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Sunday, 31 May 2026

May 31, 2026

उत्तर प्रदेश की बिगड़ती नौकरी व्यवस्था: प्रयागराज में छात्रों का आक्रोश फूट पड़ा, कैंडल मार्च ने उठाई पारदर्शिता की मांग

उत्तर प्रदेश की बिगड़ती नौकरी व्यवस्था: प्रयागराज में छात्रों का आक्रोश फूट पड़ा, कैंडल मार्च ने उठाई पारदर्शिता की मांग - Friday World 31 May2026

प्रयागराज, जो कभी ज्ञान और आस्था का प्रतीक रहा, आज युवाओं के आक्रोश का केंद्र बन गया है। गुरुवार को सैकड़ों प्रतियोगी छात्रों ने भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ सड़कों पर उतरकर अपना गुस्सा जताया। “प्रतियोगी छात्र संघर्ष मंच” के बैनर तले निकाला गया कैंडल मार्च न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में युवा वर्ग की पीड़ा को प्रतिबिंबित करता है। लाखों युवाओं का भविष्य दांव पर लगे होने के बावजूद परीक्षा प्रक्रिया में बार-बार उभरती गड़बड़ियां उनके विश्वास को हिला रही हैं।

 घटना का विस्तृत वर्णन

कटरा स्थित मनमोहन पार्क से कैंडल मार्च की शुरुआत होने वाली थी। छात्रों की योजना सुभाष चौराहा होते हुए आजाद पार्क तक मार्च निकालने की थी। हाथों में मोमबत्तियां, प्लेकार्ड और नारे लगाते हुए युवा सड़क पर उतरे। प्लेकार्ड पर लिखा था- “न्याय दो, परीक्षा दोहराओ”, “लेखपाल भर्ती में गड़बड़ी स्वीकारो”, “युवाओं का भविष्य बर्बाद मत करो”। 

पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे। भारी बल की तैनाती के बावजूद छात्र शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ रहे थे। लेकिन हिंदू छात्रावास के पास पहुंचते ही पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके बाद छात्रों ने आजाद पार्क पहुंचकर सभा का आयोजन किया। वहां उन्होंने अपनी मांगों को जोरदार तरीके से रखा।

छात्र नेता आशुतोष पांडेय ने सभा को संबोधित करते हुए कहा, “लेखपाल भर्ती, यूपी सब इंस्पेक्टर भर्ती और एसएससी कांस्टेबल जीडी भर्ती जैसी महत्वपूर्ण परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियां सामने आई हैं। इससे लाखों अभ्यर्थियों का विश्वास टूट गया है। हम सरकार से मांग करते हैं कि इन परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जरूरत पड़ने पर इन्हें दोबारा आयोजित किया जाए। यूपीएसआई भर्ती का स्कोर कार्ड भी तुरंत जारी किया जाए।”

 समस्या की गहराई: बेरोजगारी और भर्ती घोटाले

उत्तर प्रदेश में युवा बेरोजगारी एक पुरानी समस्या है, लेकिन हाल के वर्षों में भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं ने इसे और विकराल बना दिया है। आंकड़ों के अनुसार, राज्य में करोड़ों युवा सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन सीमित पदों और पारदर्शिता की कमी के कारण निराशा बढ़ रही है। 

लेखपाल भर्ती को लेकर पहले भी विवाद हुआ है। पेपर लीक, अनुचित साधनों से सफलता पाने वाले अभ्यर्थियों और प्रश्नों की त्रुटियों की शिकायतें लगातार आ रही हैं। यूपीएसआई और एसएससी जीडी जैसी परीक्षाएं लाखों युवाओं के सपनों का आधार होती हैं। इनमें एक भी गड़बड़ी पूरे बैच के भविष्य को प्रभावित कर देती है। छात्रों का कहना है कि वर्षों की मेहनत, रात-रात भर की पढ़ाई, कोचिंग संस्थानों पर खर्च किए गए लाखों रुपये सब बर्बाद हो जाते हैं जब परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।

यह सिर्फ प्रयागराज की समस्या नहीं है। पूरे उत्तर प्रदेश में रोहतास, प्रयागराज, लखनऊ समेत कई जगहों पर ऐसे प्रदर्शन हो चुके हैं। इससे पहले भी पेपर लीक के मामलों में छात्र सड़कों पर उतरे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि भर्ती एजेंसियों में सुधार, डिजिटल निगरानी बढ़ाने और तीसरे पक्ष की निगरानी की जरूरत है ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।

छात्रों की प्रमुख मांगें

1. **लेखपाल और यूपीएसआई भर्ती की दोबारा परीक्षा** - जहां गड़बड़ी साबित हो।
2. **पारदर्शी जांच प्रक्रिया** - स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच।
3. **स्कोर कार्ड का तुरंत जारी होना** - ताकि अभ्यर्थी अपनी स्थिति जान सकें।
4. **अन्य भर्तियों में सख्ती** - एसएससी जीडी सहित सभी आगामी परीक्षाओं में सख्त सुरक्षा।
5. **बेरोजगारी कम करने के ठोस कदम** - सिर्फ वादे नहीं, रोजगार के नए अवसर।

छात्रों ने यह भी कहा कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियां अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रही हैं। एक छोटी सी लापरवाही हजारों युवाओं के सपनों को चूर-चूर कर देती है।

 सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में युवा आबादी सबसे अधिक है। यदि इन युवाओं को सही अवसर नहीं मिले तो न केवल व्यक्तिगत स्तर पर हताशा बढ़ेगी, बल्कि सामाजिक अस्थिरता भी पैदा हो सकती है। बेरोजगार युवा अक्सर गलत राह पर चले जाते हैं या मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का शिकार होते हैं। 

सरकार के लिए यह चुनौती है। एक ओर विकास के दावे किए जा रहे हैं, दूसरी ओर युवा सड़कों पर हैं। पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया न केवल छात्रों का विश्वास बहाल करेगी बल्कि प्रशासनिक दक्षता भी बढ़ाएगी। डिजिटल भारत के युग में बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, सीसीटीवी निगरानी, एआई आधारित प्रश्न पत्र निर्माण और रैंडमाइज्ड परीक्षा केंद्र जैसी तकनीकों को अपनाने की जरूरत है।

 ऐतिहासिक संदर्भ और समाधान

भारत में पेपर लीक की समस्या नई नहीं है। बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों में बड़े पैमाने पर घोटाले सामने आ चुके हैं। प्रयागराज का यह प्रदर्शन उसी श्रृंखला की कड़ी है। समाधान के रूप में विशेषज्ञ सुझाव देते हैं:

- भर्ती आयोगों को स्वायत्त और जवाबदेह बनाना।
- पेपर सेटिंग और मुद्रण में बहु-स्तरीय सुरक्षा।
- अभ्यर्थियों के लिए शिकायत निवारण तंत्र का मजबूत होना।
- कोचिंग संस्थानों पर भी नियंत्रण ताकि अनुचित साधन न अपनाए जाएं।

छात्र संघर्ष मंच के कार्यकर्ता भविष्य में बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दे रहे हैं यदि मांगें नहीं मानी गईं।

: युवाओं का भरोसा बहाल करना जरूरी

प्रयागराज का यह कैंडल मार्च अंधेरे में जलती उम्मीद की किरण भी है। युवा चुपचाप सहने को तैयार नहीं हैं। वे न्याय चाहते हैं, पारदर्शिता चाहते हैं और अपना हक चाहते हैं। 

सरकार को इस आक्रोश को गंभीरता से लेना चाहिए। त्वरित जांच, दोषियों पर कार्रवाई और परीक्षाओं में सुधार युवाओं को राहत देगा। अन्यथा बेरोजगारी और गड़बड़ियों का यह सिलसिला न केवल युवा ऊर्जा को बर्बाद करेगा बल्कि राज्य के विकास को भी पीछे धकेल देगा। 

प्रयागराज के इन छात्रों का संदेश साफ है- **“सपनों पर आघात बर्दाश्त नहीं होगा।”** अब देखना यह है कि सत्ता इस आवाज को कितनी गंभीरता से सुनती है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 31 May2026
May 31, 2026

बात व्यक्ति नही, नीति की: सभ्यता नही, सिस्टम की!

बात व्यक्ति नही, नीति की: सभ्यता नही, सिस्टम की!
-Friday World  31 May 2026
आलेख : सत्येंद्र रंजन 
एक अंग्रेजी अखबार के ऑप-एड पेज पर छपी एक टिप्पणी के इस शीर्षक ने बरबस ध्यान खींचा -- ‘आर्थिक विकास के लिए चाहिए अर्जुन, अथवा देंग की तरह एकाग्रता।’ ये कमेंट किसी अर्थशास्त्री ने नहीं, बल्कि भारत के नामी वकील ने लिखा है। स्पष्टतः यहां देंग से मतलब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व सर्वोच्च नेता देंग श्याओपिंग से है। 

जब से आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत उदय के बहु-प्रचारित कथानक का ढहना शुरू हुआ, भारत के मीडिया और आम चर्चाओं में चीन के इस तरह के उदाहरणों का उल्लेख बढ़ता चला गया है। इस वर्ष जब भारतीय अर्थव्यवस्था के डगमगाने और देश पर मंडरा रहे गंभीर आर्थिक संकट का अहसास फैला है, तो ऐसी चर्चाओं की बाढ़ आ गई है। 

अभी चार-पांच साल पहले तक भारत में चीन की विकास कथा का जिक्र करना जोखिम भरा था। ऐसा करने वाले पर चीन का एजेंट होने या चीन के नैरेटिव को फैलाने का आरोप तब सहज मढ़ दिया जाता था। तब कहानी यह थी कि भारत चीन का प्रतिस्पर्धी है! भारत अपने लोकतंत्र एवं खुले समाज के साथ तीव्र आर्थिक विकास के मार्ग पर अग्रसर है! चीन ने अगर कुछ हासिल किया भी है, तो वह लोकतंत्र के अभाव एवं नागरिक अधिकारों के दमन के साथ किया है!

आज कहानी पलट गई है। अब पश्चिमी देशों के साथ-साथ भारतीय मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में भी चीन की हैरान कर देने वाली प्रगति की चर्चा छायी हुई है। भारत में अब ये अहसास भी है कि ‘हम पिछड़ गए हैं’। बहरहाल, चीन के आगे बढ़ जाने और अपने पिछड़ जाने के जिन कारणों की अक्सर चर्चा होती है, वो एक बार फिर से भ्रामक हैं। इन पर बात करने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि इन भ्रामक चर्चाओं से भारतवासियों में आत्म-हीनता का अनावश्यक भाव पैदा होगा। जबकि सही कारणों पर बात की जाए, तो बात सही जगह -- यानी समाधान की ओर जाएगी। 

गलत निष्कर्ष यह होगा कि चीन की सभ्यता में ऐसे तत्व हैं, जिन्होंने उसकी विकास यात्रा को आसान बनाया। या फिर देंग श्याओपिंग कोई करिश्माई शख्सियत थे, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में अभिनव दृष्टि अपनाई और चीन आज जो कुछ है, वह उसका ही परिणाम है। सभ्यता वाले पहलू का सीधा जवाब यह है कि परंपरागत रूप से उन तत्वों की मौजूदगी के बावजूद 1839-42 के अफीम युद्ध में ब्रिटेन ने चीन को बुरी तरह पराजित कर उसके ‘अपमान की शताब्दी’ की शुरुआत की थी। तब सभ्यता की शक्ति उसका बचाव नहीं कर पाई थी! 

जहां तक देंग के योगदान का सवाल है, तो उसे भी संदर्भ में देखने की जरूरत है। देंग के हाथ में कमान आने के पहले 1949 की क्रांति के बाद से चीन क्या हासिल कर चुका था, उसे जानने के लिए 1981 में विश्व बैंक की आई रिपोर्ट पर गौर कर लेना भर काफी होगा। 

विश्व बैंक ने चीन के बारे में अपनी रिपोर्ट जून 1981 में -- चाइना: सोशलिस्ट इकोनॉमिक डेवलपमेंट -- नाम से प्रकाशित की थी। नौ भाग वाली इस व्यापक अध्ययन रिपोर्ट में स्वीकार किया गया कि आर्थिक रूप से चीन भले अपेक्षाकृत गरीब हो, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा जैसे सामाजिक संकेतकों पर माओ जेदुंग के काल में उसने उल्लेखनीय प्रगति की। इस दौर में :
* प्राथमिक शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ।
* साक्षरता दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
* “बेयरफुट डॉक्टर” कार्यक्रम और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं ने आम लोगों को बुनियादी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराईं।
संक्रामक रोगों पर नियंत्रण और टीकाकरण अभियान सफल रहे।
* 1949 में चीन में औसत जीवन प्रत्याशा लगभग 35 वर्ष थी, जो 1970 के दशक तक 65 वर्ष तक पहुंच गई।
* ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का अपेक्षाकृत समान वितरण हुआ।
* महिलाओं की भागीदारी और अधिकारों में भारी सुधार हुआ।

तो इस मजबूत जमीन पर देंग श्याओपिंग के कार्यकाल में ‘सुधार और दरवाजा खोलने’ की नीति अपनाई गई। चीन का कोई गंभीर अध्ययनकर्ता ये दलील नहीं दे सकता कि माओ के दौर में बनी जमीन के बिना देंग के दौर की नीतियां सफल हो सकती थीं। दरअसल, देंग पर बात करते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि उनके दौर में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी माओ युग से संबंध विच्छेद से कहीं ज्यादा उस नीतिगत निरंतरता के साथ आगे बढ़ी, जिन पर 1970 के दशक के आरंभ से विचार किया जाने लगा था। देंग ने बार-बार यह स्पष्ट किया था कि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व अटूट और अपरिहार्य है। उन्होंने कहा था कि आर्थिक सुधार और खुलापन केवल कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में ही संभव हैं। इस नीति पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में आज तक कोई भ्रम नहीं है।

भारत ने स्वतंत्रता के बाद अपना अलग रास्ता चुना था, हालांकि विकास की चुनौतियां दोनों देशों के सामने एक जैसी थीं। दोनों देशों ने अपनी विकास यात्रा लगभग साथ-साथ शुरू की -- भारत ने 1947 और चीन ने 1949 में। दोनों देशों ने पंचवर्षीय योजना का मार्ग चुना। 

हार्वर्ड येनचिंग इंस्टीट्यूट में विजिटिंग फेलॉ, साउथ एशिया रिसर्च ब्रीफ के संस्थापक और भारतीय अर्थव्यवस्था के अध्ययनकर्ता केजी माओ ने एक महत्त्वपूर्ण विवरण का उल्लेख किया है। उसके मुताबिक 1955 की सर्दियों में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आमंत्रण पर चीन के जाने-माने अर्थशास्त्री चेन हानसेंग भारत आए। उन्हें प्रधानमंत्री निवास में ठहराया गया। रोज नाश्ते और रात के भोजन के समय नेहरू उनसे लंबा वार्तालाप करते थे। चीन में अपनाई गई नीतियों की जानकारी भारतीय प्रधानमंत्री ने उनसे हासिल की। इसका जिक्र खुद नेहरू ने उन पत्रों में किया, जो हर पखवाड़े वे मुख्यमंत्रियों को लिखते थे।

केजी माओ के मुताबिक एक पड़ोसी एशियाई देश में हो रही उल्लेखनीय प्रगति को जानकर नेहरू ने प्रसन्नता का इजहार किया। साथ ही उन्होंने चीन से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की जरूरत भी महसूस की। 1954 में जब भारत अपनी दूसरी पंचवर्षीय योजना बनाने में जुटा हुआ था, नेहरू ने कहा था -- ‘हमारी समस्याएं एशिया के अविकसित देशों जैसी हैं। इसी वजह से चीन में जो हो रहा है, उसमें हमारी खास दिलचस्पी है। आज मुझमें रोमांच भरने वाले दो देश भारत और चीन हैं।’

बताया जाता है कि निजी बातचीत में पंडित नेहरू भारत को चीन से आगे रखने का संकल्प जताते थे। उन्होंने कहा था -- ‘बेशक हमारा (भारत और चीन का) राजनीतिक एवं आर्थिक ढांचा अलग-अलग है, मगर हमारे सामने मौजूद समस्याएं एक जैसी हैं। भविष्य बताएगा कि कौन-सा देश और किसकी शासन प्रणाली हर क्षेत्र में बेहतर परिणाम प्रदान करती है।’

अगर कहा जाए कि वो “भविष्य” आज आ चुका है और अपना फैसला सुना चुका है, शायद इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। लेकिन इस मायूसी में गलत निष्कर्ष निकालने, चीन का अनावश्यक महिमामंडन करने, और खुद को कोसने की जरूरत नहीं है। दरअसल, ऐसा करके निराशा से घिरने के अलावा हम कहीं नहीं पहुंचेंगे। मुद्दा वो नीतियां और पहलू हैं, जिन्होंने चीन के विकास और प्रगति को सुनिश्चित किया है। असल में, वो नीतियां सिर्फ वहीं सफल रही हों, ऐसा भी नहीं है। और यह कहते हुए इस स्तंभकार के ध्यान में सिर्फ सोवियत संघ, कम्युनिस्ट दौर में पूर्वी यूरोप, क्यूबा, उत्तर कोरिया और वियतनाम भर नहीं हैं, बल्कि इस चर्चा में उन्हें हम छोड़ भी सकते हैं। 

उनके बजाय इस क्रम में हम अमेरिका (खास कर दूसरे विश्व युद्ध के बाद से लेकर 1980 तक), जापान, दक्षिण कोरिया, और ताइवान आदि पर नजर डाल सकते हैं। दरअसल, हम 1950 से 1990 तक के भारत के अपने अनुभव पर भी गौर सकते हैं। इन सबके मामले में समान पहलू यह है कि समृद्धि के सामाजिक बंटवारे (अलग-अलग देशों में इसका परिमाण अलग रहा) के साथ आर्थिक विकास का सबसे बेहतरीन दौर तभी आया, जब राज्य ने अर्थव्यवस्था में अपनी हस्तक्षेपकारी भूमिका बनाई, जब राज्य ने प्राथमिकताएं तय कीं, औद्योगिक नीति का निर्देशन किया, संसाधनों के वितरण में सक्रिय रहा, मुद्रा विनिमय को नियंत्रित किया, और आयात-निर्यात की नीतियों पर अमल सुनिश्चित कराया। तब राज्य अपने यहां मौजूद पूंजी का विकास एवं सामाजिक समृद्धि के हित में अधिकतम सकारात्मक उपयोग कर पाया। 

उस समय मूल रूप से पूंजीवादी व्यवस्थाओं में भी भले ही सीमित, लेकिन महत्त्वपूर्ण भूमिका राज्य कैसे निभा पाया, यह अलग विमर्श का विषय है। इस दलील में दम है कि कम्युनिज्म की चुनौती और मेहनतकश तबकों में सांगठनिक चेतना के प्रसार के दबाव में उन देशों के शासक वर्ग यह रियायत देने को मजबूर हुए थे। बहरहाल, उस दौर का तजुर्बा यही बताता है कि विकास और प्रगति को तय करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यही होता है कि राज्य एवं पूंजी के बीच रिश्ता कैसा है? निर्णायक पहलू यह है कि राज्य पूंजी को निर्देशित करता है या पूंजी राजकीय ढांचे पर अपना नियंत्रण बना लेती है?

चाइना एज अ सिस्टम सब्सटैक पर छपी एक टिप्पणी की इन पंक्तियों पर गौर कीजिए : ‘पूंजी कभी स्वतः राज्य की क्षमता नहीं बनती। पूंजी कारखानों में जा सकती है, अथवा रियल एस्टेट में जा सकती है। यह टेक्नोलॉजी में जा सकती है या फिर वित्तीय दांव लगाने में जा सकती है। यह निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकसित करने में लग सकती है, या फिर अभिजात वर्ग संचालित रेंट की अर्थव्यवस्था में जा सकती है। विकास के नतीजे तय करने वाला वास्तविक पहलू यह है कि क्या राज्य पूंजी प्रवाह की दिशा तय करने, पूंजी के व्यवहार को सीमित करने, और पूंजी संग्रहण को औद्योगिक क्षमता में परिवर्तित कर सकने की स्थिति में है?’

तजुर्बा यह है कि राज्य में ऐसा कर सकने की जितनी अधिक क्षमता होगी, वहां विकास एवं प्रगति के लक्ष्य उस हद तक हासिल हो सकते हैं। अमेरिका में फ्रैंकलीन डिलेनो रुजवेल्ट के समय राज्य ने यह क्षमता दिखाई। तब से अमेरिकी पूंजीवाद के कथित स्वर्ण काल की शुरुआत हुई, जिसके परिणामस्वरूप मध्य वर्ग का उदय एवं प्रसार के साथ अमेरिकी स्वप्न की धारणा दुनिया भर में फैली। जापान, दक्षिण कोरिया, और ताइवान में भी राज्य ने ऐसी क्षमताएं उस दौर में दिखाईं (हालांकि उनके विकास का एक पहलू यह भी रहा कि उनकी पीठ पर अमेरिका का हाथ था, जिसने पूरे पश्चिम के बाजार को उन्हें सुलभ कराया)। नव-उदारवाद के दौर में खासकर अमेरिका का क्षय राज्य पर फिर से पूंजी के बने नियंत्रण का परिणाम है।  

अब भारत पर ध्यान दें। भारत के पास उद्यमियों, बाजार, तकनीकी हुनर आदि की कमी नहीं है। भारत के पास बड़ी आबादी, सॉफ्टवेयर उद्योग, और वित्तीय बाजार है। ये सब उसी दौर का परिणाम हैं, जब नेहरूवादी नीतियों के तहत राज्य ने पूंजी प्रवाह की दिशा को प्रभावित करने की क्षमता दिखाई थी। उसके अलावा लोकतंत्र एवं खुले समाज की छवि के साथ पश्चिम में उसका सॉफ्ट पॉवर भी बना था, जिससे उसे एक दौर में विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में काफी सफलता मिली।  

इसके बावजूद भारत में आज मायूसी है और अब एक बड़ा आर्थिक संकट देश पर मंडरा रहा है, तो कारण 1991 के बाद पूंजी के सामने राज्य का पूर्ण समर्पण में तलाशने की जरूरत है। साथ ही इन प्रश्नों पर विचार की आवश्यकता है कि नेहरूवादी नीतियों के दौर में भारत में सार्वजनिक उद्यम लगाए गए, लेकिन देश का कारखाना क्षेत्र कभी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य क्यों नहीं बन पाया? कुशल इन्फ्रास्ट्रक्चर और निर्यात क्षमता हासिल करने में भी वह क्यों विफल रहा? इन प्रश्नों के जवाब ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में छिपे हुए है :

* विकास यात्रा पर चलने के पहले चीन की तरह भारत में ऐसी सामाजिक क्रांति नहीं हुई, जिससे वर्गीय संबंधों में आमूल बदलाव आता। भूमि सुधारों पर अमल करके ऐसा हो सकता था, लेकिन निहित स्वार्थों का निर्णायक प्रभाव बने रहने के कारण ऐसा नहीं हुआ। 
* स्थानीय स्तर पर पारंपरिक शक्ति केंद्र कायम रहे, जातीय ऊंच-नीच की भावना से समाज ग्रस्त बना रहा, और सांस्कृतिक क्रांति के अभाव में लैंगिक असमानता जारी रही। 
* इन स्थितियों के कारण निजी पूंजी समाज में पहले से ताकतवर परिवारों के हाथ में बनी रही। नवोदित राज्य एक हद से आगे जाकर उस पूंजी को निर्देशित और नियंत्रित करने में अक्षम साबित हुआ। 
* चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के कारण शुरुआत सामाजिक वर्गीय संबंध में आमूल बदलाव से हुई। जापान, दक्षिण कोरिया, या ताइवान में नवोदित पूंजीवाद पारंपरिक सामंती जकड़नों को तोड़ने में राज्य का सहायक बना। 

सोवियत संघ के विघटन के बाद नव-उदारवाद के आए दौर ने पूंजीवादी देशों में राज्य के हस्तक्षेप को अस्वीकार्य बना दिया। इसके परिणाम हर जगह देखने को मिले हैं। भारत के साथ खास यह है कि उत्पादक शक्तियों के विकसित होने से पहले ही देश नव-उदारवाद के शिकंजे में फंस गया। ऐसे में चीन से तुलना एक निरर्थक प्रयास है, जिसके बारे में कहा जाता है :

‘चीन पूंजी को कार्य-कुशलता, आर्थिक गति, तकनीकी प्रगति, और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता विकासित करने में भूमिका निभाने देता है, लेकिन वह पूंजी को ऐसी उच्चतम शक्ति बनने की इजाजत नहीं देता, जो समाज को संगठित करने लगे, जो राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करे, जिसका सार्वजनिक संसाधनों पर नियंत्रण हो जाए, और जो राजनीतिक व्यवस्था का ही आकार बदल दे।’

और, यही सबसे निर्णायक पहलू है। क्या भारत इस चर्चा के लिए तैयार है कि राज्य कैसे इतना सक्षम बने, जिससे पूंजी को वह नियंत्रित करे, ना कि वह पूंजी (आज एकाधिकारी पूंजी) का उपकरण बन जाए? राज्य ऐसी क्षमता हासिल कर पाए, इसके लिए किस तरह की राजनीति, कैसे मुद्दों और किस प्रकार के विमर्श की जरूरत है? क्या राजनीतिक वर्ग और बुद्धिजीवी इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं? अगर नहीं है, तो फिर देंग का महिमामंडन और चीन से चकित होने से कोई लाभ नहीं होगा। 

सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं। ✍
Friday World   31 May 2026
May 31, 2026

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस (30 मई 1826 – 30 मई 2026)

उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस (30 मई 1826 – 30 मई 2026)
-Friday World 31 May 2026
आलेख : बादल सरोज
यूं तो हाल के लगभग डेढ़ दशक भारतीय प्रेस – विशेषकर हिंदी भाषी प्रेस -- के धीरे-धीरे तेज से तेजतर हुए पराभव और गिरावट के बरस हैं। मगर पिछले दो-ढाई महीने, ईरान पर इजरायल और अमरीका के हमले के बाद के पिछले दो-ढाई महीने, कुछ ज्यादा ही तेजी से हुए पतन के महीने हैं। इनके विस्तार में जाए बिना सिर्फ बीते सप्ताह के हिंदी अखबारों की मुख्य खबरों पर ही नजर डालने से ही स्थिति स्पष्ट हो जाती है। अभी हाल में मोदी विदेश दौरे से लौटे हैं : कायदे से तो प्रेस का काम था कि वह पाँचों देशों की यात्रा के कारणों और परिणामों का विश्लेषण कर यह पता लगाती कि ये सफ़र शुद्ध अडानी के धंधे के लिए की गयी उसके श्रवण कुमार की यात्रा थी या पसीना बहाने वाली गर्मी से बचने के लिए किया गया ठन्डे देशों का पर्यटन था। मगर बजाय उसका ध्यान किन बातों पर रहा? 
नार्वे की एक युवा पत्रकार के प्रश्न पूछने की कोशिश भर से प्रधानमंत्री मोदी के लगभग भागने की खबर पर सिर्फ नार्वे ही नहीं, दुनिया भर के मीडिया में मजाक उड़ा : भारत की हिंदी पत्रकारिता के वीर और वीरांगनाएँ पूरी ताकत से उस युवा पत्रकार के ऐसा पीछे पड़े कि सारी मर्यादाएं तोड़कर चरित्र हनन तक आ गए। इससे भी ज्यादा हल्कापन इटली की प्रधानमंत्री मिलोनी को मेलोडी चॉकलेट खिलाने के प्रधानमंत्री मोदी के हद दर्जे के बचपने के कवरेज में दिखी ; जो इस कदर अशोभनीय हो गयी कि आजिज आकर इटली की प्रधानमंत्री को सोशल मीडिया पर मोदी से पल्ला छुड़ाना पड़ा। लाखों युवाओं सहित उनके परिवारों की जिन्दगी में भूकंप ला देने वाले नीट और सीबीएसई घोटाले की जांच परख, उत्तरदायित्व का निर्धारण प्रेस का काम था – मगर बजाय ऐसा करने के अखबार या तो दोषियों की ढाल बने दिखे या जैसे कुछ हुआ ही नहीं हुआ हो, के भाव में नजर आये। ठीक यही रुख सोना न खरीदने, घर में बंद रहने, पेट्रोल और खाने का तेल कम करने की मोदी की सुधार सप्तपदी को लेकर दिखा। कोई भी जिमेदार प्रेस इस घोषणा के समाज और समूचे अर्थतंत्र पर पड़ने वाले असर का आंकलन करती, उन कारणों की समालोचनात्मक समीक्षा करती, जिनके चलते ऐसे कड़े कदम उठाने का दावा किया गया है। विकल्पों पर विचार करती : मगर लगभग पूरा मीडिया राजा का बाजा बजाते हुए दिखा – उसमे भी हिंदी प्रेस की पीपनी कुछ ज्यादा ही बेसुरी तान छेड़े मिली। 

हालांकि इसमें नया कुछ नहीं है, पिछले डेढ़ दशक से यही गत बनी हुई है – आज इसे याद करने की वजह यह है कि इस 30 मई 2026 को हिंदी पत्रकारिता 200 बरस पूरे कर रही है। वर्ष 1826 में इसी दिन कलकत्ता – अब कोलकता – से पण्डित जुगल किशोर शुक्ला कानपुर वाले ने उदंत मार्तंड नाम का, हिंदी का पहला, अखबार निकाला था। अंग्रेजी, फ़ारसी, उर्दू वगैरा भाषाओं में अखबार इससे पहले भी निकलते थे। छापा खाना - प्रिंटिंग प्रेस - वर्ष 1674 में ही बॉम्बे – अब मुम्बई – में कायम हो चुकी थी। इस प्रेस से बंगाल गज़ट वगैरा अखबारों के छपने का सिलसिला भी शुरू हो चुका था। मगर हिंदी अखबार के निकलने में 150 साल लग गए – मजेदार बात यह है कि उसका भी प्रकाशन उस बंगाल से हुआ, जिसकी भाषा हिंदी नहीं थी। खैर, इतिहास ऐसे विस्मयकारी संयोगों से भी मिलकर बनता-बिगड़ता है। मगर मूलतः होता सबक लेने के लिए है। यही वजह है कि इस तरह की तिथियाँ वह अवसर होती हैं, जब धीरज से बैठकर अब तक के किये-अनकिये को सूत्रबद्ध किया जाए। ऐसे सबक लिए जायें, जो आने वाले समय में बेहतरी की उम्मीद जगाते हों। शाम के भूले को सुबह तक लौटाने की राह दिखाते हों। मगर यह सब होने की उम्मीद कम है। एक तो इसलिए कि जो राह भूला हो, उसे तो लौटाकर लाने की संभावना होती है – जिसने गटर खुद चुनी हो, उसे उससे बाहर लाना कठिन काम है। दूसरा इसलिए कि इन दिनों हिंदी भाषी समाज इतिहास से सबक लेने की आदत छोड़कर ऐतिहासिक तिथियों को उत्सव बनाने की कला में सिद्ध हो चुका है। ऐसा ही इस द्विशताब्दी वर्षगाँठ के साथ भी होगा, असल में तो होना शुरू भी हो चुका है। 30 मई को यह उरूज पर पहुंचेगा और जिनकी लेखनी और बोलनी दोनों अशुद्धियों से भरी है, ऐसे अनेक महानुभाव, जिन्होंने इसे आज की गत पर पहुंचाया है, वे बंटाधार के कर्णधार ही इसके सुधार के प्रवचन देते हुए नजर आयेंगे। इन 200 बरस में इसका कितना और क्या योगदान रहा, कितनी नीचाई पाई, कितना उत्थान रहा, इस पर चर्चा से बचने के हर तरीके ढूंढें जायेंगे।

200 साल पहले पहली बार निकले इस अखबार, उदन्त मार्तंड, का घोषित उद्देश्य हिन्दुस्तानियों के हित सामने लाना और राष्ट्रीय चेतना का संचार करना था। इसमें दो मत नहीं कि अधिकांश अखबारों का स्वामित्व अंग्रेज या देशी धनाढ्यों के हाथ में रहने के बावजूद प्रेस ने उस कालखंड में भी भारत की जनता को जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों की भूमिका उल्लेखनीय थी।  भारत की आजादी का समर्थक हर नेता और एक्टिविस्ट पत्रकार और सम्पादक भी हुआ था। उसके अखबार प्रतिबंधित भी हुआ करते थे, उनमें लिखे के लिए जुर्माने भुगतने पड़ते थे, जेलें हुआ करती थीं। कृपया ध्यान दें, यहाँ नियमों की बात की जा रही है, अपवादों की नहीं।

आजादी के बाद भी भारतीय भाषाओं में छपने वाले अखबारों ने आमतौर से समाज को संस्कारित करने, सभ्य बनाने, आगे की ओर  देखने वाला बनाने और एकजुट करने में अपनी भूमिका निबाही। अखबार सिर्फ खबर भर नहीं देते थे, नजरिया भी दिया करते थे। सिर्फ मत, सम्मत या सत्ता पक्ष को ही जगह नहीं देते थे :  विमत, असहमत और विपक्ष को भी प्राथमिकता से स्थान मिलता था। आमतौर से स्तुति और वन्दना से बचते थे, समालोचना और आलोचना को तरजीह देते थे। जिन्हें सरकारी माना जाता था, वे भी असरकारी हुआ करते थे, क्योंकि एक सीमा से ज्यादा सरकारपरस्ती में उन्हें भी लाज आती थी। संतुलन बनाए रखने के लिए उनमें भी अक्सर तीखे और यथार्थ के विश्लेष्ण स्थान पा लिया करते थे। अख़बार – हिंदी अखबार भी – देश और दुनिया के हाल बताते थे। सिर्फ राजनीति ही नहीं साहित्य, विज्ञान, प्रकृति और ब्रह्माण्ड, संस्कृति और कला के अवदान बताया करते थे। दूर-दूर के खेलकूद के मैदान दिखाया करते थे। बच्चों से लेकर बूढों, आदमियों से लेकर औरतों तक की जानकारी और ज्ञान को नयी उड़ान प्रदान करते थे। मनुष्य को इंसान बनाने में शिक्षक और सूचना स्रोत दोनों की भूमिका निबाहा करते थे। सामान्यतः अन्धविश्वास और पाखंड के प्रति आलोचनात्मक हुआ करते थे। सारतः यह कि वे पाठकों को सिर्फ पाठक नहीं मानते थे, उनकी राय के लिए भी जगह रखते थे। बड़े घरानों के स्वामित्व में होने के चलते अपनी वर्ग सापेक्ष पक्षधरता के बावजूद यथासंभव समावेशी दिखने की कोशिश की जाती थीं। खबरों के चयन और सम्पादकीय के मामले में सेठ नहीं,  सम्पादक सर्वोच्च होता था। आमतौर से अखबार मुनाफ़ा कमाने का जरिया नहीं हुआ करते थे। मोटा-मोटी यह बात हिंदी के अखबारों के बारे में भी सच थी । 

अब जब वह 200 वर्ष पूरे कर रही है, तब आम तौर से पूरी और खास तौर से हिंदी की पत्रकारिता के बारे में, यह बात नहीं कही जा सकती। प्रायोजित प्रोपेगंडा, झूठी खबरें, नफरत बुझी सामग्री, अज्ञान और अंधविश्वास से भरी जानकारियाँ और पूर्वाग्रह में पगी खबरें तथा पेड न्यूज़ अब इसकी मुख्य पहचान बन गयी है। सम्पादक लुप्त हो चुका है, उसके नाम पर जो बचे हैं उनकी मेरुदण्ड – रीढ़ की हड्डी – विलुप्त हो चुकी है। पत्रकार हर तरह से असुरक्षित हैं और जो सच में समाचार कहे जा सकते हैं, वे अप्रकाशित हैं। पूरी निर्लज्जता के साथ सत्ता में बैठे – भले हीं वे कितने भी जघन्य अपराधी क्यों न हो – लोगों का गुणगान किया जा रहा है। कई बार तो मालिकों से भी ज्यादा वफादार दिखने के लिए चाटुकारिता की सभी सीमाएं लांघी जा रही हैं।

पत्रकारिता के बारे में कहा जाता था कि उन्हें निष्पक्ष दिखना ही नहीं चाहिए, होना भी चाहिए। आज उस सबको भुलाकर पत्रकारिता – विशेषकर हिंदी पत्रकारिता – लिजलिजाते हुए रेंगते, सत्ता में बैठे राजनेताओं के पांवों में लोटते प्राणियों के झुण्ड में बदल कर रह गयी है।  पहरेदार - ‘वॉच डॉग’ – से गोदी मीडिया – लैप डॉग – में बदलकर रह गयी है। इसके लिए पत्रकारों को दोषी ठहराना रोग को गलत तरीके से पहचानना होगा। उनमें आज भी साहस और कौशल की कमी नहीं है – समस्या यह है कि उनकी अभिव्यक्ति पर ही सेंसरशिप लगा दी गयी है। जिन्हें कथित पत्रकारिता के पुरोधा बताकर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, वे और भले कुछ भी कहे जाएँ, पत्रकार कहीं से भी नहीं हैं। 

इसी के दो नमूने हाल ही में सामने आये। दोनों ही पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार करने वाले संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। एक इसके वर्तमान कुलपति का है, दूसरा इसके पूर्व कुलपति का है। हालाँकि इन दिनों इन्हें कुलपति संबोधन नहीं दिया जाता। जब से यह विश्वविद्यालय संघ के चंगुल में गया है और इसने पौराणिक चरित्र नारद को विश्व का पहला पत्रकार माना है और गौमूत्र तथा गोबर पर शोध को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने की आतुरता दिखाई है, तब से कुलपति को कुलगुरु कहा जाने लगा है। हिंदी पत्रकारिता की द्विशताब्दी के मौके पर हुए ‘प्रणाम उदन्त मार्तण्ड’ समारोह में इसके वर्तमान कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने सत्ता पार्टी के चरणों की ओर निहारते हुए. लगभग भाव-विगलित होते हुए कहा कि “पहले हम यह आयोजन बंगाल में ही करना चाहते थे, मगर शायद नियति को यही मंजूर था कि पहले बंगाल और कलकत्ता की भूमि का शुद्धिकरण हो, उसके बाद हम 'उदंत मार्तंड' को प्रणाम करने के लिए वहां पहुंचे। बंगाल के लोगों ने शुद्धिकरण का काम संपन्न कर दिया है। इस कार्यक्रम के बाद हम वहीं जाने वाले हैं।" उनके इस विभाजनकारी और राजनीतिक बयान को बाकियों ने ही नहीं, स्वयं इस विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों ने भी लज्जाजनक बताया है : मगर कुलगुरु लज्जित होना कब का त्याग चुके हैं। बहरहाल पण्डित तिवारी बौने संस्करण हैं, उनसे ज्यादा निराट बिरादरी के उनसे बड़े, महाकाय, दीर्घाकाय, विराट और भी पधरे हुए हैं। बात व्यक्ति की नहीं है, प्रवृत्ति की है। इसी गलीज प्रवृत्ति की गलाजत पूर्व कुलगुरु और वर्तमान में प्रसार भारती के सदस्य जगदीश उपासने दिखाई और नोर्वे की युवा पत्रकार के निजी जीवन की तस्वीरें सोशल मीडिया पर चिपकाकर उसके चरित्र को लेकर भद्दी टिप्पणियाँ कर दी। जाहिर है कि देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई । मगर कुलगुरु दुशासन आसन से डिगे नहीं : इन पंक्तियों के लिखे जाने तक उन्होंने चीरहरण वाली अपनी बात वापस नहीं ली है।   

इस प्रवृत्ति के फलने-फूलने की एक वजह मीडिया पर धन पिशाचों का सम्पूर्ण एकाधिकारी वर्चस्व स्थापित हो जाना है। अखबार सहित मीडिया संस्थानों पर पूंजी का स्वामित्व पहले भी था। मगर यह उनकी तुलना में नया और ताजा है। इस आवारा और सटोरिया पूँजी को विज्ञान और आधुनिक चेतना से संपन्न समाज की जरूरत नहीं है, बल्कि उसका निषेध करना अब उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। कुपढ़, वहशी, हिंसक और टूटा-बिखरा अमानुषिक समाज उसकी आपराधिक कमाई के लिए मुफीद भी होगा, मददगार भी। उस तरह का समाज बनाने के लायक अखबार और मीडिया उसे चाहिए। उन्हें ही तैयार किया जा रहा है।  
    
'उदंत मार्तंड' अंग्रेजी राज के चरमोत्कर्ष के समय उन दिनों की उसकी राजधानी कलकत्ता से निकलता था और दो वर्ष तक – जब तक वह आर्थिक संकट के चलते बंद नहीं हुआ, तब तक – चलता रहा। आज ऐसा नहीं हो सकता। आज असहमत अखबार या प्रकाशन संस्थान का चल पाना असंभव बना दिया गया है। यह रुझान बढ़ता ही जा रहा है। किसी समय जो भारत, 1975-77 के आपातकाल के कोई डेढ़ 18 महीनों को छोड़कर, दुनिया भर में प्रेस की स्वतन्त्रता के लिए तुलनात्मक रूप से निरापद माना जाता था, आज वह प्रेस स्वतंत्रता रसातल में पहुँच चुकी है। दुनिया के 180 देशों में वह पिछली वर्ष के 150वे स्थान से और नीचे गिरकर 157 पर आ गया है। फौजी तानाशाही वाले पाकिस्तान से भी दो श्रेणी और राजशाही वाले भूटान से सात श्रेणी नीचे पहुँच गया है।

किसी वर्षगाँठ के मौके पर यह कहना अच्छा नहीं लगता, मगर स्वयं को धोखा देना भी अच्छी बात नहीं है, इसलिए यह कहना ही होगा कि हिंदी पत्रकारिता के दो सौ बरस, उदन्त मार्तण्ड से लुप्त मेरुदण्ड तक के दो सौ बरस हैं। अच्छी बात यह है कि कथित मुख्यधारा के प्रकाशनों के कीच-कवलित हो जाने के बाद भी छोटे-छोटे कहे जाने वाले साधन विहीन प्रयत्नों ने लौ जलाए रखी है : *इन जुगनुओं का साथ लेकर राह रोशन कीजिये/ रास्ता सूरज का देखा तो सुबह हो जायेगी।* 

लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716

Friday World 31 May 2026

Saturday, 30 May 2026

May 30, 2026

ईरान की वायु रक्षा ने F-15E गिराया या चीनी मिसाइल? NBC न्यूज का नया दावा, तेहरान ने खारिज किया

ईरान की वायु रक्षा ने F-15E गिराया या चीनी मिसाइल? NBC न्यूज का नया दावा, तेहरान ने खारिज किया - Friday World 31 May2026

तेहरान/वाशिंगटन, 31 मई 2026— अप्रैल 2026 में दक्षिण-पश्चिमी ईरान के ऊपर अमेरिकी F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान के गिराए जाने के मामले में नया विवाद खड़ा हो गया है। ईरान ने इस सफलता का श्रेय अपनी स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली को दिया था, लेकिन अमेरिकी मीडिया NBC न्यूज ने अनाम अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से दावा किया है कि विमान को चीनी निर्मित MANPADS मिसाइल ने मार गिराया, जिसमें चीनी लंबी दूरी के रडार ने सहायता की।

ईरान ने इस रिपोर्ट को तुरंत खारिज कर दिया है और इसे “अमेरिकी प्रोपगैंडा” बताया है।

 घटना का विवरण

3 अप्रैल 2026 को अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान अमेरिकी वायुसेना का F-15E स्ट्राइक ईगल जाग्रोस पर्वतीय क्षेत्र के ऊपर मार गिराया गया। यह दशकों में पहली बार था जब ईरानी आग में अमेरिकी फ्रंटलाइन लड़ाकू विमान गिराया गया। विमान के दोनों चालक सदस्य सफलतापूर्वक ईजेक्ट हो गए थे, जिन्हें बाद में बचाया गया।

ईरानी रक्षा मंत्रालय और एयरोस्पेस फोर्स ने तुरंत बयान जारी कर कहा कि विमान को ईरान की domestically developed air defense system ने निशाना बनाया। ईरानी मीडिया में इसे “स्वदेशी तकनीक की बड़ी जीत” बताया गया था।

 NBC न्यूज की रिपोर्ट

NBC न्यूज ने 30 मई को अपनी रिपोर्ट में अनाम अमेरिकी खुफिया और सैन्य अधिकारियों के हवाले से दावा किया कि:

- F-15E को चीनी निर्मित shoulder-fired MANPADS (Man Portable Air Defense System) ने गिराया।

- लक्ष्य को ट्रैक करने और लॉक करने में चीनी लंबी दूरी के रडार ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

- MANPADS सिस्टम ईरान के पास पहले से मौजूद हो सकता है या हाल ही में सप्लाई किया गया हो।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी जांच अभी जारी है और पूर्ण निष्कर्ष आने में समय लग सकता है।

 दोनों पक्षों की प्रतिक्रियाएं

ईरान का पक्ष:
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने NBC की रिपोर्ट को “बेबुनियाद और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया। उन्होंने जोर देकर कहा, “ईरान की वायु रक्षा प्रणालियां पूरी तरह स्वदेशी हैं और अमेरिकी विमान को उन्हीं ने नष्ट किया। चीनी मिसाइल का दावा अमेरिका का प्रयास है कि ईरान की तकनीकी क्षमता को कम करके आंका जाए।”

अमेरिका का पक्ष:
अमेरिकी रक्षा विभाग ने अभी तक आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन सूत्रों ने NBC को बताया कि जांच में चीनी हथियारों के इस्तेमाल के सबूत मिले हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अप्रैल में ही घटना को “shoulder-fired missile” से जोड़कर बात की थी।

विशेषज्ञों की राय

कई स्वतंत्र रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि अभी तक दोनों पक्षों की ओर से कोई ठोस सार्वजनिक सबूत — जैसे मिसाइल के मलबे की तस्वीर, रडार डेटा या स्वतंत्र जांच रिपोर्ट — नहीं पेश किया गया है। 

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- MANPADS जैसी छोटी मिसाइलें आधुनिक जेट विमानों को कम ऊंचाई पर उड़ते समय मार गिराने में सक्षम होती हैं।
- ईरान के पास रूस और चीन दोनों से प्राप्त वायु रक्षा प्रणालियां हैं, जिनमें HQ-9, S-300 और स्वदेशी Bavar-373 शामिल हैं।
- यह विवाद चीन-ईरान सैन्य सहयोग की गहराई को उजागर करता है।

 व्यापक संदर्भ

यह घटना अमेरिका और ईरान के बीच अप्रैल 2026 में छिड़े सीधे सैन्य संघर्ष का हिस्सा है। इस दौरान दोनों देशों ने एक-दूसरे पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे। F-15E का गिरना अमेरिकी वायुसेना के लिए एक बड़ा झटका था, जबकि ईरान के लिए प्रचार की बड़ी सफलता।

चीन का रुख:
बीजिंग ने किसी भी हथियार सप्लाई के आरोप से इनकार किया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करते हैं और किसी भी संघर्ष में हथियारों की आपूर्ति नहीं करते।”

 आगे की संभावनाएं

- अमेरिका इस घटना को लेकर ईरान और चीन पर नए प्रतिबंध लगा सकता है।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग हो सकती है।
- दोनों पक्ष सूचना युद्ध तेज कर रहे हैं, जिसमें हथियार की असलियत से ज्यादा भू-राजनीतिक संदेश देने की कोशिश दिख रही है।

 F-15E के गिराए जाने और इस्तेमाल किए गए हथियार को लेकर अभी अलग-अलग दावे हैं। स्वतंत्र रूप से सत्यापित जानकारी अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक युद्ध में सैन्य तकनीक, खुफिया जानकारी और मीडिया रिपोर्टिंग कितनी तेजी से एक-दूसरे से जुड़ जाती है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 31 May2026
May 30, 2026

संयुक्त राष्ट्र ने इजराइल और रूस को यौन हिंसा ब्लैकलिस्ट में शामिल किया, इजराइल ने संबंध तोड़ने की घोषणा की

संयुक्त राष्ट्र ने इजराइल और रूस को यौन हिंसा ब्लैकलिस्ट में शामिल किया, इजराइल ने संबंध तोड़ने की घोषणा की - Friday World 31 May2026

न्यूयॉर्क, 30 मई 2026 — संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस की वार्षिक रिपोर्ट में इजराइल और रूस को पहली बार संघर्ष से संबंधित यौन हिंसा (Conflict-Related Sexual Violence) की ब्लैकलिस्ट में शामिल किया गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस फैसले पर इजराइल ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए महासचिव गुटेरेस के साथ सभी आधिकारिक संबंध समाप्त करने की घोषणा कर दी है।

रिपोर्ट में इजराइली सुरक्षा बलों — इजराइल डिफेंस फोर्सेज (IDF), इजराइल प्रिजन सर्विस और कुछ पुलिस यूनिट्स — पर 2023 से 2025 के बीच फिलिस्तीनी कैदियों के खिलाफ यौन हिंसा के पैटर्न का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र ने 31 मामले सत्यापित किए हैं, जिनमें रेप, जननांगों पर हिंसा, जबरन नग्नता और अपमानजनक सर्च शामिल हैं।

 रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
- 2025 में कुल 13 मामले और 2023-24 में 18 मामले सत्यापित।
- अधिकांश घटनाएं गाजा, वेस्ट बैंक और Sde Teiman जैसे हिरासत केंद्रों से जुड़ी बताई गईं।
- रिपोर्ट में कहा गया कि इजराइल ने संयुक्त राष्ट्र जांचकर्ताओं को पहुंच देने से इनकार किया, जिससे निगरानी प्रभावित हुई।
- रूस को भी इसी आधार पर सूची में शामिल किया गया है।

यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को सौंपी गई है और दुनिया भर में 77 सरकारी तथा गैर-सरकारी पक्षों को ब्लैकलिस्ट किया गया है।

 इजराइल की प्रतिक्रिया
इजराइल के संयुक्त राष्ट्र राजदूत डैनी डैनोन ने फैसले को “शर्मनाक” और “राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताया। उन्होंने कहा, “हम इस महासचिव गुटेरेस के साथ समाप्त कर चुके हैं। उन्होंने इजराइल को हमास, ISIS जैसी आतंकवादी संगठनों की कतार में खड़ा कर दिया है।”

इजराइली विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को “तथ्यों से दूर” और “बेबुनियाद” करार दिया। इजराइल का कहना है कि उसकी सेना दुनिया की सबसे नैतिक सेनाओं में से एक है और ऐसे आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।

संयुक्त राष्ट्र का पक्ष
संयुक्त राष्ट्र ने रिपोर्ट को “सत्यापित जानकारी” पर आधारित बताया है। महासचिव गुटेरेस ने पिछले साल इजराइल और रूस को “नोटिस” पर रखा था, जिसके बाद इस साल औपचारिक रूप से ब्लैकलिस्ट किया गया। रिपोर्ट में हमास द्वारा 7 अक्टूबर 2023 के हमले में की गई यौन हिंसा का भी जिक्र है।

 अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
- अमेरिका और इजराइल के अन्य सहयोगी देशों ने रिपोर्ट पर सवाल उठाए हैं।
- फिलिस्तीनी अधिकारियों और कुछ मानवाधिकार संगठनों ने रिपोर्ट का स्वागत किया है।
- रिपोर्ट में कुल लगभग 10,000 संघर्ष-संबंधित यौन हिंसा के मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्षों की तुलना में अधिक हैं।

यह घटना इजराइल-हमास युद्ध के बीच संयुक्त राष्ट्र और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव को और गहरा कर रही है। ब्लैकलिस्ट में शामिल होने से अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है, हालांकि इसका कानूनी बाध्यता नहीं है।

इजराइल ने रिपोर्ट को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि वह अपनी जांच जारी रखेगा। संयुक्त राष्ट्र ने सभी पक्षों से सहयोग की अपील की है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 31 May2026
May 30, 2026

यमन के विवादास्पद 'भगोड़े' राष्ट्रपति अब्द रब्बूह मंसूर हादी का रियाद में निधन: एक युग का अंत

यमन के विवादास्पद 'भगोड़े' राष्ट्रपति अब्द रब्बूह मंसूर हादी का रियाद में निधन: एक युग का अंत
- Friday World 31 May2026
रियाद, 28 मई 2026 – यमन के पूर्व राष्ट्रपति अब्द रब्बूह मंसूर हादी, जिन्हें उनके समर्थक 'रिपब्लिकन सिस्टम के रक्षक' और आलोचक 'भगोड़े नेता' कहते थे, 80 वर्ष की आयु में अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद सऊदी अरब की राजधानी रियाद में अपने आवास पर निधन हो गया। यमनी राज्य टेलीविजन और सरकारी सूत्रों ने इसकी पुष्टि की। हृदयाघात को उनकी मृत्यु का कारण बताया जा रहा है। यमन सरकार ने तीन दिनों का राष्ट्रीय शोक घोषित कर झंडे आधे झुका दिए हैं।

यह निधन यमन के आधुनिक इतिहास के एक जटिल और दर्द भरे अध्याय का समापन करता है। हादी 2012 से 2022 तक औपचारिक रूप से राष्ट्रपति रहे, लेकिन 2015 के बाद से वे मुख्य रूप से निर्वासन में ही शासन संभालते रहे। हूतियों के सत्ता पर कब्जे के बाद वे सऊदी अरब चले गए थे, जहां से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समर्थन के साथ यमन की वैध सरकार का प्रतिनिधित्व किया।

दक्षिणी यमन से राष्ट्रपति पद तक की यात्रा

अब्द रब्बूह मंसूर हादी का जन्म 1 सितंबर 1945 को दक्षिण यमन के अब्यान प्रांत के थुकैन गांव में हुआ था। उस समय यह क्षेत्र ब्रिटिश संरक्षण में था। उन्होंने 1960 के दशक में सैन्य अकादमी से शिक्षा प्राप्त की और दक्षिण यमन की सेना में सेवा की। मिस्र और सोवियत संघ में सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले हादी 1986 के दक्षिण यमन गृहयुद्ध के दौरान उत्तरी यमन चले गए थे।

1990 में यमन के उत्तर और दक्षिण के एकीकरण के बाद वे राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के करीबी बने। 1994 के गृहयुद्ध में उन्होंने सालेह सरकार का साथ दिया और रक्षा मंत्री के रूप में दक्षिणी अलगाववादियों के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया। इसके पुरस्कार स्वरूप 1994 में उन्हें उपराष्ट्रपति बना दिया गया, पद जो वे 2012 तक संभाले रहे।

2011 के अरब स्प्रिंग आंदोलन ने सालेह के 33 वर्षीय शासन को चुनौती दी। घायल सालेह के सऊदी अरब जाने के बाद हादी कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। 2011 के GCC समझौते के तहत सालेह ने सत्ता छोड़ी और हादी को 2012 के चुनाव में एकमात्र उम्मीदवार के रूप में खड़ा किया गया। उन्होंने लगभग 100% वोटों से जीत हासिल की, हालांकि चुनाव का बहिष्कार भी हुआ था।

 संक्रमणकालीन राष्ट्रपति: आशाएं और असफलताएं

हादी की राष्ट्रपति पद की शुरुआत आशा के साथ हुई। राष्ट्रीय संवाद सम्मेलन (National Dialogue Conference) के जरिए उन्होंने यमन को संघीय ढांचे की ओर ले जाने की कोशिश की। अल-कायदा से मुकाबला, सैन्य सुधार और आर्थिक स्थिरता उनके एजेंडे में थे। अमेरिका और खाड़ी देशों का समर्थन उन्हें प्राप्त था।

लेकिन चुनौतियां भारी थीं। गरीबी, भ्रष्टाचार, क्षेत्रीय असमानताएं और हूथी विद्रोह (उत्तर में) उनके शासन को कमजोर कर रहे थे। 2014 में हूतियों ने राजधानी साना पर कब्जा कर लिया। ईरान समर्थित हूतियों ने ईंधन सब्सिडी में कटौती और शासन की नाकामियों का फायदा उठाया। जनवरी 2015 में हादी को नजरबंद कर दिया गया, उन्होंने इस्तीफा दे दिया, लेकिन बाद में इसे वापस ले लिया।

फरवरी 2015 में वे एडेन भाग गए और फिर रियाद पहुंचे। मार्च 2015 में सऊदी नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने हूतियों के खिलाफ हस्तक्षेप शुरू किया, जिसे हादी सरकार की बहाली का उद्देश्य बताया गया। युद्ध ने यमन को तबाही के कगार पर पहुंचा दिया – लाखों मौतें, अकाल, महामारी और मानवीय संकट।

 निर्वासन में शासन: विवादों का सिलसिला

रियाद से हादी ने यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का नेतृत्व किया। लेकिन आलोचक उन्हें "रिमोट कंट्रोल" राष्ट्रपति कहते थे। 2017 के बाद वे लगभग पूरी तरह सऊदी नियंत्रण में बताए जाते थे। 2022 में सऊदी दबाव में उन्होंने इस्तीफा दे दिया और सत्ता प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल को सौंपी, जिसके चेयरमैन राशिद अल-अलीमी बने।

हादी का शासन यमन के लिए मिश्रित विरासत छोड़ गया। एक ओर वे एकीकरण और गणतंत्र की रक्षा के प्रतीक बने, दूसरी ओर उनकी कमजोर नेतृत्व क्षमता, क्षेत्रीय पूर्वाग्रह (दक्षिणी पक्षपात) और युद्ध को लंबा खींचने के आरोप लगे। हूतियों ने उन्हें "वैधता" का प्रतीक मानकर भी निशाना बनाया।

निधन पर प्रतिक्रियाएं

यमन के वर्तमान नेतृत्व ने हादी को "यमनी लोगों के न्यायपूर्ण राज्य, स्वतंत्रता और गरिमा के विश्वासी" बताया। सऊदी अरब, अमेरिका और कई अरब देशों ने शोक व्यक्त किया। हाला नामक पत्नी और छह संतानों सहित परिवार शोक में है।

 यमन आज: अनसुलझी चुनौतियां

हादी के निधन के समय यमन अभी भी विभाजित है। हूतियों का उत्तरी नियंत्रण, सरकार का दक्षिणी आधार और UN-समर्थित संघर्ष विराम। युद्ध ने लाखों लोगों को प्रभावित किया, लेकिन शांति की उम्मीद अभी भी जिंदा है।

अब्द रब्बूह मंसूर हादी की कहानी यमन की जटिल राजनीति, बाहरी हस्तक्षेप और आंतरिक कलह की दास्तां है। एक सैनिक से राष्ट्रपति बने व्यक्ति, जो अंत में निर्वासन में ही जीवन समाप्त कर गया। उनका निधन यमन को आईने में देखने का अवसर देता है – विगत की गलतियों से सीखकर भविष्य कैसे बनाया जाए।

 हादी का शासन यमन की एकता को बनाए रखने की कोशिश का प्रतीक था, लेकिन क्षेत्रीय शक्तियों (सऊदी vs ईरान) की जंग ने देश को बर्बादी की ओर धकेला। अब नई पीढ़ी के नेताओं पर निर्भर है कि वे शांति और पुनर्निर्माण का रास्ता चुनें। यमन की जनता, जो दशकों से संघर्ष कर रही है, अब स्थिरता और समृद्धि की हकदार है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 31 May2026
May 30, 2026

"આસ્થાથી રાષ્ટ્રપ્રતીક સુધી: ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાની માંગ પાછળના રાજકીય, કાયદાકીય અને સામાજિક પાસાં"

"આસ્થાથી રાષ્ટ્રપ્રતીક સુધી: ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાની માંગ પાછળના રાજકીય, કાયદાકીય અને સામાજિક પાસાં" - Friday World 31 May2026
ભારતમાં ગાય માત્ર એક પશુ નથી. તે કરોડો લોકો માટે આસ્થા, અર્થતંત્ર અને સંસ્કૃતિનું પ્રતીક છે. છેલ્લા કેટલાક દાયકાઓથી ગૌરક્ષાનો મુદ્દો રાજકીય ચર્ચાના કેન્દ્રમાં રહ્યો છે. ઘણા સંગઠનો, સંતો અને નાગરિક જૂથો સતત માંગ કરી રહ્યા છે કે ગાયને "રાષ્ટ્રીય પશુ"નો દરજ્જો આપવામાં આવે. રસપ્રદ વાત એ છે કે આ માંગને વિવિધ ધર્મ અને સમુદાયના લોકોનું સમર્થન પણ મળતું રહ્યું છે. તો સવાલ એ થાય કે જ્યારે આટલો મોટો જનાધાર છે, ત્યારે કેન્દ્ર સરકાર આ પગલું ભરવામાં કેમ અચકાય છે? ચાલો આ પ્રશ્નના તમામ પાસાં સમજીએ.

1. બંધારણીય અને કાયદાકીય માળખું: કેન્દ્રની મર્યાદા

ભારતના બંધારણમાં પશુપાલન, પશુઓની જાળવણી અને કૃષિ એ રાજ્યની યાદીના વિષયો છે. એટલે કે આ મુદ્દે કાયદો બનાવવાની સત્તા મુખ્યત્વે રાજ્ય સરકારો પાસે છે. અનુચ્છેદ 48 માં રાજ્યને ગાય અને વાછરડા સહિત દુધાળા પશુઓની હત્યા પર પ્રતિબંધ મૂકવા માટે નિર્દેશ આપ્યો છે. પરંતુ આ નિર્દેશક સિદ્ધાંત છે, ફરજિયાત કાયદો નહીં. 

આજે દેશના 20 થી વધુ રાજ્યોમાં ગૌહત્યા પર સંપૂર્ણ કે આંશિક પ્રતિબંધ છે. ગુજરાત, મહારાષ્ટ્ર, ઉત્તર પ્રદેશ, મધ્ય પ્રદેશ સહિત ઘણા રાજ્યોમાં કડક કાયદા છે. કેન્દ્ર સરકાર જો "રાષ્ટ્રીય પશુ" જાહેર કરે તો પણ ગૌહત્યા પર પ્રતિબંધનો કાયદો તો રાજ્યોએ જ બનાવવો પડે. "રાષ્ટ્રીય પશુ" નો દરજ્જો પ્રતીકાત્મક છે. તેનાથી સીધો કોઈ કાયદાકીય ફેરફાર થતો નથી. વાઘને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કર્યો છે, પણ વાઘના સંરક્ષણ માટે અલગથી વન્યજીવ સંરક્ષણ અધિનિયમ 1972 લાગુ પડે છે. એટલે ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાથી ગૌહત્યા આપોઆપ બંધ ન થાય. આ કાયદાકીય મર્યાદા એક મોટું કારણ છે.

2. રાષ્ટ્રીય પ્રતીક પસંદ કરવાના માપદંડ

ભારતના રાષ્ટ્રીય પ્રતીકો પસંદ કરતી વખતે કેટલાક અલિખિત માપદંડ રહ્યા છે. રાષ્ટ્રીય પશુ વાઘ, રાષ્ટ્રીય પક્ષી મોર, રાષ્ટ્રીય ફૂલ કમળ. આ બધા પ્રતીકોની પસંદગી પાછળ મુખ્ય કારણ તેમનું સાંસ્કૃતિક મહત્વ, દેશભરમાં ઉપસ્થિતિ, આંતરરાષ્ટ્રીય ઓળખ અને ધાર્મિક રીતે તટસ્થ હોવાનું હતું. 

ગાયનું સનાતન ધર્મમાં અત્યંત મહત્વ છે. તેને કામધેનુ, ગૌમાતા કહેવાય છે. પરંતુ ભારત એક બિનસાંપ્રદાયિક દેશ છે. સરકારનું માનવું છે કે રાષ્ટ્રીય પ્રતીક એવું હોવું જોઈએ જે તમામ ધર્મ, જાતિ, પ્રદેશના લોકોને સમાન રીતે સ્વીકાર્ય હોય. જો કોઈ એક ધર્મ સાથે વિશેષ રીતે જોડાયેલા પ્રતીકને રાષ્ટ્રીય દરજ્જો અપાય તો તેનાથી અન્ય સમુદાયોમાં વિવાદ ઉભો થઈ શકે. સરકાર કોઈપણ પ્રકારના સામાજિક ધ્રુવીકરણથી બચવા માંગે છે. ભલે ઘણા મુસ્લિમ સંગઠનોએ પણ ગૌરક્ષાનું સમર્થન કર્યું હોય, છતાં નીતિ ઘડતી વખતે સરકાર વ્યાપક સામાજિક અસર જુએ છે.

3. આર્થિક અને વ્યવહારુ પડકારો

ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાથી કેટલાક વ્યવહારુ પ્રશ્નો ઉભા થાય. ભારત વિશ્વમાં બીફનો સૌથી મોટો નિકાસકાર દેશોમાંનો એક છે. 2023-24 માં ભારતે લગભગ 25,000 કરોડ રૂપિયાનું બીફ નિકાસ કર્યું. આમાં મોટાભાગનું "બફ" એટલે ભેંસનું માંસ હોય છે, પણ આંતરરાષ્ટ્રીય બજારમાં છબીની અસર પડે. 

બીજો મુદ્દો રખડતા ઢોરનો છે. દેશમાં લાખોની સંખ્યામાં ગાયો રસ્તા પર રખડે છે. જો રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર થાય તો તેમના ભરણપોષણ, ગૌશાળા, તબીબી સારવારની જવાબદારી કેન્દ્ર પર આવે. આ માટે હજારો કરોડનું વાર્ષિક બજેટ જોઈએ. રાજ્યો પાસે પહેલેથી જ ગૌશાળા માટે પૂરતું ફંડ નથી. કેન્દ્ર સરકાર કોઈપણ નિર્ણય લેતા પહેલા તેની આર્થિક અસરનું આકલન કરે છે.

ડેરી ઉદ્યોગ પણ એક પરિબળ છે. દૂધ ન આપતી, વૃદ્ધ કે બીમાર ગાયોને પાળવી ખેડૂતો માટે આર્થિક રીતે પરવડે તેમ નથી. કડક કાયદાના કારણે ખેડૂતો ગાય પાળતા ડરે છે કારણ કે નકામી થયા પછી તેનો નિકાલ કરવો મુશ્કેલ બને છે. આનાથી ગૌપાલન જ ઘટી રહ્યું છે એવું પશુપાલન નિષ્ણાતો કહે છે.

4. રાજકીય ગણિત અને આરોપ-પ્રત્યારોપ

ગૌરક્ષા ભાજપ અને સંઘ પરિવારના મુખ્ય મુદ્દાઓમાં રહી છે. વિપક્ષ વારંવાર આરોપ મૂકે છે કે ભાજપ ગાયના નામે ભાવનાત્મક રાજનીતિ કરે છે, પણ સત્તામાં આવ્યા પછી નક્કર પગલાં લેતી નથી. બીજી તરફ ભાજપનું કહેવું છે કે તેમણે ગૌહત્યા પર કડક કાયદા બનાવ્યા, ગૌ સંવર્ધન માટે યોજનાઓ શરૂ કરી, રાષ્ટ્રીય કામધેનુ આયોગ બનાવ્યું. 

સરકારની દલીલ એ છે કે માત્ર "રાષ્ટ્રીય પશુ" નું લેબલ લગાવવાથી ગૌરક્ષા ન થાય. તેના માટે જમીની સ્તરે કામ જરૂરી છે. જો પ્રતીકાત્મક જાહેરાત કરીને વ્યવહારુ કંઈ ન થાય તો ઊલટાનું સરકાર પર "માત્ર ઘોષણા કરનારી" હોવાનો આરોપ લાગે. એટલે સરકાર ફોકસ ઘોષણા કરતા અમલીકરણ પર રાખવા માંગે છે.

5. સર્વસંમતિનો અભાવ

તમે કહ્યું કે સમસ્ત મુસ્લિમ સમુદાય ટેકો આપે છે. હકીકતમાં ઘણા મુસ્લિમ ધર્મગુરુઓ, જેમ કે જમિયત ઉલેમા-એ-હિંદ, અને સામાન્ય મુસ્લિમ નાગરિકોએ ગૌહત્યા ન કરવાની અપીલ કરી છે અને ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ બનાવવાનું સમર્થન કર્યું છે. 2017 માં મેરઠમાં મુસ્લિમ સમુદાયે આ માંગ સાથે રેલી પણ કાઢી હતી.

પરંતુ દેશમાં કેટલાક પૂર્વોત્તરના રાજ્યો, કેરળ, પશ્ચિમ બંગાળ, ગોવા જેવા રાજ્યોમાં બીફ ખોરાકનો ભાગ છે. ત્યાં આદિવાસી અને અન્ય સમુદાયો તેનો વિરોધ કરે છે. નાગાલેન્ડ, મિઝોરમ, મેઘાલયમાં ગૌહત્યા પર કોઈ પ્રતિબંધ નથી. આ રાજ્યોની સંસ્કૃતિ અને ખોરાકની આદતો અલગ છે. કેન્દ્ર સરકાર માટે પડકાર એ છે કે દેશની વિવિધતાને ધ્યાનમાં રાખીને નિર્ણય લેવો. એક તરફના રાજ્યોની ભાવનાનું સન્માન કરીએ તો બીજી તરફના રાજ્યોની સંસ્કૃતિમાં દખલ થતી લાગે.

6. સુપ્રીમ કોર્ટનું વલણ

સુપ્રીમ કોર્ટે પણ 2017 માં એક અરજી ફગાવતા કહ્યું હતું કે ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાનો આદેશ અમે સરકારને ન આપી શકીએ. આ નીતિ વિષયક નિર્ણય છે જે સંસદ અને કાર્યપાલિકાએ લેવાનો છે. કોર્ટે સ્પષ્ટ કર્યું કે બંધારણમાં ક્યાંય "રાષ્ટ્રીય પશુ" ની વ્યાખ્યા નથી. એટલે આ સંપૂર્ણપણે સરકારનો વિશેષાધિકાર છે.

તો રસ્તો શું?

વિશ્લેષકો માને છે કે સરકાર હાલ "ધીમે ધીમે" વાળી નીતિ અપનાવી રહી છે. એકદમ રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર કરવાને બદલે ગૌ સંવર્ધન, નસલ સુધારણા, ગૌ ઉત્પાદનોને પ્રોત્સાહન, ગોબર-ગૌમૂત્ર આધારિત અર્થવ્યવસ્થા ઉભી કરવા પર ભાર મૂકાઈ રહ્યો છે. રાષ્ટ્રીય ગોકુલ મિશન, કામધેનુ આયોગ એના ઉદાહરણ છે. સરકાર ઇચ્છે છે કે પહેલા ગાય આર્થિક રીતે ઉપયોગી બને, જેથી ખેડૂત પોતે તેનું જતન કરે. પછી સામાજિક સ્વીકૃતિ વધે. 

બીજું, સરકાર રાજ્યો મારફતે કામ કરવા માંગે છે. કેન્દ્ર સીધું હસ્તક્ષેપ કરે તો સંઘીય માળખા સામે સવાલ ઉઠે. એટલે રાજ્યોને પ્રોત્સાહન આપીને ગૌશાળા, કાયદા કડક કરવા પર ભાર છે.

*અંતિમ વાત*

ગાયને રાષ્ટ્રીય પશુ જાહેર ન કરવી એ માત્ર રાજકીય ઇચ્છાશક્તિનો અભાવ નથી. તેની પાછળ બંધારણીય મર્યાદા, આર્થિક વ્યવહારુતા, સામાજિક સમરસતા અને સંઘીય માળખાનું સંતુલન જેવા અનેક પરિબળો જવાબદાર છે. આ મુદ્દો આસ્થાનો છે એટલો જ શાસનનો પણ છે. કોઈપણ સરકાર માટે પડકાર એ છે કે કરોડો લોકોની આસ્થાનું સન્માન કરવાની સાથે સાથે દેશની વિવિધતા, અર્થતંત્ર અને બંધારણીય મૂલ્યોનું પણ જતન કરવું. 

જ્યાં સુધી દેશભરમાં સામાજિક અને રાજકીય સ્તરે સંપૂર્ણ સર્વસંમતિ ન સધાય, અને વ્યવહારુ માળખું તૈયાર ન થાય, ત્યાં સુધી માત્ર પ્રતીકાત્મક ઘોષણા કરવાથી સરકાર દૂર રહેવા માંગે છે. ચર્ચા ચાલુ છે, માંગ બુલંદ છે, અને બોલ હવે સમય અને સર્વસંમતિના કોર્ટમાં છે. 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 31 May2026