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September 14, 2026
जब सच को बैग में लेकर संसद पहुंचीं प्रियंका, तब हंसी उड़ाई गई - आज BRICS के मंच से भारत ने वही सच दोहराया
जब सच को बैग में लेकर संसद पहुंचीं प्रियंका, तब हंसी उड़ाई गई - आज BRICS के मंच से भारत ने वही सच दोहराया
- Friday World September 14,2026
जब गाजा की गलियों में बम बरस रहे थे, जब अस्पताल, स्कूल और रिफ्यूजी कैंप कब्रगाह बन रहे थे, जब भूख को हथियार बनाया जा रहा था, तब दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र की संसद में खामोशी थी। उस खामोशी को एक महिला ने तोड़ा।
वो थीं प्रियंका गांधी वाड्रा।
उन्होंने ट्वीट किया, बार-बार ट्वीट किया। उन्होंने गाजा में चल रहे नरसंहार को नरसंहार कहा। जब सत्ता पक्ष इसे 'जटिल भू-राजनीतिक मुद्दा' कहकर टाल रहा था, तब प्रियंका ने इसे मानवीय त्रासदी कहा। और फिर एक दिन वो संसद में एक बैग लेकर आईं, जिस पर लिखा था - 'Palestine'।
उस बैग का मजाक उड़ाया गया। ट्रोल आर्मी सक्रिय हुई। कहा गया कि ये तुष्टिकरण है, ये दिखावा है, ये विदेश नीति में दखल है। कुछ चैनलों ने इसे फैशन स्टेटमेंट तक बता दिया।
लेकिन प्रियंका अकेली नहीं थीं। कुछ दिनों बाद कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने एक लेख लिखा। बेहद संतुलित, बेहद स्पष्ट लेख। उन्होंने लिखा कि भारत फिलिस्तीन के सवाल पर कभी तटस्थ नहीं रहा, भारत का स्टैंड हमेशा न्याय के पक्ष में रहा है। उन्होंने सरकार से अपील की कि भारत को इस अमानवीयता के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए।
तब भी वही हुआ। सोनिया गांधी की आलोचना हुई। उन्हें घेरा गया। कहा गया कि कांग्रेस पुरानी सोच में जी रही है।
और आज? 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में BRICS का 18वां शिखर सम्मेलन हुआ। भारत की मेजबानी में हुआ। और इसी सम्मेलन में जो 'नई दिल्ली घोषणापत्र' जारी हुआ, उसने उन सभी आलोचनाओं को आईना दिखा दिया।
BRICS घोषणापत्र ने क्या कहा?
घोषणापत्र में साफ-साफ कहा गया है:
- गाजा में मानवीय स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है।
- भूख को युद्ध के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने, आम नागरिकों और अस्पतालों पर हमले और मानवीय सहायता में अवरोध को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया गया है।
- गाजा से फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन, चाहे वो अस्थायी हो या स्थायी, किसी भी बहाने से हो, उसका दृढ़ विरोध किया गया है।
- कहा गया है कि ऐसी कोई भी व्यवस्था स्वीकार्य नहीं जो फिलिस्तीनियों के अधिकारों को कमजोर करे या कब्जे को वैध ठहराए।
- 1967 की सीमाओं के आधार पर दो-राज्य समाधान, पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर स्वतंत्र, संप्रभु फिलिस्तीन राज्य और फिलिस्तीन को संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता का समर्थन दोहराया गया है।
ये शब्द किसी विपक्षी नेता के नहीं हैं। ये BRICS का घोषणापत्र है, जिस पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हस्ताक्षर हैं। जिस सम्मेलन की अध्यक्षता भारत ने की है।
तो सवाल उठता है - कौन सही था?
जो बात प्रियंका गांधी ने एक बैग पर लिखकर कही थी, वही बात आज भारत ने एक अंतरराष्ट्रीय मंच से कही है। जो बात सोनिया गांधी ने लेख में लिखी थी, वही बात आज भारत की विदेश नीति की आधिकारिक भाषा बन गई है।
फिर उस समय उनकी आलोचना क्यों हुई थी? क्योंकि बोलने वाली कांग्रेस की थीं?
मोदी की विदेश नीति और 75 साल पुराना रास्ता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी विदेश नीति का खूब प्रचार करते हैं। डंका बजता है, ढोल बजता है। कभी अमेरिका में, कभी इजरायल में। 2017 में वो इजरायल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, फिलिस्तीन गए बिना। एक नई हाइफन-डी-हाइफनेटेड विदेश नीति की बात कही गई। कहा गया कि भारत अब पुरानी लीक पर नहीं चलेगा।
लेकिन कूटनीति नारों से नहीं, इतिहास से चलती है।
भारत का फिलिस्तीन को लेकर स्टैंड कोई कांग्रेस का बनाया हुआ स्टैंड नहीं है। ये अटल बिहारी वाजपेयी का भी स्टैंड था। वाजपेयी जी ने 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के तौर पर पहली बार कहा था कि फिलिस्तीन की जमीन वापस होनी चाहिए, तब पूरी दुनिया ने भारत की सराहना की थी।
ये महात्मा गांधी का रास्ता है, जिन्होंने 1938 में ही कहा था कि फिलिस्तीन वैसे ही अरबों का है जैसे इंग्लैंड अंग्रेजों का। ये पंडित नेहरू का रास्ता है, जिन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन को इसी न्याय की बुनियाद पर खड़ा किया था।
75 साल से भारत का रास्ता यही है - हम आतंकवाद के खिलाफ हैं, लेकिन हम किसी भी निर्दोष आबादी पर बमबारी के भी खिलाफ हैं। हम इजरायल के अस्तित्व के अधिकार को मानते हैं, लेकिन हम फिलिस्तीन के आत्मनिर्णय के अधिकार को भी मानते हैं।
BRICS घोषणापत्र में आखिर वही रास्ता दोहराया गया है। लाख कोशिश कर लें नई राह बनाने की, लेकिन जब दुनिया में न्याय की बात आती है, तो भारत को अपने पुराने, सोचे-समझे, परखे हुए रास्ते पर ही लौटना पड़ता है।
ये कांग्रेस की जीत नहीं है। ये भारत की आत्मा की जीत है। ये उस नैतिक साहस की जीत है जो प्रियंका गांधी ने तब दिखाया था जब चुप रहना आसान था।
इतिहास गवाह है, जो आज ट्रोल होता है, कल वही घोषणापत्र बन जाता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World September 14,2026
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