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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 25 October 2026

October 25, 2026

ट्रंप की 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' की धमकी के बाद ईरान का पलटवार - हम ला रहे हैं 'फादर ऑफ ऑल बॉम्ब्स', 12 दिन की जंग के बाद मिसाइलें 1.5 गुना बढ़ीं

ट्रंप की 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' की धमकी के बाद ईरान का पलटवार - हम ला रहे हैं 'फादर ऑफ ऑल बॉम्ब्स', 12 दिन की जंग के बाद मिसाइलें 1.5 गुना बढ़ीं
- Friday World Oct 25,2026 
वाशिंगटन की धमकी, तेहरान की तैयारी

अमेरिका और ईरान के बीच जुबानी जंग अब हथियारों की होड़ में बदल गई है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा GBU-43/B 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' (MOAB) के इस्तेमाल की धमकियों के बीच ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने बड़ा बयान दिया है। IRGC प्रवक्ता हुसैन मुहिब ने कहा है कि अगर अमेरिका MOAB का इस्तेमाल करता है, तो ईरान 'फादर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' (FOAB) जैसे हथियार की तैयारी कर रहा है, जो दुश्मन के लिए कुछ नया होगा।

मुहिब के अनुसार, 12-दिन की लड़ाई से पहले की तुलना में ईरान की मिसाइलों की संख्या कम से कम 1.5 गुना बढ़ गई है। सिर्फ संख्या ही नहीं, क्वालिटी में भी बड़ा सुधार किया गया है। उनकी रेंज, मारक क्षमता और सटीकता तीनों को बढ़ाया गया है।

MOAB vs FOAB - क्या है अंतर?

अमेरिका का GBU-43/B MOAB दुनिया के सबसे बड़े नॉन-न्यूक्लियर बमों में से एक है। यह ग्रैविटी ड्रॉप, एयर बर्स्ट सिस्टम है और इसकी यील्ड लगभग 11 टन TNT के बराबर मानी जाती है। इसे 2003 में पेश किया गया था और यह बड़े बंकर और सतह के ठिकानों को नष्ट करने के लिए बनाया गया है।

इससे जुड़ा दूसरा हथियार GBU-57 MOP (Massive Ordnance Penetrator) है, जो बंकर बस्टर है और इसकी यील्ड लगभग 2.4 टन TNT के बराबर है, लेकिन इसे काइनेटिक पेनिट्रेशन के लिए ऑप्टिमाइज किया गया है, यानी जमीन के नीचे छिपे बंकरों को तोड़ने के लिए।

ईरान का दावा है कि उसका खोर्रमशहर-4 मिसाइल सिस्टम पेलोड के मामले में सबसे करीब है। इसका पेलोड 1800 किलोग्राम तक है और इसे दुश्मन के डिफेंस को तोड़ने के लिए क्लस्टर बॉम्बलेट से लैस किया जा सकता है।

ईरान साफ नहीं कर रहा है कि वह MOAB का मुकाबला किस तरह के हथियार से करेगा, लेकिन उसका जोर अंडरग्राउंड 'मिसाइल शहरों' में सुरक्षित, सस्ती और बड़े पैमाने पर बनाई गई मिसाइलों और ड्रोन की एसिमेट्रिक स्ट्रैटेजी पर है।

होर्मुज स्ट्रेट - 100% बंद

मुहिब ने सबसे बड़ा दावा होर्मुज स्ट्रेट को लेकर किया। उनके अनुसार, होर्मुज अमेरिकी युद्धपोतों के लिए "100% बंद" है। उन्होंने कहा कि कमर्शियल जहाजों ने रात के अंधेरे में अपने ट्रांसपोंडर बंद करके तस्करी का सहारा लिया है, जिन पर ईरान के हमले जारी हैं।

जो रास्तों का उल्लंघन कर रहे हैं, उन पर बिछी हुई माइन का खतरा है, जिनमें कई जहाज डूबे हैं या आग के हवाले हुए हैं। मुहिब ने 2026 की लड़ाई के दौरान कैरियर ग्रुप्स को किए गए बचाव के तरीकों की ओर इशारा किया और कहा कि ईरान ने अपनी ज्योग्राफिक ताकत का फायदा उठाकर अमेरिका की साख को खत्म कर दिया है।

ईरान का असली तुरुप का पत्ता - फत्ताह हाइपरसोनिक

ईरान की सबसे बड़ी ताकत फत्ताह-1 और फत्ताह-2 हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। ईरान का दावा है कि अमेरिका के पास अभी तक इसका कोई तोड़ नहीं है। ये मिसाइलें 5 मैक से ज्यादा स्पीड से उड़ती हैं और मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की रणनीति साफ है - महंगे अमेरिकी हथियारों का मुकाबला सस्ते, लेकिन बड़ी संख्या में बनने वाले ड्रोन और मिसाइलों से करना, और होर्मुज स्ट्रेट पर अपने कंट्रोल से दुनिया के तेल व्यापार पर दबाव बनाना।

क्या यह FOAB की धमकी सिर्फ मनोवैज्ञानिक युद्ध है या ईरान वाकई कोई नया हथियार ला रहा है, यह आने वाले हफ्तों में साफ होगा। लेकिन इतना तय है कि पाताल से लेकर समंदर तक, ईरान ने अमेरिका के लिए चुनौतियां बढ़ा दी हैं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 25,2026 

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October 25, 2026

₹50,000 चुका कर भी नहीं मिली मुक्ति, 66 पैसे के लिए किसान ने बैंक को सिखाया इंसाफ का पाठ

₹50,000 चुका कर भी नहीं मिली मुक्ति, 66 पैसे के लिए किसान ने बैंक को सिखाया इंसाफ का पाठ
-Friday World Oct 25,2026 
कर्नाटक के एक किसान की कहानी ने पूरे सिस्टम को आइना दिखा दिया है। किसान ने अपना ₹50,000 का किसान क्रेडिट कर्ज पूरा चुका दिया। NOC भी मिल गया। लेकिन कुछ महीनों बाद बैंक से फोन आया - "आपके खाते में ₹9.34 अभी भी बाकी है, ब्याज का हिस्सा।"

किसान ईमानदार था। वह तुरंत बैंक गया और ₹10 जमा कर दिए। हिसाब से बैंक का बकाया खत्म हो जाना चाहिए था। लेकिन यहां से कहानी ने नया मोड़ लिया।

किसान ने कहा, "मैंने ₹10 दिए, आपका ₹9.34 बकाया पूरा हुआ, तो मेरे ₹0.66 यानी 66 पैसे वापस करो।"

बैंक के कर्मचारी हंस पड़े। 66 पैसे के लिए कौन लड़ता है? लेकिन किसान अड़ा रहा। उसका तर्क था - अगर आप ₹9.34 के लिए मुझे 3 महीने बाद फोन करके परेशान कर सकते हैं, तो मुझे भी अपने 66 पैसे मांगने का पूरा हक है। यह पैसों का नहीं, सिद्धांत का सवाल है।

यह सवाल सिर्फ एक किसान का नहीं है। यह हर आम ग्राहक का सवाल है। बैंक जब 1 रुपये के लिए भी पेनल्टी, SMS चार्ज और नोटिस भेजता है, तो ग्राहक को भी अपने एक-एक पैसे का हिसाब मांगने का अधिकार क्यों नहीं?

सोशल मीडिया पर लोग किसान के समर्थन में उतर आए हैं। लोगों का कहना है कि किसान ने बिल्कुल सही किया। यह 66 पैसे की लड़ाई नहीं, यह सम्मान की लड़ाई है। बैंकिंग सिस्टम में अक्सर ग्राहक को छोटा समझा जाता है, लेकिन इस किसान ने साबित कर दिया कि जागरूक ग्राहक ही सबसे बड़ा ऑडिटर होता है।

आप क्या सोचते हैं? क्या किसान का 66 पैसे के लिए लड़ना सही था? कमेंट में बताएं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

#KarnatakaFarmer #66PaiseFight #BankingJustice #FarmerRights #EqualityForAll #FinancialAwareness #KisanKiLadai #BankLoan #JusticeMatters #InspiringStory

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October 25, 2026

पाताल से प्रहार की तैयारी - ईरान के मिसाइल सिटी से व्हाइट हाउस तक दहशत, ट्रंप की मुश्किलें बढ़ीं?

पाताल से प्रहार की तैयारी - ईरान के मिसाइल सिटी से व्हाइट हाउस तक दहशत, ट्रंप की मुश्किलें बढ़ीं?
-Friday World Oct 25,2026 
अमेरिका के लिए सीधी चेतावनी - ईरान ने लोड की मिसाइलें, टेक कंपनियां भी निशाने पर

वॉशिंगटन से लेकर तेहरान तक तनाव अपने चरम पर है। ईरान ने अमेरिका को सीधी चेतावनी दी है कि अगर उस पर दोबारा हमला हुआ तो जवाब सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहेगा।

ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) ने अपनी भूमिगत मिसाइल सिटीज़ में मिसाइलों को लॉन्चरों पर लोड कर दिया है। रॉयटर्स ने भी इस बात की पुष्टि की है कि ईरान की मिसाइलें ऑपरेशनल रेडीनेस में हैं। IRGC ने 18 अमेरिकी टेक और डिफेंस कंपनियों - जिनमें Meta, Google, Apple, Nvidia, Microsoft जैसी कंपनियां शामिल हैं - को वैध निशाना बताया है।

पाताल में छिपा है ईरान का सबसे बड़ा हथियार

ईरान ने दशकों में पहाड़ों के नीचे सैकड़ों किलोमीटर लंबी सुरंगें बनाई हैं। इन्हें "मिसाइल सिटी" कहा जाता है। इनकी गहराई 30 मीटर से 500 मीटर तक बताई जाती है। इन सुरंगों की ऊंचाई 6 से 10 मीटर है, जिनमें रेल सिस्टम से मिसाइलों को तेजी से मूव किया जा सकता है।

सबसे चर्चित है ईगल-44 यानी ओकाब-44 बेस, जो होर्मोजगन प्रांत में जाग्रोस पहाड़ों की तलहटी में बना है। यह एक पहाड़ को काटकर बनाया गया भूमिगत एयरबेस है जो फाइटर जेट, ड्रोन, क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों को छुपा सकता है। फरवरी 2023 में इसे पहली बार दुनिया के सामने लाया गया था। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि इस साल कई बार बमबारी झेलने के बावजूद ईरान वहां नई टैक्सीवे बना रहा है और रनवे को फिर से चालू कर रहा है।

WSJ की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के पास अभी भी सैकड़ों से हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें हैं और वह भूमिगत फैक्ट्रियों में फिर से उत्पादन शुरू कर चुका है। पेंटागन ने दावा किया था कि उसने ईरान की 90% ड्रोन और मिसाइल इंडस्ट्री तबाह कर दी, लेकिन जानकार मानते हैं कि तेहरान अभी भी जवाब देने में सक्षम है।

व्हाइट हाउस पर क्यों बढ़ा दबाव?

ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर "एपिक फ्यूरी" जैसे ऑपरेशन की धमकी दी थी। इसके जवाब में ईरान ने कहा है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह अमेरिका के एयरबेस, दूतावास, 5वें बेड़े के हेडक्वार्टर (बहरीन) के साथ-साथ खाड़ी देशों के एयरपोर्ट, पाइपलाइन, गैस प्लांट और आर्थिक ठिकानों को भी निशाना बनाएगा। पिछले टकराव में ही UAE के एनर्जी प्लांट, कतर के गैस प्लांट, दुबई, कुवैत और बहरीन के एयरपोर्ट्स पर हमले हो चुके हैं।

ईरान के सांसद मोहम्मद सालेह जोकर ने तो यहां तक कह दिया है कि अगर अमेरिका ने हमला किया तो परमाणु हथियारों समेत सभी प्रतिरोधक हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति दी जाए और NPT से बाहर निकल जाया जाए।

ट्रंप की मुश्किल - इंटरसेप्टर की कमी

अमेरिका और उसके खाड़ी सहयोगियों के लिए सबसे बड़ी चिंता इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी है। लगातार हमलों के बाद इजरायल और खाड़ी देशों के डिफेंस स्टॉक खत्म हो रहे हैं। ईरान का मानना है कि अब रोकथाम के लिए दुश्मन पर तुरंत और भारी लागत डालना जरूरी है।

ऐसे में पाताल से होने वाला कोई भी प्रहार सीधे व्हाइट हाउस की नीतियों को चुनौती देगा। क्या ट्रंप प्रशासन इस भूमिगत ताकत के आगे बेबस हो जाएगा, या एक और बड़ा टकराव दुनिया को हिला देगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

#IranMissileCity #Eagle44 #UndergroundBase #USIranTensions #WhiteHouse #Trump #IRGC #BallisticMissiles #MiddleEastCrisis #Geopolitics

Saturday, 24 October 2026

October 24, 2026

RT के टॉक शो में सनसनीखेज दावा - MBS पर तख्ता पलट का खतरा, हूती के सामने बेबस सऊदी सेना, भाड़े के सैनिकों के सहारे रियाद

RT के टॉक शो में सनसनीखेज दावा - MBS पर तख्ता पलट का खतरा, हूती के सामने बेबस सऊदी सेना, भाड़े के सैनिकों के सहारे रियाद
- Friday World Oct 25,2026 
मध्य-पूर्व की भू-राजनीति पर रूसी चैनल के शो ने छेड़ी नई बहस, बाब-अल-मंदेब पर नियंत्रण को लेकर बड़े खुलासे

रूस के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क RT के एक चर्चित जियोपॉलिटिकल टॉक शो में सऊदी अरब को लेकर किए गए विश्लेषण ने वैश्विक कूटनीति में हलचल तेज कर दी है। शो में मौजूद विश्लेषकों ने दावा किया कि सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था इस समय दोहरी चुनौती से जूझ रही है - एक बाहरी और एक आंतरिक।

पहला दावा - शाही परिवार के अंदर से खतरा?

शो के पैनलिस्टों के अनुसार, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) को न केवल सीमा पार से आ रहे ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि अल-सऊद शाही परिवार के अंदर भी असंतोष की चर्चाएं विश्लेषण का हिस्सा बनीं। यह दावा विश्लेषकों की अपनी राय के तौर पर पेश किया गया था, जिसकी कोई आधिकारिक पुष्टि सऊदी सरकार या किसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ने नहीं की है। कई जानकारों का मानना है कि सऊदी सेना की संरचना को जानबूझकर कई छोटी इकाइयों में बांटा गया था ताकि कोई एक गुट तख्ता पलट न कर सके - इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को शो में नए सिरे से उठाया गया।

दूसरा दावा - भाड़े के सैनिकों पर निर्भरता

शो में दूसरा बड़ा विश्लेषण सऊदी सैन्य क्षमता को लेकर था। कहा गया कि सऊदी अरब ने अत्याधुनिक हथियार तो अरबों डॉलर में खरीदे, लेकिन जमीनी लड़ाई लड़ने के लिए वह पूरी तरह से विदेशी मदद पर निर्भर है।

रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब की मदद के लिए लगभग 30,000 से 40,000 पाकिस्तानी सैनिक पहले से ही राज्य के अंदर तैनात हैं जो मिसाइल और ड्रोन हमलों से रक्षा में मदद कर रहे हैं। इसके अलावा कोलंबिया और अन्य देशों से आए पूर्व सैनिकों को प्राइवेट मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर्स के जरिए यमन बॉर्डर पर तैनात किया गया है। इन सैनिकों को 5000-6000 डॉलर प्रति माह तक वेतन दिया जाता है।

विश्लेषकों का तर्क था कि विचारधारा के लिए लड़ने वाले हूती लड़ाकों के गुरिल्ला युद्ध के सामने पैसे के लिए लड़ने वाले ये सैनिक प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं। यमन में लंबे समय से "घोस्ट सोल्जर्स" यानी कागजों पर मौजूद लेकिन जमीन पर न होने वाले सैनिकों की समस्या भी रिपोर्ट हो चुकी है।

तीसरा दावा - बाब-अल-मंदेब पर हूतियों का दबदबा

शो में सबसे सामरिक बिंदु बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट को बताया गया। यह 29 किलोमीटर चौड़ा समुद्री मार्ग है जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के 12% व्यापार का रास्ता है।

हाल के हफ्तों में खबरें आई हैं कि हूतियों ने मोखा बंदरगाह और पेरीम द्वीप के पास अपनी स्थिति मजबूत की है। इसी के जवाब में सऊदी अरब 100,000 यमनी सैनिकों को लामबंद करने और हवाई हमलों के साथ एक नया ऑपरेशन शुरू करने की योजना पर चर्चा कर रहा है, जैसा कि कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है। अमेरिका खुफिया जानकारी और सलाहकार दे रहा है लेकिन सीधे युद्ध में नहीं उतर रहा है।

तुर्की और पाकिस्तान का नया रक्षा समझौता

इस बीच तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए "मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट" ने भी ध्यान खींचा है। तुर्की के रक्षा मंत्री यासर गुलेर ने 24 अक्टूबर को स्पष्ट किया कि तुर्की इस समझौते के तहत हूतियों से सीधे लड़ाई में शामिल नहीं होगा, बल्कि उसकी भूमिका प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने जैसी होगी, जैसी उसने कतर में की है।


RT के शो में रखे गए ये सभी बिंदु - MBS के खिलाफ आंतरिक खतरा, भाड़े के सैनिकों की विफलता, और बाब-अल-मंदेब पर नियंत्रण - विश्लेषकों के अपने आकलन और ओपन सोर्स रिपोर्ट्स पर आधारित दावे हैं। सऊदी अरब की ओर से इन पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। सच्चाई यह है कि सऊदी अरब एक दशक से अधिक समय से यमन युद्ध में उलझा है, अरबों डॉलर खर्च किए हैं, फिर भी स्थायी जीत हासिल नहीं कर पाया है। इस युद्ध ने रियाद की सुरक्षा नीति की सीमाओं को दुनिया के सामने ला दिया है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 25,2026 

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October 24, 2026

ट्रंप-पुतिन डील का पहला असर - रूसी डीजल से लदा टैंकर अमेरिका के लिए रवाना, 3 साल बाद टूटा प्रतिबंध

ट्रंप-पुतिन डील का पहला असर - रूसी डीजल से लदा टैंकर अमेरिका के लिए रवाना, 3 साल बाद टूटा प्रतिबंध
-Friday World Oct 25,2026 
यूक्रेन के विरोध के बावजूद रूस से अमेरिका पहुंचेगा 40,000 टन डीजल, मध्यावधि चुनाव से पहले तेल की राजनीति तेज

अमेरिका और रूस के बीच ऊर्जा के मोर्चे पर एक बड़ा और चौंकाने वाला समझौता सामने आया है। रूस के प्रिमोरस्क बंदरगाह से 40,000 टन डीजल लेकर एक टैंकर शुक्रवार को अमेरिका के लिए रवाना हो गया है। यह पिछले तीन साल में पहली बार होगा जब रूसी डीजल अमेरिका की धरती पर पहुंचेगा।

क्या है पूरी डील?

जहाज ट्रैकिंग डेटा LSEG और Kpler के अनुसार, माल्टा के झंडे वाला टैंकर Agioi Fanendes' 22 अक्टूबर को रूस के बाल्टिक बंदरगाह प्रिमोरस्क से अल्ट्रा-लो-सल्फर डीजल लोड करके निकला है। इसके 7 नवंबर तक न्यूयॉर्क पहुंचने की उम्मीद है। जहाज पर लगभग 40,000 मीट्रिक टन डीजल है, जो लगभग 298,000 से 300,000 बैरल के बराबर है।

यह खेप अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुए एक समझौते के तहत भेजी जा रही है। ट्रंप ने 9 अक्टूबर को घोषणा की थी कि रूस वैश्विक बाजार में ज्यादा ईंधन उपलब्ध कराने के लिए तुरंत 300,000 टन (लगभग 22.5 लाख बैरल) डीजल निर्यात करेगा। इसके बाद नवंबर में 500,000 टन और उसके तुरंत बाद 10 लाख टन और भेजा जाएगा।

रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने पुष्टि की थी कि पहली खेप 40,000 टन की होगी। क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने शुक्रवार को कहा, "पहला तेल टैंकर ग्राहकों के लिए रवाना हुआ है और आगे नियमित आपूर्ति जारी रहेगी।"

क्यों किया ट्रंप ने यह समझौता?

इस डील के पीछे सबसे बड़ा कारण अमेरिका में होने वाले मध्यावधि चुनाव हैं। अमेरिका में 3 नवंबर को मध्यावधि चुनाव होने हैं और उससे पहले डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ट्रंप प्रशासन कीमतों को कम करने के लिए हर संभव कोशिश कर रहा है।

इसके लिए ट्रंप ने कई कदम उठाए हैं - रूस के खिलाफ नए प्रतिबंध कानून के कुछ हिस्सों में छूट देना और यूरोप को धमकी देना कि अगर उन्होंने अपने आपातकालीन भंडार से तेल नहीं निकाला तो अमेरिका डीजल निर्यात पर प्रतिबंध लगा देगा।

2022 के बाद पहली बार

अमेरिका ने 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण हमले के बाद रूसी ऊर्जा उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था। फरवरी 2023 से यूरोपीय संघ ने भी रूसी तेल उत्पादों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। तब से रूस अपना डीजल मुख्य रूप से ब्राजील, तुर्की और अफ्रीकी देशों को बेच रहा था। Kpler के अनुसार, जुलाई 2023 के बाद से अमेरिका की ओर जाने वाला यह पहला रूसी डीजल कार्गो है।

विवाद भी तेज

इस समझौते से विवाद भी खड़ा हो गया है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की और कई अमेरिकी सांसदों ने इस फैसले पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि इससे रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए फंड मिलेगा।

हालांकि, आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका रोजाना लगभग 38 लाख बैरल डीजल की खपत करता है। ऐसे में 3 लाख बैरल की यह पहली खेप अमेरिका की दैनिक मांग का केवल 7.8% ही पूरा कर पाएगी। इसलिए यह खेप कीमतों पर कितना असर डालेगी, यह देखना बाकी है।

रूस ने कहा है कि वह साल के अंत तक अपने डीजल निर्यात को बढ़ाकर 30 से 35 लाख टन प्रति माह तक ले जाएगा, जो उसका सामान्य निर्यात स्तर है। अब सबकी नजरें 7 नवंबर पर हैं, जब यह टैंकर न्यूयॉर्क पहुंचेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

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October 24, 2026

ईरान से गैस बंद, पाकिस्तान में मचा हाहाकार - 4500 वाला सिलेंडर 7000 के पार, रसोई पर महंगाई की मार

ईरान से गैस बंद, पाकिस्तान में मचा हाहाकार - 4500 वाला सिलेंडर 7000 के पार, रसोई पर महंगाई की मार
- Friday World Oct 25,2026
पाकिस्तान में LPG संकट गहराया, ईरान बॉर्डर बंद होने से आम आदमी की जेब पर डबल झटका

पाकिस्तान इन दिनों गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। ईरान द्वारा लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की सप्लाई रोक दिए जाने के बाद पूरे देश में हाहाकार मच गया है। महज कुछ ही दिनों में घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमतें आसमान छूने लगी हैं।

कीमतों में 2500 रुपये का उछाल
रिपोर्ट के अनुसार, बलूचिस्तान में 12 किलो वाले LPG सिलेंडर की कीमत 4,500 पाकिस्तानी रुपये से सीधे बढ़कर 7,000 रुपये हो गई है। यानी 2,500 रुपये की भारी बढ़ोतरी। लाहौर में यही सिलेंडर 7,500 रुपये और स्कर्दू जैसे पहाड़ी इलाकों में 8,200 रुपये तक बिक रहा है। खैबर पख्तूनख्वा के कुछ हिस्सों में तो कीमतें 10,000 रुपये को भी पार कर गई हैं। खुले बाजार में गैस 550 से 750 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है, जबकि सरकार द्वारा तय आधिकारिक कीमत 279.34 रुपये प्रति किलो यानी लगभग 3350 रुपये प्रति सिलेंडर है।

क्यों बंद हुई सप्लाई?
यह पूरा संकट 17 अक्टूबर को शुरू हुआ। पाकिस्तान और ईरान के बीच दो प्रमुख सीमा चौकियां - गाबद-रिमदान और ताफ्तान को बंद कर दिया गया। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत की सरकार ने इसका कारण सुरक्षा चिंताओं और तस्करी रोकने के प्रयासों को बताया है। वहीं ईरान के विदेश मंत्रालय ने तकनीकी दिक्कतों का हवाला दिया है।

इस बंदी का सबसे बड़ा असर LPG सप्लाई पर पड़ा है। पाकिस्तान अपनी कुल LPG जरूरत का लगभग 50% से 70% हिस्सा ईरान से आयात करता है। पाकिस्तान LPG एसोसिएशन के अनुसार, देश रोजाना ईरान से लगभग 7,000 मीट्रिक टन LPG आयात करता है। इसमें से अकेले 4,000 टन से ज्यादा सप्लाई गाबद-रिमदान बॉर्डर से आती है। अब यह पूरी सप्लाई ठप हो गई है।

बॉर्डर पर फंसे सैकड़ों ट्रक
बॉर्डर बंद होने से दोनों तरफ सैकड़ों LPG टैंकर और मालवाहक ट्रक फंसे हुए हैं। ड्राइवर पिछले एक हफ्ते से भी ज्यादा समय से कठोर मौसम में बुनियादी सुविधाओं के बिना इंतजार कर रहे हैं। हालांकि गाबद-रिमदान बॉर्डर को बुधवार को पाकिस्तान से खराब होने वाले सामानों जैसे आलू, केले और चावल के निर्यात के लिए खोला गया है, लेकिन LPG का आयात अभी भी बंद है। 1000 से ज्यादा पाकिस्तानी कंटेनर ईरान जाने के इंतजार में खड़े हैं। क्वेटा चैंबर ऑफ कॉमर्स ने व्यापारियों को ईरान से नए ऑर्डर न देने की सलाह दी है।

सर्दी से पहले बड़ी चिंता
यह संकट ऐसे समय में आया है जब सर्दियां करीब हैं। सर्दियों में गैस की मांग और बढ़ जाती है। ऐसे में अगर सप्लाई जल्द शुरू नहीं हुई तो कीमतें और बढ़ सकती हैं। लाहौर के एक निवासी ने बताया कि पहले वह 250 रुपये प्रति किलो गैस लेता था, अब 500-600 रुपये देना पड़ रहा है। महंगी गैस का असर सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रांसपोर्ट और अन्य सामानों की कीमतों पर भी पड़ रहा है।

पाकिस्तान की ऊर्जा निर्भरता उजागर
इस संकट ने पाकिस्तान की ईरान पर अत्यधिक निर्भरता को उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी होगी। LPG इंडस्ट्री सरकार से मांग कर रही है कि मासिक प्राइस फिक्सिंग सिस्टम को खत्म करके दैनिक या साप्ताहिक प्राइस सिस्टम लाया जाए, क्योंकि ईरान से आने वाली गैस की कीमत सऊदी अरामको के बेंचमार्क से काफी अलग होती है।

फिलहाल, आम पाकिस्तानी परिवारों की रसोई का बजट बिगड़ चुका है और सबकी नजरें इस बात पर हैं कि दोनों देशों के बीच बातचीत कब सफल होती है और बॉर्डर कब पूरी तरह से खुलता है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 25,2026

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Friday, 23 October 2026

October 23, 2026

PM मोदी का सबसे बड़ा तंज - "राहुल गांधी निष्फल प्रोडक्ट, इतनी बार लॉन्चिंग तो श्रीहरिकोटा से भी नहीं हुई"

PM मोदी का सबसे बड़ा तंज - "राहुल गांधी निष्फल प्रोडक्ट, इतनी बार लॉन्चिंग तो श्रीहरिकोटा से भी नहीं हुई"
-Friday World Oct 23,2026 
नई दिल्ली: संसद के विशेष सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला। उन्होंने सीधे तौर पर राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए कहा कि कांग्रेस एक निष्फल प्रोडक्ट को बार-बार लॉन्च करने की कोशिश कर रही है और इस चक्कर में देश का समय बर्बाद कर रही है।

PM मोदी ने कहा, "श्रीहरिकोटा से एक साल में जितने रॉकेट लॉन्च नहीं होते, उससे ज्यादा बार कांग्रेस ने अपने एक ही नेता को लॉन्च करने की नाकाम कोशिश की है।"

यह बयान सुनते ही सदन में सत्ता पक्ष की बेंचों से मेजें थपथपाई जाने लगीं।

कांग्रेस अपने ही परिवार के बोझ तले दब गई है - मोदी

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या बाहर नहीं, अंदर है। गांधी परिवार अब कांग्रेस के लिए ही बोझ बन गया है। पार्टी को नए विचारों, नए नेताओं को मौका देना चाहिए था, लेकिन वो एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूम कर रह गई है।

उन्होंने कहा, "देश बदल रहा है, दुनिया बदल रही है, लेकिन कांग्रेस वहीं अटकी हुई है। वो 21वीं सदी के भारत की आकांक्षाओं को समझ ही नहीं पा रही।"

कुछ लोग भारत की छवि खराब करने पर अड़े हैं

PM मोदी ने अपने भाषण में एक गंभीर चिंता भी जताई। उन्होंने कहा कि जब पूरी दुनिया एक नई विश्व व्यवस्था की तलाश में है, भारत को एक बड़ी ताकत के रूप में देख रही है, तब हमारे ही देश के कुछ लोग अराजकता का सपना देख रहे हैं।

"कुछ लोग भारत की छवि को खराब करने पर अड़े हुए हैं। वे विदेशों में जाकर भारत को बदनाम करते हैं, भारत के खिलाफ बोलते हैं और दूसरे देशों को हमारे आंतरिक मामलों में दखल देने के लिए उकसाते हैं। यह देशभक्ति नहीं है।" - PM मोदी ने बिना नाम लिए राहुल गांधी के विदेश में दिए गए बयानों पर तंज कसा।

भारत सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था - दुनिया मान रही है

प्रधानमंत्री ने वैश्विक आर्थिक संकट के बीच भारत की मजबूती का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब पूरी दुनिया मंदी और युद्ध से जूझ रही है, तब भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है।

उन्होंने याद दिलाया कि 2020 में उन्होंने G20 मंच पर 'एक नई विश्व व्यवस्था - जो मानवता के कल्याण के लिए हो' का विचार रखा था। उसी साल संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्होंने कहा था कि अगर सदी बदल जाती है और हम नहीं बदलते, तो हम सार्थक बदलाव नहीं ला सकते।

आज भारत उसी सोच पर काम कर रहा है।

ग्लोबल साउथ को मिलना चाहिए उसका हक

अपने भाषण के आखिरी हिस्से में PM मोदी ने वैश्विक सुधारों की बात की। उन्होंने कहा कि आज सवाल यह नहीं है कि विश्व व्यवस्था बदल रही है, सवाल यह है कि हम कैसी नई व्यवस्था बनाना चाहते हैं।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार अनिवार्य है। ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों को उनका उचित स्थान और आवाज मिलनी ही चाहिए। अंतरराष्ट्रीय सहयोग केवल अच्छे समय तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि संकट के समय में भी कारगर होना चाहिए।


लॉन्चिंग का फर्क

मोदी के इस श्रीहरिकोटा वाले बयान ने दो भारत की तस्वीर साफ कर दी है। एक तरफ ISRO है जो हर लॉन्चिंग के साथ भारत को अंतरिक्ष में नई ऊंचाई पर ले जा रहा है, हर मिशन सफल हो रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस है जो एक ही प्रोडक्ट को दशकों से लॉन्च कर रही है और हर बार वह प्रोडक्ट मार्केट में फेल हो जा रहा है।

PM का संदेश साफ था - भारत को अब फेल प्रोडक्ट नहीं, सफल मिशन चाहिए।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 23,2026 

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