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Saturday, 27 June 2026

June 27, 2026

शी जिनपिंग के साथ तारिक रहमान की मुलाकात: बांग्लादेश का चीन रुख भारत के लिए क्यों बड़ा झटका? मोंगला पोर्ट इकोनॉमिक जोन की नई जियोपॉलिटिक्स

शी जिनपिंग के साथ तारिक रहमान की मुलाकात: बांग्लादेश का चीन रुख भारत के लिए क्यों बड़ा झटका? मोंगला पोर्ट इकोनॉमिक जोन की नई जियोपॉलिटिक्स - Friday World 27 Jun 2026


दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की चीन यात्रा ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई दी, बल्कि भारत के लिए एक रणनीतिक चुनौती भी खड़ी कर दी है। बीजिंग में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकात के दौरान मोंगला पोर्ट के निकट एक आर्थिक क्षेत्र (Economic Zone) विकसित करने का महत्वपूर्ण समझौता हुआ। यह वही प्रोजेक्ट है जिसे पहले भारत के सहयोग से विकसित किए जाने की योजना थी, लेकिन बांग्लादेश की पिछली अंतरिम सरकार (मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली) ने उसे रद्द कर दिया था।

यह घटनाक्रम सिर्फ एक बंदरगाह विकास की कहानी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, आर्थिक हितों और बदलते गठबंधनों की गहरी कहानी है।

बांग्लादेश की राजनीतिक उथल-पुथल और विदेश नीति में बदलाव

बांग्लादेश लंबे समय से भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी रहा है। शेख हसीना की सरकार के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और जल संसाधनों पर कई समझौते हुए। लेकिन 2024-25 के राजनीतिक परिवर्तनों के बाद परिदृश्य बदल गया। अंतरिम सलाहकार मोहम्मद यूनुस की सरकार ने कई भारत से जुड़े प्रोजेक्ट्स की समीक्षा की और कुछ को रद्द भी कर दिया। इनमें मोंगला पोर्ट से संबंधित आर्थिक क्षेत्र का प्रोजेक्ट भी शामिल था।

अब तारिक रहमान की सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि बांग्लादेश अपनी आर्थिक जरूरतों को प्राथमिकता देगा। चीन उनकी पहली प्रमुख विदेश यात्राओं में शामिल रहा, जबकि भारत को कथित तौर पर बाईपास किया गया। इस यात्रा के दौरान 13 से अधिक समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

 मोंगला पोर्ट इकोनॉमिक जोन: रणनीतिक महत्व

मोंगला पोर्ट बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा बंदरगाह है, जो बंगाल की खाड़ी में स्थित है। यह भारत के पूर्वी तट के निकट है और क्षेत्रीय व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण। पहले इस पोर्ट के पास एक आर्थिक क्षेत्र भारत की कंपनियों या फंडिंग से विकसित करने की योजना थी, जो रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देती।

यूनुस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को "राष्ट्रीय हित के खिलाफ" बताते हुए रद्द कर दिया। अब चीन की एक राज्य स्वामित्व वाली कंपनी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह समझौता न केवल बंदरगाह आधुनिकीकरण बल्कि आसपास के क्षेत्र में औद्योगिक पार्क, लॉजिस्टिक्स हब और निवेश को आकर्षित करेगा।

चीन के लिए यह बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का विस्तार है। बांग्लादेश चीन का बड़ा व्यापारिक साझेदार है और बीजिंग यहां बड़े पैमाने पर निवेश कर चुका है। मोंगला का विकास चीन को हिंद महासागर में अपनी पहुंच बढ़ाने का अवसर देगा।

भारत के लिए क्यों है झटका?

भारत के लिए यह घटनाक्रम कई कारणों से चिंताजनक है:

1. रणनीतिक पहुंच का नुकसान: मोंगला पोर्ट भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (सात बहनों) और बंगाल की खाड़ी में कनेक्टिविटी के लिए महत्वपूर्ण था। भारत यहां ट्रांजिट और व्यापार सुविधाएं चाहता था।

2. चीन का बढ़ता प्रभाव चीन पहले से ही बांग्लादेश में गहरी पैठ बना चुका है। श्रीलंका के हम्बनटोटा पोर्ट, पाकिस्तान के ग्वादर और अब मोंगला के साथ बीजिंग "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति को मजबूत कर रहा है।

3. आर्थिक हित: भारतीय कंपनियां निवेश की संभावनाएं खो रही हैं। इससे रोजगार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के अवसर भी प्रभावित होंगे।

4. क्षेत्रीय सुरक्षा: बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती मौजूदगी भारत की समुद्री सुरक्षा और "एक्ट ईस्ट" नीति को चुनौती दे सकती है।

हालांकि, कुछ विश्लेषक इसे बांग्लादेश की "संतुलित विदेश नीति" का हिस्सा मानते हैं। बांग्लादेश आर्थिक विकास के लिए विविध साझेदार चाहता है, न कि किसी एक देश पर निर्भर रहना।

 चीन-बांग्लादेश संबंधों का विस्तार

तारिक रहमान और शी जिनपिंग की मुलाकात में आर्थिक सहयोग पर जोर दिया गया। चीन बांग्लादेश को ऋण, तकनीक और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने को तैयार है। पहले से चल रहे प्रोजेक्ट्स जैसे पद्मा ब्रिज (जिसमें चीन की भूमिका रही) की सफलता को देखते हुए नई पहलें तेज होंगी।

दोनों देशों के बीच व्यापार का आंकड़ा पहले ही अरबों डॉलर में है। नई डील्स हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और डिजिटल कनेक्टिविटी पर केंद्रित हैं। बांग्लादेश चीन को सस्ते श्रम और बाजार के रूप में देखता है, जबकि चीन इसे हिंद महासागर में पैठ के लिए।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

जियोपॉलिटिकल विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश "भारत-चीन टाइटरोप वॉक" कर रहा है। यूनुस काल में भारत विरोधी भावनाएं बढ़ीं, जिसका फायदा चीन ने उठाया। तारिक रहमान की सरकार अब व्यावहारिक रास्ता चुन रही है—जो देश निवेश दे, उसी के साथ गहरे संबंध।

भारत को अब अपनी "नेबरहुड फर्स्ट" नीति की समीक्षा करनी होगी। तेजी से परियोजनाओं को लागू करना, लोगों के बीच विश्वास बढ़ाना और आर्थिक पैकेज पेश करना जरूरी है।

 भविष्य की संभावनाएं

मोंगला इकोनॉमिक जोन का विकास बांग्लादेश के लिए रोजगार और औद्योगिक विकास ला सकता है। अगर चीन इसे सफलतापूर्वक संचालित करता है, तो यह BRI का मॉडल प्रोजेक्ट बन सकता है। लेकिन ऋण जाल (debt trap) की आशंकाएं भी हैं, जैसा श्रीलंका के मामले में देखा गया।

भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। दोनों देश साझा नदियों, सीमा प्रबंधन और व्यापार पर सहयोग कर सकते हैं।


बदलते समीकरण

तारिक रहमान की चीन यात्रा दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन का प्रतीक है। यह भारत के लिए एक झटका तो है, लेकिन अवसर भी—अपनी कूटनीति को मजबूत करने का। बांग्लादेश की प्रगति सभी के लिए फायदेमंद है, बशर्ते क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।

मोंगला पोर्ट की यह नई कहानी हमें याद दिलाती है कि 21वीं सदी की जियोपॉलिटिक्स आर्थिक हितों पर टिकी है। जो देश तेजी से निवेश और विकास प्रदान करेगा, वही प्रभावशाली होगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 27 Jun 2026
June 27, 2026

दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी: फातिमा अल-फिहरी की अमर विरासत और अल-कराउइन की कहानी

दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी: फातिमा अल-फिहरी की अमर विरासत और अल-कराउइन की कहानी
 - Friday World 27 Jun 2026
जब हम उच्च शिक्षा और यूनिवर्सिटी की बात करते हैं, तो ज्यादातर लोगों के मन में यूरोप के नाम घूमते हैं—बोलोग्ना, ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे पुरानी लगातार चलने वाली यूनिवर्सिटी न तो इटली में है, न ब्रिटेन में, बल्कि उत्तरी अफ्रीका के मोरक्को में? फेज़ शहर की यूनिवर्सिटी ऑफ अल-कराउइन (University of al-Qarawiyyin) न सिर्फ इतिहास की किताबों में, बल्कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और यूनेस्को की मान्यता के अनुसार, दुनिया की सबसे पुरानी उच्च शिक्षा संस्था है। इसकी स्थापना 859 ईस्वी में एक दूरदर्शी मुस्लिम महिला, फातिमा अल-फिहरी ने की थी।

यह कहानी सिर्फ एक इमारत की नहीं, बल्कि ज्ञान की प्यास, महिला सशक्तिकरण और इस्लामी स्वर्ण युग की बौद्धिक विरासत की है। आज भी यह संस्थान सक्रिय है और आधुनिक शिक्षा प्रणाली को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुका है।

फातिमा अल-फिहरी: एक महिला का सपना और दान

9वीं शताब्दी की शुरुआत। ट्यूनीशिया के कैरवान (Qairouan) शहर से एक समृद्ध व्यापारी परिवार फेज़ (Fez), मोरक्को में बसने आया। इस परिवार की बेटी थीं फातिमा अल-फिहरी। उनके पिता मुहम्मद अल-फिहरी एक सफल व्यापारी थे, जिन्होंने अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दी। फातिमा और उनकी बहन मरयम दोनों ही ज्ञान की दीवानी थीं।

पिता की मृत्यु के बाद दोनों बहनों को काफी संपत्ति विरासत में मिली। फातिमा ने इस संपत्ति को व्यक्तिगत सुख-सुविधा में खर्च करने के बजाय एक बड़े उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने फैसला किया कि फेज़ में एक मस्जिद और शिक्षा केंद्र बनवाया जाए, जहां न सिर्फ नमाज पढ़ी जाए, बल्कि ज्ञान का आदान-प्रदान भी हो। 

859 ईस्वी में, रमजान के पहले दिन, फातिमा और उनकी बहन ने अल-कराउइन मस्जिद की नींव रखी। नाम उन्होंने अपने गृहनगर कैरवान के सम्मान में रखा। निर्माण में लगभग दो साल लगे। शुरू में यह एक मस्जिद था, लेकिन जल्द ही इसमें पढ़ाई-लिखाई शुरू हो गई। फातिमा खुद भी यहां शिक्षा ग्रहण करती थीं। उन्होंने इसे वक्फ (charitable endowment) के रूप में स्थापित किया, ताकि यह सदियों तक चले और किसी की व्यक्तिगत संपत्ति न बने।

अल-कराउइन: मस्जिद से यूनिवर्सिटी तक

शुरुआती दौर में अल-कराउइन में इस्लामी अध्ययन, कुरान, हदीस, फिक्ह (इस्लामी कानून), अरबी व्याकरण, गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और अन्य विषय पढ़ाए जाते थे। यहां का शिक्षण पद्धति अनोखी थी—छात्र शेख (शिक्षक) के चारों ओर अर्ध-वृत्ताकार में बैठते और चर्चा करते। यह तरीका आज भी कई जगहों पर देखा जा सकता है।

समय के साथ यह संस्थान पूरे इस्लामी दुनिया का बौद्धिक केंद्र बन गया। 10वीं से 14वीं शताब्दी के दौरान फेज़ इस्लामी स्वर्ण युग का प्रमुख केंद्र था। अल-कराउइन ने न सिर्फ मुस्लिम विद्वानों को, बल्कि यूरोपीय विद्वानों को भी आकर्षित किया। कई इतिहासकारों का मानना है कि यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance) को प्रभावित करने वाले कई विचार इसी जगह से निकले।

यहां की लाइब्रेरी भी बेहद प्रसिद्ध है, जिसमें दुर्लभ पांडुलिपियां संरक्षित हैं। यह संस्थान आधुनिक डिग्री प्रणाली का अग्रदूत माना जाता है—विभिन्न स्तरों (जैसे इजाजा) पर डिग्री देने की परंपरा यहीं से शुरू हुई।

 गिनीज और यूनेस्को की मान्यता

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स स्पष्ट रूप से अल-कराउइन को "दुनिया की सबसे पुरानी लगातार चलने वाली उच्च शिक्षा संस्था" मानता है। यूनेस्को ने फेज़ की मदीना को विश्व धरोहर घोषित किया है और अल-कराउइन को इसके केंद्र के रूप में मान्यता दी है। 

तुलना करें तो:
- इटली की बोलोग्ना यूनिवर्सिटी (1088 ईस्वी) को यूरोप की सबसे पुरानी माना जाता है।
- अल-कराउइन इससे लगभग 229 साल पहले स्थापित हुई।

यह सिर्फ उम्र की बात नहीं, बल्कि निरंतरता की भी है। अल-कराउइन आज भी बिना रुके चल रही है, जबकि कई प्राचीन संस्थान समय के साथ लुप्त हो गए।

 आधुनिक युग में अल-कराउइन

1963 में इसे आधिकारिक रूप से मोरक्को की राज्य यूनिवर्सिटी का दर्जा मिला। आज यहां इस्लामी अध्ययन, कानून, भाषा, साहित्य और अन्य विषयों की पढ़ाई होती है। पारंपरिक शिक्षण पद्धति के साथ-साथ आधुनिक सुविधाएं भी जुड़ चुकी हैं। 

यह यूनिवर्सिटी सिर्फ मोरक्को की नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम दुनिया और मानवता की साझा विरासत है। यहां पढ़े कई विद्वान बाद में बड़े-बड़े योगदान देते रहे। उदाहरण के लिए, मध्यकालीन यूरोप में अरबी ज्ञान का अनुवाद अल-कराउइन जैसे केंद्रों से प्रभावित था।

 महिला सशक्तिकरण की प्रेरणादायक मिसाल

फातिमा अल-फिहरी की कहानी 9वीं शताब्दी में महिला शिक्षा और नेतृत्व की मिसाल है। उस दौर में जब संसाधन सीमित थे, एक महिला ने अपनी सारी संपत्ति ज्ञान के प्रसार पर लगा दी। उन्होंने न सिर्फ मस्जिद बनवाई, बल्कि एक ऐसी संस्था खड़ी की जो सदियों तक ज्ञान का दीपक बनी रही।

आज के समय में जब महिला शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है, फातिमा की कहानी याद दिलाती है कि सशक्तिकरण की जड़ें हमारे इतिहास में गहरी हैं। उनकी बहन मरयम ने भी अल-अंदरुस मस्जिद बनवाई, जो फेज़ की दूसरी महत्वपूर्ण इमारत है।

 क्यों भुला दिया जाता है यह इतिहास?

अक्सर यूरोकेंद्रित इतिहास लेखन के कारण अल-कराउइन जैसी उपलब्धियां पृष्ठभूमि में चली जाती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इस्लामी स्वर्ण युग ने विज्ञान, चिकित्सा, गणित और दर्शन में जो योगदान दिया, वह आधुनिक सभ्यता की नींव है। अल-कराउइन इसी योगदान का जीवंत प्रमाण है।

फेज़ शहर खुद एक जीवंत संग्रहालय है—संकीर्ण गलियां, पारंपरिक बाजार, और प्राचीन इमारतें आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। अल-कराउइन यहां का गौरव है।

ज्ञान की निरंतरता

अल-कराउइन हमें याद दिलाती है कि ज्ञान की यात्रा सीमाओं से परे है। एक महिला की दूरदृष्टि ने न सिर्फ एक यूनिवर्सिटी बनाई, बल्कि पूरे विश्व को शिक्षा का नया मॉडल दिया। आज जब हम डिजिटल युग में नई-नई यूनिवर्सिटीज देख रहे हैं, तब भी इस 1165+ साल पुरानी संस्था की प्रासंगिकता बरकरार है।

फातिमा अल-फिहरी का संदेश साफ है—शिक्षा सबसे बड़ा सदका है। उनकी विरासत हमें प्रेरित करती है कि ज्ञान को संरक्षित रखें, फैलाएं और अगली पीढ़ी को सौंपें।

यह लेख मूल शोध, ऐतिहासिक तथ्यों और विश्वसनीय स्रोतों (गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स, यूनेस्को, ऐतिहासिक दस्तावेज) पर आधारित है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 27 Jun 2026
June 27, 2026

दिल्ली में सियासी सरगर्मी तेज: मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल की आहट, निर्मला सीतारमण का मंत्रालय बदलेगा, शक्तिकांत दास को मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी

दिल्ली में सियासी सरगर्मी तेज: मोदी कैबिनेट में बड़े फेरबदल की आहट, निर्मला सीतारमण का मंत्रालय बदलेगा, शक्तिकांत दास को मिल सकती है बड़ी जिम्मेदारी -Friday World 27 Jun 2026
नई दिल्ली: राजधानी के सियासी गलियारों में केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार और फेरबदल को लेकर अटकलें चरम पर पहुंच गई हैं। सूत्रों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आने वाले रविवार या सोमवार को अपनी कैबिनेट में बड़ा बदलाव कर सकते हैं। इस फेरबदल में कई नए चेहरों की एंट्री तय मानी जा रही है, जबकि मौजूदा मंत्रियों के विभागों में भी बड़े स्तर पर अदला-बदली संभव है। 

चर्चा है कि भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और प्रधानमंत्री के पूर्व प्रधान सचिव शक्तिकांत दास को केंद्रीय कैबिनेट में जगह मिल सकती है। वहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को मानव संसाधन विकास मंत्रालय सौंपे जाने की प्रबल संभावना है। ऐसे में वित्त मंत्रालय की कमान शक्तिकांत दास को दिए जाने की अटकलें सबसे ज्यादा लगाई जा रही हैं।

क्यों जरूरी हो गया कैबिनेट फेरबदल?

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में यह पहला बड़ा फेरबदल होगा। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सरकार अपने कामकाज को और धार देना चाहती है। इसके पीछे तीन बड़ी वजहें मानी जा रही हैं।

पहला कारण: क्षेत्रीय संतुलन साधना
महाराष्ट्र, बिहार, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों से कैबिनेट में प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है। 2026 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना के सांसद श्रीकांत शिंदे और बिहार से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है। श्रीकांत शिंदे एकनाथ शिंदे के बेटे हैं और उन्हें मंत्री बनाकर महाराष्ट्र में NDA को मजबूती देने की कोशिश होगी।

दूसरा कारण: प्रदर्शन के आधार पर मूल्यांकन
जिन मंत्रालयों का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा या जहां विवाद हुए हैं, वहां बदलाव तय माना जा रहा है। 'नीट' पेपर लीक मामले के बाद शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मंत्रालय वापस लिया जा सकता है। उनकी जगह निर्मला सीतारमण को शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी देने की चर्चा है। सीतारमण का लंबा प्रशासनिक अनुभव नई शिक्षा नीति को लागू करने में मददगार साबित हो सकता है।

तीसरा कारण: सहयोगी दलों को साधना
NDA के सहयोगी दलों को कैबिनेट में ज्यादा जगह देकर 2029 से पहले गठबंधन को मजबूत करने की रणनीति है। नीतीश कुमार अगर केंद्र में आते हैं तो बिहार में नेतृत्व परिवर्तन का रास्ता भी साफ हो जाएगा।

पंजाब और पश्चिम बंगाल पर खास फोकस

पंजाब में जल्द विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। फिलहाल केंद्रीय मंत्रिमंडल में पंजाब का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। 2020 में कृषि कानूनों के विरोध में हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से शिरोमणि अकाली दल सरकार से दूर है। रणवीत सिंह बिट्टू को भी दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया।

ऐसे में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी की जगह किसी दूसरे सिख नेता को मौका दिया जा सकता है। इस रेस में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा का नाम भी चर्चा में है। हालांकि चड्ढा विपक्ष में हैं, लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के करीब 20 बागी सांसदों ने NDA को समर्थन देने का ऐलान किया है। इन बागी सांसदों में से किसी एक को केंद्रीय मंत्री बनाकर ममता बनर्जी को सीधी चुनौती दी जा सकती है। भाजपा बंगाल में अपना जनाधार बढ़ाना चाहती है और यह कदम सियासी समीकरण बदल सकता है।

किन मंत्रियों के बदल सकते हैं विभाग?

निर्मला सीतारमण के अलावा सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर के मंत्रालयों में भी बदलाव की संभावना जताई जा रही है। गडकरी के पास फिलहाल बहुत बड़ा कामकाज है। उनका कार्यभार कम करके दूसरे मंत्रियों को जिम्मेदारी दी जा सकती है। 

मनोहर लाल खट्टर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए उन्हें कोई दूसरा बड़ा मंत्रालय दिया जा सकता है। धर्मेंद्र प्रधान के लिए यह फेरबदल अग्निपरीक्षा साबित हो सकता है। 'नीट' विवाद में देशभर में सरकार की आलोचना हुई थी। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय की छवि सुधारने के लिए नेतृत्व परिवर्तन जरूरी माना जा रहा है।

राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद तेज हुईं अटकलें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले हफ्ते राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले थे। आमतौर पर कैबिनेट विस्तार या फेरबदल से पहले प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को जानकारी देते हैं। इस मुलाकात के बाद ही दिल्ली में अटकलों का बाजार गर्म हुआ है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी के तहत यह फेरबदल कर रही है। नए चेहरों को मौका देकर, सहयोगी दलों को साथ लेकर और प्रदर्शन के आधार पर मंत्रियों की जिम्मेदारी तय करके सरकार अगली चुनाव के लिए मजबूत टीम बनाना चाहती है।

शक्तिकांत दास की एंट्री का क्या होगा असर?

अगर शक्तिकांत दास को वित्त मंत्री बनाया जाता है तो यह आर्थिक नीतियों के लिए बड़ा संकेत होगा। दास RBI गवर्नर रह चुके हैं और मौद्रिक नीति की गहरी समझ रखते हैं। कोविड के दौरान उनके काम की तारीफ हुई थी। वित्त मंत्रालय में उनकी मौजूदगी से बाजार को भी सकारात्मक संदेश जाएगा।

वहीं निर्मला सीतारमण को शिक्षा मंत्रालय मिलने पर उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा में सुधारों को रफ्तार मिल सकती है। उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर बजट में शिक्षा के लिए आवंटन बढ़ाया था। अब सीधे मंत्रालय संभालकर वह नई शिक्षा नीति 2020 को जमीन पर उतारने पर फोकस कर सकती हैं।

आगे क्या होगा?

फिलहाल ये सब सिर्फ अटकलें हैं। अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को लेना है। लेकिन दिल्ली के सियासी गलियारों में जिस तरह चर्चाएं चल रही हैं, उसे देखते हुए अगले 48 घंटे बेहद अहम रहने वाले हैं।

अगर शक्तिकांत दास वित्त मंत्री बनते हैं, श्रीकांत शिंदे और नीतीश कुमार की एंट्री होती है, और पंजाब-बंगाल से नए चेहरों को जगह मिलती है, तो NDA और मजबूत होगा। यह फेरबदल सिर्फ मंत्रियों की अदला-बदली नहीं होगा। यह 2029 की तैयारी की दिशा में बड़ा सियासी कदम साबित होगा।

अब सबकी नजर प्रधानमंत्री के अगले फैसले पर टिकी है। आधिकारिक घोषणा प्रधानमंत्री कार्यालय से ही की जाएगी। तब तक कयासों का दौर जारी रहेगा।

जरूरी सूचना: यह लेख राजनीतिक गलियारों में चल रही चर्चाओं और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। कैबिनेट फेरबदल को लेकर कोई भी आधिकारिक जानकारी PMO की तरफ से ही जारी की जाएगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 27 Jun 2026
June 27, 2026

ભાવનગરવાસીઓ ધ્યાન આપો: 29 જૂનથી 1 જુલાઈ સુધી સવારે 6થી 12 વીજળી ગુલ, PGVCLનું મરામત અભિયાન શરૂ

ભાવનગરવાસીઓ ધ્યાન આપો: 29 જૂનથી 1 જુલાઈ સુધી સવારે 6થી 12 વીજળી ગુલ, PGVCLનું મરામત અભિયાન શરૂ
 -Friday World 27 Jun 2026
ભાવનગર શહેર અને આસપાસના વિસ્તારોમાં રહેતા નાગરિકો માટે અગત્યની સૂચના જાહેર થઈ છે. પશ્ચિમ ગુજરાત વીજ કંપની લિમિટેડ (PGVCL) સિટી-1 વિભાગ દ્વારા ચોમાસા પહેલાં વીજ માળખાને વધુ મજબૂત બનાવવા માટે મોટાપાયે સમારકામ અને જાળવણીની કામગીરી હાથ ધરવામાં આવી રહી છે. આ કામગીરીને પગલે 29 જૂન, 2026 રવિવારથી 1 જુલાઈ, 2026 મંગળવાર સુધી શહેરના જુદા જુદા વિસ્તારોમાં સવારે 6:00 વાગ્યાથી બપોરે 12:00 વાગ્યા સુધી વીજ પુરવઠો બંધ રાખવામાં આવશે. 

PGVCLએ સ્પષ્ટ કર્યું છે કે આ વીજ કાપ નિયમિત જાળવણીનો ભાગ છે. ચોમાસામાં વાવાઝોડા, વરસાદ કે અન્ય કુદરતી કારણોસર વીજ ફોલ્ટ ન સર્જાય અને નાગરિકોને અવિરત વીજળી મળતી રહે તે માટે આ કામગીરી અત્યંત જરૂરી છે. કંપનીએ નાગરિકોને વિનંતી કરી છે કે તેઓ ગભરાયા વગર સહકાર આપે અને ત્રણ દિવસ માટે જરૂરી પૂર્વ તૈયારીઓ કરી લે.

કયા દિવસે કયા વિસ્તારમાં રહેશે વીજ કાપ?

PGVCL દ્વારા જાહેર કરાયેલા સમયપત્રક મુજબ ત્રણ દિવસ અલગ-અલગ ફીડર હેઠળ આવતા વિસ્તારોમાં વારાફરતી વીજ પુરવઠો બંધ રહેશે.

1. તારીખ: 29 જૂન 2026, રવિવાર
સમય: સવારે 6:00 થી બપોરે 12:00  
અસરગ્રસ્ત વિસ્તારો: એરપોર્ટ રોડ, ગૌરીશંકર તળાવ આસપાસનો વિસ્તાર, ફાયર બ્રિગેડ સ્ટેશન પાસેનો વિસ્તાર, તેમજ તેની આજુબાજુની સોસાયટીઓ અને કોમર્શિયલ કોમ્પ્લેક્સ. 

આ વિસ્તારમાં મોટી સંખ્યામાં રહેણાંક સોસાયટીઓ, હોટલો અને એરપોર્ટ જેવી મહત્વની સંસ્થાઓ આવેલી છે. રવિવારનો દિવસ હોવાથી ઘરેલુ કામકાજ પર અસર પડી શકે છે. તેથી પાણીની ટાંકીઓ ભરી લેવી, ઈન્વર્ટર ચાર્જ રાખવા અને ફ્રીજમાં રાખેલી ખાદ્ય સામગ્રીનું ધ્યાન રાખવું હિતાવહ છે.

2. તારીખ: 30 જૂન 2026, સોમવાર
સમય: સવારે 6:00 થી બપોરે 12:00  
અસરગ્રસ્ત વિસ્તારો: હલુરિયા ચોક, ટાઉનહોલ રોડ, કાળિયાબીડ સર્કલથી સંલગ્ન વિસ્તારો, જૂના બંદર રોડના અમુક ભાગો અને આસપાસની બજારો.

સોમવાર કામકાજનો દિવસ હોવાથી આ વિસ્તારમાં આવેલી દુકાનો, બેંકો, સરકારી કચેરીઓ અને નાના-મોટા ઉદ્યોગોને અસર થવાની શક્યતા છે. વેપારીઓએ પોતાના કોમ્પ્યુટર, બિલિંગ મશીન અને અન્ય ઈલેક્ટ્રોનિક સાધનો માટે વૈકલ્પિક વ્યવસ્થા વિચારી લેવી જોઈએ.

3. તારીખ: 1 જુલાઈ 2026, મંગળવાર
સમય: સવારે 6:00 થી બપોરે 12:00  
અસરગ્રસ્ત વિસ્તારો: VIP પાર્ક, BSNL ટેલિફોન એક્સચેન્જ વિસ્તાર, સરદાર પટેલ સોસાયટી, કૃષ્ણનગર તેમજ તેની આસપાસના રહેણાંક વિસ્તારો.

આ વિસ્તારો ગીચ વસ્તી ધરાવતા હોવાથી સવારના સમયે પાણીની મોટર, લિફ્ટ અને અન્ય ઘરવપરાશના સાધનો ચલાવવા માટે નાગરિકોએ સવારે 6 વાગ્યા પહેલાં કામ પતાવી લેવું સલાહભર્યું છે.

PGVCLએ શા માટે લેવો પડ્યો આ નિર્ણય?

PGVCL સિટી-1 વિભાગના અધિકારીઓના જણાવ્યા મુજબ ચોમાસા દરમિયાન વીજ વિક્ષેપની ફરિયાદો ખૂબ વધી જાય છે. જૂના થાંભલા, ઢીલા વાયરો, ડાળીઓનો સ્પર્શ અને ટ્રાન્સફોર્મરમાં આવતી ખામી મુખ્ય કારણો છે. આથી ચોમાસા પહેલાં જ બધા 11KV ફીડર, LT લાઈન, ટ્રાન્સફોર્મર અને સબસ્ટેશનની સઘન ચકાસણી કરવામાં આવે છે. 

આ કામગીરીમાં મુખ્યત્વે નીચેના કામોનો સમાવેશ થાય છે:

- જર્જરિત વાયર બદલવા: ઘણી જગ્યાએ વાયરો ખૂબ જૂના થઈ ગયા છે જે ભારે પવન કે વરસાદમાં તૂટી પડે છે.
- ઝાડની ડાળીઓ કાપવી: વીજ લાઈનને અડતી ડાળીઓના કારણે શોર્ટ સર્કિટ થાય છે.
- ટ્રાન્સફોર્મર ઓઈલ બદલવું: ટ્રાન્સફોર્મરની ક્ષમતા જાળવવા ઓઈલ ફિલ્ટરેશન અને મેન્ટેનન્સ જરૂરી છે.
- નવા ઈન્સ્યુલેટર લગાવવા: તૂટેલા કે ક્રેક થયેલા ઈન્સ્યુલેટરના કારણે લિકેજ કરંટનો ભય રહે છે.
- અર્થિંગ ચેક કરવું: સલામતી માટે દરેક થાંભલાનું અર્થિંગ મજબૂત હોવું જોઈએ.

આ તમામ કામો કર્મચારીઓની સલામતી માટે વીજ પુરવઠો બંધ રાખીને જ કરવા પડે છે. PGVCLએ ખાતરી આપી છે કે તમામ કામગીરી સલામતીના નિયમોનું ચુસ્તપણે પાલન કરીને કરવામાં આવશે.

નાગરિકો માટે અગત્યની સૂચનાઓ અને તૈયારીઓ

વીજ કાપના આ ત્રણ દિવસ દરમિયાન તમારી રોજિંદી જિંદગી પર ઓછી અસર થાય તે માટે PGVCLએ કેટલીક મહત્વની સલાહો આપી છે:

1. પાણીની વ્યવસ્થા: સવારે 6 વાગ્યા પહેલાં ઘરની ટાંકીઓ ભરી લો. પાણીની મોટર વીજળી વગર ચાલશે નહીં.
2. 
2. મોબાઈલ અને ઈન્વર્ટર: રાત્રે જ મોબાઈલ ફોન, પાવર બેંક અને ઈન્વર્ટર ફુલ ચાર્જ કરી લો. ઈમરજન્સી માટે બેટરીવાળી ટોર્ચ રાખો.
3. 
3. ઘરેલુ ઉપકરણો: ફ્રીજ-ફ્રીઝરને વારંવાર ખોલવાનું ટાળો જેથી ઠંડક જળવાઈ રહે. વીજળી આવ્યા બાદ એક સાથે બધા હેવી ઉપકરણો ચાલુ ન કરો, કારણ કે લોડ આવી શકે છે.
4. 
4. વેપારીઓ માટે: દુકાનદારો અને ઓફિસ ધરાવતા લોકોએ પોતાના મહત્વના ડેટાનું બેકઅપ લઈ લેવું. જનરેટરની વ્યવસ્થા હોય તો તેનું ડીઝલ ચેક કરી લેવું.
5. 
5. વિદ્યાર્થીઓ માટે: ઓનલાઈન ક્લાસ કે પરીક્ષા હોય તો પહેલાંથી જ સંબંધિત શિક્ષક કે સંસ્થાને જાણ કરી દેવી.
6. 
6. વૃદ્ધો અને દર્દીઓ: ઘરમાં જો કોઈ બીમાર વ્યક્તિ હોય કે ઓક્સિજન કોન્સન્ટ્રેટર જેવા મશીન પર હોય તો વૈકલ્પિક વ્યવસ્થા અચૂક કરી લેવી. જરૂર પડ્યે 108 નો સંપર્ક કરવો.
7. 
7. લિફ્ટનો ઉપયોગ: 6 વાગ્યા પછી લિફ્ટનો ઉપયોગ ટાળવો. વીજળી અચાનક જાય તો ફસાઈ જવાની શક્યતા રહે છે.

સારી વાત: કામ વહેલું પતે તો વીજળી પણ વહેલી આવશે

PGVCLએ નાગરિકોને આશ્વાસન આપતા જણાવ્યું છે કે જે દિવસે જે વિસ્તારનું સમારકામ નિર્ધારિત સમય એટલે કે 12 વાગ્યા પહેલાં પૂર્ણ થઈ જશે, તે વિસ્તારમાં તરત જ વીજ પુરવઠો ચાલુ કરી દેવામાં આવશે. કામગીરી પૂરજોશમાં ચાલી રહી છે અને તમામ ટીમોને સમયસર કામ પૂરું કરવાની સૂચના આપવામાં આવી છે.

ફરિયાદ કે માહિતી માટે સંપર્ક

જો કોઈ નાગરિકને આ વીજ કાપ અંગે વધુ માહિતી જોઈતી હોય અથવા ઈમરજન્સી હોય તો PGVCLના ટોલ ફ્રી નંબર 19122 પર અથવા સિટી-1 વિભાગની કચેરીનો સંપર્ક કરી શકે છે. આ ઉપરાંત PGVCLની ઓફિશિયલ વેબસાઈટ અને મોબાઈલ એપ પરથી પણ રિયલ ટાઈમ અપડેટ મેળવી શકાશે.

થોડી અગવડ, લાંબા ગાળાની સગવડ

ચોક્કસ, ત્રણ દિવસ સવારનો સમય વીજળી વગર પસાર કરવો થોડો અઘરો લાગશે. ખાસ કરીને ઉનાળાની ગરમી અને ચોમાસાની શરૂઆતના ભેજવાળા વાતાવરણમાં પંખા, AC વગર રહેવું મુશ્કેલ બને. પરંતુ આ કામગીરી ભવિષ્યમાં અચાનક આવતા વીજ કાપથી બચાવશે. જૂન-જુલાઈમાં કરવામાં આવતું મેન્ટેનન્સ આખા ચોમાસા દરમિયાન વીજળીની સ્થિરતા સુનિશ્ચિત કરશે.

તેથી ભાવનગરના તમામ નાગરિકો, વેપારીઓ અને સંસ્થાઓને નમ્ર વિનંતી છે કે તંત્રને સહકાર આપે. આ ત્રણ દિવસ પૂર્વ આયોજન સાથે પસાર કરી લઈશું તો આખું ચોમાસું વીજ કાપની ઝંઝટ વગર શાંતિથી પસાર કરી શકીશું. યાદ રાખો, આજની થોડી અગવડ કાલની મોટી સગવડ માટે છે.

ચેતવણી: વીજ કામગીરી ચાલુ હોય ત્યારે વીજ લાઈન કે થાંભલા પાસે જવું નહીં. બાળકોને પણ દૂર રાખવા. વીજળી ગમે ત્યારે ચાલુ થઈ શકે છે, તેથી તમામ સ્વીચ અને ઉપકરણો બંધ સ્થિતિમાં રાખવા હિતાવહ છે.

ભાવનગરને લોડશેડિંગ મુક્ત બનાવવાના PGVCLના આ અભિયાનમાં આપ સૌ સહભાગી બનો.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 27 Jun 2026

Friday, 26 June 2026

June 26, 2026

એકતાના સૂર, વિખવાદ સામે વિસ્ફોટ: ભાવનગરમાં કોળી સમાજના આગેવાનોનો હુંકાર, વર્ગવિગ્રહની રાજનીતિ સામે આરપારની લડતનો શંખનાદ


એકતાના સૂર, વિખવાદ સામે વિસ્ફોટ: ભાવનગરમાં કોળી સમાજના આગેવાનોનો હુંકાર, વર્ગવિગ્રહની રાજનીતિ સામે આરપારની લડતનો શંખનાદ
-Friday World 27 Jun 2016
વેગડ ફાર્મહાઉસ ખાતે સૌરાષ્ટ્રના કોળી આગેવાનોની મહાબેઠક, સંગઠન મજબૂત કરવા અને જાગૃતિ અભિયાન માટે રણનીતિ ઘડાઈ

ભાવનગર, 27 જૂન 2026:
સમાજને જાતિ અને વર્ગના નામે વહેંચીને રાજકીય રોટલા શેકવાની કોશિશો સામે હવે કોળી સમાજે લાલ આંખ કરી છે. સૌરાષ્ટ્રના હૃદય સમાન ભાવનગરના વેગડ ફાર્મહાઉસ ખાતે યોજાયેલી કોળી સમાજની મહત્વપૂર્ણ બેઠકમાં આગેવાનોનો રોષ ચરમસીમાએ જોવા મળ્યો. સમાજમાં ફાટફૂટ પડાવતી રાજનીતિને જડમૂળથી ઉખેડી નાખવાનો સંકલ્પ લઈને સૌરાષ્ટ્રભરના મુખ્ય આગેવાનો એક મંચ પર આવ્યા.

આ બેઠક માત્ર રોષ ઠાલવવાનો મંચ નહોતો, પરંતુ ભવિષ્યની દિશા નક્કી કરતી વ્યૂહરચનાનું કેન્દ્ર બની. કલાકો સુધી ચાલેલી મેરેથોન બેઠકમાં સમાજની એકતા, સંગઠનની મજબૂતી અને આવનારા સમયના કાર્યક્રમોની બ્લુપ્રિન્ટ તૈયાર કરવામાં આવી.

બેઠકના મુખ્ય મુદ્દા: રોષથી રણનીતિ સુધી

1. વર્ગવિગ્રહની રાજનીતિ સામે આક્રોશ:
બેઠકમાં ઉપસ્થિત તમામ આગેવાનોનો એક સૂર હતો કે છેલ્લા કેટલાક સમયથી કેટલાક તત્વો દ્વારા સમાજમાં ભાગલા પાડવાના પ્રયાસો થઈ રહ્યા છે. કોળી સમાજની પેટા જ્ઞાતિઓ વચ્ચે ભેદભાવ ઉભો કરીને રાજકીય લાભ ખાટવાના ખેલ સામે ભારે નારાજગી વ્યક્ત કરવામાં આવી. વક્તાઓએ સ્પષ્ટ શબ્દોમાં કહ્યું કે કોળી સમાજ એક વિશાળ વટવૃક્ષ છે અને તેની કોઈપણ ડાળી કાપવાનો પ્રયાસ સાંખી લેવામાં આવશે નહીં. "અમે જાતિના નહીં, પણ જાગૃતિના આધારે જોડાયેલા છીએ" એવો સ્પષ્ટ સંદેશ બેઠકમાંથી અપાયો.

2. એકતા એ જ પરમ ધર્મ:
સમાજના વરિષ્ઠ આગેવાનોએ ભારપૂર્વક જણાવ્યું કે સમાજના હિત અને વિકાસ માટે એકતા અનિવાર્ય છે. સામાજિક, શૈક્ષણિક અને આર્થિક ઉન્નતિ ત્યારે જ શક્ય છે જ્યારે સમાજનો દરેક વર્ગ ખભેખભો મિલાવીને ચાલે. ભૂતકાળના મતભેદો ભૂલીને નવા સંકલ્પ સાથે આગળ વધવા માટે આહ્વાન કરવામાં આવ્યું. એક આગેવાને કહ્યું કે, "આપણી તાકાત આપણી સંખ્યામાં નથી, આપણી એકતામાં છે. જે દિવસે આપણે વિખેરાઈ જઈશું, તે દિવસે આપણું અસ્તિત્વ જોખમાશે."

3. સંગઠન પર્વ: જાગૃતિ અભિયાનનો પ્રારંભ:
બેઠકનું સૌથી મહત્વનું પરિણામ એ આવ્યું કે આગામી દિવસોમાં સમગ્ર સૌરાષ્ટ્ર અને રાજ્ય સ્તરે કોળી સમાજ જાગૃતિ અભિયાન ચલાવવામાં આવશે. આ અભિયાન હેઠળ દરેક જિલ્લા, તાલુકા અને ગામડા સુધી પહોંચીને સમાજને સંગઠિત કરાશે. યુવાનો, મહિલાઓ અને વડીલોને એક મંચ પર લાવીને સમાજના સાચા પ્રશ્નો પર ચર્ચા કરવામાં આવશે. શિક્ષણ, રોજગાર, સામાજિક કુરિવાજો નાબૂદી અને રાજકીય ભાગીદારી જેવા મુદ્દાઓને કેન્દ્રમાં રાખીને આ અભિયાન ચલાવાશે.

4. આગામી કાર્યક્રમોની રૂપરેખા:
માત્ર વાતો નહીં, કામનો પણ રોડમેપ તૈયાર થયો. બેઠકમાં નક્કી કરવામાં આવ્યું કે આવનારા 6 મહિનામાં:

- જિલ્લા કક્ષાના સંમેલનો: સૌરાષ્ટ્રના દરેક જિલ્લામાં ભવ્ય કોળી સમાજ સંમેલન યોજીને સ્થાનિક પ્રશ્નોની ઓળખ કરી તેના નિરાકરણ માટે સમિતિ બનાવવામાં આવશે.
- યુવા શિબિરો: સમાજના યુવાનોને નેતૃત્વ, સ્પર્ધાત્મક પરીક્ષા અને ધંધાકીય માર્ગદર્શન આપવા માટે ખાસ શિબિરોનું આયોજન થશે.
- મહિલા સશક્તિકરણ: સમાજની દીકરીઓ અને મહિલાઓને આર્થિક રીતે પગભર કરવા માટે સ્વરોજગારલક્ષી તાલીમ અને કાયદાકીય જાગૃતિના કાર્યક્રમો યોજાશે.
- હેલ્પલાઈન અને કાનૂની સહાય: સમાજના કોઈપણ વ્યક્તિને અન્યાય થાય તો તાત્કાલિક મદદ મળી રહે તે માટે જિલ્લા સ્તરે હેલ્પલાઈન અને કાનૂની સહાય કેન્દ્ર શરૂ કરાશે.

આગેવાનોની ટકોર: હવે બોલવાનો નહીં, કરવાનો સમય
બેઠકમાં ઉપસ્થિત એક યુવા આગેવાને જોશભેર કહ્યું, "અત્યાર સુધી આપણે વાપરવામાં આવ્યા છીએ, હવે આપણે વાપરવાની તાકાત બતાવવી પડશે." વરિષ્ઠ આગેવાનોએ યુવાનોના જોશને વડીલોના અનુભવ સાથે જોડીને આગળ વધવાની સલાહ આપી. સમાજના પ્રશ્નો અને હકો માટે એકજૂથ બનીને લોકશાહી ઢબે લડત લડવાનો સામૂહિક સંકલ્પ લેવામાં આવ્યો.

સમાજનું ભવિષ્ય: એકતા, શિક્ષણ અને વિકાસ
બેઠકના અંતે એવો સૂર વ્યક્ત થયો કે કોળી સમાજનો ઈતિહાસ ગૌરવવંતો રહ્યો છે. દરિયો ખેડવાથી માંડીને ખેતી અને દેશની રક્ષા સુધી, દરેક ક્ષેત્રમાં કોળી સમાજનું યોગદાન અમૂલ્ય છે. હવે સમય આવી ગયો છે કે આ યોગદાનને યોગ્ય સન્માન અને હિસ્સો મળે. તેના માટે શિક્ષણને પાયો બનાવીને આર્થિક અને રાજકીય રીતે સક્ષમ બનવું પડશે.

વેગડ ફાર્મહાઉસની આ બેઠક માત્ર એક દિવસની ઘટના નથી, પરંતુ સૌરાષ્ટ્રના કોળી સમાજમાં આવેલા એક નવા ચેતનાના એંધાણ છે. વર્ગવિગ્રહની રાજનીતિના વાવાઝોડા સામે એકતાની દીવાલ ઉભી કરવાનો આ પ્રારંભ છે. હવે જોવાનું એ રહેશે કે આ બેઠકમાં લેવાયેલા સંકલ્પો જમીની સ્તરે કેટલી ઝડપથી આકાર લે છે અને સમાજમાં કેટલું મોટું પરિવર્તન લાવે છે. કારણ કે હવે સમાજ જાગ્યો છે, અને જાગેલો સમાજ ઈતિહાસ રચે છે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 27 Jun 2016
June 26, 2026

दिल्ली के दिल में खड़ा नीला चश्मदीद: सब्ज़ बुर्ज की 500 साल पुरानी अनसुनी दास्तान

दिल्ली के दिल में खड़ा नीला चश्मदीद: सब्ज़ बुर्ज की 500 साल पुरानी अनसुनी दास्तान
- Friday World 27 Jun 2027
दिल्ली की सड़कों पर भागदौड़ के बीच, मथुरा रोड के व्यस्त चौराहे पर एक नीला गुम्बद हर रोज़ लाखों लोगों को चुपचाप निहारता है। ज्यादातर लोग इसे "नीली छतरी" या "नीला गुम्बद" कहकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन इसका असली नाम है सब्ज़ बुर्ज, और यह सिर्फ एक मकबरा नहीं है। यह दिल्ली में मुगल सल्तनत की पहली सांसों का गवाह है। हुमायूँ के मकबरे से भी पुरानी यह इमारत लगभग 500 साल से दिल्ली का इतिहास अपनी आँखों से देख रही है।

1. नाम में हरा, रंग में नीला: सब्ज़ बुर्ज का विरोधाभास
"सब्ज़ बुर्ज" का मतलब होता है हरा बुर्ज। फिर भी आज इसका गुम्बद गहरे नीले रंग में चमकता है। यह विरोधाभास ही इसकी सबसे पहली कहानी कहता है। 1530 के दशक में जब यह बना, तब इसके पूरे गुम्बद पर फ़िरोज़ी, हरे और गहरे नीले रंग की चमकदार चीनी टाइलें जड़ी थीं। यह शैली मध्य एशिया की तैमूरी वास्तुकला से आई थी, जहाँ समरकंद और बुखारा के गुम्बद इसी तरह जगमगाते थे। 

सदियों की धूप, बारिश और लापरवाही ने असली टाइलों का बड़ा हिस्सा गिरा दिया। 20वीं सदी में जब इसकी सुध ली गई, तो बची-खुची टाइलें ज्यादातर नीली थीं। 1980 के दशक में मरम्मत के दौरान नई टाइलें भी नीली ही लगा दी गईं। इस तरह "सब्ज़" यानी हरा बुर्ज लोगों की नज़र में "नीला गुम्बद" बन गया। 2017 से 2021 के बीच आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर ने ASI के साथ मिलकर इसका बड़े पैमाने पर संरक्षण किया। पुराने नमूनों के आधार पर हरे, फ़िरोज़ी और नीले रंग की टाइलें फिर से बनाई गईं और गुम्बद का असली तैमूरी लुक लौटाया गया।

2. हुमायूँ के मकबरे से भी पुराना: दिल्ली में मुगलों की पहली निशानी
इतिहासकार मानते हैं कि सब्ज़ बुर्ज 1530-1535 के बीच बना। यानी हुमायूँ के मकबरे से करीब 30 साल पहले। बाबर ने 1526 में पानीपत की जंग जीती थी। उसके बाद का दौर सल्तनत को जमाने का था। सब्ज़ बुर्ज उसी दौर की दिल्ली में बची कुछ चुनिंदा इमारतों में से एक है। यह हमें बताता है कि मुगल वास्तुकला का आगाज़ कैसा था, ताजमहल जैसी भव्यता से बहुत पहले।

इसकी बनावट में ईरानी और स्थानीय शैली का मेल दिखता है। अष्टकोणीय चबूतरा, ऊँचा ड्रम और उसके ऊपर रखा प्याज़नुमा गुम्बद, ये सब आगे चलकर हुमायूँ के मकबरे और ताजमहल की पहचान बने। इसलिए वास्तुकार इसे "मुगल शैली की प्रयोगशाला" भी कहते हैं।

3. सबसे बड़ा रहस्य: यह मकबरा किसका है?
सब्ज़ बुर्ज की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि 500 साल बाद भी हमें नहीं पता कि इसके अंदर कौन दफन है। इमारत पर कोई शिलालेख नहीं है। कोई फरमान, कोई दस्तावेज़ नहीं मिला। 

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह बाबर के किसी बड़े अमीर का मकबरा हो सकता है। कुछ इसे हुमायूँ की माँ माहम बेगम से जोड़ते हैं, क्योंकि यह हुमायूँ के मकबरे के बिल्कुल पास है। एक और थ्योरी कहती है कि यह अब्दुर रहीम खान-ए-खाना के किसी करीबी का हो सकता है। लेकिन कोई पक्का सबूत नहीं है। यह गुमनामी ही इसे और रहस्यमयी बना देती है। एक बादशाह के लिए बनी इतनी शानदार इमारत, मगर नाम तक मिट गया।

4. छत पर छिपा खज़ाना: सोने और लाजवर्द की पेंटिंग
2017 में जब संरक्षण का काम शुरू हुआ, तो कारीगरों को छत के प्लास्टर के नीचे कुछ चमकता हुआ दिखा। परत दर परत हटाने पर 16वीं सदी की असली पेंटिंग सामने आई। गहरे नीले लाजवर्द रंग और असली सोने के वर्क से बनी बेल-बूटे और ज्यामितीय डिज़ाइन। 

विशेषज्ञों के मुताबिक यह भारत में मुगल दौर की सबसे पुरानी बची हुई रंगीन छतों में से एक है। सोचिए, जब हुमायूँ का मकबरा बन रहा था, तब कारीगरों के सामने सब्ज़ बुर्ज की यही छत प्रेरणा के लिए मौजूद थी। सदियों तक सीमेंट और सफेदी की परतों में दबी यह कला अब फिर से सांस ले रही है।

5. निज़ामुद्दीन का दरबान: विरासत के बीच खड़ा प्रहरी 
आज सब्ज़ बुर्ज हुमायूँ के मकबरे, सुंदर नर्सरी और निज़ामुद्दीन बस्ती के हेरिटेज ज़ोन के ठीक मुहाने पर खड़ा है। इसे इस पूरे इलाके का "प्रवेश द्वार" कहा जाता है। एक तरफ 14वीं सदी की हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह है, दूसरी तरफ 16वीं सदी का मुगल दौर। सब्ज़ बुर्ज इन दोनों दौरों को जोड़ता हुआ चौराहे पर खामोश प्रहरी सा खड़ा है।

ट्रैफिक के शोर, कारों के हॉर्न और मेट्रो की आवाज़ के बीच यह इमारत हमें याद दिलाती है कि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है। यह कई शहरों की परत है। हर परत के नीचे एक और कहानी दबी है।

6. सब्ज़ बुर्ज हमें क्या सिखाता है?
पहली बात, विरासत सिर्फ बड़े-बड़े किले और मकबरे नहीं होते। कभी-कभी चौराहे पर खड़ा एक गुमनाम गुम्बद भी इतिहास का सबसे अहम पन्ना हो सकता है। 

दूसरी बात, नाम और पहचान हमेशा के लिए नहीं रहते। आज जो "सब्ज़" है, कल वो "नीला" कहला सकता है। जिसके लिए इमारत बनी, उसका नाम तक मिट सकता है। बचता है तो सिर्फ हुनर, कला और वक्त की गवाही।

तीसरी बात, संरक्षण का महत्व। अगर 2017 में इसका काम शुरू न होता, तो शायद छत की पेंटिंग हमेशा के लिए मिट जाती। आज इसकी टाइलें, इसका रंग, इसकी शान फिर से लौट आई है।

अंत में: अगली बार जब गुज़रें तो एक नज़र ज़रूर डालें
अगली बार जब आप मथुरा रोड से गुज़रें और आपकी गाड़ी सब्ज़ बुर्ज के गोल चक्कर पर धीमी हो, तो एक पल के लिए खिड़की से बाहर देखिए। यह नीला गुम्बद 500 साल से यहीं खड़ा है। इसने बाबर को देखा, हुमायूँ की ताजपोशी देखी, शेरशाह सूरी का आना-जाना देखा। इसने अंग्रेज़ों के तोपखाने देखे, बंटवारे का दर्द देखा, और आज़ाद भारत की भागदौड़ देख रहा है।

यह दिल्ली का साइलेंट विटनेस है। एक ऐसा चश्मदीद जिसकी खामोशी में पूरी सल्तनतों का शोर छिपा है। इसे देखने के लिए टिकट नहीं लगता। बस एक पल का ठहराव चाहिए और 500 साल की कहानी आपके सामने होगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 27 Jun 2027
June 26, 2026

मुज़फ़्फ़रनगर में इंसानियत शर्मसार — 'भाले से मारते, कुत्ते से कटवाते', बंधुआ मज़दूरी की दरिंदगी के 13 गवाह

मुज़फ़्फ़रनगर में इंसानियत शर्मसार — 'भाले से मारते, कुत्ते से कटवाते', बंधुआ मज़दूरी की दरिंदगी के 13 गवाह -Friday World 27 Jun 2027
फोटोग्राफ R Redmark के सौजन्य से
उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर से आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह सिर्फ़ बंधुआ मज़दूरी का केस नहीं है। यह गुलामी की उस बर्बर सच्चाई का चेहरा है जिसे हम 21वीं सदी में खत्म मान चुके थे।

13 मज़दूर किसी तरह जान बचाकर बाहर आए हैं। 3 की हत्या करके गाड़ दिया गया। जो बचकर आए हैं, उनकी आपबीती सुनकर रूह काँप जाती है।

क्या हुआ मुज़फ़्फ़रनगर में?

मामला मुज़फ़्फ़रनगर के एक ईंट भट्ठे और फार्म हाउस से जुड़ा है। आरोप है कि ठेकेदार अंकित बालियान और उसके गुर्गों ने 16 मज़दूरों को बंधक बनाकर रखा। इनमें महिलाएँ भी शामिल थीं।

मज़दूरों ने बताया:

1. मज़दूरी के नाम पर ज़हर: दिन भर 14-16 घंटे काम कराया जाता। मज़दूरी मांगने पर सूखी रोटी और मवेशियों का चारा खाने को दिया जाता।

2. कोड़े, भाले और कुत्ते: काम में ज़रा सी ढील पर कोड़ों से पीटा जाता। धारदार हथियार, भाले से हमला किया जाता। सबसे खौफनाक — विरोध करने वालों को पालतू कुत्तों से कटवाया जाता।

3. हत्या और दफ़न: जिन 3 मज़दूरों ने भागने की कोशिश की या ज्यादा विरोध किया, उन्हें मारकर वहीं खेत में गाड़ दिया गया। बाकी 13 मज़दूर किसी तरह मौका पाकर भाग निकले और पुलिस तक पहुँचे।

यह सिर्फ़ अपराध नहीं, सिस्टम की नाकामी है

बंधुआ मज़दूरी उन्मूलन अधिनियम 1976 के तहत यह गैर-कानूनी है। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि बंधुआ मज़दूरी संविधान के अनुच्छेद 21 यानी 'गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार' का सीधा उल्लंघन है।

सवाल ये है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी, 'बुलडोजर न्याय' के दौर में भी, एक जिले में 16 लोग महीनों तक बंधक बने रहे और स्थानीय प्रशासन को भनक तक नहीं लगी? यह लापरवाही नहीं, व्यवस्था की आपराधिक विफलता है।

जब गरीब की चीख थाने तक नहीं पहुँचती, जब श्रम विभाग की आँखें ईंट भट्ठों पर बंद रहती हैं, तभी अंकित बालियान जैसे लोग 'मालिक' बनकर इंसानों को जानवर समझने की हिम्मत करते हैं।

अब क्या होना चाहिए? 4 कदम जो ज़रूरी हैं

1. सबसे सख्त सज़ा: आरोपियों पर बंधुआ मज़दूरी कानून, SC-ST एक्ट, हत्या, हत्या का प्रयास, गैंगस्टर एक्ट के तहत केस चलें। फास्ट ट्रैक कोर्ट में 6 महीने में सज़ा हो। ऐसी मिसाल बने कि कोई दोबारा गरीब को गुलाम समझने से पहले सौ बार सोचे।

2. प्रशासन की जवाबदेही: उस इलाके के श्रम अधिकारी, थानाध्यक्ष और राजस्व कर्मचारियों की भूमिका की जांच हो। ड्यूटी में लापरवाही साबित होने पर निलंबन नहीं, बर्खास्तगी हो।

3. पीड़ितों का पुनर्वास: बचे हुए 13 मज़दूरों को तत्काल 3 लाख रुपये की पुनर्वास राशि, घर, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड और बच्चों की मुफ्त शिक्षा दी जाए। केंद्र की 'बंधुआ मज़दूर पुनर्वास योजना' के तहत यह उनका हक है।

4. व्यापक अभियान: पूरे पश्चिमी यूपी के ईंट भट्ठों, खेतों और फैक्ट्रियों में श्रम विभाग और NGOs का संयुक्त सर्वे चले। 2026 में भी अगर कहीं बंधुआ मज़दूर मिले तो यह पूरे समाज के मुँह पर तमाचा है।

बुलडोजर का इंसाफ़ कब?

मुज़फ़्फ़रनगर की इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक ही सवाल गूंज रहा है — 'हम देखते हैं योगी जी बुलडोजर कब चलवाते हैं, अपराधी अंकित बालियान के घर पर?'

सवाल वाजिब है। जब सरकार माफिया की अवैध संपत्ति पर बुलडोजर चलवा सकती है, तो उन दरिंदों के घर पर क्यों नहीं जो इंसानों को कुत्तों से कटवाते हैं? कानून सबके लिए बराबर है। अगर अवैध निर्माण है तो कार्रवाई हो। लेकिन न्याय का पहला तकाज़ा है — पीड़ितों को इंसाफ़, दोषियों को सज़ा।

बुलडोजर प्रतीक है। असली न्याय तब होगा जब अंकित बालियान और उसके साथी जेल की सलाखों के पीछे उम्र कैद काटें।

यह हमला मज़दूर पर नहीं, संविधान पर है

बाबासाहेब अंबेडकर ने संविधान में बेगारी और बंधुआ मज़दूरी को खत्म करने के लिए अनुच्छेद 23 लिखा था। मुज़फ़्फ़रनगर की घटना उस अनुच्छेद पर सीधा हमला है। यह हमला दलित, पिछड़े, आदिवासी और गरीब मज़दूर की गरिमा पर है।

आज 13 मज़दूर बच गए हैं। वे गवाह हैं। उनकी टूटी पसलियाँ, शरीर पर कुत्तों के काटने के निशान और आँखों का खौफ — ये सबूत है कि 'गुलामी' अभी मरी नहीं है। वो रूप बदलकर हमारे बीच ज़िंदा है।

अगर आज हम चुप रहे, तो कल किसी और जिले से ऐसी ही खबर आएगी। फर्क सिर्फ़ नाम का होगा, दरिंदगी वही रहेगी।

इसलिए आवाज़ उठाइए। प्रशासन से सवाल पूछिए। दोषियों के लिए फांसी से कम की मांग मत कीजिए। क्योंकि जब तक एक भी मज़दूर बंधुआ है, तब तक देश की आज़ादी अधूरी है।

मानव तस्करी, बंधुआ मज़दूरी या बाल श्रम दिखे तो तुरंत 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन या 112 पर कॉल करें। आपकी एक कॉल किसी की ज़िंदगी बचा सकती है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 27 Jun 2027