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Thursday, 23 April 2026

April 23, 2026

ट्रंप प्रशासन में अमेरिकी सेना के नेतृत्व में बड़े बदलाव: रक्षा सचिव पीट हेगसेथ एक साल से पेंटागन को नया रूप दे रहे हैं

ट्रंप प्रशासन में अमेरिकी सेना के नेतृत्व में बड़े बदलाव: रक्षा सचिव पीट हेगसेथ एक साल से पेंटागन को नया रूप दे रहे हैं-Friday World-April 23,2026 
वाशिंगटन — राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरू होते ही अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) में नेतृत्व स्तर पर अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहे हैं। रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने जनवरी 2025 में पद संभालते ही सैन्य पदानुक्रम को पूरी तरह बदलने की मुहिम छेड़ दी है। पिछले एक साल में उन्होंने दर्जनों उच्च पदस्थ अधिकारियों को हटाया, जबरन रिटायरमेंट पर भेजा, प्रमोशन्स रोके और कमांड स्ट्रक्चर में बड़े सुधार किए। इसका मकसद है — “कम जनरल, ज्यादा जवान” (Less Generals, More G.I.s) की नीति के तहत सेना को अधिक घातक, कुशल और युद्ध-केंद्रित बनाना।

हेगसेथ ने स्पष्ट कहा है कि “अमेरिकी सेना अब ‘वेक’ संस्कृति, राजनीतिक सही होने की मजबूरी और अनावश्यक प्रशासनिक बोझ से मुक्त होगी।” उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस को अनौपचारिक रूप से “डिपार्टमेंट ऑफ वॉर” कहकर युद्ध-लड़ने की क्षमता को प्राथमिकता दी है।

 बड़े पैमाने पर फायरिंग और नेतृत्व परिवर्तन

हेगसेथ के कार्यकाल में 20 से अधिक उच्च पदस्थ जनरल और एडमिरल्स को हटाया या साइडलाइन किया गया है। प्रमुख उदाहरण:

- जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन जनरल चार्ल्स “सीक्यू” ब्राउन को हटाया गया।
- नेवी के टॉप एडमिरल लिसा फ्रांचेटी को पद से हटाया गया।
- आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज को अप्रैल 2026 में जबरन रिटायरमेंट पर भेजा गया — यह ईरान संघर्ष के दौरान हुआ, जिससे कमांड स्थिरता पर सवाल उठे।
- साइबर कमांडर, डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी डायरेक्टर और कई कॉम्बेटेंट कमांडर्स सहित दर्जनों अन्य अधिकारियों को प्रभावित किया गया।

हेगसेथ ने क्वांटिको में सीनियर लीडर्स को संबोधित करते हुए कहा, “मैंने कई सीनियर अधिकारियों को निकाला है — पिछले चेयरमैन, जॉइंट चीफ्स के सदस्य, कॉम्बेटेंट कमांडर्स। और आगे भी बदलाव होंगे, क्योंकि हमें जरूरत है।” उन्होंने “फैट जनरल्स और एडमिरल्स” की आलोचना की और युद्ध-योद्धा मानसिकता (warrior ethos) पर जोर दिया।

प्रमोशन्स में हस्तक्षेप और DEI का अंत

हेगसेथ ने प्रमोशन लिस्ट में भी सीधा हस्तक्षेप किया। मार्च 2026 में उन्होंने चार आर्मी अधिकारियों (दो ब्लैक पुरुष और दो महिला) को ब्रिगेडियर जनरल बनने से रोका। कुछ रिपोर्ट्स में आरोप लगे कि यह DEI (Diversity, Equity, Inclusion) नीतियों के खिलाफ है, हालांकि हेगसेथ ने इसे मेरिट-आधारित फैसला बताया। उन्होंने दावा किया कि पिछली सरकार में रंग, लिंग या राजनीतिक जुड़ाव के आधार पर प्रमोशन्स दिए गए थे।

उन्होंने 20% चार-स्टार जनरल/एडमिरल पदों में कटौती का आदेश दिया और कुल जनरल/फ्लैग ऑफिसरों में 10% की कमी का लक्ष्य रखा। मेमो में लिखा — “अधिक जनरल ज्यादा सफलता नहीं देते। द्वितीय विश्व युद्ध में 17 चार और पांच-स्टार जनरलों ने 1.2 करोड़ सैनिकों का नेतृत्व किया, जबकि आज 44 चार-स्टार अधिकारी मात्र 21 लाख सैनिकों पर हैं।”

 कमांड स्ट्रक्चर और यूनिफाइड कमांड प्लान में बड़े सुधार

दिसंबर 2025 में पेंटागन ने यूनिफाइड कमांड प्लान (Unified Command Plan) में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया। इसमें:

- यूरोप, अफ्रीका और मिडिल ईस्ट के कुछ रीजनल हेडक्वार्टर को डाउनग्रेड या मर्ज करने का प्लान।
- कॉम्बेटेंट कमांड्स की संख्या 11 से घटाकर 8 करने का सुझाव।
- नया “अमेरिकास कमांड” बनाने का विचार, जिसमें साउथर्न और नॉर्दर्न कमांड को शामिल किया जाए।
- संसाधनों को मिडिल ईस्ट और यूरोप से हटाकर इंडो-पैसिफिक (चीन को रोकने) और होमलैंड डिफेंस पर फोकस।

ये बदलाव हेगसेथ के वादे को पूरा करते हैं — स्टेटस को चुनौती देना और टॉप लीडरशिप को कम करना।

अन्य सुधार: एक्विजिशन, फिटनेस और कल्चर

हेगसेथ ने एक्विजिशन सिस्टम को भी बदला। प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव ऑफिसेस की जगह “पोर्टफोलियो एक्विजिशन एक्जीक्यूटिव्स” (PAEs) लाए, जो सीधे आर्मी सेक्रेटरी और चीफ ऑफ स्टाफ को रिपोर्ट करेंगे। लक्ष्य — हथियारों की खरीद तेज करना, वाणिज्यिक तकनीक को प्राथमिकता देना और ठेकेदारों पर दबाव बनाना।

उन्होंने फिजिकल फिटनेस स्टैंडर्ड्स में बदलाव किया — कॉम्बैट भूमिकाओं में “हाईएस्ट मेल स्टैंडर्ड” लागू किया और “जेंडर न्यूट्रल” मानकों को समाप्त किया। DEI प्रोग्राम्स को खत्म कर “वार फाइटिंग” को एकमात्र मिशन बताया।

सिविलियन कर्मचारियों में भी बड़े बदलाव हुए — 60,000 से ज्यादा ने वॉलंटरी रिटायरमेंट या रिजिग्नेशन प्रोग्राम के तहत विभाग छोड़ा।
 विवाद और आलोचना

ये बदलाव विवादास्पद रहे हैं। डेमोक्रेटिक लीडर्स और कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों (जैसे जिम मैटिस) ने चिंता जताई कि युद्ध के दौरान (ईरान संघर्ष के बीच) इतने बड़े बदलाव कमांड स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ ने इसे “यस मेन” नियुक्त करने की कोशिश बताया। प्रमोशन्स रोकने पर रेस और जेंडर बायस के आरोप लगे, जिन्हें हेगसेथ ने खारिज किया।

ट्रंप समर्थक इसे “लंबे समय से जरूरी सुधार” मानते हैं, जो सेना को फिर से मजबूत और मेरिट-आधारित बनाएगा।

 भारत और वैश्विक प्रभाव

भारत की दृष्टि से ये बदलाव महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में इंडो-पैसिफिक पर फोकस बढ़ने से क्वाड और अन्य साझेदारियों को बल मिल सकता है। लेकिन मिडिल ईस्ट में अनिश्चितता (हॉर्मुज, ईरान) से ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। भारत को अपनी रक्षा नीति में इन बदलावों को ध्यान में रखते हुए संतुलित रणनीति अपनानी होगी।

 आगे क्या?

हेगसेथ अभी भी और बदलावों की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि ये कदम “अनावश्यक नहीं, बल्कि जरूरी” हैं ताकि अमेरिकी सेना दुश्मनों (खासकर चीन) को रोक सके। ट्रंप प्रशासन “पीस थ्रू स्ट्रेंथ” की नीति पर अडिग है।

पेंटागन में यह “शेकअप” अमेरिकी सैन्य इतिहास में याद रखा जाएगा। सफलता तब मानी जाएगी जब ये बदलाव सेना की लड़ाकू क्षमता बढ़ाएं, न कि आंतरिक अस्थिरता पैदा करें। फिलहाल, पूरी दुनिया इन बदलावों पर नजर रखे हुए है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

पेंटागन की चौंकाने वाली चेतावनी: हॉर्मुज जलडमरूमध्य से बारूदी सुरंगें साफ करने में 6 महीने लग सकते हैं, तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहेंगी

पेंटागन की चौंकाने वाली चेतावनी: हॉर्मुज जलडमरूमध्य से बारूदी सुरंगें साफ करने में 6 महीने लग सकते हैं, तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊँची रहेंगी-Friday World-April 23,2026 
वाशिंगटन — मध्य पूर्व में चल रहे अमेरिका-ईरान तनाव के बीच एक नई चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। वाशिंगटन पोस्ट की बुधवार (22 अप्रैल 2026) की रिपोर्ट के अनुसार, पेंटागन के एक गोपनीय आकलन में कहा गया है कि ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य में बिछाई गई बारूदी सुरंगों (sea mines) को पूरी तरह साफ करने में **छह महीने तक का समय** लग सकता है। भले ही लड़ाई रुक जाए और नाकाबंदी हटा ली जाए, फिर भी इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को पूरी तरह सुरक्षित बनाने में कई महीने लग सकते हैं।

यह आकलन हाउस आर्म्ड सर्विसेज कमेटी (House Armed Services Committee) के सदस्यों को मंगलवार को दी गई एक गुप्त ब्रीफिंग में बताया गया। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे वैश्विक तेल बाजार पर लंबे समय तक असर पड़ेगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतें ऊँची बनी रह सकती हैं — यहां तक कि अमेरिकी मिडटर्म चुनावों तक भी।

 पेंटागन का आकलन: 20 से ज्यादा माइन्स, साफ करने में लंबा समय

रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य और उसके आसपास 20 या उससे अधिक बारूदी सुरंगें बिछाई हैं। इनमें कुछ GPS-गाइडेड माइन्स भी हो सकते हैं, जो आधुनिक तकनीक से लैस हैं। पेंटागन के अधिकारियों ने कांग्रेस को बताया कि खदानों को हटाने की पूरी प्रक्रिया युद्ध समाप्त होने के बाद ही शुरू हो सकती है और इसमें छह महीने तक लग सकते हैं।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल निर्यात का सबसे महत्वपूर्ण चोकपॉइंट है। इससे पहले युद्ध से पहले यहां से विश्व के लगभग 20% तेल का परिवहन होता था। अगर यह मार्ग लंबे समय तक आंशिक रूप से बंद या असुरक्षित रहा, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होगी, जिसका सीधा असर भारत, चीन, यूरोप और अमेरिका की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ेगा।

वाशिंगटन पोस्ट ने तीन अधिकारियों के हवाले से लिखा कि यह समयसीमा युद्ध के आर्थिक प्रभाव को इस साल के अंत और उससे आगे तक बढ़ा सकती है। खदानें साफ करने का काम आसान नहीं है — इसमें विशेष नौसेना इकाइयां, रोबोटिक सिस्टम, डाइविंग टीम्स और हवाई निगरानी की जरूरत पड़ती है। ईरान की छोटी नावों से बिछाई गई कुछ माइन्स का पता लगाना और नष्ट करना और भी चुनौतीपूर्ण है।

 पेंटागन का खंडन: “6 महीने का बंद होना असंभव और अस्वीकार्य”

पेंटागन ने रिपोर्ट को “असटीक” (inaccurate) बताया है। पेंटागन के प्रवक्ता **सीन पार्नेल** (Sean Parnell) ने एएफपी और अन्य मीडिया को दिए बयान में कहा:

> “हॉर्मुज जलडमरूमध्य का छह महीने के लिए बंद होना एक असंभव स्थिति है और रक्षा सचिव के लिए पूरी तरह अस्वीकार्य है।”

पार्नेल ने यह भी कहा कि “एक आकलन का मतलब यह नहीं कि वह व्यावहारिक या संभव है।” उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट पर आरोप लगाया कि रिपोर्ट “एजेंडा” चलाने के लिए प्रकाशित की गई है। हालांकि, उन्होंने छह महीने की जगह कोई वैकल्पिक समयसीमा नहीं बताई।

यह खंडन ट्रंप प्रशासन की उस रणनीति से मेल खाता है जिसमें वे ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए जल्द से जल्द हॉर्मुज को पूरी तरह खोलने पर जोर दे रहे हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले ही ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर कोई ठोस सौदा नहीं हुआ तो “बहुत सारे बम फटेंगे”।

 हॉर्मुज का सामरिक महत्व: क्यों है यह इतना अहम?

हॉर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। यह संकीर्ण जलमार्ग दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और ईरान का अधिकांश तेल निर्यात होता है।

- दैनिक तेल परिवहन: लगभग 21 मिलियन बैरल प्रति दिन (2025-26 के आंकड़ों के अनुसार)।
- वैश्विक हिस्सेदारी: विश्व के कुल तेल व्यापार का करीब 20%।
- भारत पर असर: भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। हॉर्मुज में देरी या असुरक्षा से भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं, मुद्रास्फीति बढ़ सकती है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ेगा।

ईरान ने पहले भी हॉर्मुज को “बंद करने” की धमकी दी है, जिसे वह अपना “बैटलफील्ड कार्ड” मानता है। युद्ध के दौरान ईरानी नौसेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने छोटी नावों और सबमरीन्स का इस्तेमाल कर माइन्स बिछाए।

 वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: तेल कीमतें और मुद्रास्फीति

विश्लेषकों का कहना है कि अगर हॉर्मुज पूरी तरह सुरक्षित नहीं हुआ तो तेल की कीमतें 80-100 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर बनी रह सकती हैं। इससे:

- अमेरिका में गैसोलीन की कीमतें बढ़ेंगी, जो मिडटर्म चुनावों में राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
- भारत जैसे आयातक देशों में ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ और अन्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होंगी।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित होगी, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी।

कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर माइन्स साफ करने में वाकई 6 महीने लगे तो तेल बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और वैकल्पिक रास्ते (जैसे सऊदी पाइपलाइन्स) की क्षमता सीमित होने से समस्या और बढ़ेगी।

 ट्रंप प्रशासन की दोहरी चुनौती: सैन्य दबाव vs आर्थिक हकीकत

ट्रंप टीम ईरान के साथ संघर्षविराम को विस्तारित कर रही है और तेहरान को “एकजुट प्रस्ताव” देने का समय दे रही है। लेकिन पेंटागन का यह आकलन (भले ही खंडित किया गया हो) दिखाता है कि युद्ध के बाद भी आर्थिक परिणाम लंबे समय तक रह सकते हैं।

इजराइल और अमेरिकी हॉकिश गुट पूर्ण सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, जबकि कूटनीतिक प्रयास (पाकिस्तान की मध्यस्थता सहित) जारी हैं। ईरान ने कहा है कि ब्लॉकेड हटाए बिना हॉर्मुज को पूरी तरह खोलना संभव नहीं।

आगे क्या?

वर्तमान में स्थिति अनिश्चित है। पेंटागन की ब्रीफिंग कांग्रेस में चर्चा का विषय बन गई है। अगर युद्धविराम टिकता है और वार्ता आगे बढ़ती है, तो खदानें साफ करने का काम तेजी से शुरू हो सकता है। लेकिन अगर तनाव बढ़ा तो हॉर्मुज में अनिश्चितता बनी रहेगी।

भारत के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती है — एक तरफ ऊर्जा सुरक्षा, दूसरी तरफ अमेरिका-इजराइल के साथ रणनीतिक संबंध। नई दिल्ली को संतुलित कूटनीति अपनाते हुए वैकल्पिक तेल स्रोतों (रूस, अमेरिका आदि) पर ध्यान देना होगा।

यह घटनाक्रम एक बार फिर याद दिलाता है कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक हथियार जैसे बारूदी सुरंगें भी कितना बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचा सकती हैं। दुनिया अब हॉर्मुज के खुलने और खदानों के सफाई के समय पर नजर टिकाए हुए है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

ट्रंप टीम के लिए एक और बड़ी बेइज्जती: होमलैंड सिक्योरिटी की एंटी-टेरर अधिकारी जूलिया वार्वारो 'शुगर डैडी' स्कैंडल में फंसी, प्रशासनिक छुट्टी पर भेजी गई

ट्रंप टीम के लिए एक और बड़ी बेइज्जती: होमलैंड सिक्योरिटी की एंटी-टेरर अधिकारी जूलिया वार्वारो 'शुगर डैडी' स्कैंडल में फंसी, प्रशासनिक छुट्टी पर भेजी गई-Friday World-April 23,2026 
वाशिंगटन में ट्रंप प्रशासन को लगातार विवादों का सामना करना पड़ रहा है। इस बार डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) की काउंटरटेररिज्म शाखा की डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी जूलिया वार्वारो (29 वर्ष) एक चौंकाने वाले स्कैंडल में घिर गई हैं। उनके पूर्व प्रेमी ने विभाग के इंस्पेक्टर जनरल के पास औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि वार्वारो ने उन्हें 'शुगर डैडी' की तरह इस्तेमाल किया, लगभग 40,000 डॉलर खर्च करवाए और अपनी शानदार लाइफस्टाइल को फंड करने के लिए अमीर पुरुषों की तलाश की।

यह घटना ट्रंप टीम के लिए न सिर्फ शर्मिंदगी का सबब बन गई है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक उच्च पद पर तैनात एंटी-टेररिज्म अधिकारी के वित्तीय लेन-देन और व्यक्तिगत संबंध यदि संदिग्ध हों, तो सुरक्षा मंजूरी (security clearance) पर असर पड़ सकता है।

 स्कैंडल की शुरुआत: हिंग ऐप से 'शुगर डैडी' साइट तक

रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर 2025 में एक तलाकशुदा बिजनेस एक्जीक्यूटिव रॉबर्ट बी. (Robert B.) ने डेटिंग ऐप Hinge पर 29 वर्षीय जूलिया वार्वारो से मैच किया। दोनों के बीच तीन महीने का रिश्ता चला। रॉबर्ट का आरोप है कि इस दौरान उन्होंने वार्वारो पर लगभग 40,000 डॉलर खर्च किए। इन खर्चों में शामिल थे:

- इटली, अरूबा, सैन डिएगो और साउथ कैरोलिना जैसे ठिकानों पर लग्जरी छुट्टियां
- कार्टियर ज्वेलरी
- महंगे हैंडबैग्स और शॉपिंग स्प्री
- अन्य विलासिता भरे खर्च

रॉबर्ट ने दावा किया कि जब उन्होंने और खर्च करने से इनकार कर दिया, तो रिश्ता टूट गया। बाद में उन्हें पता चला कि वार्वारो का Seeking.com (एक शुगर डैडी वेबसाइट) पर प्रोफाइल था, जहां उन्होंने खुद को Alessia' नाम से पेश किया था। प्रोफाइल की फोटो भी उनकी इंस्टाग्राम से ली गई थी। रॉबर्ट ने आरोप लगाया कि वार्वारो ने उन्हें सीधे बताया था कि उनके पास मौजूद 40,000 डॉलर की ज्वेलरी विभिन्न 'शुगर डैडीज' की 'ट्रॉफीज' हैं।

रॉबर्ट ने DHS इंस्पेक्टर जनरल के पास शिकायत दर्ज कराते हुए लिखा: “मैं शुगर डैडी या वेश्यावृत्ति जैसा रिश्ता नहीं चाहता था। मुझे लगता है कि वह वित्तीय तनाव में है और उसके कार्य राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकते हैं।”

 वार्वारो का बचाव और विभाग की कार्रवाई

जूलिया वार्वारो ने इन आरोपों से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि यह एक “सामान्य रिश्ता था जो खराब हो गया” और उन्होंने “कुछ गलत नहीं किया”। उन्होंने आरोपों को “झूठा और बदले की भावना से प्रेरित” बताया।

हालांकि, विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया। DHS के एक अधिकारी ने पुष्टि की कि “जूलिया वार्वारो प्रशासनिक छुट्टी (administrative leave) पर हैं। जांच के परिणामस्वरूप वे अब डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी के पद पर कार्य नहीं कर रही हैं।”

यह कदम सुरक्षा मंजूरी और संभावित वित्तीय दबाव की जांच के लिए उठाया गया है। काउंटरटेररिज्म जैसे संवेदनशील विभाग में काम करने वाले अधिकारी पर यदि वित्तीय लेन-देन या बाहरी संबंधों का संदेह हो, तो यह blackmail या foreign influence का खतरा पैदा कर सकता है।

 कौन हैं जूलिया वार्वारो?

जूलिया वार्वारो लॉन्ग आइलैंड की रहने वाली हैं। उन्होंने St. John’s Universiti से तीन डिग्रियां हासिल की हैं। ट्रंप प्रशासन में उन्हें काउंटरटेररिज्म शाखा में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वे होमलैंड सिक्योरिटी सचिव क्रिस्टी नोएम (Kristi Noem) के साथ फोटो में भी नजर आई हैं और राष्ट्रपति ट्रंप के साथ पोज भी दिया है।

उनकी युवा उम्र (29 वर्ष) और उच्च पद दोनों ही वजहों से यह स्कैंडल और ज्यादा सुर्खियों में है। विपक्षी मीडिया इसे ट्रंप टीम की “नैतिक पतन” की मिसाल बता रहा है, जबकि समर्थक इसे “व्यक्तिगत मामला” और “राजनीतिक हमला” करार दे रहे हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल

एंटी-टेरर अधिकारी का पद अत्यंत संवेदनशील होता है। यहां काम करने वाले व्यक्ति की सुरक्षा मंजूरी (Top Secret/Sensitive Compartmented Information) बहुत सख्त जांच के बाद दी जाती है। यदि कोई अधिकारी वित्तीय संकट में हो या ऐसे संबंध रखता हो जिनसे blackmail का खतरा हो, तो यह पूरे विभाग और देश की सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।

रॉबर्ट बी. ने अपनी शिकायत में ठीक यही चिंता जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में इंस्पेक्टर जनरल की जांच न सिर्फ व्यक्तिगत आचरण, बल्कि सुरक्षा प्रोटोकॉल के उल्लंघन की भी पड़ताल करती है। यदि आरोप साबित हुए तो वार्वारो की नौकरी पर खतरा तो है ही, साथ ही ट्रंप प्रशासन की छवि पर और बट्टा लग सकता है।

 ट्रंप टीम पर लगातार विवादों की बौछार

यह पहला मामला नहीं है जब ट्रंप प्रशासन के किसी अधिकारी पर व्यक्तिगत या नैतिक मुद्दों को लेकर सवाल उठे हों। हाल के महीनों में कई विवाद सामने आए हैं, जिन्हें विपक्ष “ट्रंप टीम की बेइज्जती” की श्रृंखला बता रहा है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि युवा और महत्वाकांक्षी अधिकारियों की नियुक्ति में सख्त स्क्रीनिंग की कमी ने ऐसे मामलों को बढ़ावा दिया है। वहीं, ट्रंप समर्थक इसे “डीप स्टेट” और मीडिया की साजिश बताते हैं।

आगे क्या?

DHS इंस्पेक्टर जनरल की जांच अभी चल रही है। यदि जांच में आरोप सही पाए गए तो वार्वारो के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है, जिसमें पद से हटाना या सुरक्षा मंजूरी रद्द करना शामिल हो सकता है।

जूलिया वार्वारो ने अब तक सार्वजनिक रूप से ज्यादा बयान नहीं दिया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे आरोपों से लड़ेंगी।

यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि उच्च सरकारी पदों पर बैठे लोगों की निजी जिंदगी भी सार्वजनिक हित से जुड़ी होती है। खासकर जब बात राष्ट्रीय सुरक्षा की हो, तो पारदर्शिता और नैतिकता दोनों जरूरी हैं।

ट्रंप प्रशासन के लिए यह एक और चुनौती है। वे किस तरह इस स्कैंडल को संभालते हैं, यह उनकी छवि और भविष्य की नीतियों पर असर डालेगा। फिलहाल, पूरा वाशिंगटन इस “शुगर डैडी” विवाद पर चर्चा कर रहा है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

वाशिंगटन ने ईरान के साथ संघर्षविराम की नई समयसीमा का संकेत दिया, इजराइली सूत्र चिंतित: वार्ता ठप, अमेरिकी नीति में भ्रम की आशंका

वाशिंगटन ने ईरान के साथ संघर्षविराम की नई समयसीमा का संकेत दिया, इजराइली सूत्र चिंतित: वार्ता ठप, अमेरिकी नीति में भ्रम की आशंका
-Friday World-April 23,2026 
मध्य पूर्व की जटिल भू-राजनीति में एक बार फिर तनाव की नई लहर उभर रही है। अमेरिका ने कथित तौर पर इजराइल को सूचित किया है कि ईरान के साथ चल रहा संघर्षविराम रविवार (26 अप्रैल 2026) को समाप्त होने वाला है, जबकि व्हाइट हाउस की ओर से सार्वजनिक रूप से कोई सख्त समयसीमा तय न करने का दावा किया जा रहा है। इजराइली मीडिया और सूत्र इस स्थिति को “वार्ता में ठप्पा” और “अमेरिकी रुख में असंगति” करार दे रहे हैं। इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक भविष्य को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

ट्रंप प्रशासन का दोहरा रुख: विस्तार लेकिन दबाव बरकरार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में ईरान के साथ दो सप्ताह के संघर्षविराम को विस्तारित करने की घोषणा की थी। पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई इस व्यवस्था को ट्रंप ने “ईरानी नेतृत्व को एकीकृत प्रस्ताव देने का समय” देते हुए बढ़ाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघर्षविराम तब तक जारी रहेगा जब तक तेहरान एक “एकजुट प्रस्ताव” पेश नहीं कर देता। साथ ही, अमेरिकी नौसेना द्वारा ईरानी बंदरगाहों पर लगाए गए ब्लॉकेड को पूरी तरह बरकरार रखने का आदेश दिया गया।

ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर कोई सौदा नहीं हुआ तो “बहुत सारे बम फटेंगे” और ईरान को “ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जैसा पहले कभी नहीं देखा”। दूसरी ओर, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलीन लेविट (Karoline Leavitt) ने प्रेस से बात करते हुए जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को कोई निश्चित समयसीमा नहीं दी है। उन्होंने कहा, “कुछ रिपोर्ट्स में जो 3-5 दिन या रविवार की डेडलाइन बताई जा रही है, वह गलत है। समयसीमा अंततः राष्ट्रपति तय करेंगे।”

यह दोहरा संदेश वाशिंगटन की रणनीति को लेकर भ्रम बढ़ा रहा है। एक तरफ ट्रंप त्वरित और ठोस परिणाम चाहते हैं, तो दूसरी तरफ वे ईरान के आंतरिक विभाजन (प्रगतिशील बनाम कट्टरपंथी गुट) को देखते हुए लचीलापन दिखा रहे हैं।

 इजराइली चिंता: KAN रिपोर्ट और सूत्रों की प्रतिक्रिया

इजराइली सार्वजनिक प्रसारक **KAN** ने खबर दी कि अमेरिका ने इजराइल को गोपनीय रूप से सूचित किया है कि ट्रंप द्वारा निर्धारित समयसीमा रविवार को खत्म हो रही है। इजराइली सूत्रों का कहना है कि इस समयसीमा से पहले अमेरिका-ईरान वार्ता में कोई ठोस सफलता की संभावना नजर नहीं आ रही। उन्होंने वाशिंगटन के रुख में “स्पष्टता की कमी” और “आगे के रास्ते को लेकर असंगत संकेत” की ओर इशारा किया।

इजराइल के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि वह ईरान को परमाणु क्षमता विकसित करने से रोकने और क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने पर जोर दे रहा है। इजराइली मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तेहरान अभी भी पाकिस्तान में प्रस्तावित दूसरी दौर की वार्ता (जिसमें अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल होने वाले थे) में पूरी तरह भाग लेने को तैयार नहीं दिख रहा। वार्ता ठप होने की आशंका से इजराइल में अमेरिकी नीति पर सवाल उठ रहे हैं।

 ईरान का पक्ष: नया प्रस्ताव और “बैटलफील्ड कार्ड्स”

ईरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक “एकीकृत प्रस्ताव” नहीं आया है। तेहरान ने अमेरिकी ब्लॉकेड को “युद्ध की कार्रवाई” करार दिया है और कहा है कि हार्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलना संभव नहीं जब तक ब्लॉकेड हटाया न जाए। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर घालिबाफ ने चेतावनी दी कि अगर संघर्षविराम टूटा तो ईरान “बैटलफील्ड पर नए कार्ड” खोलने के लिए तैयार है।

ईरान के विदेश मंत्रालय ने वाशिंगटन के “परस्पर विरोधी संदेशों” की आलोचना की और कहा कि दबाव की नीति के तहत कोई वार्ता संभव नहीं। फिर भी, पाकिस्तान जैसे मध्यस्थ देशों के प्रयास जारी हैं।

वैश्विक प्रभाव: तेल बाजार, अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय सुरक्षा

यह पूरा घटनाक्रम वैश्विक स्तर पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। हार्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल निर्यात का प्रमुख मार्ग है। संघर्षविराम टूटने की आशंका से तेल की कीमतों में पहले ही उछाल आ चुका है। यदि ब्लॉकेड और तनाव बढ़ा तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होगी, जिसका असर भारत समेत कई विकासशील देशों पर पड़ेगा।

भारत की दृष्टि से यह स्थिति महत्वपूर्ण है क्योंकि हम ईरान से तेल आयात करते हैं और क्षेत्रीय स्थिरता हमारी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हुई है। साथ ही, भारत अमेरिका और इजराइल दोनों के साथ मजबूत संबंध रखता है, इसलिए संतुलित कूटनीति की जरूरत है।

आगे क्या?

वर्तमान में स्थिति अनिश्चित बनी हुई है। ट्रंप प्रशासन ईरान के आंतरिक विभाजन को देखते हुए समय दे रहा है, लेकिन सैन्य दबाव भी बनाए हुए है। इजराइल इस “भ्रम” से नाखुश है और स्पष्ट रणनीति की मांग कर रहा है। ईरान वार्ता के लिए शर्तें रख रहा है।

कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगले कुछ दिनों में या तो तेहरान कोई प्रस्ताव पेश करेगा या फिर तनाव और बढ़ सकता है। पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर आगे की कोशिशें जारी रहेंगी।

यह घटनाक्रम दर्शाता है कि मध्य पूर्व में शांति स्थापना कितनी जटिल है। ठोस सौदा तभी संभव है जब सभी पक्ष विश्वास और स्पष्टता के साथ आगे बढ़ें। फिलहाल, दुनिया संघर्षविराम के विस्तार को सकारात्मक कदम मान रही है, लेकिन रविवार के आसपास की घटनाएं निर्णायक साबित हो सकती हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

❗️ तेहरान का साफ संदेश: अमेरिकी-इज़राइली आक्रमण खाड़ी और हॉर्मुज में अस्थिरता के जड़ हैं"

❗️ तेहरान का साफ संदेश: अमेरिकी-इज़राइली आक्रमण खाड़ी और हॉर्मुज में अस्थिरता के जड़ हैं
-Friday World-April 23,2026 
तेहरान, 23 अप्रैल 2026 – ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची (Abbas Araghchi) ने दक्षिण कोरिया के विशेष दूत चुंग ब्युंग-हा (Chung Byung-ha) से मुलाकात में जोर देकर कहा कि अमेरिका और इज़राइल की आक्रामक कार्रवाइयाँ फारस की खाड़ी तथा हॉर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षा की सबसे बड़ी वजह हैं। IRNA की रिपोर्ट के अनुसार, यह बैठक तेहरान में हुई, जिसमें ईरान पर एक महीने से ज़्यादा समय तक चले हमलों के दौरान हुए अमेरिकी-इज़राइली उल्लंघनों पर विस्तार से चर्चा की गई।

 क्षेत्रीय तनाव और हॉर्मुज संकट का पृष्ठभूमि
वर्तमान समय में मध्य पूर्व में तनाव चरम पर है। फरवरी 2026 से शुरू हुए अमेरिका-इज़राइल के सैन्य अभियानों के जवाब में ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य में अपनी सुरक्षा उपाय शुरू किए। यह जलडमरूमध्य दुनिया के तेल व्यापार का लगभग 20% हिस्सा संभालता है। ईरान ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बताया है, जबकि दक्षिण कोरिया जैसे देशों के कई जहाज़ वहाँ फंस गए हैं। सियोल ने विशेष दूत भेजकर अपने नागरिकों, जहाज़ों और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश की है।

अराकची ने बैठक में स्पष्ट किया कि आक्रमणकारी (अमेरिका और इज़राइल) ही इस अस्थिरता के पूर्ण रूप से जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा, “अमेरिकी और इज़राइली कार्रवाइयाँ फारस की खाड़ी और हॉर्मुज में असुरक्षा का मुख्य स्रोत हैं। यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों और पूरे क्षेत्र की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही हैं।” ईरानी विदेश मंत्रालय के आधिकारिक बयान में जोर दिया गया कि ईरान ने अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कानून के अनुसार अपनी सुरक्षा के लिए कदम उठाए हैं।

 अराकची का आग्रह: अंतरराष्ट्रीय समुदाय चुप न रहे
ईरानी विदेश मंत्री ने दक्षिण कोरियाई दूत को ईरान पर हुए हमलों के दौरान हुए “अपराधों” की जानकारी दी। उन्होंने सभी देशों से अपील की कि वे इन हमलों की निंदा में स्पष्ट और मजबूत रुख अपनाएँ। अराकची ने चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निरंतर चुप्पी केवल अस्थिरता को और गहरा करेगी।

उन्होंने जोर दिया कि जिम्मेदार पक्षों (aggressors) को इस स्थिति के परिणाम भुगतने होंगे। दक्षिण कोरियाई दूत चुंग ब्युंग-हा ने क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए कूटनीतिक प्रयासों की उम्मीद जताई। उन्होंने हॉर्मुज में फंसे कोरियाई जहाज़ों और नाविकों की सुरक्षित निकासी पर ईरान से सहयोग की अपील की। अराकची ने इस प्रयास की सराहना की और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाने की इच्छा व्यक्त की।

 हॉर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक ऊर्जा का गला
हॉर्मुज जलडमरूमध्य मध्य पूर्व का सबसे संवेदनशील समुद्री मार्ग है। यहाँ से रोज़ाना लाखों बैरल तेल और LNG गुजरता है, जो एशिया, यूरोप और अन्य क्षेत्रों की ऊर्जा सुरक्षा से सीधे जुड़ा है। दक्षिण कोरिया जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है। वर्तमान संकट में कई कोरियाई जहाज़ फंस गए हैं, जिससे सियोल को कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय होना पड़ा है।

ईरान का तर्क है कि अमेरिका-इज़राइल के हमलों ने क्षेत्र को अस्थिर किया, जिसके जवाब में ईरान ने अपनी सुरक्षा के उपाय किए। वहीं, अमेरिकी पक्ष इसे “समुद्री आतंकवाद” या ब्लॉकेड का मुद्दा बता रहा है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, जबकि वैश्विक बाज़ार तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति बाधा से प्रभावित हो रहे हैं।

 द्विपक्षीय संबंधों की उम्मीद
बैठक में अराकची ने दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून (Cho Hyun) द्वारा विशेष दूत भेजने के फैसले की सराहना की। उन्होंने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों में भी कोरियाई दूतावास का काम जारी रहना सराहनीय है। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर और मजबूत बनाने पर सहमति जताई। ईरान ने कोरियाई नागरिकों की सुरक्षा पर भी ध्यान देने का आश्वासन दिया।

यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब मध्य पूर्व में युद्धविराम की कोशिशें चल रही हैं, लेकिन हॉर्मुज में तनाव बरकरार है। दक्षिण कोरिया का प्रयास मुख्य रूप से अपने आर्थिक हितों—खासकर ऊर्जा आयात—की रक्षा करना है, जबकि ईरान क्षेत्रीय स्थिरता और अपनी संप्रभुता की रक्षा पर जोर दे रहा है।

 वैश्विक प्रभाव और भविष्य की चुनौतियाँ
यह घटना सिर्फ द्विपक्षीय बातचीत नहीं है, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक संदर्भ को दर्शाती है। हॉर्मुज का संकट वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। तेल की कीमतें बढ़ने से मुद्रास्फीति, परिवहन लागत और ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ता है। कई देश अब कूटनीतिक चैनलों से ईरान से संपर्क कर रहे हैं ताकि जहाज़ों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।

ईरान का रुख साफ है — आक्रमण रुकना चाहिए, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान होना चाहिए और चुप्पी अस्थिरता बढ़ाएगी। वहीं, दक्षिण कोरिया जैसे देश शांति वार्ता और व्यावहारिक समाधान चाहते हैं।

: तेहरान ने सियोल के दूत के माध्यम से दुनिया को संदेश दिया है कि खाड़ी की अस्थिरता की जड़ अमेरिकी-इज़राइली नीतियाँ हैं। अब देखना यह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस चेतावनी पर कितना गंभीर रुख अपनाता है। कूटनीति की जीत होगी या तनाव और बढ़ेगा — यह आने वाले दिनों का फैसला करेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

वेनेज़ुएला और ईरान के खिलाफ संसाधनों की लूट और सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिकी-इजरायली मुहिम

वेनेज़ुएला और ईरान के खिलाफ संसाधनों की लूट और सत्ता परिवर्तन के लिए अमेरिकी-इजरायली मुहिम
-Friday World-April 23,2026
आलेख : डॉ. अशोक ढवले, अनुवाद : संजय पराते

2026 की शुरुआत में, महज़ दो महीनों के अंदर ही, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में संयुक्त राज्य अमेरिका ने सैन्य आक्रामकता की एक ऐसी बेशर्म लहर छेड़ दी, जिसने एक बार फिर समकालीन साम्राज्यवाद के क्रूर चेहरे को बेनकाब कर दिया है। 3 जनवरी को, अमेरिकी सेनाओं ने काराकास और वेनेज़ुएला के अन्य शहरों पर बमबारी की, और आधी रात को की गई एक छापेमारी में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया — यह कार्रवाई पुरानी शैली की 'गनबोट कूटनीति' की दुर्गंध से भरी हुई थी। इसके ठीक आठ हफ़्तों बाद, 28 फरवरी को, अमेरिका ने इज़राइल के साथ मिलकर पूरे ईरान में भयानक हवाई हमले किए ; इन हमलों के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई और कई अन्य राजनीतिक व सैन्य नेताओं को भी मार गिराया गया, और बाद में परमाणु स्थलों, मिसाइल ठिकानों तथा नागरिक बुनियादी ढांचों पर भी ज़ोरदार बमबारी की गई।

ये हमले एक स्पष्ट रूपरेखा बनाते हैं : दुनिया की अग्रणी साम्राज्यवादी शक्ति — अमेरिका — द्वारा चलाया गया एक सुनियोजित अभियान, जिसका उद्देश्य रणनीतिक संसाधनों पर कब्ज़ा करना, अपनीआधिपत्य का विरोध करने वाली संप्रभु सरकारों को हटाना, और 'वैश्विक दक्षिण' पर अपने वर्चस्व को फिर से स्थापित करना है।
संसाधनों की लूट की होड़ : वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण

वेनेज़ुएला में हुए अपहरण का ड्रग कार्टेल या परमाणु खतरों से कोई लेना-देना नहीं था, जैसा कि दावा किया गया था। यह सीधे तौर पर तेल से जुड़ा मामला है — जो पूंजीवादी संचय का जीवन-रक्त है — और उन देशों को सज़ा देने से जुड़ा है, जो अपने देश के लिए स्वतंत्र रास्ता चुनने की हिम्मत करते हैं। वेनेज़ुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है ; ईरान विशाल तेल और गैस क्षेत्रों के ऊपर स्थित है और महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को नियंत्रित करता है। ऐतिहासिक रूप से, इन दोनों ने ही अमेरिका के आदेशों को मानने से इंकार किया है — वेनेज़ुएला ने बोलिवेरियन समाजवाद के ज़रिए, जिसकी शुरुआत महान ह्यूगो शावेज़ ने 1999 में पहली बार राष्ट्रपति बनने पर की थी ; और ईरान ने "प्रतिरोध की धुरी" में अपनी भूमिका के ज़रिए, जो फ़िलिस्तीनी और लेबनानी संघर्षों का समर्थन करती है। ये हमले लैटिन अमेरिका के लिए ट्रंप द्वारा पुनर्जीवित 'मोनरो सिद्धांत' को उजागर करते हैं, जो पश्चिम एशिया में नेतन्याहू के विस्तारवादी यहूदवाद के साथ जुड़ा हुआ है। ये दोनों मिलकर एक खतरनाक तनाव बढ़ने का संकेत देते हैं : साम्राज्यवाद अब दुनिया के देखते-देखते राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करने और सर्वोच्च नेताओं की हत्या करने के लिए भी तैयार है।

सबसे पहले वेनेज़ुएला में ऑपरेशन हुआ, जो अमेरिका के "पिछवाड़े" में स्थित है और जो अमेरिका की बेशर्मी से दखलंदाजी का एक परीक्षण स्थल है। ट्रंप ने खुद 'ट्रुथ सोशल' पर मादुरो को "सफलतापूर्वक" पकड़ने का दावा किया। ट्रंप के प्रशासन ने खुले तौर पर "तेल वापस लेने" की बात कही। दुनिया की सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने मादुरो और उनकी पत्नी के अपहरण को वेनेज़ुएला की संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन करार दिया है। यह नंगा साम्राज्यवाद था, जो अमेरिका के कई दशकों के दखल से जुड़ा था — चिली में सल्वाडोर अलेंदे की सरकार गिराने से लेकर मध्य अमेरिका में लड़ी गई 'गंदी लड़ाइयों' तक। वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था पहले से ही कई सालों से प्रतिबंधों की मार झेल रही थी ; अब, सीधे सैन्य हमले से देश में भारी उथल-पुथल मचने का खतरा पैदा हो गया था। आम नागरिकों की मौतों में तेज़ी से वृद्धि हुई — शुरुआती हमलों में ही दर्जनों लोगों के मारे जाने की खबरें आईं — वहीं मादुरो के अपहरण से वेनेज़ुएला अपनी चुनी हुई सरकार से वंचित हो गया। ज़रा इस घोर, बेमिसाल पाखंड को देखिए : वही अमेरिका, जो लोकतंत्र पर बड़े-बड़े उपदेश देता है, संयुक्त राष्ट्र की मंज़ूरी या अपनी ही कांग्रेस की निगरानी के बिना किसी राष्ट्राध्यक्ष का अपहरण कर लेता है, और पूरे लैटिन अमेरिका को अपने नव-औपनिवेशिक खेल के मैदान की तरह इस्तेमाल करता है।

वेनेज़ुएला का गुनाह क्या है? उसकी तेल की दौलत और नव-उदारवादी कड़े उपायों के आगे झुकने से इंकार। शावेज़ और मादुरो के शासन में, देश ने अपने तेल और दूसरे संसाधनों का राष्ट्रीयकरण किया, कई प्रगतिशील सामाजिक कार्यक्रमों का वित्त पोषण किया और क्यूबा, चीन और रूस के साथ गठबंधन किया — ये सब अमेरिका के कॉर्पोरेट दबदबे के लिए चुनौतियाँ थीं। प्रतिबंधों ने पहले ही उसकी अर्थव्यवस्था का दम घोंट दिया था ; जनवरी में हुआ हमला, ज़बरदस्ती सत्ता परिवर्तन की उसकी कोशिश का अगला कदम था। ये 2011 के लीबिया और 2003 के इराक जैसे ही हालात थे : लोकतंत्र के वादे की आड़ में तेल का लालच छिपा हुआ था। इस हमले ने अमेरिका की घरेलू राजनीति को भी साधा — इससे ट्रंप को ऐप्स्टीन कांड से ध्यान भटकाने और अपनी ताक़त का मर्दाना प्रदर्शन करके अपने समर्थकों को एकजुट करने में मदद मिली। लेकिन वेनेज़ुएला के मेहनतकश लोगों और पूरे लैटिन अमेरिका के लिए, यह एक बेशर्मी भरा हमला था। पूरे महाद्वीप में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, जिनमें "वेनेज़ुएला के साथ कोई युद्ध नहीं!" की मांग की गई।

ईरान के साथ घिनौना युद्ध

वेनेज़ुएला पर हुए इस हमले ने ईरान पर होने वाले कहीं अधिक बड़े हमले के लिए मंच तैयार कर दिया। 28 फरवरी को, मादुरो के अपहरण के महज़ कुछ हफ़्तों बाद ही, अमेरिकी और इज़राइली सेनाओं ने 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (अमेरिका) और 'रोरिंग लायन' (इज़राइल) शुरू कर दिया। अचानक हुए हवाई हमलों ने तेहरान, नतान्ज़, इस्फ़हान और दर्जनों अन्य ठिकानों को तहस-नहस कर दिया। कई शीर्ष नेता मारे गए। इज़राइली जेट विमानों और अमेरिकी मिसाइलों ने परमाणु सुविधाओं, बैलिस्टिक मिसाइल बुनियादी ढांचे, हवाई सुरक्षा प्रणालियों और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया। आम नागरिकों और सैनिकों की हुई तत्काल मौतें अत्यंत भयानक थीं : अब तक 5,000 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं — जिनमें से अधिकांश ईरान और लेबनान के थे — और इनमें मीनाब के एक बालिका विद्यालय पर हुए एक ही हमले में मारी गईं 168 स्कूली छात्राएँ भी शामिल हैं। शोक-संतप्त माताओं द्वारा उठाए गए उनके ताबूत साम्राज्यवादी बर्बरता के प्रतीक बन गए।

इस हमले के घोषित लक्ष्य क्या थे? ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को "कमज़ोर करना" और सत्ता परिवर्तन के लिए "हालात बनाना"। ट्रंप और नेतन्याहू ने "अयातुल्ला शासन" को खत्म करने और ईरानियों द्वारा "गुलामी की ज़ंजीरें तोड़ने" के बारे में खुलकर बात की। यह हमला तब किया गया, जब परमाणु वार्ताओं का दौर चल रहा था — यह ताकत के जबरन इस्तेमाल को सही ठहराने के लिए झूठी कूटनीति का एक 'ट्रोजन हॉर्स' था। इस साम्राज्यवादी जोड़ी ने हज़ारों बम गिराए हैं, जिनमें स्कूल, अस्पताल, सांस्कृतिक स्थल और सैन्य ठिकाने आदि शामिल हैं।

लेकिन इस बार ईरान ने कड़ा जवाब दिया है — पश्चिम एशिया के कई देशों में फैले अमेरिकी अधीनस्थ ठिकानों और इज़राइल के प्रमुख लक्ष्यों पर मिसाइलें दागी गई हैं। उम्मीद के मुताबिक, ईरान ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया है, जिसके माध्यम से पश्चिम एशिया के देशों द्वारा उत्पादित तेल का 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दुनिया को जाता है। इससे वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू गईं और परिणामस्वरूप आर्थिक उथल-पुथल मच गई है। अमेरिका लगातार अलग-थलग पड़ता जा रहा है, क्योंकि कई प्रमुख यूरोपीय देशों ने अमेरिकी-इज़राइली आक्रामकता का समर्थन करने से इंकार कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी कांग्रेस और अमेरिकी एवं यूरोपीय जनमत से भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।   

ईरान पर हुए हमले अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व और इज़राइल की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के गठजोड़ को उजागर करते हैं। बड़े घरेलू भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रहे नेतन्याहू को सत्ता में बने रहने के लिए युद्ध की आवश्यकता थी। इसी तरह, ऐप्स्टीन कांड और गिरते चुनावी नतीजों से ध्यान हटाने के लिए उत्सुक ट्रंप ने भी बड़े पैमाने पर युद्ध छेड़ दिया। लेकिन इसके पीछे गहरे मकसद थे : होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल के प्रवाह पर नियंत्रण, फिलिस्तीन का समर्थन करने वाले प्रतिरोध के ध्रुव को कमजोर करना और चीन-रूस-ईरान गुट से पैदा किसी भी बहुध्रुवीय चुनौती को रोकना। हमास, हिज़्बुल्लाह और क्षेत्र में साम्राज्यवाद-विरोधी ताकतों को ईरान का समर्थन उसे एक प्रमुख लक्ष्य बनाता था। इसलिए, अमेरिका-इज़राइल के इस हमले का उद्देश्य पश्चिम एशिया में एकमात्र ताकतवर शक्ति के रूप में ईरान को समाप्त करना और फिलिस्तीनी प्रतिरोध की कमर तोड़ना है।

अमेरिका और इज़राइल को लगा था कि ईरान एक हफ़्ते के अंदर ही ढह जाएगा। हमलावरों को लगा था कि या तो लगातार बमबारी के दबाव में ईरानी सरकार हथियार डाल देगी, या फिर लोगों के विद्रोह से सत्ता बदल जाएगी। लेकिन, इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। इसके विपरीत, ईरान ने इन दो शक्तिशाली दुश्मनों का मुकाबला करने में ज़बरदस्त हिम्मत, दृढ़ता और पक्का इरादा दिखाया है। इसमें कोई शक नहीं कि ईरान को चीन, रूस और 'वैश्विक दक्षिण' के कई देशों का पूरा समर्थन हासिल है। पाँच हफ़्तों से ज़्यादा चली ज़ोरदार लड़ाई के बाद, जिसमें ईरान ने डटकर मुकाबला किया, 8 अप्रैल को अमेरिका और इज़राइल को पाकिस्तान की मध्यस्थता से ईरान के साथ दो हफ़्ते के लिए युद्धविराम पर राज़ी होना पड़ा है। इसके बावजूद, इज़राइल ने लेबनान पर अपने जानलेवा हमले जारी रखे है ; जवाब में ईरान ने एक बार फिर 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को बंद कर दिया है, और अमेरिका ने वहाँ नौसैनिक घेराबंदी कर दी है। इन सब बातों का 'वैश्विक दक्षिण' और दुनिया के गरीब लोगों पर बहुत बुरा असर पड़ा है।

इस युद्ध को हमलावरों ने ईरानी "खतरों" को बेअसर करने के लिए आवश्यक बताया था, लेकिन इसके विपरीत इसने सैन्य-प्रधान नीतियों के दिवालियापन को उजागर कर दिया : इसने हजारों लोगों की जान ली, लाखों लोगों को विस्थापित किया, बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया और वैश्विक तेल प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया, जिससे इस क्षेत्र से परे, दूर-दराज के मेहनतकश लोगों को आर्थिक पीड़ा झेलनी पड़ी। इस्लामाबाद में होने वाली वार्ताएं बार-बार विफल रही हैं। ईरान प्रतिबंधों में राहत, नाकाबंदी की समाप्ति और लेबनान में युद्धविराम से संबंधित पूर्व निर्धारित ढांचे पर जोर दे रहा है ; दूसरे दौर के शांति वार्ता की कोई ठोस पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, और तेहरान ने वर्तमान अमेरिकी मांगों के तहत इसमें भाग लेने से सार्वजनिक रूप से इंकार कर दिया है।

इस युद्ध में अब तक ईरान, एक सीधे और कायरतापूर्ण हमले से, बिना किसी आत्मसमर्पण या शासन के पतन के बच निकला है — जो अपने आप में साम्राज्यवादी अतिरेक पर एक करारा जवाब है — फिर भी इसके लोगों को भारी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी है। अमेरिका और इज़राइल, अपनी ज़बरदस्त मारक क्षमता के बावजूद, ईरान पर अपनी मर्ज़ी थोप नहीं पाए हैं और अब उन्हें इस सच्चाई का सामना करना पड़ रहा है कि ज़ोर-ज़बरदस्ती से प्रतिरोध पैदा होता है, न कि अधीनता। इस युद्ध विराम का स्वागत नागरिकों के लिए एक अस्थायी ढाल के रूप में और युद्ध-विरोधी दबाव की जीत के रूप में किया जा रहा है, लेकिन यह कोई स्थायी शांति नहीं है। यह उन मूल कारणों को अनसुलझा छोड़ देता है : प्रतिबंधों का युद्ध, छद्म संघर्ष, संसाधनों पर नियंत्रण, और बहुपक्षीय मंचों पर ईरान को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में शामिल करने से इंकार। एक वास्तविक समाधान के लिए आपसी सम्मान, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय लोगों की जायज़ शिकायतों को दूर करने के आधार पर तनाव कम करने की ज़रूरत है — ये ऐसी प्राथमिकताएँ हैं, जिन्हें वर्चस्व की सोच के चलते लंबे समय से नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। आने वाले दिन, जब युद्धविराम की समय सीमा नज़दीक आ रही है, यह तय करेंगे कि कूटनीति की जीत होती है या फिर से नई आक्रामकता की।

हत्या और सत्ता परिवर्तन का निंदनीय अमेरिकी इतिहास

ईरान और वेनेजुएला की समानताएँ बेहद भयावह हैं। दोनों ही देश तेल उत्पादक दिग्गज हैं और अमेरिका के निर्देशों का विरोध कर रहे हैं। दोनों ने ही संकर युद्ध का सामना किया है — प्रतिबंध, दुष्प्रचार, और फिर सीधे हमले। वेनेजुएला में, मोनरो सिद्धांत ने गोलार्धीय प्रभुत्व को उचित ठहराया है ; ईरान में, यह "आतंकवाद के खिलाफ" अंतहीन युद्ध और परमाणु भय फैलाने की रणनीति है, जो संसाधनों पर कब्ज़ा करने के लिए इस्तेमाल की जा रही है। और आम नागरिकों की मौतें? साम्राज्यवादी गणना में तो ये महज़ मामूली नुकसान हैं! और सत्ता परिवर्तन का क्या? यह लोकतंत्र के लिए नहीं है — वाशिंगटन ने अतीत में, ऑगस्टो पिनोशे से लेकर ईरान के शाह तक, अनगिनत आज्ञाकारी तानाशाहों को सत्ता में बिठाया है — बल्कि उन आज्ञाकारी सरकारों के लिए हैं, जो एक्सॉनमोबिल और शेवरॉन के लिए बाज़ार खोलती हैं और तेल अवीव के साथ गठबंधन करती हैं। और ऐसी सरकारें बहुत सारी हैं।

इतिहास इस पैटर्न पर रोशनी डालता है। अमेरिकी साम्राज्यवाद लंबे समय से संसाधनों से समृद्ध विरोधियों को निशाना बनाता रहा है : 1953 में ईरान में सीआईए का तख्तापलट, जिसमें लोकतांत्रिक रूप से चुने गए मोहम्मद मोसद्देग को सत्ता से हटाकर उनकी जगह ईरान के शाह को बिठाया गया ; 2003 में इराक पर हमला और सद्दाम हुसैन की हत्या ; 2011 में लीबिया का गृहयुद्ध और मुअम्मर गद्दाफी की हत्या ; 2026 में वेनेज़ुएला के निकोलस मादुरो का अपहरण, और ईरान के अली खामेनेई की हत्या। यह सब तेल और अपनी दादागिरी के अलावा किसी और चीज़ के लिए नहीं था। इज़राइल की भूमिका — ईरान के सहयोगी हमास और हिज़्बुल्लाह पर उसके हमले, और अब खुद ईरान के मुख्य भूभाग पर हमले — ने गाज़ा में चल रहे जन संहार के तर्क को क्षेत्रीय स्तर तक फैला दिया है। 7 अक्टूबर 2023 से गाज़ा में इज़राइल द्वारा किए जा रहे इस राक्षसी जनसंहार के परिणामस्वरूप 75,000 से ज़्यादा आम नागरिकों की जान चली गई है, जिनमें से 60 प्रतिशत से ज़्यादा महिलाएं और बच्चे हैं।

अमेरिकी साम्राज्यवाद का संसाधनों की लूट के लिए नेताओं की हत्या करने और दुनिया भर में ज़बरदस्ती सत्ता बदलने का एक लंबा और गंदा इतिहास रहा है। इनमें मोहम्मद मोसादेग (ईरान, 1953), पैट्रिस लुमुम्बा (कांगो, 1961), क्वामे न्क्रूमा (घाना, 1966), अमिलकार कैब्राल (गिनी-बिसाऊ, 1973), सल्वाडोर अलेंदे (चिली, 1973), जुआन जोस टोरेस (बोलीविया, 1976), ऑरलैंडो लेटेलियर (चिली, 1976), मौरिस बिशप (ग्रेनाडा, 1983), थॉमस संकारा (बुर्किना फासो, 1987), सद्दाम हुसैन (2003), और मुअम्मर गद्दाफ़ी (2011) शामिल हैं। यहाँ तक कि अमेरिका में ही 'असुविधाजनक' माने जाने वाले अश्वेत नेताओं, जैसे मैल्कम एक्स (1965) और मार्टिन लूथर किंग जूनियर (1968) की भी हत्या कर दी गई, जबकि वे एफबीआई की निगरानी में थे।

जान-माल का नुकसान इस आपराधिकता को और भी उजागर करता है। मीडिया की मिलीभगत इसे संभव बनाती है। पश्चिमी मीडिया संस्थान इन सशस्त्र हमलों को "ज़रूरी" या "लक्षित" बताकर पेश करते हैं, और आम नागरिकों की हत्याओं तथा कानूनी उल्लंघनों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बल प्रयोग पर लगी रोक को पूरी तरह से धता बताते हुए तार-तार कर दिया जाता है।

मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा-आरएसएस सरकार की कानफोड़ू और शर्मनाक चुप्पी

हाल ही में अमेरिका और इज़राइल द्वारा की गई तमाम कार्रवाइयों पर भारत की मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा-आरएसएस सरकार की कानफोड़ू चुप्पी बेहद शर्मनाक रही है। फ़िलिस्तीन पर ज़ुल्म, गाज़ा में नरसंहार, मादुरो का अपहरण, ईरान पर हमला, खामेनेई की हत्या, मिनाब में 168 स्कूली छात्राओं की हत्या, जहाज़ आईआरआईएस देना पर मारे गए ईरानी नाविक— जो हमारे ही न्योते पर भारत आए थे -- इनमें से किसी भी घटना पर भारत सरकार की ओर से अफ़सोस का एक शब्द भी नहीं कहा गया, निंदा करना तो दूर की बात है! भारत इस समय देशों के शक्तिशाली समूह ब्रिक्स का अध्यक्ष है। भारत के इस चाटुकार रवैये के कारण वह इस मंच भी पूरी तरह से निष्क्रिय हो गया है।  

इसके विपरीत, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने — ठीक ईरान पर हुए उस जघन्य हमले से महज़ दो दिन पहले इज़राइल का दौरा किया था ; गाज़ा के कसाईयों — नेतान्याहू और इज़राइल — की जमकर तारीफ़ की थी, और उन्हें बिना किसी शर्त के अपना समर्थन दिया था। ट्रंप और अमेरिका के सामने नरेंद्र मोदी का हर मामले में — जिसमें राष्ट्र-विरोधी 'अमेरिका-भारत व्यापार समझौता' भी शामिल है — पूरी तरह से घुटने टेक देना, ज़ाहिर है, अब जगज़ाहिर हो चुका है। यह सब कुछ, भारत की पहले की स्वतंत्र, गुट-निरपेक्ष और साम्राज्यवाद-विरोधी विदेश नीति का एक घोर मज़ाक है।

पूंजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था का पतन

ये हमले साम्राज्यवाद के पतन के दौरान उत्पन्न विरोधाभासों को उजागर करते हैं। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति अंतहीन युद्धों को छुपाती है ; नेतन्याहू का सुरक्षा को लेकर जुनून आक्रोश पैदा करता है। जनविरोध बढ़ता जा रहा है — सर्वेक्षण ईरान युद्ध के लिए अमेरिका और यूरोपीय संघ के घोर समर्थन को दोषी दर्शाते हैं ; लैटिन अमेरिकी सड़कों पर वेनेजुएला की आक्रामकता के खिलाफ आक्रोश फैल रहा है। वैश्विक वामपंथियों को एकजुट होना होगा : जन प्रदर्शन, मजदूर हड़तालें, ईरान और वेनेजुएला की आवाज़ों को बुलंद करने वाले एकजुटता अभियान ; युद्ध-विरोधी गठबंधन बनाना ; हर्जाने की मांग करना, हमलावरों पर प्रतिबंध लगाना और अमेरिका-नाटो-यहूदीवादी गठबंधनों को समाप्त करना।

अंततः, वेनेज़ुएला और ईरान पर ये दोहरे हमले एक पूँजीवादी और साम्राज्यवादी व्यवस्था की अंतिम साँसें हैं। संसाधनों और बाज़ारों के लिए पूँजीवाद की होड़ अंतहीन संघर्षों को जन्म देती है। ईरानी, लेबनानी, फ़िलिस्तीनी और वेनेज़ुएलाई लोग पूरी हिम्मत से इसका विरोध कर रहे हैं। वैश्विक एकजुटता इस स्थिति का रुख़ बदल सकती है। काराकास से लेकर तेहरान तक, यह संदेश ज़ोर-शोर से और साफ़-साफ़ गूँज रहा है : साम्राज्यवाद और यहूदीवाद की जीत नहीं होगी! यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक हर राष्ट्र वाशिंगटन और तेल अवीव के शिकंजे से आज़ाद नहीं हो जाता!

लेखक अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। अनुवादक छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650

Friday World-April 23,2026 
April 23, 2026

प्रधानमंत्री को खुला पत्र : मोदी जी, कृपया भारत की महिलाओं के लिए आँसू न बहाएँ-बृंदा करात

प्रधानमंत्री को खुला पत्र : मोदी जी, कृपया भारत की महिलाओं के लिए आँसू न बहाएँ-बृंदा करात 
-Friday World-April 23,2026
लेखिका : बृंदा करात, अनुवाद : संजय पराते

उस प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र, जिन्होंने देश की महिलाओं के साथ कई बार विश्वासघात किया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी,

महिलाओं के लिए आरक्षण के मुद्दे पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में आपने कहा था कि, “महिलाओं को सत्ता में भागीदारी दिलाने की लड़ाई दशकों से चल रही है... कितनी ही महिलाओं ने मेरे सामने यह विषय उठाया है। कितनी ही बहनों ने मुझे पत्र लिखकर पूरी बात समझाई है।”

मोदी जी, आपके लिए यह एक और पत्र है उस व्यक्ति की ओर से, जो उस "दशकों लंबी लड़ाई" में एक सक्रिय भागीदार रही है, जिसका आपने अपने संबोधन में ज़िक्र किया है। उस ऐतिहासिक लड़ाई का नेतृत्व महिला संगठनों ने किया था ; इसका नेतृत्व पंचायतों में मौजूद उन लाखों महिलाओं ने किया था, जिन्होंने पितृसत्तात्मक संस्कृति से लोहा लेते हुए यह साबित किया है कि वे महज़ "मुखौटे" नहीं हैं। यह लड़ाई हज़ारों-लाखों प्रदर्शनों, रैलियों, विरोध प्रदर्शनों, धरनों और याचिकाओं के ज़रिए लड़ी गई थी। आपने अपने संबोधन में यह भी कहा था, "मैं भी उन लोगों में शामिल रहा हूँ, जिन्होंने इसके लिए प्रयास किए हैं।" नहीं मोदी जी, नहीं, संघर्ष के इन तमाम वर्षों के दौरान हमें आपकी ओर से कभी भी किसी तरह का कोई समर्थन नहीं मिला। आपका यह दावा सच्चाई से उतना ही दूर है, जितना कि गोडसे की विचारधारा गांधी की विचारधारा से दूर थी।

आइए मोदी जी, तथ्यों को प्रचार से अलग करके देखें। लेकिन उससे पहले महिलाओं के "दुख को बांटने" वाले आपके बयान और आपकी इस प्रतिज्ञा कि, "मैं देश की हर महिला को भरोसा दिलाता हूं, हम महिलाओं के आरक्षण की राह में आने वाली हर बाधा को दूर करेंगे", के संदर्भ में यहां एक ठोस सुझाव है, जो आपके दुख और हर बाधा को दूर कर देगा। उस सबसे बड़ी बाधा को हटा दीजिए, जिसे आपकी सरकार द्वारा 2023 में लाए गए 106वें संविधान संशोधन में खड़ा किया गया था। यह संशोधन महिलाओं के आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ता है। मोदी जी, इस वाक्य को हटा दीजिए, और महिलाओं के लिए आरक्षण कल से ही लागू किया जा सकता है। लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगे, मोदी जी। आपकी प्रतिबद्धता कभी भी महिलाओं के आरक्षण के प्रति थी ही नहीं।

आप 2014 में प्रधानमंत्री चुने गए थे। आपकी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण का वादा किया था। आपके नेतृत्व वाले गठबंधन ने 336 सीटें जीतीं थीं, जिनमें से आपकी अपनी पार्टी ने 282 सीटें हासिल की थीं। उस समय आपने इस दिशा में क्या "प्रयास" किया था? भारत की महिलाओं को बताइए कि आपने अपने पहले कार्यकाल में महिला आरक्षण विधेयक क्यों पारित नहीं किया? इतना ही नहीं मोदी जी, आपने तो इस विधेयक को सरकारी एजेंडा में शामिल करने से भी इंकार कर दिया था। 2017 के मानसून सत्र में, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के तत्कालीन महासचिव सीताराम येचुरी ने राज्यसभा के सदस्य के तौर पर, महिला आरक्षण विधेयक को सदन की कार्यसूची में शामिल करने की मांग की थी। आपने ऐसा करने से इंकार क्यों किया? जुलाई 2018 में, लोकसभा में सीपीआई(एम) की सांसद पी.के. श्रीमती (जो अब अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की अध्यक्ष हैं) ने इस मुद्दे को उठाया था। उस समय यह मुद्दा बेहद ज़रूरी था, क्योंकि 2019 में होने वाले चुनावों में सिर्फ़ एक साल का समय ही बचा था। कई पार्टियों ने उनका समर्थन किया, लेकिन आपकी सरकार ने उनकी इस अपील को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया था। कई विपक्षी पार्टियों की महिला सांसदों ने संसद के भीतर धरना दिया था और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की मांग की थी। संसद के बाहर भी, महिलाएं सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन कर रही थीं और इस विधेयक को कार्यसूची में शामिल करके पारित करने की मांग कर रही थीं। लेकिन आपने कुछ भी नहीं किया। ऐसा क्यों, मोदी जी? इसका नतीजा यह हुआ कि 2019 के लोकसभा चुनावों में महिलाएं एक-तिहाई आरक्षण से वंचित रह गईं। इस मुद्दे पर यह आपका पहला विश्वासघात था।
2019 में आपने और भी बड़े बहुमत से जीत हासिल की थी ; आपके गठबंधन ने कुल 353 सीटें जीतीं, जिनमें से 303 सीटें आपकी पार्टी को मिली थी। यह एक बहुत बड़ा बहुमत था। आपने इसका इस्तेमाल कैसे किया? आपकी प्राथमिकता कारोबारियों की मदद करना थी। आप मज़दूरों के हितों के खिलाफ़ चार श्रम संहिताएं लेकर आए, और अपने बहुमत का इस्तेमाल करके किसानों के हितों के खिलाफ़ तीन विधेयक पारित करवा दिया। आपने अपने बहुमत का इस्तेमाल 'महिला आरक्षण विधेयक' लाने के लिए क्यों नहीं किया? आपने अपने कार्यकाल के लगभग आखिरी सत्र तक इंतज़ार क्यों किया, ताकि जब आप 'महिला आरक्षण विधेयक' का एक दोषपूर्ण मसौदा लेकर आएं, तो उसे किसी संसदीय समिति के पास भेजने के लिए बिल्कुल भी समय न बचे?

सितंबर 2023 में ही आपने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (एनएसवीए) नाम का एक विधेयक पेश किया था। इस खुले पत्र में आगे चलकर मैं आपके द्वारा चुने गए इस नाम पर फिर से बात करूँगी। कई लोगों ने कहा कि आपकी सरकार यह विधेयक इसलिए लाई थी, ताकि आने वाले 2024 के चुनावों के दौरान उसे इस बात की आलोचना का सामना न करना पड़े कि उसने दूसरी बार अपने वादे से मुँह मोड़ लिया है। लेकिन इस विधेयक का असली एजेंडा तो और भी ज़्यादा बुरा था। एनएसवीए के ज़रिए संविधान में संशोधन करते हुए एक नई धारा 334 (अ) जोड़ी गई, जिसमें यह कहा गया था कि महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था तभी लागू होगी, जब जनगणना और परिसीमन का काम पूरा हो जाएगा। महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठनों ने इस शर्त का ज़ोरदार विरोध किया था। हमने यह तर्क दिया था कि महिलाओं के लिए आरक्षण का जनगणना या परिसीमन से कोई लेना-देना नहीं है ; दूसरा, कि इस वजह से 2024 के चुनावों में महिलाओं को आरक्षण के अधिकार से वंचित रहना पड़ेगा ; और तीसरा, कि इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह पूरी प्रक्रिया आखिर कब तक पूरी हो पाएगी। संसद में विपक्षी दलों ने भी इनमें से कई मुद्दों को ज़ोर-शोर से उठाया था। तब आपने और केंद्रीय गृह मंत्री ने यह "गारंटी" दी थी कि 2029 के चुनावों से पहले जनगणना और परिसीमन का काम हर हाल में पूरा कर लिया जाएगा। आखिरकार, इस बिल को मंज़ूरी मिल गई। लेकिन, आपके द्वारा दिए गए उन आश्वासनों में से किसी पर भी अब तक अमल नहीं किया गया है।

मोदी जी, इसकी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ी है।

अगर आपने इस 'लिंकेज' (महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने) पर ज़ोर न दिया होता और 2010 वाला विधेयक पेश किया होता —जिसके पक्ष में आपकी अपनी पार्टी ने उस समय वोट दिया था — तो आज लोकसभा में 180 महिलाएँ होतीं। इसके बजाय, उनकी संख्या घटकर सिर्फ़ 74 रह गई है, जो कि 2019 के मुकाबले भी कम है। इस दौरान दस विधानसभा चुनाव हुए हैं। एक-तिहाई होने के बजाय, उनकी संख्या 10% से भी कम है। आपके अपने गृह राज्य गुजरात में, 182 विधानसभा सीटों में से, 2022 में हुए चुनावों में, सिर्फ़ 15 महिलाएँ हैं, यानी लगभग 8 प्रतिशत। संसद में दो-तिहाई बहुमत होने के बावजूद, आपने ऐसा कानून बनाने से इंकार कर दिया, जो तत्काल प्रभाव से लागू हो सकता था। मोदी जी, यह आपका दूसरा विश्वासघात था।

राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों के बीच, 16 अप्रैल को, आपने महिला आरक्षण के मुद्दे पर संवैधानिक संशोधनों का एक नया सेट पारित करवाने के लिए संसद सत्र को आगे बढ़ा दिया। विपक्षी दलों के साथ न तो कोई पूर्व चर्चा हुई और न ही महिला संगठनों के साथ कोई परामर्श किया गया। सदन में ये संवैधानिक संशोधन पारित नहीं हो सके। महिला आरक्षण के मुद्दे का इस्तेमाल करके, 2011 की पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की आपकी चाल नाकाम हो गई। अब यह साफ़ है कि आपकी सरकार ने जान-बूझकर जनगणना की प्रक्रिया शुरू नहीं की, क्योंकि आपने शुरू से ही इस चालबाजी की योजना बना रखी थी। मोदी जी, यह आपका तीसरा विश्वासघात था।

आप संसद में सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना चाहते थे। अपने संबोधन में आपने कहा, “नारी शक्ति वंदन संशोधन का मकसद किसी से कुछ छीनना नहीं था। नारी शक्ति वंदन संशोधन का मकसद तो सबको कुछ देना था ; यह देने के लिए किया गया एक संशोधन था।” दूसरे शब्दों में कहें तो, राजनीति में पितृसत्ता को छेड़ा नहीं जाना है — पुरुषों के पास ही सत्ता बनी रहे, उनकी संख्या बढ़ती रहे — और महिलाएँ बस एक ‘अतिरिक्त’ के तौर पर शामिल हो जाएँ। आपने अपनी ही पार्टी के भीतर मौजूद उस सामंती और जातिवादी ‘सरदारों’ वाले विपक्ष के साथ समझौता कर लिया, जो अपनी-अपनी ‘रियासतें’ चलाते हैं और जो महिलाओं के लिए आरक्षण के सबसे बड़े विरोधी रहे हैं। सीटों की संख्या बढ़ा देने से, उनकी स्थिति पर कोई आँच नहीं आती।

इसके अलावा, मनुवादी दृष्टिकोण भी स्पष्ट है। क्या यह सच नहीं है कि 2011 की जनगणना का इस्तेमाल करके, आपने दलित और आदिवासी महिलाओं को उनके लिए आरक्षित सीटों में उनके हक के हिस्से से वंचित कर दिया होता? 2001 और 2026 के बीच अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी बढ़ी है, इसलिए उनकी सीटों का अनुपात भी बढ़ना चाहिए। लेकिन आपका प्रस्ताव उन्हें इस अधिकार से वंचित कर देता।

और आखिर में, आइए हम परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने के मुद्दे पर आते हैं। इस पर अलग से चर्चा की जाए। राज्यों की आबादी को आनुपातिक हिस्से का आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से राज्यों को उनके विकास के लिए दंडित किया जाएगा। तो फिर आधार क्या हो सकता है? इस पर चर्चा और परामर्श होना चाहिए। वैसे भी, इसका महिला आरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है।

महिलाएँ इस बात से खुश हैं कि महिला आरक्षण के मुद्दे पर आपकी हेरा-फेरी नाकाम रही। आप विपक्ष पर "पाप" करने का, "भ्रूण हत्या" करने का आरोप लगा रहे हैं, जिसके लिए उन्हें "सज़ा मिलेगी।" मोदी जी, अपने शब्दों का इस्तेमाल ज़रा सोच-समझकर कीजिए। अगर आपको ऐसी अशोभनीय उपमाएँ देनी ही हैं, तो आपको यह पता होना चाहिए कि वहाँ कोई भ्रूण नहीं था। वहाँ तो 2010 के आरक्षण विधेयक के रूप में एक पूरी तरह से विकसित "अस्तित्व" था, जिसके पक्ष में आपकी पार्टी ने वोट दिया था। आपने उस अस्तित्व को दफ़ना दिया। अगर कोई पाप है, तो वह यही है।

महिलाएँ आपकी सरकार द्वारा किए गए लगातार विश्वासघातों से तंग आ चुकी हैं। इसे "वंदन" का नाम न दें। हम सम्मान नहीं, बल्कि अपने अधिकार चाहते हैं। हमारी यह माँग इस दृढ़ विश्वास पर आधारित है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी में संवैधानिक रूप से अनिवार्य वृद्धि भारत में लोकतंत्र को और अधिक मज़बूत करेगी। हम जाति जनगणना की माँग का समर्थन करते हैं। एक ऐसी माँग है, जिससे आप बचना चाहते हैं, क्योंकि आप नहीं चाहते कि भारत में मौजूद जातीय असमानताओं का सच अकाट्य आँकड़ों के माध्यम से दर्ज हो और उन पर उचित कार्रवाई की जाए।

और मोदी जी, कृपया हमारे लिए आँसू मत बहाइए – बस वैसा कीजिए, जैसा आपको 2014 में करना चाहिए था : संसद के अगले सत्र में बिना किसी शर्त या रोक-टोक के 'महिला आरक्षण बिल' लाइए, ताकि इसे अगले चुनावों में लागू किया जा सके। हमें दिखावा नहीं, काम चाहिए।

भवदीय,
बृंदा करात

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Friday World-April 23,2026 

पत्र-लेखिका राज्यसभा की पूर्व सांसद, माकपा पोलिट ब्यूरो की पूर्व सदस्य तथा देश में जनवादी महिला आंदोलन की वरिष्ठ नेत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)