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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 19 April 2026

April 19, 2026

सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर चरमराती व्यवस्था: गैस संकट ने मचा दिया पलायन का तूफान, 24 घंटे की कतार में भूखे-प्यासे मजदूरों ने कूदी बाउंड्री, पुलिस का लाठीचार्ज

सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर चरमराती व्यवस्था: गैस संकट ने मचा दिया पलायन का तूफान, 24 घंटे की कतार में भूखे-प्यासे मजदूरों ने कूदी बाउंड्री, पुलिस का लाठीचार्ज-Friday World-April 20,2026 
19 अप्रैल 2026। गुजरात की टेक्सटाइल राजधानी सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जो दिल दहला देने वाला था। हजारों प्रवासी श्रमिक — हाथों में सामान, बच्चों को गोद में लिए, कुछ की आंखों में घर लौटने की बेचैनी और कुछ के चेहरों पर थकान — स्टेशन के बाहर 3 से 5 किलोमीटर तक लंबी कतार में खड़े थे। गर्मी का पारा चढ़ा हुआ था, प्यास लगी थी, भूख सता रही थी, लेकिन ट्रेन नहीं आ रही थी। धैर्य टूटा तो भगदड़ मच गई। कुछ लोग बाउंड्री दीवार कूदकर प्लेटफॉर्म पर पहुंचने की कोशिश करने लगे। स्थिति को काबू में लाने के लिए रेलवे पुलिस और आरपीएफ को लाठीचार्ज करना पड़ा।

यह महज गर्मी की छुट्टियों या शादी सीजन की भीड़ नहीं थी। असली वजह थी — एलपीजी सिलेंडर का गंभीर संकट। ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण मध्य पूर्व से आने वाली गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिसकी मार सूरत जैसे शहरों में रहने वाले लाखों प्रवासी मजदूरों पर पड़ी।

 गैस नहीं तो गुजारा नहीं — मजदूरों का पलायन

सूरत में हीरा और टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से आते हैं। पिछले एक-दो महीनों से घरेलू गैस सिलेंडर बाजार में गायब हो गए। जहां पहले 1000-1200 रुपये में सिलेंडर मिल जाता था, वहां अब ब्लैक में 4000-5000 रुपये तक की मांग हो रही थी। कई परिवारों के लिए खाना बनाना मुश्किल हो गया।

मजदूरों ने बताया — “रसोई में चूल्हा जलता ही नहीं। बच्चे भूखे सो जाते हैं। काम तो है, लेकिन घर चलाने लायक गैस नहीं है।” नतीजा? फैक्टरियां भी प्रभावित होने लगीं और मजदूर परिवार समेत गांव लौटने लगे। उधना स्टेशन पर रोजाना 7000 से ज्यादा यात्री जमा हो गए। सामान्य दिनों में दो-तीन ट्रेनें पर्याप्त होती थीं, लेकिन इस बार भीड़ तीन गुनी हो गई।
 24 घंटे की कतार, बाउंड्री कूदना और लाठीचार्ज

स्टेशन के बाहर लाइन 3 किलोमीटर से ज्यादा लंबी हो गई। लोग 16-18 घंटे से ज्यादा खड़े रहे। पानी की सुविधा न के बराबर थी। जब रेलवे प्रशासन ने आखिरकार पानी की व्यवस्था की, तो तृष्णार्त लोग एक-दूसरे के हाथ से बोतलें छीनने लगे। एक हृदयविदारक दृश्य भी देखने को मिला — एक युवक अपनी पत्नी की अस्थियों का कलश हाथ में लिए घंटों ट्रेन में चढ़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन भीड़ में जगह नहीं मिली।

धैर्य खत्म होने पर कुछ लोग बाउंड्री दीवार फांदकर अंदर घुसने लगे। सुरक्षा बलों ने स्थिति संभालने के लिए हल्का लाठीचार्ज किया। दो मजदूर गर्मी और भीड़ में बेहोश भी हो गए। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गए, जिसमें भगदड़ और पुलिस की कार्रवाई साफ दिख रही थी।

 रेलवे की नाकामी और प्रशासनिक तैयारी की कमी

मुसाफिरों का आरोप है कि हर साल गर्मी की छुट्टियों और शादी सीजन में भीड़ बढ़ती है, फिर भी रेलवे पहले से कोई विशेष व्यवस्था नहीं करता। इस बार तो एलपीजी संकट ने स्थिति और बिगाड़ दी। उपलब्ध ट्रेनों की संख्या बेहद कम थी। स्पेशल ट्रेनें चलाने या अतिरिक्त कोच लगाने की मांग की गई, लेकिन तत्काल कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

पश्चिम रेलवे ने बाद में बयान जारी कर कहा कि स्थिति नियंत्रण में है और अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बता रही थी।

गैस संकट की जड़ें और व्यापक प्रभाव

यह संकट अचानक नहीं आया। मध्य पूर्व (विशेषकर ईरान) में बढ़ते तनाव के कारण एलपीजी और संबंधित गैसों की आयात आपूर्ति प्रभावित हुई। भारत दुनिया का बड़ा एलपीजी आयातक है। जब अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन दबाव में आती है, तो सबसे पहले गरीब और मध्यम वर्ग प्रभावित होता है। सूरत जैसे औद्योगिक शहर में यह संकट और गहरा हो गया क्योंकि यहां लाखों मजदूर परिवार रहते हैं।

टेक्सटाइल उद्योग भी चिंता में है। मजदूरों के पलायन से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। कई यूनिट्स ने कामकाजी घंटे कम कर दिए या अस्थायी छुट्टियां घोषित कर दीं।

 क्या सबक मिलेगा?

यह घटना कई सवाल खड़े करती है:
- क्या केंद्र और राज्य सरकारें गैस आपूर्ति की वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे घरेलू उत्पादन बढ़ाना, रणनीतिक भंडारण) पर पर्याप्त काम कर रही हैं?
- क्या रेलवे बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति में स्पेशल ट्रेनों और बेहतर क्राउड मैनेजमेंट के लिए तैयार है?
- क्या प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को केवल चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय स्थायी समाधान निकाला जाएगा?

उधना स्टेशन पर जो दृश्य देखे गए, वे केवल एक स्टेशन की कहानी नहीं हैं। वे उन लाखों अजान परिवारों की पीड़ा की कहानी हैं जो शहरों में मेहनत करके देश की अर्थव्यवस्था चलाते हैं, लेकिन संकट के समय सबसे पहले असुरक्षित हो जाते हैं।

पानी की बोतल के लिए लूट, बेहोश होते मजदूर, बाउंड्री फांदते लोग और लाठी की मार — ये दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्मनाक हैं। समय आ गया है कि सरकारें न सिर्फ तत्काल राहत दें, बल्कि लंबे समय के लिए मजबूत नीतियां बनाएं ताकि गैस जैसे बुनियादी जरूरत का संकट फिर कभी इतना भयानक रूप न ले।

उधना रेलवे स्टेशन की यह घटना महज भीड़ प्रबंधन की नाकामी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक-आर्थिक संकट का संकेत है। एलपीजी संकट ने दिखा दिया कि वैश्विक घटनाएं कितनी तेजी से आम भारतीयों की जिंदगी प्रभावित कर सकती हैं। अब जरूरत है त्वरित कार्रवाई की — अतिरिक्त ट्रेनें, गैस आपूर्ति बहाल करना, मजदूरों को सहायता और भविष्य के लिए बेहतर तैयारी।

अन्यथा ऐसे दृश्य बार-बार दोहराए जाएंगे, और हर बार मजदूरों की पीड़ा बढ़ती ही जाएगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026 
April 19, 2026

ईरान की सस्ती ड्रोन रणनीति ने महंगे युद्ध को बदल दिया: हॉर्मुज में भारत के टैंकरों पर गोलीबारी और हमारी डिप्लोमेसी की चुप्पी

ईरान की सस्ती ड्रोन रणनीति ने महंगे युद्ध को बदल दिया: हॉर्मुज में भारत के टैंकरों पर गोलीबारी और हमारी डिप्लोमेसी की चुप्पी
-Friday World-April 20,2026
अप्रैल 2026। विश्व के सबसे व्यस्त तेल मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में दो भारतीय ध्वज वाले तेल टैंकरों पर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के गनबोट्स ने अचानक गोलीबारी कर दी। एक सुपरटैंकर लगभग 20 लाख बैरल इराकी क्रूड ऑयल ले जा रहा था। क्रू सदस्यों के डिस्ट्रेस कॉल में साफ सुनाई दिया — “तुमने हमें क्लियरेंस दी थी, फिर गोली क्यों चला रहे हो?” जाहाजों को रास्ता बदलना पड़ा, लेकिन कोई जान-माल की हानि नहीं हुई।

यह घटना महज एक स्थानीय टकराव नहीं थी। यह उस बड़े युद्ध की एक कड़ी है जिसमें ईरान ने महंगे हथियारों के बजाय सस्ती ड्रोन रणनीति से अमेरिका-इजराइल गठबंधन को आर्थिक और सैन्य रूप से जकड़ लिया है। और इसी बीच भारत खड़ा है — चुप, असमंजस में, जहां एक तरफ ऊर्जा सुरक्षा का खतरा है तो दूसरी तरफ डिप्लोमेसी की नाकामी।

 राहुल गांधी की दो साल पुरानी चेतावनी आज सही साबित हो रही है

करीब दो साल पहले राहुल गांधी ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर बार-बार कहा था — “भारत को महंगे रक्षा सौदों से बचना चाहिए। ड्रोन युद्ध का भविष्य हैं। हमें बैटरी, मोटर, ऑप्टिक्स, कैमरा जैसी ड्रोन कंपोनेंट्स पर फोकस करना चाहिए।” उन्होंने चीनी ड्रोन का उदाहरण देते हुए भारत की धीमी प्रगति पर सवाल उठाए थे।

आज ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष में यही बात साबित हो रही है। ईरान के शाहेद-136 जैसे सस्ते ‘कामिकाजे’ ड्रोन की कीमत मात्र 20,000 से 50,000 डॉलर है। वहीं अमेरिका के पैट्रियट इंटरसेप्टर की कीमत 40 लाख डॉलर से ज्यादा, THAAD 1 करोड़ डॉलर के आसपास और कुछ एडवांस्ड मिसाइलें उससे भी महंगी।
ईरान ने सैकड़ों-हजारों सस्ते ड्रोन उड़ाकर अमेरिकी और इजराइली एयर डिफेंस को “सैचुरेट” (भरमार) कर दिया। एक महंगा इंटरसेप्टर एक सस्ते ड्रोन को मारने में खर्च हो रहा है — और ईरान के पास ड्रोन की संख्या लगातार बढ़ रही है। परिणाम? अमेरिका की मिसाइल स्टॉक तेजी से खाली हो रही है, जबकि ईरान का आर्थिक नुकसान न्यूनतम।

यह “असिमेट्रिक वॉरफेयर” का क्लासिक उदाहरण है — कम खर्च में ज्यादा दबाव। ईरान ने दिखा दिया कि आधुनिक युद्ध में हिम्मत के साथ स्मार्ट स्ट्रैटेजी भी उतनी ही जरूरी है।

 हॉर्मुज स्ट्रेट: ईरान ने आर्थिक गला घोंट दिया

हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल व्यापार का करीब 20% हिस्सा संभालता है। ईरान ने अमेरिकी ब्लॉकेड के जवाब में इस स्ट्रेट पर कड़ाई बढ़ा दी। पहले खोलने का ऐलान, फिर अचानक बंदी और भारतीय टैंकरों पर फायरिंग — यह संदेश साफ था: “अगर हमारा तेल नहीं निकल सकता, तो तुम्हारा भी नहीं।”

भारत के लिए यह चेतावनी बेहद गंभीर है। हम ईरान से सस्ता तेल आयात करते रहे हैं। चाबहार पोर्ट हमारा सेंट्रल एशिया तक पहुंच का रास्ता है। लेकिन जब दो भारतीय टैंकरों पर गोली चली, तो विदेश मंत्रालय ने केवल “गहरी चिंता” जताई और ईरानी राजदूत को तलब किया। ईरानी राजदूत ने भरोसा दिलाया कि मामला तेहरान पहुंचाएंगे — बस।

कोई ठोस डिप्लोमेटिक पहल, कोई बैकचैनल बातचीत, कोई क्षेत्रीय देशों के साथ समन्वय — कुछ नहीं दिखा।

 मोदी सरकार की “इजराइल यात्रा” और भारत की अनुपस्थिति

फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा के ठीक बाद अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए। मोदी ने इजराइली संसद (Knesset) में कहा — “भारत इजराइल के साथ मजबूती से खड़ा है।” ईरान का जिक्र तक नहीं किया, जबकि ईरान भारत का पुराना दोस्त और ऊर्जा साझेदार रहा है।

इस यात्रा और उसके बाद की चुप्पी ने भारत को “न्यूट्रल” की बजाय “इजराइल-अमेरिका कैंप” में दिखा दिया। नतीजा? ईरान के साथ हमारे संबंधों में दरार, हॉर्मुज में भारतीय जहाजों की सुरक्षा पर सवाल और क्षेत्रीय प्रभाव में कमी।

विपक्ष कह रहा है — मोदी जी को चुनाव लड़ने और इजराइल यात्राओं के अलावा डिप्लोमेसी में समय नहीं मिलता। जबकि राहुल गांधी जैसे नेता ड्रोन और स्वदेशी रक्षा पर फोकस की बात करते रहे। आज जब ईरान सस्ते ड्रोन से महंगे युद्ध को जीत रहा है, तो भारत को अपनी रक्षा रणनीति पर फिर से सोचना चाहिए — महंगे सौदों की जगह स्वदेशी ड्रोन उत्पादन, बैटरी टेक्नोलॉजी और असिमेट्रिक क्षमताओं पर।

 क्या सिखाता है ईरान का यह “ड्रोन इकोनॉमी” मॉडल?

1. लागत का खेल: सस्ते हथियार महंगे डिफेंस को थका देते हैं। ईरान ने हजारों ड्रोन उड़ाकर अमेरिकी स्टॉक खाली कर दी।
2. मास प्रोडक्शन: ईरान महीने में सैकड़ों ड्रोन बना रहा है। भारत को भी DRDO, HAL और प्राइवेट सेक्टर के साथ मिलकर स्वदेशी ड्रोन इकोसिस्टम बनाना चाहिए।
3. डिप्लोमेसी की जरूरत: सिर्फ सैन्य ताकत नहीं, बैलेंस्ड फॉरेन पॉलिसी भी जरूरी। ईरान, इजराइल, अमेरिका और अरब देशों के बीच भारत को “ब्रिज” बनना चाहिए, न कि किसी एक पक्ष में दिखना।
4. ऊर्जा सुरक्षा: हॉर्मुज पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक रूट (चाबहार, INSTC), रणनीतिक तेल भंडार और स्वच्छ ऊर्जा पर तेजी से काम करना होगा।

भारत के सामने चुनौतियां और अवसर

यह युद्ध भारत के लिए सबक है। हम दुनिया की सबसे बड़ी तेल आयातक अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं। अगर हॉर्मुज अस्थिर रहा तो तेल की कीमतें बढ़ेंगी, महंगाई बढ़ेगी और विकास प्रभावित होगा।

समय आ गया है कि हम:
- स्वदेशी ड्रोन और एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी पर भारी निवेश करें।
- डिप्लोमेसी को मजबूत करें — ईरान के साथ पुराने संबंधों को नजरअंदाज न करें।
- रक्षा खरीद में “महंगा = बेहतर” वाली सोच से ऊपर उठें।
- क्षेत्रीय संघर्ष में अपनी भूमिका को स्पष्ट लेकिन बैलेंस्ड रखें।

ईरान ने दिखाया कि स्ट्रैटेजी और हिम्मत से छोटा देश भी बड़े गठबंधनों को टक्कर दे सकता है। भारत जैसे विशाल, युवा और तकनीकी रूप से सक्षम देश को इस सबक को समझना चाहिए।

अगर हम आज ड्रोन और स्मार्ट रक्षा पर फोकस नहीं करेंगे, तो कल महंगे सौदों की कीमत चुकानी पड़ेगी — न सिर्फ पैसे में, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक प्रतिष्ठा में भी।

ईरान की ड्रोन रणनीति ने साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध में “महंगा” हमेशा “बेहतर” नहीं होता। राहुल गांधी की पुरानी चेतावनी आज प्रासंगिक है। भारत को अब महज दर्शक नहीं, बल्कि स्मार्ट प्लेयर बनना होगा — जहां डिप्लोमेसी हो, स्वदेशी तकनीक हो और राष्ट्रीय हित सबसे ऊपर हो।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 20,2026
April 19, 2026

હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં ઈરાની ગોળીબાર: બે ભારતીય તેલ ટેન્કરો પર હુમલો, જહાજોને રસ્તો બદલવો પડ્યો – ભારતે વ્યક્ત કરી ગંભીર ચિંતા

હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં ઈરાની ગોળીબાર: બે ભારતીય તેલ ટેન્કરો પર હુમલો, જહાજોને રસ્તો બદલવો પડ્યો – ભારતે વ્યક્ત કરી ગંભીર ચિંતા
-Friday World-April 19,2026
અપ્રિલ 2026ના આ અઠવાડિયે વિશ્વના સૌથી મહત્વપૂર્ણ સમુદ્રી માર્ગ સ્ટ્રેટ ઑફ હોર્મુઝ માં એક ચોંકાવનારી ઘટના બની છે. ઈરાનના રિવોલ્યુશનરી ગાર્ડ્સ (IRGC)ના ગનબોટ્સે બે ભારતીય ધ્વજવાળા તેલ ટેન્કરો પર ગોળીબાર કર્યો. આ હુમલાને કારણે જહાજોએ પોતાનો માર્ગ બદલીને પાછા વળવું પડ્યું. ક્રૂ સભ્યો સુરક્ષિત છે, પરંતુ આ ઘટનાએ વૈશ્વિક તેલ પુરવઠા અને ભારતની ઊર્જા સુરક્ષા પર નવા પ્રશ્નો ઊભા કર્યા છે.

 ઘટના શું હતી?
શનિવારે (18 અપ્રિલ 2026) હોર્મુઝ સ્ટ્રેટમાં બે ભારતીય-ધ્વજવાળા વેસલ્સ પર IRGCના ગનબોટ્સે અચાનક ફાયરિંગ કર્યું. આમાંનું એક મોટું સુપરટેન્કર હતું જે લગભગ 20 લાખ બેરલ ઈરાકી ક્રૂડ ઓઈલ લઈને જઈ રહ્યું હતું. બીજું વેસલ પણ તેલ અથવા સંબંધિત કાર્ગો લઈને હતું.

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મેરિટાઈમ ટ્રેકિંગ એજન્સીઓ (જેમ કે TankerTrackers અને UK Maritime Trade Operations) અનુસાર, IRGCના ગનબોટ્સે રેડિયો વોર્નિંગ વિના અથવા ઓછા વોર્નિંગ સાથે ફાયરિંગ શરૂ કર્યું. કેપ્ટનના ઓડિયોમાં સંભળાય છે કે તેઓ ઈરાની નેવીને પૂછી રહ્યા હતા: “તમે અમને ક્લિયરન્સ આપી હતી, પછી ગોળીબાર કેમ કરો છો?” આ છતાં જહાજોને પાછા વળવું પડ્યું.

કોઈ જાનહાનિ થઈ નથી અને ક્રૂ સુરક્ષિત છે, પરંતુ જહાજોએ રસ્તો બદલીને પશ્ચિમ તરફ વળવું પડ્યું. આ ઘટના એવા સમયે બની જ્યારે ઈરાને હોર્મુઝ સ્ટ્રેટને “ખુલ્લું” જાહેર કર્યા પછી તરત જ ફરીથી કડક નિયંત્રણ લાગુ કર્યું હતું. ઈરાન આને અમેરિકાના બ્લોકેડના જવાબ તરીકે જુએ છે.

 ભારતની પ્રતિક્રિયા: દૂતાવાસ તલબ, વિરોધ નોંધાવ્યો
ભારત સરકારે ઘટનાને “ગંભીર” માનીને તરત જ પગલાં લીધાં. વિદેશ મંત્રાલયે ઈરાનના રાજદૂત ડો. મોહમ્મદ ફથાલી ને તલબ કર્યા. વિદેશ સચિવ વિક્રમ મિસરીએ ઈરાની રાજદૂત સાથે બેઠકમાં “ઊંડી ચિંતા” વ્યક્ત કરી અને સમુદ્રી સુરક્ષા તેમજ નેવિગેશનની સ્વતંત્રતા પર ભાર મૂક્યો.

ભારતે યાદ કરાવ્યું કે અત્યાર સુધી ઈરાન ભારતીય જહાજોના સુરક્ષિત પરિવહનમાં સહયોગ આપતું આવ્યું છે. તેથી આવી ઘટના અપેક્ષિત નથી. ભારતે ઈરાનને અપીલ કરી છે કે ભારત તરફ આવતાં-જતાં જહાજો માટે હોર્મુઝમાં અવરોધ વિનાનું, સુરક્ષિત પરિવહન સુનિશ્ચિત કરવામાં આવે.

ઈરાની રાજદૂતે ભારતના વિરોધને તેહેરાન સુધી પહોંચાડવાનો ભરોસો આપ્યો છે.

ટ્રમ્પની પ્રેસ બ્રીફિંગમાં પ્રશ્ન, જવાબમાં માત્ર “થેંક યુ”
આ જ દિવસે વ્હાઈટ હાઉસની ઓવલ ઑફિસમાં પ્રેસ બ્રીફિંગ દરમિયાન અમેરિકી રાષ્ટ્રપતિ **ડોનાલ્ડ ટ્રમ્પ**ને આ ઘટના વિશે પ્રશ્ન પૂછવામાં આવ્યો. પ્રશ્ન હતો: “ભારતીય ઝંડાવાળા બે જહાજો પર ફાયરિંગ થયું છે, તેના વિશે તમે શું કહેશો?”

ટ્રમ્પે સીધો જવાબ આપવાને બદલે માત્ર “થેંક યુ” કહીને પ્રેસ કોન્ફરન્સ સમાપ્ત કરી દીધી. આ પ્રશ્ન અંતમાં પૂછાયો હતો, જ્યારે બ્રીફિંગ પૂરી થવાની તૈયારી હતી.

પૃષ્ઠભૂમિ: હોર્મુઝ સ્ટ્રેટનું મહત્વ અને તાજેતરના તણાવ
હોર્મુઝ સ્ટ્રેટ વિશ્વના તેલના લગભગ 20% વેપારનું મુખ્ય દ્વાર છે. ઈરાન અને અમેરિકા વચ્ચેના તાજેતરના તણાવમાં ઈરાને આ માર્ગને બ્લોક કરવાની અને નિયંત્રણમાં લેવાની ધમકી આપી હતી. અમેરિકાએ ઈરાની પોર્ટ્સ પર બ્લોકેડ લગાવ્યો છે, જેના જવાબમાં ઈરાને સ્ટ્રેટ પર કડક નિયંત્રણ લાગુ કર્યું છે.

ભારત માટે આ માર્ગ અત્યંત મહત્વપૂર્ણ છે કારણ કે તે તેલની આયાત માટે મુખ્ય રૂટ છે. આ ઘટના ભારતીય જહાજો અને ક્રૂની સુરક્ષા તેમજ ઊર્જા સુરક્ષા માટે ચિંતાનું કારણ બની છે.

 આગળ શું?
ભારતે ઈરાન સાથે ડિપ્લોમેટિક ચેનલો દ્વારા વાતચીત ચાલુ રાખી છે અને સુરક્ષિત પસાર થવાની વ્યવસ્થા માટે અપીલ કરી છે. આ ઘટના વૈશ્વિક સ્તરે તેલના ભાવ અને માર્ગીય સુરક્ષા પર અસર કરી શકે છે.

હોર્મુઝમાં શાંતિ અને સ્વતંત્ર નેવિગેશન જાળવવું એ વિશ્વના તમામ દેશો માટે જરૂરી છે. ભારત જેવા મોટા તેલ આયાતકાર દેશો માટે આ મુદ્દો વ્યૂહાત્મક રીતે અત્યંત સંવેદનશીલ છે.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 19,2026
April 19, 2026

ज्योतिष के फेर मे हुआ बंटाधार

ज्योतिष के फेर मे हुआ बंटाधार 
-Friday World-April 19,2026 
राजनैतिक व्यंग्य-समागम

1. ज्योतिष के फेर में हुआ बंटाधार : विष्णु नागर

विद्वानों की बात विद्वान जानें, मगर मुझे लगता है कि नरेन्द्र मोदी ने जिद करके पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के बीचों-बीच संसद का विशेष अधिवेशन बुलाने की जो गफलत की, उसके पीछे कोई बड़ी चाल नहीं रही होगी, बल्कि मूर्खता पर इनका दिनों-दिन गहरा होता विश्वास रहा होगा। मूर्खता और क्रूरता के बगैर ये चार कदम भी चल नहीं सकते! दो कदम के बाद ही हांपने लगते हैं!

तो किसी ज्योतिषी को इन्होंने बुलाया होगा कि महाराज ये बताएं कि लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक के बहाने हिंदी प्रदेशों पर स्थायी कब्जा करने की जो कूट चाल हम चलना चाहते हैं, वह किस शुभ मुहूर्त में सफल होगी! 

सच्चा ज्योतिषी वही होता है, जो अपने मोटे- तगड़े जजमान के सामने उसके मन की बात कहे। तो उस ज्योतिषी ने तत्काल अमित शाह की उपस्थिति में मोदी जी के सामने कुछ फर्जी जोड़-बाकी-गुणा-भाग करके बताया होगा कि राजाधिराज, यह शुभ काम आप 16 से 18 अप्रैल के बीच करें, तो दुनिया की कोई ताकत आपके इस विजय अभियान को रोक नहीं पाएगी। विपक्ष आपके चरणों में शीश रख देगा और संसद में वह आपकी जय-जयकार इतनी जोर से करेगा कि एनडीए गठबंधन के दल के नेता भी देखते रह जाएंगे! यह मुहूर्त हुजूर इतना अधिक लाभकर है कि आप प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की ऐसी अनोखी मिसाल कायम कर जाएंगे, जो दुनिया में आज तक किसी ने न की होगी। आप 2049 तक तो देश के प्रधानमंत्री रहेंगे ही रहेंगे और हुजूर, गणना तो यह भी बताती है कि आप उसके बाद भी प्रधानमंत्री बने रहेंगे। अगर आपकी इच्छा इस बीच राष्ट्रपति बनने की हुई, तो वह इच्छा भी आप जिस दिन चाहेंगे, ठीक उसी दिन पूरी हो जाएगी। आपकी जन्मकुंडली और आपके हाथ की रेखाएं बताती हैं कि आप सौ वर्ष की उम्र के बाद भी आज की तरह स्वस्थ रहेंगे और प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पद पर रहेंगे और हुजूर योग तो इतने तगड़े हैं कि ऐसा समय भी आ सकता है कि दोनों पदों को आप ही शोभायमान करें। इस जीवन में कोई आपसे ये पद छीन नहीं सकता। आप बुरा न मानें, तो इसके आगे की भविष्यवाणी भी कर दूं कि जब भी आप इस दुनिया से स्वेच्छा से प्रयाण करने का विचार करेंगे, आप पद और उसकी कुर्सी समेत स्वर्ग की ओर प्रस्थान करेंगे। इंद्र आदि देवता आप पर वहां पुष्प वर्षा करेंगे। वहां आपके लिए रेड कार्पेट बिछेगा और देवतागण आपके इतने पीछे चलेंगे कि कैमरे में केवल आप ही आप दिखेंगे!

भारत देश में चमचों का इतने बड़ा प्रेमी न इसके पहले कभी हुआ है और न इसके बाद होने की संभावना है।उसने आगा देखा, न पीछा और विशेष अधिवेशन बुला लिया। आप ही सोचिए कि न तो संसद भागी जा रही थी, न संसद सदस्य और न ये तीनों विधेयक भागे जा रहे थे और न इन्हें और अमित शाह के पद को कोई खतरा था। चुनाव के बाद अधिवेशन बुलाने से न तो अडानी का कोई आर्थिक नुक़सान होनेवाला था, न ट्रंप इस अधिवेशन को बुलाने की अनुमति देने से इंकार करता! ट्रंप से इनकी जो बातचीत पिछले दिनों चालीस मिनट तक हुई है, सूत्रों के अनुसार उसमें भी विशेष अधिवेशन का विषय आया था, तो उस भले आदमी ने उदारता दिखाते हुए कहा था कि माई डियर फ्रेंड मोडी, टुमको हम इसकी अनुमटि देता है।टुम जब चाहो, इसे बुलाने को सकटा।

इसके अलावा और क्या कारण रहा होगा कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने ऐन चुनाव के बीचों-बीच अपनी नाक कटवाई का यह शुभ आयोजन रखवाया। यह आयोजन बाद में भी तो हो सकता था! ज्योतिषी जी से अगर मोदी जी कहते कि नहीं ज्योतिषी जी महाराज, चुनाव के बाद की कोई तिथि बताइए, तो उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि 'नहीं' कह पाता! वह फौरन पोथी पत्रा फिर से निकालता, फिर से फर्जी गुणा-भाग का खेल खेलता और दूसरी तिथि बता देता और उस तिथि को अप्रैल वाली तिथि से भी उत्तम बताता! उसके पिताजी का न पहले कुछ जा रहा था, न अब जानेवाला था, बल्कि वह तो तीसरी और चौथी तिथि भी बता देता! वह जरूर पहुंचा हुआ ज्योतिषी रहा होगा, तो नौ तिथियां अस्वीकार हो जातीं, तो दसवीं तिथि भी बता देता। दक्षिणा में वह केवल राज्यसभा की फकत एक सीट मांगता और जिला परिषद की सदस्यता पर राजी हो जाता!

पिछले लगभग बारह साल से पूरे देश को झांसा देने वाला यह महापुरुष इस ज्योतिषी के झांसे में आ गया और यह कांड कर बैठा। पहली बार इतनी तगड़ी मात खा गया। बरसों तक लोग इस पर हंसेंगे।

अच्छा चलो एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि यह गड़बड़ ज्योतिषी के कारण नहीं हुई, बल्कि काफी राजनीतिक गुणा-भाग के बाद हुई। ये विधेयक अगर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनाव के बाद लाए जाते, तो भी इतनी ही आसानी से गिर जाते! जब सरकार को बारह साल से हर दिन गिरने में कोई समस्या नहीं, तो इन विधेयकों को तो केवल एक दिन में एक साथ गिरना था! इन्हें क्या दिक्कत थी?

अगर ये दोनों गुजराती भाई सोच रहे थे कि ये विधेयक लाकर और 'विपक्ष ने महिला आरक्षण विधेयक गिरा दिया' का हल्ला मचा कर ये ममता बनर्जी या स्टालिन को हरा देंगे, तो ये बहुत ही दूर की कौड़ी ला रहे थे। स्टालिन का तो ये कुछ भी करके कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते हैं, इतना ये पहले भी जानते थे। स्टालिन ने तो पहले ही परिसीमन के सवाल पर इनके खिलाफ युद्ध छेड़ रखा था और इनकी हवा टाइट कर दी थी। रही ममता बनर्जी, तो उन्हें किसी और तरकीब से तो हराने की सोचा जा सकता था, मगर इस मुद्दे पर उन्हें हराया नहीं जा सकता। एक तो वह खुद महिला मुख्यमंत्री हैं और दूसरे उन्होंने पहले ही महिलाओं को चुनाव में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दे रखा है। ममता के विरुद्ध यह हथियार कारगर नहीं होगा, इतनी अक्ल इनके पास रही होगी, यह मानना चाहिए। हां, इस बार खरीद फरोख्त ये नहीं कर पाए, इसका अफसोस इन्हें जरूर रहा होगा!

तो सवाल यह है कि जल्दबाजी में ये ड्रामा करने से इन्हें क्या मिला, जिसका सेट तैयार नहीं था। प्रापर्टी पूरी नहीं थी और प्रकाश व्यवस्था में‌ भी कमी थी! अभिनेता डायलॉग तक रट नहीं पाए थे।बात फिर ज्योतिषी पर आकर अटक जाती है।

कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।
Friday World-April 19,2026 
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April 19, 2026

बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलते हैं! :

बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलते हैं! :
-Friday World-April 19,2026 
बोलेंगे तो बोलोगे कि बोलते हैं! : राजेंद्र शर्मा

थैंक यू मोदी जी। ऐसा-वैसा नहीं, बड्डा वाला थैंक यू। आप रात आठ बजे के बाद टीवी पर प्रकट भी हुए, आधा घंटा बोले भी, पर वही विरोधियों के पाप गिनाने और उन्हें श्राप देने पर ही भाषण खत्म हो गया। सच पूछिए तो हम तो सांसें रोककर आखिर-आखिर तक इंतजार करते ही रह गए कि अब आयी नोटबंदी की घोषणा, अब आया लॉकडॉउन का एलान, पर कुछ भी नहीं आया। 

यूं ही विपक्ष को गरियाने में आपका बोल-बचन का सारा कोटा खाली हो गया। और तो और, आपने तो इस बार ताली-थाली बजाने या दीया-बाती करने का टॉस्क तक नहीं दिया। सच पूछिए तो पहले तो हमें यकीन ही नहीं हुआ कि रात आठ बजे के बाद आप टीवी पर प्रकट भी हो गए और फिर भी अगली सुबह से हमें न तो किसी नयी लाइन में लगना है और न शहरों से जान बचाकर गांवों की ओर भागना है। यहां हम रसोई गैस की लाइनों और रसोई गैस की किल्लत के मारे मजदूरों-वजदूरों के गांवों की ओर भागने की बात नहीं कर रहे हैं। और दिल्ली-एनसीआर में मजदूरों के आंदोलन-वांदोलन करने पर उतर आने की बात तो हम हर्गिज-हर्गिज नहीं कर रहे हैं। आप तो पहले ही कह चुके थे कि वह सब तो चंगा सी! दिक्कत देखे, सो शहरी नक्सल या पाकिस्तानी। 

सो बहुत-बहुत थैंक यू मोदी जी, रात आठ बजे के बाद टीवी पर आकर भी, सिर्फ चुनावी भाषण सुनाकर जान बख्शी कर देने के लिए। वर्ना जब से रात आठ बजे के बाद राष्ट्र के नाम आपके संबोधन के एलान की खबर सुनी थी, तब से दिल में कैसे-कैसे ख्याल आ रहे थे कि पूछो ही मत। खैर! हरेक कार्यकाल में एक का औसत मानें, तब भी प्रधानमंत्री के आपके चालू तीसरे कार्यकाल का नोटबंदी-लॉकडॉउन टाइप का एलान, इस पब्लिक पर उधार रहा!

पर रात साढ़े आठ बजे टीवी पर आकर भी पब्लिक की इस जान-बख्शी के लिए मोदी जी का धन्यवाद करने की जगह, विपक्षी इसमें भी बाल की खाल निकालने में लगे हैं। और कुछ नहीं मिला, तो विरोध करने का यही बहाना पकड़कर बैठ गए हैं कि यह तो राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का संबोधन था ही नहीं। माना टीवी पर प्रधानमंत्री की ही तस्वीर थी और विपक्ष के खिलाफ जो भी बक-झक की, प्रधानमंत्री ने ही की थी। लेकिन, यह राष्ट्र के नाम संबोधन तो था ही नहीं। यह तो एक और चुनावी भाषण था और वह भी ऐन चुनावी सीजन में। भाषण भी प्रधानमंत्री का नहीं, आरएसएस के स्वयंसेवक का था, जो प्रधानमंत्री का भेष धरकर टीवी पर आया था। यह तो विपक्ष के खिलाफ प्रचार के लिए, सरकारी पद से लेकर सरकारी टीवी तक के दुरुपयोग का मामला था। यानी विपक्षी, पब्लिक की जान बख्शी को ही मोदी जी का जुर्म बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उसके ऊपर से इसे चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन बताकर, इसके खिलाफ चुनाव आयोग से कार्रवाई की मांग और कर रहे हैं। 

शुक्र है कि मोदी जी ने ज्ञानेश कुमार के जरिए चुनाव आयोग की ऐसी सैटिंग की है कि उनका और उनकी पार्टी का नाम आते ही, आयोग बापू के तीन बंदरों का पक्का अनुयाई बन जाता है -- न कुछ गलत देखता है, न कुछ गलत सुनता है और गलत के बारे में कुछ बोलने का तो खैर सवाल ही नहीं उठता है। वर्ना आदर्श आचार संहिता के चक्कर में मोदी जी का राष्ट्र के नाम तो क्या, चुनावी सभाओं में संबोधन भी मुश्किल हो जाता!

और मोदी जी ने साढ़े आठ बजे टीवी पर आकर जो बोला, उसको भी तो देखिए! नारी शक्ति की उड़ान रोकने का विपक्ष ने जो पाप किया है, उसका क्या? महिला आरक्षण की भ्रूण हत्या का पाप! हमें पता है कि विपक्ष वाले इसमें भी कोई न कोई टेक्निकल पेंच डालकर, इस पाप का दोष भी उल्टे मोदी जी पर ही डालने की कोशिश करेंगे। बल्कि उन्होंने तो कहना भी शुरू कर दिया है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का कानून तो 2023 में ही बन चुका था और करीब-करीब एक राय से बन चुका था। बल्कि उसी समय विपक्ष ने, इस आरक्षण को तुरंत लागू कराने की मांग भी की थी और इसके लिए, इस आरक्षण के लागू होने से पहले 2026 के बाद की जनगणना और उसके बाद परिसीमन के पूरे होने की शर्त जोड़े जाने का विरोध किया था। विपक्ष की मानी जाती तो, 2024 के आम चुनाव से ही एक-तिहाई महिला आरक्षण लागू हो सकता था। पर तब मोदी जी-शाह जी की जोड़ी राजी नहीं हुई। अब तीन साल बाद उनको इस कानून की याद आयी है और नारी वंदन अधिनियम के लागू होने में देरी के नाम पर आंसू बहा रहे हैं!

एक सेकुलरवादी लेखिका ने तो मोदी जी के मामले में यह जानते हुए बॉयोलॉजी घुसा दी कि मोदी जी ठहरे नॉन-बायोलॉजीकल। कह रही हैं कि तीन साल पहले जो बच्चा पैदा हो चुका था, उसकी तीन साल बाद भ्रूण हत्या कैसे हो सकती है? जैसे उन्हें पता ही नहीं हो कि मोदी-शाह की पार्टी के पास वाशिंग मशीन ही नहीं है, डीप फ्रीजर भी है। जो अधिनियम 2023 में संसद के दोनों सदनों में लगभग एक राय से पास हुआ था, उसे मोदी-शाह की सरकार ने उसी डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा हुआ था और संसद में इस विशेष चर्चा के दौरान ही लागू करने के एलान के लिए बाहर निकाला था। तीन साल का हो गया तो क्या हुआ, डीप फ्रीजर में रहने से वह रहा तो भ्रूण का भ्रूण ही या ज्यादा तकनीकी ही होना है, तो नवजात कह लो। मोदी जी की नजरों में और करोड़ों माताओं-बहनों की नजरों में तो यह भ्रूण हत्या ही है।

अब प्लीज कोई ये मत कहना कि अगर मोदी जी को नारी वंदन की इतनी ही चिंता है, तो मोदी जी तब क्यों नहीं बोले, जब उनकी डबल इंजन सरकार के आशीर्वाद से बिलकीस बानो के दोषियों को माफी दिलाने के बाद, फूल मालाएं पहनाकर गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान स्वागत किया गया। या जब उनके अपने चुनाव क्षेत्र, वाराणसी में विश्वविद्यालय की छात्रा के भाजपायी-संघी बलात्कारियों का जमानत पर छूटने पर स्वागत किया गया? या हाथरस की बच्ची के मामले में। या सेंगर के मामले में। या महिला पहलवानों के मामले में। या राम-रहीम को बार-बार जेल से छोड़े जाने पर। या आसाराम की जमानत पर जमानत पर। या एप्सटीन फाइल पर। या जसोदा बेन के अधिकारों पर। सिंपल है, पहले नहीं बोलने से क्या हुआ? मोदी अब तो बोल रहे हैं। नारी शक्ति की उड़ान के लिए दरवाजे तोड़ रहे हैं! तमिलनाडु और बंगाल की माताएं और बहनें, मोदी जी की पहले की चुप्पी याद रखेंगी या अब उनके बोलने पर वोट देंगी? 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोक लहर' के संपादक हैं।

Friday World-April 19,2026 
April 19, 2026

नारी शक्ति का दोहरा चेहरा: महिला आरक्षण की वकालत कर रहे वे, जिनके संगठन में महिलाओं की एंट्री तक नहीं!

नारी शक्ति का दोहरा चेहरा: महिला आरक्षण की वकालत कर रहे वे, जिनके संगठन में महिलाओं की एंट्री तक नहीं!-Friday World-April 19,2026 
नई दिल्ली: संसद में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों पर बहस के दौरान वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा, “महिला आरक्षण की बात वो लोग कर रहे हैं जिनके संगठन में महिलाओं की कोई एंट्री ही नहीं है। गजब हिप्पोक्रेसी है?” 

आशुतोष ने आरोप लगाया कि जहां आरएसएस जैसे संगठनों में महिलाओं को शाखाओं में शामिल होने की अनुमति नहीं है, वहीं भाजपा महिला सशक्तिकरण और आरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें कर रही है। उनका यह बयान संसद की बहस के बीच आया, जब महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने और उससे जुड़े परिसीमन व अन्य संशोधनों पर चर्चा हो रही थी।

आशुतोष का तीखा आरोप और संदर्भ

आशुतोष ने कहा कि आरएसएस का मूल संगठन पुरुष-केंद्रित है। महिलाओं के लिए अलग से राष्ट्र सेविका समिति (Rashtra Sevika Samiti) है, जो 1936 में स्थापित हुई, लेकिन मुख्य आरएसएस शाखाओं (शाखाओं) में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती। उन्होंने इसे हिप्पोक्रेसी करार दिया कि जो संगठन अपनी आंतरिक संरचना में महिलाओं को समान स्थान नहीं देता, वह देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की वकालत कैसे कर सकता है?

यह बयान ऐसे समय में आया जब संसद में महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को पूरी तरह लागू करने के लिए तकनीकी अधिसूचना जारी की गई है। 16 अप्रैल 2026 को कानून मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) लागू कर दिया। हालांकि, वास्तविक आरक्षण का क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन के बाद, संभवतः 2029 के आसपास ही हो पाएगा।

महिला आरक्षण अधिनियम क्या कहता है?

2023 में पारित यह ऐतिहासिक संविधान संशोधन (106वां संशोधन) लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करता है। यह आरक्षण अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा। आरक्षण 15 साल के लिए होगा, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है।

सरकार का दावा है कि यह महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं ने इसे नारी शक्ति का सम्मान बताया। लेकिन विपक्षी नेता और आशुतोष जैसे कमेंटेटर इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं।

 आरएसएस की संरचना: महिलाओं की भूमिका क्या है?

आरएसएस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 1925 में स्थापित इस संगठन का मूल फोकस पुरुष स्वयंसेवकों (स्वयंसेवक) पर है। महिलाएं मुख्य आरएसएस शाखाओं में नहीं शामिल हो सकतीं। इसके बजाय, महिलाओं के लिए अलग स्वतंत्र संगठन **राष्ट्र सेविका समिति** काम करता है, जिसमें हजारों सेविकाएं सक्रिय हैं। समिति की अपनी शाखाएं, प्रचारिकाएं और कार्यक्रम हैं, जो महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक गतिविधियों पर केंद्रित हैं।

आरएसएस के अनुसार, दोनों संगठन समान विचारधारा वाले हैं लेकिन अलग-अलग संचालित होते हैं। समिति की प्रचारिकाएं आजीवन समर्पण करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे आरएसएस के प्रचारक। समिति के पास 55,000 से ज्यादा सेविकाएं और 2,700 से अधिक शाखाएं बताई जाती हैं।

आरएसएस के आलोचक कहते हैं कि मुख्य संगठन में महिलाओं की अनुपस्थिति पुरानी मानसिकता को दर्शाती है। जबकि समर्थक तर्क देते हैं कि अलग संगठन महिलाओं को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता देता है। हाल के वर्षों में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महिला सशक्तिकरण पर कई बार बात की है, लेकिन मुख्य शाखाओं में महिलाओं की एंट्री पर अभी कोई आधिकारिक बदलाव नहीं हुआ है।

 हिप्पोक्रेसी का मुद्दा: दोनों पक्षों की सच्चाई

आशुतोष का आरोप सिर्फ आरएसएस-भाजपा तक सीमित नहीं है। राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति हर पार्टी में चिंताजनक रही है। 

- भाजपा की स्थिति: भाजपा ने कई महिला नेताओं को महत्वपूर्ण पद दिए हैं – स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण, नirmala Sitharaman जैसी मंत्री, कई राज्य इकाइयों में महिला अध्यक्ष। पार्टी ने महिला आरक्षण बिल को पास कराने में सक्रिय भूमिका निभाई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर भी टॉप लीडरशिप में महिलाओं की संख्या सीमित है।

- अन्य दलों की स्थिति: कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि में भी महिला टिकटों की संख्या अक्सर कम रहती है। कई क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद और पुरुष-प्रधान संस्कृति हावी है। 2023 के बिल के समय लगभग सभी दलों ने एकमत से समर्थन किया था, लेकिन अंदरूनी स्तर पर महिला उम्मीदवारों को टिकट देने में अनिच्छा दिखती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव तब आएगा जब पार्टियां अपनी आंतरिक संरचनाओं में महिलाओं को ज्यादा जगह देंगी – चाहे टिकट वितरण हो या संगठनात्मक पद।

 महिला सशक्तिकरण: कानून vs वास्तविकता

महिला आरक्षण कानून एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन कई चुनौतियां बाकी हैं:

- परिसीमन का इंतजार: आरक्षण तब लागू होगा जब अगली जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होगा। इससे लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 के आसपास हो सकती हैं।
- रोटेशन सिस्टम: आरक्षित सीटें हर चुनाव में घूमती रहेंगी, जिससे पुरुष सांसदों/विधायकों को अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है।
- ग्रासरूट स्तर: पंचायतों में पहले से 33-50% महिला आरक्षण है, जहां महिलाएं सक्रिय हैं, लेकिन कई जगहों पर वे प्रॉक्सी (पति या परिवार के पुरुष सदस्य) के रूप में काम करती दिखती हैं।

देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक बदलाव भी जरूरी हैं।

 बहस का बड़ा सवाल

आशुतोष का बयान राजनीतिक बहस को फिर से गरमा गया है। एक तरफ सरकार इसे महिलाओं के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, दूसरी तरफ विपक्ष और स्वतंत्र कमेंटेटर संगठनात्मक हिप्पोक्रेसी की बात उठा रहे हैं।

आरएसएस और भाजपा का जवाब आमतौर पर यही होता है कि उनकी विचारधारा परिवार और समाज में महिलाओं को सम्मान देती है, लेकिन आधुनिक राजनीतिक आरक्षण से अलग उनका फोकस चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक सशक्तिकरण पर है।

दूसरी ओर, आलोचक पूछते हैं – अगर आरक्षण इतना जरूरी है, तो क्यों न अपनी शाखाओं और संगठनों में पहले महिलाओं को बराबरी का स्थान दिया जाए?

 निष्कर्ष: सच्चा सशक्तिकरण कहां?

महिला आरक्षण विधेयक निस्संदेह एक सकारात्मक कदम है, जो भारतीय लोकतंत्र को ज्यादा समावेशी बना सकता है। लेकिन कानून पास करना एक बात है, उसे सही मायने में लागू करना और मानसिकता बदलना दूसरी बात। 

आशुतोष का बयान हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक दलों को अपने घर से ही शुरुआत करनी चाहिए। जब तक संगठनात्मक स्तर पर महिलाओं को समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक बड़े-बड़े दावे सिर्फ वोट बैंक की राजनीति लगेंगे।

नारी शक्ति वाकई वंदनीय है, लेकिन उसे सिर्फ आरक्षण के जरिए नहीं, बल्कि समाज की हर संस्था में बराबरी से सम्मान देकर सच्चा रूप देना होगा। संसद की बहस जारी है, देश देख रहा है कि यह हिप्पोक्रेसी की बहस कहां तक जाती है और असली सशक्तिकरण की राह कितनी लंबी है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 19,2026 
April 19, 2026

ईरान की अटूट शक्ति: युद्धविराम के दौरान तैयारियां, बची हुई मिसाइलें और होर्मुज का खतरा

ईरान की अटूट शक्ति: युद्धविराम के दौरान तैयारियां, बची हुई मिसाइलें और होर्मुज का खतरा
-Friday World-April 19,2026 
दो हफ्तों के नाजुक युद्धविराम के बीच ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता को फिर से संभाल लिया है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में अमेरिकी सेना और खुफिया अधिकारियों के अनुमानों का हवाला देते हुए कहा गया है कि ईरान के पास अब भी अपने हमलावर ड्रोनों का लगभग 40 प्रतिशत और मिसाइल लॉन्चरों का 60 प्रतिशत से ज्यादा बचा हुआ है। इसके अलावा, बैलिस्टिक मिसाइलों का स्टॉक भी पूर्व-युद्ध स्तर का करीब 70 प्रतिशत तक सुरक्षित माना जा रहा है। ईरानी सेना ने भूमिगत बंकरों और गुफाओं से 100 से ज्यादा लॉन्चर सिस्टम निकालकर अपनी ताकत को और मजबूत कर लिया है। यह तैयारी न केवल भविष्य के किसी भी टकराव के लिए है, बल्कि विश्व की सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही को चुनौती देने की क्षमता भी बनाए रखती है।

यह युद्धविराम 8 अप्रैल 2026 को शुरू हुआ था, जो अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लंबे संघर्ष के बाद ब्रोकर किया गया। पाकिस्तान की मध्यस्थता में इस समझौते पर मुहर लगी, लेकिन दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिकी नौसेना द्वारा उसके बंदरगाहों पर लगाया गया ब्लॉकेड युद्धविराम का उल्लंघन है, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से बंद करने का आरोप लगा रहे हैं। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान समझौते का सम्मान नहीं करता तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट और पुलों को नष्ट कर देगा।

ईरान की प्रतिक्रिया सख्त और स्पष्ट है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने कहा, "अमेरिका को खतरनाक अंजाम भुगतने पड़ेंगे। हम पूरी तरह से तैयार हैं। अगर वे जरा सी भी गलती करते हैं तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे।" गालिबाफ ने आगे जोड़ा कि ईरानी सशस्त्र बल अमेरिकी जमीनी सैनिकों के आने का इंतजार कर रहे हैं और उन्हें "आग के हवाले" करने को तैयार हैं। उन्होंने अमेरिका को "इजरायल फर्स्ट" नीति से पीछे हटने की सलाह भी दी।

युद्धविराम के दौरान ईरान की रणनीतिक तैयारी

युद्धविराम की अवधि ईरान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो रही है। अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युद्ध के दौरान ईरान ने अपने कई मिसाइल लॉन्चर और ड्रोन खो दिए थे, लेकिन भूमिगत सुविधाओं और बंकरों में छिपाए गए हथियार अब फिर से सक्रिय हो रहे हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि युद्धविराम शुरू होने के समय ईरान के पास मिसाइल लॉन्चरों का केवल आधा हिस्सा ही operational था, लेकिन अब 100 से ज्यादा अतिरिक्त सिस्टम निकालकर यह संख्या 60 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

ईरान की सैन्य रणनीति हमेशा से असममित युद्ध पर आधारित रही है। बड़े पैमाने पर बैलिस्टिक मिसाइलें, स्वयं-विस्फोटक ड्रोन (शहीद-136 जैसे) और समुद्री हमले की क्षमता उसके मुख्य हथियार हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। अगर ईरान इसे फिर से बंद करने या खतरे में डालने की स्थिति में पहुंच जाता है, तो वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने पहले ही चेतावनी दी है कि कोई भी जहाज होर्मुज की ओर बढ़ने की कोशिश करेगा तो उसे निशाना बनाया जाएगा।

इस दौरान ईरान ने अपनी वायु रक्षा प्रणालियों को भी मजबूत किया है और छिपे हुए स्टॉक को फिर से संगठित कर रहा है। अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि ईरान के पास अभी भी हजारों मिसाइलें और ड्रोन बचे हुए हैं, जो क्षेत्रीय अमेरिकी ठिकानों और इजरायली हितों के लिए खतरा बने रहेंगे।

 ट्रंप की धमकियां और ईरान का दृढ़ संकल्प

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कई बार ईरान को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि ईरान "थोड़ा चालाक" बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अमेरिका कुछ नहीं खो रहा है। ट्रंप का दावा है कि होर्मुज पर नियंत्रण और बंदरगाहों पर ब्लॉकेड से ईरान रोजाना करोड़ों डॉलर का नुकसान उठा रहा है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान की सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाएगा।

लेकिन ईरान झुकने को तैयार नहीं दिख रहा। गालिबाफ ने साफ कहा कि अमेरिकी धमकियां ईरानी राष्ट्र पर कोई असर नहीं डालेंगी। "अगर वे लड़ना चाहते हैं तो हम लड़ेंगे, अगर तर्क से बात करना चाहते हैं तो हम तर्क से जवाब देंगे। हम किसी भी धमकी के आगे नहीं झुकेंगे।" ईरान का मानना है कि अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बावजूद उसकी सैन्य मशीनरी अभी भी काफी हद तक बरकरार है।

 पाकिस्तान में शांति वार्ता की संभावना

युद्धविराम को स्थायी बनाने के लिए पाकिस्तान में एक और दौर की बातचीत की संभावना जताई जा रही है। पाकिस्तान ने पहले भी दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता की थी और इस्लामाबाद में हुई बैठकें काफी चर्चित रहीं। हालांकि, पिछली वार्ताओं में कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। पाकिस्तानी अधिकारी अब दूसरे दौर की तैयारी कर रहे हैं, जिसमें अमेरिकी और ईरानी प्रतिनिधि शामिल हो सकते हैं।

ईरान की मांग है कि अमेरिका अपना नौसैनिक ब्लॉकेड हटाए और इजरायल लेबनान में हमले बंद करे। वहीं अमेरिका ईरान से परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण और क्षेत्रीय स्थिरता की गारंटी चाहता है। गालिबाफ ने कहा कि बातचीत में कुछ प्रगति हुई है, लेकिन अंतिम समझौते से अभी काफी दूर हैं। मध्यस्थता में पाकिस्तान की भूमिका दोनों देशों द्वारा सराही गई है, लेकिन विश्वास की कमी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।

 क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक चिंताएं

यह पूरा संकट मध्य पूर्व की स्थिरता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर कोई भी अड़चन वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका दे सकती है, खासकर तेल आयातक देशों जैसे भारत, चीन, जापान और यूरोपीय राष्ट्रों को। भारत के लिए ईरान न केवल तेल का स्रोत है, बल्कि क्षेत्रीय भू-राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

ईरान की मजबूत तैयारी दिखाती है कि वह आसानी से हार मानने वाला नहीं है। उसकी भूगोलिक स्थिति, भूमिगत सुविधाएं और असममित युद्ध की क्षमता उसे लंबे संघर्ष के लिए तैयार रखती है। दूसरी ओर, अमेरिका और इजरायल की उन्नत तकनीक और हवाई हमले की क्षमता भी कम नहीं है।

आगे क्या?

युद्धविराम की समय सीमा जल्द समाप्त होने वाली है। अगर पाकिस्तान में होने वाली वार्ता सफल होती है तो क्षेत्र में शांति की उम्मीद जगेगी, वरना तनाव और बढ़ सकता है। ईरान का संदेश साफ है – हम तैयार हैं और किसी भी गलती का जवाब पूरी ताकत से देंगे।

दुनिया इस नाजुक मोड़ पर नजर रखे हुए है। होर्मुज का भविष्य, तेल की कीमतें और मध्य पूर्व की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों पक्ष समझौते की राह चुनते हैं या फिर युद्ध के अगले चरण में कदम रखते हैं। ईरान की बची हुई शक्ति और उसकी दृढ़ता इस पूरे संघर्ष में एक नया आयाम जोड़ रही है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 19,2026