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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 20 September 2026

September 20, 2026

लाल सागर में हूतियों का कहर, सऊदी की गुहार पर एक्शन में आया चीन - बीजिंग ने तेहरान को दी चेतावनी, मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट!

लाल सागर में हूतियों का कहर, सऊदी की गुहार पर एक्शन में आया चीन - बीजिंग ने तेहरान को दी चेतावनी, मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट!
- Friday World September 20,2026 
नई दिल्ली - मिडिल ईस्ट का समीकरण एक बार फिर तेजी से बदल रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों ने लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में जिस तरह से अपनी पकड़ मजबूत की है, उसने सऊदी अरब समेत पूरी दुनिया की टेंशन बढ़ा दी है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि सऊदी अरब को हूतियों से निपटने के लिए अब अमेरिका नहीं, बल्कि चीन का दरवाजा खटखटाना पड़ा है।

खबरों के मुताबिक, रियाद ने बीजिंग से निजी तौर पर अनुरोध किया है कि वह हूतियों को कंट्रोल करने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे। सऊदी का डर साफ है - एक तरफ हूती लाल सागर में उसके तेल टैंकरों और ग्लोबल शिपिंग को निशाना बना रहे हैं, दूसरी तरफ होर्मुज स्ट्रेट में ईरान पहले से ही शिपिंग रूट में अड़ंगा डाल रहा है।

सऊदी ने चीन को क्यों चुना?

यह सवाल सबसे बड़ा है। दरअसल, सऊदी अरब अच्छी तरह जानता है कि हूतियों की डोर सीधे तेहरान से जुड़ी है। ईरान ही हूतियों का सबसे बड़ा समर्थक है। और ईरान को अगर कोई समझा सकता है, तो वो है चीन।

चीन ईरान का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और ईरान के कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार भी है। बीते कुछ सालों में बीजिंग ने मिडिल ईस्ट में अपना असर बनाने के लिए खरबों डॉलर का निवेश किया है। सऊदी और ईरान के बीच ऐतिहासिक समझौता करवाकर चीन ने पहले ही दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी थी। अब सऊदी उसी ताकत को टेस्ट करना चाहता है।

सऊदी की सोच सीधी है - अमेरिका इस वक्त अपने आंतरिक मुद्दों और यूक्रेन-इजरायल युद्ध में उलझा है, जबकि चीन ही एक ऐसा देश है जिसकी तेहरान में सबसे ज्यादा सुनी जाती है।

बीजिंग का तेहरान को गुप्त संदेश

सूत्रों के अनुसार, सऊदी के अनुरोध के बाद बीजिंग ने तुरंत तेहरान से संपर्क किया। चीन ने निजी तौर पर ईरान से कहा है कि वह यमन के लाल सागर तट और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट के आसपास हूतियों के तेजी से बढ़ते हमलों को रोके।

चीन के लिए यह चिंता बहुत निजी और आर्थिक है। चीन अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों के 50% से ज्यादा के लिए मिडिल ईस्ट पर निर्भर है। अगर लाल सागर और होर्मुज दोनों जगह शिपिंग बाधित हुई, तो चीन की फैक्ट्रियां ठप पड़ सकती हैं और तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। चीन का 90% से ज्यादा व्यापार समुद्री रास्ते से होता है, जिसका बड़ा हिस्सा इसी लाल सागर से गुजरता है।

इसलिए चीन नहीं चाहता कि यह संघर्ष और बढ़े।

ईरान का टेढ़ा जवाब

लेकिन ईरान ने चीन की इस अपील पर जो जवाब दिया है, उसने सबको चौंका दिया है। ईरान का कथित तौर पर कहना है कि - "इलाके की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल का युद्ध खत्म हो।"

मतलब साफ है, तेहरान ने गेंद वापस अमेरिका और इजरायल के पाले में डाल दी है। ईरान का इशारा है कि जब तक गाजा और लेबनान में युद्ध नहीं रुकेगा, तब तक हूतियों को भी नहीं रोका जा सकता।

बिना धमकी की डिप्लोमेसी

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अब तक चीन ने इस रिक्वेस्ट के साथ कोई आर्थिक धमकी नहीं दी है। बीजिंग ने ईरान को तेल खरीदना बंद करने या व्यापार रोकने की चेतावनी नहीं दी है। यह सिर्फ एक दोस्ताना लेकिन गंभीर अनुरोध है।

विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग बहुत फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। वह ईरान को नाराज नहीं करना चाहता, लेकिन साथ ही सऊदी को भी दिखाना चाहता है कि वह एक जिम्मेदार ग्लोबल पावर है।

बीजिंग ने मिडिल ईस्ट में अपना असर बनाने में सालों लगाए हैं, अरबों डॉलर लगाए हैं। अब पहली बार उससे असल में उस असर का इस्तेमाल करने के लिए कहा जा रहा है। यह चीन के लिए एक अग्निपरीक्षा है।

क्या चीन अपने सबसे करीबी दोस्त ईरान को समझा कर लाल सागर में शांति ला पाएगा? या फिर ईरान के टेढ़े रवैये के बाद चीन को भी सख्त कदम उठाने पड़ेंगे? आने वाले कुछ हफ्ते इसका जवाब देंगे, लेकिन इतना तय है कि लाल सागर की यह लड़ाई अब सिर्फ यमन की नहीं, बल्कि बीजिंग, तेहरान और रियाद के बीच पावर बैलेंस की लड़ाई बन गई है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 20,2026 

#MiddleEastCrisis #ChinaIran #SaudiArabia #HouthiRebels #RedSeaCrisis #BabAlMandeb #Geopolitics #OilShipping #HormuzStrait #WorldNews
September 20, 2026

વડોદરામાં આંબેડકર સંકલ્પભૂમિ સ્મારકના ઉદ્ઘાટન પહેલા જ રાજકારણ ગરમાયું: નિમંત્રણ પત્રિકામાં મેયર અને જિલ્લા પંચાયત પ્રમુખના નામ ગાયબ, મહિલા મોરચામાં નારાજગી

વડોદરામાં આંબેડકર સંકલ્પભૂમિ સ્મારકના ઉદ્ઘાટન પહેલા જ રાજકારણ ગરમાયું: નિમંત્રણ પત્રિકામાં મેયર અને જિલ્લા પંચાયત પ્રમુખના નામ ગાયબ, મહિલા મોરચામાં નારાજગી
-Friday World September 20,2026 
વડોદરા - સંસ્કારી નગરી વડોદરા માટે ગૌરવ સમાન એવા બે ઐતિહાસિક પ્રોજેક્ટ - સયાજીબાગ સ્થિત ડો. બાબાસાહેબ આંબેડકર સંકલ્પભૂમિ સ્મારક અને કલ્યાણનગર સ્થિત ડો. બાબાસાહેબ આંબેડકર મ્યુઝિયમના ઉદ્ઘાટનને હવે ગણતરીના કલાકો બાકી છે. પણ ઉદ્ઘાટનની ઉજવણી પહેલા જ એક નિમંત્રણ પત્રિકાએ ભાજપના આંતરિક રાજકારણમાં ભારે ચર્ચા જગાવી છે.

20 સપ્ટેમ્બરના રોજ વડોદરા નજીક વરણામા સ્થિત ત્રિમંદિર ખાતે યોજાનારા ભવ્ય કાર્યક્રમમાં ગુજરાતના મુખ્યમંત્રીના હસ્તે આ બંને સ્થળોનું વર્ચ્યુઅલ ઉદ્ઘાટન થવાનું છે. આ માટે રાજ્યકક્ષાના મંત્રી મનીષાબેન વકીલ દ્વારા જાહેર કરવામાં આવેલી સત્તાવાર નિમંત્રણ પત્રિકા હાલ સોશિયલ મીડિયામાં વાયરલ થઈ છે અને તેને લઈને વિવાદ સર્જાયો છે.

વિવાદનું મૂળ શું છે?

વાયરલ થયેલી નિમંત્રણ પત્રિકામાં પ્રોટોકોલ મુજબ હોવા જોઈતા બે સૌથી મહત્વના નામો જ ગાયબ છે.

1. વડોદરા શહેરના પ્રથમ નાગરિક - મેયર ગીતાબેન મકવાણા

2. જિલ્લા પંચાયત પ્રમુખ - જોસનાબેન રબારી

આ બંને હોદ્દેદારો મહિલા છે અને સ્થાનિક સ્વરાજ્યની સૌથી મોટી સંસ્થાઓનું નેતૃત્વ કરે છે. સયાજીબાગ સંકલ્પભૂમિ અને કલ્યાણનગર મ્યુઝિયમ બંને વડોદરા મહાનગરપાલિકાની હદમાં આવે છે, ત્યારે શહેરના મેયરનું નામ પત્રિકામાં ન હોવું એ પ્રોટોકોલનો ભંગ હોવાનું કાર્યકરો માની રહ્યા છે.

મહિલા મોરચામાં આંતરિક ગણગણાટ

આ મુદ્દાએ ભાજપના મહિલા મોરચામાં સૌથી વધુ ચર્ચા જગાવી છે. કાર્યકરોના મતે, એક તરફ પાર્ટી મહિલા સશક્તિકરણની વાત કરે છે, ત્યારે બીજી તરફ શહેર અને જિલ્લાના બે ટોચના મહિલા પ્રતિનિધિઓની જ બાદબાકી કરવી એ યોગ્ય નથી.

વિશેષ ચર્ચા એ વાતની પણ છે કે, મેયર ગીતાબેન મકવાણા અનુસૂચિત જાતિ સમાજમાંથી આવે છે, જ્યારે જિલ્લા પંચાયત પ્રમુખ જોસનાબેન રબારી બક્ષીપંચ સમાજમાંથી આવે છે. ડૉ. આંબેડકર સ્મારક જેવા દલિત સમાજ અને વંચિત વર્ગ માટે પ્રેરણાસ્ત્રોત સમાન કાર્યક્રમમાં આ બંને સમાજના મહિલા નેતાઓની ઉપસ્થિતિ અને સન્માન અનિવાર્ય હતું, એવી લાગણી વ્યક્ત થઈ રહી છે.

સંકલ્પભૂમિનું ઐતિહાસિક મહત્વ

વડોદરાનું સયાજીબાગ એ માત્ર બગીચો નથી, તે ડૉ. બાબાસાહેબ આંબેડકરની સંકલ્પભૂમિ છે. ઈતિહાસ કહે છે કે, મહારાજા સયાજીરાવ ગાયકવાડના સમયમાં બાબાસાહેબ વડોદરામાં નોકરી અર્થે આવ્યા હતા, ત્યારે તેમને જે અસ્પૃશ્યતાનો સામનો કરવો પડ્યો, તેનાથી વ્યથિત થઈને તેમણે સયાજીબાગમાં એક ઝાડ નીચે બેસીને સમાજમાંથી અસમાનતા નાબૂદ કરવાનો સંકલ્પ લીધો હતો. આ જ સ્થળ આજે દેશભરના આંબેડકર અનુયાયીઓ માટે તીર્થ સમાન છે. ત્યારે તેના નવનિર્મિત સ્મારક અને મ્યુઝિયમનું ઉદ્ઘાટન વડોદરા માટે ઐતિહાસિક ઘટના છે.

હાલ તંત્ર દ્વારા ત્રિમંદિર ખાતે તૈયારીઓને આખરી ઓપ આપવામાં આવી રહ્યો છે. પરંતુ નિમંત્રણ પત્રિકાના વિવાદે આ ઐતિહાસિક ક્ષણ પર રાજકીય રંગ ચડાવી દીધો છે. હવે જોવાનું એ રહેશે કે, ઉદ્ઘાટન કાર્યક્રમના મંચ પર આ બંને મહિલા હોદ્દેદારોને સ્થાન મળે છે કે કેમ? કે પછી આ વિવાદ વધુ વકરશે?

સ્થાનિક રાજકારણના નિષ્ણાતોનું માનવું છે કે આ નાની દેખાતી ભૂલ ભવિષ્યમાં મોટા રાજકીય સમીકરણો બદલી શકે છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 20,2026 

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Saturday, 19 September 2026

September 19, 2026

DUSU चुनाव 2026: 3 सीटों पर ABVP का कब्जा, बिखरे विपक्ष से जीती सत्ता - आंकड़े खोल रहे हैं बड़ी कहानी

DUSU चुनाव 2026: 3 सीटों पर ABVP का कब्जा, बिखरे विपक्ष से जीती सत्ता - आंकड़े खोल रहे हैं बड़ी कहानी
-Friday World September 20,2026 
नई दिल्ली, 20 सितंबर 2026 - दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) चुनाव 2026 के नतीजे आ गए हैं और इस बार भी भगवा लहर ने अपना दबदबा दिखाया है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने 4 में से 3 पदों - अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव पर जीत दर्ज की है, जबकि उपाध्यक्ष पद पर NSUI के बागी निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने ऐतिहासिक जीत हासिल कर सबको चौंका दिया है।

ये चुनाव सिर्फ जीत-हार नहीं, बल्कि विपक्षी एकता के बिखराव का सबसे बड़ा केस स्टडी बन गया है।

 वोटों का पूरा गणित क्या कहता है?

 1. अध्यक्ष पद:
- यश डाबस (ABVP): 24,576 वोट - विजेता
- विजय शंकर मीणा (NSUI): 22,523 वोट
- LEFT (AISA+SFI): 5,377 वोट
- ASAP: 1,388 वोट
- जीत का अंतर: सिर्फ 2,053 वोट

 2. उपाध्यक्ष पद:
- दीपांशु शोकीन (निर्दलीय/NSUI बागी): 30,615 वोट - विजेता
- ईशु मौर्य (ABVP): 16,910 वोट
- विर चतरथ (NSUI): 4,313 वोट
- LEFT: 2,383 वोट
यहाँ NSUI के आधिकारिक उम्मीदवार को बागी उम्मीदवार ने लगभग 7 गुना वोटों से पीछे छोड़ दिया।

 3. सचिव पद:
- रिया छावड़ी (ABVP): 21,650 वोट - विजेता
- नम्रता चौधरी (NSUI): 14,869 वोट
- LEFT: 8,734 वोट
- ASAP: 7,639 वोट
- जीत का अंतर: 6,781 वोट

4. संयुक्त सचिव पद:
- लक्ष्य राज सिंह (ABVP): 16,615 वोट - विजेता
- विशेष यादव (SCS/समाजवादी छात्र सभा): 15,778 वोट
- गोपाल चौधरी (NSUI): 15,206 वोट
- LEFT: 5,837 वोट
- जीत का अंतर: सिर्फ 837 वोट - सबसे करीबी मुकाबला

 पत्रकार अरविंद गुणसेकर और सौरभ दास के ट्वीट से निकलते 3 बड़े संदेश

संदेश 1: बंटा हुआ विपक्ष, जीती हुई सत्ता
अध्यक्ष पद पर ABVP को 2,053 वोटों से जीत मिली, जबकि लेफ्ट को मिले 5,377 वोट अगर एक साथ होते तो नतीजा कुछ और होता। सचिव पद पर भी यही कहानी, ABVP की जीत 6,781 वोट से, जबकि लेफ्ट के 8,734 वोट अलग पड़े रहे। सबसे दिलचस्प संयुक्त सचिव का चुनाव रहा, जहाँ ABVP सिर्फ 837 वोट से जीती, जबकि SP (15,778) और LEFT (5,837) को मिलाकर कुल 21,615 वोट विपक्ष के खाते में गए। साफ है, छात्र सत्ता के खिलाफ थे, पर बंटे हुए थे।

संदेश 2: NSUI के लिए खतरे की घंटी
NSUI के बागी दीपांशु शोकीन ने 30,615 वोटों के साथ उपाध्यक्ष पद पर प्रचंड जीत हासिल की। यह NSUI के संगठनात्मक ढांचे पर सीधा सवाल है। टिकट न मिलने पर भी एक कार्यकर्ता इतना बड़ा जनसमर्थन कैसे जुटा लेता है? यह कांग्रेस के छात्र संगठन को अपनी अंदरूनी लोकतंत्र व्यवस्था पर फिर से सोचने का मौका है। पिछले 12 साल से संगठन सुधार की बात हो रही है, लेकिन जमीनी कार्यकर्ता अब धैर्य खो रहे हैं।

संदेश 3: वाम एकता और वैचारिक शुद्धता का अहंकार
सौरभ दास ने बिल्कुल सही लिखा है - वामपंथी एकता के भीतर कुछ लोग वैचारिक शुद्धता और एक्सक्लूसिविटी पर ज्यादा जोर देते हैं। कोई भी उनसे मान्यता लेने नहीं आ रहा। जब तक वाम, NSUI, SCS, ASAP जैसे सभी छात्र संगठन एक मंच पर नहीं आएंगे, तब तक ABVP को हराना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। बहुमत ABVP के खिलाफ है, लेकिन यह बहुमत एक जगह नहीं है।

जीतने वालों के लिए सबक

इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश जीतने वालों के लिए है। जैसा कि विश्लेषण में कहा गया - "वे कोई राजा या रानी नहीं हैं। बहुमत ने उन्हें वोट नहीं दिया है।" DUSU में कुल 1.51 लाख से ज्यादा वोटर्स थे, मतदान 40.46% हुआ। अध्यक्ष पद पर ABVP को 24 हजार वोट मिले, यानी कुल छात्र आबादी के एक छोटे हिस्से का समर्थन। इसलिए जिम्मेदारी बड़ी है - हॉस्टल, PG सुरक्षा, कैंपस सुविधाएं और छात्र कल्याण पर काम करना होगा, न कि सिर्फ नारेबाजी।

DUSU 2026 ने साफ कर दिया है कि 2029 के बड़े चुनावों से पहले छात्र राजनीति का प्रयोगशाला यही DU है। अगर विपक्ष इसी तरह बंटा रहा, तो वह आगे भी विपक्ष में ही रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 20,2026 

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September 19, 2026

जंतर-मंतर की गूंज से DU तक का सन्नाटा: जब जेन-Z की लहर पर गलत उम्मीदवारों ने फेरा पानी

जंतर-मंतर की गूंज से DU तक का सन्नाटा: जब जेन-Z की लहर पर गलत उम्मीदवारों ने फेरा पानी
-Friday World September 20,2026 
जंतर-मंतर। नाम सुनते ही दिल्ली के लोकतंत्र की धड़कन सुनाई देती है। पिछले हफ्ते यहीं पर जेन-जी ने जो नजारा दिखाया, उसने पूरे देश को चौंका दिया। हाथ में तख्तियां, आंखों में सवाल और जुबान पर एक ही मांग - छात्र राजनीति में पारदर्शिता, रोजगारपरक शिक्षा और कैंपस लोकतंत्र की वापसी। हजारों छात्रों की उस भीड़ में कोई बैनर नहीं था, कोई पार्टी का झंडा नहीं था। सिर्फ एक जेनरेशन थी जो कह रही थी - हमें सुनो।

इस धरना प्रदर्शन के बाद माहौल बिल्कुल सकारात्मक था। सोशल मीडिया से लेकर नॉर्थ कैंपस की चाय की टपरी तक, हर जगह चर्चा थी कि अब DU के छात्र संघ चुनाव में कुछ नया होगा। छात्र अब मुद्दों पर वोट करेंगे, चेहरे पर नहीं। लेकिन जब DUSU 2025 के नतीजे आए, तो इसी सकारात्मक लहर के बावजूद एक बड़ा धड़ा चुनाव हार गया। कारण? गलत प्रत्याशियों का चयन।

लहर थी, नाव ही कमजोर निकली

जंतर-मंतर पर जेन-जी ने जो माहौल बनाया, वह किसी एक संगठन का नहीं था। वह एंटी-इस्टैब्लिशमेंट नहीं, प्रो-स्टूडेंट माहौल था। छात्रों ने साफ कहा था - हमें लग्जरी गाड़ियों से प्रचार करने वाले नहीं, लाइब्रेरी की सीट बढ़ाने वाले चाहिए। हमें बाहुबली नहीं, पढ़ने वाला प्रतिनिधि चाहिए।

इस लहर का सबसे ज्यादा फायदा उन छात्र संगठनों को मिलना था जो खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बताते हैं। लेकिन हुआ उल्टा। जमीनी कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर, ऊपर से थोपे गए प्रत्याशी मैदान में उतार दिए गए।

उदाहरण के लिए, अध्यक्ष पद पर एक ऐसा चेहरा दिया गया जो कैंपस में कभी आंदोलन में दिखा ही नहीं, जिसका जुड़ाव विभागों से नहीं था। सोशल मीडिया फॉलोइंग को जमीनी पकड़ समझ लिया गया। जबकि ABVP ने ठीक इसके उलट किया - आर्यन मान जैसा चेहरा, जो लाइब्रेरी साइंस विभाग से आता है, लगातार 5 साल से कैंपस में सक्रिय है। परिणाम सामने है - आर्यन मान को 28,841 वोट मिले, जबकि NSUI की प्रत्याशी जोस्लिन नंदिता चौधरी को मात्र 12,645 वोट। 16,196 वोटों का अंतर सिर्फ हार नहीं, रणनीतिक चूक का प्रमाण है।

देश भर में गूंज से क्या होगा, जब घर ही हार जाओ?

एक तरफ आप जंतर-मंतर से लेकर पटना, लखनऊ, हैदराबाद तक छात्रों की गूंज करने की बात करते हो। प्रेस कॉन्फ्रेंस, ट्विटर ट्रेंड, रील और हैशटैग। लेकिन छात्र राजनीति का पहला नियम है - आपका अपना किला मजबूत होना चाहिए।

DU, JNU, इलाहाबाद, BHU - ये सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं, छात्र आंदोलन की प्रयोगशालाएं हैं। अगर आप यहां गलत टिकट बंटवारे, गुटबाजी और जातीय-समीकरण में उलझ कर चुनाव हार रहे हैं, तो देश भर की गूंज का कोई लाभ नहीं होगा। छात्र बहुत समझदार है। वह जंतर-मंतर पर आपके साथ खड़ा होगा क्योंकि मुद्दा उसका है, लेकिन वोट वह उसी को देगा जिसे वह रोज कैंटीन में देखता है, जो उसकी क्लास के बाहर उसके लिए खड़ा होता है।

तीन बड़ी गलतियां जो हार की वजह बनीं:

 1. सर्वे नहीं, सिफारिश: उम्मीदवार चयन के लिए कोई ओपन सर्वे, कोई कैंपस फीडबैक नहीं लिया गया। दिल्ली से बाहर बैठे नेताओं ने नाम तय कर दिए।

 2. मुद्दों से भटकाव: जेन-जी ने फीस वृद्धि, हॉस्टल, प्लेसमेंट, लड़कियों की सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाए। लेकिन प्रत्याशियों ने अपने भाषणों में राष्ट्रीय राजनीति के बड़े-बड़े नैरेटिव परोस दिए, जो DU के वोटर को कनेक्ट नहीं कर पाए।

 3. महिला वोट की अनदेखी: इस बार DU में 7 महिला उम्मीदवार थीं। महिला वोटर निर्णायक है। लेकिन जिन महिला चेहरों को उतारा गया, उनकी तैयारी अधूरी थी, जबकि विरोधी खेमे की दीपिका झा ने जॉइंट सेक्रेटरी पद 21,825 वोट लेकर जीत लिया।

अब आगे क्या?

जेन-जी आंदोलन ने साबित कर दिया है कि छात्र अब जागरूक है, वह भीड़ नहीं, भागीदारी चाहता है। DUSU चुनाव की हार एक सबक है - लहर से ज्यादा जरूरी है नाव।

अगर वाकई छात्र राजनीति को बदलना है तो करना यह होगा:
कॉलेज-स्तर पर पैनल बनाओ, नाम ऊपर से मत थोपो। टिकट से पहले 3 महीने कैंपस में काम अनिवार्य करो। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर नहीं, लाइब्रेरी एक्टिविस्ट को आगे लाओ।

जंतर-मंतर की गूंज बेकार नहीं गई, उसने माहौल दिया। लेकिन माहौल को वोट में बदलने के लिए सही चेहरा चाहिए। वरना हर साल यही होगा - जंतर-मंतर पर तालियां, और नॉर्थ कैंपस में सन्नाटा।

छात्र आंदोलन नारों से नहीं, सही नेतृत्व से जीते जाते हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 20,2026 

#GenZProtest #DUSUElections2025 #JantarMantar #DelhiUniversity #StudentPolitics #CampusDemocracy #YouthVoice #DUSUResults #StudentElections #WrongCandidateSelection
September 19, 2026

ભુજમાં ઉજવણીને નામે છળકપટ? આંગણવાડી બહેનોને સ્માર્ટફોનની લાલચ આપી દૂરના ગામડાંથી બોલાવી, ફોટા પડાવી તરત જ ફોન પાછા પડાવી લીધા!

ભુજમાં ઉજવણીને નામે છળકપટ? આંગણવાડી બહેનોને સ્માર્ટફોનની લાલચ આપી દૂરના ગામડાંથી બોલાવી, ફોટા પડાવી તરત જ ફોન પાછા પડાવી લીધા!
-Friday World September 20,2026
ભુજ - કચ્છ

વડાપ્રધાનના જન્મદિવસની ઉજવણી દેશભરમાં ઉત્સાહથી થઈ રહી છે, ત્યારે ગુજરાતના સરહદી જિલ્લા કચ્છના મુખ્ય મથક ભુજમાંથી એક ચોંકાવનારી અને શરમજનક ઘટના સામે આવી છે. મહિલા અને બાળ વિકાસ વિભાગની આગેવાની હેઠળ યોજાયેલા સ્માર્ટફોન વિતરણ કાર્યક્રમમાં આંગણવાડી બહેનોની સરેઆમ મશ્કરી કરવામાં આવી હોવાનો આક્ષેપ થયો છે.

મળતી માહિતી મુજબ, જિલ્લા પંચાયત હસ્તકની સંકલિત બાળ વિકાસ યોજના (ICDS) વિભાગ દ્વારા કચ્છ જિલ્લાની તમામ આંગણવાડી સંચાલિકા બહેનોને સ્માર્ટફોન આપવાની લાલચ આપવામાં આવી હતી. આ માટે અંતરિયાળ ગામડાઓમાંથી બહેનોને ખાસ ભુજ ખાતે બોલાવવામાં આવી હતી. દૂર-દૂરથી ભાડું ખર્ચીને, પોતાનું કામ છોડીને આશા સાથે આવેલી બહેનોને માત્ર 6 થી 7 પ્રતિકાત્મક ફોન હાથમાં આપીને ફોટોગ્રાફી કરવામાં આવી અને ત્યારબાદ તરત જ એ ફોન પરત લઈ લેવામાં આવ્યા હતા.

શું હતી સમગ્ર ઘટના?

સૂત્રો મુજબ, વડાપ્રધાનના જન્મદિવસ નિમિત્તે સ્માર્ટફોન વિતરણનો કાર્યક્રમ યોજવાનો છે, તેવું કહીને તમામ તાલુકાઓમાંથી આંગણવાડી બહેનોને ભુજ બોલાવવામાં આવી. બહેનોને એવું કહેવામાં આવ્યું હતું કે સરકાર દ્વારા ડિજિટલ ઈન્ડિયાને વેગ આપવા માટે તેમને કામગીરીમાં સરળતા રહે તે માટે સ્માર્ટફોન આપવામાં આવશે. 

ઘણી બહેનો 50 થી 100 કિલોમીટર દૂરના નાના રણ, બન્ની, અબડાસા અને લખપત જેવા અંતરિયાળ વિસ્તારોમાંથી સવારથી નીકળીને ભુજ પહોંચી હતી. કાર્યક્રમ સ્થળે હાજરી લેવામાં આવી, થોડીવાર રાહ જોવડાવવામાં આવી અને પછી માત્ર ગણતરીના બહેનોને સ્ટેજ પર બોલાવી ફોન આપતા હોય તેવા દ્રશ્યો ઉભા કરી ફોટા પાડવામાં આવ્યા. કાર્યક્રમ પૂર્ણ થયાના થોડી જ મિનિટોમાં અધિકારીઓએ વિનમ્રતાથી કહ્યું કે, "ફોન હવે પરત આપી દો, આ તો માત્ર પ્રતિકાત્મક વિતરણ હતું."

આ સાંભળીને બહેનો સ્તબ્ધ થઈ ગઈ હતી. ગુસ્સે ભરાયેલી એક બહેને જણાવ્યું હતું કે, "અમને રમકડાં સમજી લીધા છે? જો ફોન આપવા જ નહોતા તો આટલે દૂર શા માટે બોલાવ્યા? અમારા છોકરાઓને ઘરે મૂકીને અમે આવ્યા, આખો દિવસ બગાડ્યો."

તંત્રની બેદરકારી છતી થઈ

આ મામલે જ્યારે જિલ્લા વિકાસ અધિકારી (DDO)નો સંપર્ક કરવામાં આવ્યો ત્યારે તેમણે આ બાબતે પોતાને જાણ જ ન હોય તેવું જણાવ્યું હતું અને આગામી દિવસોમાં કાર્યક્રમનું આયોજન કરાશે તેવું ગોળ-ગોળ જવાબ આપ્યો હતો. આ બાબત ભાજપ શાસિત જિલ્લા પંચાયતની કામગીરી પર અનેક સવાલો ઉભા કરે છે. જે વિભાગ જિલ્લા પંચાયત હેઠળ આવે છે, તેના કાર્યક્રમની જાણ DDOને જ ન હોય તો વહીવટ કેટલો લચર છે તે સ્પષ્ટ થાય છે.

ICDS શાખાના સંકલનના અભાવે કચ્છ જિલ્લાની મહિલાઓમાં ભારે રોષ ભભૂકી ઉઠ્યો છે. એક તરફ સરકાર મહિલા સશક્તિકરણની મોટી મોટી વાતો કરે છે, બીજી તરફ જમીન સ્તરે કામ કરતી, કુપોષણ સામે લડતી, બાળકોને ભણાવતી આંગણવાડી બહેનોને જ આ રીતે હેરાન પરેશાન કરવામાં આવી રહી છે.

આ ઘટના માત્ર ફોનની નથી, પરંતુ વિશ્વાસની છે. ડિજિટલ સેવાઓ માટે સરકારે આંગણવાડી બહેનો પાસે પોષણ ટ્રેકર જેવી એપમાં એન્ટ્રી કરાવવી ફરજિયાત કરી છે, પરંતુ ઘણી બહેનો પાસે હજુ સ્માર્ટફોન જ નથી. તેઓ પોતાના પગારમાંથી ફોન લઈને કામ કરે છે. જો સરકાર ખરેખર ફોન આપવા માંગતી હોય તો પ્રતિકાત્મક નહીં, પણ સાચા અર્થમાં વિતરણ થવું જોઈએ.

સવાલ એ પણ છે કે શું આ કાર્યક્રમ માત્ર ઉપરથી આવેલા ફોટા મોકલવાના દબાણને કારણે ઉતાવળે યોજવામાં આવ્યો હતો? શું વડાપ્રધાનના જન્મદિવસની ઉજવણીનો રિપોર્ટ દિલ્હી મોકલવા માટે કચ્છની ગરીબ મહિલાઓને મહોરા બનાવવામાં આવી?

હાલમાં આંગણવાડી સંગઠનોએ આ મામલે લેખિત રજૂઆત કરવાની તૈયારી બતાવી છે અને માંગ કરી છે કે તમામ બહેનોને તાત્કાલિક સ્માર્ટફોન આપવામાં આવે અને જવાબદાર અધિકારીઓ સામે પગલાં લેવામાં આવે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World September 20,2026

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September 19, 2026

ट्रंप का सबसे बड़ा दांव - रूस-ईरान पर सख्त कानून पर दस्तखत, भारत-चीन पर 100% टैरिफ का खतरा!

ट्रंप का सबसे बड़ा दांव - रूस-ईरान पर सख्त कानून पर दस्तखत, भारत-चीन पर 100% टैरिफ का खतरा!
- Friday World September 19,2026 
वाशिंगटन/नई दिल्ली - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आखिरकार उस कानून पर हस्ताक्षर कर दिए हैं जिसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी। 18 सितंबर 2026 को व्हाइट हाउस ने ऐलान किया कि ट्रंप ने 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' (H.R. 5334) पर दस्तखत कर दिए हैं। यह कानून अमेरिका के दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम को श्रद्धांजलि के तौर पर उनके नाम पर रखा गया है।

यह कानून सिर्फ रूस और ईरान पर प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो भारत और चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को भी सीधे प्रभावित कर सकता है। 85f9

 क्या है इस कानून में सबसे खतरनाक?

इस कानून का सबसे चर्चित प्रावधान है - अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार देना कि वह उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगा सकें जो रूसी तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं।

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि यह टैरिफ ऑटोमेटिक नहीं लगेगा। कानून के मुताबिक, राष्ट्रपति उन 5 सबसे बड़े देशों पर टैरिफ लगा सकते हैं जिन्होंने कानून लागू होने से पिछले 12 महीनों में सबसे ज्यादा रूसी कच्चा तेल या गैस खरीदा है। इसमें भारत और चीन टॉप पर हैं। 24a4

व्हाइट हाउस ने साफ कहा है कि ट्रंप के पास यह तय करने की पूरी शक्ति होगी कि किस देश पर टैरिफ लगे, कितना लगे, और क्या छूट दी जाए।

कानून 30 दिन में होगा लागू: हस्ताक्षर के 30 दिन के भीतर यह कानून प्रभावी हो जाएगा, यानी अक्टूबर 2026 के मध्य से अमेरिका को कार्रवाई का अधिकार मिल जाएगा। ed1a

 शैडो फ्लीट पर शिकंजा

इस कानून का दूसरा सबसे बड़ा निशाना है रूस की 'शैडो फ्लीट'। ये वो सैकड़ों पुराने टैंकर जहाज हैं जिनका इस्तेमाल रूस पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए कर रहा है।

नए कानून के तहत सिर्फ जहाज ही नहीं, बल्कि उनसे जुड़े मालिक, ऑपरेटर, इंश्योरेंस कंपनियां, मैनेजर और यहां तक कि उनको पैसा देने वाले बैंकों पर भी कार्रवाई होगी। ed1a

इसके अलावा ईरान पर लगे मौजूदा प्रतिबंधों को भी 5 साल के लिए बढ़ा दिया गया है।

 भारत के लिए क्या मतलब है?

भारत दुनिया में रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। सस्ते रूसी तेल ने भारत को पिछले 3 सालों में अरबों डॉलर बचाए हैं। लेकिन अब खतरा सामने है।

अच्छी खबर यह है कि कानून में छूट का भी प्रावधान है। अगर कोई देश यह साबित कर दे कि उसका रूसी गैस आयात, रूस के कुल निर्यात का 15% से कम है और उसने आयात घटाने के लिए "महत्वपूर्ण कदम" उठाए हैं, तो उसे छूट मिल सकती है। ed1a

साथ ही राष्ट्रपति के पास 'नेशनल इंटरेस्ट वेवर' का अधिकार भी है। यानी अगर ट्रंप को लगता है कि भारत पर टैरिफ लगाना अमेरिका के हित में नहीं है, तो वह संसद को लिखित प्रमाण देकर छूट दे सकते हैं।

 सीनेट और हाउस में बंपर जीत

यह कानून द्विदलीय समर्थन से पास हुआ है। सीनेट में 86-11 वोटों से और हाउस में 262-159 वोटों से इसे मंजूरी मिली। यह 1974 के बाद पहली बार है जब कांग्रेस ने राष्ट्रपति को इतनी बड़ी टैरिफ पावर दी है।

यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने ट्रंप को धन्यवाद देते हुए कहा, "लिंडसे ग्राहम की याद को सम्मान देने का सबसे अच्छा तरीका इस कानून को पूरी तरह और तेजी से लागू करना होगा।"

 आगे क्या होगा?

यह कानून ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिनों में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग वाशिंगटन आने वाले हैं। चीन ने पहले ही इस कानून को "लॉन्ग-आर्म जुरिस्डिक्शन" बताते हुए विरोध किया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल सौदेबाजी के हथियार के तौर पर करेंगे। वह भारत और चीन पर दबाव बनाकर रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के लिए रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाना चाहते हैं।

भारत के लिए अगले 30 दिन बेहद अहम होंगे। विदेश मंत्रालय को अब अमेरिका के साथ कूटनीतिक बातचीत तेज करनी होगी ताकि 100% टैरिफ की तलवार को टाला जा सके।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 19,2026 

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September 19, 2026

काला सागर में खूनी खेल - रूस के ड्रोन अटैक में तंजानिया के कार्गो शिप के कैप्टन की मौत, तुर्की ने बुलाई शांति बैठक

काला सागर में खूनी खेल - रूस के ड्रोन अटैक में तंजानिया के कार्गो शिप के कैप्टन की मौत, तुर्की ने बुलाई शांति बैठक
- Friday World September 19,2026 
अहमदाबाद - काला सागर एक बार फिर जंग का सबसे खतरनाक मोर्चा बन गया है। 17 सितंबर को रूस ने काला सागर में तंजानिया के झंडे वाले एक सिविलियन कार्गो शिप पर ड्रोन से ताबड़तोड़ हमला किया, जिसमें जहाज के कैप्टन की मौके पर ही मौत हो गई और 3 क्रू मेंबर बुरी तरह घायल हो गए। यूक्रेन के इन्फ्रास्ट्रक्चर मंत्रालय और सी पोर्ट अथॉरिटी ने इस हमले की पुष्टि की है।

यह हमला कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले 3 महीनों में काला सागर में कम से कम 4 बड़े कार्गो शिपों पर रूस ने इसी तरह के घातक हमले किए हैं, जिनमें तुर्की, टोगो और तंजानिया के जहाज शामिल हैं। 

कैसे हुआ हमला?

यूक्रेन की सी पोर्ट अथॉरिटी के मुताबिक, तंजानिया के झंडे वाला जहाज यूक्रेन के किसी बंदरगाह की तरफ जा रहा था। अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ही रूसी ड्रोन ने उसे निशाना बनाया।

> "रूसी ड्रोन द्वारा हमले के परिणामस्वरूप जहाज के कैप्टन की मौत हो गई और तीन अन्य क्रू मेंबर घायल हो गए," अथॉरिटी ने अपने आधिकारिक बयान में कहा। फिलहाल जहाज की हालत का आकलन किया जा रहा है और घायलों को इलाज के लिए भेजा गया है।

कैप्टन की राष्ट्रीयता अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है। यह जुलाई 2026 के बाद दूसरी बार है जब तंजानिया के झंडे वाले जहाज पर हमला हुआ है।

काला सागर में 4 बड़े हमलों की टाइमलाइन

 1. जून 2026 - यूक्रेनी बंदरगाहों से निकल रहे 2 विदेशी कार्गो जहाजों पर ड्रोन हमला। 1 नाविक की मौत, 5 घायल।
 
2. जुलाई 2026 - तुर्की के स्वामित्व वाले बल्क कैरियर GOLDEN LEO पर क्रूज मिसाइल हमला जब वह ओडेसा से अनाज लेकर निकल रहा था। 10 लोगों की मौत। इसी महीने तुर्की के ही एक और जहाज Reyhan Sari पर हमला, 1 नाविक की मौत।

 3. अगस्त 2026 - ओडेसा पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमले के दौरान टोगो के झंडे वाले जहाज को नुकसान, 4 लोग घायल।

 4. सितंबर 17, 2026 - तंजानिया फ्लैग वाले जहाज पर हमला, कैप्टन की मौत।

इन हमलों के बाद से काला सागर कॉरिडोर से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। फसल के सीजन में शिप ओनर्स ने यूक्रेनी बंदरगाहों में जाने से मना कर दिया है।

तुर्की का शांति फॉर्मूला

लगातार हमलों से परेशान तुर्की ने अब एक बड़ा कदम उठाया है। तुर्की के एक राजनयिक ने AFP को बताया कि अंकारा ने रूस और यूक्रेन दोनों को एक मसौदा ज्ञापन भेजा है ताकि सिविलियन जहाजों पर हमले रोके जा सकें।

तुर्की का यह प्रस्ताव 2022 के Black Sea Grain Initiative से प्रेरित है, जिसे तुर्की और UN ने मिलकर बनाया था। तुर्की का कहना है कि जून के आखिर से अब तक तुर्की के स्वामित्व वाले कम से कम 25 जहाजों पर हमले हो चुके हैं।

तुर्की ने कहा है कि यूक्रेन को इस समझौते के लिए तैयार है, लेकिन रूस ने अभी तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने तो यहां तक कह दिया है कि सिविलियन कार्गो जहाजों पर हमले रोकने के समझौते की निगरानी करना असंभव है।

यूक्रेन का पलटवार - ऑपरेशन मोलोचका

यूक्रेन भी चुप नहीं बैठा है। जुलाई में यूक्रेन ने "ऑपरेशन मोलोचका" शुरू किया है, जिसका मकसद रूस के शैडो फ्लीट - यानी प्रतिबंधित तेल ले जाने वाले जहाजों को ट्रैक करके काला सागर और आज़ोव सागर में निशाना बनाना है।

यूक्रेन का कहना है कि रूस व्यवस्थित रूप से यूक्रेनी बंदरगाहों, पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर और सिविलियन कमर्शियल जहाजों पर हमला कर रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का घोर उल्लंघन है। यूक्रेन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समन्वित कार्रवाई की मांग की है।

संयुक्त राष्ट्र ने भी चेतावनी दी है कि इन बढ़ते हमलों के कारण युद्ध में नागरिकों की मौत में काफी वृद्धि हुई है।

वैश्विक व्यापार पर असर

काला सागर दुनिया के अनाज व्यापार का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है। रूस और यूक्रेन दोनों दुनिया के सबसे बड़े अनाज निर्यातक हैं। जब भी यहां शिपिंग रुकती है, तो अफ्रीका और एशिया में खाने की कीमतें बढ़ जाती हैं।

2023 में रूस द्वारा UN-तुर्की अनाज डील से हटने के बाद यूक्रेन ने रोमानिया और बुल्गारिया के तट के पास से अपना वैकल्पिक कॉरिडोर बनाया था। रूस उसी 4-5 मील के खतरनाक गैप में जहाजों को निशाना बना रहा है, जहां जहाजों को राष्ट्रीय जलक्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में आना पड़ता है।

काला सागर में कैप्टन की मौत सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि एक बड़े समुद्री युद्ध की चेतावनी है। अगर तुर्की का शांति प्रस्ताव फेल होता है, तो आने वाले दिनों में वैश्विक सप्लाई चेन और अनाज संकट और गहरा सकता है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World September 19,2026 

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