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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 29 March 2026

March 29, 2026

ट्रंप-विरोधी प्रदर्शनों में ईरानी झंडे और बर्नी सैंडर्स का इज़रायल हथियार सौदा रोकने का एलान: अमेरिकी राजनीति का नया मोड़

ट्रंप-विरोधी प्रदर्शनों में ईरानी झंडे और बर्नी सैंडर्स का इज़रायल हथियार सौदा रोकने का एलान: अमेरिकी राजनीति का नया मोड़
-Friday World March 29,2026 
अमेरिका में 'नो किंग्स' आंदोलन की लहर: ईरान युद्ध, इमिग्रेशन और घरेलू असंतोष का मिश्रण

 मार्च 2026 के अंत में अमेरिका के कई शहरों में नो किंग्स' नामक बड़े पैमाने पर ट्रंप-विरोधी प्रदर्शन हुए। इन प्रदर्शनों को आयोजकों ने देश के इतिहास की सबसे बड़ी एक दिवसीय विरोध सभाओं में से एक बताया। हजारों जगहों पर लाखों लोग सड़कों पर उतरे, जिनमें मिनेसोटा की राजधानी सेंट पॉल को फ्लैगशिप इवेंट बनाया गया। वहाँ ब्रूस स्प्रिंगस्टीन जैसे सितारे, सीनेटर बर्नी सैंडर्स, इल्हान ओमार और अन्य प्रमुख नेता शामिल हुए। 

प्रदर्शनों के मुख्य मुद्दे थे: ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति (जिसे 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' कहा जा रहा है), इमिग्रेशन एन्फोर्समेंट (खासकर मिनेसोटा में दो अमेरिकी नागरिकों की मौत), बढ़ती महंगाई और नागरिक अधिकारों पर कथित हमले। ईरान के साथ चल रहे संघर्ष ने इन प्रदर्शनों को नया आयाम दिया। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने ईरानी झंडे (इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के झंडे) लहराए, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। 

ईरानी झंडे क्यों लहराए गए? प्रदर्शनों में ईरानी झंडे दिखना कई अमेरिकियों के लिए चौंकाने वाला था। कुछ वीडियो और रिपोर्ट्स में डेट्रॉइट, वाशिंगटन डीसी और अन्य जगहों पर ईरानी झंडे के साथ फिलिस्तीनी झंडे भी दिखे। आयोजक इसे **युद्ध विरोध** और ट्रंप की विदेश नीति के खिलाफ आवाज बताते हैं। 

वास्तव में, ये प्रदर्शन मुख्य रूप से ट्रंप के ईरान पर सैन्य अभियान के खिलाफ थे। फरवरी 2026 में अमेरिका और इज़रायल ने ईरान पर बड़े हमले किए थे, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेता मारे गए थे। ईरान ने जवाबी हमले किए, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को प्रभावित किया और क्षेत्रीय तनाव बढ़ा। 

कुछ प्रदर्शनकारी ईरान के मौजूदा शासन (इस्लामिक रिपब्लिक) के समर्थन में नहीं, बल्कि युद्ध के विस्तार और अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप के विरोध में थे। हालांकि, ईरानी रिजीम के झंडे लहराना कई आलोचकों ने प्रो-टेरर' या विदेशी हस्तक्षेप का प्रतीक बताया। वहीं, ईरानी-अमेरिकन समुदाय के कुछ हिस्से पहले से ही ट्रंप के ईरान विरोधी कदमों का समर्थन कर रहे थे और पुराने 'लाइन एंड सन' झंडे लहरा रहे थे। 

ये प्रदर्शन दिखाते हैं कि अमेरिकी समाज में विदेश नीति कितनी विभाजित है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन ईरान को 'परमाणु खतरा' और क्षेत्रीय अस्थिरता का स्रोत बता रहा है, तो दूसरी तरफ प्रगतिशील और शांति समर्थक ईरान युद्ध को 'अवैध' और 'असंवैधानिक' करार दे रहे हैं। 

 बर्नी सैंडर्स का बड़ा कदम: इज़रायल को 660 मिलियन डॉलर के बम सौदे पर रोक इसी बीच, सीनेटर बर्नी सैंडर्स (स्वतंत्र, वर्मोंट) ने एक ठोस राजनीतिक कदम उठाया। मार्च 2026 के मध्य में उन्होंने तीन जॉइंट रेजोल्यूशन ऑफ डिसएप्रूवल (JRD) पेश कीं, जिनका मकसद इज़रायल को लगभग 658.8 मिलियन डॉलर (करीब 660 मिलियन डॉलर) के हथियार सौदे को रोकना था।

 इस सौदे में शामिल थे: 

- 5,000 संबंधित डिफेंस आर्टिकल्स (250-पाउंड बमों से जुड़े) 

- 10,000 पांच सौ पाउंड के बम

 - 12,000 एक हजार पाउंड के बम 

कुल मिलाकर 22,000 से ज्यादा बम। सैंडर्स ने इसे ट्रंप प्रशासन द्वारा कांग्रेस की समीक्षा को बायपास करके 'इमरजेंसी' के तहत आगे बढ़ाए जाने का विरोध किया।

 सैंडर्स का बयान साफ था: “इज़रायल की चरमपंथी सरकार ने गाजा, ईरान और लेबनान में जो भयानक तबाही मचाई है, उसके बीच अमेरिकी टैक्सपेयर्स का आखिरी काम 22,000 नए बम देना नहीं होना चाहिए।” उन्होंने इसे “अवैध युद्ध” का समर्थन बताया और कहा कि कांग्रेस को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना चाहिए।

 इस रेजोल्यूशन के सह-प्रायोजक थे सीनेटर क्रिस वैन होलेन (डेमोक्रेट, मैरीलैंड), जेफ मर्कले (डेमोक्रेट, ओरेगन) और पीटर वेल्च (डेमोक्रेट, वर्मोंट)। सैंडर्स लंबे समय से इज़रायल को दिए जाने वाले हथियारों के आलोचक रहे हैं, खासकर गाजा संघर्ष के बाद। 

ध्यान दें कि वायरल खबरों में कभी-कभी इसे 1 अरब डॉलर' बताया जा रहा है, जो थोड़ा बढ़ा-चढ़ाकर है। वास्तविक राशि 660 मिलियन डॉलर के आसपास है, लेकिन यह भी काफी बड़ी राशि है। 

पृष्ठभूमि: ट्रंप का दूसरा टर्म और मिडिल ईस्ट का तूफान ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका-इज़रायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया। फरवरी 2026 में शुरू हुए अभियान में अमेरिका-इज़रायल ने ईरान के सैन्य ठिकानों, परमाणु सुविधाओं और नेतृत्व पर हमले किए। ईरान ने मिसाइल हमलों से जवाब दिया, जिससे क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई – खासकर तेल परिवहन वाले स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर। 

ट्रंप प्रशासन इसे **ईरान के परमाणु कार्यक्रम** और घरेलू दमन (जनवरी 2026 के ईरानी विरोध प्रदर्शनों) का जवाब बता रहा है। वहीं, विरोधी इसे अनावश्यक विस्तारवादी युद्ध मानते हैं। 

इस युद्ध ने अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी हिला दिया है। महंगाई बढ़ी, गैस की कीमतें चढ़ीं और 'नो किंग्स' जैसे आंदोलन मजबूत हुए। मिनेसोटा में इमिग्रेशन एजेंट्स द्वारा दो नागरिकों की मौत ने स्थानीय गुस्से को और भड़का दिया।

- विरोधी पक्ष: युद्ध अनावश्यक है, इससे अमेरिकी सैनिकों और टैक्सपेयर्स का नुकसान हो रहा है। बर्नी सैंडर्स जैसे नेता कांग्रेस की भूमिका मजबूत करने और हथियार निर्यात पर नियंत्रण की मांग कर रहे हैं। 

- ईरानी-अमेरिकन समुदाय: आयतुल्लाह खामेनेई के साथ 

 आगे क्या? बर्नी सैंडर्स की रेजोल्यूशन पर सीनेट में वोट हो सकता है, हालांकि पास होना मुश्किल है क्योंकि ट्रंप प्रशासन और रिपब्लिकन बहुमत इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बता रहे हैं। 'नो किंग्स' प्रदर्शन जारी रह सकते हैं, खासकर अगर ईरान युद्ध लंबा खिंचा।

 यह घटनाक्रम अमेरिकी लोकतंत्र की जीवंतता दिखाता है – जहां विदेश नीति भी घरेलू चुनावी और सामाजिक मुद्दों से जुड़ जाती है। एक तरफ शक्ति प्रदर्शन, तो दूसरी तरफ शांति और जवाबदेही की मांग। 

ईरानी झंडे और बर्नी का कदम सिर्फ दो घटनाएं नहीं, बल्कि गहरे विभाजन का प्रतीक हैं। अमेरिका में बहस अब सिर्फ 'ट्रंप vs विरोधी' नहीं, बल्कि युद्ध vs शांति, सुरक्षा vs मानवाधिकार और अमेरिकी हित vs वैश्विक जिम्मेदारी पर केंद्रित हो गई है। 

जैसा कि इतिहास सिखाता है, ऐसे समय में संवाद और संतुलित नीति ही स्थायी समाधान ला सकती है। क्या कांग्रेस हथियार सौदों पर अपनी भूमिका निभाएगी? क्या प्रदर्शन युद्ध की दिशा बदल पाएंगे? समय बताएगा। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 29,2026 
March 29, 2026

‘झेलेन्स्की मिडिल ईस्ट के दौरे पर निकले, रूस ने यूक्रेन पर 270+ ड्रोन से हमला कर दिया: ओडेसा में मातृत्व अस्पताल क्षतिग्रस्त, 5 मौतें’

‘झेलेन्स्की मिडिल ईस्ट के दौरे पर निकले, रूस ने यूक्रेन पर 270+ ड्रोन से हमला कर दिया: ओडेसा में मातृत्व अस्पताल क्षतिग्रस्त, 5 मौतें’
-Friday World-March 29,2026
कीव/ओडेसा, 29 मार्च 2026 — यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर झेलेन्स्की जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर के अचानक दौरे पर थे, ठीक उसी समय रूस ने यूक्रेन पर भारी ड्रोन हमले की बौछार कर दी। रूसी सेना ने एक ही रात में 270 से अधिक ड्रोन (कुछ रिपोर्ट्स में 273) लॉन्च किए, जिसमें कम से कम 5 लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हुए। यह हमला झेलेन्स्की के मिडिल ईस्ट दौरे को और ज्यादा सियासी रंग दे गया है। 

 ओडेसा पर सबसे भयानक हमला ओडेसा क्षेत्र के प्रमुख सेरही लिसाक ने टेलीग्राम पर बताया कि काला सागर के इस प्रमुख बंदरगाह शहर पर रातभर हुए हमले में दो लोगों की मौत हुई और कम से कम 11 लोग घायल हुए (बाद में एक और की मौत की खबर आई)। हमले में एक मातृत्व अस्पताल की छत को नुकसान पहुंचा, कई आवासीय इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं और आग लग गई। 

लिसाक ने लिखा, “80 लोग अस्पताल में थे, जिनमें 33 मेडिकल स्टाफ शामिल थे।幸运 से सभी ने समय पर शेल्टर ले लिया।” घायलों में एक 9 वर्षीय बच्चा भी शामिल है, जिसकी हालत स्थिर बताई जा रही है। ओडेसा के प्रिमोर्स्की जिले में कई बहुमंजिला इमारतों के बीच के हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए।

 राष्ट्रपति झेलेन्स्की ने खुद इस हमले को “मैसिव” बताया और कहा कि ओडेसा पर अकेले 60 से ज्यादा ड्रोन दागे गए। उन्होंने क्रिवी रीह (अपने गृहनगर) में भी हमले की पुष्टि की, जहां एक औद्योगिक सुविधा पर ड्रोन हमला हुआ और दो लोगों की मौत हो गई। 

यूक्रेनी वायुसेना के अनुसार, रूस ने पूरे देश पर ड्रोन की कई लहरें भेजीं। कई ड्रोन को मार गिराया गया, लेकिन कुछ लक्ष्य पर पहुंचने में सफल रहे। 

झेलेन्स्की का अचानक मिडिल ईस्ट दौरा: ड्रोन डिफेंस की पेशकश इस हमले के ठीक उसी दिन झेलेन्स्की UAE और कतर पहुंचे थे। यह दौरा अनऑफिशियल (अचानक) था। उनका मुख्य उद्देश्य अरब देशों को ईरान के ड्रोन हमलों से बचाने में यूक्रेन की विशेषज्ञता और एंटी-ड्रोन सिस्टम उपलब्ध कराना है।

 झेलेन्स्की ने UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर सहमति बनी। कतर के साथ भी 10 वर्षीय सुरक्षा समझौता साइन किया गया। इससे पहले सऊदी अरब के साथ भी इसी तरह का डिफेंस पेक्ट हो चुका है। 

यूक्रेन का दावा है कि वह UAE, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और जॉर्डन समेत पांच अरब देशों को ईरानी ड्रोन (खासकर शाहेद टाइप) से बचाने में मदद कर रहा है। यूक्रेन अपनी युद्ध-कसौटी पर खरी एंटी-ड्रोन तकनीक और विशेषज्ञ टीमों को भेज रहा है। झेलेन्स्की ने कहा, “आज के खतरे में हर सामान्य देश को स्थिरता और जीवन की रक्षा करनी चाहिए। यूक्रेन के पास इस क्षेत्र में अनुभव है।” 

यह दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच तनाव बढ़ा हुआ है। ईरान ने हाल में कई अरब देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए हैं। यूक्रेन, जो खुद रूस से ईरानी ड्रोन का सामना कर रहा है, अब अपनी इस विशेषज्ञता को डिप्लोमैटिक लाभ में बदलने की कोशिश कर रहा है। 

रूस का संदेश साफ: युद्ध जारी रहेगा विश्लेषकों का मानना है कि रूस ने झेलेन्स्की के विदेश दौरे के दौरान जानबूझकर बड़े पैमाने पर ड्रोन हमला किया है ताकि यह संदेश दिया जा सके कि यूक्रेन का ध्यान कहीं और हो, तो भी रूस हमले जारी रखेगा। 

यह हमला रूस-यूक्रेन युद्ध के नए चरण को दर्शाता है, जहां दोनों पक्ष अब ड्रोन युद्ध पर ज्यादा निर्भर हो गए हैं। रूस ईरान से शाहेद ड्रोन प्राप्त कर उन्हें और बेहतर बना रहा है, जबकि यूक्रेन अपनी स्वदेशी ड्रोन और एंटी-ड्रोन क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। 

मानवीय और रणनीतिक प्रभाव ओडेसा हमले में मातृत्व अस्पताल पर निशाना लगना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा का विषय बन गया है। कई देशों ने नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले की निंदा की है। 

दूसरी ओर, झेलेन्स्की का मिडिल ईस्ट दौरा यूक्रेन की विदेश नीति में नया मोड़ साबित हो सकता है। अगर यूक्रेन अरब देशों के साथ लंबे समय के डिफेंस डील कर लेता है, तो इससे न सिर्फ आर्थिक फायदा होगा, बल्कि रूस-ईरान अक्ष के खिलाफ भी एक नया मोर्चा खुल सकता है।

 यूक्रेन के अधिकारियों ने कहा कि हमले के बाद राहत और बचाव कार्य तेजी से चल रहे हैं। घायलों का इलाज विभिन्न अस्पतालों में जारी है।

 यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अब केवल यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें मिडिल ईस्ट की ड्रोन तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा भी उलझ चुकी है।

 अब देखना होगा कि झेलेन्स्की का यह दौरा कितना सफल रहता है और रूस के लगातार हमलों के बीच यूक्रेन अपनी एंटी-ड्रोन रणनीति को कितना मजबूत कर पाता है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-March 29,2026
March 29, 2026

7 एयरपोर्ट उद्घाटन, 6 बंद: अखिलेश यादव ने दादरी रैली में योगी-मोदी सरकार पर बोला तीखा हमला, 2027 की तैयारी तेज’

7 एयरपोर्ट उद्घाटन, 6 बंद: अखिलेश यादव ने दादरी रैली में योगी-मोदी सरकार पर बोला तीखा हमला, 2027 की तैयारी तेज’
'-Friday World March 29,2026
गौतमबुद्ध नगर के दादरी में रविवार को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ को संबोधित करते हुए भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) के उद्घाटन के ठीक एक दिन बाद आयोजित इस रैली में अखिलेश ने विकास, रोजगार, किसानों और महिलाओं के मुद्दों पर जोरदार हमला बोलते हुए 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों का बिगुल फूंक दिया। रैली में हजारों कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद रहे, जिसने पूरे क्षेत्र में सियासी सरगर्मी बढ़ा दी। 

एयरपोर्ट घोटाले का बड़ा आरोप अखिलेश यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सीधा हमला करते हुए कहा कि भाजपा सरकार केवल दिखावा और ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने में लगी है। उन्होंने दावा किया, “भाजपा ने 7 एयरपोर्ट का उद्घाटन किया, लेकिन उनमें से 6 बंद पड़े हैं। लगता है ये उद्घाटन सिर्फ बेचने या ठेके देने के लिए किए गए थे।” 

अखिलेश ने सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को उठाते हुए लिखा था कि सात नए एयरपोर्ट में से छह बंद हैं और बाकी हवाई अड्डों की हालत देखने के लिए घास हटवाकर भी देख लिया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि अरबों रुपये खर्च करके सिर्फ निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं, ताकि चुनिंदा लोगों को मुनाफा पहुंचाया जा सके। वास्तव में हवाई अड्डे चालू नहीं हो रहे और ‘उड़ान’ योजना के तहत विमान भी नहीं उड़ रहे। 

यह आरोप इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में अलीगढ़, आजमगढ़, चित्रकूट, श्रावस्ती, मुरादाबाद जैसे कई छोटे एयरपोर्ट्स का उद्घाटन हुआ था, लेकिन ऑपरेशनल सेवाएं कुछ महीनों में ही बंद हो गईं। अखिलेश ने इसे भाजपा का “भ्रष्ट प्रबंधन” करार दिया और पूछा कि आखिर जनता के टैक्स का पैसा कहां जा रहा है? 

भारी भीड़ जुटाने के लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल? रैली में अखिलेश यादव ने भाजपा की हालिया रैलियों पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा, “दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा को भीड़ जुटाने के लिए सरकारी विभागों का सहारा लेना पड़ रहा है। हमारे रैली से पहले उन्होंने भी रैली की, लेकिन असली जनसमर्थन तो समाजवादी पार्टी के पास है।”

 उन्होंने दादरी रैली को ‘समाजवादी समानता भाईचारा’ का प्रतीक बताते हुए कहा कि सपा समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चल रही है और 2027 में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। 

 किसानों, युवाओं और महिलाओं के लिए बड़े वादे अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर 50 लाख करोड़ के एमओयू सिर्फ कागजों पर रह जाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि युवाओं को रोजगार नहीं मिला, जबकि किसान लगातार परेशान हैं।

 रैली में उन्होंने स्पष्ट वादा किया: 

- अगर 2027 में सपा सरकार बनी तो खेतों से जमीन लेते समय किसानों को बाजार भाव से 64% अतिरिक्त मुआवजा और 4% प्लॉट दिए जाएंगे।

 - लखनऊ और गोमती रिवर फ्रंट पर गुरुजर महापुरुषों की प्रतिमाएं लगाई जाएंगी। 

- महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नई योजना शुरू की जाएगी। 

*महिलाओं के लिए सबसे बड़ा ऐलान: अखिलेश ने ‘स्त्री समृद्धि सम्मान योजना’ (या नारी समृद्धि सम्मान योजना) का जिक्र करते हुए कहा कि सपा सरकार बनते ही गरीब परिवार की महिलाओं को हर साल 40,000 रुपये की सम्मान राशि दी जाएगी। यह राशि सीधे उनके खाते में ट्रांसफर होगी, जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बन सकें। उन्होंने कहा, “हर बच्ची, युवती और महिला को सामाजिक-आर्थिक सम्मान देंगे और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करेंगे।” 

विकास बनाम दिखावा: सपा vs भाजपा अखिलेश यादव ने दादरी-नोएडा क्षेत्र के विकास का जिक्र भी किया। उन्होंने दावा किया कि सपा सरकार के समय नोएडा में आवासीय और ऑफिस इंफ्रास्ट्रक्चर का बड़ा काम हुआ था, जिसे भाजपा सरकार ने नजरअंदाज या खराब कर दिया। उन्होंने कहा कि सपा का फोकस असली विकास पर है, जबकि भाजपा केवल फोटो सेशन्स और उद्घाटनों में व्यस्त है।

 रैली में अखिलेश ने सामाजिक समानता और भाईचारे पर जोर देते हुए कहा कि जो लोग कभी दमन का सामना नहीं किया, वे समाजवादी परिवार की पीड़ा नहीं समझ सकते। उन्होंने युवाओं, किसानों, महिलाओं, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट होने का आह्वान किया। 

 2027 चुनाव की शुरुआत? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दादरी रैली से अखिलेश यादव ने औपचारिक रूप से 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। जेवर एयरपोर्ट उद्घाटन के एक दिन बाद इस रैली का आयोजन भाजपा के कार्यक्रम के जवाबी हमले के रूप में देखा जा रहा है। 

सपा कार्यकर्ताओं में उत्साह चरम पर है। पार्टी का दावा है कि रैली में भारी भीड़ उमड़ी और यह साबित करता है कि जनता भाजपा की “जुमलों” से तंग आ चुकी है और असली बदलाव चाहती है।

 अखिलेश यादव की यह रैली न सिर्फ एयरपोर्ट विवाद को नया मोड़ देती है, बल्कि महिलाओं को 40 हजार रुपये सालाना देने जैसे लोकलुभावन वादों से वोट बैंक को साधने की रणनीति भी साफ दिखाती है। अब देखना होगा कि भाजपा इन आरोपों और वादों का क्या जवाब देती है और 2027 तक यूपी की सियासत किस दिशा में जाती है। 

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 29,2026
March 29, 2026

ममता बनर्जी का पुरुलिया में तीखा हमला: “बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार”, TMC सरकार की उपलब्धियां गिनाईं

ममता बनर्जी का पुरुलिया में तीखा हमला: “बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार”, TMC सरकार की उपलब्धियां गिनाईं
-Friday World March 29,2026
पुरुलिया, २९ मार्च २०२६: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव २०२६ की तैयारियों के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज पुरुलिया में एक जोरदार चुनावी रैली को संबोधित किया। रैली के दौरान उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर जमकर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं और आदिवासियों पर सबसे ज्यादा अत्याचार हो रहे हैं। उन्होंने अपनी सरकार की महिलाओं के लिए चलाई जा रही योजनाओं का बचाव करते हुए केंद्र सरकार की नीतियों की भी आलोचना की। 

रैली में बड़ी संख्या में महिलाएं और स्थानीय लोग शामिल हुए। ममता बनर्जी ने कहा, “बीजेपी शासित राज्यों में देखिए – महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामले सबसे ज्यादा हैं। आदिवासी बहनों पर भी जुल्म हो रहा है। हमारी सरकार महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान के लिए प्रतिबद्ध है।” 

महिलाओं की सुरक्षा पर ममता का दावा मुख्यमंत्री ने लक्ष्मीर भंडार योजना का जिक्र करते हुए कहा कि इस योजना से लाखों महिलाओं को आर्थिक सहायता मिल रही है, जिससे वे आत्मनिर्भर बन रही हैं। उन्होंने दावा किया कि अगर BJP सत्ता में आई तो इस योजना को बंद कर दिया जाएगा और महिलाओं की स्थिति और खराब हो जाएगी। 

“बीजेपी कहती है कि मछली-मांस नहीं खाना चाहिए। वे बंगाल की संस्कृति और खान-पान पर भी हमला करना चाहते हैं। लेकिन हमारी सरकार सभी की संस्कृति और अधिकारों की रक्षा करती है,” ममता बनर्जी ने कहा।

 उन्होंने NCRB (National Crime Records Bureau) के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि इन राज्यों में महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति चिंताजनक है, जबकि पश्चिम बंगाल में उनकी सरकार कानून-व्यवस्था सुधारने और महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। 

केंद्र सरकार पर हमला ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि देशभर में कानून-व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP शासित राज्यों में आदिवासियों का शोषण हो रहा है और महिलाओं की स्थिति बदतर हो गई है। 

“हमारी सरकार ने महिलाओं के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। हम महिलाओं को सुरक्षा, सम्मान और आर्थिक स्वावलंबन दे रहे हैं। लेकिन BJP केवल झूठे वादे करती है और सत्ता में आकर लोगों के अधिकार छीनना चाहती है,” उन्होंने कहा।

 रैली में ममता बनर्जी ने Special Intensive Revision (SIR) का भी जिक्र किया और आरोप लगाया कि BJP इस प्रक्रिया के जरिए बंगाल के मतदाताओं, खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि TMC इस साजिश के खिलाफ सड़क से लेकर अदालत तक लड़ाई लड़ रही है। 

 पुरुलिया रैली का महत्व पुरुलिया जिला पश्चिम बंगाल के आदिवासी बहुल इलाकों में आता है। यहां BJP की कुछ सीटें हैं, इसलिए ममता बनर्जी की यह रैली चुनावी रणनीति के तहत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। उन्होंने आदिवासियों और महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा कि TMC सरकार सभी वर्गों के विकास के लिए काम कर रही है और कोई भी समुदाय पीछे नहीं छूटेगा। 

रैली में ममता बनर्जी ने जनता से अपील की कि वे BJP की “फूट डालो और राज करो” की नीति को पहचानें और TMC को मजबूत करें। उन्होंने कहा, “बंगाल की मिट्टी, बंगाल की भाषा और बंगाल की संस्कृति की रक्षा हम सबको करनी है।” 

राजनीतिक संदर्भ यह रैली २०२६ के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आयोजित हुई है। BJP लगातार पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा और भ्रष्टाचार के मुद्दों पर TMC सरकार पर हमला बोल रही है। हाल ही में BJP ने TMC सरकार के खिलाफ १४ सूत्री चार्जशीट जारी की थी, जिसमें महिलाओं के खिलाफ अपराध और सिंडिकेट राज को प्रमुख मुद्दा बनाया गया था।

 ममता बनर्जी की रैली को TMC की चुनावी तैयारियों का हिस्सा माना जा रहा है। उन्होंने महिलाओं से अपील की कि वे “खड़ी रहें और धोखा न होने दें”। 

महिलाओं की सुरक्षा: तथ्य और बहस महिलाओं के खिलाफ अपराध पूरे देश में एक गंभीर मुद्दा है। NCRB के हालिया आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में इन मामलों की संख्या अधिक है। इनमें से कई राज्य बीजेपी शासित रहे हैं या हैं। वहीं पश्चिम बंगाल में भी कुछ प्रमुख घटनाएं (जैसे सैंडेशखाली) सुर्खियों में रहीं, जिन पर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है।

 TMC सरकार का दावा है कि कोलकाता कई वर्षों से सबसे सुरक्षित महानगरों में शामिल रहा है, जबकि BJP इसे खारिज करते हुए राज्य में कानून-व्यवस्था के पूर्ण पतन का आरोप लगाती है। 

 पुरुलिया रैली में ममता बनर्जी ने महिलाओं की सुरक्षा, कल्याण योजनाओं और बंगाल की संस्कृति के मुद्दों को केंद्र में रखकर BJP पर हमला बोला। यह रैली न केवल स्थानीय मुद्दों पर फोकस करती दिखी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर BJP की नीतियों की आलोचना भी की। 

चुनावी मौसम में दोनों प्रमुख दलों के बीच महिलाओं की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और विकास के मुद्दों पर तीखी बहस जारी है। आम जनता अब देख रही है कि इन आरोप-प्रत्यारोपों के बीच असली मुद्दों का समाधान कौन बेहतर तरीके से कर पाता है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 29,2026 
March 29, 2026

ट्रंप के खिलाफ 'नो किंग्स' आंदोलन: अमेरिका में ८०-९० लाख लोगों का ऐतिहासिक गुस्सा, ईरान युद्ध ने और भड़काया विरोध

ट्रंप के खिलाफ 'नो किंग्स' आंदोलन: अमेरिका में ८०-९० लाख लोगों का ऐतिहासिक गुस्सा, ईरान युद्ध ने और भड़काया विरोध
-Friday World March 29,2026 
वाशिंगटन/अटलांटा/मिनियापोलिस, २९ मार्च २०२६: अमेरिका की सड़कें एक बार फिर गूंज उठीं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दूसरी पारी के खिलाफ 'नो किंग्स' (No Kings) आंदोलन का तीसरा बड़ा दौर २८ मार्च २०२६ को पूरे देश में फैल गया। आयोजकों के अनुसार, **८० लाख से ९० लाख** लोगों ने ३,३०० से अधिक स्थानों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए। यह अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा एक दिवसीय गैर-हिंसक विरोध प्रदर्शन माना जा रहा है।

 प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप को "किंग" (राजा) कहकर संबोधित किया और नारे लगाए — "No Kings in America", "Trump Must Go Now", "No War on Iran", "Hands Off Our Democracy"। मुख्य मुद्दे थे: आक्रामक इमिग्रेशन एन्फोर्समेंट (ICE ऑपरेशंस), जिसमें हाल के गोलीकांड शामिल हैं, महंगाई, जीवनयापन की बढ़ती लागत और ईरान के साथ चल रही सैन्य कार्रवाई। 

 अटलांटा, वॉशिंगटन और मिशिगन में भारी भीड़ जॉर्जिया की अटलांटा में मेमोरियल ड्राइव पर हजारों लोग मार्च निकालकर राज्य कैपिटल पहुंचे। प्रदर्शनकारियों ने "We Are Losing Our Democracy" जैसे संदेश वाले बैनर लहराए। एक स्थानीय निवासी ने कहा, "चीजें सामान्य नहीं हैं। हम अपनी लोकतंत्र खो रहे हैं।" 

वॉशिंगटन डीसी में लिंकन मेमोरियल के पास उल्टा अमेरिकी झंडा लेकर लोग जमा हुए। "Fight Fascism" और "Trump is a Dictator" के नारे गूंजे। मिशिगन में १२८ स्थानों पर प्रदर्शन हुए। कांग्रेसवुमन राशिदा त्लैब ने लांसिंग में २,००० लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि ट्रंप प्रशासन इमिग्रेशन एजेंटों के जरिए समुदायों को आतंकित कर रहा है और ईरान युद्ध ने आम अमेरिकियों की जेब पर बोझ बढ़ा दिया है।

 मिनेसोटा के स्टेट कैपिटल में फ्लैगशिप रैली हुई, जहां ब्रूस स्प्रिंगस्टीन जैसी हस्तियों ने प्रदर्शनकारियों का मनोबल बढ़ाया। न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर, शिकागो, लॉस एंजेलिस, फिलाडेल्फिया और सिएटल समेत सभी प्रमुख शहरों में सड़कें प्रदर्शनकारियों से पट गईं। छोटे शहरों और उपनगरों में भी सैकड़ों रैलियां हुईं, जो इस आंदोलन की व्यापक पहुंच को दर्शाती हैं। 

 ईरान जंग ने विरोध को नई ऊर्जा दी ट्रंप प्रशासन द्वारा इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर सैन्य हमले (जिसमें ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले की धमकी भी शामिल है) ने विरोध को और तेज कर दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना युद्ध शुरू किया गया, जिससे गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। कई जगहों पर "No Blood for Oil" और "End the War on Iran" के बैनर दिखे। 

आयोजक समूह (Indivisible और अन्य प्रोग्रेसिव संगठनों का गठबंधन) ने इसे "अमेरिका में राजा नहीं" का संदेश बताया। उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन इमिग्रेशन एजेंटों को "सीक्रेट पुलिस" की तरह इस्तेमाल कर रहा है, जो समुदायों में आतंक फैला रहा है। हाल के ICE ऑपरेशंस में हुई गोलीबारी की घटनाएं (जैसे Renée Good, Keith Porter और Alex Pretti की मौत) ने गुस्से को भड़काया। 

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिध्वनि प्रदर्शन सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहे। एम्स्टर्डम, मैड्रिड, रोम, लंदन, पेरिस और कनाडा, ऑस्ट्रेलिया समेत १५ से अधिक देशों में रैलियां हुईं। प्रदर्शनकारियों ने वैश्विक लोकतंत्र और शांति की अपील की। यूरोपीय शहरों में भी "No Kings" बैनर और ईरान युद्ध के खिलाफ नारे सुनाई दिए। 

 ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट मार्च २०२६ के पोल्स में ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग ३६-४२% के बीच बताई जा रही है, जबकि डिसअप्रूवल ५६-६०% तक पहुंच गई है। ईरान युद्ध और इमिग्रेशन नीतियों ने उनकी लोकप्रियता को और नुकसान पहुंचाया है। स्वतंत्र मतदाताओं में असंतोष और ज्यादा है। आगामी मिडटर्म चुनावों को देखते हुए सियासी माहौल तेजी से गरम हो रहा है।

 व्हाइट हाउस ने इन प्रदर्शनों को "रेडिकल लेफ्ट" का काम बताया और कहा कि यह लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन नीतियां नहीं बदलेंगी। राष्ट्रपति ट्रंप फ्लोरिडा में गोल्फ खेलते नजर आए, जबकि देशभर में लाखों लोग सड़कों पर थे। 

प्रदर्शनकारियों की आवाज एक युवा प्रदर्शनकारी (अटलांटा) ने कहा, "हम इंट्रोवर्ट भी सड़क पर आ गए हैं क्योंकि स्थिति इतनी खराब है।" मिनियापोलिस में एक महिला ने बताया, "यह सिर्फ ट्रंप के खिलाफ नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य, शांति और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए है।" 

आयोजकों ने जोर दिया कि आंदोलन शांतिपूर्ण रहेगा, लेकिन निरंतर रहेगा। उन्होंने सभी ५० राज्यों में स्थानीय स्तर पर संगठन बनाने की अपील की। 

क्या कहते हैं विश्लेषक? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 'नो किंग्स' आंदोलन २०२५ के दो पिछले दौरों से ज्यादा प्रभावी साबित हो रहा है। यह न सिर्फ बड़े शहरों, बल्कि ग्रामीण और रिपब्लिकन इलाकों तक पहुंच रहा है। ईरान युद्ध जैसे मुद्दे ने इसे व्यापक जनसमर्थन दिलाया है। 

ट्रंप प्रशासन के आलोचक कहते हैं कि यह "अथॉरिटेरियन" रवैया अमेरिकी लोकतंत्र के लिए खतरा है। वहीं समर्थक इसे "राष्ट्र की सुरक्षा" के लिए जरूरी बताते हैं। 

आगे क्या? आगामी दिनों में और प्रदर्शन की संभावना है। संगठन 'No Kings' ने वेबसाइट पर स्थानीय लाइवस्ट्रीम और आगे की रणनीति साझा की है। यह आंदोलन न सिर्फ ट्रंप की नीतियों के खिलाफ है, बल्कि अमेरिका में लोकतंत्र, समानता और शांति की लड़ाई का प्रतीक बनता जा रहा है। 

अमेरिका की सड़कों पर लाखों लोगों का यह एकजुट प्रदर्शन इतिहास में दर्ज हो गया है। चाहे कोई इसे "लेफ्ट विंग" का प्रदर्शन कहे या "लोकतंत्र की आवाज", एक बात साफ है — अमेरिकी जनता चुप नहीं बैठने वाली।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 29,2026 
March 29, 2026

Waves of Unity on London’s Streets: Together Alliance’s Historic March Against Far-Right and Islamophobia

Waves of Unity on London’s Streets: Together Alliance’s Historic March Against Far-Right and Islamophobia
-Friday World March 29, 2026
On Saturday, 28 March 2026, the historic streets of London, the capital of Britain, once again echoed with the voices of unity. Thousands — and according to organisers, hundreds of thousands — of people took to the streets in a powerful show of solidarity against hatred, racism, and the rising tide of Islamophobia. 

→ The massive march, organised under the banner of the Together Alliance, is being described as the largest anti-far-right demonstration in British history. Starting from Park Lane and stretching through central London to Whitehall near the Houses of Parliament, the event became a vibrant symbol of diversity, hope, and collective resistance. 

→ A Sea of Diversity and Solidarity

 → People from across the country and from all walks of life joined the march — elderly citizens, young people, children, trade union activists, anti-racism campaigners, Muslim organisations, members of the Christian community, and ordinary citizens from diverse backgrounds. 

→ Organisers claimed that around **500,000** people participated, while the Metropolitan Police provided a lower estimate of approximately 500,000, noting that the dispersed nature of the crowd made an exact count difficult. 

→ Nearly 500 organisations supported the event, including the Muslim Council of Britain (MCB), Stand Up To Racism, various trade unions, the Federation of Student Islamic Societies (FOSIS), the British Turkish Association, the Palestinian Forum in Britain, and many others. Celebrities also added their voices in support of the cause against hatred. 

→ Demonstrators carried colourful placards with powerful messages such as “No to Racism, No to Trump”, “Refugees Welcome”, “Migrants Make Our NHS”, and “Love, Hope, Unity”. Chants like “Whose streets? Our streets!” and “No to hate, no to division!” filled the air. It was not merely a protest — it was a celebration of Britain’s multicultural society and its tradition of tolerance. 

 → Concern Over Hatred Entering the Mainstream 

→ Organisers and speakers emphasised that Islamophobia and far-right ideology are no longer fringe ideas. They are gradually infiltrating mainstream politics. 

→ Trade union activist Aadam Muuse told Al Jazeera that racism and Islamophobia have shifted from the margins into the heart of political discourse.

 → Dr. Abdullah Faliq, a key organiser from the Together Alliance, addressed the crowd powerfully: “London has over 1 million Muslims. This is our home — whether you like it or not. Britain is our home. We are part and parcel of this society.” 

→ He highlighted the broad support from major organisations including the Muslim Council of Britain, MEND, Strive UK, FOSIS, the British Turkish Association, and the Palestinian Forum in Britain, underscoring full backing from the British Muslim community. 

→ Dr. Wajid Akhtar (also referred to as Dr. Mohammed Wajid Akhter), Secretary General of the Muslim Council of Britain, thanked the organisers and delivered a message of unity. Green Party leader Zack Polanski also participated, while London Mayor Sir Sadiq Khan sent a video message of support. 

→ Many protesters pointed out that the growing popularity of far-right ideas, heated debates on immigration, and the rising influence of parties like Reform UK have deepened divisions in society. Several participants also carried messages in support of Palestine and against war, linking these issues to broader concerns about Islamophobia. 

→ A Peaceful March with Minimal Counter-Protests 

→ Despite heavy police presence, the march remained largely peaceful and orderly. Small-scale counter-protests appeared at a few points, but their numbers were negligible. → Police reported only a handful of arrests throughout the day, with the overall situation remaining under control. By around 5 pm, the Whitehall area began to clear as the rally concluded. 

→ This Together Alliance march was widely seen as a direct response to the large “Unite the Kingdom” rally organised by far-right groups in September 2025, which had drawn significant crowds. Organisers described their event as “a message of hope against hatred.” 

 → Why This March Matters 

→ Britain’s political climate has become increasingly polarised in recent years. The rise of far-right ideology, the spread of hate on social media, and certain incidents have heightened feelings of insecurity among Muslim communities and other minorities. 

→ In this context, the Together Alliance march sent a strong and clear message: Britain’s multicultural identity remains alive and vibrant, and ordinary people reject the politics of hatred and division. 

→ Kevin Courtney, a prominent figure with the Together Alliance, told the crowd in Whitehall: “Our estimate is now that there are half a million people on this demonstration — the biggest demonstration ever against the far right. And it gives us all confidence to carry on.” 

→ Whatever the exact numbers, the core message was unmistakable: unity is strong, and hatred is weak

→ The Road Ahead: Dialogue and Inclusion 

→ This was not just a one-day event. It forces British society to reflect on how to confront racism, Islamophobia, and divisive politics effectively. 

→ The strong participation of trade unions and civil society groups showed that the issue concerns the entire society, not just one community. 

→ Speakers stressed that education, open dialogue, and inclusive policies are essential for reducing hatred in the long term. The large turnout of young people brought fresh hope that the new generation is ready to rise above old divisive thinking and build a better, more united Britain. 

→ A Victory for Unity 
→ The London march of 28 March 2026 will be remembered as a historic moment. Regardless of debates over attendance figures, the image is clear — thousands upon thousands of people stood hand in hand, firmly against hatred. 

→ The Together Alliance proved that when society comes together, dark forces retreat. 

→ This march was more than protest — it was a joyful celebration of **love, hope, and unity**. The message that rang out across London’s streets will echo far and wide: We stand together, we are strong, and we choose unity over hatred. 
Sajjadali Nayani ✍
Friday World March 29, 2026
March 29, 2026

लंदन की सड़कों पर एकता की लहर: फार-राइट और इस्लामोफोबिया के खिलाफ Together Alliance का ऐतिहासिक मार्च

लंदन की सड़कों पर एकता की लहर: फार-राइट और इस्लामोफोबिया के खिलाफ Together Alliance का ऐतिहासिक मार्च-Friday World March 29,2026
शनिवार, 28 मार्च 2026 को ब्रिटेन की राजधानी लंदन  की ऐतिहासिक सड़कें एक बार फिर गूंज उठीं। हजारों—बल्कि आयोजकों के अनुसार लाखों—लोग नफरत, नस्लवाद और बढ़ते इस्लामोफोबिया के खिलाफ एकजुट होकर सड़कों पर उतर आए। Together Alliance के बैनर तले निकाले गए इस विशाल मार्च को ब्रिटेन के इतिहास का सबसे बड़ा एंटी-फार-राइट प्रदर्शन बताया जा रहा है। पार्क लेन से शुरू होकर व्हाइटहॉल (Whitehall) तक फैला यह मार्च विविधता, एकता और उम्मीद का प्रतीक बन गया। 

 विविधता का रंगीन समुद्र इस मार्च में देशभर से लोग शामिल हुए—बुजुर्ग, युवा, बच्चे, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता, एंटी-रेसिज्म कैंपेनर्स, मुस्लिम संगठन, ईसाई समुदाय के सदस्य और अलग-अलग पृष्ठभूमि के आम नागरिक। आयोजकों का दावा है कि करीब 5 लाख लोगों ने हिस्सा लिया, जबकि मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने भीड़ को करीब 5 लाख से ज्यादा बताया। इतनी बड़ी भीड़ को सटीक गिनना मुश्किल था, क्योंकि लोग सड़कों पर फैले हुए थे। 

मार्च में लगभग 500 संगठन शामिल थे, जिनमें मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन (MCB), स्टैंड अप टू रेसिज्म, ट्रेड यूनियंस, फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट इस्लामिक सोसाइटीज (FOSIS), ब्रिटिश टर्किश एसोसिएशन, पैलेस्टाइन फोरम इन ब्रिटेन और कई अन्य शामिल थे। सेलिब्रिटी भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बने, जिन्होंने नफरत के खिलाफ आवाज बुलंद की।

 लोगों ने हाथों में प्लेकार्ड्स थाम रखे थे—“No to Racism, No to Trump”, “Refugees Welcome”, "Migrants Make Our NHS” और “Love, Hope, Unity” जैसे संदेशों वाले। स्लोगन गूंज रहे थे—“Whose streets? Our streets!” और “No to hate, no to division!”। यह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि ब्रिटिश समाज की बहुलता और सहिष्णुता का जश्न था। 

 मुख्यधारा में घुसती नफरत की चिंता आयोजकों और वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि इस्लामोफोबिया और फार-राइट सोच अब किनारे की घटना नहीं रही। यह धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीति में जगह बना रही है। ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट आदम मुसे ने अल जजीरा से बात करते हुए कहा कि रेसिज्म और इस्लामोफोबिया फ्रिंज से मुख्यधारा में शिफ्ट हो गया है। 

Dr. Abdullah Faliq, Together Alliance के आयोजक, ने भाषण में कहा: “लंदन में एक मिलियन से ज्यादा मुस्लिम हैं। यह हमारा घर है—चाहे आप इसे पसंद करें या नहीं। ब्रिटेन हमारा घर है। हम इस समाज का अभिन्न हिस्सा हैं।” उन्होंने MCB, MEND, Strive UK और अन्य संगठनों का जिक्र करते हुए मुस्लिम समुदाय का पूर्ण समर्थन बताया। 

Dr. Wajid Akhtar, मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन के सेक्रेटरी जनरल, ने भीड़ को संबोधित करते हुए आयोजकों का शुक्रिया अदा किया और एकता का संदेश दिया। ग्रीन पार्टी के नेता जैक पोलांस्की भी शामिल हुए, जबकि लंदन के मेयर सादिक खान ने वीडियो मैसेज भेजा।

 प्रदर्शनकारियों का कहना था कि हाल के वर्षों में फार-राइट की बढ़ती लोकप्रियता, इमिग्रेशन पर बहस और कुछ राजनीतिक दलों (जैसे रिफॉर्म यूके) की बढ़ती ताकत ने समाज में बंटवारा पैदा किया है। कई लोगों ने पैलेस्टाइन समर्थन और एंटी-वार संदेश भी दिए, जो इस्लामोफोबिया से जुड़े मुद्दों को और व्यापक बनाते हैं। 
 शांतिपूर्ण प्रदर्शन और छोटे काउंटर-प्रोटेस्ट पुलिस की भारी तैनाती के बावजूद मार्च शांतिपूर्ण रहा। कुछ जगहों पर छोटे स्तर पर काउंटर-प्रोटेस्ट देखने को मिले, लेकिन उनकी संख्या नगण्य थी। पुलिस ने बताया कि पूरे दिन कुछ गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन कुल मिलाकर स्थिति नियंत्रण में रही। शाम 5 बजे के आसपास व्हाइटहॉल क्षेत्र खाली होने लगा। 

यह मार्च सितंबर 2025 के “Unite the Kingdom” रैली का जवाब भी माना जा रहा है, जिसमें फार-राइट समर्थक बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरे थे। Together Alliance ने इसे “नफरत के खिलाफ उम्मीद का जवाब” बताया। 

क्यों मायने रखता है यह मार्च? ब्रिटेन में आजकल राजनीतिक माहौल काफी ध्रुवीकृत है। फार-राइट विचारधारा का उदय, सोशल मीडिया पर फैलती नफरत और कुछ घटनाओं ने मुस्लिम समुदाय समेत अल्पसंख्यकों में असुरक्षा बढ़ाई है। इस संदर्भ में Together Alliance का मार्च एक मजबूत संदेश देता है—कि ब्रिटेन की बहुसांस्कृतिक पहचान अभी भी जिंदा है और आम लोग नफरत की राजनीति को स्वीकार नहीं करते। 

आयोजक केविन कोर्टनी ने व्हाइटहॉल में कहा: “हमारा अनुमान है कि यहां आधा मिलियन लोग हैं—फार-राइट के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन।” यह आंकड़ा चाहे कितना भी हो, संदेश साफ है: एकता मजबूत है, नफरत कमजोर।

आगे की राह: संवाद और समावेश यह प्रदर्शन सिर्फ एक दिन की घटना नहीं। यह ब्रिटेन के समाज को सोचने पर मजबूर करता है—कैसे हम नस्लवाद, इस्लामोफोबिया और विभाजनकारी राजनीति से निपटें? ट्रेड यूनियंस और सिविल सोसाइटी ग्रुप्स का एक साथ आना दिखाता है कि मुद्दा सिर्फ मुस्लिम समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। 

कई वक्ताओं ने जोर दिया कि शिक्षा, संवाद और समावेशी नीतियां ही लंबे समय में नफरत को कम कर सकती हैं। युवाओं की बड़ी भागीदारी ने उम्मीद जगाई कि नई पीढ़ी पुरानी विभाजनकारी सोच से ऊपर उठकर एक बेहतर ब्रिटेन का सपना देख रही है। 

एकता की जीत लंदन का यह मार्च इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा। चाहे संख्या पर बहस हो, लेकिन तस्वीर साफ है—हजारों लोग हाथों में हाथ डाले, नफरत के खिलाफ खड़े हुए। Together Alliance ने साबित कर दिया कि जब समाज एकजुट होता है, तो अंधेरी ताकतें पीछे हट जाती हैं। 

यह मार्च सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि प्यार, आशा और एकता का जश्न था। ब्रिटेन की सड़कों पर गूंजा यह संदेश दूर-दूर तक जाएगा: हम साथ हैं, हम मजबूत हैं, और हम नफरत नहीं, एकता चुनते हैं। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 29,2026