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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 21 June 2026

June 21, 2026

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के युद्ध ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा, अब कौन बनेगा इस्लामिक दुनिया का सुल्तान?

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के युद्ध ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा, अब कौन बनेगा इस्लामिक दुनिया का सुल्तान?
-Friday World 21 Jun 2026
28 फरवरी 2026 की सुबह जब दुनिया की निगाहें यूक्रेन और ताइवान पर थीं, तब फारस की खाड़ी में इतिहास का रुख बदल रहा था। अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुआ 39 दिन का सीधा सैन्य टकराव 7 अप्रैल को उस मोड़ पर आकर रुका, जहां वॉशिंगटन ने तेहरान की शर्तों पर समझौता स्वीकार किया। यह सिर्फ एक युद्धविराम नहीं था। यह उस युग की शुरुआत थी जिसमें अमेरिका को पहली बार मिडिल ईस्ट में एक क्षेत्रीय ताकत के सामने झुकते हुए देखा गया। 

युद्ध की शुरुआत: 28 फरवरी की वह रात
28 फरवरी को होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी ड्रोन और ईरानी नौसेना के बीच झड़प के बाद हालात बेकाबू हो गए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ईरान के तीन परमाणु ठिकानों पर लक्षित हमले किए। जवाब में ईरान ने "ऑपरेशन जुल्फिकार" लॉन्च किया। यह 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार था जब ईरान ने किसी महाशक्ति से आमने-सामने की जंग छेड़ी। 

पहले 72 घंटों में ही ईरान ने इजरायल के हाइफा पोर्ट, तेल अवीव के रक्षा मुख्यालय और डिमोना पर बैलिस्टिक मिसाइलों की बारिश कर दी। इजरायल का आयरन डोम और डेविड स्लिंग सिस्टम सैचुरेशन अटैक के आगे बेबस दिखा। मोसाद की दशकों से बुनी गई प्रॉक्सी नेटवर्क की रणनीति ध्वस्त हो गई, क्योंकि हिजबुल्लाह, हौथी और इराकी मिलिशिया नहीं, बल्कि खुद ईरानी सेना मैदान में थी।

खाड़ी में मिसाइलों का तूफान: GCC की नींव हिली
युद्ध का दूसरा चरण सबसे चौंकाने वाला था। 6 मार्च से 20 मार्च के बीच ईरान ने कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत पर 1400 से ज्यादा मिसाइलें और ड्रोन दागे। 

1. कतर: अल उदैद एयरबेस, जहां अमेरिकी सेंटकॉम का मुख्यालय है, पर 11 फतेह-360 मिसाइलें गिरीं। दोहा के एलएनजी टर्मिनल 9 दिनों तक बंद रहे। 

2. सऊदी अरब: अरामको की अबकैक और खुरैस रिफाइनरी फिर निशाने पर आईं। जेद्दा पोर्ट पर हमले से लाल सागर का व्यापार 72% तक गिर गया। 

3. यूएई: दुबई का जेबेल अली पोर्ट और अबू धाबी का बराका न्यूक्लियर प्लांट सायरन से गूंज उठे। बुर्ज खलीफा के पास धमाकों ने निवेशकों का भरोसा हिला दिया।

4. बहरीन और कुवैत: अमेरिकी नौसेना के 5वें बेड़े के मुख्यालय और कुवैती तेल क्षेत्रों पर हमलों ने खाड़ी की सुरक्षा गारंटी को सवालों में डाल दिया।

इन हमलों में सैकड़ों नागरिकों की जान गई। ऊर्जा सप्लाई रुकने से ब्रेंट क्रूड 143 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यूरोप और एशिया में महंगाई ने 2008 जैसे हालात पैदा कर दिए। ईरान का संदेश साफ था: "हम अकेले लड़ेंगे, और पूरी कीमत वसूलेंगे।"

अमेरिका पीछे क्यों हटा? तीन बड़ी वजहें
39 दिनों तक चले युद्ध में अमेरिका के पास सैन्य बढ़त थी, फिर भी 7 अप्रैल को वह समझौते की मेज पर आया। इसके पीछे तीन ठोस कारण रहे:

1. घरेलू दबाव और चुनावी साल: नवंबर 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हैं। लगातार तेल की कीमतें, शेयर बाजार में गिरावट और सैनिकों के शव वापस आने से जनता में आक्रोश बढ़ रहा था। पेंटागन के आकलन के मुताबिक युद्ध 6 महीने खींचता तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी में जाती।

2. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का ब्लॉकेड
: ईरान ने 21 मार्च को होर्मुज जलडमरूमध्य में माइन बिछा दीं और अपने तट से एंटी-शिप मिसाइलें तैनात कर दीं। दुनिया का 30% तेल यहीं से गुजरता है। एक भी टैंकर डूबता तो वैश्विक सप्लाई चेन चरमरा जाती।

3. इजरायल की रणनीतिक हार: इजरायल ने दशकों तक "मोविंग द वॉर अवे फ्रॉम होम" की नीति अपनाई। प्रॉक्सी वॉर से वह खुद को बचाता रहा। लेकिन इस बार जंग उसके घर पहुंच गई। तेल अवीव में 14 दिन तक बिजली गुल रही। 3 लाख इजरायली साइप्रस और ग्रीस भागे। इजरायल ने अमेरिका पर युद्ध रोकने का दबाव बनाया।

समझौते की शर्तें: तेहरान ने क्या हासिल किया?
कतर की मध्यस्थता में दोहा में हुए समझौते की 5 बड़ी शर्तें सामने आईं:

1. प्रतिबंधों में ढील: अमेरिका ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर लगे 60% प्रतिबंध हटाएगा। 

2. परमाणु कार्यक्रम: ईरान 60% यूरेनियम संवर्धन जारी रखेगा, लेकिन हथियार नहीं बनाएगा। IAEA की सीमित निगरानी मंजूर। 

3. क्षेत्रीय गारंटी: अमेरिका खाड़ी देशों में स्थायी सैन्य अड्डे नहीं बढ़ाएगा। 

4. यमन और सीरिया: सऊदी अरब यमन से सेना वापस बुलाएगा। ईरान सीरिया में अपनी मौजूदगी घटाएगा। 

5. युद्धबंदियों की अदला-बदली: दोनों तरफ के 400 से ज्यादा सैनिक और वैज्ञानिक रिहा होंगे।

यह शर्तें 2015 की JCPOA डील से कहीं ज्यादा ईरान के पक्ष में हैं। तेहरान ने साबित कर दिया कि मेज पर जगह बातचीत से नहीं, ताकत से बनती है।

GCC की नई हकीकत: एकता टूटी, अविश्वास बढ़ा
खाड़ी सहयोग परिषद इस युद्ध की सबसे बड़ी राजनीतिक हार है। 1981 में ईरान के डर से बना GCC आज बिखराव के कगार पर है। 

कतर ने युद्ध के दौरान ईरान से गुप्त चैनल खोलकर मध्यस्थता की। ओमान शुरू से तटस्थ रहा। कुवैत ने अमेरिका को अपना एयरस्पेस देने से इनकार कर दिया। सिर्फ बहरीन और यूएई आखिर तक अमेरिकी खेमे में डटे रहे। सऊदी अरब बीच में झूलता रहा। 

हमलों के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस ने कहा, "हमारी सुरक्षा की गारंटी अब वॉशिंगटन नहीं दे सकता।" रियाद अब बीजिंग और मॉस्को से एयर डिफेंस खरीद रहा है। GCC का "एक के लिए सब, सब के लिए एक" का सिद्धांत दफन हो चुका है।

अब सबसे बड़ा सवाल: इस्लामिक दुनिया का सुल्तान कौन?
अमेरिका के हटने से मिडिल ईस्ट में पावर वैक्यूम पैदा हुआ है। उसे भरने की दौड़ में दो दावेदार हैं: ईरान और सऊदी अरब।

ईरान का दावा: 39 दिन की जंग ने ईरान को "प्रतिरोध की धुरी" का निर्विवाद नेता बना दिया। उसने दिखाया कि वह इजरायल पर सीधा हमला कर सकता है, अमेरिकी बेस उड़ा सकता है, और होर्मुज बंद कर सकता है। शिया मिलिशिया से लेकर गाजा तक, ईरान अब वैचारिक जीत की कहानी बेच रहा है। तेहरान की सड़कों पर पोस्टर लगे हैं: "हमने करबला का बदला ले लिया।"

सऊदी अरब की चुनौती: सऊदी अरब के पास मक्का-मदीना की कस्टडी, तेल की ताकत और सुन्नी दुनिया का नेतृत्व है। विजन 2030 के तहत वह खुद को मॉडर्न इस्लामिक पावर के तौर पर पेश कर रहा है। युद्ध में नुकसान के बावजूद रियाद के पास 900 बिलियन डॉलर का संप्रभु कोष है। वह मिस्र, पाकिस्तान और इंडोनेशिया को साथ लेकर सुन्नी ब्लॉक मजबूत कर रहा है।

असली टक्कर अब विचार की है। ईरान का मॉडल है: "अमेरिका को हराओ, इज्जत कमाओ"। सऊदी का मॉडल है: "अर्थव्यवस्था बनाओ, स्थिरता लाओ"। 57 इस्लामिक देश अब तय करेंगे कि उन्हें जंग का हीरो चाहिए या विकास का आर्किटेक्ट।

दुनिया पर दूरगामी असर: 5 बड़े बदलाव

1. अमेरिकी डिटरेंस खत्म: ताइवान से लेकर यूक्रेन तक अमेरिकी सहयोगी अब सोचेंगे कि क्या वॉशिंगटन वाकई उनकी रक्षा करेगा। 

2. तेल का नया भूगोल: चीन ने ईरान से 25 साल का तेल समझौता साइन किया है। पेट्रो-युआन को बढ़ावा मिलेगा। डॉलर की बादशाहत को झटका। 

3. इजरायल की सुरक्षा नीति फेल: "क्वालिटेटिव मिलिट्री एज" का सिद्धांत टूट गया। इजरायल अब न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन पर दोबारा सोचेगा। 

4. हथियारों की नई दौड़: तुर्की, मिस्र और सऊदी अब बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन प्रोग्राम तेज करेंगे। मिडिल ईस्ट का सैन्यीकरण बढ़ेगा। 

5. भारत की दुविधा: भारत के ईरान में चाबहार पोर्ट और इजरायल से रक्षा संबंध दोनों हैं। अब दिल्ली को एक पक्ष चुनने का दबाव झेलना पड़ेगा।

एक युद्ध, सौ कहानियां
39 दिन के इस युद्ध ने साबित कर दिया कि सुपरपावर होना सिर्फ हथियारों से नहीं, राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होता है। ईरान ने वह कर दिखाया जो वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक कोई नहीं कर पाया: अमेरिका को उसकी शर्तों पर झुकाया। 

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। तेहरान में जश्न है, मगर अर्थव्यवस्था तबाह है। रियाद घायल है, मगर जेब भरी है। इस्लामिक दुनिया का सुल्तान तलवार से नहीं, तेल और तकनीक से तय होगा। 

7 अप्रैल 2026 को हुआ समझौता युद्ध का अंत नहीं, एक नए ग्रेट गेम की शुरुआत है। और इस गेम में दोस्त और दुश्मन रोज बदलेंगे। मिडिल ईस्ट अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 21 Jun 2026
June 21, 2026

हॉर्मुज स्ट्रेट पर 'टोल फ्री' का शोर, ईरान का 'सर्विस फी' वाला दांव – वैश्विक तेल सप्लाई पर फिर मंडराया संकट?

हॉर्मुज स्ट्रेट पर 'टोल फ्री' का शोर, ईरान का 'सर्विस फी' वाला दांव – वैश्विक तेल सप्लाई पर फिर मंडराया संकट? '-Friday World 21 Jun 2026

भूमिका: एक ऐलान, एक जवाब और बढ़ गया सस्पेंस
अमेरिका और ईरान के बीच महीनों से चल रहे तनाव के बाद जब डोनाल्ड ट्रंप ने 'शांति करार' का ऐलान किया तो दुनिया ने राहत की सांस ली. ट्रंप का दावा था कि हॉर्मुज स्ट्रेट अब 'पूरी तरह टोल फ्री' रहेगा. मगर 24 घंटे भी नहीं बीते कि तेहरान से ऐसा जवाब आया जिसने इस राहत को सस्पेंस में बदल दिया. ईरान ने साफ कहा- 'टोल नहीं लेंगे, लेकिन फीस जरूर वसूलेंगे'.

बस यहीं से शुरू हुई 'शब्दों की जंग'. अमेरिका इसे 'टोल फ्री' बता रहा है, ईरान इसे 'सर्विस फी' कह रहा है. सवाल वही है- क्या आम जहाज के लिए इसका मतलब बदलेगा? और सबसे बड़ा सवाल- क्या दुनिया की 20% तेल सप्लाई फिर खतरे में है?

हॉर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम?
हॉर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. ये सिर्फ 33 किमी चौड़ी पट्टी है, लेकिन इसकी अहमियत किसी महाद्वीप से कम नहीं.

- वैश्विक तेल की लाइफलाइन: दुनिया का हर 5वां बैरल कच्चा तेल यहीं से गुजरता है. रोजाना करीब 2 करोड़ बैरल तेल और दुनिया की एक-तिहाई LNG इसी रास्ते से निकलती है.
- बड़े निर्यातक देशों का रास्ता सऊदी अरब, ईरान, UAE, कुवैत, इराक और कतर अपना ज्यादातर तेल-गैस यहीं से भेजते हैं.
- कोई विकल्प नहीं*: सऊदी की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन या UAE की फुजैरा पाइपलाइन से थोड़ा-बहुत तेल निकाला जा सकता है, पर वो हॉर्मुज के ट्रैफिक का 15% भी नहीं संभाल सकतीं.

इसीलिए जब भी हॉर्मुज पर तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल के दाम सीधे आसमान छूने लगते हैं. भारत अपनी जरूरत का 60% से ज्यादा तेल इसी रास्ते से मंगाता है. मतलब, हॉर्मुज में छींक आए तो दिल्ली में पेट्रोल महंगा हो जाता है.

ट्रंप का दावा: 'हमेशा के लिए टोल फ्री'
रविवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में बड़ा ऐलान किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका-ईरान के बीच अहम डील फाइनल हो गई है.

ट्रंप के दावे के 3 बड़े पॉइंट:
1. हॉर्मुज फिर से खुला: महीनों की नाकाबंदी खत्म होगी.

2. पूरी तरह टोल फ्री यहां से गुजरने वाले किसी भी जहाज से कोई टोल नहीं लिया जाएगा.

3. युद्ध का खतरा टला: ये डील मध्य-पूर्व में बड़े युद्ध को रोकेगी और सबसे अहम ऊर्जा मार्ग को सुरक्षित करेगी.

ट्रंप ने इसे अपनी विदेश नीति की बड़ी जीत बताया. उनके मुताबिक इस करार से न सिर्फ तेल की कीमतें काबू में रहेंगी, बल्कि लाल सागर और खाड़ी में अमेरिकी नौसेना का दबाव भी कम होगा.

ईरान का पलटवार: 'टोल नहीं, सर्विस फी लेंगे'
ट्रंप के ऐलान के कुछ घंटों बाद ही तेहरान का बयान आया. ईरानी विदेश मंत्रालय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी स्ट्रेट से 'टोल' वसूलना गैरकानूनी है. इसलिए ईरान टोल नहीं लेगा.

लेकिन अगली लाइन ने सबको चौंका दिया- 'हम जहाजों को दी जाने वाली विभिन्न सेवाओं के लिए फीस जरूर वसूलेंगे'.

यहां पेंच क्या है?

1. कानूनी शब्दजाल: UNCLOS यानी समुद्री कानून के तहत अंतरराष्ट्रीय स्ट्रेट से गुजरना 'ट्रांजिट पैसेज' है. इसका मतलब, कोई देश सिर्फ गुजरने के लिए पैसा नहीं ले सकता. पर अगर वो नेविगेशन, सुरक्षा, लाइटहाउस, पायलट जैसी 'सेवा' देता है, तो उसकी 'वाजिब फीस' ले सकता है.

2. फीस कितनी होगी?: ईरान ने ये साफ नहीं किया कि कौन सी सेवा देगा और फीस कितनी होगी. क्या ये 1000 डॉलर होगी या 10 लाख डॉलर प्रति जहाज? यही सबसे बड़ा सस्पेंस है.

3. पहले कभी नहीं लगी: US-ईरान तनाव से पहले हॉर्मुज से गुजरने पर कोई फीस नहीं लगती थी. ईरान अब पहली बार ये सिस्टम शुरू करना चाहता है.

यानी ईरान ने 'टोल' शब्द हटाकर 'सर्विस फी' कर दिया. नाम बदला है, मगर जेब पर असर शायद वही रहेगा.

'टोल' vs 'सर्विस फी': असली फर्क क्या है?
आम आदमी के लिए टोल और फीस एक ही बात लगती है. मगर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शब्द बहुत मायने रखते हैं.
मुद्दा टोल सर्विस फी

कानूनी दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्ट्रेट में गैरकानूनी अगर सेवा वास्तविक है तो वाजिब फीस ली जा सकती है
**उद्देश्य** सिर्फ गुजरने के बदले पैसा वसूलना नेविगेशन, सुरक्षा, एस्कॉर्ट, लाइटहाउस जैसी सेवा का खर्च

ईरान का स्टैंड हम नहीं लेंगे, क्योंकि ये गैरकानूनी है हम लेंगे, क्योंकि हम सेवा देंगे
**अमेरिका का स्टैंड** पूरा रास्ता टोल फ्री होना चाहिए किसी भी तरह की वसूली 'टोल' के बराबर है
असली लड़ाई अब इसी बात पर होगी कि ईरान जो 'सेवा' देगा, वो वास्तविक होगी या वसूली का नया तरीका. अगर ईरान हर जहाज पर भारी भरकम 'सुरक्षा फीस' थोप दे, तो वो घुमा-फिराकर टोल ही हुआ.

अगर ईरान फीस लेने लगा तो क्या होगा? 5 बड़े असर

1. तेल महंगा होगा: शिपिंग कंपनियां फीस का खर्च तेल के दाम में जोड़ देंगी. 1 डॉलर प्रति बैरल भी बढ़ा तो भारत का इंपोर्ट बिल अरबों डॉलर बढ़ जाएगा.

2. महंगाई बढ़ेगी: कच्चा तेल महंगा मतलब पेट्रोल-डीजल, ट्रांसपोर्ट, सब्जी से लेकर हर चीज महंगी. आम आदमी की जेब पर सीधा असर.

3. नया खतरनाक उदाहरण: अगर ईरान हॉर्मुज पर फीस लेने में कामयाब रहा, तो कल मलक्का स्ट्रेट, स्वेज नहर, बाब-अल-मंदेब पर भी देश फीस मांग सकते हैं. वैश्विक व्यापार का पूरा सिस्टम हिल सकता है.

4. अमेरिका-ईरान फिर आमने-सामने: ट्रंप ने 'टोल फ्री' का वादा किया है. अगर ईरान फीस लेता है तो अमेरिका इसे करार का उल्लंघन बताएगा. नौसैनिक टकराव का खतरा फिर बढ़ेगा.

5. बीमा प्रीमियम में उछाल: युद्ध या टकराव के डर से हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों का बीमा पहले ही महंगा है. 'सर्विस फी' के बाद वॉर रिस्क प्रीमियम और बढ़ेगा.

भारत के लिए क्यों है टेंशन की बात?

1. ऊर्जा सुरक्षा: भारत अपने क्रूड का 55% और LNG का 65% से ज्यादा खाड़ी देशों से हॉर्मुज के रास्ते मंगाता है.

2. रणनीतिक भंडार पर दबाव: अगर सप्लाई 1 हफ्ते भी रुकी तो भारत के पास सिर्फ 74 दिन का तेल भंडार है.

3. रुपये पर दबाव: तेल महंगा हुआ तो डॉलर की डिमांड बढ़ेगी और रुपया कमजोर होगा.

4. डिप्लोमेसी की परीक्षा: भारत के अमेरिका और ईरान दोनों से अच्छे रिश्ते हैं. नई दिल्ली को दोनों के बीच संतुलन साधना होगा.

आगे क्या? 3 संभावित सीन

1. सीन 1: बातचीत से हल: अमेरिका और ईरान 'सर्विस फी' की परिभाषा और दर पर राजी हो जाएं. नाममात्र की फीस लगे ताकि दोनों की इज्जत बच जाए.

2. सीन 2: टकराव बढ़े: अमेरिका फीस को 'टोल' मानकर खारिज कर दे. नौसेना एस्कॉर्ट बढ़ाए. ईरान जहाज रोकना शुरू करे. तेल 150 डॉलर पार.

3. सीन 3: बीच का रास्ता: UN या ओमान, कतर जैसे देश मध्यस्थता करें. कोई तीसरी एजेंसी फीस वसूले और नेविगेशन सेवा दे. ईरान को पैसा मिले, अमेरिका को 'टोल फ्री' का क्रेडिट.

 शब्दों से बड़ी है हकीकत
ट्रंप ने 'टोल फ्री' कहकर जीत का ऐलान कर दिया. ईरान ने 'सर्विस फी' कहकर अपना दांव चल दिया. कूटनीति में इसे 'फेस सेविंग' कहते हैं. मगर समुद्र से गुजरते टैंकर के लिए नाम से फर्क नहीं पड़ता, फर्क पड़ता है बिल से.

अगर वो बिल बड़ा हुआ, तो दुनिया को महंगाई की नई लहर झेलनी पड़ेगी. हॉर्मुज स्ट्रेट पर सस्पेंस अभी खत्म नहीं हुआ है. असली करार कागज पर नहीं, समंदर में उतरने के बाद पता चलेगा. तब तक दुनिया की नजरें टोल पर नहीं, ईरान की 'सर्विस लिस्ट' पर टिकी हैं.

एक लाइन में: हॉर्मुज पर 'टोल' गया नहीं, सिर्फ नाम बदलकर 'फीस' की ड्रेस पहनकर वापस आया है.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 21 Jun 2026

Saturday, 20 June 2026

June 20, 2026

पीएम, पीएम, पीएम नंबर वन!

पीएम, पीएम, पीएम नंबर वन!
-Friday World 21 Jun 2026
राजेंद्र शर्मा
 
अब बोलें, क्या कहते हैं बात-बात में और बहुत बार तो बिना बात के ही, नेहरू जी के देश का पहला प्रधानमंत्री होने की याद दिलाने वाले। मोदी जी ने इंदिरा जी तो इंदिरा जी, उनके बाप को भी आखिरकार पछाड़ ही दिया। 

नेहरू जी के प्रधानमंत्री के पद पर रहने के कुल 4398 दिन के सामने, मोदी ने 4399 दिन की उससे लंबी लकीर खींच दी और नेहरू जी को पीछे छोड़ दिया। और सच पूछिए तो मोदी जी, नेहरू जी को पीछे छोड़ने पर ही रुक नहीं गए। नेहरू जी को पीछे तो उन्होंने 10 जून को ही छोड़ दिया था। उसके बाद भी मोदी जी लगातार नेहरू जी को ज्यादा से ज्यादा पीछे छोड़ते जा रहे हैं और अपनी जीत का अंतर बढ़ाते ही जा रहे हैं। यह दूसरी बात है कि मोदी जी के पीएम नंबर वन बनने के जश्न अभी चल ही रहे हैं।

सच पूछिए तो अभी तो शुरुआत है। अभी तो मंत्री लोगों ने मंदिर-मंदिर जाकर, भगवान का जो थैंक यू किया है, मोदी जी को नंबर पीएम बनाने के लिए, उसकी तस्वीरें हर तरह के मीडिया पर आयी ही हैं। अभी तो मोदी जी के मंत्रिमंडल ने, ईश्वर का धन्यवाद किया है कि उसने, मोदी जी को उनका प्रधान बनने के लिए भेजा। अभी तो एनडीए ने अपने भाग्य की सराहना की है कि मोदी है, तो ही दिल्ली की गद्दी पर उनका कब्जा मुमकिन है। अभी तो विदेश मंत्रालय के बाबुओं की सिफारिश पर विदेशी नेताओं के भेजे बधाई संदेश मोदी जी ने सोशल मीडिया पर पाए हैं और मोदी जी ने उनको जवाबी धन्यवाद ज्ञापन के संदेश पठाए हैं। पार्टी लंबी चलेगी। अभी तो पार्टी शुरू हुई है।

पब्लिक वाला जश्न तो अभी शुरू भी नहीं हुआ है। क्या कीजै, मोदी जी उधर नेहरू जी को पछाड़ने में बिजी थे और रोड शो, रैलियों वगैरह में कटौती कर के तेल के डालर बचा रहे थे और इधर पब्लिक कॉकरोचों के पीछे लग गयी। और तो और, मोदी जी-शाह जी को ठीक से बंगाल फतेह करने को सेलिब्रेट करने का मौका तक नहीं दिया। माने बंगाल में थोड़ा-बहुत सेलिब्रेशन तो हुआ, जो राज में बैठकर कल तक सब को पीटते थे, वो तृणमूली थोड़े-बहुत पिटे, उससे ज्यादा कुछ डर से, कुछ लालच से टूटे, पर बस इतना ही। 

और तो और, राजधानी दिल्ली में तो उनके सांसदों को मोदी जी की पार्टी में ठीक से मिलाया तक नहीं जा सका, जैसे आम आदमी पार्टी वालों को मिलाया गया था। तब तक न जाने कहां से कॉकरोच निकल आए। और निकलते ही चले आ रहे हैं। हद्द तो ये है कि जिन्होंने पेपर का प तक नहीं देखा होगा, वो भी पेपर लीक, पेपर लीक का शोर मचा रहे हैं। और मोदी जी के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं, यह जानते हुए भी कि मोदी जी के राज में इस्तीफे नहीं होते। यह मोदी जी के राज का सिद्धांत है। और मोदी जी अपने सिद्धांत पर कभी समझौता नहीं करते। 

इसीलिए, मोदी जी हफ्ते भर का ब्रेक लेकर, यूरोप के दौरे पर निकल गए हैं। तब तक कॉकरोचों का जोश भी ठंडा पड़ जाएगा और बड़े-बड़े नेताओं से सीधे, पीएम नंबर वन बनने की बधाई लेने और उसके लिए धन्यवाद देने का मौका भी मिल जाएगा। किसी मैडल-वैडल का जुगाड़ भी हो गया, तो वह बोनस में। वैसे मोदी जी को मैडलों के पीछे भागने की जरूरत नहीं है। नेहरू जी-वेहरू जी को तो वह न जाने कब का पछाड़ चुके थे, अब तो वह दुनिया भर में सबसे ज्यादा विदेशी मैडल बटोरने वाले नेता बन चुके हैं। फिर भी अगर मैडल आते रहते हैं और बाकी विश्व नेताओं से मोदी जी के मैडल फासला बढ़ता रहता है, तो मोदी जी भी मान देने वाले का सम्मान करने में कोताही नहीं होने देते।

फिर भी, सिर्फ कॉकरोच ही नहीं, मोदी जी के पुराने विरोधी भी, उनके पीएम नंबर वन बनने के जश्न में रंग में भंग डालने से बाज नहीं आए हैं। मोदी जी अच्छी तरह समझते हैं कि ये उनके नेहरू जी को पछाड़कर पीएम नंबर वन बनने पर, इन विरोधियों की खिसियाहट ही है, जो ये पार्टी का मजा किरकिरा करने पर तुले हैं। वर्ना बताइए, तीन भारतीय नाविकों के मारे जाने का शोर मचाकर, मोदी जी के पीएम नंबर वन बनने की पार्टी खराब करने की क्या तुक हुई? लड़ाई अमेरिका-ईरान की। मिसाइल मारी अमेरिका ने। जहाज राम न जाने किस का, हमारा नहीं। जहाज न जाने किस के समंदर में, हमारे में नहीं। ये नाविक कमाई के चक्कर में दूसरों के जहाजों पर काम करने गए थे, हमारे यानी सरकार के कहने से नहीं। फिर लड़ाई के बीच में आकर मारे गए, तो इसमें मोदी क्या कर सकता है? अमेरिका ने मोदी से पूछकर हेलफायर मिसाइल थोड़े ही मारी थी। मरने वाले मोदी के लिए मरे हैं क्या? फिर भी, मोदी की सरकार ने विरोध जताया है कि नहीं? अमेरिका का नाम भले ही नहीं लिया हो, ऐसे हमले बंद करने के लिए कहा है कि नहीं? और क्या चाहिए! बच्चे की जान लोगे क्या?

विरोधी जो इसका शोर मचा रहे हैं कि मोदी जी ने भारतीय नागरिकों के मारे जाने पर विरोध क्यों नहीं जताया, पीएम नंबर वन बनने पर ट्रंप की बधाई पर अपने जवाबी धन्यवाद में, यह मुद्दा क्यों नहीं उठाया, उनकी नीयत क्या है, यह मोदी जी अच्छी तरह से पहचानते हैं! अमरीका के साथ रिश्ते बढ़ाने में तो मोदी जी बहुत-बहुत पहले ही पीएम नंबर वन बन चुके थे। न नेहरू, न इंदिरा, न राजीव, न राव, न बाजपेयी, यहां तक कि देसाई तक ने, न कभी किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए अमेरिका जाकर चुनाव प्रचार किया था और न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए भारत में ‘‘नमस्ते ट्रंप’’ कराया था! मोदी का यही नंबर वन होना, इनकी आंखों में खटकता है। ये चाहते हैं कि मोदी, ट्रंप से झगड़ा कर लें और वह भी सिर्फ तीन नाविकों के चक्कर में -- मजबूरी में जयशंकर को जिस तरह विरोध जताना पड़ा, मोदी वैसे ही विरोध जताए और जो जवाब रूबियो ने जयशंकर को दिया, वैसा ही जवाब ट्रंप, मोदी को सुनाए! यानी अमेरिका-भारत का रिश्ता नीचे खिसक कर, नेहरू नहीं, तो कम से कम इंदिरा गांधी के टैम वाले दर्जे पर आ जाए। पर पीएम नंबर वन के दर्जे के साथ मोदी कंप्रोमाइज कभी नहीं कर सकता। आखिर, पेरिस में ट्रंप से डीयर फ्रेंड मोदी भी तो कहलवाना है।

और ये जो व्हाट्सएप इतिहास के विरोध के नाम पर, मोदी जी के पीएम नंबर वन होने पर ही सवाल उठा रहे हैं, उनकी दलीलें सिर्फ तकनीकी हैं। माना कि नेहरू जी कुल 16 साल, 282 दिन देश के प्रधानमंत्री रहे थे और इंदिरा गांधी, 15 साल 356 दिन। इस हिसाब से मोदी जी को इंदिरा गांधी का रिकार्ड तोड़ने के लिए भी अभी चार साल इंतजार करना पड़ेगा और नेहरू का रिकार्ड तोड़ने के लिए, पांच साल। पर लोहिया जी ने कहा था -- जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं। मोदी जी ने भी पांच साल इंतजार नहीं किया। इंदिरा गांधी का रिकार्ड यह कहकर छोटा किया और तोड़ दिया कि उनके करीब 16 साल में एक ब्रेक था। और नेहरू का रिकार्ड यह कहकर छोटा कर दिया कि उनके करीब सत्रह साल में, पहले पांच साल तो स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव से पहले के थे। और हो गए मोदी जी, पीएम नंबर वन!

अब प्लीज कोई ये मत कहना कि मोदी जी ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री पद पर रह भी जाएं तब भी, भारत के पहले प्रधानमंत्री यानी पीएम नंबर वन तो नेहरू जी ही रहेंगे। ये सरासर चीटिंग है। पहले या आखिरी से क्या फर्क पड़ता है, अब पीएम नंबर वन तो मोदी जी ही माने जाएंगे। ट्रंप तक की बधाई आ चुकी है, और क्या चाहिए?

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 21 Jun 2026
June 20, 2026

अब गांधीजी का रिकॉर्ड तोड़ने की धुन! :

अब गांधीजी का रिकॉर्ड तोड़ने की धुन! :
-Friday World 21 Jun 2026
इंदिरा गांधी से भी अधिक समय तक लगातार प्रधानमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड मोदी जी तोड़ चुके हैं। दावा उनका यह भी है कि उन्होंने इस रेस में जवाहरलाल नेहरू को भी पीछे छोड़ दिया है और 9 जून के बाद से हर दिन उन्हें पीछे छोड़ते जा रहे हैं। वैसे मोदी जी नेहरू जी से आशंकित रहते हैं। पीछे मुड़कर बार-बार देखते हैं कि कहीं चाचा नेहरू उनसे आगे निकलने का षड़यंत्र तो नहीं कर रहे हैं, मगर जब दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता, तो मोदी जी दस कदम आगे बढ़ते हैं। ग्यारहवें कदम पर फिर पीछे मुड़कर देखते हैं, फिर दस कदम आगे बढ़ते हैं। उन्हें यह वाक्य हमेशा याद रहता है कि सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी!

नेहरू को तो इस प्रकार वह संघ प्रदत्त 'चाल, चेहरे और चरित्र' के दम पर निबटा चुके हैं। अब उनका नेक्स्ट टारगेट महात्मा गांधी हैं। उन्हें निबटाना उनकी उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उनका रिकॉर्ड मोदी जी को तोड़ना है, क्योंकि उनका रिकार्ड नहीं तोड़ा, तो फिर क्या तोड़ा! हथौड़े से नहीं टूटा, तो योगी जी के बुलडोजर से तोड़ेंगे। उससे भी नहीं टूटा, तो विस्फोटक लगाकर फोड़ देंगे, मगर तोड़ेंगे जरूर और तोड़े बिना मानेंगे नहीं। यह उनका अपने आप से वायदा है, इसलिए महात्मा गांधी भी अब उनसे बच नहीं पाएंगे। गांधी जी जितनी भी कोशिश करना चाहें, कर लें। कोशिश करने पर कोई रोक नहीं है, मगर उनका रिकार्ड तो तोड़ेगा मोदी ही। इसे तोड़ने की ए टू जेड प्लानिंग हो चुकी है। 'महात्मा गांधी रिकार्ड तोड़ समिति' का गठन किया जा चुका है। गृहमंत्री इसके अध्यक्ष हैं। सूत्रों की मानें, तो इसकी एक से अधिक बैठकें हो चुकी हैं।

समिति के सामने फिलहाल समस्या यह है कि गांधी जी का रिकॉर्ड मोदी जी तोड़ें, तो तोड़ें कैसे? सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि गांधी जी प्रधानमंत्री नहीं बने। बन गए होते, तो फट से उनका रिकार्ड तोड़-ताड़ कर वह फेंक देते। अमित शाह जी ने ठीक पहचाना कि गांधी जी 'चतुर बनिया' थे। 'चतुर बनिया' थे, इसलिए वे प्रधानमंत्री नहीं बने। यहां तक कि सरदार पटेल को भी नहीं बनने दिया। जवाहरलाल नेहरू को फंसा दिया कि तुम बनो प्रधानमंत्री! कसम से, अगर गांधी जी प्रधानमंत्री बने होते तो मोदी जी वो दांव खेलते कि अब तक गांधी जी का नाम दुनिया से गायब हो चुका होता!

संयोग से दोनों गुजराती हैं। गांधी जी के पिता पोरबंदर के दीवान थे। मोदी जी के सामने जन्म लेने से पहले यह च्वाइस थी कि वे किसी दीवान के घर जन्म लें, मगर उन्हें मुख्यमंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री भी बनना था। उनकी प्लानिंग अलग थी। उन्हें चुनाव लड़ना और जीतना था। किसी दीवान के घर वे जन्म लेते, तो उन्हें राजनीतिक घाटा हो सकता था। प्रधानमंत्री बनने में यह पृष्ठभूमि बाधक बन सकती थी। काफी सोच-विचार के बाद उन्होंने चायवाले के रूप में भारत-भू पर अवतार लेना उचित समझा!

फिर भी एक ग़लती उनसे हो गई कि उन्होंने किसी तरह एम ए तो 'एंटायर पोलिटिकल साइंस' में कर लिया, मगर जल्दबाजी में 'एंटायर' वाली एल एल बी करना भूल गए! अगर वह कर लेते, तो गांधी जी से कंपीट करना उनके लिए आसान हो जाता। आजकल कौन ससुरा गांधी जी की तरह वकालत करने के लिए इंग्लैंड जाकर बैरिस्टरी करता है!

संभव है कि तब तक मोदी जी ने सोचा नहीं होगा कि एक दिन उन्हें महात्मा गांधी को भी निबटाना है। तब तक उनकी नज़र नेहरू जी से आगे नहीं बढ़ पाई होगी।

एक ग़लती उनसे और हुई कि एक दिन के लिए भी वे जेल नहीं गये, जबकि गांधी जी लगभग सात बरस तक विभिन्न जेलों में रहे। एक दिन के लिए तो छोड़ो, मोदी जी आठ घंटे के लिए भी जेल नहीं गए। थाने में चार घंटे बैठकर थानेदार के साथ चाय पीते हुए गपशप तक नहीं की। इतना कर लिया होता, तो मां कसम एंटायर पोलिटिकल साइंस से प्राप्त ज्ञान के आधार पर वह गांधी जी से अधिक समय तक जेल में रहने का रिकॉर्ड तैयार करवा लेते! गांधी जी को मात दे देते! इमरजेंसी में जेल जाने का सुनहरा मौका उन्हें घर बैठे मिला था, मगर जेल‌ के नाम से उन्हें आज भी इतना डर लगता है कि उस अवसर का लाभ उन्होंने नहीं उठाया। छुप-छुप कर, बच-बचकर रहे। सत्याग्रह कभी किया नहीं। जब भी किया दुराग्रह ही किया। सच कभी बोला नहीं। अहिंसा में उनका विश्वास कभी रहा नहीं। सारी दुनिया 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस के रूप में मनाती है, मोदी जी इसे स्वच्छता दिवस के रूप में मनवाते हैं। साफ जगह पर कचरा डलवाकर सफाई का रिकॉर्ड बनाते हैं। गांधी जी की तरह एक सफ़ेद धोती से पूरा शरीर ढंकना उनकी कल्पना की कल्पना से भी परे है। रेलवे के थर्ड क्लास तो क्या, किसी भी क्लास में सफ़र करने के नाम से उन्हें कंपकंपी छूट जाती है। लाठी कभी छुई नहीं। बकरी का दूध कभी पिया नहीं। दो अक्टूबर को फोटो खिंचवाने के अलावा चरखे को कभी हाथ लगाया नहीं। हिंदू-मुस्लिम एकता से उन्हें इतना परहेज है जितना कि कुछ लोगों को बैंगन या करेले खाने से होता है।

इसके बाद एक ही तरीका बचता है कि महात्मा गांधी से बड़े बनने का कि उनसे ज्यादा दिन जिंदा रहकर बताएं। यह काम वह आसानी से कर सकते हैं। मोदी जी सितंबर में जीवन के 76 वर्ष पूरे कर लेंगे। गांधी जी ने कुल 78 वर्ष का जीवन पाया था। दो वर्ष और कुछ दिन की और बात है बस। गांधी जी कुल 28608 दिन जीवित रहे थे। जिस दिन साहेब इससे एक दिन अधिक जी लेंगे, मतलब जिस दिन वह 28609 वें दिन में प्रवेश कर लेंगे, उसी दिन, उसी क्षण से वह गांधी जी से आटोमेटिकली बड़े हो जाएंगे।

मोदी जी के अनुसार, गांधी जी को तो दुनिया उस दिन से जानने लगी थी ,जब रिचर्ड एटनबरो ने गांधी जी पर 1982 में फिल्म बनाई थी। मोदी जी अपने जीवन काल में इसके केवल बीस साल बाद वर्ल्ड फेमस हो गए, जब उनकी उम्र महज़ 52 साल थी। इतनी कम उम्र में उनके नेतृत्व और निर्देशन में गुजरात में जो 2002 हुआ, उसके कारण उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई कि अमेरिका तक उनके कारनामों से दंग रह गया।उसने इन्हें किसी भी तरह का वीज़ा देने से मना कर दिया। 

इस तरह गांधी जी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति मरने के बाद मिली , जबकि मोदी जी को गुजरात की सत्ता मिलते ही कुख्याति मिल गई। इस तरह मोदी जी लगभग दो साल बाद गांधी जी से न केवल बड़े हो जानेवाले हैं और महान तो वह आज से चौबीस वर्ष पहले 2002 में ही हो चुके थे!

कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 21 Jun 2026
June 20, 2026

શનિવારે સભામંડપ બન્યો શમશાન: પરભણીના યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં છત ધરાશાયી, 6 ભક્તોના મોત, 40થી વધુ દટાયા

શનિવારે સભામંડપ બન્યો શમશાન: પરભણીના યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં છત ધરાશાયી, 6 ભક્તોના મોત, 40થી વધુ દટાયા
-Friday World 20 Jun 2026
પરભણી | 20 જૂન 2026:
 શ્રદ્ધાનું કેન્દ્ર અચાનક શોકનું ઘર બની ગયું. મહારાષ્ટ્રના પરભણી જિલ્લાના માનવત તાલુકાના યશવાડી ગામે આવેલા પ્રસિદ્ધ મારૂતિ મંદિરમાં શનિવારનો દિવસ કાળ બનીને ત્રાટક્યો. હનુમાનજીના દર્શન અને કીર્તન માટે ઉમટેલા સેંકડો શ્રદ્ધાળુઓ પર સભામંડપની જર્જરિત છત અચાનક કડડભૂસ થઈને તૂટી પડી. આ હૃદયદ્રાવક દુર્ઘટનામાં 6 નિર્દોષ ભક્તોએ જીવ ગુમાવ્યા છે, જ્યારે 25થી વધુ લોકો ગંભીર રીતે ઘાયલ થયા છે. 7c025dec

શું બની ઘટના?
શનિવાર હનુમાનજીનો વાર હોવાથી યશવાડી મારૂતિ મંદિરમાં સવારથી જ ભક્તોની ભારે ભીડ હતી. બપોરના સમયે મંદિરના સભામંડપમાં કીર્તન અને ધાર્મિક કાર્યક્રમ ચાલી રહ્યો હતો. મંડપમાં લગભગ 100થી વધુ શ્રદ્ધાળુઓ બેઠા હતા ત્યારે જ અચાનક સમગ્ર છત ધડાકાભેર નીચે પડી. એક ક્ષણમાં ભજન-કીર્તનના સૂર ચીસોમાં ફેરવાઈ ગયા. નાસભાગ મચી ગઈ અને ધૂળની ડમરીઓથી આખો પરિસર છવાઈ ગયો. આ દ્રશ્યો મંદિરના CCTV કેમેરામાં પણ કેદ થયા છે. 29137c02

કાટમાળ નીચે જીવ માટે જંગ
પ્રાથમિક અંદાજ મુજબ 30 થી 40 લોકો કાટમાળ નીચે દબાયા હતા. ઘટનાની જાણ થતાં જ સ્થાનિક લોકો અને શ્રદ્ધાળુઓએ તાત્કાલિક બચાવ કામગીરી શરૂ કરી દીધી. થોડી જ વારમાં જિલ્લા વહીવટીતંત્ર, પોલીસ અને NDRFની ટીમો ઘટનાસ્થળે પહોંચી ગઈ અને યુદ્ધના ધોરણે કામગીરી શરૂ કરી. અત્યાર સુધીમાં લગભગ 25 લોકોને સુરક્ષિત બહાર કાઢવામાં આવ્યા છે. ઘાયલોને માનવત અને પરભણીની સરકારી હોસ્પિટલમાં ખસેડવામાં આવ્યા છે. 5dec2913

પોલીસ અધિકારીએ જણાવ્યું કે આ ઘટના શનિવારે બપોરે બની હતી. કાટમાળ હટાવવાની કામગીરી હજુ ચાલુ છે અને મૃત્યુઆંક વધવાની ભીતિ સેવાઈ રહી છે. 5dec

વહીવટીતંત્ર એલર્ટ પર
ઘટનાને પગલે સમગ્ર વિસ્તારને કોર્ડન કરી લેવામાં આવ્યો છે. મેઘના બોર્ડીકરે જિલ્લા કલેક્ટર અને પોલીસ અધિક્ષક સાથે સતત સંપર્કમાં રહીને બચાવ કામગીરી પર નજર રાખી છે. અધિકારીઓએ જણાવ્યું કે પરિસ્થિતિ પર સતત નજર રાખવામાં આવી રહી છે અને ટૂંક સમયમાં વિગતવાર માહિતી શેર કરવામાં આવશે. 2913

સવાલોના વર્તુળમાં સભામંડપ
યશવાડી મારૂતિ મંદિર આ વિસ્તારનું જૂનું અને પ્રસિદ્ધ ધામ છે. શનિવારે અહીં મોટી સંખ્યામાં ભાવિકો દર્શન માટે આવે છે. સૂત્રોનું માનીએ તો સભામંડપનું બાંધકામ ઘણું જૂનું હતું. ચોમાસા પહેલા મંદિર પરિસરનું સ્ટ્રક્ચરલ ઓડિટ થયું હતું કે નહીં, તે હવે તપાસનો વિષય બન્યો છે. મંદિરોમાં સભામંડપ, નાટમંડપ જેવા બાંધકામો ભક્તો એકઠા થવા માટે જ હોય છે. પણ જો તેની જાળવણી ન થાય તો શ્રદ્ધાનું સ્થળ જોખમી બની જાય છે. 6a45

સરકાર દ્વારા સહાયની જાહેરાત
મુખ્યમંત્રી કાર્યાલય દ્વારા દુર્ઘટના પર દુઃખ વ્યક્ત કરવામાં આવ્યું છે. પ્રાથમિક માહિતી મુજબ મૃતકોના પરિવારજનોને 5 લાખ અને ગંભીર ઘાયલોને 50 હજારની સહાય આપવાની જાહેરાત થઈ શકે છે. સમગ્ર ઘટનાની ઉચ્ચસ્તરીય તપાસના આદેશ પણ આપવામાં આવ્યા છે.

શ્રદ્ધા અને અંધશ્રદ્ધા વચ્ચેની ભેદરેખા જાળવણી છે. મંદિરો, સભામંડપો માત્ર આસ્થાના નહીં, સુરક્ષાના કેન્દ્રો પણ બનવા જોઈએ. યશવાડીની આ ઘટના તંત્ર અને મંદિર ટ્રસ્ટો માટે લાલબત્તી સમાન છે. કીર્તનના સૂર બંધ થયા, પણ એમ્બ્યુલન્સના સાયરન હજુ ચાલુ છે. જે ભક્તો દર્શન કરવા આવ્યા હતા, તેમના પરિવારજનો હવે હોસ્પિટલના દરવાજે આશા અને પ્રાર્થના સાથે ઉભા છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 20 Jun 2026
June 20, 2026

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'

ट्रंप का अगला निशाना क्यूबा? वेनेजुएला-ईरान के बाद अब हवाना पर मंडराया अमेरिकी खतरा, कहा- 'शांति से नहीं माने तो सैन्य विकल्प तैयार'
- Friday World 20 Jun 2026
अमेरिका की विदेश नीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताजा बयान ने लैटिन अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में नई बहस छेड़ दी है। वेनेजुएला और ईरान के बाद अब ट्रंप प्रशासन की नजरें क्यूबा पर टिक गई हैं। एक प्राइवेट इंटरव्यू में ट्रंप ने साफ संकेत दिए हैं कि अगर जरूरत पड़ी तो क्यूबा में भी अमेरिका वैसा ही अभियान चला सकता है जैसा वेनेजुएला में चलाया गया था। 

ट्रंप का बयान: 'क्यूबा अमेरिका के बहुत करीब है'
इंटरव्यू के दौरान जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या क्यूबा में संभावित अमेरिकी ऑपरेशन वेनेजुएला जैसा हो सकता है, तो उन्होंने दो टूक जवाब दिया - 'संभव है।' ट्रंप ने कहा कि क्यूबा की भौगोलिक स्थिति उसे अलग बनाती है। यह देश अमेरिका से सिर्फ 90 मील दूर है। इसलिए वहां की कोई भी अस्थिरता सीधे तौर पर अमेरिकी सुरक्षा हितों को प्रभावित करती है। 

हालांकि ट्रंप ने यह भी जोड़ा कि उनकी पहली प्राथमिकता हमेशा शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन ही रहेगी। लेकिन साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो सैन्य विकल्पों को भी टेबल से हटाया नहीं गया है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ महीनों से अमेरिका लगातार क्यूबा पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ा रहा है।

अमेरिका का बढ़ता दबाव: प्रतिबंधों से लेकर सैन्य चेतावनी तक
रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने हवाना पर नए प्रतिबंधों का ऐलान किया है। इन प्रतिबंधों का मकसद क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार पर दबाव बनाना है। अमेरिका ने क्यूबा को खुली चेतावनी दी है कि अगर उसने ऐसे हथियार हासिल करने की कोशिश की जो अमेरिकी क्षेत्र या ग्वांतानामो बे में स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे के लिए खतरा बन सकते हैं, तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि क्यूबा रूस और चीन के साथ अपने रक्षा संबंध बढ़ा रहा है। ग्वांतानामो बे के इतने करीब किसी विरोधी देश की सैन्य मौजूदगी वाशिंगटन के लिए अस्वीकार्य है। इसलिए अमेरिका पहले से ही 'प्लान B' पर काम कर रहा है। 

'प्लान B' क्या है? सैन्य और राजनयिक दोनों विकल्प खुले 
ट्रंप ने इंटरव्यू में बताया कि उनकी टीम ने क्यूबा में संभावित अस्थिरता की स्थिति से निपटने के लिए कई योजनाएं तैयार की हैं। इनमें राजनयिक दबाव, आर्थिक नाकेबंदी को और सख्त करना, और अंतिम विकल्प के रूप में सीमित सैन्य कार्रवाई शामिल है। 

ट्रंप प्रशासन के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, अगर क्यूबा में जन आंदोलन तेज होता है या सरकार कमजोर पड़ती है, तो अमेरिका 'मानवीय हस्तक्षेप' के नाम पर कदम उठा सकता है। 1961 के बे ऑफ पिग्स आक्रमण की नाकामी के बाद अमेरिका सीधे सैन्य हस्तक्षेप से बचता रहा है। लेकिन ट्रंप की भाषा से लगता है कि वे पुरानी नीतियों को बदलने से नहीं हिचकिचाएंगे।

ईरान से तुलना: 'क्यूबा का केस अलग है'
ट्रंप ने क्यूबा की स्थिति की तुलना हाल ही में ईरान पर किए गए अभियान से भी की। उन्होंने कहा कि ईरान वाला ऑपरेशन बहुत बड़े स्तर का था। उसमें ज्यादा हथियार, ज्यादा संसाधन और लंबी दूरी की रणनीति शामिल थी। 

इसके उलट क्यूबा अमेरिका के दरवाजे पर है। फ्लोरिडा से इसकी दूरी इतनी कम है कि कोई भी सैन्य कार्रवाई लॉजिस्टिक रूप से आसान होगी। ट्रंप के शब्दों में, 'भौगोलिक रूप से क्यूबा हमारे लिए ज्यादा सुविधाजनक है।' इस बयान को विशेषज्ञ क्यूबा के लिए सीधी धमकी के रूप में देख रहे हैं।

क्या वेनेजुएला मॉडल क्यूबा में चलेगा?
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की क्यूबा रणनीति काफी हद तक 'वेनेजुएला मॉडल' जैसी दिखती है। वेनेजुएला में अमेरिका ने निकोलस मादुरो सरकार पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई थी। इसमें कड़े आर्थिक प्रतिबंध, विपक्षी नेता हुआन गुआइदो को समर्थन, और पड़ोसी देशों के जरिए कूटनीतिक अलगाव शामिल था। साथ ही समय समय पर सैन्य कार्रवाई के संकेत भी दिए गए थे।

लेकिन क्यूबा और वेनेजुएला में बड़ा फर्क है। क्यूबा में कम्युनिस्ट पार्टी की पकड़ 1959 से बेहद मजबूत है। फिदेल कास्त्रो के बाद राउल कास्त्रो और अब मिगुएल डियाज-कनेल के नेतृत्व में सरकार ने हर अमेरिकी दबाव को झेला है। दूसरा फर्क यह है कि क्यूबा को रूस, चीन और लैटिन अमेरिका के कई देशों का खुला समर्थन हासिल है। वेनेजुएला की तरह क्यूबा आर्थिक रूप से पूरी तरह ढहा हुआ नहीं है, हालांकि वहां भी हालात कठिन हैं।

60 साल पुरानी दुश्मनी की नई किस्त
अमेरिका और क्यूबा के रिश्ते 1959 की क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। 1962 का मिसाइल संकट दुनिया को परमाणु युद्ध के कगार पर ले आया था। इसके बाद से अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। ओबामा के समय में रिश्तों में थोड़ी नरमी आई थी। राजनयिक संबंध बहाल हुए और कुछ पाबंदियां हटी थीं। 

लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल में ये सभी प्रयास पलट दिए गए। बाइडेन प्रशासन ने भी कोई बड़ी राहत नहीं दी। अब ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद क्यूबा नीति और आक्रामक हो गई है। क्यूबा सरकार इसे 'अमेरिकी साम्राज्यवाद' का नया रूप बता रही है। हवाना का कहना है कि अमेरिका क्यूबा के आंतरिक मामलों में दखल दे रहा है।

लैटिन अमेरिका में चिंता: 'क्या मोनरो डॉक्ट्रिन की वापसी हो रही है?'
ट्रंप के बयान के बाद पूरे लैटिन अमेरिका में बेचैनी है। मेक्सिको, ब्राजील और कोलंबिया जैसे बड़े देशों ने कहा है कि किसी भी देश में सैन्य हस्तक्षेप क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरनाक होगा। 19वीं सदी की 'मोनरो डॉक्ट्रिन' के तहत अमेरिका लैटिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र मानता रहा है। 

विश्लेषकों को डर है कि ट्रंप उसी सोच को 21वीं सदी में वापस ला रहे हैं। वेनेजुएला में नाकामी के बाद क्यूबा को निशाना बनाना यह दिखाता है कि अमेरिका अब 'रिजीम चेंज' की नीति को खुलकर अपना रहा है। 

आगे क्या? समयसीमा पर सस्पेंस बरकरार
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या और कब अमेरिका क्यूबा में कार्रवाई करेगा। ट्रंप ने इस पर कोई समयसीमा नहीं दी। उन्होंने कहा कि स्थिति 'फ्लेक्सिबल' है और फैसले हालात देखकर लिए जाएंगे। इसका मतलब है कि वाशिंगटन हवाना के हर कदम पर नजर रख रहा है। 

अगर क्यूबा में आर्थिक संकट गहराता है, बड़े प्रदर्शन होते हैं, या सरकार रूस से कोई बड़ा रक्षा समझौता करती है, तो अमेरिका बहाने के तौर पर कार्रवाई कर सकता है। 2026 अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले विदेश नीति में एक 'बड़ी जीत' दिखाना भी ट्रंप की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

क्यूबा की तैयारी: 'हम किसी धमकी से नहीं डरते' 
उधर क्यूबा ने भी सख्त रुख अपनाया है। राष्ट्रपति मिगुएल डियाज-कनेल ने कहा कि क्यूबा की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा। क्यूबा की सेना को अलर्ट पर रखा गया है। रूस और चीन ने भी बयान जारी कर कहा है कि वे क्यूबा के साथ खड़े हैं। 

क्यूबा की जनता में भी मिली जुली प्रतिक्रिया है। सरकार समर्थक इसे अमेरिकी दादागिरी बता रहे हैं। वहीं सरकार विरोधी गुटों को उम्मीद है कि अमेरिकी दबाव से बदलाव का रास्ता खुलेगा। लेकिन इतिहास गवाह है कि बाहरी दबाव से क्यूबा की सरकार और मजबूत होती रही है।

: लैटिन अमेरिका बना नया शीत युद्ध का मैदान  
ट्रंप का क्यूबा को लेकर दिया गया बयान सिर्फ एक धमकी नहीं है। यह अमेरिकी विदेश नीति के बड़े बदलाव का संकेत है। वेनेजुएला, ईरान और अब क्यूबा, तीनों मामलों में ट्रंप प्रशासन का संदेश साफ है: जो देश अमेरिकी हितों के खिलाफ जाएगा, उसे परिणाम भुगतने होंगे। 

चाहे वह आर्थिक प्रतिबंध हों या सैन्य कार्रवाई, अमेरिका अब 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को आक्रामक तरीके से लागू कर रहा है। इससे लैटिन अमेरिका एक बार फिर महाशक्तियों के टकराव का अखाड़ा बन सकता है। आने वाले महीने तय करेंगे कि ट्रंप की धमकी बयानबाजी तक सीमित रहती है या क्यूबा वाकई वेनेजुएला और ईरान के बाद अमेरिका का अगला युद्धक्षेत्र बनता है। 

फिलहाल इतना तय है कि कैरेबियन सागर में सियासी तापमान बढ़ चुका है। हवाना से वाशिंगटन तक, सबकी नजरें अब इसी पर टिकी हैं कि अगला कदम कौन उठाता है। शांति से सत्ता परिवर्तन होगा या टकराव होगा, इसका जवाब सिर्फ वक्त देगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 20 Jun 2026
June 20, 2026

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा

तेहरान की शर्तों पर झुका वॉशिंगटन: 39 दिन के संघर्ष ने बदल दिया मिडिल ईस्ट का नक्शा
- Friday World 20 Jun 2026
तेहरान-ब्यूरो
39 दिनों तक चले भीषण टकराव के बाद आखिरकार अमेरिका ने ईरान की शर्तों पर समझौता कर लिया है। 28 फरवरी को शुरू हुआ यह संघर्ष सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं था, बल्कि इसने पूरी दुनिया की शक्ति-समीकरण को हिला दिया। युद्धविराम की स्याही सूखने से पहले ही विश्लेषक मान रहे हैं कि मिडिल ईस्ट अब कभी पहले जैसा नहीं रहेगा।

कैसे शुरू हुई 39 दिन की जंग?  
28 फरवरी की सुबह खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंचा। अमेरिकी दबाव और इजरायल की रणनीतिक चालों के जवाब में ईरान ने सीधा मोर्चा खोल दिया। तेहरान ने साफ किया कि वह अब छद्म युद्ध नहीं, सीधी टक्कर के लिए तैयार है। इसके बाद जो हुआ उसने 1945 के बाद पहली बार किसी देश को अमेरिका के सामने इस तरह अड़ते देखा।

ईरान ने एक साथ कई मोर्चे खोले। कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और कुवैत पर भयानक मिसाइल हमलों की झड़ी लगा दी गई। तेहरान का दावा था कि ये हमले आत्मरक्षा और बदले के अधिकार के तहत हैं। इन हमलों ने खाड़ी देशों की ऊर्जा सप्लाई लाइनों को बुरी तरह तोड़ दिया। तेल के कुएं, रिफाइनरी और शिपिंग रूट निशाने पर आए। कुछ ही दिनों में वैश्विक ऊर्जा बाजार में हाहाकार मच गया। 

अमेरिका को क्यों झुकना पड़ा? 
युद्ध के पहले हफ्ते में ही वॉशिंगटन को अहसास हो गया कि यह 2003 का इराक या 2001 का अफगानिस्तान नहीं है। ईरान की मिसाइल क्षमता, ड्रोन स्वॉर्म और क्षेत्रीय मिलिशिया नेटवर्क ने अमेरिकी ठिकानों को लगातार नुकसान पहुंचाया। पेंटागन के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि ईरान लड़ाई को लंबा खींचने की रणनीति पर था। हर गुजरते दिन के साथ अमेरिका के सहयोगी देशों में घबराहट बढ़ रही थी।

खाड़ी देशों में हुई मौतों और बुनियादी ढांचे की तबाही ने अमेरिका पर अंदरूनी दबाव बना दिया। सऊदी अरब और यूएई ने वॉशिंगटन से कहा कि या तो युद्ध रोको, या फिर वे खुद अलग रास्ता चुनेंगे। यूरोप में भी तेल संकट गहराने लगा। घरेलू स्तर पर अमेरिकी प्रशासन पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 39वें दिन अमेरिका ने माना कि सैन्य जीत की कीमत अब कूटनीतिक हार से ज्यादा है।

इजरायल का छद्मजाल कैसे टूटा?
पिछले दो दशक से इजरायल ने ईरान को घेरने के लिए खाड़ी देशों के साथ सुरक्षा गठजोड़ बनाए थे। अब्राहम समझौते इसी रणनीति का हिस्सा थे। लेकिन 28 फरवरी के बाद ईरान ने सीधे उन देशों पर हमला किया जिन्हें इजरायल अपना सुरक्षा कवच मानता था। संदेश साफ था: तेहरान अब प्रॉक्सी नहीं, प्रिंसिपल से लड़ेगा। 

इन हमलों ने इजरायल की डिटरेंस नीति को ध्वस्त कर दिया। तेल अवीव को समझ आ गया कि ईरान अब हर लाल रेखा पार करने को तैयार है। नतीजा यह हुआ कि इजरायल युद्ध के आखिरी 10 दिनों में पूरी तरह रक्षात्मक हो गया और अमेरिका पर युद्धविराम का दबाव बनाने लगा।

GCC की भूमिका और कतर की मध्यस्थता
युद्ध जितना तेजी से भड़का, उतनी ही तेजी से कूटनीति भी सक्रिय हुई। खाड़ी सहयोग परिषद के सदस्य देशों में मतभेद उभर आए। ओमान और कुवैत शुरू से ही तनाव कम करने के पक्ष में थे। लेकिन निर्णायक भूमिका निभाई कतर ने। दोहा ने तेहरान और वॉशिंगटन के बीच गुप्त चैनल खोला। 

कतर के अमीर ने खुद कई दौर की बातचीत की मेजबानी की। सऊदी अरब ने भी आखिरी हफ्ते में रुख नरम किया क्योंकि उसके तेल संयंत्रों पर हमलों से अरामको का उत्पादन 40% तक गिर गया था। GCC को अहसास हुआ कि अमेरिका की छतरी अब पहले जैसी मजबूत नहीं रही। इसलिए क्षेत्रीय समाधान ही एकमात्र रास्ता बचा।

समझौते की बड़ी शर्तें क्या हैं? 
हालांकि पूरा दस्तावेज सार्वजनिक नहीं हुआ है, लेकिन तीन बड़ी बातें सामने आई हैं:  

1. प्रतिबंधों में ढील: अमेरिका ईरान के तेल और बैंकिंग सेक्टर पर लगे प्रमुख प्रतिबंध हटाएगा।  

2. क्षेत्रीय सुरक्षा गारंटी: ईरान खाड़ी में और हमले न करने पर सहमत हुआ है, बशर्ते उसकी सुरक्षा चिंताओं को मान्यता मिले।  

3. परमाणु निगरानी का नया फॉर्मूला: ईरान सीमित निरीक्षण के लिए तैयार हुआ है, लेकिन संवर्धन पर उसकी संप्रभुता बनी रहेगी।  

तेहरान इसे अपनी जीत बता रहा है। राष्ट्रपति कार्यालय से जारी बयान में कहा गया कि ईरान ने साबित कर दिया कि सुपरपावर को भी झुकाया जा सकता है।

मिडिल ईस्ट में अब कौन होगा असली सुल्तान?
युद्ध के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है। ईरान अब खुद को प्रतिरोध की धुरी के केंद्र के तौर पर पेश कर रहा है। उसने दिखा दिया कि वह इजरायल और अमेरिका के गठजोड़ को सैन्य तौर पर चुनौती दे सकता है। यमन से लेबनान तक उसके समर्थक समूहों का मनोबल बढ़ा है।

दूसरी तरफ सऊदी अरब है। युद्ध में सबसे ज्यादा आर्थिक नुकसान रियाद को ही हुआ। लेकिन क्राउन प्रिंस अब दोहरी रणनीति पर हैं। एक तरफ वे कतर और ओमान के साथ मिलकर ईरान से तनाव कम करना चाहते हैं, ताकि विजन 2030 बचे। दूसरी तरफ वे इस्लामिक दुनिया के सुन्नी नेतृत्व का दावा नहीं छोड़ना चाहते। 

इसलिए अगला दशक तेहरान और रियाद के बीच वर्चस्व की शांत लड़ाई का होगा। जो देश ज्यादा स्थिरता, आर्थिक मौके और सुरक्षा देगा, इस्लामिक दुनिया उसी के पीछे लामबंद होगी। ईरान के पास अब सैन्य मनोबल है। सऊदी के पास तेल और मक्का-मदीना की कस्टोडियनशिप है।

अमेरिका के पीछे हटने के दूरगामी असर

1. डॉलर का दबदबा कमजोर: तेल व्यापार अब सिर्फ डॉलर में नहीं होगा। ईरान-चीन-रूस पहले से ही वैकल्पिक मुद्रा पर काम कर रहे हैं।  

2. नाटो सहयोगियों में शक: यूरोपीय देश अब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी को सौ फीसदी नहीं मानेंगे।  

3. चीन की एंट्री: बीजिंग युद्धविराम के तुरंत बाद पुनर्निर्माण पैकेज लेकर खाड़ी पहुंच गया है।  

4. हथियारों की नई दौड़: सऊदी, यूएई और कतर अब आत्मनिर्भर रक्षा पर अरबों डॉलर खर्च करेंगे।  

भारत समेत एशिया के लिए मतलब
भारत के लिए यह दोधारी तलवार है। एक तरफ ईरान से चाबहार और तेल व्यापार आसान होगा। दूसरी तरफ खाड़ी में अस्थिरता से 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और रेमिटेंस पर खतरा रहेगा। भारत को अब तेहरान और रियाद दोनों के साथ संतुलन बनाना होगा।

 एक युग का अंत, दूसरे का आगाज

39 दिन की जंग ने साबित किया कि 21वीं सदी में सिर्फ सैन्य बजट से सुपरपावर नहीं बना जाता। सहनशक्ति, क्षेत्रीय पकड़ और जोखिम उठाने की हिम्मत भी मायने रखती है। ईरान ने वह हिम्मत दिखाई। अमेरिका ने व्यावहारिकता चुनी। 

अब मिडिल ईस्ट वॉशिंगटन की छाया से निकलकर अपने फैसले खुद लेगा। असली सुल्तान कौन होगा, इसका फैसला मिसाइलों से नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, कूटनीति और अवाम के भरोसे से होगा। तेहरान ने जंग जीती है, लेकिन वर्चस्व की जंग अभी बाकी है।

Sajjadali Nayani ✍
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