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Thursday, 19 March 2026

March 19, 2026

यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड पर आग: लंबी तैनाती और युद्ध की थकान ने अमेरिकी नौसेना को झकझोर दिया

यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड पर आग: लंबी तैनाती और युद्ध की थकान ने अमेरिकी नौसेना को झकझोर दिया
-Friday 🌎 World 20 March 2026
मार्च 2026 में अमेरिका-ईरान संघर्ष अपने तीसरे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत अमेरिकी और इज़राइली बलों ने ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए हैं, लेकिन इस जंग का सबसे बड़ा असर अब अमेरिकी सेना के अंदर दिखाई दे रहा है। दुनिया के सबसे बड़े और सबसे आधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड (CVN-78) पर 12 मार्च को लगी आग ने न केवल जहाज को क्षति पहुँचाई, बल्कि पूरे अमेरिकी नौसेना और जनता में युद्ध-विरोधी भावनाओं को और तेज कर दिया है। 

आग की घटना: क्या हुआ था?

 12 मार्च 2026 को रेड सी में तैनात यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड के मुख्य लॉन्ड्री एरिया में आग लग गई। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, यह आग युद्ध से संबंधित नहीं थी। शुरुआत में इसे एक ड्रायर वेंट से शुरू बताया गया, जो तेजी से फैल गई। आग को पूरी तरह बुझाने में 30 घंटे से अधिक समय लगा।

 इस घटना के परिणाम गंभीर थे: 

→ तीन नौसैनिक घायल हुए—एक को हवाई मार्ग से इलाज के लिए जहाज से बाहर ले जाया गया, जबकि दो अन्य स्थिर हालत में हैं।

 → लगभग 200 नौसैनिकों को धुएँ से संबंधित चोटें आईं। 

→ जहाज के मुख्य बर्थिंग एरिया को इतनी क्षति पहुँची कि 600 से अधिक नौसैनिकों को अपने बिस्तर खोने पड़े। वे अब फर्श, टेबल या अन्य जगहों पर सो रहे हैं।

 → आग बुझाने के लिए इस्तेमाल पानी और फोम से जहाज के कई हिस्सों में पानी भर गया, जिससे सफाई और मरम्मत का काम लंबा खिंच रहा है।

 नौसेना ने स्पष्ट किया कि जहाज का प्रोपल्शन प्लांट सुरक्षित है और यह अभी भी ऑपरेशनल है। लेकिन आग के बाद फोर्ड को रेड सी से हटाकर ग्रीस के क्रीट द्वीप पर अमेरिकी नौसेना बेस सौदा बे में अस्थायी मरम्मत के लिए भेजा जा रहा है। यह कदम युद्ध के बीच अमेरिकी नौसेना की चुनौतियों को उजागर करता है। 

लंबी तैनाती: नौसैनिकों की थकान और मनोबल पर असर

यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड जून 2025 से तैनात है—यानी लगभग 9-10 महीने हो चुके हैं। पहले यह कैरिबियन में था, फिर वेनेजुएला संकट के बाद मिडिल ईस्ट भेजा गया। फरवरी 2026 में ईरान के खिलाफ ऑपरेशन शुरू होने के बाद इसकी तैनाती और बढ़ा दी गई। नौसैनिकों के परिवारों और पूर्व सैनिकों से मिली जानकारी के अनुसार: 

→ बार-बार एक्सटेंशन से थकान चरम पर है। 

→ परिवार से दूर रहना, लगातार युद्ध अभियान, और जहाज पर प्लंबिंग जैसी पुरानी समस्याएँ (जो पहले से रिपोर्ट की जा रही थीं) मनोबल को गिरा रही हैं। 

→ एक नौसैनिक के माता-पिता ने कहा, “वे थक चुके हैं। आग ने मनोबल को और गिरा दिया है।”

 यह थकान सिर्फ फोर्ड तक सीमित नहीं है। अमेरिकी सेना में लंबे समय से युद्ध-विरोधी भावनाएँ बढ़ रही हैं। कई सर्वे दिखाते हैं कि आम अमेरिकी नागरिक ईरान के साथ पूर्ण युद्ध का समर्थन बहुत कम कर रहे हैं—कई पोल में यह 20-30% से नीचे है। युवा पीढ़ी, खासकर मिलेनियल्स और जेन-जेड, सोशल मीडिया पर #NoWarWithIran और #BringOurTroopsHome जैसे अभियानों में सक्रिय हैं। 

अमेरिकी जनता और सेना: युद्ध से दूरी बढ़ती जा रही है

 यह आग की घटना अमेरिका में व्यापक असंतोष का प्रतीक बन गई है। रिटायर्ड जनरल्स और पूर्व सैनिक खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह जंग अमेरिकी हितों के खिलाफ है। ओमान के विदेश मंत्री सय्यिद बद्र अल-बुसैदी ने भी चेतावनी दी है कि यह “अमेरिका की जंग नहीं है”—यह इज़राइल के एजेंडे में फंसकर अमेरिका अपनी विदेश नीति पर नियंत्रण खो रहा है। 

परिणाम पहले से दिख रहे हैं: 

→ तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर। 

→ वैश्विक मुद्रास्फीति का खतरा। 

→ सहयोगी देश (ब्रिटेन, फ्रांस, जापान आदि) अमेरिकी अनुरोध पर जहाज भेजने से इनकार कर रहे हैं। 

→ NATO में दरार, यूरोपीय देश डिप्लोमेसी पर जोर दे रहे हैं। 

स्वेज संकट (1956) की याद ताजा हो रही है—जब ब्रिटेन ने सैन्य जीत हासिल की, लेकिन राजनीतिक-आर्थिक हार से सुपरपावर का दर्जा खो दिया। आज अमेरिका उसी राह पर है। सैन्य ताकत से शुरुआत हुई, लेकिन असल में ईरान क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत हो रहा है, राष्ट्रवाद बढ़ रहा है, और अमेरिका अलग-थलग पड़ता जा रहा है। 

शांति की आवश्यकता: अब समय आ गया है

 यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड पर आग ने साबित कर दिया कि कोई भी युद्ध बिना घरेलू समर्थन के नहीं चल सकता। सेना थक चुकी है, जनता नहीं चाहती, और सहयोगी चुप हैं। 

अमेरिका को अपने सहयोगियों की सुननी होगी—युद्ध रोकना होगा, बातचीत की मेज पर लौटना होगा। ओमान जैसे देश पहले से मध्यस्थता की पेशकश कर रहे हैं। अगर अब नहीं जागे, तो यह जंग और विस्तारित हो सकती है—और अमेरिका स्वेज की तरह अपनी वैश्विक छवि और आर्थिक स्थिरता खो सकता है। 

शांति चुनना अब केवल विकल्प नहीं—यह आवश्यकता है। वरना यह आग सिर्फ जहाज तक नहीं, पूरे क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक फैल जाएगी। 


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday 🌎 World 20 March 2026
March 19, 2026

From Suez to Hormuz: Britain-Israel 1956 America-Israel 2026 History’s Repeating Tragedy?

From Suez to Hormuz: Britain-Israel 1956 America-Israel 2026 History’s Repeating Tragedy?-Friday 🌎 World March 19, 2026
The 1956 Suez Crisis remains one of the most decisive turning points in modern international relations. Britain and France, acting in concert with Israel, launched military action against Egypt after President Gamal Abdel Nasser nationalized the Suez Canal in July 1956. 

 British and French paratroopers landed along the canal; Israeli forces advanced deep into Sinai. 

 Militarily, the tripartite coalition achieved rapid initial success. Yet the real victory belonged to Egypt. 

 Nasser not only survived but emerged as the undisputed hero of the Arab world.

  His pan-Arab nationalist stature grew enormously, galvanizing anti-colonial sentiment across the region. For Britain the military triumph turned into a catastrophic political and economic defeat. 

 The international community—led by the United States—condemned the invasion. 

 President Eisenhower applied brutal financial pressure: Britain’s dollar reserves drained rapidly, the pound sterling came under massive speculative attack, and IMF support was withheld. 

 Within days London was forced to accept a humiliating ceasefire and full withdrawal. The crisis permanently ended Britain’s status as a global superpower.

  The pound sterling lost its position as the world’s leading reserve currency; the US dollar took its place decisively. 

 Britain was reduced to a “second-tier” power.

  Prime Minister Anthony Eden resigned in disgrace. 

 France was damaged too, but Britain’s fall was the deepest and most irreversible. 

 The canal returned to Egyptian control, and Nasser’s triumph fueled a new wave of Arab nationalism. 

History is repeating itself—from Suez to Hormuz

In March 2026 the drama unfolding in the Strait of Hormuz feels eerily familiar. On 28 February 2026 the United States and Israel launched massive airstrikes against Iran under Operation Epic Fury.

  Hundreds of sorties targeted military bases, nuclear facilities, missile sites, and senior leadership. 

 Iran’s Supreme Leader Ali Khamenei was killed in the opening hours. 

 In the first phase American-Israeli air superiority appeared overwhelming; Iranian air defenses and missile stocks suffered severe attrition. But—as in Suez—the emerging strategic winner is Iran. 

 Tehran retaliated with missile and drone barrages against US bases in the region, Israeli territory, and selected Gulf targets. 


 Most critically, Iran has effectively closed the Strait of Hormuz to commercial traffic. 

 Tankers have been harassed, boarded, or threatened; mines have reportedly been laid in key channels. 

 Roughly 20% of global seaborne oil passes through this 21-mile-wide chokepoint. The economic consequences are already severe: 
 Brent crude has surged well above $100 per barrel. 

Global energy markets are in turmoil. 

 Asian economies have begun fuel rationing; shipping companies are rerouting around the Cape of Good Hope, adding weeks and millions in costs to every voyage. Iran’s strategy is transparent and brutally effective: 

Unable to match US-Israeli conventional firepower head-on, Tehran is internationalizing the conflict. 

 By making the war prohibitively expensive for the global economy, Iran hopes to generate irresistible pressure for de-escalation and mediation. 

 This is exactly what Nasser did in 1956—closing the canal inflicted immediate pain on Europe and forced diplomatic intervention. 

America’s fatal miscalculation: the Suez echo
 In 1956 Britain believed overwhelming military force could restore great-power prestige. 

Washington proved them wrong and forced retreat. Today the United States appears trapped in the same illusion.

  This is not America’s war. 

 Washington has been drawn into Israel’s agenda at the expense of its own independent foreign policy. 

 Control over American strategy has visibly eroded. Early signs of strategic damage are unmistakable: 

 Skyrocketing oil and gas prices threaten renewed global inflation. 

 Key allies remain silent or openly critical—Trump’s calls for Britain, France, Japan, South Korea, and even China to deploy naval assets have met with refusal or polite deflection. 

 Cracks are appearing inside NATO; European capitals increasingly demand diplomacy over escalation.

  The United States is becoming diplomatically isolated, precisely as Britain did in 1956. In Suez the pound lost reserve-currency status to the dollar. 

 If the Hormuz crisis drags on, serious questions about the dollar’s long-term dominance will intensify. 

 Alternative currencies (yuan, euro, digital alternatives) could gain ground faster than anyone currently expects. 

 America’s image as the champion of an “unlawful war” is hardening globally. 

Voices like Oman still offer a way out

Oman’s Foreign Minister Sayyid Badr Albusaidi has repeatedly warned that this conflict runs counter to core American interests. 

 Escalating regional instability, energy shock, and global economic damage serve no one. 

 After Suez, Britain eventually pivoted toward European integration. 

 Today the United States must listen to its partners: halt the war, return to the negotiating table. 

Final lesson: military victory is not political victory

Suez proved that battlefield success can mask strategic disaster. 

 Britain lost its superpower crown and the pound’s primacy. 

 Today in Hormuz the pattern repeats: America and Israel hold overwhelming military advantage, yet they are losing the larger war. 

  Iran is growing stronger in regional perception. 

 Nationalist currents across the Middle East are rising. 

 America’s global standing is eroding. 

Will the United States repeat Britain’s Suez blunder?

 Or will the world finally awaken and stop this “unlawful war” before the damage becomes irreversible? 

The choice is stark: peace must be chosen—or the road to devastation will only lengthen. 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday 🌎 World March 19, 2026
March 19, 2026

स्वेज से होर्मुज: ब्रिटेन-इज़राइल अब अमेरिका-इज़राइल-इतिहास की दोहराती हुई त्रासदी?

स्वेज से होर्मुज: ब्रिटेन-इज़राइल अब अमेरिका-इज़राइल-इतिहास की दोहराती हुई त्रासदी?
-Friday 🌎 World March 19, 2026
1956 का स्वेज संकट आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति की किताबों में एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है। उस समय ब्रिटेन और फ्रांस, इज़राइल के साथ मिलकर, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्देल नासेर द्वारा स्वेज नहर के राष्ट्रीयकरण के जवाब में सैन्य कार्रवाई में उतरे थे। ब्रिटेन ने सैन्य रूप से शुरुआती सफलता हासिल की—उनकी सेनाएँ नहर के किनारे उतर गईं, इज़राइली बल सिनाई में आगे बढ़े। लेकिन असल जीत मिस्र की हुई। नासेर न केवल सत्ता में बने रहे, बल्कि अरब दुनिया के नायक बन गए। उनकी राष्ट्रवादी छवि और मजबूत हो गई।

 ब्रिटेन के लिए यह सैन्य विजय एक भारी राजनीतिक और आर्थिक हार साबित हुई। 

अंतरराष्ट्रीय समुदाय—खासकर अमेरिका—ने ब्रिटेन और फ्रांस की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की। अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने ब्रिटेन पर आर्थिक दबाव डाला: पाउंड स्टर्लिंग की रिजर्व करेंसी की स्थिति पर हमला किया गया, ब्रिटेन के डॉलर रिजर्व तेजी से घटे, और आईएमएफ से मदद मिलना बंद हो गई। परिणामस्वरूप ब्रिटेन को पीछे हटना पड़ा। 

इस संकट ने ब्रिटेन की वैश्विक सुपरपावर स्थिति को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। पाउंड स्टर्लिंग अब रिजर्व करेंसी नहीं रहा—डॉलर ने उसकी जगह ले ली। ब्रिटेन अब "दूसरी पंक्ति" की शक्ति बन गया। एंथनी ईडन जैसे प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। फ्रांस भी प्रभावित हुआ, लेकिन ब्रिटेन की गिरावट सबसे गहरी थी। स्वेज नहर फिर से मिस्र के नियंत्रण में आ गई, और नासेर की जीत ने अरब राष्ट्रवाद को नई ऊर्जा दी। 

अब इतिहास खुद को दोहरा रहा है—स्वेज से होर्मुज तक

आज, मार्च 2026 में, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर मचा तमाशा ठीक वैसा ही महसूस हो रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए—ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत सैन्य ठिकाने, परमाणु सुविधाएँ, और नेतृत्व को निशाना बनाया। ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई। शुरुआती चरण में अमेरिका-इज़राइल की सैन्य श्रेष्ठता स्पष्ट थी—सैकड़ों हमले, ईरानी मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम को भारी नुकसान। 

लेकिन जैसे स्वेज में हुआ, वैसे ही यहां भी असल जीत ईरान की तरफ झुकती दिख रही है। ईरान ने जवाबी हमले किए—अमेरिकी ठिकानों, इज़राइली क्षेत्रों, और खाड़ी देशों में मिसाइल-ड्रोन हमले। सबसे महत्वपूर्ण: ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। जहाजों पर हमले, खतरों की चेतावनी, और कुछ मामलों में माइन बिछाने की रिपोर्ट्स। दुनिया का 20% तेल इसी संकरे रास्ते से गुजरता है। परिणाम? तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर, वैश्विक ऊर्जा संकट, एशिया में ईंधन राशनिंग, और शिपिंग रूट्स में बदलाव। 

ईरान की रणनीति स्पष्ट है:

 सैन्य रूप से ताकतवर पर भारी पड़ा ओर युद्ध को अंतरराष्ट्रीय बनाना। अमेरिका और इज़राइल की सैन्य शक्ति से डटकर मुकाबला, ओर वैश्विक अर्थव्यवस्था को इतना महंगा बना सकता है कि दबाव बढ़े और मध्यस्थता की मांग हो। ठीक वैसे ही जैसे नासेर ने स्वेज में किया था—नहर बंद करके यूरोप की अर्थव्यवस्था को झटका दिया। 

अमेरिका की सबसे बड़ी गलती: स्वेज की याद

1956 में ब्रिटेन ने सोचा था कि सैन्य बल से पुरानी महाशक्ति की हैसियत बहाल हो जाएगी। लेकिन अमेरिका ने उन्हें रोक दिया। आज अमेरिका खुद उसी जाल में फंसता दिख रहा है। यह "अमेरिका की जंग नहीं है"—यह इज़राइल के एजेंडे में खिंचकर अपनी विदेश नीति का नियंत्रण खोने जैसा है। 

परिणाम पहले से दिख रहे हैं: 

→ तेल-गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, वैश्विक मुद्रास्फीति का खतरा। 

→ सहयोगी देश चुप हैं या विरोध कर रहे हैं—ट्रंप ने ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन से जहाज भेजने को कहा, लेकिन कोई साथ नहीं दे रहा। 

→ NATO में दरार, यूरोपीय देश डिप्लोमेसी की बात कर रहे हैं। 

→ अमेरिका अलग-थलग पड़ता जा रहा है, ठीक जैसे ब्रिटेन 1956 में हुआ था। 

स्वेज में पाउंड स्टर्लिंग की जगह डॉलर ने ली। आज क्या होगा? डॉलर की रिजर्व स्थिति पर सवाल उठ रहे हैं—यदि यह संकट लंबा चला, तो वैकल्पिक मुद्राओं (युआन, यूरो) की ओर दुनिया मुड़ सकती है। अमेरिका की "अनलॉफुल वॉर" की छवि मजबूत हो रही है, और उसके मित्र राष्ट्र सच बोलने से हिचकिचा रहे हैं। 

ओमान जैसी आवाजें: संवाद का रास्ता अभी बाकी है

ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी जैसे लोग चेतावनी दे रहे हैं—यह जंग अमेरिका के हितों के खिलाफ है। क्षेत्रीय अस्थिरता, ऊर्जा संकट, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा। स्वेज के बाद ब्रिटेन ने यूरोपीय एकीकरण की ओर रुख किया। आज अमेरिका को भी अपने सहयोगियों की सुननी होगी—युद्ध रोकना होगा, बातचीत की मेज पर लौटना होगा। 

इतिहास से सीखने का समय** स्वेज संकट ने साबित किया कि सैन्य विजय हमेशा राजनीतिक जीत नहीं होती। ब्रिटेन ने सुपरपावर का ताज खो दिया, पाउंड की हैसियत गई। आज होर्मुज पर वही कहानी दोहराई जा रही है—अमेरिका और इज़राइल सैन्य रूप से मजबूत हैं, लेकिन असल में हार रहे हैं। ईरान मजबूत हो रहा है, क्षेत्रीय राष्ट्रवाद उभर रहा है, और अमेरिका की वैश्विक छवि धूमिल हो रही है। 


क्या अमेरिका स्वेज की गलती दोहराएगा? या दुनिया अब जागेगी और इस "अवैध जंग" को रोकेगी? समय बता रहा है—शांति चुनना होगा, वरना विनाश की यह राह और लंबी हो जाएगी। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday 🌎 World March 19, 2026
March 19, 2026

Oman's Foreign Minister, Sayyid Badr Albusaidi, has delivered a bold and historic statement on the global stage. In his op-ed published in

Oman's Foreign Minister, Sayyid Badr Albusaidi, has delivered a bold and historic statement on the global stage. In his op-ed published in-Friday World March 19, 2026
The Economist (titled "America’s friends must help extricate it from an unlawful war"), he issued a stark warning: 

 "The superpower has lost control of its foreign policy." This declaration not only highlights deepening regional tensions but also expresses profound concern for global peace and stability. 

Peace repeatedly within reach, only to be derailed

  Twice in the past nine months, the United States and Iran came tantalizingly close to a genuine agreement on the most contentious issue dividing them: Iran’s nuclear-energy programme and America’s fears that it could mask a weapons effort. 

  Such a deal could have addressed U.S. security concerns, provided Iran relief from sanctions, and restored stability across the Middle East. 

 Oman, long respected as a neutral mediator, played a pivotal role in facilitating these indirect negotiations, with the Foreign Minister himself deeply involved in steering the talks forward. 

The February 28 sabotage

  Yet, on February 28, 2026—just hours after the most substantive and promising round of discussions in Geneva—Israel and the United States launched a joint, unlawful military strike.

   The attack shattered the fragile momentum toward peace that had felt genuinely achievable. 

  Albusaidi described it as “a shock but not a surprise,” noting that it deliberately targeted the very possibility of diplomacy that was “really possible.” 

Iran’s inevitable response

  Iran retaliated by striking what it described as American targets on the territory of neighboring countries. → The Omani minister called this reaction “inevitable, deeply regrettable, and completely unacceptable.” 

  However, he acknowledged that, faced with declarations from Israel and America framing the conflict as a war to “terminate the Islamic Republic,” Tehran’s leadership likely saw no other rational course of action. 

America’s greatest miscalculation

  According to Albusaidi, the Trump administration’s fatal error was allowing itself to be drawn into this war at all. 

  “This is not America’s war, and there is no likely scenario in which both Israel and America will get what they want from it.” 

  Instead, the conflict harms core U.S. interests: regional instability is escalating, oil and gas prices are soaring, and the global economy faces mounting threats. 

 He bluntly states that America has “lost control of its own foreign policy”—an uncomfortable truth that must be confronted. 

A call for allies to speak truth

  America’s friends and partners bear a responsibility to help Washington escape this “unwanted entanglement.” 

  They must tell the plain truth: this war is immoral, unlawful, and must be stopped. 

 Silence only prolongs the catastrophe. 

Oman’s enduring role as a bridge for dialogue

 Oman has consistently symbolized balance, moderation, and quiet diplomacy in a turbulent region. 

  It has repeatedly served as a trusted channel between the U.S. and Iran. 

 Albusaidi emphasized that the recent talks were “active and serious,” with peace “within our reach.” 

 Military action destroyed that prospect, but the path to de-escalation still exists. 

A roadmap back to negotiations

   The article is not mere criticism—it offers a practical way forward. 

  America and Iran should set aside enmity and return to the negotiating table, however difficult that may be. 

  Both nations’ true national interests lie in ending hostilities: reducing nuclear risks, easing economic sanctions, and rebuilding regional calm.

  Resumption of talks, even indirect and mediated, remains the only viable escape from endless war. 

A global message: the time to speak out is now** 

 America’s allies—especially Gulf states and European partners—must break their silence. 

 They should openly declare that this conflict serves no one’s long-term benefit and that Washington is entangled in someone else’s agenda at the expense of its own independence. 

 Albusaidi’s piece is more than diplomatic prose: it is a warning, a plea, and a flicker of hope. 

 If the world fails to act, the war could widen, drawing in more nations. 

 But if honest voices prevail and mediation resumes, peace is still attainable. The international community must unite to halt this “unlawful war.” Countries like Oman, which prioritize dialogue over destruction, are leading by example. The question now rests with the rest of the world: will we choose peace, or allow the path of devastation to continue? 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 19, 2026
March 19, 2026

ओमान के विदेश मंत्री सय्यिद बद्र अल-बुसैदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ऐतिहासिक और साहसिक बयान दिया है।

ओमान के विदेश मंत्री सय्यिद बद्र अल-बुसैदी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ऐतिहासिक और साहसिक बयान दिया है।
-Friday World March 19,2026 
द इकोनॉमिस्ट में प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने अमेरिकी विदेश नीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी है कि "अमेरिका ने अपनी विदेश नीति पर से नियंत्रण खो दिया है।" यह बयान न केवल क्षेत्रीय तनाव को दर्शाता है, बल्कि वैश्विक शांति के लिए एक गहरी चिंता भी व्यक्त करता है। 

 शांति के करीब पहुंचकर फिर ठोकर लगना पिछले नौ महीनों में दो बार ऐसा हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच एक वास्तविक समझौते की संभावना मजबूत हो गई थी। यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिकी चिंताओं को दूर करने और क्षेत्र में स्थिरता लाने का आधार बन सकता था। ओमान, जो लंबे समय से दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाता आ रहा है, ने इन बातचीतों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

लेकिन 28 फरवरी को ठीक वैसा ही हुआ, जिसकी आशंका थी। सबसे ठोस और उत्पादक वार्ता के कुछ ही घंटों बाद इज़राइल और अमेरिका ने संयुक्त रूप से एक गैर-कानूनी सैन्य हमला कर दिया। यह हमला शांति प्रक्रिया के ठीक बीच में आया, जैसे कोई जानबूझकर आग में घी डाल रहा हो। बद्र अल-बुसैदी इसे "शॉक लेकिन सरप्राइज नहीं" बताते हैं। उन्होंने लिखा है कि यह हमला शांति की उस संभावना को कुचलने वाला था जो "वास्तव में संभव" लग रही थी। 

ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई अपरिहार्य थी। तेहरान ने इसे अपने पड़ोसियों की सरज़मीन पर अमेरिकी ठिकानों पर हमला बताकर जवाब दिया। यह प्रतिक्रिया "गहरा अफसोसनाक और पूरी तरह अस्वीकार्य" थी, लेकिन ईरानी नेतृत्व के सामने शायद यही एकमात्र तर्कसंगत विकल्प बचा था—जब अमेरिका और इज़राइल ने इसे "इस्लामिक रिपब्लिक को समाप्त करने" की जंग करार दिया था। 

अमेरिका की सबसे बड़ी गलतफहमी ओमान के विदेश मंत्री के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी भूल यही थी कि वह इस जंग में खिंच गया। यह "अमेरिका की जंग नहीं है।" ऐसा कोई परिदृश्य नहीं दिखता जिसमें इज़राइल और अमेरिका दोनों अपनी मंजिल हासिल कर सकें। बल्कि यह जंग अमेरिकी हितों के खिलाफ जा रही है—क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है, तेल-गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर खतरा मंडरा रहा है। 

बद्र अल-बुसैदी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि अमेरिका ने अपनी विदेश नीति का नियंत्रण खो दिया है। यह "असहज सत्य" है, लेकिन इसे स्वीकार करना ज़रूरी है। अमेरिका के मित्र देशों की ज़िम्मेदारी है कि वे वाशिंगटन को इस "अवांछित उलझन" से बाहर निकालने में मदद करें। उन्हें सच बोलना होगा—यह जंग अनैतिक और गैर-कानूनी है, और इसे रोकना होगा। 

 क्षेत्रीय मध्यस्थता और ओमान की भूमिका ओमान हमेशा से मध्य पूर्व में संतुलन और संवाद का प्रतीक रहा है। इस छोटे लेकिन बुद्धिमान देश ने कई बार अमेरिका-ईरान के बीच पुल का काम किया है। बद्र अल-बुसैदी खुद इन नवीनतम परमाणु वार्ताओं के प्रमुख मध्यस्थ थे। उन्होंने बार-बार कहा कि बातचीत "सक्रिय और गंभीर" थीं, और शांति "हमारी पहुंच में" थी। लेकिन सैन्य कार्रवाई ने सब कुछ बर्बाद कर दिया। 

यह लेख सिर्फ आलोचना नहीं है—यह एक रोडमैप भी है। विदेश मंत्री सुझाव देते हैं कि अमेरिका और ईरान को दुश्मनी छोड़कर फिर से बातचीत की मेज पर लौटना होगा। भले ही यह मुश्किल हो, लेकिन युद्ध से बचने का रास्ता इसी में है। दोनों पक्षों के राष्ट्रीय हित शांति और समझौते में ही हैं—परमाणु खतरे को कम करना, आर्थिक प्रतिबंधों से राहत, और क्षेत्र में स्थिरता। 

वैश्विक संदेश: सच बोलने का समय यह लेख एक बड़े संदेश के साथ आता है—मित्र राष्ट्रों को चुप नहीं रहना चाहिए। अमेरिका के सहयोगी, खासकर खाड़ी देश और यूरोपीय साझेदार, अब खुलकर बोलें। उन्हें कहना होगा कि यह जंग अमेरिका के लिए फायदेमंद नहीं है। यह इज़राइल के एजेंडे में फंसकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति खोने जैसा है।

 बद्र अल-बुसैदी का लेख सिर्फ राजनयिक भाषा नहीं है—यह एक चेतावनी है, एक पुकार है, और एक उम्मीद भी। अगर दुनिया अब नहीं जागी, तो यह जंग और विस्तारित हो सकती है, जिसमें और देश खिंच सकते हैं। लेकिन अगर सच बोला गया, अगर मध्यस्थता फिर से शुरू हुई, तो शांति अभी भी संभव है। 

यह समय है कि वैश्विक समुदाय इस "अवैध जंग" को रोकने के लिए एकजुट हो। ओमान जैसे देश, जो संवाद में विश्वास रखते हैं, आगे आ रहे हैं। अब बारी बाकी दुनिया की है—क्या हम शांति चुनेंगे, या विनाश की इस राह पर चलते रहेंगे? 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 19,2026 
March 19, 2026

सोना-चांदी में लगातार छठे दिन भयंकर गिरावट! आज सोने में 1700 रुपये का भारी नुकसान, चांदी में 7300+ रुपये का धड़ाधड़ गिरावट

सोना-चांदी में लगातार छठे दिन भयंकर गिरावट! आज सोने में 1700 रुपये का भारी नुकसान, चांदी में 7300+ रुपये का धड़ाधड़ गिरावट
-Friday World March 19,2026 
मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच भी क्यों टूट रहे दाम? मिडिल ईस्ट में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रहा है, लेकिन काउंटर-इंट्यूटिव तरीके से कीमती धातुओं के बाजार में भारी गिरावट देखी जा रही है। सोना और चांदी के भाव लगातार छठे दिन गिर रहे हैं, और आज (19 मार्च 2026) MCX पर सोने में करीब 1700-1725 रुपये का भारी गिरावट दर्ज हुई, जबकि चांदी में एक दिन में ही 7300 से ज्यादा रुपये का धड़ाधड़ गिरावट आया। यह स्थिति तब है जब क्रूड ऑयल के दाम 112 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चढ़ गए हैं और रुपया डॉलर के सामने 93.13 के नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। 

यह गिरावट सुरक्षित निवेश (safe-haven) की धारणा को चुनौती दे रही है। आइए विस्तार से समझते हैं कि क्या हो रहा है और इसका भारत पर क्या असर पड़ रहा है। 

 सोने में लगातार गिरावट: MCX पर आज का हाल MCX (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज) पर सोने के जून वायदा अनुबंध में आज भारी बिकवाली देखी गई।

 - पिछला बंद भाव (Prev. Close): ₹1,53,025 प्रति 10 ग्राम

 - आज का ओपन: ₹1,51,941

 - दिन का उच्च स्तर (High): ₹1,52,449 - दिन का निचला स्तर (Low): ₹1,51,300 (कुछ रिपोर्ट्स में ₹1,51,429 तक)

 - वर्तमान भाव (समाचार लिखे जाने तक): ₹1,51,429 (लगभग 1.04% या 1,596-1,725 रुपये की गिरावट) 

यह छठा लगातार दिन है जब सोने के दाम टूट रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कॉमेक्स गोल्ड $4,700-$5,000 के आसपास दबाव में है, जहां से हाल के हफ्तों में 6-8% तक की गिरावट आई है। भारत में 24 कैरेट सोने की कीमत अब ₹1,51,000-1,52,000 प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गई है, जो कुछ हफ्ते पहले के उच्च स्तरों से काफी नीचे है। 

चांदी में और भी भयंकर गिरावट: एक दिन में 7300+ का नुकसान चांदी सोने से ज्यादा प्रभावित हुई है, क्योंकि यह औद्योगिक धातु भी है। MCX पर चांदी के मई वायदा में आज बड़ा धक्का लगा:

 - पिछला बंद भाव: ₹2,48,194 प्रति किलो 

- आज का ओपन: ₹2,45,000

 - दिन का उच्च: ₹2,45,674

 - दिन का निचला: ₹2,40,854 

- वर्तमान भाव: ₹2,41,500 (लगभग 2.70% या 6,694-7,340 रुपये की गिरावट) 

चांदी में यह गिरावट सोने से दोगुनी तेज है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिल्वर $71-$78 प्रति औंस के आसपास दबाव में है। औद्योगिक मांग (सोलर, इलेक्ट्रॉनिक्स) में संभावित सुस्ती और मजबूत डॉलर ने चांदी को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। 

गिरावट के मुख्य कारण: युद्ध के बावजूद क्यों टूट रहे दाम? आमतौर पर युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव में सोना-चांदी सुरक्षित निवेश के रूप में चढ़ते हैं, लेकिन इस बार उलटा हो रहा है। मुख्य कारण: 

1. मजबूत अमेरिकी डॉलर (Dollar Strength)  USD इंडेक्स 100 के ऊपर स्थिर है। मजबूत डॉलर से डॉलर-मूल्य वाली कीमती धातुएं महंगी हो जाती हैं, जिससे मांग घटती है। रुपया भी 93.13 पर रिकॉर्ड लो पर है, लेकिन डॉलर की ताकत ने दबाव बढ़ाया। 

2. उच्च क्रूड ऑयल कीमतें और इन्फ्लेशन का डर: ब्रेंट क्रूड $112+ और WTI $96+ पर है। उच्च ऊर्जा कीमतें इन्फ्लेशन बढ़ाती हैं, जिससे फेड और अन्य सेंट्रल बैंक ब्याज दरें काटने की बजाय टाइट पॉलिसी पर विचार कर सकते हैं। उच्च ब्याज दरें नॉन-यील्डिंग एसेट्स (सोना) के लिए नुकसानदायक हैं। 

3. प्रॉफिट बुकिंग और लिक्विडेशन: हाल के महीनों में सोना-चांदी रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचे थे। युद्ध की शुरुआत में सुरक्षित मांग से तेजी आई, लेकिन अब प्रॉफिट बुकिंग और मजबूर बिकवाली (margin calls) से गिरावट तेज हुई। ETF से गोल्ड आउटफ्लो भी देखा गया। 

4. वैश्विक रिस्क-ऑफ से अलग ट्रेंड: युद्ध से ऊर्जा संकट बढ़ा, लेकिन बाजार अब री-इन्फ्लेशनरी प्रेशर देख रहा है, जो ब्याज दरों को ऊंचा रख सकता है। इससे सोने की अपील कम हुई। 

 भारत पर असर: महंगाई और अर्थव्यवस्था पर दोहरा झटका

 - रुपया कमजोर: 93.13 पर पहुंचकर आयात महंगा, महंगाई बढ़ेगी। 

- तेल महंगा: क्रूड $112+ से पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट, उर्वरक महंगे। 

- सोना-चांदी सस्ता: ज्वेलरी, निवेश के लिए अच्छा समय, लेकिन गिरावट से निवेशकों का नुकसान। 

- कुल मिलाकर: ऊर्जा संकट से महंगाई, लेकिन कीमती धातुओं में गिरावट से कुछ राहत। लंबे समय में अगर युद्ध चला तो सोना फिर चढ़ सकता है। 

आगे क्या? विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों का कहना है कि अगर डिप्लोमेसी कामयाब हुई और तनाव कम हुआ, तो 3-8% और गिरावट संभव। लेकिन अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ या युद्ध बढ़ा, तो सुरक्षित मांग से सोना-चांदी फिर रिकॉर्ड बना सकते हैं। फिलहाल बाजार में अस्थिरता बनी रहेगी। 

यह घटना याद दिलाती है कि कीमती धातुओं का बाजार कितना जटिल और वैश्विक कारकों से जुड़ा है। निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए – गिरावट में खरीदारी का मौका, लेकिन जोखिम भी ज्यादा।

 Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 19,2026 
March 19, 2026

अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर: शेयर बाजार में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट, रुपया डॉलर के सामने रिकॉर्ड निचले स्तर पर, महंगाई का खतरा बढ़ा

अमेरिका-इज़राइल बनाम ईरान युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा असर: शेयर बाजार में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट, रुपया डॉलर के सामने रिकॉर्ड निचले स्तर पर, महंगाई का खतरा बढ़ा
-Friday World March 19,2026
पश्चिम एशिया में अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला रहा है, और भारत जैसे ऊर्जा आयात-निर्भर देश पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुए इस संघर्ष ने मार्च 2026 में भारतीय शेयर बाजार, रुपए की कीमत, तेल-गैस कीमतों और महंगाई को बुरी तरह प्रभावित किया है। कतर के रास लफ्फान गैस फील्ड पर ईरान के हमलों ने LNG सप्लाई को ठप कर दिया, जिससे वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह युद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित कर रहा है।
 1. भारतीय शेयर बाजार में अब तक की सबसे बड़ी गिरावट

युद्ध शुरू होने के बाद से भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली हुई है। मार्च 2026 में यह गिरावट सबसे तेज और व्यापक रही:

- Sensex और Nifty की भारी गिरावट: फरवरी 27, 2026 से Sensex लगभग 6,000-6,147 अंक गिर चुका है (लगभग 7.5% की गिरावट), जबकि Nifty 50 में 7-8% तक की गिरावट दर्ज की गई। एक हफ्ते में Nifty 5.3% और Sensex 5.5% गिरा, जो 2022 के बाद सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट है।

- निवेशकों का नुकसान: बाजार पूंजीकरण में ₹30-34 लाख करोड़ तक की कमी आई है। कुछ रिपोर्ट्स में यह आंकड़ा ₹11 लाख करोड़ से लेकर ₹31 लाख करोड़ तक बताया गया। 400 से ज्यादा स्टॉक्स में दोहरे अंकों (10%+) की गिरावट आई, जिसमें मिडकैप और स्मॉलकैप सबसे ज्यादा प्रभावित हुए।
 कारण: वैश्विक अनिश्चितता, तेल कीमतों में उछाल (Brent crude $100+ प्रति बैरल), विदेशी निवेशकों का ₹52,000 करोड़+ का निकासी (FPI outflows), और रिस्क-ऑफ मूड। बैंकिंग, ऑटो, इंफ्रा, एविएशन जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा गिरे, जबकि एनर्जी और डिफेंस सेक्टर में कुछ तेजी देखी गई।

- वैश्विक प्रभाव: अमेरिका और अन्य बाजारों में भी गिरावट आई, लेकिन भारत जैसे उभरते बाजारों पर ज्यादा असर पड़ा क्योंकि विदेशी पूंजी सुरक्षित जगहों (US डॉलर, गोल्ड) की ओर भागी।

यह गिरावट युद्ध की अनिश्चितता से जुड़ी है – अगर संघर्ष लंबा चला, तो और गिरावट संभव है, लेकिन अगर तनाव कम हुआ तो रिकवरी भी तेज हो सकती है।
 2. रुपया डॉलर के सामने सबसे निचले स्तर पर
रुपए की कीमत में तेज गिरावट आई है, जो युद्ध का सीधा असर है:


- रिकॉर्ड लो स्तर: मार्च 2026 में USD/INR 93+ के स्तर पर पहुंच गया (कुछ दिनों में 92.5 से 93.3 तक), जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। पहले यह 90-91 के आसपास था, लेकिन युद्ध के बाद तेज गिरावट आई।

- कारण: 

  - विदेशी निवेशकों का पूंजी निकासी (कैपिटल फ्लाइट)।

  - तेल-गैस आयात महंगा होने से करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ना।

  - सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर की मांग बढ़ना।

- असर: 

  - आयात महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी (इंपोर्टेड इन्फ्लेशन)।

  - हर 1% रुपया कमजोर होने से तेल आयात बिल में अरबों का बोझ बढ़ता है।

  - RBI हस्तक्षेप कर रहा है, लेकिन लंबे समय तक दबाव बना रह सकता है।

3. महंगाई में बड़ा उछाल: रसोड़ा और अर्थव्यवस्था पर असर

युद्ध ने ऊर्जा कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया, जो भारत के लिए डबल झटका है:


- तेल कीमतें: Brent crude $100-110+ प्रति बैरल पर। ईरान के हमलों से Strait of Hormuz में तनाव बढ़ा, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है। भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, इसलिए हर $10 की बढ़ोतरी से CAD 0.5% बढ़ता है और महंगाई 0.35% तक बढ़ सकती है।

- LNG और गैस संकट: कतर के रास लफ्फान पर ईरान के मिसाइल/ड्रोन हमलों से उत्पादन ठप। कतर से भारत 45-47% LNG आयात करता है (12-13 मिलियन टन सालाना)। वैश्विक LNG कीमतें 30-50% उछलीं, जिससे भारत को महंगे स्पॉट मार्केट से गैस खरीदनी पड़ रही है।

- महंगाई का खतरा: 

  - LPG सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल, बिजली, उर्वरक, ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे।


  - घरेलू महंगाई (CPI) में 0.5-1%+ का इजाफा संभव।

  - इंडस्ट्रीज (फर्टिलाइजर, सीमेंट, केमिकल) प्रभावित, उत्पादन कटौती और कीमतें बढ़ना।

  - अगर युद्ध लंबा चला, तो रिसेशन का खतरा भी।

4. अन्य प्रभाव और चुनौतियां

- रेमिटेंस का जोखिम: गल्फ में 9 मिलियन भारतीय कामगार हैं, जो $50 बिलियन+ रेमिटेंस भेजते हैं। युद्ध से नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं।


- ट्रेड और सप्लाई चेन: शिपिंग में 25% वॉर रिस्क सरचार्ज, देरी, महंगे फ्रेट।

- सरकार की चुनौतियां: ऊर्जा विविधीकरण (अमेरिका, रूस से ज्यादा आयात), स्टॉकपाइल बढ़ाना, रिन्यूएबल एनर्जी पर फोकस। फिलहाल कोई कमी नहीं, लेकिन लंबे संकट में महंगाई और ग्रोथ प्रभावित होगी।

यह युद्ध भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, महंगाई नियंत्रण और आर्थिक स्थिरता का बड़ा परीक्षण है। अगर तनाव जल्द थमा, तो रिकवरी संभव है, लेकिन अगर हॉर्मुज स्ट्रेट बंद रहा या हमले बढ़े, तो असर और गहरा होगा। निवेशकों को सतर्क रहना चाहिए – लॉन्ग-टर्म फंडामेंटल्स मजबूत हैं, लेकिन शॉर्ट-टर्म में अस्थिरता बनी रहेगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 19,2026