछ हफ्तों के फैसलों पर निर्भर करता है। लेकिन एक बात तय है — तेल की हर बूंद की कीमत अब सिर्फ पैसे में नहीं, बल्कि वैश्विक शांति और समृद्धि में है।

समय आ गया है कि हम ऊर्जा दक्षता बढ़ाएं, सौर-विंड को बढ़ावा दें और भू-राजनीतिक जोखिमों से खुद को मजबूत बनाएं। क्योंकि संकट चुनौती भी है और नई शुरुआत का अवसर भी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-13 May 2026