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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 25 October 2026

October 25, 2026

तुर्किये का सऊदी को झटका - अंसारुल्लाह के खिलाफ जंग में नहीं देंगे साथ, मक्का रक्षा समझौते पर भी सवाल!

तुर्किये का सऊदी को झटका - अंसारुल्लाह के खिलाफ जंग में नहीं देंगे साथ, मक्का रक्षा समझौते पर भी सवाल!
-Friday World Oct 26,2026 
मध्य पूर्व की सियासत में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। तुर्किये ने साफ कर दिया है कि वह यमन के अंसारुल्लाह आंदोलन के खिलाफ सऊदी अरब की कोई सैन्य मदद नहीं करेगा।

#तुर्किये का कहना है कि ये युद्ध अंसारुल्लाह ने नहीं, बल्कि सऊदी अरब ने 2015 में यमन पर शुरू किया था। यमन पर 9 साल से बमबारी और नाकेबंदी सऊदी गठबंधन ने की है, इसलिए अब उसे अंसारुल्लाह को जिम्मेदार ठहराना गलत है।

#अगस्त में हुआ था मक्का रक्षा समझौता

आपको याद होगा, इसी साल अगस्त में सऊदी अरब ने तुर्किये, पाकिस्तान समेत कई देशों के साथ "मक्का संरक्षण समझौते" पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते का मकसद था कि अगर मक्का-मदीना को कोई खतरा हो तो सभी देश मिलकर उसकी रक्षा करेंगे।

लेकिन अब जब सऊदी इस समझौते की आड़ में अंसारुल्लाह के खिलाफ समर्थन मांग रहा है, तो तुर्किये ने इससे दूरी बना ली है। अंकारा का स्टैंड है कि मक्का-मदीना पूरी तरह सुरक्षित हैं और अंसारुल्लाह ने कभी भी हरमैन शरीफैन को निशाना नहीं बनाया। इसलिए इस समझौते को यमन युद्ध के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

#पाकिस्तान और अमेरिका ने भी बनाई दूरी

सिर्फ तुर्किये ही नहीं, पाकिस्तान और अमेरिका ने भी इस मामले में सऊदी से दूरी बना ली है। पाकिस्तान की संसद पहले ही 2015 में यमन युद्ध में शामिल होने से इनकार कर चुकी है। पाकिस्तान का कहना है कि वह मध्यस्थता कर सकता है, लेकिन किसी मुस्लिम देश के खिलाफ जंग में हिस्सा नहीं लेगा।

वहीं #अमेरिका भी अब सीधे तौर पर इस युद्ध से खुद को अलग रखना चाहता है, क्योंकि उसे पता है कि यमन में सऊदी गठबंधन को कोई बड़ी जीत नहीं मिली है और अंसारुल्लाह आज पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरा है।

असली सवाल क्या है?

#असली सवाल ये है कि जब सऊदी अरब खुद यमन पर हजारों हवाई हमले कर चुका है, तो क्या उसे दूसरों से मदद मांगने का हक है? तुर्किये के इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि मुस्लिम दुनिया अब आंख बंद करके किसी एक देश की जंग में शामिल नहीं होगी। मक्का की सुरक्षा के नाम पर यमन पर युद्ध को जायज ठहराना अब मुश्किल होता जा रहा है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 26,2026 

#TurkeySaudi #Ansarullah #YemenWar #MeccaDefensePact #SaudiArabia #Turkey #Pakistan #MiddleEast #YemenConflict #NoWar
#Fridayworld 
October 25, 2026

સૌરાષ્ટ્રમાં દુષ્કાળનો કાળો પડછાયો: ખેડૂતોએ ભીની આંખે 6000 બળદોને આશ્રમે મૂક્યા, રાજકોટમાં કરુણ દ્રશ્યો!

સૌરાષ્ટ્રમાં દુષ્કાળનો કાળો પડછાયો: ખેડૂતોએ ભીની આંખે 6000 બળદોને આશ્રમે મૂક્યા, રાજકોટમાં કરુણ દ્રશ્યો!
-Friday World Oct 26,2026 
સૌરાષ્ટ્રમાં સરકારી ચોપડે ભલે હજુ દુષ્કાળ જાહેર ન થયો હોય, પણ ધરતી પર દુષ્કાળના દારુણ અને હૃદય કંપાવી દે તેવા દ્રશ્યો દેખાવા લાગ્યા છે. રાજકોટના કાલાવડ રોડ પર દેવગામ પાસે આવેલા સદ્ભાવના બળદ આશ્રમમાં છેલ્લા 20 દિવસમાં ખેડૂતો ભારે હૈયે અને આંખોમાં આંસુ સાથે પોતાના દીકરા સમાન 6000 જેટલા બળદોને મૂકી ગયા છે.

જામનગર, દ્વારકા, પોરબંદર અને કચ્છ જેવા જિલ્લાઓમાં ચોમાસું નિષ્ફળ જતા ખેતી સંપૂર્ણપણે નિષ્ફળ ગઈ છે. રવિ સીઝનની કોઈ આશા નથી, અને ઘાસચારા તથા પાણીનું અતિ ગંભીર સંકટ સર્જાયું છે.

20 દિવસમાં 6000 બળદો, 200 વાહનોની લાઈન

સદ્ભાવના બળદ આશ્રમની શરૂઆત 5 વર્ષ પહેલા માત્ર 100 બળદોથી કરવામાં આવી હતી, જેથી કોઈ નિરાધાર બળદ રસ્તા પર રખડે નહીં કે કતલખાને ન જાય. સામાન્ય રીતે અહીં 1500 થી 2000 બળદો જ રહેતા હતા.

પરંતુ આ વખતે પરિસ્થિતિ વિકટ છે. છેલ્લા 20 દિવસમાં જ 6000 બળદો આવી ગયા છે. રોજ સવારથી જ આશ્રમ બહાર બળદ ભરેલા 200 વાહનોની લાંબી લાઈનો લાગે છે. એક ખેડૂત પોતાની 1 લાખ રૂપિયાની કિંમતની બળદની જોડીને છેલ્લી વાર વહાલ કરતી વખતે ધ્રુસકે ધ્રુસકે રડી પડ્યો હતો, આવા દ્રશ્યો રોજના થઈ ગયા છે.

દિવસનો 12 લાખનો ખર્ચ, ઘાસના ભાવ ડબલ

એક બળદને રોજના 25 કિલો લીલા ઘાસની જરૂર પડે છે. જે લીલા ઘાસનો ભાવ પહેલા મણ (20 કિલો) નો રૂ. 60 હતો, તે હવે વધીને રૂ. 120-130 થઈ ગયો છે.

આશ્રમમાં 125 કર્મચારીઓ દિવસ-રાત સેવા આપી રહ્યા છે અને માત્ર ઘાસચારા પાછળ રોજનો ખર્ચ આશરે રૂ. 12,00,000 સુધી પહોંચી ગયો છે. આ ઉપરાંત પાણી માટે પણ સંકટ છે, 8000 બળદો માટે ભૂગર્ભ જળ પૂરતું ન હોવાથી રોજ 8 થી 10 ટેન્કરોથી અવેડા ભરવા પડી રહ્યા છે.

આશ્રમના સંચાલકો રોકડ દાનને બદલે સીધો ઘાસચારો આપવાની અપીલ કરી રહ્યા છે.

120 વીઘામાં નવો આશ્રમ, 1 લાખ બળદો આવશે?

સદ્ભાવના બળદ આશ્રમના વિજયભાઈ ડોબરીયાએ જણાવ્યું કે હાલની 30 એકર જમીન સંપૂર્ણ ભરાઈ ગઈ છે, તેથી નવા બળદો લેવાનું થોડા દિવસ માટે બંધ રાખ્યું છે. પરંતુ ટૂંક સમયમાં જ બીજી 120 વીઘા જમીનમાં નવો આશ્રમ શરૂ કરવામાં આવશે.

તેમના અંદાજ મુજબ જો વરસાદ નહીં થાય તો ઉનાળા સુધીમાં 75,000 થી 1,00,000 બળદો આશ્રમમાં આવી શકે છે. તેમણે સંકલ્પ લીધો છે કે એક પણ બળદને રસ્તા પર રખડવા કે કતલખાને જવા દેવામાં નહીં આવે.

બળદ એટલે સૌરાષ્ટ્રની ખેતીનો આત્મા

સૌરાષ્ટ્રમાં આજે પણ હજારો ખેડૂતો બળદથી જ ખેતી કરે છે. આ ખેતી 100% ઈકો-ફ્રેન્ડલી છે, તેમાં ડીઝલ નથી બળતું. બળદના છાણથી બનતું ઓર્ગેનિક ખાતર રાસાયણિક ખાતર અને દવાનો ખર્ચ બચાવે છે. જો બળદ નહીં રહે તો ઓર્ગેનિક ખેતીનો પાયો જ હલી જશે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 26,2026 

#SaurashtraDrought #RajkotBaldAshram #GujaratDrought #SaveBulls #FarmersCrisis #SadbhavanaAshram #FodderCrisis #EcoFriendlyFarming #GirBulls #SupportFarmers
#Fridayworld 
October 25, 2026

इज़राइली जेट्स को लेकर ईरान का इराक को अल्टीमेटम - "एयरस्पेस का इस्तेमाल हुआ तो तेहरान देगा कड़ा जवाब!"

इज़राइली जेट्स को लेकर ईरान का इराक को अल्टीमेटम - "एयरस्पेस का इस्तेमाल हुआ तो तेहरान देगा कड़ा जवाब!"
- Friday World Oct 26,2026 
मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। ईरान ने इराक को लेकर एक सख्त और सीधा संदेश दिया है। तेहरान का कहना है कि अगर इज़राइली लड़ाकू विमान ईरान को धमकाने या हमला करने के लिए इराक के हवाई क्षेत्र (Airspace) का इस्तेमाल करते हैं, तो ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानेगा और इसका गंभीर और कड़ा जवाब देगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने यह चेतावनी बगदाद सरकार को राजनयिक चैनलों के जरिए दी है। तेहरान का तर्क है कि इराक को अपने एयरस्पेस की सुरक्षा खुद सुनिश्चित करनी चाहिए। अगर इराक अपने आसमान को सुरक्षित नहीं रख सकता और अमेरिका-इज़राइल गठबंधन इसका फायदा उठाता है, तो इसकी जिम्मेदारी बगदाद की भी होगी।

क्यों है इराक का एयरस्पेस इतना अहम?

भौगोलिक स्थिति को देखिए। इज़राइल से ईरान तक जाने का सबसे छोटा हवाई रास्ता जॉर्डन और इराक से होकर ही गुजरता है। पिछले साल अप्रैल और अक्टूबर में जब इज़राइल और ईरान के बीच सीधे हमले हुए थे, तब भी रिपोर्ट्स आई थीं कि इज़राइली जेट्स ने इराकी और सीरियाई एयरस्पेस का इस्तेमाल किया था। इराक के पास इतना मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम नहीं है कि वह अमेरिकी निगरानी में चल रहे अपने एयरस्पेस को पूरी तरह कंट्रोल कर सके।

इराक फंसा बीच में!

यह चेतावनी इराक के लिए बड़ी कूटनीतिक मुसीबत बन गई है। एक तरफ अमेरिका और इज़राइल का दबाव, दूसरी तरफ पड़ोसी ईरान की धमकी। बगदाद सरकार पहले ही कहती रही है कि वह अपने देश की जमीन या आसमान को किसी भी देश पर हमले के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगी, लेकिन हकीकत में इराकी एयरस्पेस पर आज भी अमेरिकी गठबंधन का काफी नियंत्रण माना जाता है।

क्या तनाव और बढ़ेगा?

विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह बयान सिर्फ इराक के लिए नहीं, बल्कि सीधे वॉशिंगटन और तेल अवीव के लिए एक संदेश है। ईरान यह साफ कर रहा है कि आने वाले किसी भी हमले को वह सिर्फ इज़राइल का हमला नहीं, बल्कि उन देशों की मिलीभगत मानेगा जिनके एयरस्पेस से वह जेट्स आएंगे। इससे पूरे क्षेत्र में एक नए टकराव का खतरा पैदा हो गया है।

अब सबकी नजरें बगदाद के जवाब पर टिकी हैं। क्या इराक अपने एयरस्पेस को पूरी तरह सील कर पाएगा? और क्या अमेरिका-इज़राइल ईरान की इस लाल रेखा का सम्मान करेंगे? मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े टकराव के मुहाने पर खड़ा है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World Oct 26,2026 

#IranIraqTension #IsraeliFighterJets #IraqiAirspace #TehranWarning #MiddleEastCrisis #IranIsraelConflict #Baghdad #AirspaceViolation #RegionalSecurity #BreakingNews
October 25, 2026

मक्का-मदीना पर हमले की फेक न्यूज का सच और जन्नतुल बक़ी का वो कड़वा इतिहास जिसे मीडिया नहीं दिखाता

मक्का-मदीना पर हमले की फेक न्यूज का सच और जन्नतुल बक़ी का वो कड़वा इतिहास जिसे मीडिया नहीं दिखाता
-Friday World Oct 25,2026 

आजकल सोशल मीडिया और कुछ चैनलों पर एक नैरेटिव तेजी से फैलाया जा रहा है कि यमन के अंसारुल्लाह (हूती) ने मक्का पर हमला किया, मदीना पर हमला किया। लेकिन हकीकत की तह में जाएंगे तो पता चलता है कि ये जंगी प्रोपेगेंडा के सिवा कुछ नहीं है, और इसी प्रोपेगेंडा की आड़ में एक 100 साल पुरानी सच्चाई को दबा दिया जाता है।

क्या वाकई #अंसारुल्लाह ने #मक्का-मदीना पर हमला किया?

पिछले 9 साल में #अंसारुल्लाह ने सऊदी अरब पर सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं, ये सच है। लेकिन उनका टारगेट कभी भी हरमैन शरीफैन नहीं रहा। उनके आधिकारिक बयानों में हमेशा कहा गया है - "मक्का और मदीना हमारे लिए भी मुकद्दस हैं, हमारा निशाना सऊदी के मिलिट्री एयरबेस, रियाद का किंग खालिद एयरपोर्ट, जेद्दा एयरपोर्ट और अरामको के तेल ठिकाने हैं।"

तो फिर #"मक्का पर हमला" की खबर कैसे आती है? हकीकत ये है कि ताइफ, जेद्दा और रियाद के पास मौजूद सऊदी फौजी अड्डों पर दागी गई मिसाइलों को जब सऊदी एयर डिफेंस मक्का प्रांत के ऊपर रोकता है, तो उसका मलबा वहीं गिरता है। उसी मलबे की तस्वीर दिखाकर सऊदी मीडिया इसे "मक्का पर हमला" बता देती है, ताकि पूरी मुस्लिम दुनिया के जज़्बात को अंसारुल्लाह के खिलाफ भड़काया जा सके। आज तक काबा शरीफ या गुम्बद-ए-ख़ज़रा पर किसी हमले का एक भी सबूत, एक भी वीडियो पूरी दुनिया में मौजूद नहीं है।
वो सच्चाई जिसे गोदी मीडिया कभी नहीं दिखाती - #जन्नतुल बक़ी का विध्वंस

अब सवाल उठता है कि अगर हरम की हिफाजत का इतना ही ख्याल है, तो सऊदी अरब की मौजूदा हुकूमत के बाप-दादाओं ने खुद क्या किया था?

#तारीख गवाह है, 8 शव्वाल 1345 हिजरी, यानी 21 अप्रैल 1926 को, #सऊदी शासक अब्दुल अजीज इब्ने सऊद की फौज ने मदीना के सबसे मुकद्दस कब्रिस्तान जन्नतुल बक़ी पर हमला किया और वहां बने तमाम मजारों को जमीन में मिला दिया।

किन हस्तियों के #मजार शहीद किए गए?
- #जनाबे फातिमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा - #पैगंबर-ए-इस्लाम की लाडली बेटी, जिनकी एक रिवायत के मुताबिक मजार बक़ी में है।
- #इमाम हसन मुजतबा अलैहिस्सलाम - पैगंबर के नवासे और जन्नत के सरदार।
- #इमाम ज़ैनुल आबेदीन, #इमाम मोहम्मद बाकिर, #इमाम जाफर सादिक अलैहिमुस्सलाम - इन चारों इमामों का एक ही बड़ा गुम्बद था, जिसे तोड़ दिया गया।
- इसके अलावा हजरत #इब्राहिम, हजरत #अब्बास और रसूल की कई #अज़वाज की मजारें भी थीं।
- मक्का के #जन्नतुल मुअल्ला में हजरत खदीजा (स.अ) और हजरत अबू तालिब (अ.स) के मजार भी उसी सोच के तहत ढहाए गए।

उनका तर्क था कि कब्रों पर इमारत बनाना शिर्क है, लेकिन पूरी दुनिया के मुसलमानों के लिए ये अहले बैत की खुली बेअदबी थी। इस दिन को आज भी "यौम-ए-इन्हेदाम-ए-बक़ी" (बक़ी के विध्वंस का दिन) के रूप में याद किया जाता है।

#असली हक क्या है?

हक ये है कि झूठी खबरें फैलाकर मुसलमानों को आपस में लड़ाना आसान है, लेकिन हकीकत छुपती नहीं है। अंसारुल्लाह का सऊदी मिलिट्री से जंग अपनी जगह है, लेकिन उसे मक्का-मदीना का दुश्मन बताना फेक न्यूज है। और इसी तरह, सऊदी हुकूमत का जन्नतुल बक़ी में अहले बैत की मजारों को तोड़ना एक ऐतिहासिक सच है, जिसे डॉलर और रियाल की चमक में दबाया नहीं जा सकता।

सच्चाई के साथ रहना ही सबसे बड़ी ताकत है। हरमैन की हिफाजत भी हक है और अहले बैत की मोहब्बत और उनके मजारों का एहतराम भी हक है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

#JannatulBaqi #BaqiDemolition #YoumEGham #FatimaZahra #ImamHassan #Ansarullah #FakeNewsExposed #MeccaMedina #HaqKiBaat #IslamicHistory
October 25, 2026

ईरान के आसमान में गरजीं मिसाइलें - IRGC ने शुरू की परीक्षणों की नई लहर, 12 दिन की जंग के बाद ताकत 1.5 गुना बढ़ी

ईरान के आसमान में गरजीं मिसाइलें - IRGC ने शुरू की परीक्षणों की नई लहर, 12 दिन की जंग के बाद ताकत 1.5 गुना बढ़ी
-Friday World Oct 25
तेहरान - खाड़ी क्षेत्र में तनाव के बीच ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने मिसाइल परीक्षणों की नई लहर शुरू कर दी है। सूत्रों के अनुसार, ईरान के आसमान में देर रात हुए इस अभ्यास की तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें कई मिसाइलें एक साथ आसमान चीरती नजर आ रही हैं।

IRGC प्रवक्ता हुसैन मुहिब के पिछले बयान के बाद यह परीक्षण काफी अहम माना जा रहा है। उन्होंने कहा था कि 12 दिन की लड़ाई से पहले की तुलना में ईरान की मिसाइलों की संख्या कम से कम 1.5 गुना बढ़ गई है और उनकी क्वालिटी, रेंज, मारक क्षमता और सटीकता में बड़ा सुधार किया गया है।

क्या है नई रणनीति?

ईरान अब अंडरग्राउंड 'मिसाइल शहरों' की रणनीति पर चल रहा है। इन शहरों में सस्ती, बड़े पैमाने पर बनने वाली मिसाइलें और ड्रोन सुरक्षित रखे गए हैं। जानकारों का कहना है कि यह अमेरिका की महंगी तकनीक के खिलाफ ईरान की असममित (Asymmetric) रणनीति है।

IRGC का दावा है कि अगर अमेरिका ने अपने 'मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' GBU-43/B का इस्तेमाल किया, तो ईरान 'फादर ऑफ ऑल बॉम्ब्स' जैसे हथियार से जवाब देगा। इसके साथ ही ईरान की फत्ताह-1 और फत्ताह-2 हाइपरसोनिक मिसाइलें भी दुनिया का ध्यान खींच रही हैं, जिनका अमेरिका के पास फिलहाल कोई तोड़ नहीं है।

होर्मुज पर नजर

इस मिसाइल अभ्यास का सीधा संबंध होर्मुज स्ट्रेट से भी जोड़ा जा रहा है। मुहिब ने कहा था कि होर्मुज अमेरिकी युद्धपोतों के लिए "100% बंद" है और उल्लंघन करने वाले जहाजों पर बिछी माइनों का खतरा है। 2026 की लड़ाई में ईरान ने कैरियर ग्रुप्स को रोकने के लिए इसी तरह के हथकंडे अपनाए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह नया मिसाइल परीक्षण सिर्फ ताकत दिखाना नहीं, बल्कि अमेरिका को यह संदेश देना है कि ईरान अब पहले से ज्यादा तैयार है और उसकी मिसाइलें न सिर्फ ज्यादा हैं, बल्कि ज्यादा घातक भी हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25

#IRGC #IranMissileTest #MissileDrill #IranMilitary #HormuzStrait #MiddleEastTension #FattahMissile #IranUSConflict #MissileCity #IranDefense
October 25, 2026

सोनम वांगचुक की सरकार को चेतावनी - "शांतिपूर्ण आंदोलन दबाओगे तो नेपाल-बांग्लादेश जैसे हालात बनेंगे"

सोनम वांगचुक की सरकार को चेतावनी - "शांतिपूर्ण आंदोलन दबाओगे तो नेपाल-बांग्लादेश जैसे हालात बनेंगे"
-Friday World Oct 25,2026 
लेह-लद्दाख के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक ने मुंबई में आयोजित IPF फेस्टिवल में सत्याग्रह और नागरिक अधिकारों पर केंद्र सरकार को बड़ी चेतावनी दी है।

वांगचुक ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन सरकार के लिए फीडबैक और प्रेशर रिलीज वाल्व का काम करते हैं। यह प्रेशर कुकर की सीटी की तरह हैं, अगर सीटी को बंद कर दोगे तो कुकर फट जाएगा। उन्होंने बताया कि यूके, नॉर्वे और स्वीडन जैसे विकसित देशों में लोगों को संसद के बाहर प्रदर्शन करने की पूरी छूट है, ताकि सांसद सीधे जनता की आवाज सुन सकें। लेकिन भारत में जंतर-मंतर जैसी जगहों को संसद से बहुत दूर रखा गया है।

उन्होंने चेतावनी दी कि अगर लोगों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया, तो नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों में जो हालात बने थे, वैसा ही परिणाम भारत में भी आ सकता है।

अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल सीमा पर होना चाहिए, सड़कों पर नहीं

वांगचुक ने देश के अंदर प्रदर्शनों को रोकने के लिए अर्धसैनिक बलों के इस्तेमाल की भी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अर्धसैनिक बलों की तैनाती देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए होनी चाहिए। सर्दियों में जब इन बलों का ध्यान और तैनाती दूसरी जगहों पर लगाई जाती है, तब चीन लद्दाख सीमा के पास धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। उन्होंने गृह मंत्रालय को सुझाव दिया कि सीमा सुरक्षा पर ज्यादा ध्यान दे और अर्धसैनिक बलों को रक्षा मंत्रालय के अधीन लाने पर विचार करे।

लद्दाख के स्थानीय शासन की मांग

लद्दाख के भविष्य पर बोलते हुए वांगचुक ने कहा कि किसी भी क्षेत्र के शासन में वहां के स्थानीय लोगों की भागीदारी बेहद जरूरी है। 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख का शासन दूर बैठे प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जा रहा है। बाहर से आने वाले प्रशासक चाहे कितने भी अच्छे इरादे वाले हों, वे लद्दाख की विशेष परिस्थिति और पर्यावरण को ठीक से नहीं समझ सकते।

उन्होंने मांग की कि नागरिकों को प्रदर्शन करने के लिए परमिशन लेने की जरूरत नहीं होनी चाहिए और प्रदर्शनकारियों की आवाज को दबाने के बजाय उनके संदेश को सुनना चाहिए।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

#SonamWangchuk #LadakhProtest #IPFFestivalMumbai #PeacefulProtest #DemocracyInIndia #JantarMantar #ParliamentProtest #LadakhAutonomy #CivilRightsIndia #Satyagraha
October 25, 2026

સોનમ વાંગચુકની મોટી ચેતવણી - 'શાંતિપૂર્ણ દેખાવો દબાવશો તો ભારતમાં પણ નેપાળ-બાંગ્લાદેશ જેવી સ્થિતિ સર્જાશે'

સોનમ વાંગચુકની મોટી ચેતવણી - 'શાંતિપૂર્ણ દેખાવો દબાવશો તો ભારતમાં પણ નેપાળ-બાંગ્લાદેશ જેવી સ્થિતિ સર્જાશે'
-Friday World Oct 25,2026 
લેહ-લદાખના જાણીતા શિક્ષણવિદ અને સામાજિક કાર્યકર્તા સોનમ વાંગચુકે મુંબઈમાં આયોજિત IPF ફેસ્ટિવલમાં કેન્દ્ર સરકારને સત્યાગ્રહ અને લોકશાહીના ભવિષ્યને લઈને કડક ચેતવણી આપી છે.

વાંગચુકે કહ્યું કે શાંતિપૂર્ણ પ્રદર્શન એ લોકશાહીમાં સરકાર માટે ફીડબેક સિસ્ટમ છે. તે પ્રેશર કૂકરની સીટી જેવું છે, જે દબાણને હળવું કરે છે. જો તમે સીટી જ બંધ કરી દેશો તો કૂકર ફાટશે. તેમણે ઉદાહરણ આપતા કહ્યું કે યુકે, નોર્વે અને સ્વીડન જેવા વિકસિત દેશોમાં નાગરિકોને સંસદની બહાર જ પ્રદર્શન કરવાની છૂટ છે, જેથી સાંસદો સીધો લોકોનો અવાજ સાંભળી શકે. પરંતુ ભારતમાં જંતર-મંતર જેવા સ્થળોને સંસદથી કિલોમીટરો દૂર ધકેલી દેવાયા છે.

જો લોકોને શાંતિપૂર્ણ રીતે પોતાની વાત રજૂ કરવાની તક નહીં મળે, તો જે સ્થિતિ નેપાળ, શ્રીલંકા અને બાંગ્લાદેશમાં સર્જાઈ હતી, તેવી જ સ્થિતિ અહીં પણ આવી શકે છે.

અર્ધસૈનિક દળો સરહદ પર હોવા જોઈએ, સડકો પર નહીં

વાંગચુકે આંતરિક વિરોધ પ્રદર્શનોને રોકવા માટે અર્ધસૈનિક દળોના ઉપયોગ પર પણ સવાલ ઉઠાવ્યા. તેમણે કહ્યું કે આ દળોની સાચી જગ્યા દેશની સરહદ પર છે, શહેરના ચોકમાં નહીં. જ્યારે શિયાળામાં આ દળોને લદાખથી હટાવીને અંદરના પ્રદર્શનો રોકવા લગાવવામાં આવે છે, ત્યારે ચીન લદાખ સરહદ પાસે ધીમે-ધીમે આગળ વધે છે. તેમણે ગૃહ મંત્રાલયને સૂચન કર્યું કે સરહદ સુરક્ષા પર વધુ ધ્યાન આપે અને અર્ધસૈનિક દળોને સંરક્ષણ મંત્રાલય હેઠળ લાવવા પર વિચાર કરે.

લદાખ માટે સ્થાનિક શાસનની માંગ

લદાખના મુદ્દે વાંગચુકે કહ્યું કે 2019માં જમ્મુ-કાશ્મીરના પુનર્ગઠન પછી લદાખનું શાસન દૂર બેઠેલા અધિકારીઓ ચલાવે છે. બહારથી આવતા પ્રશાસકો ભલે સારા ઇરાદા ધરાવતા હોય, પણ તેઓ લદાખની નાજુક પર્યાવરણ અને વિશિષ્ટ સંસ્કૃતિને સમજી શકતા નથી. કોઈ પણ પ્રદેશનું સંચાલન ત્યાંના સ્થાનિક લોકોની ભાગીદારી વગર શક્ય નથી.

તેમણે સ્પષ્ટ માંગ કરી કે નાગરિકોને પ્રદર્શન માટે પરવાનગી લેવાની જરૂર ન હોવી જોઈએ. સરકારે પ્રદર્શનકારોનો અવાજ દબાવવાને બદલે તેમનો સંદેશ સાંભળવો જોઈએ.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World Oct 25,2026 

#SonamWangchuk #Ladakh #IPFFestivalMumbai #PeacefulProtest #Democracy #JantarMantar #IndiaParliament #LadakhAutonomy #CivilRights #Satyagraha