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Friday, 19 June 2026

June 19, 2026

ट्रम्प ने हर तरह के दांव-पेंच अपनाए... ईरान-अमेरिका डील पर खामेनेई का बड़ा बयान: 'मेरा मत अलग था, लेकिन मंजूरी दे दी'

ट्रम्प ने हर तरह के दांव-पेंच अपनाए... ईरान-अमेरिका डील पर खामेनेई का बड़ा बयान: 'मेरा मत अलग था, लेकिन मंजूरी दे दी'
-Friday World 19 Jun 2026
ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव और युद्ध की आशंकाओं के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने इस्लामाबाद मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जो दोनों देशों के बीच युद्ध समाप्त करने और आगे की बातचीत का रास्ता खोलता है। इस डील के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का पहला आधिकारिक बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने अपनी शंकाओं को स्वीकार करते हुए डील को मंजूरी देने की बात कही है।

यह डील न केवल दोनों देशों के बीच तनाव कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल आपूर्ति और मध्य पूर्व की स्थिरता पर भी गहरा असर डालेगी। आइए विस्तार से समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम को, खामेनेई के बयान का महत्व और इसके संभावित प्रभावों को।

 खामेनेई का बयान: शंकाओं के बावजूद मंजूरी क्यों?

मोजतबा खामेनेई ने लिखित बयान में स्पष्ट किया कि अमेरिका के साथ इस MoU पर उनके मन में कुछ आपत्तियां और संदेह थे। फिर भी, उन्होंने राष्ट्रपति पेजेश्कियान और उच्च सुरक्षा अधिकारियों के आश्वासन पर डील को मंजूरी दे दी। उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति पेजेश्कियान और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सदस्यों ने मुझे आश्वासन दिया कि ईरान के हितों की रक्षा की जाएगी।"

खामेनेई ने आगे ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने "उत्साह और हताशा" में इस डील को साकार करने के लिए हर तरह का दबाव और प्रभाव का इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि सिद्धांत रूप से उनका मत अलग था, लेकिन ईरानी नेतृत्व की प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्होंने अनुमति दे दी।

अमेरिका को साफ चेतावनी: खामेनेई ने भविष्य की बातचीत पर भी जोर देते हुए कहा, "हम अमेरिका के दृष्टिकोण को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। अगर अमेरिका अत्यधिक मांगें रखेगा तो हम उन्हें मानने वाले नहीं हैं।" यह बयान ईरान की 'प्रतिरोध की धुरी' (Resistance Front) की मजबूती और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का संदेश देता है।

यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खामेनेई ईरान की सर्वोच्च सत्ता हैं। उनका अनुमोदन डील को घरेलू स्तर पर वैधता प्रदान करता है, जबकि उनकी शंकाएं ईरान की सतर्क नीति को दर्शाती हैं।

 डील के मुख्य बिंदु: क्या-क्या हुआ समझौते में?

इस MoU के तहत:
- दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों (खासकर लेबनान) पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से समाप्त करने का वादा किया।

- अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकाबंदी हटा ली।

- होर्मुज की खाड़ी को 60 दिनों के लिए टोल-फ्री खोल दिया गया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का 20% प्रभावित करता था।

- ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने और IAEA निरीक्षण स्वीकार करने का वादा किया।

- आगे 60 दिनों में पूर्ण समझौते के लिए बातचीत होगी, जिसमें प्रतिबंध हटाना और आर्थिक राहत शामिल है।

ट्रंप ने इसे "आर्थिक आपदा" से बचने का कदम बताया, जबकि पेजेश्कियान ने इसे ईरान के हितों की रक्षा बताई। पाकिस्तान की मध्यस्थता भी इस डील में अहम रही।

ऐतिहासिक संदर्भ: पुरानी दुश्मनी से नई शुरुआत?

ईरान-अमेरिका संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल में JCPOA (परमाणु समझौता) से अमेरिका के बाहर निकलने के बाद टकराव बढ़ा। हालिया संघर्ष में अमेरिकी हमलों और ईरानी प्रतिक्रियाओं ने दुनिया को युद्ध की कगार पर ला खड़ा किया था।

यह डील उस पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है जहां:

- आर्थिक प्रभाव: होर्मुज खाड़ी खुलने से तेल कीमतें स्थिर होंगी, वैश्विक व्यापार को राहत मिलेगी।

- क्षेत्रीय स्थिरता: लेबनान, इराक और सीरिया जैसे मोर्चों पर शांति की संभावना बढ़ी।

- परमाणु मुद्दा: IAEA निगरानी के तहत ईरान का कार्यक्रम पारदर्शी बनेगा।

हालांकि, इजराइल जैसे सहयोगी अभी भी सतर्क हैं, और कुछ आलोचक इसे अमेरिका की "पीछे हटने" की रणनीति मानते हैं।

खामेनेई के बयान का रणनीतिक महत्व

खामेनेई का बयान ईरान की आंतरिक राजनीति को भी संबोधित करता है। ईरान में कट्टरपंथी तत्व इस डील को "समर्पण" मान सकते थे, लेकिन सुप्रीम लीडर की मंजूरी इसे "राष्ट्रीय हित" का हिस्सा बनाती है। उन्होंने "प्रतिरोध की धुरी" (Hezbollah, Houthis आदि) की सुरक्षा का जिक्र कर कट्टर समर्थकों को आश्वस्त किया।

ट्रंप की "दबाव की रणनीति" को स्वीकार करते हुए खामेनेई ने अमेरिका को कमजोर दिखाया, जो घरेलू स्तर पर ईरानी गर्व को बढ़ावा देता है। भविष्य की बातचीत में ईरान "अत्यधिक मांगों" का विरोध कर सकता है, जो डील को नाजुक बनाता है।

 संभावित चुनौतियां और आगे का रास्ता

1. 60 दिनों की समयसीमा: इस दौरान पूर्ण समझौता (UN-समर्थित) होना है। परमाणु, प्रतिबंध और क्षेत्रीय मुद्दे जटिल हैं।

2. इजराइल का रुख: इजराइल लेबनान में अभियान जारी रख सकता है, जो डील को प्रभावित करे।

3. आर्थिक राहत: अमेरिका द्वारा संपत्ति छोड़ना और पुनर्निर्माण सहायता पर अमल मुश्किल हो सकता है।

4. ईरान की घरेलू राजनीति: यदि डील फेल हुई तो खामेनेई और पेजेश्कियान पर दबाव बढ़ेगा।

विश्लेषकों का मानना है कि यह डील "अंतरिम" है, लेकिन अगर सफल हुई तो मध्य पूर्व का नक्शा बदल सकता है।

 शांति की उम्मीद या नया खेल?

ट्रंप की आक्रामक कूटनीति और खामेनेई की सतर्क मंजूरी ने एक नया अध्याय शुरू किया है। ईरान-अमेरिका संबंधों में यह पहला बड़ा ब्रेकथ्रू है, जो युद्ध की बजाय बातचीत को प्राथमिकता देता है। हालांकि, इतिहास गवाह है कि ऐसे समझौते नाजुक होते हैं।

दुनिया अब 60 दिनों का इंतजार कर रही है। क्या यह स्थायी शांति लाएगा या सिर्फ एक सांस लेने का मौका? समय बताएगा। ईरान की जनता, क्षेत्रीय शक्तियां और वैश्विक अर्थव्यवस्था इस डील के नतीजों पर नजर रखे हुए हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 19 Jun 2026
June 19, 2026

राख में तब्दील EVM और सवालों के धुएं में घिरता लोकतंत्र: भरोसे की चिता कब बुझेगी?

राख में तब्दील EVM और सवालों के धुएं में घिरता लोकतंत्र: भरोसे की चिता कब बुझेगी?
-Friday World 19 Jun 2026
तस्वीर झकझोर देने वाली है। काले पड़ चुके लोहे के रैक, जले हुए तार, और पिघली हुई EVM की कतारें। ये सिर्फ मशीनें नहीं जलीं। जला है एक भरोसा। वह भरोसा जो कहता था कि मेरा एक वोट सरकार बदल सकता है।
आपने जो कहा, "लोकतंत्र की हत्या की यह जली हुई चिता EVM बहुत कुछ कह रही है", यह लाइन अब सिर्फ एक राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस आग की तस्वीर है जो गोदाम में लगी या किसी के मन में लगी। फर्क क्या पड़ता है? राख दोनों जगह बनती है।
1. यह तस्वीर बोलती क्या है?
इस फोटो में जली हुई EVM और VVPAT मशीनें दिख रही हैं। शायद किसी गोदाम में आग लगी। शायद किसी ने लगाई। कारण जो भी हो, प्रतीक बहुत बड़ा है।
लोकतंत्र मशीनों से नहीं चलता। लोकतंत्र चलता है जनता के विश्वास से। जब चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, जब संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होने लगे, तब सबसे बड़ा नुकसान EVM का नहीं होता। नुकसान होता है उस नागरिक का जो अगली बार लाइन में लगने से पहले दस बार सोचेगा।
EVM सिर्फ प्लास्टिक और चिप का डिब्बा है। मगर इस डिब्बे में 96 करोड़ लोगों की उम्मीद बंद थी। आज वह उम्मीद राख के ढेर में बदली पड़ी है।
2. EVM आई ही क्यों थी? बैलेट का दौर भूल गए?
1990 से पहले चुनाव बैलेट पेपर से होते थे। तब क्या होता था?
*बूथ कैप्चरिंग*: बाहुबली पूरी की पूरी मतपेटी उठा ले जाते थे। हज़ारों फर्जी ठप्पे लगा दिए जाते थे।
*गिनती में खेल*: 3 दिन तक गिनती चलती थी। हर राउंड में विवाद। फिर से गिनती के नाम पर दबाव।
*खर्च और वक्त*: करोड़ों बैलेट छापो। ट्रकों में ढोओ। फिर कचरे में फेंक दो।
EVM इन सबका जवाब बनकर आई। 1982 में केरल में पहला प्रयोग। 2004 से पूरे देश में लोकसभा चुनाव EVM से।
वादा था तीन चीज़ों का:
- *तेज़ी*: शाम 6 बजे वोटिंग बंद, रात 12 बजे तक नतीजे।
- *पारदर्शिता*: एक आदमी, एक बटन, एक वोट। हज़ार ठप्पे मारना बंद।
- *किफायत*: बार बार कागज़ छापने का खर्च खत्म।
दुनिया ने माना कि भारत ने कमाल कर दिया। 10 लाख बूथ। एक दिन में चुनाव। यह तकनीकी क्रांति थी।
3. फिर चिता जलने की नौबत क्यों आई?
मशीन खराब नहीं थी। भरोसा खराब हुआ। और भरोसा टूटने की 4 बड़ी वजहें हैं:
*पहली वजह: तकनीक और जनता के बीच दूरी*
बैलेट दिखता था। मुहर लगती थी। डिब्बे में डालते थे। आंखों के सामने सील लगता था। EVM के अंदर क्या होता है? आम वोटर नहीं जानता। जो दिखता नहीं, उस पर शक स्वाभाविक है। चुनाव आयोग लाख कहे कि मशीन स्टैंडअलोन है, इंटरनेट से नहीं जुड़ती, हैक नहीं हो सकती। मगर जब समझ ही न हो तो भरोसा कैसे हो?
*दूसरी वजह: हार का ठीकरा*
कड़वी सच्चाई यह है कि EVM पर सवाल हमेशा हारने वाला उठाता है। 2014, 2019 में विपक्ष ने उठाए। राज्यों में जब वही विपक्ष जीता तो EVM माता बन गई। 2009 में BJP हारी तो उसने सवाल उठाए थे। यह चयनात्मक हमला जनता को कन्फ्यूज़ करता है। उसे लगता है कि मुद्दा EVM नहीं, कुर्सी है।
*तीसरी वजह: संस्थाओं की साख*
EVM चुनाव आयोग चलाता है। अगर लोगों को लगे कि आयोग ही दबाव में है, तो मशीन पर शक लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा कि आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए। जब नियुक्ति पर सवाल हों, तो नतीजों पर सवाल उठेंगे ही।
*चौथी वजह: VVPAT का आधा अधूरा सच*
2019 से हर EVM के साथ VVPAT लगा। आप बटन दबाते हैं, 7 सेकंड की पर्ची दिखती है। तसल्ली होती है कि वोट सही गया। मगर सिर्फ 5 बूथ की पर्चियां ही गिनी जाती हैं। मांग है 50% या 100% गिनती की। आयोग कहता है कि वक्त बढ़ जाएगा। जनता कहती है कि भरोसे से बड़ा वक्त नहीं। यह टकराव आग में घी डालता है।
4. क्या EVM सच में हैक हो सकती है? फैक्ट क्या है
चुनाव आयोग के दावे सुनिए:
1. EVM में वन टाइम प्रोग्रामेबल चिप है। एक बार कोड डाला, फिर बदला नहीं जा सकता।
2. मशीन किसी नेटवर्क से नहीं जुड़ती। न ब्लूटूथ, न वाई-फाई, न इंटरनेट।
3. बटन दबाने और नतीजे में महीनों का गैप होता है। बीच में मशीनें स्ट्रॉन्ग रूम में सील रहती हैं।
4. 2017 में आयोग ने हैकाथॉन की खुली चुनौती दी थी। कोई राजनीतिक दल हैक करके नहीं दिखा पाया।
आज तक लाखों VVPAT पर्चियां EVM के नतीजों से मिलाई गई हैं। एक भी केस में अंतर नहीं मिला। यह डेटा है।
मगर शक करने वाले पूछते हैं: अगर निर्माण के समय ही खेल हो तो? अगर स्ट्रॉन्ग रूम से मशीन बदल दी जाए तो? इन सवालों का जवाब सिर्फ तकनीक से नहीं, पारदर्शी प्रक्रिया से मिलेगा।
5. दुनिया ने क्या किया? सबक क्या है?
*जर्मनी*: 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने EVM को असंवैधानिक बताया। तर्क था कि आम नागरिक पूरी प्रक्रिया को समझ न पाए तो वह चुनाव पारदर्शी नहीं है। जर्मनी बैलेट पर लौट गया।
*नीदरलैंड, आयरलैंड*: हैकिंग के डर से EVM हटा दी।
*ब्राज़ील, फिलीपींस*: भारत की तरह EVM इस्तेमाल करते हैं और संतुष्ट हैं।
*अमेरिका*: हर राज्य का अपना सिस्टम। कहीं पेपर बैलेट, कहीं स्कैनिंग मशीन, कहीं EVM।
भारत की चुनौती सबसे अलग है। 96 करोड़ वोटर। दूर दराज़ के इलाके। बूथ कैप्चरिंग का इतिहास। बैलेट पर लौटना आसान नहीं। मगर जर्मनी का तर्क भी वज़नदार है: चुनाव सिर्फ सही नहीं होना चाहिए, सही दिखना भी चाहिए।
6. जली हुई चिता का मतलब क्या है?
यह तस्वीर दो बातें कहती है।
पहली: अगर यह हादसा है, तो हमारी चुनावी तैयारियों पर सवाल है। करोड़ों की मशीनें ऐसे कैसे जल गईं? सुरक्षा कहां थी?
दूसरी: अगर यह साज़िश है, तो लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। कोई इतना बौखलाया हुआ है कि वह पूरी व्यवस्था को ही आग लगाना चाहता है।
दोनों सूरतों में नुकसान लोकतंत्र का है। क्योंकि जनता का विश्वास ही लोकतंत्र की असली ताकत है। मशीनें फिर बन जाएंगी। भरोसा टूट गया तो उसे कौन जोड़ेगा?
7. अब रास्ता क्या है? भरोसा कैसे लौटे?
आग बुझाने के लिए पानी चाहिए, भाषण नहीं। 5 ठोस कदम ये हो सकते हैं:
*1. दिखाओ, सिर्फ बताओ मत*
EVM की फर्स्ट लेवल चेकिंग, रैंडमाइज़ेशन, मॉक पोल, सीलिंग। ये सब हर दल के एजेंट के सामने हो। पूरी वीडियोग्राफी हो। वेबसाइट पर लाइव डाला जाए। जब प्रक्रिया दिखेगी, तो शक घटेगा।
*2. VVPAT गिनती बढ़ाओ*
5 बूथ बहुत कम हैं। सुप्रीम कोर्ट 25% या 50% बूथ की गिनती का आदेश दे सकता है। हां, नतीजे 2 दिन लेट आएंगे। मगर 5 साल के लिए भरोसा पक्का हो जाएगा। यह सौदा महंगा नहीं है।
*3. चुनाव आयोग को मज़बूत करो*
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस की समिति हो। सुप्रीम कोर्ट यह सुझाव दे चुका है। जब नियुक्ति निष्पक्ष दिखेगी, तो फैसले निष्पक्ष लगेंगे।
*4. तकनीकी ऑडिट हर चुनाव से पहले*
IIT, IISc जैसे स्वतंत्र संस्थानों से EVM का सैंपल ऑडिट करवाया जाए। रिपोर्ट सार्वजनिक हो।
*5. राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तय हो*
बिना सबूत EVM को चोर कहना बंद हो। अगर हैक का दावा है तो आयोग की चुनौती स्वीकार करो। हार को EVM पर नहीं, अपनी कमियों पर डालने की हिम्मत दिखाओ।
8. आखिरी बात: चिता ठंडी करनी होगी
यह जली हुई EVM की तस्वीर एक चेतावनी है। लोकतंत्र की हत्या एक दिन में नहीं होती। वह रोज़ थोड़ी थोड़ी होती है। जब नेता सवाल से भागते हैं। जब संस्थाएं चुप रहती हैं। जब नागरिक व्हाट्सएप फॉरवर्ड पर भरोसा कर लेता है।
जनता का विश्वास बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है। चुनाव आयोग की कि वह पारदर्शी रहे। कोर्ट की कि वह निगरानी रखे। मीडिया की कि वह सच दिखाए। दलों की कि वे एजेंट ट्रेन करें। और आपकी, हमारी कि हम आंख बंद करके न यकीन करें, न शक करें। सवाल पूछें। जवाब मांगें। प्रक्रिया का हिस्सा बनें।
क्योंकि EVM जल सकती है। दूसरी बन जाएगी। मगर अगर भरोसे की चिता जल गई, तो राख से लोकतंत्र वापस नहीं आएगा।
उसे बचाना है। आज। अभी। वरना कल यह राख हमारे हाथों में होगी। और हम पूछ रहे होंगे कि गलती किसकी थी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026

Thursday, 18 June 2026

June 18, 2026

107 साल बाद वर्साय में उलटा खेल: घुटनों पर आया सुपरपावर, 110 दिन बाद ईरान ने लिखी जीत की इबारत

107 साल बाद वर्साय में उलटा खेल: घुटनों पर आया सुपरपावर, 110 दिन बाद ईरान ने लिखी जीत की इबारत -Friday World 19 Jun 2026
_पेरिस, 12 जून 2026_  
इतिहास खुद को दोहराता है, मगर कभी कभी आईने में चेहरा बदल जाता है। फ्रांस के पैलेस ऑफ़ वर्साय के शीशमहल में बुधवार रात वही हुआ जिसका इंतजार दुनिया ने 110 दिन से किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ 300 अरब डॉलर की उस डील पर दस्तखत कर दिए जिसे तेहरान पहले ही "प्रतिरोध की फतह" घोषित कर चुका है। 

28 जून 1919 को इसी हॉल में जर्मनी को झुकाकर वर्साय संधि थोप दी गई थी। 32 देशों ने मिलकर एक महाशक्ति को अपमान की स्याही से नहला दिया था। 107 साल बाद उसी मेज़ पर अमेरिका झुका। कलम ट्रम्प के हाथ में थी, मगर शर्तें ईरान की थीं। प्रतिबंध हटेंगे, यूरेनियम ईरान के पास रहेगा, और इज़रायल पहली बार अमेरिकी डील से बाहर रहेगा। 

110 दिन का घेरा और वर्साय की उड़ान
7 मार्च 2026 को नतांज पर साइबर हमले के साथ जो टकराव शुरू हुआ था, वह फारस की खाड़ी में तेल टैंकरों, लाल सागर में ड्रोन और यूरोप की गैस पाइपलाइन तक फैल गया। अमेरिका ने यूएसएस जेराल्ड फोर्ड और यूएसएस एंटरप्राइज को खाड़ी में उतारा। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में 4000 स्पीडबोट तैनात कर दीं। 

तेल 142 डॉलर प्रति बैरल छू गया। यूरोप में महंगाई 11% पर पहुंची। अमेरिकी गैस स्टेशन पर लाइनें लग गईं। 110 दिन में वाशिंगटन समझ गया कि प्रतिबंधों की तलवार अब खुद उसी की गर्दन पर है। फ्रांस ने मध्यस्थता की पेशकश की। नौ दौर की गुप्त बैठक के बाद वर्साय चुना गया। संदेश साफ था। जहाँ 1919 में हार लिखी गई थी, वहीं 2026 में नई बराबरी लिखी जाएगी।

डील की वो 8 शर्तें जो बदल देंगी मिडिल ईस्ट

1. 300 अरब डॉलर का मेगा फंड: अमेरिका, यूरोपीय संघ, चीन, कतर और यूएई मिलकर 10 साल में ईरान में निवेश करेंगे। पैसा तेल, गैस, बंदरगाह, सोलर और रेल में लगेगा। 

2. प्रतिबंध खत्म: अमेरिकी कांग्रेस 90 दिन में कॉम्प्रिहेंसिव ईरान सैंक्शंस एक्ट को रद्द करेगी। ईरानी बैंक स्विफ्ट, वीज़ा और मास्टरकार्ड से फिर जुड़ेंगे।

3. यूरेनियम पर ईरान का हक ईरान के पास मौजूद 60% समृद्ध यूरेनियम वहीं रहेगा। वह उसे नागरिक बिजली के लिए इस्तेमाल करेगा। IAEA सिर्फ कैमरों से निगरानी करेगा।

4. तेल की खुली छूट: ईरान तुरंत 40 लाख बैरल प्रतिदिन तेल बेचेगा। चीन, भारत और तुर्की को रियायती दर पर सप्लाई देगा।

5. क्षेत्रीय युद्धविराम: ईरान यमन, लेबनान और इराक में हथियार सप्लाई 5 साल तक रोकेगा। बदले में इज़रायल सीरिया में हवाई हमले बंद करेगा और गाज़ा की नाकेबंदी में ढील देगा।

6. कैदी रिहाई: 1979 के बाद सबसे बड़ा आदान प्रदान होगा। दोनों तरफ के 78 नागरिक 30 दिन में घर लौटेंगे।

7.सीधी कनेक्टिविटी: तेहरान से न्यूयॉर्क, लॉस एंजिल्स और शिकागो के लिए सीधी उड़ानें 180 दिन में शुरू होंगी।

8. तकनीक ट्रांसफर बोइंग और एयरबस ईरान को 300 नए यात्री विमान देंगे। अमेरिकी कंपनियां ईरान में सेमीकंडक्टर फैक्ट्री लगाएंगी।

इन शर्तों में ईरान कहीं भी हारा हुआ नहीं दिखता। न जमीन गई, न यूरेनियम गया, न सम्मान गया। गया तो सिर्फ अमेरिका का वह घमंड जो कहता था कि प्रतिबंध से देश झुक जाते हैं।

1919 का वर्साय बनाम 2026 का वर्साय
1919 में जर्मनी से उसकी 13% जमीन, सारी कॉलोनी और 132 अरब गोल्ड मार्क वसूले गए। उसकी सेना 1 लाख तक सीमित कर दी गई। राइनलैंड को निशस्त्र क्षेत्र बना दिया गया। कीन्स ने तभी कहा था कि यह शांति नहीं, 20 साल का युद्धविराम है। 1939 में उनकी बात सच हुई।

2026 में पासा पलटा है। इस बार हरजाना देने वाला अमेरिका है। 300 अरब डॉलर ईरान की मौजूदा जीडीपी का 68% है। 1919 में जर्मनी को दबाया गया था। 2026 में ईरान को उठाया गया है। इसलिए यह संधि टिकेगी। क्योंकि यह अपमान पर नहीं, सौदे पर टिकी है।

ट्रम्प 2.0: नेतन्याहू से आज़ाद व्हाइट हाउस
डोनाल्ड ट्रम्प का पहला कार्यकाल इज़रायल के इर्द गिर्द घूमता था। जेरुशलम को राजधानी माना, गोलान हाइट्स को मान्यता दी, ईरान डील तोड़ी। दूसरा कार्यकाल अलग है। 

2024 के चुनाव में ट्रम्प को खाड़ी के अरबपति डोनर्स और अमेरिकी तेल लॉबी ने शर्त रखी थी कि मिडिल ईस्ट में शांति चाहिए। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को वर्साय नहीं बुलाया गया। उन्होंने ट्वीट किया कि यह डील इज़रायल की पीठ में छुरा है। मगर ट्रम्प ने जवाब नहीं दिया। 

साइन के बाद ट्रम्प ने कहा: "मैंने अमेरिका को फिर से महान बनाने का वादा किया था। महान देश लड़ते नहीं हैं, डील करते हैं। आज हमने इतिहास की सबसे बड़ी डील की है।" 

तेहरान में जश्न, तेल अवीव में सन्नाटा
ईरान के राष्ट्रपति ने आज़ादी टावर से एलान किया: "110 दिन ने 45 साल का हिसाब बराबर कर दिया। वर्साय अब हार का नहीं, इज़्ज़त का नाम है।" पूरी रात तेहरान में आतिशबाजी हुई। रियाल 22% मजबूत हुआ। तेल मंत्री ने कहा कि कल से हम यूरोप को गैस बेचेंगे।

उधर तेल अवीव में कैबिनेट की इमरजेंसी बैठक बेनतीजा रही। रक्षा मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। विपक्ष ने नेतन्याहू से इस्तीफा मांगा। हिब्रू अखबारों की हेडलाइन थी: "अमेरिका ने हमें अकेला छोड़ दिया।"

300 अरब डॉलर कहाँ खर्च होंगे
ईरानी वित्त मंत्रालय ने तुरंत रोडमैप जारी किया।
क्षेत्र राशि मुख्य प्रोजेक्ट

ऊर्जा 115 अरब डॉलर साउथ पार्स गैस फील्ड, नई रिफाइनरी, सोलर पार्क

ट्रांसपोर्ट 65 अरब डॉलर चाबहार से यूरोप तक रेल कॉरिडोर, 8 नए एयरपोर्ट

इंडस्ट्री 50 अरब डॉलर स्टील, ऑटो, सेमीकंडक्टर फैक्ट्री

पानी-कृषि 30 अरब डॉलर खारे पानी को मीठा बनाने के 20 प्लांट
स्वास्थ्य 25 अरब डॉलर 250 अस्पताल, कैंसर रिसर्च सेंटर

शिक्षा-टेक 15 अरब डॉलर 10 AI यूनिवर्सिटी, स्टार्टअप फंड
इस निवेश से ईरान की विकास दर 2027 तक 8.5% पहुंच जाएगी। बेरोज़गारी 21% से 7% पर आएगी। मध्यम वर्ग की आय दोगुनी होगी।

दुनिया के लिए मायने: किसका फायदा, किसका नुकसान

भारत: चाबहार पोर्ट अब गेमचेंजर बनेगा। ईरान से सस्ता तेल और गैस मिलेगा। मध्य एशिया और रूस तक सीधी पहुंच बनेगी। रुपये में व्यापार से डॉलर की जरूरत घटेगी।

चीन: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को ईरान में खुला मैदान मिला। 25 साल का तेल समझौता पक्का हुआ। अमेरिका को मिडिल ईस्ट से पीछे धकेलने में कामयाबी।

यूरोप: सर्दियों से पहले गैस संकट खत्म। महंगाई काबू में आएगी। जर्मनी और फ्रांस की कंपनियों को ईरान में ठेके मिलेंगे।

रूस: तेल की कीमत 70 से 80 डॉलर पर स्थिर रहेगी। बजट संभलेगा। मगर सीरिया और मिडिल ईस्ट में ईरान अब रूस का मोहताज नहीं रहेगा।

सऊदी अरब और यूएई: सबसे बड़ा कूटनीतिक झटका। ईरान विरोधी धड़ा टूटा। अब अब्राहम अकॉर्ड की जगह तेहरान-रियाद डायरेक्ट डायलॉग होगा।

110 दिन ने दिया नया सबक
अमेरिका ने 1979 से ईरान को अलग थलग करने की कोशिश की। नतीजा उल्टा निकला। ईरान ने मिसाइल प्रोग्राम बनाया, ड्रोन में महारत हासिल की, क्षेत्रीय नेटवर्क खड़ा किया। 110 दिन के संकट ने दिखाया कि प्रतिबंध अब लगाने वाले को ज़्यादा चोट पहुंचाते हैं। 

अमेरिकी ट्रेजरी की अपनी रिपोर्ट कहती है कि ईरान ने क्रिप्टो, बार्टर और चीन के साथ युआन व्यापार से 80% प्रतिबंध बेअसर कर दिए। उधर अमेरिका को हर दिन 50 करोड़ डॉलर का सैन्य खर्च उठाना पड़ा। ट्रम्प ने कारोबारी दिमाग लगाया और घाटे का सौदा बंद कर दिया।

आगे की राह: क्या यह शांति टिकेगी
1919 की वर्साय संधि इसलिए फेल हुई क्योंकि वह बदले पर बनी थी। 2026 की डील फायदे पर बनी है। इसलिए इसके टिकने के आसार ज़्यादा हैं। 

फिर भी तीन चुनौतियां हैं। पहली, अमेरिकी सीनेट में 60 वोट जुटाना। दूसरी, इज़रायल की खुफिया एजेंसियां डील को पटरी से उतार सकती हैं। तीसरी, ईरान के कट्टरपंथी गुट इसे अमेरिका से समझौता बताकर विरोध कर सकते हैं।

मगर 12 जून 2026 की तारीख अब किताबों में दर्ज हो चुकी है। 107 साल बाद वर्साय फिर गवाह बना। फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार झुकने वाला वही था जो 1919 में झुकवाता था। 

सुपरपावर जब घुटनों पर आते हैं तो धमाका नहीं होता। सिर्फ दस्तखत की खरखराहट सुनाई देती है। कल रात वर्साय के हॉल ऑफ़ मिरर्स में वही आवाज़ गूंजी। उसने दुनिया को बता दिया कि 21वीं सदी का मिडिल ईस्ट अब तेहरान की धुरी पर घूमेगा। और अमेरिका ने मान लिया है कि हर जंग मैदान में नहीं जीती जाती। कुछ जंगें मेज़ पर हारकर ही जीती जाती हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026
June 18, 2026

जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना

जनसांख्यिकी समिति और हिंदुत्व की व्यापक परियोजना -Friday World 19 Jun 2026
आलेख: मुरलीधरन, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते

केंद्र सरकार ने एक उच्च-स्तरीय समिति (एचएलसी) बनाने की घोषणा की है। इसका मकसद कथित तौर पर अवैध आव्रजन और असामान्य बसावट के तरीकों आदि से होने वाले "अस्वाभाविक" जनसांख्यिकीय बदलावों की जांच करना है। प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्ति में कहा गया है कि "यह समिति धार्मिक और सामाजिक समुदायों के स्तर पर आबादी में होने वाले असामान्य बदलावों के पैटर्न का विश्लेषण करेगी और इस मुद्दे से निपटने के लिए एक सुनियोजित और समय-सीमा के भीतर लागू होने वाला समाधान पेश करेगी"।

जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नवलेकर (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति को एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने का काम दिया गया है। यह बात दिलचस्प लग सकती है कि मोदी सरकार ने जनगणना की प्रक्रिया, जिससे जनसांख्यिकी से जुड़े आंकड़े सामने आते, पूरी होने का इंतज़ार करने के बजाय, जल्दबाज़ी में एचएलसी का गठन कर दिया है।

सालों से, आरएसएस-भाजपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि भारत आंतरिक जनसांख्यिकीय खतरे से जूझ रहा है। 2014 में केंद्र में सत्ता में आने के बाद से यह बात और ज़ोर-शोर से कही जाने लगी है। "दीमक" से लेकर "घुसपैठिए" तक, शब्द भले ही अलग-अलग हों, लेकिन निशाना एक ही है, मुख्य रूप से मुसलमान — जिन पर देश की "जनसांख्यिकीय संतुलन" को बिगाड़कर अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया जाता है।

नई कमिटी इसे संस्थागत रूप देगी। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कमिटी के किसी भी सदस्य का जनसांख्यिकी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। असल में, कमिटी के चेयरमैन प्रकाश प्रभाकर नवलेकर ने खुलकर कहा कि उन्हें "हैरानी" हुई है कि उन्हें कमिटी का प्रमुख बनाया गया है, और जनसांख्यिकी तथा अवैध प्रवास उनके लिए नए विषय हैं।

आरएसएस के लिए यह मुद्दा कितना अहम है, यह बात 'ऑर्गनाइज़र' के 14 जून के अंक से एक बार फिर साफ़ होती है। इस अंक में इस विषय पर 27 पेज समर्पित किए गए हैं और साथ ही सुरक्षा और घुसपैठ के नज़रिए से "सिलीगुड़ी कॉरिडोर" पर भी चार पेज दिए गए हैं।

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस साल की शुरुआत में कहा था, "घुसपैठ को लेकर सरकार को बहुत कुछ करना है। उन्हें घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें वापस भेजना होगा। अब तक ऐसा नहीं हो रहा था। लेकिन धीरे-धीरे यह काम शुरू हो गया है और आगे और तेज होगा। जब जनगणना या एसआईआर होता है, तो ऐसे कई लोग सामने आते हैं, जो इस देश के नागरिक नहीं हैं ; उन्हें अपने आप इस प्रक्रिया से बाहर कर दिया जाता है। लेकिन हम एक काम कर सकते हैं : हम उनकी पहचान करने का काम कर सकते हैं। हमें उनकी पहचान करनी चाहिए और संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देनी चाहिए। हमें पुलिस को बताना चाहिए कि हमें शक है कि ये लोग विदेशी हैं..."।

इस बात का उल्लेख करन ज़रूरी है कि मई 2026 में पश्चिम बंगाल में सत्ता संभालने के बाद भाजपा सरकार के शुरुआती फैसलों में से एक फैसला नौ ज़िलों में 142.79 एकड़ ज़मीन बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) को सौंपने का है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में संवेदनशील भारत-बांग्लादेश सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ और सीमाओं पर नई चौकियां बनाने के लिए 600 एकड़ ज़मीन हस्तांतरित करने का वादा किया था।

एचएलसी का गठन हिंदुत्व की राजनीति के व्यापक दायरे में पूरी तरह से फिट बैठता है। नागरिकता संशोधन कानून, नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी), धर्म-परिवर्तन विरोधी कानून, अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों पर हमले, कई राज्यों में समान नागरिक संहिता और "आबादी के असंतुलन" की बार-बार की जाने वाली बातें -- ये सभी एक ही विचारधारा का हिस्सा हैं। इनमें सबसे गंभीर बात मतदाता सूची का 'विशेष गहन पुनरीक्षण' है। इन सभी कदमों का मकसद बहुसंख्यकवादी नज़रिए से नागरिकता की परिभाषा को बदलना है। धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य को धीरे-धीरे एक ऐसे हिंदू राष्ट्र के रूप में बदला जा रहा है, जहाँ अल्पसंख्यकों का अस्तित्व शर्तों और शक के दायरे में है।

एचएलसी के काम करने के तरीके और मकसद से यह साफ़ पता चलता है कि इसका मकसद एक ऐसी सोच को संस्थागत वैधता देना है, जो लंबे समय से हिंदुत्व को बढ़ावा देने का मुख्य आधार रही है — यानी यह कि हिंदू बहुसंख्यक आबादी अपनी ही ज़मीन पर खतरे में है। यह सोच तब भी बनी हुई है, जब ऐसी आशंकाओं को साबित करने के लिए आबादी से जुड़ा कोई सबूत नहीं मिलता। भारत में सभी धार्मिक समुदायों में प्रजनन दर लगातार कम हो रही है। पिछले कुछ सालों में समुदायों के बीच का अंतर भी काफ़ी कम हुआ है

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, 2019–21 में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच प्रजनन दर का अंतर प्रति महिला सिर्फ़ 0.42 बच्चे था, जबकि 1992 में यह अंतर 1.1 था। 1992–93 के बाद से मुस्लिमों में प्रजनन दर 46.5% कम हुआ है, जबकि हिंदुओं में यह 41.2% कम हुआ है — यानी मुस्लिमों में प्रजनन दर तेज़ी से कम हो रही है। पिछले 20 सालों में हिंदुओं में प्रजनन दर 30% कम हुई है, जबकि मुस्लिमों में यह कमी 35% रही है।

जनसांख्यिकी से जुड़े डर की राजनीति एक साथ कई मकसद पूरे करती है। पहला, यह देश के भीतर ही एक स्थायी दुश्मन खड़ा कर देती है। नव-उदारवादी शासन की नाकामियों या कॉरपोरेट के हाथों में संपत्ति के संकेद्रण पर सवाल उठाने के बजाय, लोगों के एक हिस्से को यह यकीन दिलाया जाता है कि देश की समस्याएं घुसपैठियों, जनसांख्यिकीय साज़िशों या सांस्कृतिक रूप से बाहरी लोगों की वजह से पैदा हो रही हैं।

दूसरी बात, जनसांख्यिकीय राजनीति, जातिगत विभाजनों के बावजूद, एक एकजुट हिंदू राजनीतिक पहचान बनाने में मदद करती है। हिंदुत्व ने एक व्यापक बहुसंख्यक चेतना पैदा करके हिंदू समाज के भीतर मौजूद अंतर्विरोधों को दबाने की कोशिश की है। बाहरी या आंतरिक खतरे का ज़िक्र ठीक इसी तरह के एकीकरण को संभव बनाता है। सामाजिक चिंताओं का रुख जातिगत उत्पीड़न, बेरोजगारी या वर्गीय शोषण के बजाए धार्मिक ध्रुवीकरण की ओर मोड़ देता हैं।

तीसरी बात, जनसांख्यिकीय डर की वजह से सरकारी निगरानी और दस्तावेजीकरण का दायरा बढ़ता है। एक बार जब अप्रवासन और आबादी में बदलाव को सुरक्षा के नज़रिए से देखा जाने लगता है, तो कड़े या असाधारण कदमों को सही ठहराना आसान हो जाता है। देश की अखंडता की रक्षा के नाम पर नागरिकता की जांच, निवारक निरोध प्रणाली, सीमा पर पुलिस जांच, आंकड़े इकट्ठा करना और खास तौर पर कमज़ोर तबकों की जांच-पड़ताल जैसी चीज़ों को सामान्य माना जाने लगता है। ऐसी नीतियों का सबसे ज़्यादा बोझ गरीब, भूमिहीन, प्रवासी और बिना कागज़ात वाले लोगों को उठाना पड़ता है। एसआईआर इसका एक उदाहरण है, जहाँ एक करोड़ से ज़्यादा लोग न सिर्फ़ वोट देने के अधिकार से वंचित हो गए हैं, बल्कि वे ऐसे "संदिग्ध" नागरिक बन गए हैं जिन्हें उनके अधिकार और सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है।

मदुरै में हुए सीपीआई(एम) के 24वें महाधिवेशन में केंद्र की मौजूदा सरकार को "नव-फासीवादी लक्षण" वाली बताया गया था। जर्मनी में जिस तरह का फासीवाद देखा गया था, उससे हमें यह सीख मिलती है कि लोकतांत्रिक समाज में डर, प्रचार और नौकरशाही की वैधता के ज़रिए धीरे-धीरे भेदभावपूर्ण राजनीति को सामान्य बनाया जा सकता है। संस्थाओं, कानूनों, समितियों, प्रशासनिक भाषा और लोगों के मन में जान-बूझकर पैदा की गई चिंताओं के ज़रिए तानाशाही कदम-दर-कदम आगे बढ़ती है।

एडॉल्फ हिटलर ने बार-बार यह तर्क दिया था कि जर्मनी को आबादी और सभ्यता के स्तर पर कथित तौर पर बाहरी आबादी, खासकर यहूदियों, से विनाश का खतरा है। नाज़ी प्रचार ने अल्पसंख्यकों को देश की शुद्धता, सुरक्षा और भविष्य के लिए अस्तित्व का खतरा बना दिया। आर्थिक तंगी और राजनीतिक अस्थिरता को देश के भीतर मौजूद दुश्मनों के प्रति नफ़रत में बदल दिया गया। 1935 के न्यूरेम्बर्ग कानूनों के तहत नागरिकता को नस्ल के आधार पर फिर से परिभाषित किया गया, जिससे यहूदियों को समान नागरिक अधिकार नहीं मिले।

अमेरिकी पत्रकार और इतिहासकार विलियम शिरेर ने अपनी मशहूर किताब 'द राइज़ एंड फ़ॉल ऑफ़ द थर्ड राइख़' में कहा है कि फ़ासीवाद का उदय सिर्फ़ किसी एक नेता की महत्वाकांक्षाओं की वजह से नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए हुआ था, क्योंकि लोकतांत्रिक संस्थाएँ अंदर से कमज़ोर हो गई थीं और अभिजात वर्ग को लगता था कि वे तानाशाही ताक़तों के साथ अपनी पटरी बैठा सकते हैं और उन पर नियंत्रण रख सकते हैं। प्रचार, राष्ट्रवाद और स्थायी दुश्मनों को खड़ा करने की कोशिशों ने धीरे-धीरे लोगों की सोच को बदल दिया।

शिरेर लिखते हैं, “15 सितंबर 1935 के तथाकथित न्यूरेम्बर्ग कानूनों ने यहूदियों से जर्मन नागरिकता छीन ली और उन्हें सिर्फ़ ‘प्रजा’ का दर्जा दिया गया। इन कानूनों ने यहूदियों और आर्यों के बीच शादी और शादी के बाहर के रिश्तों पर भी रोक लगा दी। साथ ही, यहूदियों के लिए 35 साल से कम उम्र की आर्य महिला नौकरानियों को काम पर रखना भी मना कर दिया गया। अगले कुछ सालों में, न्यूरेम्बर्ग कानूनों को और सख्त बनाने वाले लगभग तेरह और आदेश आए, जिन्होंने यहूदियों को पूरी तरह से गैर-कानूनी बना दिया। ...कानून या नाज़ी आतंक — अक्सर आतंक, कानून से पहले आता था -- के ज़रिए यहूदियों को सरकारी और निजी नौकरियों से इस हद तक बाहर कर दिया गया कि उनमें से लगभग आधे लोगों के पास आजीविका का कोई साधन नहीं बचा। 'थर्ड राइख' के पहले साल, यानी 1933 में, उन्हें सरकारी पदों, नागरिक सेवा, पत्रकारिता, रेडियो, खेती, शिक्षण, थिएटर और फ़िल्मों से बाहर कर दिया गया ; 1934 में उन्हें स्टॉक एक्सचेंज से निकाल दिया गया। हालाँकि, वकालत, डॉक्टरी या व्यापार करने पर कानूनी रोक 1938 में लगी, लेकिन असल में नाज़ी शासन के पहले चार साल खत्म होने तक ही उन्हें इन क्षेत्रों से हटा दिया गया था।”

'दूसरे' (यानी जो अपने समुदाय के नहीं हैं) के प्रति यह नफ़रत हिंदुत्व के बड़े नेता एम.एस. गोलवलकर की शिक्षाओं में भी दिखती है। वे कहते हैं : “वे (मुसलमान और ईसाई) बेशक इसी भूमि पर पैदा हुए हैं, लेकिन क्या वे इस भूमि के प्रति नमकहलाल हैं? ...नहीं। उनके धर्म बदलने के साथ ही, देश के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना भी खत्म हो गई है।”

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि गोलवलकर हिटलर की खुलकर तारीफ़ करता था। 1939 में हिटलर के विनाशकारी युद्ध शुरू करने से कुछ महीने पहले छपी अपनी किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' में उन्होंने लिखा था: "अपनी नस्ल और संस्कृति की शुद्धता बनाए रखने के लिए, जर्मनी ने सेमिटिक नस्लों — यहूदियों — को देश से बाहर निकालकर दुनिया को चौंका दिया।" इसके अलावा, उन्होंने लिखा: "यहाँ नस्लीय गर्व का सबसे ऊँचा रूप देखने को मिला। जर्मनी ने यह भी दिखाया है कि जिन नस्लों और संस्कृतियों में बुनियादी अंतर हों, उन्हें एक साथ मिलाकर एक इकाई बनाना लगभग नामुमकिन है ; यह हिंदुस्तान के लिए एक अच्छा सबक है, जिससे हमें सीखना चाहिए और फ़ायदा उठाना चाहिए।"

गोलवलकर ने मुसलमानों के मुकाबले देश पर हिंदुओं के खास दावे पर ज़ोर देते हुए तर्क दिया कि "हिंदुस्तान में रहने वाली विदेशी जातियों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का सम्मान और आदर करना सीखना होगा, हिंदू जाति और संस्कृति यानी हिंदू राष्ट्र की महिमा के अलावा कोई और विचार नहीं रखना होगा और हिंदू जाति में घुलने-मिलने के लिए अपनी अलग पहचान छोड़नी होगी ; या फिर वे देश में हिंदू राष्ट्र के पूरी तरह अधीन होकर, बिना किसी दावे या विशेषाधिकार के, रह सकते हैं, और उन्हें कोई खास सुविधाएं या नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे।"

इसके अलावा, "राष्ट्रीय जीवन में उनकी कोई जगह नहीं है, जब तक कि वे अपने मतभेदों को छोड़कर देश का धर्म, संस्कृति और भाषा न अपना लें और पूरी तरह से राष्ट्रीय समुदाय में घुल-मिल न जाएं। लेकिन जब तक वे अपने नस्लीय और सांस्कृतिक मतभेदों को बनाए रखते हैं, तब तक उन्हें विदेशी ही माना जाएगा।"

यह आज भी हिंदुत्व की परियोजना का ब्लूप्रिंट और आरएसएस की सोच का आधार बना हुआ है। गोलवलकर की दूसरी किताब 'बंच ऑफ़ थॉट्स' (विचार मीमांसा) — जिसमें उनके लेख और भाषण शामिल थे और जो ढाई दशक बाद प्रकाशित हुई थी — उसमें भी उन्हीं विचारों का सार था, जो उन्होंने 1939 में लिखे थे।

हिंदुत्व के प्रचार में मुसलमानों को सालों से, बहुत ज़्यादा दिखने वाले और राजनीतिक रूप से संदिग्ध के तौर पर चित्रित करने की कोशिश की गई है : जैसे कि वे बहुत ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं, बहुत ज़्यादा बेईमान होते हैं, बहुत ज़्यादा संगठित होते हैं और बहुत ज़्यादा विदेशी होते हैं। ऐसी बातें 20 करोड़ से ज़्यादा नागरिकों वाले पूरे समुदाय को जनसांख्यिकीय लिहाज से एक ख़तरे की श्रेणी में डाल देती हैं।

जनसांख्यिकीय समिति का गठन हिंदुत्व की परियोजना को आगे बढ़ाने का एक और माध्यम है। इससे नागरिक ऐसे जनसांख्यिकीय विषयों में बदल जाएंगे, जिनकी वैधता बड़े पैमाने पर पहचान, दस्तावेज़ों और राजनीतिक अनुरूपता पर निर्भर होकर रह जाएगी।

लेखक माकपा के केंद्रीय सचिवमंडल सदस्य हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650


Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026
June 18, 2026

'हमारे वोट कहाँ गए?' : बंगाल के एक बूथ की जमीनी हकीकत

'हमारे वोट कहाँ गए?' : बंगाल के एक बूथ की जमीनी हकीकत -Friday World 19 Jun 2026
ऑल्ट न्यूज' के लिए अंकिता, शिंजिनी और अंकित की रिपोर्टिंग, अनुवाद : संजय पराते

पश्चिम बंगाल के राजारहाट न्यू टाउन के बूथ क्रमांक 164 में विधानसभा चुनाव के नतीजों ने स्थानीय निवासियों, विपक्षी नेताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं। जब 'ऑल्ट न्यूज़' ने इस निर्वाचन क्षेत्र का दौरा किया और मतदाताओं से बात की, तो उनमें से कई ने नतीजों को बेतुका और असंभव बताया।

सीपीआई (एम)-आईएसएफ गठबंधन के उम्मीदवार सप्तर्षि देब को बूथ क्रमांक 164 से केवल एक वोट मिला। टीएमसी के उम्मीदवार तापस चटर्जी को पांच वोट मिले, जबकि भाजपा के उम्मीदवार पीयूष कनोडिया, जिन्होंने यह सीट जीती, उन्हें डाले गए 656 वोटों में से 637 वोट मिले।

बूथ क्रमांक 164 और 165 मुसलमान पारा नामक इलाके में स्थित हैं, जो मुख्य रूप से मुस्लिमबहुल क्षेत्र है। पास के बूथ क्रमांक 165 में, जहां इसी इलाके के और कई मामलों में तो एक ही परिवार के मतदाता वोट डालते हैं, कनोडिया को 32 वोट मिले, जबकि देब को 299 और चटर्जी को 290 वोट मिले। इसके बिल्कुल विपरीत, बूथ संख्या 164 में, जहां 88% मतदाता मुस्लिम हैं, भाजपा को 97% वोट मिले। स्थानीय लोगों ने 'ऑल्ट न्यूज' को बताया कि बूथ क्रमांक 164 का परिणाम क्षेत्र की राजनीतिक और जनसांख्यिकीय स्थिति से मेल नहीं खाता। 

गिनती के उस अतिरिक्त दौर ने परिणाम को पलट दिया।
न्यू टाउन के नतीजे 5 मई को घोषित किए गए, जो पश्चिम बंगाल के बाकी चुनाव परिणामों के एक दिन बाद था।

इस सीट का परिणाम शुरू से ही विवादों में घिरा है, क्योंकि इस सीट पर पूर्व-सूचित 17 चरणों के बजाय 18 चरणों में मतगणना हुई। निर्वाचन क्षेत्र में 10 सहायक बूथों सहित कुल 330 मतदान केंद्र थे। प्रत्येक मतगणना चरण में 20 ईवीएम की गिनती होनी थी। तदनुसार, उम्मीदवारों को 17 चरणों की मतगणना की उम्मीद थी -- 16 चरण, जिनमें प्रत्येक में 20 ईवीएम शामिल थीं और अंतिम चरण में शेष 10 ईवीएम शामिल थीं।

अतिरिक्त गिनती की आवश्यकता क्यों उत्पन्न हुई?

मतगणना के 18 वें चक्र का संबंध मतदान के दिन बूथ क्रमांक 164 पर ईवीएम में दर्ज किए गए 52 अतिरिक्त वोटों से है। वहां ईवीएम में वास्तव में डाले गए वोटों से 52 अधिक वोट प्रदर्शित होने पर, मतदान कर्मचारियों द्वारा लगभग दो घंटे के लिए मतदान रोक दिया गया था।

एक मतदान एजेंट ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि हालांकि ईवीएम में मॉक पोल (मतदान शुरू होने से पहले किया गया पोल) के बाद शून्य वोट दिखाए गए, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि मॉक पोल की वीवीपीएटी पर्चियां हटाई गई थीं या नहीं। विभिन्न राजनीतिक दलों के एजेंटों ने संयुक्त रूप से बूथ क्रमांक 164 के लिए वीवीपीएटी गिनती की मांग करते हुए एक लिखित अनुरोध प्रस्तुत किया था। यह 18वां चक्र था।

मतगणना के 17वें चक्र तक भाजपा उम्मीदवार पीयूष कनोडिया, टीएमसी के तापश चटर्जी से पीछे चल रहे थे। बहरहाल, बिल्कुल अंत में बूथ क्रमांक 164 की मतगणना ने नतीजे को पूरी तरह से बदल दिया। 18वें और अंतिम चक्र (बूथ क्रमांक 164 के लिए) में 656 वोट पड़े। इनमें से कनोडिया को 637 वोट, चटर्जी को पांच वोट और देब को एक वोट मिला। फॉर्म-20 में भी यही आंकड़े दर्ज हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो, बूथ क्रमांक 164 के नतीजे ने सीधे-सीधे निर्वाचन क्षेत्र के परिणाम को निर्धारित किया। 4 मई को रात 11 बजे तक, एक बूथ की गिनती बाकी थी और चटर्जी 316 वोटों से आगे चल रहे थे । 18वें और अंतिम चरण की गिनती के बाद, जिसमें केवल बूथ क्रमांक 164 शामिल था, बढ़त पूरी तरह से पलट गई और कनोडिया ने ठीक 316 वोटों से जीत हासिल की।

हमारे वोट कहाँ गए?'

इस असामान्य परिणाम को सबसे पहले 'स्क्रॉल' ने 21 मई को प्रकाशित एक रिपोर्ट में उजागर किया था।

जब 'ऑल्ट न्यूज़' ने मुसलमान पारा का दौरा किया, तो स्थानीय निवासियों ने नतीजों पर हैरानी जताई और अपने-अपने मतदाताओं के बारे में जानकारी दी। इनमें सीपीआई(एम) के पंचायत सदस्य और आईएसएफ के सक्रिय कार्यकर्ता शामिल थे। बूथ क्रमांक 164 के अंतिम परिणाम को देखें, इन सभी ने सामूहिक रूप से भाजपा को वोट दिया था।

“यह बिल्कुल सच नहीं है। फिर हमारे वोट कहाँ गए?” कई निवासियों ने पूछा। स्थानीय लोगों ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि मतदाताओं की संख्या में वृद्धि के कारण, मूल मतदान केंद्र को दो सहायक बूथों -- बूथ क्रमांक 164 और 165 में विभाजित कर दिया गया था। एक ही मोहल्ले के मतदाताओं को बिना किसी स्पष्ट क्रम के दोनों बूथों में वितरित कर दिया गया था। कई मामलों में, एक ही परिवार के सदस्यों को भी अलग-अलग बूथों में बैठा दिया गया था।

एक निवासी, रुखसाना बेगम ने बताया कि उन्होंने बूथ क्रमांक 165 पर वोट डाला, जबकि उनके 25 वर्षीय बेटे साहिनुर ने बूथ क्रमांक 164 पर वोट डाला। 'ऑल्ट न्यूज़' को अपने दौरे के दौरान ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले।

“हमें समझ नहीं आ रहा कि भाजपा को हमारे बूथ से इतने वोट कैसे मिले। कुछ गड़बड़ तो जरूर है,” एक निवासी ने कहा। जगदीशपुर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले और बूथ क्रमांक 164 और 165 को कवर करने वाले सीपीआई (एम) के दो बार निर्वाचित पंचायत सदस्य अहमद अली मंडल ने कहा कि उन्होंने और उनके परिवार के आठ सदस्यों ने बूथ 164 पर सीपीआई (एम)-आईएसएफ गठबंधन के पक्ष में मतदान किया था।

“मेरे परिवार के सभी सदस्यों और मैंने बूथ क्रमांक 164 से गठबंधन के उम्मीदवार को वोट दिया। लेकिन नतीजों में बूथ से सिर्फ एक ही वोट दिखाया गया है। हमारे वोट कहाँ गए?” मंडल ने पूछा।

एक अन्य स्थानीय सीपीआई (एम) समर्थक, अशरफ अली ने कहा कि परिणाम तर्क से परे हैं, खासकर एक ही इलाके के निवासियों से आबाद दो सटे हुए बूथों के बीच स्पष्ट अंतर को देखते हुए। आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए अली ने कहा, “बूथ क्रमांक 165 में सीपीआई (एम) नौ वोटों से आगे थी, जबकि बूथ क्रमांक 164 में पार्टी को केवल एक वोट मिला। मुझे समझ नहीं आ रहा कि इतना बड़ा अंतर कैसे संभव है।” अली ने आगे बताया कि उन्होंने बूथ क्रमांक 165 पर वोट डाला, जबकि उनकी पत्नी ने बूथ नंबर 164 पर वोट डाला। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें यकीन है कि उनकी पत्नी ने सीपीआई (एम) उम्मीदवार को वोट दिया था, तो उन्होंने जवाब दिया, "बिल्कुल। हम सीपीआई (एम) समर्थक हैं।"

“ये सारे वोट कहाँ गए?” उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया। अली ने आगे तर्क दिया कि यदि सीपीआई(एम)-आईएसएफ गठबंधन बूथ क्रमांक 165 में बढ़त हासिल कर सकता है, तो बूथ क्रमांक 164 में भी गठबंधन के लिए पर्याप्त समर्थन दिखना चाहिए था। उन्होंने दावा किया, “यहां भाजपा के जीतने की कोई संभावना नहीं थी। असली मुकाबला हमेशा से सीपीआई (एम) और टीएमसी के बीच रहा है।”

इसी तरह की चिंताओं को दोहराते हुए, स्थानीय निवासी और आईएसएफ नेता अख्तर अली मोल्ला ने कहा कि उन्होंने अपने परिवार के कम से कम आठ सदस्यों के साथ बूथ क्रमांक 164 से सीपीआई (एम)-आईएसएफ गठबंधन के उम्मीदवार को वोट दिया था।

“इस बूथ से उम्मीदवार को सिर्फ एक वोट कैसे मिल सकता है?” मोल्ला ने पूछा। “सिर्फ मैं और मेरा आठ लोगों का परिवार ही नहीं, इस इलाके में और हमारे बूथ पर भी कई पार्टी कार्यकर्ता मौजूद हैं। हमारे सारे वोट कहाँ गए?”

स्थानीय निवासी और बूथ क्रमांक 164 के मतदान एजेंट रमजान अली ने कहा कि उन्होंने, उनकी पत्नी और उनकी दो बेटियों ने बूथ पर मतदान किया था। अली ने कहा, "मैंने व्यक्तिगत रूप से बूथ क्रमांक 164 पर सीपीआई (एम) को वोट दिया, और मेरे परिवार के सदस्यों ने भी ऐसा ही किया।" जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि भाजपा उस बूथ से इतना जबरदस्त समर्थन हासिल कर सकती थी, तो उन्होंने जवाब दिया, "बिल्कुल नहीं। मुझे नहीं लगता कि भाजपा उस बूथ से इतने अधिक वोट जुटा सकती थी।"

टीएमसी के बूथ अध्यक्ष मोक्षेद मंडल ने कहा कि वह परिणाम की व्याख्या नहीं कर सकते और उन्होंने इसे "चौंकाने वाला" और "अविश्वसनीय" बताया। उन्होंने कहा, "मुझे ठीक से नहीं पता कि क्या हुआ। नतीजे वाकई चौंकाने वाले हैं।" मंडल ने बताया कि उनके परिवार के सात सदस्य मतदान के योग्य थे। उनमें से केवल एक को बूथ क्रमांक 164 आबंटित किया गया था, जबकि अन्य ने बूथ क्रमांक 165 पर मतदान किया। उन्होंने दावा किया कि सभी सातों ने टीएमसी को वोट दिया था। मंडल ने व्यक्तिगत मतदान व्यवहार के संबंध में निश्चितता की सीमाओं को स्वीकार किया। उन्होंने कहा, “हम कभी भी यह पूरी तरह से नहीं जान सकते कि लोग क्या सोच रहे हैं। उनमें से कुछ ने शायद एक पार्टी को वोट दिया हो और दावा किसी और पार्टी का किया हो। फिर भी, बूथ क्रमांक 164 का परिणाम हास्यास्पद है।”

ऑल्ट न्यूज़ ने इस इलाके में स्थित भाजपा पार्टी कार्यालय का दौरा किया और पूछा कि मुस्लिम बहुल बूथ में पार्टी को 98% वोट कैसे मिले? भाजपा का कहना है, "लोगों ने हमें वोट दिया। नतीजे खुद ही सब कुछ बयां करते हैं।"

भाजपा कार्यालय में मौजूद कार्यकर्ताओं ने ऑल्ट न्यूज़ को बताया कि इन सवालों का जवाब सिर्फ विधायक ही दे सकते हैं। उनमें से एक, शुभो नास्कर ने कहा, "आप यह क्यों नहीं देखते कि टीएमसी ने 2021 में यह सीट कैसे जीती?" हालांकि नास्कर ने इस बारे में विस्तार से नहीं बताया, लेकिन ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्होंने यह संकेत दिया कि टीएमसी ने पिछले चुनाव में हेरफेर के जरिए इस निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल की थी।

'ऑल्ट न्यूज़' ने विधायक पीयूष कनोडिया से फोन पर बात की। हमने उनसे पूछा कि मुस्लिम बहुल बूथ पर भाजपा को भारी बहुमत मिलने के बारे में उनका क्या विचार है। उन्होंने कहा, “मुझे इस बारे में क्या सोचना चाहिए? लोगों ने हमें वोट दिया है। हम ऐसा नहीं कह रहे हैं। नतीजे खुद ही सब कुछ बता रहे हैं।”

ऑल्ट न्यूज़ ने इलाके में भाजपा के चुनाव प्रचार की गतिविधियों के बारे में भी निवासियों से पूछा। निवासियों ने बताया कि उन्होंने भाजपा का कोई खास चुनाव प्रचार नहीं देखा। उनके अनुसार, भाजपा उम्मीदवार पीयूष कनोडिया ने चुनाव से पहले या जीतने के बाद भी इलाके का दौरा नहीं किया। मोल्लाह, अली और मंडल ने इस बात की पुष्टि की।

'पूरी मतगणना प्रक्रिया अस्पष्ट थी'

'ऑल्ट न्यूज' से बात करते हुए, सीपीआई (एम)-आईएसएफ के उम्मीदवार सप्तर्षि देब ने मतगणना प्रक्रिया से संबंधित घटनाओं का क्रम बताया।

बिधाननगर, न्यू टाउन-गोपालपुर और न्यू टाउन-राजरहाट - इन तीन निर्वाचन क्षेत्रों के वोटों की गिनती एक ही केंद्र पर की गई।

“शुरुआत में सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा था। मैंने देखा कि 17 दौर के बाद तापस चटर्जी आगे चल रहे थे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उनके अलावा कोई और कभी आगे नहीं था। शुरुआत में उनकी बढ़त काफी बड़ी थी, फिर धीरे-धीरे कम होती गई। लेकिन यह कभी पूरी तरह से उलट नहीं ग़ई,” देब ने कहा।

उनके अनुसार, एक समय मतगणना केंद्र के अंदर यह खबर फैल गई कि टीएमसी सरकार गिर सकती है, जिससे तृणमूल के मतगणना एजेंट हतोत्साहित हो गए। बताया जाता है कि उनमें से कई लोग केंद्र छोड़कर चले गए, और रिटर्निंग ऑफिसर की मेज पर केवल उम्मीदवार और कुछ वरिष्ठ नेता ही बैठे रह गए।

देब ने बताया कि इसके बाद हंगामा मच गया और अंततः भाजपा और टीएमसी दोनों के उम्मीदवारों को मतगणना केंद्र छोड़कर लॉबी में इंतजार करने के लिए कहा गया। बाद में उन्हें वापस अंदर आने की अनुमति दी गई। देब 4 मई को रात करीब 11 बजे मतगणना केंद्र से रवाना हुए। लगभग 12:30 बजे, चुनाव आयोग की वेबसाइट देखने के बाद, उन्हें पता चला कि मतगणना के चक्रों की संख्या 17 से बढ़कर 18 हो गई है। फिर भी, उनके अनुसार, टीएमसी उम्मीदवार आगे चल रहे थे।

“अगली सुबह मुझे बीडीओ के कार्यालय से फोन आया कि दोबारा गिनती हो रही है। मैं गया, लेकिन अंदर नहीं जा सका।” जब हमने उनसे वजह पूछी, तो उन्होंने कहा, “दूसरे दिन अधिकारी किसी को भी अंदर नहीं जाने दे रहे थे… मुझे यकीन है कि भाजपा उम्मीदवार अंदर थे… उनकी कार बाहर खड़ी थी, और बाद में हमने उन्हें मतगणना केंद्र से जीत का प्रमाण पत्र लेकर बाहर आते हुए वीडियो में देखा। तृणमूल उम्मीदवार वहां मौजूद नहीं थे।”

जब हमने उनसे पुनर्गणना प्रक्रिया के बारे में विस्तार से पूछा, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता। मुझे, एक उम्मीदवार के तौर पर, या मेरे प्रतिनिधियों को कोई सूचना नहीं दी गई। हमें इसके बारे में सुबह-सुबह फोन पर पता चला। मैं पिछली रात 11 बजे निकला था। अगर पुनर्गणना का फैसला रात 2 बजे भी लिया गया होता, तो सभी उम्मीदवारों को सूचित किया जाना चाहिए था। उम्मीदवारों को अपने मतगणना प्रतिनिधियों को बताना चाहिए था… मुझे अपने सभी 50 मतगणना प्रतिनिधियों को साथ लाना चाहिए था… यह सब इतनी गुपचुप तरीके से क्यों हुआ?”

“पुनर्गणना का अनुरोध किसने किया? भाजपा कह रही है कि टीएमसी ने अनुरोध किया, और टीएमसी कह रही है कि भाजपा ने अनुरोध किया।” जब उनसे पूछा गया कि कितने चक्र की पुनर्गणना हुई, तो देब ने बताया, “मुझे लगता है कि उन्होंने अंतिम 2-3 चक्र की गिनती करने का फैसला किया था। मुझे पक्का पता नहीं है। लेकिन मेरे सूत्रों से जो जानकारी मिली है, उसके अनुसार अंतिम तीन दौर (15वें, 16वें और 17वें) की पुनर्गणना होगी।”

“मुझे इस बात से भी परेशानी है कि उम्मीदवारों को अपना फॉर्म 20 दो दिनों के भीतर मिल जाना चाहिए था, लेकिन हमें नहीं मिला,” देब ने कहा। "जब मैंने दो दिन बाद फोन किया, तो मुझे बताया गया, 'हमें इसे वितरित करने के लिए अभी तक कोई निर्देश नहीं मिले हैं।'"

डीवाईएफआई के जिला सचिव के रूप में, देब ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी थी कि अन्य निर्वाचन क्षेत्रों के उम्मीदवारों को पहले ही उनके फॉर्म 20 दस्तावेज प्राप्त हो चुके हैं। बार-बार कहने पर, रिटर्निंग ऑफिसर ने उन्हें दो-तीन दिन और इंतजार करने को कहा। देब के अनुसार, परिणाम आने के लगभग दो सप्ताह बाद दस्तावेज़ उपलब्ध कराया गया।

बूथ क्रमांक 164 के बारे में विशेष रूप से बात करते हुए देब ने कहा, “मैं आपको यह नहीं बता सकता कि यहां किस तरह की हेराफेरी हुई। लेकिन यह एक ऐसा बूथ है, जहां पंचायत चुनावों में भी हम आगे थे। जनसांख्यिकीय दृष्टि से भी, ऐसा लगता नहीं है कि यहां भाजपा को भारी बहुमत मिलेगा।”

बंगाल के पूर्व मंत्री और सीपीआई (एम) के दिग्गज नेता गौतम देब के बेटे ने कहा कि कई महत्वपूर्ण सवाल अनुत्तरित रह गए हैं और ये सवाल इस निर्वाचन क्षेत्र के असामान्य परिणाम को समझने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सबसे पहले, पुनर्गणना की मांग किसने की, कितने चक्र की पुनर्गणना हुई, और कोई आधिकारिक दस्तावेज क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया? दूसरा, एक ऐसे बूथ में, जो अल्पसंख्यक बहुल हैं, भाजपा ने इतने भारी बहुमत से वोट कैसे हासिल किए? और तीसरा, इस निर्वाचन क्षेत्र के लिए फॉर्म 20 इतनी देर से क्यों उपलब्ध कराया गया?

जब हमने सप्तर्षि देब से पूछा कि क्या उनकी पार्टी चुनाव परिणाम को चुनौती देगी, तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि कुछ किया जा सकता है या नहीं। हम देख रहे हैं कि टीएमसी क्या करती है… अगर ये पंचायत चुनाव होते, तो मैं इसे न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तर तक ले जाता। लेकिन चूंकि ये विधानसभा चुनाव हैं, जहां मेरा वोट शेयर इतना अधिक नहीं है… मैं मीडियाकर्मियों से बात करने की कोशिश कर रहा हूं। मैं चाहता हूं कि इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाए…”।

जब हमने कनोडिया से कहा कि उनके राजनीतिक विरोधी मतगणना में हेराफेरी का आरोप लगा रहे हैं, तो भाजपा विधायक ने कहा कि वे "भ्रम की दुनिया में जी रहे हैं"। उन्होंने देब के इस आरोप का भी स्पष्ट खंडन किया कि 5 मई को हुई पुनर्गणना के दौरान केवल कनोडिया को ही मतगणना केंद्र के अंदर जाने की अनुमति दी गई थी।

'ऑल्ट न्यूज़' ने भारत निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र लिखकर राजारहाट न्यू टाउन निर्वाचन क्षेत्र में हुई मतगणना का विवरण मांगा है और स्थानीय लोगों तथा सीपीआई(एम) उम्मीदवार द्वारा लगाए गए आरोपों पर जवाब देने का अनुरोध किया है। लेकिन, उनकी ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है।

*टिप्पणी* : यह उल्लेखनीय है कि उक्त इलाका, अर्थात् राजारहाट विधानसभा क्षेत्र का मुसलमान पारा, पिछले विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक रूप से भाजपा के विरुद्ध मतदान करता रहा है। 2016 में, यह राजारहाट न्यू टाउन (115) एसी का बूथ क्रमांक 138 था। मतदान केंद्र वही था -- जगदीशपुर एफपी स्कूल। 2016 के विधानसभा चुनावों में इस बूथ पर सीपीआई(एम), भाजपा और टीएमसी के वोटों का कुल योग इस प्रकार था : सीपीआई (एम) के नरेंद्र नाथ चटर्जी : 499 ; बीजेपी के नुपुर घोष : 35 ; टीएमसी के सब्यसाची घोष : 507.

2021 में, इस इलाके को एक बार फिर दो बूथों में विभाजित किया गया -- क्रमांक 148 और 148-ए। दोनों बूथों के लिए मतदान केंद्र जगदीशपुर एफपी स्कूल का कमरा नंबर 2 था। बूथ क्रमांक 148 में तीनों पार्टियों को इस प्रकार वोट मिले थे : 
सीपीआई (एम) के सप्तर्षि देब : 373 ; टीएमसी के तापश चटर्जी : 221 ; बीजेपी के भास्कर रॉय : 15.

बूथ 148-ए में मिले वोट इस प्रकार थे : सीपीआई (एम) के सप्तर्षि देब : 353 ; टीएमसी के तापश चटर्जी : 264 ; और
बीजेपी के भास्कर रॉय : 30.

अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 19 Jun 2026

Wednesday, 17 June 2026

June 17, 2026

ભાવનગર મહાનગર સેવા સદનમાં બોમ્બ ધમકી: હોક્સ ઈમેલે મચાવ્યો હાઈ વોલ્ટેજ ડ્રામા, પોલીસે કરી સંપૂર્ણ તપાસ

ભાવનગર મહાનગર સેવા સદનમાં બોમ્બ ધમકી: હોક્સ ઈમેલે મચાવ્યો હાઈ વોલ્ટેજ ડ્રામા, પોલીસે કરી સંપૂર્ણ તપાસ -Friday World 17 Jun 2026

ભાવનગર (તા. ૧૭ જૂન ૨૦૨૬): ભાવનગરના હૃદયસ્થળે આવેલા મહાનગર સેવા સદન (Bhavnagar Municipal Corporationના મુખ્ય કાર્યાલય)ને અજાણ્યા ઈમેલ આઈડીમાંથી બોમ્બ વિસ્ફોટની ધમકી મળતાં સમગ્ર વિસ્તારમાં હાઈ એલર્ટ જાહેર કરવામાં આવ્યું હતું. પોલીસ અને સુરક્ષા એજન્સીઓએ ત્વરિત કાર્યવાહી કરીને બોમ્બ સ્ક્વોડ, ડોગ સ્ક્વોડ અને અન્ય ટીમો સાથે સંપૂર્ણ સર્ચિંગ ઓપરેશન હાથ ધર્યું. અંતે તપાસમાં કોઈ વિસ્ફોટક પદાર્થ મળ્યો નહીં અને આ ધમકી હોક્સ (ખોટી) સાબિત થઈ.

આ ઘટના ગુજરાતમાં છેલ્લા કેટલાક દિવસોમાં વિવિધ મહાનગરપાલિકાઓ અને સરકારી કચેરીઓને મળેલી સમાન ધમકીઓની શ્રેણીમાં નવી કડી છે. જો કે, સુરક્ષા દળોની સતર્કતાએ કોઈ અનુચિત ઘટના બનતી અટકાવી છે.

 ઘટના ક્રમ: કેવી રીતે મળી ધમકી?

મહાનગર સેવા સદનના અધિકારીઓને સવારે અજાણ્યા ઈમેલ આઈડી પરથી એક મેસેજ મળ્યો, જેમાં બોમ્બ વિસ્ફોટની ધમકી આપવામાં આવી હતી. ઈમેલમાં કેટલાક કિસ્સાઓમાં સમયની મર્યાદા પણ ઉલ્લેખિત હતી. તરત જ મ્યુનિસિપલ કમિશનર કચેરીએ ભાવનગર પોલીસને જાણ કરી. 

પોલીસ કમિશનર અને વરિષ્ઠ અધિકારીઓના માર્ગદર્શન હેઠળ:
- બોમ્બ ડિટેક્શન એન્ડ ડિસ્પોઝલ સ્ક્વોડ (BDDS)

- ડોગ સ્ક્વોડ

- સ્પેશિયલ ઓપરેશન ગ્રુપ (SOG)

- લોકલ ક્રાઈમ બ્રાન્ચ (LCB)

- ફાયર બ્રિગેડ

ની ટીમો ત્વરિત સ્થળે પહોંચી. આખા મહાનગર સેવા સદનના મુખ્ય મકાન, આસપાસના વિસ્તાર અને પાર્કિંગને કોર્ડન કરીને સઘન તપાસ કરવામાં આવી. કર્મચારીઓ અને આવેલા નાગરિકોને અસ્થાયી રૂપે સુરક્ષિત સ્થળે ખસેડવામાં આવ્યા હતા.

સારા સમાચાર: કલાકોની તપાસ પછી કોઈ વિસ્ફોટક સામગ્રી કે સંદેહાસ્પદ વસ્તુ મળી નહીં. પોલીસે આને હોક્સ કોલ/ઈમેલ જાહેર કર્યો છે.

ગુજરાતમાં વધતી ધમકીઓની શ્રેણી

આ ઘટના અલગ નથી. છેલ્લા કેટલાક અઠવાડિયામાં ગુજરાતના અનેક મહાનગરપાલિકા કાર્યાલયો — સુરત, અમદાવાદ, જામનગર અને ભાવનગર — સહિત અન્ય સરકારી કચેરીઓને સમાન પ્રકારના ઈમેલ મળ્યા છે. ઘણા કિસ્સાઓમાં “Khalistan National Army” જેવા નામનો ઉલ્લેખ કરવામાં આવ્યો હતો. 

આવી ધમકીઓનો મુખ્ય ઉદ્દેશ **ભય અને અસ્થિરતા** ફેલાવવાનો હોય છે. સાયબર સેલ અને સુરક્ષા એજન્સીઓએ આ ઈમેલ્સના IP એડ્રેસ, સર્વર અને મૂળ સ્ત્રોતની તપાસ શરૂ કરી છે. અગાઉના કેસમાં પણ મોટા ભાગની ધમકીઓ ખોટી સાબિત થઈ છે.

સુરક્ષા વ્યવસ્થાની તૈયારી અને પડકારો

આવી ઘટનાઓ સુરક્ષા વ્યવસ્થાની તૈયારીને પરખે છે. ભાવનગર પોલીસની ત્વરિત પ્રતિક્રિયા સારી ઉદાહરણ છે. જો કે, વારંવાર આવતી ખોટી ધમકીઓથી:
- સરકારી કામકાજ અસરગ્રસ્ત થાય છે.
- સામાન્ય નાગરિકોમાં અનાવશ્યક ભય ફેલાય છે.
- સુરક્ષા દળોના સંસાધનોનો વ્યય થાય છે.

નાગરિકો માટે સલાહ:
- આવા ઈમેલ અથવા કોલ મળે તો તરત પોલીસ અથવા સાયબર ક્રાઈમ હેલ્પલાઈન (૧૯૩૦ અથવા ૧૦૦) પર જાણ કરો.
- અફવાઓ પર વિશ્વાસ ન કરો.
- સત્તાવાળાઓની અપીલ મુજબ શાંતિ જાળવો.

સાયબર સુરક્ષા અને ભવિષ્યની તૈયારી

આ ઘટના ડિજિટલ યુગમાં સાયબર ટેરરિઝમના વધતા જોખમને રેખાંકિત કરે છે. ગુજરાત સરકાર અને કેન્દ્રીય એજન્સીઓએ આવી ધમકીઓ સામે વધુ મજબૂત સાયબર ફાયરવોલ અને રિયલ-ટાઈમ મોનિટરિંગ વ્યવસ્થા વિકસાવવી જરૂરી છે. 

મહાનગર સેવા સદન જેવી સંસ્થાઓ જે નાગરિક સેવાઓ પૂરી પાડે છે (પાણી, રસ્તા, કચરા વ્યવસ્થાપન, પ્રોપર્ટી ટેક્સ વગેરે), તેમના કાર્યમાં વિક્ષેપ ન પડે તે માટે વધુ સુરક્ષા પગલાં લેવામાં આવી રહ્યાં છે.

  સતર્કતા સુરક્ષા છે  

ભાવનગર મહાનગર સેવા સદનમાં મળેલી બોમ્બ ધમકી હોક્સ સાબિત થવા છતાં તે સુરક્ષા એજન્સીઓની તૈયારી અને ત્વરિત પ્રતિસાદનું પ્રમાણ છે. આવી ઘટનાઓ આપણને યાદ અપાવે છે કે આધુનિક યુદ્ધ હવે માત્ર ભૌતિક નથી, પરંતુ માનસિક અને ડિજિટલ પણ છે.

ગુજરાત પોલીસ અને તંત્રને અભિનંદન કે તેમણે પરિસ્થિતિને નિયંત્રણમાં રાખી. નાગરિકો તરફથી પણ સહયોગ અને સતર્કતા જરૂરી છે. 

શાંતિ અને સુરક્ષા સાથે જીવીએ, એકબીજાને સાચવીએ.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 17 Jun 2026
June 17, 2026

पहली मुहर्रम: कर्बला की पुकार, हक़ की अमर जंग यज़ीदियत को खुल्ला कर देने का और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत से सबक़ सीखने का महीना है।

पहली मुहर्रम: कर्बला की पुकार, हक़ की अमर जंग यज़ीदियत को खुल्ला कर देने का और इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत से सबक़ सीखने का महीना है।
- Friday World 17 Jun 2026
जब चाँद की पहली किरण मुहर्रम की रात को छूती है, तो इतिहास की सबसे बड़ी सच की लड़ाई फिर से ज़िंदा हो जाती है। यह महीना न जश्न का है, न भूलने का — यह हक़ की कीमत चुकाने का, 

हर साल 1 मुहर्रम आते ही दुनिया के कोने-कोने में बस उन लोगों की रगों में खून की जगह कर्बला दौड़ने लगती है, जिनके दिल में ज़मीर अभी ज़िंदा है। यह वह महीना है जब इंसानियत फिर से पूछती है — क्या तुम हक़ के साथ खड़े हो, या मक्कारों की भीड़ में शामिल हो गए हो?

 कर्बला: हक़ और बاطिल की निर्णायक जंग

सन् 61 हिजरी, 10 मुहर्रम। कर्बला के मैदान में सिर्फ 72 साथी, भूखे-प्यासे, घायल। सामने यज़ीद की हजारों की फौज। लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) ने झुकना मंजूर नहीं किया। उन्होंने कहा था: “मैं अपनी जान दे दूंगा, लेकिन अपनी गरिमा और सच्चाई नहीं बेचूंगा।”

यह जंग सिर्फ दो आदमियों या दो परिवारों की नहीं थी। यह दो मज़हबों की नहीं थी। यह दो रास्तों की जंग थी — हक़ और सत्ता की लालच की। एक तरफ इमाम हुसैन (अ.स.), जो बाप-दादा की विरासत — रसूल (स.अ.व.) की सच्चाई — को बचाने निकले थे। दूसरी तरफ यज़ीद, जो ख़िलाफत को राजशाही में बदलना चाहता था।

आज भी जब हम मुहर्रम की रातों में मातम करते हैं, रोते हैं, तो असल में हम अपने अंदर के यज़ीद को मारने की कोशिश करते हैं।

मुहर्रम का सच्चा मिजाज

मुहर्रम का मिजाज जश्न का नहीं, जागृति का है।  
यह महीना हमें याद दिलाता है कि:

- हर चेहरे पर यक़ीन नहीं करना चाहिए।
- लिबास बदलकर आने वाले मक्कारों को पहचानना है।
- दोस्ती का दावा करने वाले, लेकिन किरदार बेचने वाले लोगों से दूर रहना है।

“जो तेरे सामने तेरे हैं, जो मेरे सामने मेरे हैं — ऐसे फितरत के मक्कारों से मुझे नफरत है।”

मुहर्रम हमें सिखाता है कि **किरदार के सौदागर** नहीं, उसूलों के मुसाफिर बनना है। सर झुकाना हमारी फितरत नहीं, ज़रूरत पड़े तो सर कटाना हमारी विरासत है।

आज के इस दौर में, जहां सोशल मीडिया पर हर कोई “हुसैनी” बनने का दावा करता है, मुहर्रम हमें सवाल करता है — क्या तुम सच में हुसैनी हो? या सिर्फ नाम और हैशटैग का?

 आधुनिक यज़ीदियत: नये लिबास में पुरानी साजिश

आज यज़ीदियत लैपटॉप और माइक लेकर आती है।  
वो टीवी स्क्रीन पर “शांति” और “संवाद” की बात करती है, लेकिन अंदर से सत्ता और पैसे की भूख रखती है।  
वो धार्मिक लिबास पहनकर आती है, लेकिन इमाम हुसैन (अ.स.) के पैगाम को तोड़-मरोड़कर पेश करती है।

मुहर्रम हमें चेतावनी देता है — यज़ीदियत कभी ख़त्म नहीं होती, वो सिर्फ अपना चेहरा बदलती है। आज वो कॉर्पोरेट मीटिंग में, कल मीडिया स्टूडियो में, परसों राजनीतिक मंच पर नज़र आएगी।

इसीलिए इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत का पैगाम आज भी उतना प्रासंगिक है जितना 1400 साल पहले था: **अकेले खड़े होना बेहतर है, लेकिन गलत भीड़ के साथ खड़े होने से।**

 फ़नकार, अहल-ए-कलम और अहल-ए-दिल के लिए दुआ

इस मुहर्रम में विशेष दुआ है उन सभी के लिए जो सच बोलने का साहस रखते हैं:

- जो लेखक हैं, जो कलाकार हैं, जो शायर हैं।

- जो सच्ची आवाज़ उठाते हैं, भले ही उनकी आवाज़ अकेली ही क्यों न हो।

- जो बदकिरदार लोगों के सामने झुकने से इनकार करते हैं।

या इमाम हुसैन (अ.स.),
आपके सदके तमाम ज़मीर वाले लोग, अहल-ए-कलम और अहल-ए-दिल हर तरह के मक्कारों, दबाव और धोखे से महफूज़ रहें। उन्हें हक़ की राह पर चलने की तौफ़ीक अता फरमाएं।

 हक़ ज़िंदा है — हमेशा ज़िंदा रहेगा

कर्बला की शहादत ने साबित कर दिया कि हक़ को मारने के लिए कितनी भी बड़ी फौज क्यों न हो, वो कभी ख़त्म नहीं होता।  
इमाम हुसैन (अ.स.) शहीद हो गए, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी हर ज़ालिम के खिलाफ गूंजती है।

हर मातमी जलूस, हर नोहा, हर मज़लूम की पुकार यह संदेश देती है:

हक़ ज़िंदा था, हक़ ज़िंदा है, और हक़ हमेशा ज़िंदा रहेगा।

इस मुहर्रम हम सब से अपील है —  
अपने अंदर छिपे छोटे-छोटे यज़ीद को मारो।  
सच के साथ खड़े हो।  
मक्कारों की चमकदार बातों में न आओ।  
और अगर ज़रूरत पड़ी तो इमाम हुसैन (अ.स.) की तरह अकेले ही सही, लेकिन हक़ पर खड़े रहो।


लabbayk ya Hussain (अ.स.) या हुसैन (अ.स.)...

यह महीना हमारे दिलों को साफ़ करे, हमारे ज़मीर को जागृत करे और हमें हक़ की राह पर चलने की हिम्मत दे।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 17 Jun 2026