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February 06, 2026
पंडित मोतीलाल नेहरू: स्वतंत्रता संग्राम के 'राजकुमार' और संवैधानिक क्रांति के पुरोधा
पंडित मोतीलाल नेहरू: स्वतंत्रता संग्राम के 'राजकुमार' और संवैधानिक क्रांति के पुरोधा
-Friday world 6/2/2026
लखनऊ, 6 फरवरी – आज का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान योद्धा, पंडित मोतीलाल नेहरू की पुण्यतिथि है। 6 फरवरी 1931 को लखनऊ में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है – एक ऐसे नेता की, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सामने संवैधानिक हथियार उठाया, स्वराज पार्टी की नींव रखी और नेहरू-गांधी परिवार की राजनीतिक परंपरा की शुरुआत की।
जन्म और प्रारंभिक जीवन: कश्मीरी पंडितों की शानदार विरासत पंडित मोतीलाल नेहरू का जन्म 6 मई 1861 को आगरा (तत्कालीन उत्तर-पश्चिमी प्रांत, अब उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता गंगाधर नेहरू का निधन उनके जन्म से पहले ही हो गया था। कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्लुक रखने वाले मोतीलाल ने कानून की पढ़ाई की और इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में एक सफल वकील बन गए। वे ब्रिटिश भारत के सबसे अमीर और प्रभावशाली बैरिस्टरों में से एक थे – आनंद भवन जैसा शानदार घर, लग्जरी जीवनशैली और यूरोपीय अंदाज। लेकिन 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया।
वे महात्मा गांधी के प्रभाव में आए और घरेलू विलासिता छोड़कर खादी अपनाई। आनंद भवन को स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र बना दिया। मोतीलाल ने कहा था, "मैंने अपनी संपत्ति और आराम छोड़ दिया है, क्योंकि अब देश की आजादी से बड़ा कुछ नहीं।"
स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान: स्वराज पार्टी से नेहरू रिपोर्ट तक मोतीलाल नेहरू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष चुने गए – 1919 (अमृतसर अधिवेशन) और 1928 (कलकत्ता अधिवेशन)। उन्होंने 1923 में चित्तरंजन दास के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की स्थापना की, जिसका उद्देश्य विधानसभाओं में प्रवेश कर ब्रिटिश शासन को अंदर से चुनौती देना था।
सबसे महत्वपूर्ण योगदान था 1928 का नेहरू रिपोर्ट। साइमन कमीशन के विरोध में ऑल पार्टीज कॉन्फ्रेंस ने मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई, जिसमें जवाहरलाल नेहरू (सचिव), तेज बहादुर सप्रू, सुभाष चंद्र बोस जैसे दिग्गज शामिल थे। इस रिपोर्ट ने भारत के लिए डोमिनियन स्टेटस की मांग की, जिसमें शामिल थे:
- संसदीय शासन प्रणाली
- द्विसदनीय विधायिका (सेंट्रल लेजिस्लेचर में सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स)
- जॉइंट इलेक्टोरेट (सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्रों का विरोध)
- मौलिक अधिकारों की गारंटी
- राज्य धर्म का विरोध और समान नागरिक अधिकार
यह रिपोर्ट भारतीय इतिहास में पहली बार स्वदेशी संविधान का ड्राफ्ट था – जो बाद में 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट और 1950 के भारतीय संविधान की नींव बनी। हालांकि मुस्लिम लीग ने कुछ मांगों पर असहमति जताई, लेकिन यह रिपोर्ट भारतीय एकता और संवैधानिक लड़ाई का प्रतीक बनी।
गांधीजी के साथ संघर्ष और बलिदान 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान मोतीलाल नेहरू गिरफ्तार हुए। जेल में उनकी तबीयत बिगड़ी, लेकिन रिहाई के बाद भी वे सक्रिय रहे। उनके अंतिम दिनों में बेटे **जवाहरलाल नेहरू** और महात्मा गांधी उनके साथ थे। लंबी बीमारी के बाद 6 फरवरी 1931 को 69 वर्ष की आयु में लखनऊ में उनका निधन हो गया।
परिवार और विरासत: एक राजनीतिक वंश की शुरुआत मोतीलाल नेहरू के तीन ओलाद थी – जवाहरलाल नेहरू (भारत के प्रथम प्रधानमंत्री), विजयलक्ष्मी पंडित (संयुक्त राष्ट्र महासभा की पहली महिला अध्यक्ष) और कृष्णा हठीसिंग। उनकी पोती इंदिरा गांधी, परपोते राजीव गांधी और आज के दौर में राहुल गांधी तक यह विरासत जारी है।
श्रद्धांजलि आज, जब उनकी पुण्यतिथि हैं, हमें याद आता है एक ऐसे नेता का जो वकील थे, क्रांतिकारी थे, पिता थे और सबसे बढ़कर – राष्ट्रभक्त थे। पंडित मोतीलाल नेहरू ने दिखाया कि संवैधानिक संघर्ष भी स्वतंत्रता का हथियार हो सकता है। उनकी रिपोर्ट ने भारत को एक संविधानिक ढांचा दिया, जिसकी बदौलत आज हम लोकतंत्र का गौरव महसूस करते हैं। "उनकी स्मृति में – एक ऐसे पुरुष को जो राजकुमारों जैसा जीवन जीया, लेकिन देश के लिए साधारण से साधारण बन गया।"
भारत माता के इस महान सपूत को कोटि-कोटि नमन। उनकी आत्मा को शांति और हमें उनकी राह पर चलने की प्रेरणा मिले। जय हिंद! जय भारत!
Sajjadali Nayani ✍
Friday world 6/2/2026