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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Friday, 3 April 2026

April 03, 2026

भावनगर में शहीद रहबरे इंक़िलाब की याद में मजलिस-ए-ताजियत: ईरानी प्रतिनिधि ने भारत की इंसानियत को सलाम किया

भावनगर में शहीद रहबरे इंक़िलाब की याद में मजलिस-ए-ताजियत: ईरानी प्रतिनिधि ने भारत की इंसानियत को सलाम किया
-Friday World-April 3,2026
अप्रैल 3, 2026 को गुजरात के भावनगर शहर में एक ऐसी ऐतिहासिक और भावुक मजलिस-ए-ताजियत का आयोजन हुआ, जिसने शिया मुस्लिम समुदाय के दिलों को गहरी तकलीफ और इज्जत के साथ जोड़ दिया। ईरान के रहबरे इंक़िलाब, शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खामेनेई की शहादत पर आयोजित इस ताजियती मजलिस में ईरान के सर्वोच्च नेता के विशेष दूत आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब की शानदार उपस्थिति रही।

 ईरानी दूतावास से तशरीफ लाए इस महान शख्सियत ने अपनी तकरीर में भारत की धरती को ‘निष्ठा और इंसानियत की भूमि’ करार दिया। 

मजलिस का आगाज़ के पहले मग़रिब की नमाज़ हुई, जिसकी इमामत खुद आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने की। नमाज़ के बाद हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के होल (जनाब का मकान) में खुसूसी ताजियती मजलिस शुरू हुई। इस दौरान वातावरण पूरी तरह से करबला की यादों से भर गया। शहीद खामेनेई की याद में आँखें नम हो गईं और सीनों से सिसकियाँ निकलीं। 

ताजियती नज्म ने माहौल को रोशन किया 

मजलिस में सबसे पहले प्रसिद्ध शायर और नज्म पढ़ने वाले मुहम्मद रजा गोपाल पुरी साहब ने अपनी दिलकश ताजियती नज्म पेश की। उनकी नज्म में शहीद रहबरे इंक़िलाब की सादगी, इंसाफ की लड़ाई और शहादत की कहानी इतनी मार्मिक तरीके से बयान हुई कि हर श्रोता का दिल पिघल गया। नज्म के हर शेर पर “या हुसैन” के नारे गूंजे। गोपाल पुरी साहब की आवाज़ में करबला की गूंज और खामेनेई की शहादत की पीड़ा एक साथ महसूस की जा रही थी। 
नज्म के बाद आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने खास तकरीर फरमाई। अपनी तकरीर में उन्होंने शहीद आयतुल्लाह खामेनेई की शख्सियत, उनके सादा जीवन, मज़लूमों की आवाज़ बनने वाले उनके रोल और अमेरिका-इज़राइल के हमलों के बावजूद अपनी धरती पर डटे रहने की कहानी को बड़े ही प्रभावशाली अंदाज़ में बयान किया। उन्होंने कहा कि खामेनेई साहब ने हमेशा आम लोगों की तरह जीवन जिया। सुरक्षा अधिकारियों के बंकर में जाने के सुझाव को उन्होंने ठुकरा दिया और कहा कि जब तक पूरे ईरान के लोग सुरक्षित नहीं, मैं अकेला कैसे सुरक्षित हो सकता हूँ। 

डॉक्टर हकीम इलाही साहब ने भारत की तारीफ करते हुए कहा, “भारत निष्ठा, मानवता और नैतिक मूल्यों की धरती है। यहां लोग दिल से शोक मना रहे हैं। कोई मजबूरी नहीं, सिर्फ प्यार और सम्मान है।” उन्होंने ईरान-भारत के दोस्ताना रिस्ते सालो पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्तों का भी जिक्र किया और कहा कि शहीद खामेनेई की शहादत पूरे दुनिया के मुसलमानों और मज़लूमों के लिए एक सबक है। उनकी तकरीर में दर्द, इज्जत और उम्मीद का अनोखा मिश्रण था, जिसने पूरे हॉल को भावुक कर दिया। 

 मौलाना वसी हसन खान साहब का खिताब 

तकरीर के बाद मजलिस-ए-ताजियत को आगे बढ़ाते हुए भारत के जाने-माने विद्वान जनाब मौलाना वसी हसन खान साहब ने खिताबात फरमाया। मौलाना साहब ने अपनी मर्मस्पर्शी तकरीर में शहीद खामेनेई की विरासत, इंक़िलाब-ए-इस्लामी के मकसद और आज की दुनिया में मज़लूमों की लड़ाई पर रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि खामेनेई साहब की शहादत किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि इंसाफ और मुस्तजाफीन की आवाज़ की शहादत है। उनकी बातों में गहराई और जज्बा था, जिसने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।

 इस खुसूसी प्रोग्राम में भावनगर के मौलाना तहकीक हुसैन साहब और आस-पास के इलाकों से तशरीफ लाए कई अन्य मौलाना और ज़ाकिरीन की खास हाजिरी रही। सभी ने इस मजलिस को यादगार बनाने में अपना योगदान दिया। हॉल में मौजूद हर शख्स की आँखों में आंसू थे और दिलों में शहीद रहबरे इंक़िलाब के प्रति असीम मोहब्बत और सम्मान था। 

 भारत-ईरान के गहरे रिश्तों का प्रतीक यह मजलिस सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि भारत और ईरान के बीच सदियों पुरानी दोस्ती, साझा सभ्यता और आपसी सम्मान का जीवंत प्रमाण भी थी। आयतुल्लाह डॉक्टर अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब की उपस्थिति ने इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्रदान किया। उन्होंने बार-बार भारत की इंसानियत की तारीफ की और कहा कि भारतीय मुसलमान और आम नागरिक शहीद खामेनेई की याद में जो शोक व्यक्त कर रहे हैं, वह दिल से है। 

भावनगर जैसा छोटा शहर भी इस शोक में शामिल होकर साबित कर रहा है कि मज़लूमों की शहादत की खबर चाहे कितनी दूर हो, दिलों को छू जाती है। हज़रत अब्बास अलैहिस्सलाम के होल में हुई यह मजलिस करबला की यादों को ताज़ा करने वाली और शहीद खामेनेई की विरासत को आगे बढ़ाने वाली साबित हुई। 
शहीद आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खामेनेई की शहादत पर भावनगर की इस ताजियती मजलिस ने एक बार फिर साबित किया कि सच्ची इंसानियत सीमाओं से परे होती है। ईरान के दूत की तकरीर और स्थानीय उलेमा की खिताबात ने पूरे कार्यक्रम को यादगार बना दिया। 

अल्लाह तआला शहीद रहबरे इंक़िलाब की मग़फिरत फरमाए और उनकी शहादत को कबूल फरमाए। उनकी विरासत को दुनिया भर में इंसाफ की लड़ाई जारी रखने की तौफीक अता फरमाए।

भावनगर के शिया भाई-बहनों और ईरानी प्रतिनिधि की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष बना दिया। इंसानियत की इस मिसाल को सलाम!

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 3,2026
April 03, 2026

ईरान का चेतावनी भरा ‘हिट लिस्ट’: खाड़ी के 8 बड़े पुलों पर निशाना, “इट का जवाब पत्थर से” — मध्य पूर्व में तनाव चरम पर

ईरान का चेतावनी भरा ‘हिट लिस्ट’: खाड़ी के 8 बड़े पुलों पर निशाना, “इट का जवाब पत्थर से” — मध्य पूर्व में तनाव चरम पर-Friday World -April 3,2026 

अप्रैल 2026 — मध्य पूर्व में जारी ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष ने एक नया और खतरनाक मोड़ ले लिया है। अमेरिका-इजरायल गठबंधन द्वारा ईरान के उत्तरी शहर करज के पास स्थित B1 ब्रिज (ईरान का सबसे ऊंचा और इंजीनियरिंग का शानदार पुल) पर हमला करने के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई की तैयारी दिखाते हुए खाड़ी देशों और जॉर्डन के 8 प्रमुख पुलों की ‘हिट लिस्ट’ जारी कर दी है। ईरानी मीडिया फार्स न्यूज एजेंसी (IRGC से जुड़ी) ने इस सूची को प्रकाशित करते हुए साफ संकेत दिया कि यह “टिट-फॉर-टैट" (जैसे को तैसा) की नीति का हिस्सा है। 

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिका-इजरायल ने सार्वजनिक स्थानों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले करके साबित कर दिया है कि वे भी आतंकवादी तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब ईरान का जवाब भी उसी भाषा में होगा — “इट का जवाब पत्थर से”। 

 करज का B1 ब्रिज हमला: ईरान पर हमले की नई मिसाल 

2 अप्रैल 2026 को अमेरिकी-इजरायली हमले में करज के पास B1 हाईवे ब्रिज को निशाना बनाया गया। यह पुल तेहरान को पश्चिमी इलाकों से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण लिंक था, जिसकी ऊंचाई 136 मीटर बताई जाती है और इसे मध्य पूर्व का सबसे ऊंचा पुल माना जा रहा था। हमले में कम से कम 8 नागरिकों की मौत हुई और 90 से ज्यादा लोग घायल हुए। कुछ रिपोर्ट्स में अस्पताल और सार्वजनिक स्थानों पर भी हमलों का जिक्र है, जिसे ईरान ने “नागरिक अवसंरचना पर जानबूझकर हमला” करार दिया। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले की जिम्मेदारी ली और सोशल मीडिया पर पुल के गिरने का वीडियो शेयर करते हुए चेतावनी दी कि “और भी बहुत कुछ बाकी है — ब्रिजेस के बाद पावर प्लांट्स”। ईरान का कहना है कि ये हमले न केवल सैन्य, बल्कि नागरिक जीवन को निशाना बनाने वाले हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। 

ईरान की ‘हिट लिस्ट’ — 8 प्रमुख पुल ईरान ने जवाबी रणनीति के तहत निम्नलिखित 8 बड़े और रणनीतिक पुलों को संभावित लक्ष्य के रूप में नामित किया है: 

1. शेख जाबेर अल-अहमद अल-सबाह सी ब्रिज (कुवैत)— लगभग 36-48 किमी लंबा यह समुद्री पुल कुवैत का उत्तरी जीवन रेखा माना जाता है।

 2. शेख जायद ब्रिज (UAE, अबू धाबी) — अबू धाबी को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पुल। 

3. अल मक़्ता ब्रिज (UAE) — अबू धाबी का एक प्रमुख यातायात लिंक, लगभग 300 मीटर लंबा। 

4. शेख खलीफा ब्रिज (UAE)— अबू धाबी क्षेत्र का अहम पुल। 

5. किंग फहद कॉजवे (सऊदी अरब — बहरीन) — 25 किमी लंबा यह कॉजवे दोनों देशों को जोड़ने वाला एकमात्र स्थायी सड़क मार्ग है।

 6. किंग हुसैन ब्रिज (जॉर्डन) — जॉर्डन और वेस्ट बैंक को जोड़ने वाला ऐतिहासिक पुल (80 मीटर)।

 7. दामिया ब्रिज (जॉर्डन) — जॉर्डन-वेस्ट बैंक सीमा पर स्थित। 

8. अब्दौन ब्रिज (जॉर्डन, अम्मान)— जॉर्डन की राजधानी में यातायात का महत्वपूर्ण हिस्सा।

 ये सभी पुल क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, तेल परिवहन, दैनिक आवागमन और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। अगर इनमें से एक भी प्रभावित होता है तो खाड़ी क्षेत्र में यातायात ठप हो सकता है, तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और वैश्विक बाजारों में झटका लग सकता है। 

ईरान का संदेश: प्रतिरोध और न्याय की लड़ाई ईरान के सर्वोच्च नेतृत्व और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का कहना है कि अमेरिका-इजरायल ने “आतंकवादी” तरीके अपनाकर ईरान की जनता पर हमले किए हैं। पुलों और अस्पतालों जैसी नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाना “नैतिक पतन” का प्रमाण है। अब ईरान का जवाब भी उसी स्तर पर होगा।

 ईरानी मीडिया में कहा गया है — “जो हमारी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाएगा, उसकी बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचेगा।” यह सिर्फ सैन्य प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की रणनीति भी है। ईरान पहले ही होर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने और खाड़ी देशों की ऊर्जा सुविधाओं पर हमले की चेतावनी दे चुका है। 

 क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक चिंता यह ‘हिट लिस्ट’ खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) देशों — कुवैत, UAE, सऊदी अरब, बहरीन — और जॉर्डन के लिए बड़ी चेतावनी है। ये देश पहले से ही ईरान के साथ तनावपूर्ण संबंध रखते हैं, लेकिन पूर्ण युद्ध की स्थिति में उनकी अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। 

- कुवैत और UAE: बड़े समुद्री और शहरी पुलों पर खतरा यातायात और व्यापार को ठप कर सकता है।

 - सऊदी-बहरीन: किंग फहद कॉजवे दोनों देशों की एकमात्र सड़क कड़ी है।

 - जॉर्डन: तीन पुलों पर खतरा वेस्ट बैंक और क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करेगा। 

वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें पहले ही बढ़ रही हैं। अगर ये पुल प्रभावित हुए तो आपूर्ति श्रृंखला टूट सकती है, जिसका असर यूरोप, अमेरिका और एशिया पर पड़ेगा। कई विशेषज्ञ इसे “आर्थिक आतंकवाद” का नया रूप बता रहे हैं। 

 क्या है आगे का रास्ता? ईरान की यह चेतावनी स्पष्ट रूप से कह रही है कि वह अब सिर्फ रक्षा नहीं, बल्कि आक्रामक जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार है। ट्रंप प्रशासन की “स्टोन एज” वाली धमकियों के जवाब में ईरान ने साबित किया है कि वह अकेला नहीं है और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर जवाब दे सकता है। 

दुनिया भर के शांति प्रेमी लोग इस बढ़ते तनाव पर चिंता जता रहे हैं। यदि दोनों पक्ष नहीं रुके तो मध्य पूर्व में पूर्ण पैमाने का युद्ध छिड़ सकता है, जिसकी कीमत आम नागरिकों को चुकानी पड़ेगी — चाहे पुल टूटें, अस्पताल प्रभावित हों या तेल की आपूर्ति रुके। 

ईरान का “इट का जवाब पत्थर से” वाला रुख दिखाता है कि संघर्ष अब केवल सैन्य नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था तक पहुंच गया है। खाड़ी के 8 पुलों की हिट लिस्ट एक चेतावनी है — आगे बढ़ने से पहले सोच लो। क्षेत्रीय स्थिरता, मानवीय मूल्यों और वैश्विक अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए तत्काल कूटनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत है।

 “जंग से कभी कोई नहीं जीतता — सिर्फ आम लोग हारते हैं।”

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World -April 3,2026 
April 03, 2026

भारत की सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण: लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई को खिराजे अकीदत

भारत की सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण: लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई को खिराजे अकीदत
-Friday World-April 3,2026
लखनऊ, 1 अप्रैल 2026 — उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ऐतिहासिक छोटा इमामबाड़ा (हुसैनाबाद) में एक भावुक और यादगार मजलिस का आयोजन किया गया। इस मजलिस में ईरान के शहीद रहबर अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई साहब की शहादत पर गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों और समुदायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया, जिसमें हिंदू धर्मगुरु स्वामी सारंग साहब का खमनाई साहब को खिराजे अकीदत पेश करना सबसे चर्चित रहा। ईरानी दूतावास के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब भी इस मौके पर मौजूद रहे और उन्होंने मजलिस को संबोधित किया। 

यह आयोजन न केवल शिया समुदाय की आस्था का प्रतीक था, बल्कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब और धार्मिक सद्भावना का जीवंत उदाहरण भी साबित हुआ। जहां एक तरफ ईरानी संस्कृति और इस्लामी मूल्यों को याद किया गया, वहीं दूसरी तरफ हिंदू संत ने मंच साझा कर साबित किया कि सच्ची आस्था और मानवता की सेवा में कोई धर्म बाधा नहीं बनता। 

 छोटा इमामबाड़ा: इतिहास और पवित्रता का संगम 

लखनऊ का छोटा इमामबाड़ा नवाबी काल की शानदार विरासत है। 19वीं शताब्दी में नवाब मुहम्मद अली शाह द्वारा बनवाया गया यह इमामबाड़ा अपनी अनोखी वास्तुकला, चमकदार कांच की नक्काशी, चांदनी रातों में जगमगाती रोशनी और करबला की याद दिलाने वाले माहौल के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हर साल मुहर्रम के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। इस बार अप्रैल 2026 में यहां आयोजित मजलिस ने इमामबाड़े को एक नया आयाम दिया — जहां शोक और श्रद्धांजलि के साथ-साथ अंतरधार्मिक एकता का संदेश भी गूंजा।

 मजलिस में बड़ी संख्या में शिया भाई-बहन, उलेमा, विद्वान और आम लोग शामिल हुए। माहौल गमगीन लेकिन सम्मानपूर्ण था। नोहे, मरसिये और खिताबात ने पूरे परिसर को भावुक कर दिया। 

 ईरानी दूतावास के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही की उपस्थिति 

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खमनाई साहब के प्रतिनिधि के रूप में डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने मजलिस में शिरकत की। उन्होंने खमनाई साहब की शहादत पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि वे उन आवाम की आवाज थे जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं थी। डॉ. हकीम इलाही ने खमनाई साहब के सिद्धांतों — न्याय, मुजाहिदीन की रक्षा, साम्राज्यवाद विरोध और इस्लामी मूल्यों की रक्षा — को याद किया।

 उन्होंने बताया कि ईरान में चुनौतियों के बावजूद खमनाई साहब की विचारधारा जीवित है और ईरानी राष्ट्र उनकी शहादत के बाद भी मजबूती से आगे बढ़ रहा है। उनकी उपस्थिति ने मजलिस को अंतरराष्ट्रीय महत्व प्रदान किया और भारत-ईरान के सांस्कृतिक व धार्मिक संबंधों को मजबूत करने का संदेश दिया। 

हिंदू धर्मगुरु स्वामी सारंग साहब का भावुक खिराजे अकीदत

 कार्यक्रम का सबसे यादगार पल तब आया जब जनाब स्वामी सारंग साहब (श्री स्वामी सारंग मोहिले जी, ग्लोबल पीस फाउंडेशन के संस्थापक) ने मंच संभाला। गेरुआ वस्त्र में सजे स्वामी जी ने अयातुल्लाह खमनाई साहब को अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की। 

स्वामी सारंग साहब ने कहा कि सच्चे रहबर वह होते हैं जो न केवल अपने समुदाय की रक्षा करते हैं बल्कि पूरी मानवता के लिए न्याय की लड़ाई लड़ते हैं। उन्होंने खमनाई साहब की बहादुरी, उनके दृष्टिकोण और दमितों की आवाज बनने की प्रशंसा की। स्वामी जी की यह भागीदारी भारत की उस परंपरा को मजबूत करती है जिसमें संत-महात्मा हमेशा से सभी धर्मों के दुख-दर्द में शामिल होते रहे हैं। 

स्वामी सारंग साहब पहले भी मुहर्रम की अशूरा जुलूस में शामिल हो चुके हैं और विभिन्न अंतरधार्मिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहते हैं। उनकी यह पहल साबित करती है कि “धर्म मानव सेवा के लिए है, मानव सेवा धर्म के लिए नहीं”। 

 मजलिस का महत्व: सद्भावना का प्रतीक यह मजलिस केवल शोक सभा नहीं थी, बल्कि भारतीय सभ्यता की व्यापकता का प्रमाण थी। यहां हिंदू, मुस्लिम, शिया-सुन्नी सब एक मंच पर खड़े थे। मौलाना कल्बे जवाद साहब जैसे स्थानीय उलेमा ने भी स्वामी सारंग साहब का स्वागत किया और एकता का संदेश दिया। 

कार्यक्रम में “We Stand with Iran” जैसे नारे भी लगे, जो फिलिस्तीन और अन्य न्यायपूर्ण मुद्दों पर ईरान की भूमिका को रेखांकित करते थे। यह आयोजन याद दिलाता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में धार्मिक सहिष्णुता ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है। 

खमनाई साहब की विरासत: न्याय और प्रतिरोध की मिसाल 

अयातुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी खमनाई ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में दशकों तक अपनी राष्ट्र की सेवा करते रहे। उन्होंने इस्लामी क्रांति की रक्षा की, साम्राज्यवादी ताकतों का डटकर मुकाबला किया और गरीब-मजलूम देशों की आवाज बने। उनकी शहादत के बाद भी उनकी विचारधारा दुनिया भर के मुसलमानों और न्यायप्रिय लोगों को प्रेरित कर रही है। 

लखनऊ की यह मजलिस उनकी याद को अमर बनाने का एक छोटा सा प्रयास था। डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब ने कहा कि खमनाई साहब उन लोगों की आवाज थे जिनकी अपनी कोई आवाज नहीं थी — चाहे वह फिलिस्तीन हो, यमन हो या कोई भी दमित क्षेत्र। 

भारत-ईरान संबंधों में नई ऊर्जा भारत और ईरान के बीच प्राचीन सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। चंद्रगुप्त मौर्य काल से लेकर आधुनिक समय तक दोनों देशों ने एक-दूसरे की संस्कृति, कला और दर्शन से प्रेरणा ली है। स्वामी सारंग साहब की उपस्थिति और ईरानी प्रतिनिधि का आना इन संबंधों को नई मजबूती प्रदान करता है।

 यह घटना सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी भारत के विभिन्न समुदाय एकजुट होकर अपनी सहानुभूति जता सकते हैं। 

एकता ही समाधान है लखनऊ के छोटा इमामबाड़ा में आयोजित यह मजलिस सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सद्भावना, सहिष्णुता और मानवता का संदेश था। हिंदू संत द्वारा ईरानी रहबर को श्रद्धांजलि अर्पित करना उन लाखों भारतीयों की भावना को प्रतिबिंबित करता है जो मानते हैं कि सच्ची आस्था सीमाओं से परे होती है।

 स्वामी सारंग साहब, डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही साहब और सभी शामिल उलेमा-मशायख को बधाई। आशा है कि ऐसी पहलें भविष्य में भी जारी रहेंगी और भारत को दुनिया के लिए सद्भावना का संदेश देने में मदद करेंगी। 

“जब धर्म एकता सिखाता है, तब मानवता जीतती है।”

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 3,2026

Thursday, 2 April 2026

April 02, 2026

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को तुरंत रिटायरमेंट लेने का आदेश दिया: ईरान युद्ध के बीच पेंटागन में बड़ा भूचाल

अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को तुरंत रिटायरमेंट लेने का आदेश दिया: ईरान युद्ध के बीच पेंटागन में बड़ा भूचाल
-Friday World-April 3,2026 
ट्रंप प्रशासन की सैन्य नेतृत्व सफाई का नया अध्याय — क्या यह युद्ध की जरूरत है या राजनीतिक purge? 

अमेरिका इन दिनों ईरान के साथ खुला युद्ध लड़ रहा है। मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है, मिसाइल हमले, हवाई हमले और रणनीतिक लक्ष्यों पर लगातार कार्रवाई हो रही है। ठीक इसी संकटपूर्ण समय में अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) ने एक चौंकाने वाला फैसला लिया है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने अमेरिकी सेना के प्रमुख, जनरल रैंडी जॉर्ज को फोन पर तुरंत पद छोड़ने और रिटायरमेंट लेने का आदेश दे दिया। 

पेंटागन ने इस अचानक बदलाव का कोई स्पष्ट आधिकारिक कारण नहीं बताया। सिर्फ इतना कहा गया कि जनरल रैंडी जॉर्ज 41वें आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ के पद से तुरंत प्रभावी रूप से रिटायर हो रहे हैं। पेंटागन के मुख्य प्रवक्ता सीन पार्नेल ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा — “जनरल रैंडी ए. जॉर्ज आर्मी के 41वें चीफ ऑफ स्टाफ के पद से तुरंत रिटायर हो रहे हैं। रक्षा विभाग उनके देश की सेवा के लिए आभारी है। हम उन्हें रिटायरमेंट में शुभकामनाएं देते हैं।” 

यह फैसला न सिर्फ अमेरिकी सैन्य जगत में हलचल मचा रहा है, बल्कि पूरे विश्व में चर्चा का विषय बन गया है। क्योंकि यह बदलाव **ईरान युद्ध** के बीच हो रहा है, जब सेना को मजबूत और स्थिर नेतृत्व की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। 

जनरल रैंडी जॉर्ज कौन थे? जनरल रैंडी एलन जॉर्ज (Randy Alan George) अमेरिकी सेना के एक अनुभवी और सम्मानित अधिकारी थे। उनका जन्म 1 नवंबर 1964 को आयोवा में हुआ था। उन्होंने 1982 में सेना में भर्ती हुई और 1988 में वेस्ट पॉइंट (यूएस मिलिट्री एकेडमी) से इन्फैंट्री अधिकारी के रूप में कमीशन प्राप्त किया। उनकी सेवा का रिकॉर्ड शानदार रहा:

 - खाड़ी युद्ध (Operation Desert Storm) में 101st एयरबोर्न डिवीजन के साथ सक्रिय भूमिका। 

- इराक युद्ध में 173rd एयरबोर्न ब्रिगेड की कमान।

 - अफगानिस्तान युद्ध में 4th ब्रिगेड कॉम्बैट टीम की कमान।

 - पूर्व रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन के सीनियर मिलिट्री असिस्टेंट के रूप में काम। 

- अगस्त 2023 में जो बाइडेन प्रशासन के दौरान वे आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ बने। चार साल का कार्यकाल पूरा करने वाले थे।

 जनरल जॉर्ज ने हाल के वर्षों में आर्मी की भर्ती संकट को सुधारने, सस्ते ड्रोन्स और आधुनिक हथियारों की खरीद को तेज करने जैसी महत्वपूर्ण पहल की थीं। वे युद्ध के मैदान से लेकर पेंटागन की रणनीतिक योजना तक में अनुभव रखते थे। 

पीट हेगसेथ का फैसला: विजन या purge? 

पीट हेगसेथ, जो ट्रंप प्रशासन में रक्षा मंत्री बने, सेना के उच्च स्तर पर बड़े पैमाने पर बदलाव कर रहे हैं। जनरल जॉर्ज का जाना हेगसेथ द्वारा किए गए 12 से ज्यादा उच्च स्तरीय अधिकारियों की बर्खास्तगी का हिस्सा है। सूत्रों के अनुसार, हेगसेथ किसी ऐसे व्यक्ति को आर्मी चीफ बनाना चाहते हैं जो ट्रंप और हेगसेथ के विजन को तेजी से लागू कर सके।

 जनरल जॉर्ज को फोन पर ही यह खबर दी गई, जबकि वे एक मीटिंग में थे। कोई लिखित चेतावनी या कारण नहीं बताया गया। कुछ रिपोर्ट्स में इसे “leadership change” बताया गया है, लेकिन आर्मी के अंदरूनी सूत्रों में गुस्सा और निराशा है। कई सीनियर अधिकारी इसे युद्ध के बीच “अस्थिरता” पैदा करने वाला कदम मान रहे हैं। 

विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप प्रशासन पुराने नेतृत्व को हटाकर अपनी नीतियों — जैसे सेना का आधुनिकीकरण, भर्ती सुधार, और मध्य पूर्व में आक्रामक रुख — को लागू करना चाहता है। लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं — क्या युद्ध के दौरान इतना बड़ा बदलाव सही समय पर है? 

 ईरान युद्ध का संदर्भ: क्यों इतना संवेदनशील समय? 

अप्रैल 2026 तक अमेरिका और इजराइल ईरान के खिलाफ संयुक्त सैन्य अभियान चला रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार: 

- ईरान पर मिसाइल हमले, हवाई हमले और रणनीतिक ठिकानों पर कार्रवाई जारी। 

- ईरान ने जवाबी हमले किए, लेकिन अमेरिका दावा कर रहा है कि उसके रणनीतिक लक्ष्य पूरे हो रहे हैं।

 - क्षेत्र में तेल आपूर्ति, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित हो रही है। 

- ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका “ईरान का काम जल्द खत्म” करेगा और पीछे नहीं हटेगा। 

ऐसे में आर्मी चीफ का अचानक जाना कई सवाल खड़े करता है: 

1. नया नेतृत्व युद्ध की रणनीति को कितनी जल्दी समझ पाएगा? 

2. सेना के मनोबल पर क्या असर पड़ेगा?

 3. क्या यह बदलाव राजनीतिक वफादारी पर आधारित है या वास्तविक सैन्य जरूरत?

 जनरल जॉर्ज के स्थान पर **जनरल क्रिस्टोफर ला नीव** (Gen. Christopher LaNeve) के नाम की चर्चा है, जो पहले हेगसेथ के सीनियर मिलिट्री असिस्टेंट रह चुके हैं। 

 पेंटागन में चल रही सफाई: बड़ा पैटर्न यह पहला मामला नहीं है। हेगसेथ के आने के बाद जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन, नेवी के टॉप एडमिरल, एयर फोर्स के नंबर-2 जनरल और कई अन्य उच्च अधिकारी हटाए जा चुके हैं। ट्रंप प्रशासन इसे “सुधार” बता रहा है, जबकि विपक्ष और कुछ सैन्य विशेषज्ञ इसे “राजनीतिक शुद्धिकरण” (purge) कह रहे हैं। 

ट्रंप के पहले कार्यकाल और अब दूसरे कार्यकाल में सैन्य नेतृत्व पर उनका जोर हमेशा से रहा है — “America First” और मजबूत सेना। लेकिन युद्ध के बीच यह कदम जोखिम भरा माना जा रहा है। 

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

 - कुछ का मानना है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन्स, साइबर और तेज फैसले की जरूरत है। पुराना नेतृत्व शायद इसमें फिट नहीं बैठ रहा था। 

- दूसरे कहते हैं कि युद्ध के समय स्थिरता जरूरी होती है। अचानक बदलाव से कमांड चेन प्रभावित हो सकती है।

 - अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन और रूस इस घटना को अमेरिकी कमजोरी के रूप में प्रचारित कर सकते हैं। 

भारत जैसे देशों के लिए भी इसका महत्व है। अमेरिका-ईरान युद्ध से वैश्विक तेल कीमतें, सुरक्षा और कूटनीति प्रभावित हो रही है। भारत, जो दोनों पक्षों से संतुलित संबंध रखता है, सतर्क नजर रख रहा है। 

आगे क्या? पेंटागन ने अभी नए चीफ की औपचारिक घोषणा नहीं की है। लेकिन जल्द ही सीनेट में नामांकन प्रक्रिया शुरू हो सकती है। जनरल जॉर्ज को उनके लंबे सेवा काल के लिए सम्मान दिया जाएगा, लेकिन सवाल बाकी है — क्या यह बदलाव अमेरिकी सेना को मजबूत बनाएगा या अस्थिरता बढ़ाएगा? 

ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वे “विजनरी लीडरशिप” चाहते हैं जो भविष्य की चुनौतियों — चीन, रूस और मध्य पूर्व — से निपट सके। 

 युद्ध के मैदान में राजनीति? जनरल रैंडी जॉर्ज का अचानक जाना सिर्फ एक पद छोड़ना नहीं है। यह अमेरिकी सैन्य-राजनीतिक संबंधों में बदलाव का प्रतीक है। ईरान युद्ध जैसे संकट में नेतृत्व परिवर्तन हमेशा जोखिम लेता है। इतिहास गवाह है कि युद्ध के दौरान स्थिर कमांड कितनी महत्वपूर्ण होती है।

 ट्रंप और हेगसेथ का मानना है कि पुरानी व्यवस्था को तोड़कर नई ऊर्जा लानी होगी। लेकिन सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं — युद्ध कोई प्रयोगशाला नहीं है। यहां गलती महंगी पड़ सकती है।

 अभी तो पूरा विश्व देख रहा है कि यह बदलाव अमेरिका को कितना मजबूत बनाता है और ईरान युद्ध का रुख कैसे प्रभावित करता है। समय बताएगा कि यह फैसला दूरदर्शी था या जोखिम भरा।

 जनरल रैंडी जॉर्ज को उनके योगदान के लिए धन्यवाद। और नए नेतृत्व से उम्मीद है कि वे सेना और देश दोनों की रक्षा करेंगे।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 3,2026 
April 02, 2026

पेट्रोल के भाव में जबरदस्त उछाल: 101 से सीधा 113! आज आम भारतीय को समृति ईरानी की बहुत याद आ रही है !!

पेट्रोल के भाव में जबरदस्त उछाल: 101 से सीधा 113! आज आम भारतीय को समृति ईरानी की बहुत याद आ रही है !!-Friday World-April 3,2026
जब विपक्ष में थीं तो 20 पैसे की बढ़ोतरी पर सड़क पर उतर आती थीं, आज कहाँ तपस्या कर रही हैं? 

भारत के हर घर में आजकल एक ही चर्चा चल रही है – पेट्रोल की कीमतें। एक समय था जब पेट्रोल ₹80-90 प्रति लीटर के आसपास था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। हाल ही में प्रीमियम पेट्रोल (XP95, XP100 जैसी हाई-ऑक्टेन वैरिएंट) की कीमतों में ₹2 से ₹11 तक की तेज उछाल देखी गई है। कुछ जगहों पर XP100 पेट्रोल ₹149 से बढ़कर ₹160 प्रति लीटर तक पहुंच गया है। आम पेट्रोल की कीमतें स्थिर बताई जा रही हैं (दिल्ली में लगभग ₹94.77), लेकिन प्रीमियम फ्यूल और ग्लोबल तनाव के कारण कुल ईंधन बिल आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है। 

यह उछाल सिर्फ संयोग नहीं है। मध्य पूर्व में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने क्रूड ऑयल की सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल परिवहन प्रभावित होने से वैश्विक कीमतें 20-26% तक उछल गईं। भारत जैसे देश जो 85% से ज्यादा क्रूड आयात करते हैं, इसकी मार सीधे पेट्रोल-डीजल पर पड़ रही है। कुछ रिपोर्ट्स तो यह तक बता रही हैं कि अगर सब कुछ बाजार के हिसाब से होता तो आम पेट्रोल ₹119 और डीजल ₹192 तक जा सकता था, लेकिन सरकार ने आम नागरिकों को सीधा झटका देने से बचने के लिए प्रीमियम वैरिएंट पर फोकस किया। 
फिर भी, सवाल उठता है – आम आदमी का क्या? दोपहिया वाहन, छोटी कारें, ट्रांसपोर्ट, किराना, सब्जी, दूध – हर चीज की कीमत अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ रही है। महंगाई का यह चक्र हर परिवार की बजट को बिगाड़ रहा है। 

 पुरानी यादें ताजा हो रही हैं: समृति ईरानी का 'रोड पर आना' 

2011-2014 के बीच जब समृति ईरानी विपक्ष में थीं, तो ईंधन और एलपीजी की छोटी-छोटी बढ़ोतरी पर वे सड़कों पर उतर आती थीं। ₹50 की एलपीजी बढ़ोतरी पर उनका ट्वीट आज भी वायरल होता है – “50 rupee hike in LPG!!!!! N they call themselves Aam Aadmi ki Sarkar. What a shame!” 

₹5-20 पैसे की बढ़ोतरी पर भी वे प्रदर्शन करती थीं, रोड पर बैठती थीं, आवाज उठाती थीं। कांग्रेस सरकार को “महंगाई की सरकार” कहकर घेरती थीं। युवा कांग्रेस और अन्य विपक्षी कार्यकर्ता आज उसी समृति ईरानी के घर के बाहर प्रदर्शन करते हैं और पूछते हैं – “अब क्यों चुप हैं?”

 आज जब पेट्रोल के प्रीमियम वैरिएंट में ₹2-11 की उछाल आई है, तो सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं – “समृति जी, अब कहाँ हैं? किस गुफा में तपस्या कर रही हैं?” यह व्यंग्य नहीं, बल्कि एक सच्चाई की याद दिलाता है। सत्ता में आने के बाद कई नेताओं का रुख बदल जाता है, लेकिन आम आदमी की पीड़ा वही रहती है। 

क्यों बढ़ रही हैं कीमतें? ग्लोबल और लोकल फैक्टर्स 

1. मध्य पूर्व संकट: ईरान-इजराइल तनाव ने क्रूड ऑयल को $80-100+ प्रति बैरल तक पहुंचा दिया। भारत का क्रूड बास्केट महंगा हो रहा है। 

2. रुपया कमजोर: डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य घटने से आयात महंगा पड़ रहा है। 

3. टैक्स स्ट्रक्चर: पेट्रोल की कीमत में केंद्रीय और राज्य सरकारों के एक्साइज ड्यूटी, VAT आदि का बड़ा हिस्सा है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जाता है, लेकिन आम आदमी को राहत नहीं मिलती।

 4. प्रीमियम फ्यूल का फोकस: सरकार कह रही है कि सिर्फ 2-5% लोग प्रीमियम पेट्रोल इस्तेमाल करते हैं, इसलिए आम आदमी पर असर कम है। लेकिन अप्रत्यक्ष प्रभाव – ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ना, सामान महंगा होना – हर किसी को छू रहा है। 

पेट्रोलियम मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि रेगुलर पेट्रोल-डीजल की कीमतें नहीं बढ़ीं, लेकिन अंडर-रिकवरी (₹24 प्रति लीटर पेट्रोल पर) बढ़ रही है। यानी भविष्य में और दबाव बन सकता है। 

 आम भारतीय की पीड़ा: एक सच्ची कहानी

 कल्पना कीजिए एक मध्यमवर्गीय परिवार। पिता ऑफिस जाते हैं, बेटा कॉलेज, मां सब्जी मंडी। पेट्रोल महंगा होने से ऑटो-रिक्शा, बस, टैक्सी का किराया बढ़ जाता है। दूधवाला, सब्जीवाला अपना खर्चा बढ़ा देते हैं। महीने के अंत में बजट बिगड़ जाता है। छोटे व्यापारी तो और भी परेशान – उनकी डिलीवरी वैन का खर्चा बढ़ने से प्रॉफिट मार्जिन घटता है।

 एक समय था जब विपक्षी नेता कहते थे – “पेट्रोल ₹100 पार कर गया तो सरकार गिरा देंगे।” आज ₹100+ के आसपास पहुंच चुका है (मुंबई में ₹103+), लेकिन कोई सड़क पर नहीं उतर रहा। विपक्ष अब सत्ता पक्ष को घेर रहा है, और सत्ता पक्ष कह रहा है – “ग्लोबल फैक्टर है, हम कंट्रोल कर रहे हैं।” 

राजनीति vs वास्तविकता

 यह मुद्दा सिर्फ समृति ईरानी तक सीमित नहीं है। यह हर उस नेता की याद दिलाता है जो विपक्ष में रहते हुए महंगाई पर रोता है और सत्ता में आकर चुप हो जाता है। लोकतंत्र में जवाबदेही जरूरी है। जनता पूछ रही है: 

- 20 पैसे पर सड़क पर उतरने वाली आवाज अब क्यों गायब है?

 - क्या सत्ता में आने के बाद आम आदमी की पीड़ा भूल जाती है? 

- क्या प्रीमियम फ्यूल पर बढ़ोतरी “कोई बड़ी बात नहीं” है, जबकि हर चीज की कीमत बढ़ रही है?

 सरकार का दावा है कि महंगाई कंट्रोल में है, लेकिन ग्राउंड रियलिटी अलग कहानी बयां कर रही है। एलपीजी सिलेंडर भी महंगा हो चुका है। कई जगहों पर व्यावसायिक सिलेंडर में ₹195+ की बढ़ोतरी की खबरें हैं। 

 क्या समाधान हो सकता है? 

- लंबी अवधि की योजना: घरेलू तेल उत्पादन बढ़ाना, रिन्यूएबल एनर्जी (इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर) पर जोर।

 - टैक्स रेशनलाइजेशन: पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम करके आम आदमी को राहत। 

- सब्सिडी टारगेटेड: गरीबों और जरूरतमंदों के लिए सीधा लाभ हस्तांतरण।

 - वैश्विक कूटनीति: मध्य पूर्व में स्थिरता के लिए भारत की भूमिका बढ़ाना।

 लेकिन फिलहाल आम नागरिक को इंतजार है – कीमतें कब स्थिर होंगी? 

 याद रखिए, जनता सबसे बड़ी ताकत है 

पेट्रोल के भाव में यह उछाल सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। यह हर उस परिवार की कहानी है जो महंगाई से जूझ रहा है। समृति ईरानी या कोई भी नेता हो, जब वे विपक्ष में थे तो सड़क पर उतरते थे। आज सत्ता पक्ष में हैं तो चुप हैं। यह राजनीति का चक्र है, लेकिन आम भारतीय इस चक्र से बाहर निकलना चाहता है। 

आज हर भारतीय को समृति ईरानी की याद इसलिए आ रही है क्योंकि वे पुरानी तस्वीरें दिखा रहे हैं – सड़क पर बैठी हुई, नारेबाजी करती हुई। आज उसी ऊर्जा की जरूरत है – चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष। महंगाई किसी की नहीं सुनती, वह हर घर में घुस जाती है।

 जनता अब जाग चुकी है। सोशल मीडिया पर चर्चाएं तेज हैं। अगले चुनावों में यह मुद्दा जरूर उठेगा। तब तक, हर नागरिक को अपनी आवाज उठानी चाहिए – शांतिपूर्ण तरीके से, लेकिन मजबूती से। क्योंकि आखिरकार, लोकतंत्र में असली ताकत जनता के हाथ में है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 3,2026
April 02, 2026

ईरान की अनदेखी ताकत: पाबंदियों की आग में तपकर निकली शिक्षा और विज्ञान की चिंगारी

ईरान की अनदेखी ताकत: पाबंदियों की आग में तपकर निकली शिक्षा और विज्ञान की चिंगारी
-Friday World-April 3,3026
दुनिया हैरान है। ईरान, जिसे दशकों से आर्थिक पाबंदियों, सैन्य दबाव और राजनीतिक अलगाव का सामना करना पड़ा, आज अमेरिका जैसी महाशक्ति के सामने न केवल टिका हुआ है बल्कि लगातार चुनौती दे रहा है। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी अड्डों पर उसके घातक ड्रोन और मिसाइल हमले ने साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों के बावजूद उसकी रणनीतिक क्षमता को कम आंकना गलती थी। अमेरिकी राष्ट्रपति की धमकियाँ अब बेबसी की आवाज़ लगती हैं। सवाल उठता है—पचास साल की सख्त पाबंदियों के बावजूद ईरान ने यह हौसला, यह तकनीक और यह लचीलापन कहाँ से पाया? 

जवाब सरल लेकिन गहरा है। दुनिया ने ईरान को सिर्फ़ इस्लामी शासन, मुल्लाओं के प्रभाव, महिलाओं पर पर्दा और सख्त सामाजिक नियमों की नज़र से देखा। लेकिन किसी ने गौर नहीं किया कि इसी दौरान ईरान शिक्षा, अनुसंधान और विज्ञान के क्षेत्र में चुपचाप एक क्रांति कर रहा था। पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी बराबरी से, बल्कि कई क्षेत्रों में आगे बढ़कर उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं। यही शिक्षा और रिसर्च की नींव है, जिसने ईरान को स्वदेशी ड्रोन, मिसाइल और रक्षा प्रौद्योगिकी का हथियार दिया। 
शिक्षा में क्रांति: साक्षरता से विश्वस्तरीय अनुसंधान तक ईरान की शिक्षा व्यवस्था की कहानी 1979 की क्रांति के बाद की है। तब महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 35-40% के आसपास थी। लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। युवा महिलाओं (15-24 वर्ष) की साक्षरता दर लगभग 99% तक पहुँच गई है, जो विश्व के कई विकसित देशों से बेहतर है। कुल वयस्क साक्षरता दर 88-90% के आसपास है, जबकि युवा पीढ़ी में यह लगभग सार्वभौमिक स्तर पर है। 

विश्व बैंक और यूनेस्को के आँकड़ों के अनुसार, ईरान में विश्वविद्यालयों में महिलाओं की भागीदारी 50-60% से अधिक है। कई वर्षों में यह 55-60% तक रही। चिकित्सा विज्ञान, बेसिक साइंस और ह्यूमैनिटीज़ जैसे क्षेत्रों में महिलाएँ 60-70% तक छात्राएँ हैं। यहां तक कि कुछ रिपोर्टों में STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मैथमेटिक्स) क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी 35-50% तक बताई जाती है, जो अमेरिका (करीब 12-13%) से कहीं अधिक है।

 यह प्रगति संयोग नहीं है। ईरान सरकार ने शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर लड़कियों की नामांकन दर में भारी वृद्धि हुई। विश्वविद्यालयों में महिलाओं की संख्या 1990 के दशक से कई गुना बढ़ी। आज ईरान में लाखों महिलाएँ डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक और रिसर्चर के रूप में काम कर रही हैं। हालांकि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी अभी भी कम (20% के आसपास) है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में वे पुरुषों से आगे निकल चुकी हैं। यह "ओवर-एजुकेटेड" महिलाओं की पीढ़ी है, जो घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ बौद्धिक योगदान दे रही है। 

ईरान की शिक्षा प्रणाली ने मात्र साक्षरता नहीं बढ़ाई, बल्कि गुणवत्ता भी दी। अंतरराष्ट्रीय ओलंपियाड में ईरानी छात्रों ने 2024 में खगोल विज्ञान, जीव विज्ञान, भौतिकी आदि में शानदार प्रदर्शन किया। देश ने STEM शिक्षा पर भारी निवेश किया, जिसका फल आज उसके रक्षा कार्यक्रमों में दिख रहा है। 

 रिसर्च और विज्ञान में अनदेखी उड़ान पाबंदियों के बावजूद ईरान ने रिसर्च आउटपुट में जबरदस्त प्रगति की। SCImago, Web of Science और Nature Index जैसे सूचकों के अनुसार, ईरान नैनोटेक्नोलॉजी में विश्व के शीर्ष 4-6 देशों में शामिल है। आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क्स में 6वाँ स्थान, इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में 7वाँ, एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में 8वाँ और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में 9वाँ स्थान—ये आंकड़े बताते हैं कि ईरान सिर्फ़ हथियार नहीं, बल्कि मूल प्रौद्योगिकी विकसित कर रहा है। 

नैनोटेक्नोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, एनर्जी इंजीनियरिंग और एनालिटिकल केमिस्ट्री जैसे क्षेत्रों में ईरान की वैज्ञानिक प्रकाशन संख्या विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी है। पाबंदियों ने ईरान को मजबूर किया कि वह आयात पर निर्भर न रहे। परिणामस्वरूप रिवर्स इंजीनियरिंग, स्वदेशी नवाचार और विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग बढ़ा। ईरानी विश्वविद्यालय अब मिसाइल इंजन, ड्रोन सामग्री और स्मार्ट सिस्टम के विकास के केंद्र बन चुके हैं। 

ईरान के ड्रोन और मिसाइल कार्यक्रम इसी शिक्षा-रिसर्च इकोसिस्टम का उत्पाद हैं। शाहेद-136 जैसे कम लागत वाले लंबी दूरी के ड्रोन ने दुनिया को चौंकाया। ये ड्रोन AI, नैनो-मटेरियल्स और एडवांस्ड इंजीनियरिंग का मिश्रण हैं। पाबंदियों के कारण पारंपरिक हवाई शक्ति कमजोर होने पर ईरान ने असममित युद्ध की रणनीति अपनाई—सस्ते, स्वदेशी और बड़े पैमाने पर उत्पादित ड्रोन और मिसाइल। विश्वविद्यालयों से निकले इंजीनियरों ने इन्हें विकसित किया। आज ईरान के पास हजारों ऐसे ड्रोन हैं, जो महंगे एयर डिफेंस सिस्टम (जैसे पैट्रियट या THAAD) को थका सकते हैं।

 यह तकनीक सिर्फ़ प्रतिलिपि नहीं, बल्कि नवाचार है। ईरान ने सॉलिड फ्यूल मिसाइल, प्रिसीजन गाइडेंस और स्वायत्त ड्रोन सिस्टम में प्रगति की। पाबंदियों ने "सेल्फ-रिलायंस" को मजबूत किया। विदेशी पार्ट्स की कमी में भी वे स्थानीय सामग्री और डिज़ाइन इस्तेमाल करते हैं। 

 महिलाएँ: शिक्षा की असली ताकत ईरान की कहानी में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है। वे न केवल छात्राओं के रूप में आगे हैं, बल्कि रिसर्च प्रोजेक्ट्स, प्रकाशनों और यहां तक कि उच्च पदों पर भी योगदान दे रही हैं। 2000 के दशक में महिलाओं की विश्वविद्यालय नामांकन दर 58% तक पहुँची। आज कई क्षेत्रों में वे पुरुषों से अधिक हैं। 

यह प्रगति सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में प्रतिबंध हैं, लेकिन शिक्षा के द्वार महिलाओं के लिए खुले रहे। परिणामस्वरूप ईरान की वैज्ञानिक कार्यबल में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ी। वे नैनो-मटेरियल्स, एयरोस्पेस और मेडिकल रिसर्च में सक्रिय हैं। शिक्षा ने महिलाओं को आत्मनिर्भर और बौद्धिक रूप से सशक्त बनाया, जो देश की समग्र ताकत बनी। 

पाबंदियाँ बन गईं अवसर पचास साल की पाबंदियाँ ईरान के लिए अभिशाप नहीं, बल्कि उत्प्रेरक साबित हुईं। जब आयात बंद हुए, तो ईरान ने घरेलू क्षमता विकसित की। शिक्षा पर निवेश बढ़ाया गया। युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन मिला। आज ईरान का मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम इस आत्मनिर्भरता का प्रमाण है। यह दर्शाता है कि तकनीकी प्रगति हमेशा धन या खुले बाज़ार पर निर्भर नहीं होती—इच्छाशक्ति, शिक्षा और रणनीतिक फोकस पर होती है। 

दुनिया ने ईरान को सतही नज़र से देखा। "मुल्लाओं का देश" कहकर उसके बौद्धिक विकास को नजरअंदाज किया। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान की सच्ची ताकत उसके विश्वविद्यालयों, लैबोरेटरियों और शिक्षित युवाओं—खासकर महिलाओं—में है। वे ही ड्रोन के इंजन डिज़ाइन कर रहे हैं, मिसाइलों की सटीकता बढ़ा रहे हैं और देश को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में टिकाए हुए हैं। 

 सच्ची ताकत शिक्षा में छिपी है ईरान की कहानी सबक देती है—कोई भी देश कितनी भी पाबंदियाँ झेले, अगर उसकी नींव शिक्षा और अनुसंधान पर मजबूत हो, तो वह अजेय हो सकता है। अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता के सामने ईरान का टिकना इसीलिए संभव हुआ क्योंकि उसने दशकों से युवाओं—मर्द और औरत दोनों—को ज्ञान का हथियार दिया। 

भविष्य में अगर ईरान को समझना है, तो सिर्फ़ उसके शासन या सैन्य क्षमता को नहीं, बल्कि उसके कैंपस, लैब और महिलाओं की किताबों को देखना होगा। यही वह अनदेखी ताकत है, जिसने पूरी दुनिया को अचंभित कर रखा है।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 3,3026
April 02, 2026

US F-15 Fighter Jet vs Iran's Shahed Drone: Thrilling 'Dogfight' Video Goes Viral Over Northern Iraq Skies – But the Low-Cost Drone Outsmarts the Million-Dollar Jet!

US F-15 Fighter Jet vs Iran's Shahed Drone: Thrilling 'Dogfight' Video Goes Viral Over Northern Iraq Skies – But the Low-Cost Drone Outsmarts the Million-Dollar Jet!
-Friday World – April 3, 2026
A dramatic video has emerged from the tense Middle East conflict, capturing a high-stakes aerial pursuit in the skies over northern Iraq. In the footage, a US Air Force F-15 fighter jet is seen desperately chasing an Iranian Shahed-136 drone. The clip, which has gone massively viral on social media, highlights the challenges of modern asymmetric warfare. 

 The video shows the sleek, high-speed F-15 Eagle maneuvering sharply – banking hard turns, changing altitudes rapidly, and attempting to visually track the elusive drone. However, the Shahed drone demonstrates remarkable agility for its design. It repeatedly slows down, drops to very low altitudes, and forces the F-15 to overshoot its position. The scene resembles a Formula-1 supercar trying to catch a tiny fly – the jet’s superior speed and power ironically become a disadvantage against the slow, nimble, low-flying drone. 

 In the end, the F-15 pilot is forced to descend from safer altitudes in a bid to engage, but by then it is too late. The Shahed drone successfully evades interception and strikes its target: a British-owned Castrol engine oil storage facility near Erbil. Moments after the chase, powerful explosions rock the site, sending thick black plumes of smoke billowing into the sky. The F-15 continues circling overhead, but the damage has already been done. 

Shahed Drone’s Smart Tactics Outwit the F-15

 This incident is reported to have occurred around April 1-2, 2026. The video, widely shared by Iran-aligned channels and accounts, claims that at least two Shahed-136 drones evaded the US F-15. Each drone costs roughly $20,000, while the F-15 is valued at approximately $80–90 million (some viral posts even cite a lower operational figure of around $1 million per sortie, but the aircraft’s full cost remains significantly higher). 

The F-15 Eagle is one of the US Air Force’s most reliable air superiority fighters, designed primarily for high-speed dogfights and dominating the skies against peer adversaries. Yet, against low-speed, low-altitude “kamikaze” drones like the Shahed, it faces serious limitations. The drone’s small size, ability to fly nap-of-the-earth (very close to the ground), and variable speed make radar tracking and visual acquisition extremely difficult. 

The New Face of Modern Warfare: Cheap Drones vs Expensive Jets

This event perfectly illustrates asymmetric warfare. While the United States and its allies invest heavily in advanced fighter jets and sophisticated air defense systems, adversaries like Iran employ swarm tactics using hundreds of inexpensive drones to overwhelm and saturate defenses. 

 Key cost comparison: 

- F-15 Fighter Jet: Estimated $80–90 million per unit. 

- Shahed-136 Drone: Approximately $20,000 to $50,000 per unit. 

 If even one high-value jet struggles to neutralize a single low-cost drone, the economic and operational burden on air defense becomes enormous when facing mass drone attacks. A similar pattern has been observed in the Ukraine conflict, where Russia’s Geran-2 (the Russian version of the Shahed) has been used extensively to challenge expensive air defenses. 

Shahed-136: Iran’s Deadly and Affordable Weapon

 The Shahed-136*म is Iran’s well-known one-way attack (kamikaze) drone, publicly unveiled in 2021. Its key features include: 

- Design: Delta-wing configuration with a rear pusher propeller and MD-550 piston engine.

 - Navigation*म: GPS combined with inertial navigation system. 

- Range: Hundreds of kilometers, enabling long-endurance flights. 

- Tactics: Flies at low altitudes to evade radar detection and crashes into the target to detonate its warhead. 

- Usage: Widely supplied to Russia for operations in Ukraine; also employed by Iranian-backed groups in the Middle East. 

 These drones are primarily used to target energy infrastructure, military bases, and critical facilities. The strike on the Castrol oil depot near Erbil underscores how such attacks can escalate regional tensions involving Iran, the US, Israel, and local actors in Iraq’s Kurdistan region. 

Video Authenticity and Reactions

 As of now, the US military or Central Command (CENTCOM) has not officially confirmed the video or the details of the interception attempt. The footage appears to originate from ground observers near Erbil, with shaky camera work as the person filming struggles to keep up with the high-speed action in the sky. 

 Some analysts suggest the F-15 may have eventually engaged and destroyed the drone after the video ended, while others point out that multiple drones were involved – some intercepted, others successfully hitting the target. 

Nevertheless, the clip has reignited global debate on the future of air power. Experts argue that tomorrow’s battlefields will require advanced counter-drone technologies, laser-based defense systems, AI-driven interception, and drone swarms rather than relying solely on traditional manned fighter jets. 

The Evolving Nature of War

This viral incident serves as a stark reminder that technological superiority is not limited to expensive platforms. Affordable, smart, and mass-produced systems like the Shahed drone can pose serious challenges to even the most advanced conventional military forces. 

In the ongoing Middle East tensions, such videos not only provide thrilling visuals but also force strategists worldwide to rethink air defense doctrines and the balance between high-end assets and low-cost asymmetric threats. 

What do you think about this viral video? Have you watched the full clip? How do you see the role of drones reshaping modern warfare? Share your views in the comments below. 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World – April 3, 2026