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June 08, 2026
"15 महीने में किले से कतार तक: जब PM की कुर्सी का सपना, INDIA की शरण में ले आया"
"15 महीने में किले से कतार तक: जब PM की कुर्सी का सपना, INDIA की शरण में ले आया"
- Friday World 8 Jun 2026
राजनीति में 15 महीने का वक्त बहुत लंबा होता है। इतने में तख्त बदल जाते हैं, ताज उतर जाते हैं, और जो खुद को शहंशाह समझते हैं वो सियासी फुटपाथ पर आ जाते हैं।
तस्वीर देखिए। एक वक्त था जब ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की मुलाकात 'किंगमेकर' वाली होती थी। दोनों के चेहरे पर वो आत्मविश्वास था कि दिल्ली अभी दूर नहीं। दोनों को लगता था कि उनका राज्य उनका अभेद किला है। दोनों की आंखों में प्रधानमंत्री बनने का सपना था। और दोनों की राजनीति की पहली शर्त थी - कांग्रेस से दूरी और राहुल गांधी से नफरत।
15 महीने पहले का सियासी नक्शा
15 महीने पहले का सीन याद करिए।
1. दोनों मुख्यमंत्री थे: एक बंगाल की शेरनी, दूसरा दिल्ली का 'आम आदमी'। कुर्सी की गर्मी से ज्यादा घमंड की गर्मी थी।
2. दोनों विधायक थे: जनता का भरोसा जेब में था। लगता था कि ये भरोसा कभी टूटेगा ही नहीं।
3. किला अभेद्य था: ममता को लगता था बंगाल में TMC को कोई हिला नहीं सकता। केजरीवाल को लगता था दिल्ली और पंजाब उनका जागीर है।
4. PM का सपना: विपक्षी एकता की हर बैठक में दोनों खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानकर बैठते थे। नीतीश, अखिलेश, उद्धव सबको किनारे कर यही दोनों आगे थे।
5. कांग्रेस से एलर्जी: राहुल गांधी का नाम सुनते ही दोनों के चेहरे का रंग उड़ जाता था। कांग्रेस को 'खत्म पार्टी' बताकर अकेले चलने का दम भरा जाता था। 'एकला चलो' का नारा इनकी जुबान पर था।
उस वक्त ये दोनों विपक्ष की राजनीति के 'सोलो प्लेयर' थे। गठबंधन को कमजोरी मानते थे। लगता था कि अकेले ही 2024 फतह कर लेंगे।
15 महीने बाद: घमंड से गठबंधन तक का सफर
और फिर 15 महीने में बाजी पलट गई। लोकतंत्र ने अपना रंग दिखाया। जनता ने बता दिया कि कुर्सी किसी की बपौती नहीं होती।
1. ना रहे मुख्यमंत्री, ना रहे विधायक: दिल्ली में AAP का सूपड़ा साफ हो गया। अरविंद केजरीवाल खुद अपनी सीट हार गए। बंगाल में TMC का वो जलवा नहीं रहा। ममता बनर्जी के कई दिग्गज मंत्री-विधायक हार की धूल चाट गए। जो कल तक विधानसभा में दहाड़ते थे, आज सड़क पर सन्नाटा ओढ़े हैं।
2. अपने ही गढ़ में करारी हार: केजरीवाल ने पंजाब-दिल्ली-गोवा-गुजरात में पार्टी फैलाने का सपना देखा था। हुआ उल्टा। दिल्ली में BJP ने क्लीन स्वीप कर दिया। पंजाब में भगवंत मान की सरकार भी हिल गई। उधर बंगाल में BJP और लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन ने TMC के अभेद किले में बड़ी सेंध लगा दी। पंचायत से लेकर लोकसभा तक, हर जगह झटका लगा।
3. पार्टी में बगावत, संगठन चरमराया: हार के बाद दोनों पार्टियों में भगदड़ मच गई। AAP के कई बड़े चेहरे BJP में चले गए। शराब घोटाले और जेल यात्राओं ने पार्टी की कमर तोड़ दी। TMC में भी शुभेंदु अधिकारी के जाने के बाद से जो टूट शुरू हुई, वो रुकी नहीं। ED-CBI की कार्रवाई से नेता सहमे हुए हैं। जो पार्टी कल तक 'अनुशासन' का उदाहरण थी, आज 'अवसरवादी' नेताओं का अड्डा बन गई है।
4. अब याद आया INDIA गठबंधन: यही सबसे बड़ा यू-टर्न है। 15 महीने पहले जो केजरीवाल कांग्रेस के मंच पर जाने से कतराते थे, आज वो INDIA गठबंधन की बैठकों में सबसे आगे बैठते हैं। जो ममता राहुल गांधी को 'PM मटेरियल' नहीं मानती थीं, आज वो गठबंधन धर्म निभाने की बात करती हैं। क्यों? क्योंकि अकेले लड़ने की औकात नहीं बची। जब सत्ता गई, अहंकार टूटा, तब समझ आया कि विपक्षी एकता मजबूरी नहीं, जरूरत है।
दीदी और मफलर में फर्क क्यों?
अब सवाल ये कि जनता का गुस्सा दोनों पर बराबर क्यों नहीं? 'ममता तो ठीक है, पर मफलर छाप कतई बर्दाश्त नहीं' वाली बात क्यों हो रही है?
इसका जवाब सियासी चरित्र में छुपा है।
ममता बनर्जी: मानो या ना मानो, ममता सड़क की लड़ाई लड़कर आई हैं। 34 साल के वामपंथी किले को उन्होंने अकेले तोड़ा था। लाठी खाई हैं, सिर फुड़वाया है। उनके अंदर एक 'फाइटर' की छवि आज भी जिंदा है। उनकी राजनीति में बंगाल की अस्मिता, बंगाली संस्कृति का तड़का है। हारने के बाद भी वो कार्यकर्ताओं के बीच जाती हैं। गलतियां की हैं, तुष्टिकरण के आरोप लगे हैं, पर जनता को लगता है कि 'दीदी अपनी है'। उनका अहंकार 'जमीन' से जुड़ा था, 'AC कमरे' से नहीं। इसलिए हार के बाद भी बंगाल में उनके लिए सॉफ्ट कॉर्नर बचा हुआ है। लोग कहते हैं, 'दीदी ने लड़ना तो सिखाया'।
अरविंद केजरीवाल: यहां कहानी उलट है। केजरीवाल 'आंदोलन' से निकले, पर 'सत्ता' में आते ही आंदोलनकारी चोला उतार फेंका। मफलर, स्वेटर और खांसी वाली 'आम आदमी' की इमेज एक PR स्टंट बनकर रह गई। शीशमहल विवाद, शराब घोटाला, मंत्री सत्येंद्र जैन और मनीष सिसोदिया का जेल जाना, राज्यसभा सीटों की सौदेबाजी - इन सबने 'कट्टर ईमानदार' का मुखौटा नोच डाला।
उनका सबसे बड़ा गुनाह अहंकार नहीं, 'धोखा' माना गया। जनता को लगा कि जिस 'बदलाव' के लिए उन्होंने वोट दिया था, केजरीवाल खुद वही 'सिस्टम' बन गए जिससे लड़ने की बात करते थे। पंजाब में कानून-व्यवस्था फेल, दिल्ली में यमुना मैली की मैली, और हर नाकामी का ठीकरा केंद्र पर फोड़ना। ऊपर से प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी।
ममता जब हारती हैं तो लगता है एक 'योद्धा' हारा है। केजरीवाल जब हारते हैं तो लगता है एक 'नौटंकीबाज' एक्सपोज हुआ है। दीदी की हार में संघर्ष है, मफलर की हार में ड्रामा। यही फर्क है।
सबक क्या है? 15 महीने की कहानी से 5 बड़ी सीख
1. जनता मालिक है, ठेकेदार नहीं: कोई भी नेता खुद को अजेय समझने की गलती ना करे। कुर्सी जनता देती है, जनता ही छीनती है। 'मेरा किला सुरक्षित है' का घमंड सबसे पहले टूटता है।
2. नफरत की राजनीति लंबी नहीं चलती: सिर्फ मोदी विरोध या राहुल विरोध से पार्टी नहीं चलती। आपके पास अपना 'पॉजिटिव एजेंडा' होना चाहिए। कांग्रेस से नफरत करते-करते खुद खत्म हो गए, पर कांग्रेस आज भी जिंदा है।
3. गठबंधन कमजोरी नहीं, ताकत है: आज की तारीख में कोई भी पार्टी अकेले BJP का मुकाबला नहीं कर सकती। जो 15 महीने पहले गठबंधन को ठुकरा रहे थे, आज उसी के दरवाजे पर कटोरा लिए खड़े हैं।
4. चरित्र पर दाग सबसे भारी पड़ता है: ममता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, पर 'कट मनी' और 'टोलबाजी' तक सीमित रहे। केजरीवाल पर 'शराब घोटाले' का सीधा आरोप लगा। जनता भ्रष्टाचार बर्दाश्त कर लेती है, पर 'ईमानदारी का ढोंग' बर्दाश्त नहीं करती।
5. PM का सपना देखने से पहले CM की कुर्सी बचाओ: दिल्ली और बंगाल संभला नहीं, चल पड़े देश संभालने। जनता ने आइना दिखा दिया कि पहले गली संभालो, फिर दिल्ली की बात करना।
आखिर में
ये तस्वीर बहुत कुछ कहती है। गुलदस्ता देने वाले हाथ में अब सत्ता नहीं है। लेने वाले हाथ में भी पहले वाली मजबूती नहीं है। 15 महीने पहले ये मुलाकात 'रणनीति' थी, आज ये 'मजबूरी' है।
राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, ये बात पुरानी हो गई। नई बात ये है कि राजनीति में 'स्थायी अहंकार' भी नहीं चलता। जो वक्त रहते झुक गया, वो शायद बच गया। जो अकड़ में रहा, वो टूट गया।
ममता बनर्जी शायद फिर उठ जाएंगी, क्योंकि उनके पास खोने के लिए सत्ता के सिवा 'संघर्ष' अभी बाकी है। पर 'मफलर मैन' के लिए वापसी मुश्किल है। क्योंकि जनता ने उनके 'आम आदमी' वाले ड्रामे को देख लिया है। और हिंदुस्तान की जनता एक बात कभी नहीं भूलती - उसे कोई 'बेवकूफ' बनाए, ये कतई बर्दाश्त नहीं।
15 महीने में सियासत का ये सबक है: किले ढह जाते हैं, पर किरदार जिंदा रहता है। दीदी का किरदार अभी बचा है, मफलर का दांव पर लग चुका है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 8 Jun 2026