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Monday, 20 April 2026

April 20, 2026

राहुल गांधी मोची की दुकान पर, खेत में धान रोपते... तो मोदी जी झालमूड़ी खाने क्यों पहुँच गए? राजनीति का ‘कॉमन मैन’ ड्रामा और कैमरा की सच्चाई

राहुल गांधी मोची की दुकान पर, खेत में धान रोपते... तो मोदी जी झालमूड़ी खाने क्यों पहुँच गए? राजनीति का ‘कॉमन मैन’ ड्रामा और कैमरा की सच्चाई
-Friday World-April 20,2026 
भारतीय राजनीति में ‘आम आदमी’ से जुड़ने का खेल लंबे समय से चल रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी मोची की दुकान पर जाकर जूते सीते दिखते हैं, कुलियों के साथ बैठकर चाय पीते हैं, खेत में किसानों के साथ धान रोपते हैं, ट्रक ड्राइवर बनकर सड़क पर निकल पड़ते हैं और स्कूल के बच्चों के बीच बैठकर पढ़ाई करते नजर आते हैं। ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं और विपक्षी खेमे में ‘जनता से जुड़ाव’ का नारा गूँजता है।

फिर सवाल उठता है — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैसे पीछे रह सकते थे? 

19 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल के झारग्राम में चुनावी रैलियों के बीच मोदी जी ने अचानक अपना काफिला रोका और एक सड़क किनारे की छोटी सी झालमूड़ी की दुकान पर रुक गए। उन्होंने स्थानीय स्वादिष्ट झालमूड़ी चखी, दुकानदार से बात की, बच्चों और महिलाओं से मिले और ₹10 की बोहनी कर दी। तस्वीरें और वीडियो तुरंत वायरल हो गए। मोदी जी ने खुद अपने X अकाउंट पर पोस्ट किया — “झारग्राम झालमूड़ी ब्रेक”।

लेकिन सोशल मीडिया पर एक खास टिप्पणी ने ध्यान खींचा — दुकान बिल्कुल साफ-सुथरी, आलमारी और रैक पूरी तरह भरी हुई, नए-नए डिब्बे, कोई डिब्बा थोड़ा भी खाली नहीं। जैसे कोई मेहमान के आने की तैयारी कर रहा हो। कुछ यूजर्स ने लिखा — “बेचारे की दुकान चलती नहीं, लेकिन कैमरे के लिए सब नया और फुल पैक। फोटो अच्छी आए, यही तो जरूरी है।”

 राजनीति में ‘जनता से जुड़ाव’ का पुराना फॉर्मूला
राहुल गांधी की यात्राएँ अक्सर इसी स्टाइल की होती हैं। वे कभी किसान के खेत में काम करते नजर आते हैं, कभी ट्रक में ड्राइवर के बगल में बैठ जाते हैं, कभी स्कूल के बच्चों के साथ बेंच पर। ये तस्वीरें दिखाती हैं कि नेता ‘आम आदमी’ की जिंदगी समझते हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं — ये ‘फोटो ऑप’ (photo opportunity) ज्यादा हैं, असली समस्याओं का हल कम।

मोदी जी भी पिछले 12 सालों से ‘चायवाला’, ‘चौकीदार’ जैसे नारों से जुड़ाव दिखाते आए हैं। झालमूड़ी वाला प्रसंग भी उसी श्रृंखला का हिस्सा लगता है। झारग्राम में रैलियों के बीच अनियोजित स्टॉप बताकर इसे सहज और स्वाभाविक दिखाया गया। दुकानदार दीपक कुमार ने बाद में बताया कि मोदी जी ने उनका नाम पूछा, पढ़ाई का स्तर जाना और झालमूड़ी को बहुत पसंद किया। उन्होंने 10 मिनट वहाँ रुके और बच्चों के साथ भी समय बिताया।

लेकिन तस्वीरों में दुकान की सफाई और नए डिब्बों ने बहस छेड़ दी। क्या ये वाकई एक आम सड़क किनारे की दुकान थी, या कैमरे के लिए थोड़ी ‘सेटिंग’ की गई थी? राजनीति में ऐसे प्रसंग अक्सर स्टेज मैनेज्ड होते हैं — रोशनी, एंगल, बैकग्राउंड सब ध्यान में रखकर। फोटो अच्छी आए, तो मैसेज मजबूत जाता है।

 फोटो-ऑप की राजनीति: दोनों तरफ एक ही सिक्का
राहुल गांधी जब मोची की दुकान पर बैठते हैं तो कहा जाता है — “देखो, ये आम आदमी की तकलीफ समझते हैं।” मोदी जी जब झालमूड़ी खाते हैं तो कहा जाता है — “देखो, पीएम भी सड़क के स्वाद से जुड़े हैं।” दोनों तरफ एक ही कोशिश — जनता से जुड़ाव का मैसेज। लेकिन सवाल ये है कि इन तस्वीरों से असली बदलाव कितना आता है?

- मोची की दुकान पर बैठने से जूते बनाने वालों की आय बढ़ती है?
- खेत में धान रोपने से किसानों की फसल की कीमतें बेहतर होती हैं?
- ट्रक ड्राइवर के साथ बैठने से सड़क सुरक्षा और उनके हक में कानून मजबूत होते हैं?
- झालमूड़ी खाने से छोटे स्ट्रीट वेंडर्स को स्थायी सहायता मिलती है?

ज्यादातर मामलों में ये तस्वीरें वायरल होकर राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल होती हैं। असली मुद्दे — बेरोजगारी, महंगाई, किसान संकट, छोटे व्यापारियों की दिक्कतें — पीछे छूट जाते हैं।

झारग्राम की झालमूड़ी दुकान पर भी यही हुआ। दुकानदार को अचानक प्रधानमंत्री का आना शायद जीवन का सबसे बड़ा दिन लगा। लेकिन कुछ घंटों बाद सब सामान्य हो गया। दुकान फिर वैसे ही चलती रहेगी — कभी अच्छा दिन, कभी खराब। ₹10 की बोहनी से दुकान नहीं चल सकती। लेकिन फोटो में वो दुकान ‘सफाई और समृद्धि’ का प्रतीक बन गई।

 कैमरा की सच्चाई और राजनीतिक थिएटर
आज की राजनीति मीडिया और सोशल मीडिया पर बहुत निर्भर है। हर नेता जानता है कि एक अच्छी फोटो हजार शब्दों से ज्यादा असर करती है। इसलिए बैकग्राउंड साफ, कपड़े ठीक, एक्सप्रेशन नेचुरल और प्रॉप्स (यहाँ झालमूड़ी के डिब्बे) परफेक्ट होने चाहिए। 

आलोचक कहते हैं — मोदी जी की झालमूड़ी वाली दुकान ‘स्टेज्ड’ लग रही थी क्योंकि सब कुछ नया और व्यवस्थित था। ठीक वैसे ही जैसे राहुल गांधी के कुछ फोटो-ऑप में सेटिंग दिखाई देती है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं — “तुम्हारा फोटो-ऑप, हमारा असली जुड़ाव”।

लेकिन हकीकत ये है कि आम आदमी की जिंदगी फोटो से नहीं बदलती। मोची, कुली, किसान, ट्रक ड्राइवर और छोटे दुकानदार रोज की मेहनत से गुजरते हैं। उनकी समस्याएँ — कर्ज, बिजली बिल, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधा — राजनीतिक दौरों से नहीं सुलझतीं।

 क्या सीखें हम?
राजनीति में ‘जनता से जुड़ाव’ दिखाना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है असली काम करना। फोटो अच्छी आए या न आए, लेकिन नीतियाँ आम आदमी तक पहुँचनी चाहिए। 

- छोटे स्ट्रीट वेंडर्स को लाइसेंस, जगह और सुरक्षा मिले।
- किसानों को सही दाम और बीमा मिले।
- मजदूरों और ड्राइवरों को सम्मानजनक मजदूरी और सुविधाएँ मिलें।
- बच्चों के स्कूलों में बेहतर शिक्षा और खेलकूद की व्यवस्था हो।

झालमूड़ी खाना अच्छा है, लेकिन सिर्फ फोटो के लिए नहीं। राहुल गांधी का खेत में काम करना भी सराहनीय है, लेकिन वो तस्वीरें असर तभी दिखाएँगी जब किसान आत्महत्या नहीं करेगा।

लो भाईयों, राजनीति का ये खेल चलता रहेगा। नेता कभी मोची बनेंगे, कभी झालमूड़ी खाएँगे, कभी ट्रक चलाएँगे। लेकिन असली सवाल ये है — इन तस्वीरों के बाद आम आदमी की जिंदगी में क्या बदला?

जब तक फोटो-ऑप से आगे जाकर नीतियाँ नहीं बनेंगी, तब तक ये ‘कॉमन मैन ड्रामा’ सिर्फ वोट बटोरने का हथियार बना रहेगा। साफ-सुथरी दुकान अच्छी लगती है, लेकिन दुकान चलनी भी चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे राजनीति सिर्फ दिखावे की नहीं, असली सेवा की होनी चाहिए।

सच्चाई सामने आए, नेता जनता की असली समस्याओं पर काम करें — यही असली ‘जनता से जुड़ाव’ होगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026 
April 20, 2026

यूएस वॉरशिप पर खाने के फाँफे! दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना के सैनिक भूखे पेट सोने को मजबूर

यूएस वॉरशिप पर खाने के फाँफे! दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना के सैनिक भूखे पेट सोने को मजबूर
-Friday World-April 20,2026 
अरब सागर में ईरान के खिलाफ तनाव और सशस्त्र संघर्ष के बीच अमेरिकी नौसेना की दो प्रमुख युद्धपोतों — USS ट्रिपोली और USS अब्राहम लिंकन — पर खाने की भयावह कमी की खबरें सामने आई हैं। परिवारों को भेजे गए फोटो में लंच ट्रे लगभग खाली नजर आ रही हैं — सिर्फ मुट्ठी भर कटा हुआ मांस का टुकड़ा और एक मुड़ी हुई टॉर्टिला, या फिर उबले गाजर, सूखा मीट पैटी और ग्रे प्रोसेस्ड मीट का स्लैब। 

ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं और पूरी दुनिया में अमेरिकी नौसेना की मज़ाक उड़ाई जा रही है। कुछ ही महीने पहले टॉयलेट ब्लॉक होने की घटना पर भी ठिठोली हुई थी, अब खाने की कमी ने सवाल खड़े कर दिए हैं — क्या दुनिया की सबसे महंगी और ताकतवर नौसेना भी लंबे संघर्ष के लिए तैयार नहीं है?

 पहले टॉयलेट ब्लॉक, अब खाने की कमी
ईरान के खिलाफ ऑपरेशन शुरू होने से पहले अरब सागर में तैनात एक अमेरिकी वॉरशिप पर टॉयलेट सिस्टम ब्लॉक हो जाने की घटना ने सोशल मीडिया पर हंगामा मचा दिया था। हजारों सैनिकों के लिए सीमित शौचालयों की वजह से लंबी कतारें लग रही थीं। अब उसी क्षेत्र में तैनात जहाजों पर खाने की समस्या उभरी है।
USA Today की रिपोर्ट के अनुसार, USS ट्रिपोली पर तैनात एक महिला मरीन ने अपने परिवार को लंच ट्रे का फोटो भेजा। ट्रे में सिर्फ थोड़ा सा शेडेड मीट और एक फोल्डेड टॉर्टिला था। इसी तरह USS अब्राहम लिंकन पर एक डिनर की तस्वीर में मुट्ठी भर उबले गाजर, सूखा मीट पैटी और प्रोसेस्ड मीट का ग्रे टुकड़ा दिखाई दिया। परिवार वाले हैरान हैं कि इतनी बड़ी नौसेना में सैनिकों को इतना कम और बेस्वाद खाना क्यों मिल रहा है।

 परिवारों की चिंता और राशनिंग की मजबूरी
एक पिता (जिन्होंने नाम न बताने की शर्त पर बात की) ने बताया कि उनकी बेटी USS ट्रिपोली पर है। वह लिखती है — “जब खाना उपलब्ध होता है तो हम खाते हैं, जब कम होता है तो बराबर बाँटते हैं। अगर सप्लाई और घट गई तो हमारा मनोबल सबसे नीचे स्तर पर पहुँच जाएगा।”

पश्चिम वर्जीनिया की एक पादरी ने बताया कि उनके समुदाय के एक सदस्य का बेटा अब्राहम लिंकन पर तैनात है। उसने बताया — “खाना बेस्वाद है, मात्रा बहुत कम है और सैनिक हमेशा भूखे रहते हैं।”

परिवार वाले अब कुकीज, डियोडोरेंट, मोजे, टूथपेस्ट जैसी जरूरी चीजें पैक करके भेजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर पार्सल अटके पड़े हैं। अप्रैल 2026 की शुरुआत से US Postal Service ने मध्य पूर्व के 27 मिलिट्री ZIP कोड्स पर डिलीवरी अस्थायी रूप से रोक दी है। वजह — गल्फ एयरस्पेस बंद होना और संघर्ष से जुड़ी लॉजिस्टिकल दिक्कतें।

 नौसेना का बचाव और विवाद
अमेरिकी नौसेना ने इन रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। चीफ ऑफ नेवल ऑपरेशंस एडमिरल डैरिल कॉडल ने कहा — “तैनात जहाजों पर खाने की कमी और खराब गुणवत्ता की रिपोर्टें गलत हैं। USS अब्राहम लिंकन और USS ट्रिपोली दोनों पर पर्याप्त खाना उपलब्ध है और स्वस्थ विकल्प दिए जा रहे हैं।”

नेवी ने सोशल मीडिया पर “ताजा और भरपूर भोजन” की तस्वीरें भी जारी कीं और दावा किया कि दोनों जहाजों पर 30 दिनों से ज्यादा का क्लास-1 (खाने का) स्टॉक मौजूद है। पेंटागन के अधिकारी रोजाना लॉजिस्टिक्स की निगरानी कर रहे हैं।

लेकिन परिवारों और कुछ मीडिया रिपोर्टों का कहना है कि लंबी तैनाती, बंदरगाहों पर रुकने की कमी और सप्लाई लाइन पर दबाव के कारण ताजा सब्जियाँ, फल और अच्छा खाना गायब हो गया है। सैनिक राशनिंग कर रहे हैं और मनोबल गिर रहा है।

 क्या कहती है सच्चाई?
ये घटनाएँ दिखाती हैं कि आधुनिक युद्ध सिर्फ मिसाइल और ड्रोन का नहीं, लॉजिस्टिक्स का भी होता है। अमेरिका अपनी नौसेना पर खरबों डॉलर खर्च करता है, फिर भी ईरान जैसे क्षेत्र में लंबे समय तक ऑपरेशन चलाने में सप्लाई चेन दबाव में आ रही है। 

पहले टॉयलेट की समस्या, अब खाने की कमी — सोशल मीडिया पर यूजर्स मज़ाक उड़ा रहे हैं कि “दुनिया की सबसे ताकतवर नौसेना भूख और शौचालय की लड़ाई लड़ रही है”। ईरान समर्थक अकाउंट्स तो इसे “ट्रंप प्रशासन की नाकामी” बता रहे हैं।

महिलाओं की सुरक्षा से लेकर वैश्विक युद्ध तक — दोहरी नीति?
जब अमेरिका दुनिया को “महिला सुरक्षा”, “मानवाधिकार” और “न्याय” का उपदेश देता है, तो उसके अपने सैनिक (महिलाओं सहित) भूखे पेट तैनात हैं। वहीं घरेलू मोर्चे पर भी अमेरिका की नीतियाँ सवालों के घेरे में हैं। 

भारत में हम देखते हैं कि महिला सुरक्षा के नाम पर बड़े-बड़े नारे लगाए जाते हैं, लेकिन जब शक्तिशाली लोग या वोट बैंक शामिल होते हैं तो न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है। खरात केस में गवाह की मौत, व्यापम घोटाले में दर्जनों गवाहों की रहस्यमयी मौतें, राम रहीम जैसे दोषियों को बार-बार पैरोल — ये सब दिखाते हैं कि सत्ता और प्रभाव न्याय को कैसे मोड़ देते हैं।

अमेरिका भी वैश्विक स्तर पर यही खेल खेल रहा है — एक तरफ ईरान पर हमले की तैयारी, दूसरी तरफ अपने सैनिकों की हालत पर चुप्पी। 

 सबक क्या है?
महिला सुरक्षा हो या सैनिकों की भलाई — दोनों ही मामलों में सच्चाई छिपाई नहीं जा सकती। लंबे संघर्ष में लॉजिस्टिक्स की कमी, गवाहों की सुरक्षा की कमी या दोषियों को राजनीतिक संरक्षण — ये सब व्यवस्था की कमजोरी दिखाते हैं। 

अमेरिकी नौसेना के सैनिक भले ही 30 दिन का स्टॉक होने का दावा करें, लेकिन परिवारों द्वारा शेयर की गई तस्वीरें और संदेश साफ बताते हैं कि स्थिति सामान्य नहीं है। सैनिक जब भूखे होंगे तो लड़ाई का जज्बा कैसे बरकरार रहेगा?

लो भाईयों, यही है आज की “सुपरपावर” की हकीकत। खाने के फाँफे, टॉयलेट की कतारें और घर से भेजे पैकेज अटके पड़े — जबकि अरब सागर में तनाव चरम पर है। 

न्याय की मांग हर जगह एक समान होनी चाहिए — चाहे वो महिलाओं पर अत्याचार का मामला हो, गवाहों की सुरक्षा का सवाल हो, या सैनिकों की भलाई का। चुप्पी अन्याय को बढ़ावा देती है। सच्चाई सामने आए और व्यवस्था सबके लिए समान बने — यही असली सुरक्षा और न्याय है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 20,2026 
April 20, 2026

लो भाईयों, महिला सुरक्षा का नया अध्याय: खरात केस में गवाह की 'रहस्यमयी' मौत और भाजपा की दोहरी नीति

लो भाईयों, महिला सुरक्षा का नया अध्याय: खरात केस में गवाह की 'रहस्यमयी' मौत और भाजपा की दोहरी नीति-Friday World-April 20,2026
महाराष्ट्र के नासिक में स्वयंभू 'गॉडमैन' अशोक खरात के यौन उत्पीड़न और महिलाओं के शोषण के मामले ने एक बार फिर देश की न्याय व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। खरात के शिवनिका ट्रस्ट के उपाध्यक्ष और उनके बेहद करीबी डॉक्टर जितेंद्र शेलके की समृद्धि महामार्ग पर हुई सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। उनकी पत्नी अनुराधा शेलके भी मौके पर ही जान गंवा बैठीं, जबकि उनका बेटा गंभीर रूप से घायल है।

यह हादसा महज एक साधारण ट्रैफिक एक्सीडेंट लगता है, लेकिन खरात केस के संदर्भ में यह पहली 'रहस्यमयी मौत' बन गई है। डॉ. जितेंद्र शेलके ट्रस्ट में खास आदमी थे। उनके पास खरात की कई गतिविधियों के राज़ थे—जमीन की खरीद-फरोख्त, ट्रस्ट के वित्तीय मामलों और महिलाओं से जुड़े आरोपों के अंदरूनी तथ्य। अब जब SIT जांच में शिकंजा कस रहा है, तो उनका जाना कई सवाल खड़े कर रहा है: क्या यह सच्चाई को दबाने की कोशिश थी? हादसा या साजिश?

 खरात केस: महिलाओं के शोषण का नया अध्याय
अशोक खरात पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न, बलात्कार और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं। उनके ट्रस्ट को महिलाओं को आध्यात्मिक नाम पर लूटने और शोषण करने का माध्यम बताया जा रहा है। वायरल MMS और पीड़ितों की शिकायतों ने मामले को सुर्खियों में ला दिया। ऐसे में मुख्य गवाह की मौत न सिर्फ जांच को प्रभावित करेगी, बल्कि अन्य गवाहों में भी डर का माहौल पैदा करेगी।

यह पहली मौत है, लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसे बड़े कांडों में गवाहों का गायब होना या 'रहस्यमयी' मौतें आम हो जाती हैं।

 व्यापम कांड: गवाहों की मौत का भयावह रिकॉर्ड
मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला (Vyapam Scam) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। 2013 में सामने आए इस घोटाले में परीक्षा पेपर लीक, भर्ती में घूसखोरी और नकली उम्मीदवारों का खेल चला। लेकिन घोटाले की जांच शुरू होते ही गवाहों और आरोपियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 23 से 40 से ज्यादा 'असामान्य मौतें' हुईं। अनौपचारिक रूप से यह संख्या 100 के पार बताई जाती है। कुछ गवाह सड़क हादसों में मारे गए, कुछ को 'हृदयाघात' या 'आत्महत्या' बताया गया। एक पत्रकार जो जांच कर रहा था, वह भी रहस्यमयी परिस्थितियों में मरा। पूरे कांड में सिर्फ एक नेता (वो भी भाजपा का) जेल गया, बाकी बड़े मछली बच निकले।

व्यापम में भी यही सवाल उठे थे—क्या गवाहों को खामोश करने के लिए सिस्टम का इस्तेमाल हो रहा था? आज खरात केस में डॉ. जितेंद्र शेलके की मौत उसी पैटर्न की याद दिलाती है। क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?

 राम रहीम और हरियाणा की 'महिला सुरक्षा' नीति
जबकि महाराष्ट्र में खरात केस गर्म है, हरियाणा में भाजपा सरकार बाबा राम रहीम (Gurmeet Ram Rahim Singh) को लेकर चर्चा में है। दो महिलाओं के बलात्कार और एक हत्या के दोषी राम रहीम को 2017 से अब तक 15 बार से ज्यादा पैरोल मिल चुकी है। हरियाणा सरकार की अनुमति से वे दर्जनों बार जेल से बाहर आकर 'मौज' मना चुके हैं।

2022 में हरियाणा सरकार ने नया कानून बनाया, जिसके तहत 'अच्छे आचरण' वाले कैदियों को आसानी से अस्थायी रिहाई मिल सके। राम रहीम जैसे 'हार्डकोर' दोषी भी इस कानून का फायदा उठा रहे हैं। वे सिरसा डेरा में रहकर राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय दिखते हैं। SGPC और महिलाओं के संगठन बार-बार विरोध कर चुके हैं, लेकिन सरकार अपनी 'उदारता' पर अड़ी हुई है।

पीड़ित परिवार और महिला अधिकार कार्यकर्ता पूछते हैं—क्या यही है महिलाओं की सुरक्षा? एक दोषी बलात्कारी को बार-बार जेल से बाहर भेजकर सरकार महिलाओं को क्या संदेश दे रही है? राम रहीम पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आरोप हैं, फिर भी उन्हें 'महिला सुरक्षा' का गुरु बनाने की कोशिश क्यों?

 दोहरी नीति और न्याय की पोल
भाजपा शासित राज्यों में महिला सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी घोषणाएं होती हैं—बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, सख्त कानून। लेकिन जब बात अपने सहयोगियों या वोट बैंक की आती है, तो चुप्पी साध ली जाती है। 

- व्यापम में गवाह मरे, बड़े नेता बच गए।
- राम रहीम को बार-बार पैरोल, जबकि पीड़ित महिलाएं अभी भी न्याय की गुहार लगाती हैं।
- अब खरात केस में मुख्य गवाह की मौत—फिर वही सवाल: क्या न्याय व्यवस्था गवाहों की रक्षा करने में नाकाम है?

ये घटनाएं दिखाती हैं कि जब शक्तिशाली लोग शामिल होते हैं, तो जांच का रुख बदल जाता है। गवाह डर जाते हैं, सबूत गायब हो जाते हैं और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। महिलाओं पर होने वाले अन्याय का ज्ञान देने वाले लोग खुद उन अपराधियों को संरक्षण देते नजर आते हैं, जिनके खिलाफ महिलाएं लड़ रही हैं।

 क्या सीखें हम?
महिला सुरक्षा सिर्फ कानून बनाने या नारेबाजी से नहीं आती। यह तब आती है जब:
- गवाहों को सुरक्षा मिले,
- जांच निष्पक्ष हो,
- दोषियों को राजनीतिक संरक्षण न मिले,
- और व्यवस्था सभी के लिए समान हो।

खरात केस, व्यापम घोटाला और राम रहीम पैरोल—ये तीनों घटनाएं एक ही कहानी कहती हैं। सत्ता और प्रभाव वाले लोग न्याय को प्रभावित करते हैं। आम आदमी या पीड़ित महिला के लिए न्याय दूर की कौड़ी बन जाता है।

लो भाईयों, यही है आज की 'महिला सुरक्षा'। जाओ, ले लो न्याय... अगर मिले तो।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026 

👉 यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक सूचनाओं, मीडिया रिपोर्टों और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। जांच एजेंसियां अभी भी खरात केस की जांच कर रही हैं—अंतिम सत्य अदालत तय करेगी। लेकिन गवाहों की मौत जैसे पैटर्न को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सच्चाई की तलाश और न्याय की मांग हर नागरिक का अधिकार है। 

Sunday, 19 April 2026

April 19, 2026

मणिपुर: बच्‍चों की निर्दोष मौत ने फिर भड़काई हिंसा की लपटें एक राज्य जो शांति की आस में सिसक रहा है

मणिपुर: बच्‍चों की निर्दोष मौत ने फिर भड़काई हिंसा की लपटें एक राज्य जो शांति की आस में सिसक रहा है-Friday World-April 20,2026 
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर में एक बार फिर से अशांति की काली छाया घिर गई है। कई महीनों की मेहनत से धीरे-धीरे लौट रही शांति की किरणें, अप्रैल 2026 की शुरुआत में एक भयानक बम विस्फोट के साथ बुझ गईं। दो निर्दोष नाबालिग बच्चों की मौत और उनकी मां की गंभीर हालत ने पूरे इम्फाल घाटी को आग की लपटों में झोंक दिया। हजारों लोग सड़कों पर उतर आए, मशाल जुलूस निकाले गए, और कुछ जगहों पर प्रदर्शन हिंसक रूप ले बैठे। यह घटना न सिर्फ एक परिवार की तबाही है, बल्कि पूरे राज्य के घावों को फिर से हरा कर देने वाली सच्चाई है।

 7 अप्रैल 2026: वो रात जो भूल नहीं पाएगा मणिपुर

7 अप्रैल की आधी रात, बिष्णुपुर जिले के ट्रोंगलाओबी (Tronglaobi) अवांग लीकाई गांव में एक साधारण परिवार सो रहा था। घर के मालिक ओइनाम मंगलंगबा सिंह सुरक्षा बलों से जुड़े थे। अचानक एक तेज विस्फोट ने पूरे इलाके को हिला दिया। बम के छर्रे घर की दीवारों को भेदते हुए बच्चों के बिस्तर तक पहुंच गए। 

पांच साल के ओइनाम टॉमथिन मौके पर ही शहीद हो गए। उनकी मात्र पांच महीने की बहन ओइनाम लैसाना (या याइसाना) भी घायल हुईं और बाद में उनकी मौत हो गई। मां ओइनाम बिनीता (35 वर्ष) गंभीर रूप से घायल होकर अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही हैं। यह हमला एक सुरक्षा कर्मी के परिवार पर हुआ, जो पहले से ही राज्य की अशांति से जूझ रहा था।
स्थानीय लोगों और मैतेई संगठनों ने तुरंत इसे कुकी-जो उग्रवादियों का हमला बताया। उनका आरोप था कि बम “पहाड़ी इलाकों” से आया। हालांकि कुकी संगठनों ने किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया। सुरक्षा बलों ने मौके से unexploded RPG और IED बरामद किए, जिससे हमले की गंभीरता साफ झलकती है।

 आक्रोश की लहर: प्रदर्शन से हिंसा तक

घटना की खबर फैलते ही बिष्णुपुर में गुस्सा फूट पड़ा। सैकड़ों लोग CRPF कैंप पर टूट पड़े, वाहनों को आग के हवाले कर दिया। सुरक्षा बलों ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए गोली चलाई, जिसमें दो प्रदर्शनकारी मौके पर मारे गए और कई घायल हुए। कुल मिलाकर उस दिन चार मौतें दर्ज की गईं — दो बच्चे बम से, और दो प्रदर्शनकारी पुलिस फायरिंग से।

इसके बाद इम्फाल घाटी (इम्फाल वेस्ट, बिष्णुपुर, काकचिंग आदि) में लगातार मशाल जुलूस (torchlight rallies) शुरू हो गए। महिलाओं की बड़ी तादाद में भागीदारी रही — मैरा पाइबी समूह और अन्य स्थानीय संगठनों ने मोर्चा संभाला। **कुकी-मैतेई जातीय हिंसा** की पुरानी यादें ताजा हो गईं, और लोग एक बार फिर सड़कों पर उतर आए।

19 अप्रैल 2026 (रविवार) की रात को तो माहौल और गर्म हो गया। हजारों लोग कई जिलों में सड़कों पर थे। कुछ जगहों पर पत्थरबाजी, पेट्रोल बम और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। सुरक्षा बलों ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और कभी-कभी गोलीबारी का सहारा लिया। इम्फाल वेस्ट के सागोलबंद, कोइरेंगेई, उरीपोक और काकचिंग जैसे इलाकों में तनाव चरम पर रहा।

 वर्तमान हालात: शटडाउन, इंटरनेट बंदी और तनाव

20 अप्रैल 2026 तक की स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है:
- इम्फाल घाटी में 5 दिनों का शटडाउन (19 अप्रैल से शुरू) चल रहा है, जिससे स्कूल, बाजार, परिवहन सब ठप हैं।
- मोबाइल इंटरनेट और कुछ जगहों पर ब्रॉडबैंड सेवाएं निलंबित हैं, ताकि अफवाहें न फैलें।
- सुरक्षा बलों ने कई गिरफ्तारियां की हैं। पत्थरबाजी करने वालों और सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने वालों (अराम्बाई टेंग्गोल से जुड़े कुछ लोगों सहित) को हिरासत में लिया गया है।
- मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह (Yumnam Khemchand Singh) ने हाई-लेवल मीटिंग की, सुरक्षा बलों के साथ समन्वय बढ़ाया और इलाकों का दौरा किया। उन्होंने हमले को “बार्बरिक एक्ट” बताया जो राज्य सरकार को अस्थिर करने की साजिश है। मामले को NIA को सौंप दिया गया है।

सरकार ने शांति की अपील की है और चेतावनी दी कि हिंसा करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी।

 गहरी पृष्ठभूमि: 2023 से चला आ रहा चक्रव्यूह

यह ताजा हिंसा 2023 से शुरू हुई मैतेई-कुकी जातीय संघर्ष की निरंतरता है। उस साल मई में आरक्षण, भूमि अधिकार और जनसांख्यिकीय बदलाव को लेकर हिंसा भड़की। सैकड़ों लोग मारे गए, 60,000 से ज्यादा विस्थापित हुए, गांव जलाए गए और चर्च-मंदिर दोनों तरफ निशाना बने।

2026 की शुरुआत में नई सरकार (मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह के नेतृत्व में) बनी थी। फरवरी में राष्ट्रपति शासन हटा और शांति प्रयास शुरू हुए — दोनों समुदायों के बीच संवाद, विस्थापितों की वापसी की कोशिशें। मार्च में पहली बार तीन साल बाद सीधा संवाद हुआ। लेकिन ट्रोंगलाओबी का बम विस्फोट इन प्रयासों पर पानी फेर गया।

प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें:
- बच्चों के हत्यारों को तुरंत गिरफ्तार कर सजा देना
- राष्ट्रीय जनगणना से पहले **NRC** (National Register of Citizens) लागू करना
- राष्ट्रीय राजमार्गों (खासकर NH-37, NH-202) पर सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना
- नार्को-टेररिज्म और अवैध हथियारों पर सख्त कार्रवाई
- विस्थापित परिवारों के सुरक्षित पुनर्वास और घायलों को न्याय

क्या कहती है सच्चाई?

यह घटना किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे मणिपुर की त्रासदी है। निर्दोष बच्चे — जो न जाति जानते थे, न राजनीति — सिर्फ सोते हुए मारे गए। उनकी मौत ने दिखाया कि कितना गहरा है अविश्वास का जहर। मैतेई बहुल घाटी में आक्रोश स्वाभाविक है, लेकिन हिंसा का रास्ता कभी समाधान नहीं हो सकता। कुकी पक्ष का इनकार भी जांच का विषय है — NIA की जांच बिना पक्षपात के होनी चाहिए।

मणिपुर की समस्या जटिल है: भूमि, पहचान, संसाधन, सशस्त्र समूह और केंद्र-राज्य समन्वय की कमी। 2023-2026 के बीच 260 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। हर नई घटना पुराने घावों को खोल देती है।

आगे का रास्ता: संवाद या फिर खून-खराबा?

मणिपुर को अब संवाद की जरूरत है, न कि बंदूकों की। मुख्यमंत्री खेमचंद सिंह ने शांति की अपील की है — यह अपील सिर्फ शब्दों तक नहीं रहनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी मजबूत कदम उठाने चाहिए: अतिरिक्त सुरक्षा बल, विकास योजनाएं, युवाओं को रोजगार और दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाली।

स्थानीय संगठनों — COCOMI, अराम्बाई टेंग्गोल, मैरा पाइबी आदि — को भी समझना होगा कि हिंसा से सिर्फ विस्थापन और मौतें बढ़ेंगी। बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे, व्यापार ठप है, पर्यटन खत्म — यह चक्र कब तक चलेगा?

मणिपुर भारत का अभिन्न अंग है। यहां की शांति न सिर्फ उत्तर-पूर्व की, बल्कि पूरे देश की स्थिरता से जुड़ी है। ट्रोंगलाओबी के दो मासूम बच्चों की आत्मा को न्याय तभी मिलेगा, जब राज्य में सच्ची शांति लौटेगी।

मणिपुर फिर खड़ा होगा — लेकिन तभी, जब उसके लोग एक-दूसरे का हाथ थामेंगे, न कि हथियार।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 20,2026 
April 19, 2026

ડાંગમાં ડ્રાય ડેનો ‘અજાયબ’ આદેશ: દારૂબંધીવાળા ગુજરાતમાં પણ ચૂંટણી માટે અલગ નિયમ – કાયદો-વ્યવસ્થા જાળવવા કે રાજકીય રમત?

ડાંગમાં ડ્રાય ડેનો ‘અજાયબ’ આદેશ: દારૂબંધીવાળા ગુજરાતમાં પણ ચૂંટણી માટે અલગ નિયમ – કાયદો-વ્યવસ્થા જાળવવા કે રાજકીય રમત?
-Friday World-April 20,2026 
ગુજરાતમાં સત્તાવાર રીતે દારૂબંધી અમલમાં છે તે છતાં ડાંગ જિલ્લાના મેજિસ્ટ્રેટે સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીને ધ્યાનમાં રાખીને વિશેષ ‘ડ્રાય ડે’ જાહેર કર્યો છે. આ જાહેરનામું બહાર પડતાં જ લોકોમાં કુતૂહલ અને આશ્ચર્યનો માહોલ જોવા મળી રહ્યો છે. ઘણા પ્રશ્નો ઉઠી રહ્યા છે – જો આખા રાજ્યમાં જ દારૂ પર પ્રતિબંધ છે, તો ડાંગ જિલ્લામાં અલગથી ડ્રાય ડે જાહેર કરવાની જરૂર શા માટે પડી?

આ નિર્ણયનો હેતુ સ્પષ્ટ છે: 26 એપ્રિલ 2026ના રોજ યોજાનાર સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણી દરમિયાન મતદારો નિર્ભયપણે મતદાન કરી શકે, કોઈ અનિચ્છનીય ઘટના ન બને અને કાયદો-વ્યવસ્થા સુરક્ષિત રહે. તેમ છતાં, દારૂબંધીના રાજ્યમાં આવા વિશેષ આદેશે ચર્ચાનું વાતાવરણ ઊભું કર્યું છે.
ડ્રાય ડેની વિગતો – ક્યારે અને કેટલા સમય સુધી?
ડાંગ જિલ્લા મેજિસ્ટ્રેટ શાલિની દુહાનના જાહેરનામા અનુસાર:

- 24 એપ્રિલ 2026 ની સાંજે 6:00 વાગ્યાથી શરૂ થઈને 26 એપ્રિલ 2026 ના મતદાન પૂર્ણ થાય ત્યાં સુધી (લગભગ 48 કલાક) ડ્રાય ડે રહેશે.
- 28 એપ્રિલ 2026 (મંગળવાર)ના રોજ મતગણતરી ના દિવસે પણ સંપૂર્ણ ડ્રાય ડે જાહેર કરવામાં આવ્યો છે.

આ સમયગાળા દરમિયાન દારૂનું વેચાણ, ખરીદી, પીરસવું કે વપરાશ પર સંપૂર્ણ પ્રતિબંધ રહેશે. જાહેરનામાનો ભંગ કરનાર વ્યક્તિ કે સ્થાપના વિરુદ્ધ *મુંબઈ પ્રોહિબીશન એક્ટ ની સંબંધિત કલમો હેઠળ ગુનો નોંધીને કાર્યવાહી કરવામાં આવશે અને જેલભેગા કરી શકાશે.

પોલીસને મળેલી વિશેષ સત્તા
જાહેરનામામાં પોલીસ અધિકારીઓને વિશેષ અધિકાર આપવામાં આવ્યા છે. પોલીસ સબ-ઈન્સ્પેક્ટર (PSI) અથવા તેથી ઉપરના હોદ્દા ધરાવતા તમામ અધિકારીઓને આદેશનો ભંગ કરનારાઓ વિરુદ્ધ તાત્કાલિક ફરિયાદ નોંધવાની અને કાર્યવાહી કરવાની સત્તા આપવામાં આવી છે. આનાથી કાયદાનો અમલ વધુ કડક અને ત્વરિત બને તેવી અપેક્ષા છે.

 ડાંગ જિલ્લાનું વિશેષ મહત્વ
ડાંગ જિલ્લો ગુજરાતનો સૌથી નાનો અને આદિવાસી-પ્રધાન જિલ્લો છે. અહીંની ભૌગોલિક સ્થિતિ, જંગલો અને આદિવાસી સમાજની સંસ્કૃતિને કારણે કેટલીક વખત સ્થાનિક સમસ્યાઓ અલગ પ્રકારની હોય છે. સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીમાં (જિલ્લા પંચાયત, તાલુકા પંચાયત અને ગ્રામ પંચાયતો) મતદાનનું પ્રમાણ વધારવા અને કોઈ અનુચિત પ્રભાવ ન પડે તે માટે આ પગલું ભરવામાં આવ્યું છે.

ગુજરાતમાં 26 એપ્રિલ 2026ના રોજ સમગ્ર રાજ્યમાં સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીઓ યોજાવાની છે. આમાં 15 મ્યુનિસિપલ કોર્પોરેશન, 84 મ્યુનિસિપાલિટી, 34 જિલ્લા પંચાયત અને 260 તાલુકા પંચાયતોની સીટો માટે મતદાન થશે. મતગણતરી 28 એપ્રિલે થશે. આવા મોટા પાયાના ચૂંટણી કાર્યક્રમમાં કાયદો-વ્યવસ્થા જાળવવી એ પ્રશાસન માટે મોટો પડકાર છે.

 દારૂબંધી અને ડ્રાય ડે વચ્ચેનો વિરોધાભાસ
ગુજરાત એકમાત્ર એવું મુખ્ય રાજ્ય છે જ્યાં 1949ના ગુજરાત પ્રોહિબિશન એક્ટ હેઠળ સંપૂર્ણ દારૂબંધી અમલમાં છે. અહીં દારૂની ખરીદી-વેચાણ માટે ખાસ પરમિટની જરૂર પડે છે અને તે પણ મર્યાદિત વ્યક્તિઓને જ. આવી સ્થિતિમાં ડાંગ જેવા જિલ્લામાં અલગથી ડ્રાય ડે જાહેર કરવું ઘણા લોકોને વિરોધાભાસી લાગી રહ્યું છે.

કેટલાક નાગરિકો પૂછી રહ્યા છે:
- જો રાજ્યમાં જ દારૂ ઉપલબ્ધ નથી, તો ડ્રાય ડેની જરૂર શા માટે?
- શું આનાથી અનધિકૃત દારૂના વેપાર પર અસર પડશે?
- અન્ય જિલ્લાઓમાં આવો આદેશ કેમ નથી?

પ્રશાસનનું કહેવું છે કે ચૂંટણી સમયે કોઈ પણ પ્રકારના અનિચ્છનીય પ્રભાવને રોકવા માટે આ પગલું જરૂરી છે. ભલે રાજ્યમાં દારૂબંધી હોય, તેમ છતાં કેટલાક વિસ્તારોમાં અનધિકૃત માધ્યમો દ્વારા દારૂની ઉપલબ્ધતા થઈ શકે છે. તેથી કડક નિયંત્રણ જરૂરી છે.

ચૂંટણીમાં કાયદો-વ્યવસ્થાનું મહત્વ
સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીઓમાં મતદાનનું પ્રમાણ વધારવું અને તેને નિષ્પક્ષ રાખવું એ લોકતંત્ર માટે અત્યંત મહત્વનું છે. ડાંગ જેવા આદિવાસી વિસ્તારમાં કેટલીક વખત સ્થાનિક પ્રભાવો, જૂથો અને અન્ય પરિબળો મતદાન પર અસર કરી શકે છે. આવી સ્થિતિમાં પ્રશાસનનું આ પગલું મતદારોને સુરક્ષિત અને નિર્ભય વાતાવરણ આપવાના હેતુથી લેવામાં આવ્યું છે.

ગુજરાતની સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીઓમાં આ વખતે લગભગ 4.19 કરોડ મતદારો મત આપવાના છે. આમાં મહિલાઓ, યુવાનો અને આદિવાસી વર્ગની ભાગીદારી વધારવી એ પણ મોટો લક્ષ્ય છે. ડ્રાય ડે જેવા પગલાં આ લક્ષ્યને હાંસલ કરવામાં મદદરૂપ થઈ શકે છે.

 સમાજ અને પ્રશાસન માટે સંદેશ
આ જાહેરનામું એક તરફ કુતૂહલ જગાવી રહ્યું છે તો બીજી તરફ એ પણ યાદ અપાવી રહ્યું છે કે **ચૂંટણી એ લોકતંત્રનો મહોત્સવ** છે. તેને શાંતિમય, નિષ્પક્ષ અને સુરક્ષિત રાખવી એ દરેક નાગરિકની જવાબદારી છે.

ડાંગના લોકો અને સમગ્ર ગુજરાતના મતદારોને અપીલ છે:
- મતદાન કરવા જાઓ, નિર્ભયપણે મત આપો.
- કોઈ પણ પ્રકારના અનુચિત પ્રભાવથી દૂર રહો.
- કાયદાનું પાલન કરો અને અન્યને પણ કરાવો.

જો કોઈ વ્યક્તિ કે સ્થાપના આ જાહેરનામાનો ભંગ કરે તો તેની સામે કડક કાર્યવાહી થશે. પ્રશાસન અને પોલીસ દ્વારા સતત નિગરાની રાખવામાં આવશે.

અંતમાં…
ડાંગમાં ડ્રાય ડેનો આ આદેશ ગુજરાતની દારૂબંધીની વ્યવસ્થા અને ચૂંટણી વ્યવસ્થાપન વચ્ચેના સંતુલનનું એક ઉદાહરણ છે. તે એ પણ દર્શાવે છે કે લોકતંત્રને મજબૂત બનાવવા માટે પ્રશાસન કેટલીક વખત વિશેષ પગલાં લે છે.

આ ચૂંટણીમાં દરેક મતદારની ભાગીદારી મહત્વની છે. શાંતિ અને સુરક્ષા સાથે મતદાન થાય, તે જ સૌથી મોટી જીત છે.

મતદાન કરો, લોકતંત્રને મજબૂત કરો.
ડાંગ સહિત સમગ્ર ગુજરાતમાં આ ચૂંટણી સફળ અને શાંતિપૂર્ણ રહે તેવી શુભેચ્છા.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026 
April 19, 2026

जम्मू-कश्मीर खाई में लुढ़की बस, टूटे सपने और रोते परिवार: उधमपुर हादसे ने मचा दिया कोहराम, 15 निर्दोषों की गई जान

जम्मू-कश्मीर खाई में लुढ़की बस, टूटे सपने और रोते परिवार: उधमपुर हादसे ने मचा दिया कोहराम, 15 निर्दोषों की गई जान
-Friday World-April 20,2026 
                      प्रतिकात्मक तस्वीर 
जम्मू-कश्मीर के उधमपुर जिले में सोमवार, 20 अप्रैल 2026 की सुबह एक ऐसा हादसा हो गया जिसने पूरे क्षेत्र को शोक में डुबो दिया। रामनगर-उधमपुर हाईवे पर कागोट (कागोत/कनोटे) गांव के निकट एक यात्री बस अनियंत्रित होकर सड़क से फिसल गई और लगभग 100 फीट गहरी खाई में जा गिरी। इस भीषण दुर्घटना में कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि 20 से अधिक यात्री घायल हो गए। कई घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है।

यह बस एक दूरदराज के गांव से उधमपुर शहर की ओर जा रही थी। सुबह के समय जब लोग अपने रोजमर्रा के कामों के लिए निकले थे, तभी यह त्रासदी घटी। पहाड़ी इलाके की घुमावदार सड़क, तेज मोड़ और संभवतः ओवरस्पीड या ब्रेक फेल होने के कारण बस ड्राइवर का कंट्रोल छूट गया। बस पलटी और गहरी खाई में लुढ़क गई। आसपास के गांववासियों ने चीख-पुकार सुनकर तुरंत मौके पर पहुंचकर बचाव कार्य शुरू किया।

 हादसे का विस्तृत विवरण
रामनगर क्षेत्र की यह सड़क पर्यटकों और स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है, लेकिन पहाड़ी इलाके होने के कारण यहां सड़क संकरी और मोड़ खतरनाक हैं। बस में सवार ज्यादातर यात्री गांव के रहने वाले थे – कुछ बाजार जाने वाले, कुछ अस्पताल या सरकारी काम से उधमपुर जा रहे थे। हादसे के बाद बस पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। लोहे के टुकड़े, सामान और घायलों की कराहें पूरे इलाके में गूंज रही थीं।

बचाव दल – पुलिस, स्थानीय प्रशासन, SDRF और ग्रामीणों ने मिलकर घायलों को खाई से निकाला। कुछ घायलों को हेलीकॉप्टर या एंबुलेंस से उधमपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टर लगातार उनकी जान बचाने की कोशिश में जुटे हैं। मृतकों की पहचान अभी पूरी तरह नहीं हो पाई है, लेकिन परिवारों में मातम का माहौल है।

 जम्मू-कश्मीर में सड़क दुर्घटनाएं: एक पुरानी समस्या
यह हादसा कोई पहला नहीं है। जम्मू-कश्मीर, खासकर उधमपुर, रामनगर और आसपास के पहाड़ी इलाकों में ऐसे बस हादसे बार-बार होते रहते हैं। 2016 में उधमपुर में ही एक बस 300 फीट गहरी खाई में गिरी थी, जिसमें 11 लोगों की जान गई थी। 2022 में रामनगर में बरातियों से भरी बस खाई में गिरी, जिसमें 3 मौतें हुईं। हाल के वर्षों में भी कई छोटे-बड़े हादसे दर्ज हुए हैं।

कारण लगभग एक जैसे हैं:
- खराब सड़कें और अपर्याप्त चौड़ीकरण
- तेज रफ्तार और अनुभवहीन ड्राइवर
- खराब मौसम और कोहरा (हालांकि आज मौसम साफ था)
- ओवरलोडिंग – बसों में क्षमता से ज्यादा यात्री
- ब्रेक और टायर की खराब स्थिति

राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी दुर्घटनाएं कम नहीं हैं। जनवरी 2026 में उधमपुर के जखानी-चेनानी इलाके में एक बस ने पार्क्ड वाहन को टक्कर मारी, जिसमें CRPF जवान समेत 4 लोगों की मौत हुई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि सड़क सुरक्षा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

 पीड़ित परिवारों 
हर हादसे के पीछे कई अधूरी कहानियां होती हैं। एक परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य, किसी की नई शादी, किसी का सपना शहर में बेहतर जीवन का। घायलों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल हैं। अस्पताल में रोते परिजन, डॉक्टरों की भागदौड़ और प्रशासन का शोक संदेश – यह दृश्य हर बार दिल को चीर जाता है।

उपराज्यपाल और स्थानीय नेताओं ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मृतकों के परिवारों को आर्थिक मदद और घायलों के इलाज का भरोसा दिया गया है। लेकिन क्या ये मुआवजा उन खाली कुर्सियों को भर पाएगा? क्या ये उन बच्चों के भविष्य को सुरक्षित कर पाएगा जिनके माता-पिता इस हादसे में चले गए?

सड़क सुरक्षा: समय आ गया है सख्ती दिखाने का
यह हादसा हमें कई सबक देता है:
1. बस ऑपरेटरों की जिम्मेदारी — वाहनों की नियमित चेकिंग, ड्राइवरों को ट्रेनिंग और ओवरलोडिंग पर सख्ती जरूरी।
2. सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर — पहाड़ी क्षेत्रों में गार्ड रेलिंग, चौड़ी सड़कें, बेहतर साइन बोर्ड और स्पीड ब्रेकर लगाने की जरूरत।
3. यात्री जागरूकता — सीट बेल्ट, ओवरस्पीड न करने की सलाह और ड्राइवर को सतर्क रखना।
4. सरकारी स्तर पर — जम्मू-कश्मीर सरकार और केंद्र को सड़क दुर्घटनाओं पर विशेष अभियान चलाना चाहिए। AI कैमरे, स्पीड मॉनिटरिंग और सख्त लाइसेंस नियम लागू हों।

रामनगर-उधमपुर मार्ग पर पहले भी कई सुझाव दिए गए थे, लेकिन अमल कहां है? अगर समय रहते सुधार नहीं हुए तो ऐसे हादसे दोहराते रहेंगे।

अंत में एक अपील
यह दुखद घटना सिर्फ आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की चीख है जो आज बेसहारा हो गए। हमें सड़क सुरक्षा को व्यक्तिगत जिम्मेदारी माननी होगी। ड्राइवर हो, यात्री हो या प्रशासन – हर कोई सतर्क रहे तो कई जानें बचाई जा सकती हैं।

मृतकों की आत्मा को शांति मिले। घायल जल्द स्वस्थ हों। परिजनों को इस दुख को सहन करने की शक्ति मिले। 

सड़क हादसे रोकना हमारे हाथ में है।
चलते समय एक बार सोचें – क्या मेरी स्पीड जरूरी है? क्या वाहन फिट है? क्या मैं जिम्मेदार हूं?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026 
April 19, 2026

गरीब कल्याणकारी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रतापगढ़ में विशाल नि:शुल्क मेडिकल कैंप का आयोजन

गरीब कल्याणकारी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रतापगढ़ में विशाल नि:शुल्क मेडिकल कैंप का आयोजन
-Friday World-April 20,2026
​प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश): समाज सेवा के क्षेत्र में अग्रणी संस्था गरीब कल्याणकारी चैरिटेबल ट्रस्ट (GKT) द्वारा प्रतापगढ़ के पूरे सुखदेव, कटरा गुलाब सिंह में एक विशाल नि:शुल्क चिकित्सा शिविर का सफल आयोजन किया गया। इस शिविर में क्षेत्र के सैकड़ों असहाय और जरूरतमंद लोगों ने नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच कराई और मुफ्त दवाइयां प्राप्त कीं।
​वरिष्ठ नेतृत्व का मार्गदर्शन
​इस कार्यक्रम का सफल संचालन ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष इकराम साबरी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील कुमार तिवारी के कुशल नेतृत्व में किया गया। राष्ट्रीय अध्यक्ष इकराम साबरी ने इस अवसर पर कहा कि संस्था का मुख्य उद्देश्य समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना है।
​वही, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील कुमार तिवारी ने स्थानीय स्तर पर व्यवस्थाओं की कमान संभालते हुए स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि "स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र की नींव है, और GKT इस दिशा में निरंतर कार्य करता रहेगा।"
​प्रमुख उपस्थिति एवं सेवाएँ
​शिविर में चिकित्सा जगत के विशेषज्ञों ने अपनी सेवाएँ दीं, जिनमें 'बजा विश्वविद्यालय' के विशेषज्ञों द्वारा एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर और प्रोफेशनल काउंसलिंग प्रदान की गई। कार्यक्रम के दौरान निम्नलिखित प्रमुख सदस्य सक्रिय रूप से उपस्थित रहे:
​अस्लम महमूद (राष्ट्रीय महामंत्री)
​एडवोकेट आजम भारती (राष्ट्रीय मुख्य प्रवक्ता)
​प्रीति मिश्र (जिला अध्यक्ष, प्रतापगढ़)
​पूनम मिश्र (जिला उपाध्यक्ष, प्रतापगढ़)
​जनहित में निरंतर सेवा का संकल्प
​शिविर के समापन पर ट्रस्ट के सदस्यों ने संकल्प लिया कि भविष्य में भी उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे जनहितैषी कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। स्थानीय ग्रामीणों ने संस्था के इस सराहनीय कार्य की प्रशंसा की और ट्रस्ट के पदाधिकारियों का आभार व्यक्त किया।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026