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Friday, 13 March 2026

March 13, 2026

ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी सेना को बड़ा झटका: पश्चिमी इराक में KC-135 टैंकर क्रैश, 'इस्लामिक रेजिस्टेंस' ने ली जिम्मेदारी लेकिन

ईरान युद्ध के बीच अमेरिकी सेना को बड़ा झटका: पश्चिमी इराक में KC-135 टैंकर क्रैश, 'इस्लामिक रेजिस्टेंस' ने ली जिम्मेदारी लेकिन
-Friday World March 13,2026
CENTCOM का इनकार – मिड-एयर कोलिजन की आशंका मजबूत मध्य पूर्व में जारी तनाव और

 अमेरिका-इजरायल के ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के बीच एक बड़ी घटना ने सुर्खियां बटोरी हैं। 12 मार्च 2026 को पश्चिमी इराक के ऊपर अमेरिकी वायुसेना का एक Boeing KC-135 Stratotanker रिफ्यूलिंग विमान क्रैश हो गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इसकी आधिकारिक पुष्टि की है, लेकिन घटना के कारणों पर विरोधाभासी दावे सामने आ रहे हैं। यह विमान हवा में लड़ाकू जेट्स और बॉम्बर्स को ईंधन भरने वाला महत्वपूर्ण टैंकर है, जो लंबी दूरी के मिशनों के लिए अमेरिकी वायुसेना की रीढ़ माना जाता है। इस क्रैश से अमेरिकी ऑपरेशन पर सवाल उठ रहे हैं, खासकर जब ईरान समर्थित ग्रुप्स ने इसे अपना हमला बताया है। 

घटना का क्रम और क्या हुआ? CENTCOM के बयान के अनुसार, यह घटना 'फ्रेंडली एयरस्पेस' (दोस्ताना हवाई क्षेत्र) में हुई, जहां दो KC-135 विमान शामिल थे। एक विमान पश्चिमी इराक में क्रैश हो गया, जबकि दूसरा सुरक्षित उतर गया। कुछ रिपोर्ट्स में दूसरे विमान के टेल फिन (ऊर्ध्वाधर स्थिरक) के बड़े हिस्से के क्षतिग्रस्त होने की बात है, जो इजरायल के तेल अवीव में लैंडिंग के दौरान दिखाई दी। इससे मिड-एयर कोलिजन (हवा में टकराव) की सबसे मजबूत आशंका जताई जा रही है। 

अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि क्रैश "न तो दुश्मन की फायरिंग से हुआ और न ही फ्रेंडली फायर (अपने ही बलों की गोलीबारी) से"। राहत और बचाव अभियान तुरंत शुरू कर दिए गए हैं, लेकिन क्रैश साइट की सटीक लोकेशन (इराक-जॉर्डन बॉर्डर के निकट होने की बात) और समय अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। 

क्रू मेंबर और हताहतों की स्थिति विमान में क्रू की संख्या पर रिपोर्ट्स अलग-अलग हैं:

 - कुछ स्रोतों (जैसे AP और PBS) के अनुसार, क्रैश हुए विमान में कम से कम 5 क्रू मेंबर थे। 

- अन्य रिपोर्ट्स में 3 या 6 क्रू मेंबर का जिक्र है। 

- अभी तक किसी की मौत या बचाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सर्च ऑपरेशन जारी है, लेकिन KC-135 में पैराशूट या ईजेक्शन सीट्स नहीं होतीं (2008 से पैराशूट हटा दिए गए हैं), जिससे इमरजेंसी में बचाव मुश्किल हो जाता है। क्रू केवल फ्लोर हैच से निकल सकता है, वो भी अगर विमान सीधा और लेवल हो। 

 जिम्मेदारी के दावे: विरोधाभास की पराकाष्ठा ईरान समर्थित 'इस्लामिक रेजिस्टेंस इन इराक' (Iraq में कई मिलिशिया ग्रुप्स का छाता संगठन) ने क्रैश की जिम्मेदारी ली है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने "उचित हथियार" से अमेरिकी KC-135 को मार गिराया, इराकी संप्रभुता की रक्षा में। ईरानी राज्य मीडिया (Press TV) और IRGC के बयानों में भी इसे मिसाइल अटैक बताया गया, जिसमें चालक दल के मारे जाने का दावा किया गया। 

लेकिन CENTCOM ने इन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे "हॉस्टाइल फायर" नहीं माना और इसे एक "दुर्घटना" बताया। यह विरोधाभास युद्ध के प्रचार युद्ध का हिस्सा लगता है, जहां दोनों पक्ष अपनी जीत दिखाना चाहते हैं। 

 KC-135 Stratotanker: युद्ध का 'अदृश्य हीरो' KC-135 Stratotanker 1950 के दशक से अमेरिकी वायुसेना का मुख्य रिफ्यूलिंग प्लेटफॉर्म है। यह Boeing 707 के आधार पर बना है और हवा में ईंधन ट्रांसफर कर लड़ाकू विमानों को हजारों किलोमीटर अतिरिक्त रेंज देता है। ईरान जैसे दूरस्थ लक्ष्यों पर हमलों के लिए ऐसे टैंकर बिना इनके ऑपरेशन असंभव हैं। 

इस क्रैश से अमेरिकी वायुसेना को न सिर्फ एक विमान का नुकसान हुआ है, बल्कि ऑपरेशन की लॉजिस्टिक्स पर भी असर पड़ सकता है। KC-135 फ्लीट पुराना है, लेकिन अभी भी महत्वपूर्ण है। 

 व्यापक संदर्भ: ईरान युद्ध का नया मोड़ यह घटना अमेरिका-इजरायल के ईरान के खिलाफ चल रहे बड़े अभियान 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' का हिस्सा है। हाल के दिनों में क्षेत्र में कई घटनाएं हुई हैं, जैसे अमेरिकी जहाजों पर हमले, ईरानी जहाजों पर फायरिंग और हूती/हिजबुल्लाह की गतिविधियां। यह क्रैश अमेरिकी नुकसान की बढ़ती सूची में चौथा बड़ा प्लेन हो सकता है। 

ट्रंप प्रशासन ने ईरान युद्ध को "बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा" बताया है, लेकिन ऐसे हादसे राजनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ा सकते हैं।

जांच और आगे क्या? अभी जांच जारी है। मिड-एयर कोलिजन सबसे संभावित कारण लगता है, लेकिन ईरान समर्थित ग्रुप्स के दावे प्रोपगैंडा का हिस्सा भी हो सकते हैं। क्रू की सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता है। जैसे-जैसे नई जानकारी आएगी, स्थिति स्पष्ट होगी। 

यह घटना याद दिलाती है कि युद्ध में तकनीकी हादसे भी उतने ही खतरनाक हो सकते हैं जितने दुश्मन के हमले। मध्य पूर्व का तनाव और गहरा रहा है, और ऐसे हादसे स्थिति को और जटिल बना सकते हैं। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 13,2026

Thursday, 12 March 2026

March 12, 2026

इज़राइल ने रूस से की मध्यस्थता की अपील: "ईरान को युद्धविराम के लिए मनाओ" – ईरान का करारा जवाब:

इज़राइल ने रूस से की मध्यस्थता की अपील: "ईरान को युद्धविराम के लिए मनाओ" – ईरान का करारा जवाब:-Friday World March 13,2026 
                 प्रतिकात्मक तस्वीर 
"हमारे किसी भी द्वीप पर हमला हुआ तो सारी लाइनें खत्म, फारस की खाड़ी में पूरी ताकत से जवाब देंगे"

मिडिल ईस्ट में इज़राइल-ईरान युद्ध की आग अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है जहां दोनों पक्षों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। लेकिन पहली बार इज़राइल ने खुले तौर पर रूस से मदद मांगी है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने गुरुवार को सनसनीखेज खुलासा किया कि इज़राइल ने मॉस्को से फोन पर अपील की है कि रूस ईरान को युद्धविराम के लिए राजी कराए और राजनयिक वार्ता फिर से शुरू करवाए।

 दूसरी ओर ईरान ने साफ-साफ चेतावनी दी है – "हमारे किसी भी द्वीप पर हमला करने की कोशिश हुई तो सारी सीमाएं खत्म हो जाएंगी। फारस की खाड़ी में हमलावरों को पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा।" 

 इज़राइल की अपील: रूस से मांगी मध्यस्थता

 रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया ज़खारोवा ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा:

 "इज़राइल ने हमें संपर्क किया है और फोन पर अनुरोध किया है कि हम ईरान को युद्धविराम के लिए मनाएं। वे चाहते हैं कि मॉस्को राजनयिक स्तर पर बातचीत फिर से शुरू करवाए।"

 उन्होंने आगे कहा: 

"पूरे क्षेत्र में मानवीय स्थिति बेहद गंभीर हो गई है। तनाव लगातार बढ़ रहा है और यह चिंताजनक है। हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।" 

यह दूसरी बार है जब इज़राइल ने सार्वजनिक रूप से रूस से मध्यस्थता की अपील की है। रूस ने पहले से ही ईरान के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं और सीरिया में भी दोनों देश मिलकर काम करते हैं। इज़राइल की यह अपील युद्ध में थकान या रणनीतिक दबाव का संकेत मानी जा रही है। 

 ईरान का सख्त रुख: "द्वीप पर हमला हुआ तो कोई लाइन नहीं बचेगी" 

ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ ने X (पूर्व ट्विटर) पर एक सख्त पोस्ट में चेतावनी दी:

 "ईरान के किसी भी द्वीप पर हमला करने की कोशिश हुई तो सारी सीमाएं खत्म हो जाएंगी। हम कोई प्रतिबंध नहीं मानेंगे। फारस की खाड़ी में हमलावरों को पूरी ताकत से जवाब दिया जाएगा।" 

गालिबाफ का यह बयान ईरान की "रेड लाइन" को स्पष्ट करता है। ईरान के पास फारस की खाड़ी में कई रणनीतिक द्वीप हैं जैसे: 

- अबू मूसा 

- ग्रेटर टुनब 

- लेसर टुनब

 ये द्वीप पर ईरान का कब्जा हैं। 

इज़राइल या उसके सहयोगी अगर इन पर हमला करने की कोशिश करते हैं तो ईरान इसे "राष्ट्रीय संप्रभुता पर सीधा हमला" मानकर पूर्ण युद्ध घोषित कर सकता है। 

युद्ध की ताजा स्थिति: दोनों तरफ से हमले जारी 

- ईरान ने हाल ही में 'ट्रू प्रॉमिस-4' ऑपरेशन के तहत 42वां बैच मिसाइल और ड्रोन छोड़े। 

- इज़राइल ने तेहरान के आसपास के ठिकानों पर हमले तेज किए। 

- हॉर्मुज़ स्ट्रेट में जहाजों पर हमले बढ़े 

– भारत के 28 जहाज फंसे हुए। 

- अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS Gerald R. Ford पर आग लगने की घटना।

 - ट्रंप का बयान: "ऑयल महंगा होना हमारे लिए अच्छा है।" 

वैश्विक प्रभाव: भारत पर सबसे ज्यादा असर

 - हॉर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने की आशंका से तेल की कीमतें 130 डॉलर के पार।

 - भारत में पहले से गैस, डेयरी, सिरेमिक, बटाटा निर्यात संकट में। 

- कच्छ के बंदरगाहों पर जहाजों का आवागमन प्रभावित। 

- रूस ने भारत को LNG सप्लाई का ऑफर दिया 

– लेकिन अभी तक कोई बड़ा करार नहीं। 

 क्या होगा आगे? इज़राइल की रूस से अपील और ईरान की "कोई लाइन नहीं बचेगी" वाली चेतावनी से साफ है कि युद्ध अब निर्णायक दौर में पहुंच गया है। 

- अगर रूस मध्यस्थता में सफल हुआ तो कुछ दिनों में युद्धविराम संभव। 

- अगर ईरान ने द्वीपों पर हमले का जवाब दिया तो फारस की खाड़ी पूरी तरह युद्ध का मैदान बन सकती है। 

- दुनिया की नजरें अब रूस पर टिकी हैं – क्या मॉस्को ईरान को रोक पाएगा या फिर यह आग पूरे क्षेत्र को जला डालेगी? 

     Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 13,2026 
March 12, 2026

ट्रंप का चौंकाने वाला बयान: "ऑयल की कीमतें बढ़ना हमारे लिए अच्छा है, अमेरिका खूब कमाई कर रहा है"

ट्रंप का चौंकाने वाला बयान: "ऑयल की कीमतें बढ़ना हमारे लिए अच्छा है, अमेरिका खूब कमाई कर रहा है"
-Friday World March 13,2026 
जबकि ईरान ने कहा, "हॉर्मुज़ स्ट्रेट अब खुलेगा नहीं!"

मिडिल ईस्ट में इज़राइल-अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की आग अब और भड़क गई है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुले आम कहा है कि ऑयल की बढ़ती कीमतें अमेरिका के लिए फायदेमंद हैं, क्योंकि इससे अमेरिका भारी कमाई कर रहा है। 

दूसरी तरफ ईरान के नए सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह मुजतबा खामेनेई ने पद संभालते ही अपना पहला बयान जारी किया और साफ चेतावनी दी – "हॉर्मुज़ स्ट्रेट अभी नहीं खुलेगा, अमेरिकी सैन्य अड्डे बंद करो वरना हमले जारी रहेंगे।" 

यह बयान ऐसे समय में आया है जब युद्ध की वजह से वैश्विक तेल व्यापार ठप होने की कगार पर है, जहाजों पर हमले हो रहे हैं, और भारत समेत कई देशों के जहाज खतरे में फंसे हैं। 

 मुजतबा खामेनेई का पहला बयान: 7 सबसे बड़ी बातें 

ईरान के सरकारी टीवी पर पढ़कर सुनाया गया यह संदेश बेहद सख्त और निर्णायक था। आयतुल्लाह मुजतबा खामेनेई ने कहा:

 1. मिडिल ईस्ट में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को तुरंत बंद किया जाए, वरना उन पर हमले जारी रहेंगे। 

2. ईरान अपने पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध चाहता है, लेकिन उनके यहां मौजूद अमेरिकी अड्डे ही निशाने पर हैं। 

3. दुश्मनों पर दबाव बनाने के लिए हॉर्मुज़ स्ट्रेट अभी बंद रहेगा – इसे खोलने का कोई इरादा नहीं।

 4. ईरान हर शहीद का खून का बदला लेगा – चाहे वह पूर्व सुप्रीम लीडर हों या हमलों में मारे गए बच्चे। 

5. ईरानी सेना का शुक्रिया – उनके बलिदान ने देश को विदेशी ताकतों के कब्जे और विभाजन से बचाया।

 6. युद्ध से प्रभावित लोगों के लिए आर्थिक और अन्य मदद की योजनाएं बनाई जा रही हैं।

 7. देश के लोग मतभेद भूलकर एकजुट रहें और इस मुश्किल वक्त का साथ मिलकर सामना करें। 

यह बयान ईरान की नई लीडरशिप की सख्त नीति को दर्शाता है। मुजतबा खामेनेई ने साफ कहा कि ईरान अब पीछे नहीं हटेगा और अमेरिका-इज़राइल को हर हमले की "भरपाई" करनी पड़ेगी। 

 ट्रंप का विवादित बयान: "ऑयल महंगा होना हमारे लिए अच्छा है" अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक इंटरव्यू में कहा: "ऑयल की कीमतें बढ़ रही हैं, और यह हमारे लिए अच्छी बात है। अमेरिका अब दुनिया का सबसे बड़ा ऑयल प्रोड्यूसर है। हम इससे खूब कमाई कर रहे हैं। हाई प्राइस से हमें फायदा हो रहा है।" 

ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में आया जब वैश्विक तेल की कीमतें 120-130 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं।

 → अमेरिका शेल ऑयल और अन्य घरेलू उत्पादन से लाभान्वित हो रहा है। 

→ लेकिन यूरोप, भारत, चीन जैसे आयातक देशों में महंगाई आसमान छू रही है। ट्रंप ने यह भी कहा कि "ईरान को सबक सिखाना जरूरी है, 


USS जेराल्ड फोर्ड पर आग: अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर में हादसा अमेरिकी नौसेना के सबसे आधुनिक विमानवाहक पोत **USS Gerald R. Ford** पर आग लगने की घटना ने दुनिया को चौंका दिया। 

→ यूएस सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बताया कि आग जहाज के मुख्य लॉन्ड्री एरिया में लगी। 

→ दो नाविक घायल हुए, लेकिन उनकी हालत स्थिर है। 

→ जहाज की प्रोपल्शन सिस्टम को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। 

→ अमेरिकी नौसेना ने साफ किया कि यह घटना किसी लड़ाई से जुड़ी नहीं है – यह एक आंतरिक हादसा था। 

→ फिर भी, युद्ध के बीच इतने बड़े जहाज पर आग लगना चिंता का विषय बना हुआ है। 

हॉर्मुज़ स्ट्रेट के पास भारत के 28 जहाज फंसे: सुरक्षा पर नजर भारत सरकार ने पुष्टि की है कि हॉर्मुज़ स्ट्रेट के आसपास **28 भारतीय जहाज** मौजूद हैं। 

→ इनमें से 24 जहाज स्ट्रेट के पश्चिमी हिस्से में हैं – 677 भारतीय नाविक सवार। 

→ 4 जहाज पूर्वी हिस्से में हैं – 101 भारतीय नाविक। 

→ शिपिंग मंत्रालय के अधिकारी राजेश कुमार सिंह ने कहा: 

"हमारी नजर हर जहाज और नाविक पर है। जरूरत पड़ने पर तत्काल सहायता दी जाएगी।" 

यह संख्या बताती है कि भारत का तेल आयात और निर्यात कितना खतरे में है। हॉर्मुज़ बंद होने से भारत में पेट्रोल-डीजल, गैस और अन्य आयातित सामान की कीमतें और बढ़ सकती हैं। 

रूस का ऑफर: भारत को LNG सप्लाई करने को तैयार रूसी राजदूत डेनिस अलीपोव ने कहा: "रूस भारत को लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) सप्लाई के लिए तैयार है। पहले भी करार हुए थे, लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों से रुक गए। अब हम वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं।" 

यह बयान ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब खाड़ी से गैस सप्लाई पर संकट मंडरा रहा है। 

 ईरान का 42वां हमला: 'ट्रू प्रॉमिस-4' ऑपरेशन ईरानी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि 'ट्रू प्रॉमिस-4' ऑपरेशन के तहत मिसाइलों और ड्रोनों का **42वां जत्था** छोड़ा गया। 

→ हमले का कोड: "लब्बैक या खामेनेई" 

→ इस्तेमाल की गई मिसाइलें: इमाद, कद्र, खैबर-शेकन, फतह 

→ निशाना: तेल अवीव और आसपास के अमेरिकी सैन्य अड्डे 

ईरान का कहना है कि यह हमला "शहीदों के बदले" के लिए था।

 वैश्विक प्रभाव: युद्ध अब अर्थव्यवस्था को निगल रहा है 

- तेल की कीमतें 130 डॉलर के पार – महंगाई का खतरा।

 - हॉर्मुज़ बंद होने से दुनिया का 20-25% तेल व्यापार रुक सकता है। 

- भारत में पहले से गैस, डेयरी, सिरेमिक उद्योग संकट में

 – अब तेल और गैस पर और मार। 

- बनासकांठा जैसे इलाकों में बटाटा निर्यात रुका – किसान घाटे में। 

- जहाजों पर हमले बढ़े – कच्छ के बंदरगाह प्रभावित। 

ट्रंप का "महंगा ऑयल अच्छा है" बयान और मुजतबा का "हॉर्मुज़ नहीं खुलेगा" ऐलान – दोनों तरफ से सख्त रुख। युद्ध अब सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक युद्ध में बदल चुका है। दुनिया की नजरें अब इस बात पर हैं कि क्या कोई बड़ा समझौता होगा या फिर यह आग और फैलेगी? 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 13,2026 
March 12, 2026

खाड़ी युद्ध की चपेट में बनासकांठा के किसान: बटाटे की निर्यात रुकने से भाव 100 रुपये के नीचे, मेहनत पर पानी फिरा, व्यापारी भी संकट में!

खाड़ी युद्ध की चपेट में बनासकांठा के किसान: बटाटे की निर्यात रुकने से भाव 100 रुपये के नीचे, मेहनत पर पानी फिरा, व्यापारी भी संकट में!
-Friday World March 13,2026
ईरान-इज़राइल युद्ध की आग अब गुजरात के बनासकांठा जिले तक पहुंच गई है। जहां कभी खाड़ी देशों में बटाटे की भारी मांग होती थी, वहां आज निर्यात पूरी तरह ठप है। नतीजा? बटाटे के भाव तह में पहुंच गए हैं – 100 रुपये प्रति क्विंटल के नीचे! किसानों की साल भर की मेहनत, खाद-बीज-मजदूरी का खर्चा और उम्मीदें – सब कुछ मिट्टी में मिलता नजर आ रहा है। व्यापारी भी बड़े पैमाने पर स्टॉक करके बैठे हैं, लेकिन बाजार में मांग न होने से उन्हें भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। 

 बनासकांठा: गुजरात का 'बटाटा का कटोरा', खाड़ी देशों का पसंदीदा बनासकांठा जिला गुजरात में बटाटा उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र है। यहां की मिट्टी, जलवायु और सिंचाई सुविधाओं की वजह से उच्च गुणवत्ता वाला बटाटा पैदा होता है, खासकर प्रोसेसिंग और निर्यात के लिए उपयुक्त। 

→ हर साल लाखों क्विंटल बटाटा यहां से खाड़ी देशों (यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कुवैत, कतर आदि) में निर्यात होता है।

 → सामान्य वर्षों में 35-40 लाख कट्टे (बोरियां) का निर्यात होता है। 

→ प्रोसेस्ड बटाटे (चिप्स, फ्रेंच फ्राइज़ के लिए) की सालाना 25 लाख कट्टे की निर्यात मात्रा होती है। 

किसानों को उम्मीद रहती है कि अच्छी फसल होने पर निर्यात से अच्छे दाम मिलेंगे। लेकिन इस बार ईरान-इज़राइल युद्ध ने पूरी तस्वीर बदल दी है। 

 युद्ध की वजह से निर्यात पर पूरी तरह ब्रेक खाड़ी क्षेत्र में युद्ध बढ़ने के बाद: 

→ समुद्री मार्ग (खासकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य) पर खतरा बढ़ गया। 

→ जहाजों पर हमले, बीमा प्रीमियम में भारी उछाल, कंटेनरों की उपलब्धता लगभग खत्म। 

→ कंटेनर किराया कई गुना बढ़ गया है। 

→ निर्यातक कंपनियां जोखिम नहीं लेना चाहतीं। नतीजा? बनासकांठा से खाड़ी देशों में बटाटे का निर्यात लगभग रुक गया है। 

→ पहले जहां रोजाना दर्जनों कंटेनर लोड होते थे, अब कंटेनर ही नहीं मिल रहे। 

→ जो कंटेनर मिल भी रहे हैं, उनका किराया 3-4 गुना हो गया है। 

→ निर्यात 50% से भी कम रह गया है। 

 भाव तह में: 100 रुपये के नीचे पहुंचे बटाटे 

स्थानीय मंडियों (पालनपुर, देesa, थराद आदि) में बटाटे की आवक बढ़ गई है, लेकिन मांग न के बराबर।

 → औसत भाव: 80-100 रुपये प्रति क्विंटल (कुछ जगह 60-70 रुपये तक गिर गए)। 

→ उत्पादन लागत (खाद, बीज, मजदूरी, बिजली, पानी) औसतन 150-200 रुपये प्रति क्विंटल होती है। 

→ यानी किसान को प्रति क्विंटल 50-100 रुपये का घाटा हो रहा है।

 किसानों का कहना है: "साल भर मेहनत की, कुदरत ने भी साथ दिया, लेकिन युद्ध ने सब बर्बाद कर दिया। अब तो मजदूरी भी नहीं निकल रही।" 

व्यापारियों पर भी दोहरा संकट 

बटाटा व्यापारी और कोल्ड स्टोरेज मालिक भी बुरी तरह फंसे हैं: 

→ उन्होंने अग्रिम में किसानों से ऊंचे दाम पर बटाटा खरीदा और कोल्ड स्टोरेज में रखा। 

→ निर्यात रुकने से स्टॉक पड़ा है, लेकिन बाजार में भाव गिरते जा रहे हैं। 

→ अगर युद्ध लंबा चला तो लाखों-करोड़ों का नुकसान तय है।

देesa के एक प्रमुख व्यापारी ने बताया: 

"हर साल 8 हजार कंटेनर में निर्यात होता था। इस बार अभी तक 50% भी नहीं हुआ। कंटेनर नहीं मिल रहे, मिल भी रहे हैं तो किराया बहुत ज्यादा है। स्टॉक पड़ा है, भाव गिर रहे हैं – नुकसान बहुत बड़ा होने वाला है।" 

किसानों और व्यापारियों की एक ही उम्मीद: युद्ध जल्द खत्म हो 

अभी सबकी नजरें खाड़ी क्षेत्र की स्थिति पर टिकी हैं। 

→ अगर जल्दी शांति स्थापित हुई और समुद्री मार्ग सुरक्षित हुए, तो निर्यात फिर शुरू हो सकता है। 

→ भाव में सुधार हो सकता है।

 → लेकिन अगर युद्ध लंबा खिंचा तो: 

- किसानों को भारी घाटा - व्यापारियों का दिवालिया होना 

- कोल्ड स्टोरेज में सड़ने का खतरा 

- अगले साल बुआई में कमी 

सरकार से अपील: तत्काल हस्तक्षेप जरूरी किसान संगठन और व्यापारी मंडल सरकार से मांग कर रहे हैं: 

→ निर्यात प्रोत्साहन योजना तुरंत लागू करें।

 → वैकल्पिक बाजार (दक्षिण भारत, पूर्वी देशों) में निर्यात के लिए मदद। 

→ MSP या बफर स्टॉक में बटाटा खरीद की व्यवस्था।

 → कोल्ड स्टोरेज सब्सिडी बढ़ाएं। 

युद्ध की कीमत किसान चुकाएंगे? बनासकांठा के किसान कहते हैं: "हमने तो सिर्फ खेती की थी, युद्ध हमने नहीं किया। फिर भी हमें ही सजा मिल रही है।" यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर कितनी दूर तक पहुंचता है – गांव-गांव तक, खेत-खेत तक। 

अगर युद्ध जल्दी खत्म नहीं हुआ, तो बनासकांठा के बटाटा किसान इस सीजन में सबसे बड़ा नुकसान उठाने वाले होंगे। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 13,2026
March 12, 2026

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आग: ईरान के हमले में कच्छ के कंडला-मुंद्रा जाने वाले दो जहाज क्षतिग्रस्त,

हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में आग: ईरान के हमले में कच्छ के कंडला-मुंद्रा जाने वाले दो जहाज क्षतिग्रस्त,
-Friday World March 13,2026
मिडिल ईस्ट में इज़राइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव अब समुद्री मार्गों तक पहुंच गया है। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ – दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और व्यापारिक गलियारों में से एक – अब खतरे की चपेट में आ गया है। ईरान ने इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर सख्त प्रतिबंध लगाए हैं और यूरोपीय, अमेरिकी तथा उनके सहयोगी देशों के जहाजों को निशाना बनाया जा रहा है। इसी क्रम में बुधवार को गुजरात के कच्छ जिले के कंडला और मुंद्रा बंदरगाह की ओर जा रहे दो बड़े कार्गो जहाजों पर मिसाइल हमले हुए, जिससे पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई है। 

 थाईलैंड का 'मयूरी नारी' जहाज: कंडला की ओर बढ़ते हुए दो मिसाइलों का शिकार यूएई के खलीफा पोर्ट से कंडला पोर्ट के लिए रवाना हुआ थाई ध्वज वाला कार्गो जहाज **मयूरी नारी** बुधवार को हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य के नजदीक दो मिसाइल हमलों का शिकार बन गया। 

→ रॉयल थाई नेवी ने आधिकारिक बयान में कहा कि जहाज यूएई से निकलने के कुछ समय बाद ही हमला हुआ। 

→ दोनों मिसाइलें जहाज की वॉटरलाइन पर लगीं, जिससे जहाज के पिछले हिस्से और इंजन रूम में धमाके हुए और आग लग गई। 

→ आग इतनी भयंकर थी कि स्थिति गंभीर हो गई, लेकिन अच्छी खबर यह रही कि आग पर काबू पा लिया गया। 

→ ओमान नेवी ने तुरंत रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया। 

→ कुल 23 क्रू मेंबर्स में से 20 को सुरक्षित बचाया गया, जबकि 2-3 सदस्य लापता बताए जा रहे हैं। 

→ जहाज की पहचान इंटरनेशनल मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन के नंबर से की गई। यह जहाज कंडला पोर्ट पर बर्थिंग के लिए तैयार था और इसमें 18 हजार टन नॉन-बासमती चावल लोड था, जो मोज़ाम्बिक के लिए निर्यात होने वाला था। हमले के कारण इस शिपमेंट में 5-6 दिनों का विलंब हो गया है। अब दूसरा जहाज बुक करना पड़ेगा, जिससे शिपिंग चार्जेस में भारी बढ़ोतरी होगी। 

 जापान का 'वन मैजेस्टी' जहाज: मुंद्रा की ओर बढ़ते हुए 10 सेमी का छेद दूसरे हमले में जेबेल अली से मुंद्रा पोर्ट की ओर जा रहा जापानी कंटेनर जहाज **वन मैजेस्टी** (Mitsui O.S.K. Lines और Ocean Network Express द्वारा संचालित) भी निशाना बना। 
→ हमला स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से मात्र 97 किलोमीटर दूर हुआ। 

→ वेसल ट्रैकर डॉट कॉम के अनुसार जहाज में 10 सेंटीमीटर का छेद हो गया। 

→ जहाज में पानी भरने, आग लगने या ऑयल लीक जैसी कोई गंभीर समस्या नहीं आई। 

→ सभी क्रू मेंबर्स सुरक्षित हैं और जहाज को सुरक्षित लंगर करा दिया गया। 

→ कंपनी ने संबंधित पक्षों के साथ मिलकर हमले के कारणों की जांच शुरू कर दी है। 

 ईरान का सख्त रुख: हॉर्मुज़ स्ट्रेट में प्रतिबंध और हमले ईरान ने इज़राइल-अमेरिका के साथ चल रहे युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ पर कड़ा प्रतिबंध लगाया है। 

→ इस जलडमरूमध्य से दुनिया का 20-25% तेल और बड़ा हिस्सा व्यापारिक माल गुजरता है। 

→ ईरान ने घोषणा की है कि अमेरिका, इज़राइल और उनके सहयोगी देशों के जहाजों को निशाना बनाया जाएगा। 

→ अमेरिकी नेवी ने चार जहाजों को हॉर्मुज़ से बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन ईरान ने उन पर हमला कर दिया। 

→ इनमें से एक जहाज कंडला पोर्ट के लिए था। 

गुजरात पर असर: चावल निर्यात में बड़ा झटका, आयात-निर्यात पर मंडराता संकट गांधीधाम से मिली जानकारी के अनुसार: 

→ मयूरी नारी जहाज में 18 हजार टन चावल था, जो मोज़ाम्बिक जा रहा था। 

→ हमले के कारण निर्यात में देरी हुई है। 

→ नए जहाज की बुकिंग में 5-6 दिन लगेंगे। 

→ शिपिंग रेट्स में भारी उछाल आएगा, जिससे आयातक-निर्यातकों को आर्थिक नुकसान होगा। 

→ खास बात यह कि इस जहाज के मालिक आयरलैंड स्थित क्रिशियर्स शिपिंग कंपनी के हैं, जिनके मालिक किरिट शाह कच्छ के मूल निवासी हैं। 

 वैश्विक व्यापार पर खतरा: हॉर्मुज़ बंद होने की आशंका 

हॉर्मुज़ स्ट्रेट अगर पूरी तरह बंद हो गया तो:

  तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। 

 भारत जैसे देशों में पेट्रोल-डीजल, गैस और अन्य आयातित वस्तुओं के दाम बढ़ेंगे। 

 कंडला और मुंद्रा जैसे बड़े बंदरगाहों पर जहाजों का आवागमन प्रभावित होगा। 

 पहले से ही गैस की कमी से डेयरी, सिरेमिक और अन्य उद्योग प्रभावित हैं, अब समुद्री मार्ग भी खतरे में है। 

यह घटना साफ दिखाती है कि मिडिल ईस्ट का युद्ध अब सिर्फ स्थानीय नहीं रहा – यह वैश्विक व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और भारत जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर रहा है। गुजरात के निर्यातकों, खासकर कच्छ क्षेत्र के व्यापारियों के लिए यह बड़ा झटका है। स्थिति पर नजर रखनी होगी, क्योंकि अगर ईरान का रुख और सख्त हुआ तो समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद हो सकता है।

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 13,2026
March 12, 2026

International Quds Day: A Global Symbol of Palestine's Freedom – Imam Khomeini's Visionary Declaration and Its Enduring Legacy

International Quds Day: A Global Symbol of Palestine's Freedom – Imam Khomeini's Visionary Declaration and Its Enduring Legacy-Friday World March 13, 2026
The last Friday of the blessed month of Ramadan is observed by Muslims worldwide as a special and powerful day known as Yaum al-Quds (International Quds Day).

 This is not merely a single day of observance; it is a worldwide call for awakening, unity, and justice. 

In Arabic, "Yaum al-Quds" literally means "the Day of Al-Quds" (Jerusalem). 

 It is dedicated to the liberation of the Palestinian people, especially the freedom of Al-Quds (Jerusalem), and stands as a global symbol of resistance against the Zionist occupation. This day carries a strong message for the entire Muslim Ummah: 

To stand firmly against oppression, 

 To support the oppressed (mazloom),

  To refuse to bow before the arrogant powers (mustakbireen). 

 It was initiated by Imam Ruhollah Khomeini (Rahbar-e-Moazzam Ayatollah Imam Khomeini) and has today become the largest organized platform of solidarity with Palestine across the globe. 

→ Imam Khomeini’s Historic Declaration: The Moment of 1979 Shortly after the victory of the Islamic Revolution in Iran, on 7 August 1979 (Ramadan 1399 Hijri), Imam Khomeini issued a historic decree. 

 He appealed to Muslims around the world to designate the last Friday of the holy month of Ramadan as "Al-Quds Day". 

 Key excerpt from his declaration (translated):
"I call upon all Muslims of the world to designate the last Friday of the holy month of Ramadan – which is a decisive period and can determine the fate of the Palestinian people – as 'Quds Day' and, through a ceremony, demonstrate the solidarity of Muslims worldwide in support of the legitimate rights of the Muslim people of Palestine." 

  This announcement came at a time when Israel was carrying out attacks on southern Lebanon and intensifying oppression against Palestinians. 

 Imam Khomeini did not limit it to Palestine alone. 

 He declared: "Al-Quds Day is not only the day of Palestine; it is the day of all the oppressed of the world who rise against the oppressors." 

 He transformed it into a global platform against arrogant powers (mustakbireen) and their domination. 

 Why the Last Friday of Ramadan Was Chosen Ramadan is the holiest month for Muslims – a time of fasting, worship, recitation of the Qur’an, and peak spiritual unity. 

 The last Friday (Jumma-tul-Wida / Alvida Jumma) was selected for several profound reasons: 

 Peak of spiritual strength and worship – ideal for resistance and unity. 

 After Friday prayers, massive processions and rallies can be organized easily and powerfully. 

 Imam Khomeini stated that this month can become decisive for the fate of Palestinians because Muslim unity reaches its highest level during Ramadan. 

 It provides the perfect opportunity for global awakening, as Muslims across continents are spiritually connected at the same time.

  Deep Significance and Objectives of Yaum al-Quds This day is linked to multiple great purposes: 

 Liberation of Al-Quds (Jerusalem) – the third holiest city in Islam, home to Masjid al-Aqsa and the sacred precincts. 

 In 1967, Israel illegally occupied East Jerusalem – this day stands as a direct challenge to that occupation. 

 Resistance against Zionism and Israeli atrocities – oppression of Palestinians, threats to Masjid al-Aqsa, and illegal settlements. 

 Global solidarity with all oppressed people – according to Imam Khomeini, this day belongs to the mazloom of the entire world (Kashmir, Yemen, Afghanistan, and beyond). 

 It is not merely an Arab-Islamic issue; it is a universal struggle for justice. 

 Strengthening Islamic Ummah unity – uniting Muslims to stand strong before tyrants. 

 International protest – massive government-organized marches in Iran, and rallies in Europe, America, Asia, Africa, and even India. 

 How Yaum al-Quds is Observed Worldwide The day is marked with immense zeal and passion across the globe: 

 Massive processions immediately after Friday prayers – millions take to the streets.

  Slogans and banners – "Death to Israel", "Death to America", "Palestine will be free", burning of Israeli and American flags. 

 Speeches and messages – In Iran, the Supreme Leader (currently Ayatollah Ali Khamenei) delivers a special address; scholars and leaders speak worldwide. 

 Rallies and demonstrations – from Tehran to London, New York, Delhi, Karachi, Istanbul, and many other cities. 

 Media and social media campaigns – posters, videos, hashtags (#QudsDay, #YaumAlQuds) spread awareness rapidly. 

 Yaum al-Quds in 2026: A Rare and Special Occasion As of March 2026, the holy month of Ramadan is underway. 

 This year, Ramadan contains 5 Fridays – a rare occurrence after 26 years. 

 The last Friday (Alvida Jumma) is expected on 13 March or 20 March 2026 (depending on moon sighting). 

 This makes Yaum al-Quds even more powerful, as the unity and strength of the Ummah will be at its peak. 

 Imam Khomeini’s Vision Remains Alive Today Imam Khomeini turned the Palestinian cause from a local issue into a global struggle for justice.

  He stated: "The existence of Zionist Israel is a danger to Muslims, and the struggle will continue until its liberation." 

 Today, as atrocities continue in Gaza, Yaum al-Quds remains a ray of hope for the oppressed. 

 This day reminds us: No tyranny can survive in the face of unity. 

 Palestine will be free. 

 Al-Quds will be liberated! 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World March 13, 2026 


March 12, 2026

यवम अल-कुद्स: फिलिस्तीन की आजादी का वैश्विक प्रतीक – इमाम खुमैनी की दूरदर्शी घोषणा और इसकी अमिट विरासत

यवम अल-कुद्स: फिलिस्तीन की आजादी का वैश्विक प्रतीक – इमाम खुमैनी की दूरदर्शी घोषणा और इसकी अमिट विरासत-Friday World March 13,2026
माहे रमज़ान उल मुबारक के आखिरी जुम्मे को दुनिया भर के मुसलमान एक खास दिन के रूप में मनाते हैं – यूम अल-कुद्स (Yaum al-Quds) या इंटरनेशनल कुद्स डे। यह सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि एक वैश्विक जागृति, एकजुटता और न्याय की पुकार है। अरबी में "यूम अल-कुद्स" का मतलब है "अल-कुद्स (बैतूल मुकद्दस) का दिन"। यह दिन फिलिस्तीनी भाइयों-बहनों की आजादी के लिए, खासकर अल-कुद्स (बैतूल मुकद्दस) की मुक्ति और ज़ायोनी कब्जे के खिलाफ दुनिया भर में विरोध जताने का प्रतीक बन चुका है। 

यह दिन मुस्लिम उम्माह के लिए एक मजबूत संदेश है – उत्पीड़न के खिलाफ खड़े होने का, मजलूमों का साथ देने का और अत्याचारियों (मुस्तकबिरीन) के सामने झुकने से इनकार करने का। इमाम रुहोल्लाह खुमैनी (रहबर-ए-मोअज्जम आयतुल्लाह इमाम खुमैनी) ने इसे शुरू किया, और आज यह दुनिया भर में फिलिस्तीन समर्थन का सबसे बड़ा संगठित मंच है। 

इमाम खुमैनी की ऐतिहासिक घोषणा: 1979 का वह क्षण ईरान में इस्लामी क्रांति की जीत के महज कुछ महीनों बाद, 7 अगस्त 1979 (रमज़ान 1399 हिजरी) को इमाम खुमैनी ने एक ऐतिहासिक फरमान जारी किया। उन्होंने दुनिया भर के मुसलमानों से अपील की कि वे रमज़ान के आखिरी जुम्मे को "अल-कुद्स डे" के रूप में मनाएं। उनकी घोषणा का मुख्य अंश कुछ इस प्रकार है: 
"मैं दुनिया भर के मुसलमानों से अपील करता हूं कि वे रमज़ान के पवित्र महीने की आखिरी जुम्मा को 'अल-कुद्स डे' के रूप में चुनें – जो खुद एक निर्णायक अवधि है और फिलिस्तीनी लोगों के भाग्य का निर्धारक भी बन सकती है – और दुनिया भर के मुसलमानों की एकजुटता दिखाते हुए एक समारोह के माध्यम से फिलिस्तीन के मुस्लिम लोगों के वैध अधिकारों के समर्थन की घोषणा करें।" 

यह घोषणा तब आई जब इज़राइल दक्षिणी लेबनान पर हमले कर रहा था और फिलिस्तीनियों पर अत्याचार बढ़ रहे थे। इमाम खुमैनी ने इसे सिर्फ फिलिस्तीन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने कहा: "अल-कुद्स डे सिर्फ फिलिस्तीन का नहीं, बल्कि दुनिया के सभी उत्पीड़ितों (मजलूमों) का दिन है जो अत्याचारियों के खिलाफ विरोध जताते हैं।" उन्होंने इसे वैश्विक स्तर पर मुस्तकबिरीन (अरोगेंट पावरों) के खिलाफ संघर्ष का मंच बनाया। 

 क्यों चुना गया रमज़ान का आखिरी जुम्मा? रमज़ान मुसलमानों के लिए सबसे पवित्र महीना है – रोज़ा, इबादत, कुरान तिलावत और एकजुटता की भावना यहां चरम पर होती है। आखिरी जुम्मा (शुक्रवार) को चुनने के पीछे कई कारण थे: 

- पवित्रता और इबादत का चरम: रमज़ान में मुसलमानों की आध्यात्मिक शक्ति सबसे ज्यादा होती है, जो विरोध और एकजुटता के लिए आदर्श समय है। 

- जुमे की नमाज के बाद जुलूस: जुमे की नमाज के बाद बड़े पैमाने पर रैलियां निकालना आसान और प्रभावशाली होता है।

 - फिलिस्तीनी भाग्य का निर्धारक: इमाम खुमैनी ने कहा कि यह महीना फिलिस्तीनी लोगों के भाग्य को बदल सकता है, क्योंकि इसमें उम्माह की एकता सबसे मजबूत होती है। 

- वैश्विक जागृति: रमज़ान में दुनिया भर के मुसलमान एक साथ होते हैं, जो एक वैश्विक आवाज उठाने के लिए सबसे उपयुक्त है। 

यवम अल-कुद्स का गहरा महत्व और उद्देश्य यह दिन सिर्फ फिलिस्तीन की आजादी का नहीं, बल्कि कई बड़े उद्देश्यों से जुड़ा है:

 - अल-कुद्स (यरुशलम) की मुक्ति: इस्लाम में यरुशलम तीसरा सबसे पवित्र शहर है। यहां मस्जिद अल-अक्सा और कुद्स शरीफ स्थित हैं। 1967 के युद्ध में इज़राइल ने पूर्वी यरुशलम पर कब्जा कर लिया। यह दिन उस कब्जे के खिलाफ विरोध का प्रतीक है।

 - ज़ायोनिज्म और इज़राइल के अत्याचारों के खिलाफ: फिलिस्तीनियों पर दमन, मस्जिद अल-अक्सा पर खतरा और अवैध कब्जे के खिलाफ आवाज उठाना। 

- वैश्विक एकजुटता और मजलूमों का साथ: इमाम खुमैनी के अनुसार, यह दिन दुनिया भर के उत्पीड़ितों (जैसे कश्मीर, यमन, अफगानिस्तान आदि) के लिए भी है। यह सिर्फ अरब-इस्लामी मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय का संघर्ष है। 

- इस्लामी उम्माह की एकता: मुसलमानों को एकजुट कर अत्याचारियों के सामने मजबूत खड़े होने का संदेश। 

- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध: ईरान में सरकारी स्तर पर बड़े जुलूस होते हैं, लेकिन यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और भारत समेत कई देशों में रैलियां निकलती हैं। 

कैसे मनाया जाता है यूम अल-कुद्स? यह दिन दुनिया भर में उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है: 

- जुमे की नमाज के बाद जुलूस: जुमे की नमाज के बाद लाखों लोग सड़कों पर उतरते हैं।

 - नारे और बैनर: "मौत इज़राइल", "मौत अमेरिका", "फिलिस्तीन आजाद होगा" जैसे नारे लगते हैं। इज़राइली और अमेरिकी झंडे जलाए जाते हैं। 

- भाषण और संदेश: ईरान में सुप्रीम लीडर (अभी आयतुल्लाह अली खामेनेई) विशेष संदेश जारी करते हैं। दुनिया भर में उलेमा और नेता भाषण देते हैं। 

- रैलियां और प्रदर्शन: तेहरान से लेकर लंदन, न्यूयॉर्क, दिल्ली, कराची, इस्तांबुल तक – हर जगह विरोध प्रदर्शन। 

- मीडिया और सोशल मीडिया: पोस्टर, वीडियो, हैशटैग (#QudsDay, #YaumAlQuds) से जागृति फैलाई जाती है। 

2026 में यूम अल-कुद्स: एक खास मौका वर्तमान समय (मार्च 2026) में रमज़ान चल रहा है। इस साल रमज़ान में 5 जुम्मे पड़ रहे हैं, जो 26 साल बाद दुर्लभ संयोग है। आखिरी जुम्मा (अलविदा जुमा) 13 मार्च या 20 मार्च को पड़ सकता है (चांद दिखने पर निर्भर)। यह यूम अल-कुद्स के लिए और भी खास बनाता है, क्योंकि उम्माह की एकता और विरोध की ताकत ज्यादा मजबूत होगी।

 इमाम खुमैनी की दूरदर्शिता आज भी जीवित इमाम खुमैनी ने फिलिस्तीनी मुद्दे को सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक न्याय का मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा था कि "ज़ायोनी इज़राइल का अस्तित्व मुसलमानों के लिए खतरा है, और इसकी मुक्ति तक संघर्ष जारी रहेगा।" आज जब गाजा में अत्याचार जारी हैं, यूम अल-कुद्स मजलूमों की उम्मीद की किरण है।

 यह दिन हमें याद दिलाता है – एकजुटता से कोई भी अत्याचार टिक नहीं सकता। फिलिस्तीन आजाद होगा, अल-कुद्स मुक्त होगा!

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World March 13,2026