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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Tuesday, 3 February 2026

February 03, 2026

मध्य पूर्व का अस्तित्व खतरे में: अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो क्या होगा?

मध्य पूर्व का अस्तित्व खतरे में: अमेरिका ईरान पर हमला करेगा तो क्या होगा?
-फ्राइडे वर्ल्ड 4/2/2026 
अमेरिका ईरान पर हमला क्यों नहीं कर रहा? होर्मुज का ताला और विश्व की आर्थिक तबाही" 

मध्य पूर्व की राजनीति में आज एक अजीब स्थिति है – अमेरिका के पास दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, लेकिन ईरान जैसे देश पर अब तक पूर्ण पैमाने पर सीधा हमला नहीं किया गया। भले ही ट्रंप प्रशासन ने धमकियां दी हों, भले ही जून 2025 में इजराइल के साथ मिलकर ईरान की न्यूक्लियर साइट्स (फोर्डो, नतांज और इस्फहान) पर हमले किए गए हों (ऑपरेशन मिडनाइट हैमर), लेकिन पूर्ण युद्ध अभी तक टाला जा रहा है। इसका मुख्य कारण है ईरान की जवाबी कार्रवाई की क्षमता और उसके परिणामों का डर। 

ईरान के पास हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें, ड्रोन और असिमेट्रिक युद्ध की मजबूत क्षमता है।

 अमेरिका के मध्य पूर्व में 8-10 प्रमुख बेस हैं – जैसे कतर का अल उदैद एयर बेस (सबसे बड़ा, 10,000+ अमेरिकी सैनिक), बहरीन में नेवल सपोर्ट एक्टिविटी (फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय), जॉर्डन का मुवाफ्फक सल्ती, कुवैत और सऊदी अरब में अन्य बेस। जून 2025 में ईरान ने अल उदैद पर मिसाइल हमला किया था – हालांकि बड़े नुकसान नहीं हुए, लेकिन यह दिखाता है कि ईरान की पहुंच है और वह जवाब दे सकता है।

 ईरान के IRGC (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स) के अधिकारी कहते हैं कि अमेरिका के ये बेस "शक्ति नहीं, बल्कि सबसे बड़ी कमजोरी" हैं। अगर अमेरिका हमला करे तो ईरान इन बेस पर मिसाइल-ड्रोन हमले कर सकता है, जिसमें अमेरिकी सैनिकों की जान खतरे में पड़ सकती है। यह डर अमेरिका को पूर्ण युद्ध से रोकता है – क्योंकि युद्ध शुरू हुआ तो यह "क्षेत्रीय युद्ध" में बदल जाएगा, जिसमें इजराइल, हिज्बुल्लाह, हूती और अन्य प्रॉक्सी ग्रुप शामिल हो जाएंगे। लेकिन सबसे बड़ा डर है 

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज। 
यह संकरी चैनल दुनिया के 20% तेल और बड़े हिस्से के LNG से गुजरती है। ईरान इसे "बंद" कर सकता है – माइंस, स्पीडबोट्स, सबमरीन्स और क्रूज मिसाइलों से। पूर्ण ब्लॉकेज न हो तो भी कुछ हमलों से शिपिंग रुक सकती है, इंश्योरेंस रेट्स बढ़ सकते हैं और तेल के दाम $10-20 प्रति बैरल तक उछल सकते हैं। विश्व स्तर पर महंगाई, मंदी और आर्थिक हाहाकार मच सकता है। चीन, भारत, जापान जैसे देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि उनका बड़ा तेल इसी रूट से आता है।

 यमन के लाल सागर में हूतियों ने पहले ही शिपिंग पर हमले किए हैं – जिससे रूट बदलने पड़े और खर्च बढ़ा।

 अगर होर्मुज बंद हुआ तो यह समस्या वैश्विक स्तर पर पहुंच जाएगी। सऊदी अरब, UAE जैसे देश भी प्रभावित होंगे, क्योंकि उनका तेल एक्सपोर्ट इसी रूट पर निर्भर है। इजराइल के अस्तित्व पर भी खतरा बढ़ेगा। ईरान के प्रॉक्सी (हिज्बुल्लाह, हमास के अवशेष) और आक्रामक हो सकते हैं। अमेरिका इजराइल की रक्षा के लिए ज्यादा संसाधन खर्च करेगा, लेकिन इससे विश्व स्तर पर अस्थिरता बढ़ेगी।

 आखिरकार, अमेरिका ईरान पर हमला नहीं कर रहा क्योंकि यह "कम लागत, ज्यादा प्रभाव" वाला नहीं है।

 युद्ध हुआ तो अमेरिकी सैनिक मरेंगे, बेस नष्ट होंगे, तेल के दाम आसमान छू लेंगे और विश्व अर्थव्यवस्था तबाह हो जाएगी। ईरान भी जानता है कि उसके तेल एक्सपोर्ट आधारित अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा, लेकिन "एस इन द होल" के रूप में होर्मुज का इस्तेमाल करके वह डिटरेंस बनाए रखता है। 

यह "डर की दीवार" है जो अब तक युद्ध को रोक रही है। लेकिन अगर कोई गलती हुई – एक गलतफहमी, एक अचानक हमला – तो यह दीवार टूट जाएगी और मध्य पूर्व के साथ पूरा विश्व हाहाकार में डूब जाएगा। 
सज्जाद अली नयानी ✍
 फ्राइडे वर्ल्ड 4/2/2026 

February 03, 2026

મધ્ય પૂર્વનું અસ્તિત્વ જોખમમાં: અમેરિકા ઈરાન પર હુમલો કરશે તો શું થશે? "ડરની દીવાલ: અમેરિકા ઈરાન પર હુમલો કેમ નથી કરતું?

મધ્ય પૂર્વનું અસ્તિત્વ જોખમમાં: અમેરિકા ઈરાન પર હુમલો કરશે તો શું થશે? "ડરની દીવાલ: અમેરિકા ઈરાન પર હુમલો કેમ નથી કરતું? 
-Friday world 3/2/2026
મધ્ય પૂર્વની રાજનીતિમાં આજે એક અજીબ વાત છે – અમેરિકા પાસે વિશ્વની સૌથી મોટી સૈન્ય શક્તિ છે, પરંતુ ઈરાન જેવા દેશ પર સીધો હુમલો કરવામાં હજુ સુધી આગળ વધ્યું નથી. ભલે ટ્રમ્પ પ્રશાસને ધમકીઓ આપી હોય, ભલે ઈઝરાયલ સાથે મળીને ન્યુક્લિયર સાઈટ્સ પર હુમલા કર્યા હોય (જૂન 2025માં), પણ પૂર્ણ-સ્કેલ યુદ્ધ ટાળવામાં આવે છે. આનું મુખ્ય કારણ છે 

– ઈરાનની રિટાલિએશન ક્ષમતા અને તેના પરિણામોનો ડર

 ઈરાન પાસે હજારો બેલિસ્ટિક મિસાઈલ્સ, ડ્રોન્સ અને અસિમેટ્રિક યુદ્ધની ક્ષમતા છે. અમેરિકાના મધ્ય પૂર્વમાં 8-10 મુખ્ય બેઝ છે – જેમ કે કતારનું **અલ ઉદેઈદ એર બેઝ** (સૌથી મોટું, 10,000+ અમેરિકન સૈનિકો), બહેરીનમાં નેવલ સપોર્ટ એક્ટિવિટી (ફિફ્થ ફ્લીટનું હેડક્વાર્ટર્સ), જોર્ડનનું મુવાફ્ફક સલ્તી, કુવૈત અને સાઉદી અરેબિયામાં અન્ય બેઝ. ઈરાને 2025માં જ અલ ઉદેઈદ પર મિસાઈલ હુમલો કર્યો હતો – જોકે મોટા નુકસાન વિના, પણ આ દર્શાવે છે કે ઈરાન પાસે રીચ છે.

 ઈરાનના IRGC (ઈસ્લામિક રેવોલ્યુશનરી ગાર્ડ કોર્પ્સ)ના અધિકારીઓ કહે છે કે અમેરિકાના આ બેઝ "શક્તિ નહીં, પણ સૌથી મોટી કમજોરી" છે. જો અમેરિકા હુમલો કરે તો ઈરાન આ બેઝ પર મિસાઈલ-ડ્રોન હુમલા કરી શકે છે, જેમાં અમેરિકન સૈનિકોના જીવન જોખમમાં આવે. આ ડર અમેરિકાને પૂર્ણ યુદ્ધથી રોકે છે – કારણ કે એક વાર યુદ્ધ શરૂ થાય તો તે "રીજનલ વોર"માં ફેરવાઈ જશે, જેમાં ઈઝરાયલ, હિઝબુલ્લાહ, હૌથી અને અન્ય પ્રોક્સી ગ્રુપ્સ સામેલ થઈ જશે. પણ સૌથી મોટો ડર છે

 – સ્ટ્રેટ ઓફ હોર્મુઝ. આ સાંકડી ચેનલ પરથી વિશ્વના 20% તેલ અને મોટા ભાગનું LNG પસાર થાય છે. ઈરાન આને "બંધ" કરી શકે છે – માઈન્સ, સ્પીડબોટ્સ, સબમરીન્સ અને ક્રુઝ મિસાઈલ્સથી. પૂર્ણ બ્લોકેજ ન થાય તો પણ થોડા હુમલાઓથી શિપિંગ રોકાઈ જાય, ઈન્શ્યોરન્સ રેટ્સ વધે અને તેલના ભાવમાં $10-20 પ્રતિ બેરલનો ઉછાળો આવે. વિશ્વભરમાં ઈન્ફ્લેશન, રિસેશન અને આર્થિક હાહાકાર થઈ જાય. ચીન, ભારત, જાપાન જેવા દેશો સૌથી વધુ અસરગ્રસ્ત થાય, કારણ કે તેમનું મોટું તેલ આ પાસેથી આવે છે. 

યમનના લાલ સમુદ્રમાં હૌથીઓએ પહેલેથી જ શિપિંગ પર હુમલા કર્યા છે – જેનાથી શિપિંગ રૂટ્સ બદલવા પડ્યા અને ખર્ચ વધ્યો. જો હોર્મુઝ બંધ થાય તો આ સમસ્યા ગ્લોબલ લેવલ પર પહોંચી જશે. સાઉદી અરેબિયા, UAE જેવા દેશો પણ અસરગ્રસ્ત થશે, કારણ કે તેમનું તેલ એક્સપોર્ટ આ રૂટ પર આધારિત છે. 

ઈઝરાયલના અસ્તિત્વ પર પણ ખતરો વધી જશે. ઈરાનના પ્રોક્સીઝ (હિઝબુલ્લાહ, હમાસ અને યમન ના હુથી) વધુ આક્રમક બની શકે છે. અમેરિકા ઈઝરાયલનું રક્ષણ કરવા માટે વધુ સંસાધનો ખર્ચ કરશે, પણ તેનાથી વિશ્વભરમાં અસ્થિરતા વધશે. 

આખરે, અમેરિકા ઈરાન પર હુમલો નથી કરતું કારણ કે તે "લો-કોસ્ટ, હાઈ-ઈમ્પેક્ટ" નથી. યુદ્ધ થાય તો અમેરિકન સૈનિકો મરશે, બેઝ નાશ પામશે, તેલના ભાવ આકાશમાં પહોંચશે અને વિશ્વ અર્થતંત્ર તબાહ થઈ જશે. ઈરાન પણ જાણે છે કે પોતાના તેલ એક્સપોર્ટ પર આધારિત અર્થતંત્રને નુકસાન થશે, પણ "એસ ઈન ધ હોલ" તરીકે હોર્મુઝને વાપરીને તે ડિટરન્સ બનાવે છે.

 આ ડરની દીવાલ છે જે અત્યાર સુધી યુદ્ધને રોકી રાખે છે. પણ જો કોઈ ભૂલ થાય – એક ગેરસમજ, એક અચાનક હુમલો – તો આ દીવાલ તૂટી જશે અને મધ્ય પૂર્વ સાથે સમગ્ર વિશ્વ હાહાકારમાં ડૂબી જશે. 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 3/2/2026
February 03, 2026

मोसाद: इंटेलिजेंस एजेंसी या ग्लोबल ब्लैकमेल सिंडिकेट? एपस्टीन से अब्राहम अकॉर्ड तक की साजिशों का जाल

मोसाद: इंटेलिजेंस एजेंसी या ग्लोबल ब्लैकमेल सिंडिकेट? एपस्टीन से अब्राहम अकॉर्ड तक की साजिशों का जाल
-Friday world 3/2/2026
दुनिया की सबसे रहस्यमयी इंटेलिजेंस एजेंसियों में से एक, इजराइल की मोसाद, को अक्सर जासूसी के मास्टरमाइंड के रूप में देखा जाता है। लेकिन क्या यह सिर्फ एक राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी है, या इससे कहीं ज्यादा – एक अंतरराष्ट्रीय ब्लैकमेल ग्रुप जो ह्यूमन ट्रैफिकिंग, हनीट्रैप और सेक्स स्कैंडल्स के जरिए दुनिया के ताकतवर लोगों को अपने जाल में फंसाता है? जेफ्री एपस्टीन जैसे कुख्यात नामों के साथ जुड़े सिद्धांतों ने इस बहस को नई हवा दी है। एपस्टीन की मौत के बाद उठे सवाल, बड़े नामों का छिपाया जाना, और अब्राहम अकॉर्ड जैसे राजनीतिक समझौतों में ब्लैकमेल की भूमिका – ये सब मिलकर एक ऐसी कहानी बुनते हैं जो जियोपॉलिटिक्स की गहराइयों में उतरती है। लेकिन क्या ये सारे दावे सच्चाई पर आधारित हैं, या महज साजिश सिद्धांत? आइए, तथ्यों, गवाहियों और विशेषज्ञों के नजरिए से इसकी पड़ताल करें। 

 मोसाद का उदय और उसकी छवि: जासूसी से परे? मोसाद, या इंस्टीट्यूट फॉर इंटेलिजेंस एंड स्पेशल ऑपरेशंस, की स्थापना 1949 में इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हुई थी। यह एजेंसी म्यूनिख ओलंपिक हमले के बदले में फिलिस्तीनी लड़ाकों को खत्म करने जैसे ऑपरेशंस के लिए जानी जाती है। लेकिन समय के साथ, मोसाद पर ब्लैकमेल, हनीट्रैप और कोम्प्रोमैट (कमजोर करने वाली जानकारी) का इस्तेमाल करने के आरोप लगने लगे। पूर्व इजराइली इंटेलिजेंस अधिकारी अरी बेन-मेनाशे जैसे लोग दावा करते हैं कि मोसाद ने 1980 के दशक से ही ऐसे नेटवर्क चलाए, जहां सेक्स और पैसे के जरिए प्रभावशाली लोगों को नियंत्रित किया जाता था। रिसर्च पेपर्स में भी मोसाद को US पॉलिटिशियंस, यूरोपीय लीडर्स और अरब अधिकारियों को ब्लैकमेल करने का आरोपी बताया गया है, ताकि इजराइल के हित साधे जा सकें। हालांकि, इजराइल के पूर्व PM नफ्ताली बेनेट जैसे लोग इन दावों को "कैटेगोरिकली फॉल्स" बताते हैं, कहते हैं कि ये महज झूठी अफवाहें हैं। 

 जेफ्री एपस्टीन: मोसाद का 'फेस' या महज एक अपराधी? जेफ्री एपस्टीन, अमेरिका का कुख्यात सेक्स ट्रैफिकर, को अक्सर मोसाद के ब्लैकमेल नेटवर्क का 'चेहरा' कहा जाता है। दावों के मुताबिक, एपस्टीन ने नाबालिग लड़कियों को हाई-प्रोफाइल लोगों के साथ फंसाकर वीडियो और रिकॉर्डिंग्स बनाईं, जो बाद में ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल हुईं। एपस्टीन की पार्टनर गिस्लेन मैक्सवेल के पिता रॉबर्ट मैक्सवेल को मोसाद का एजेंट माना जाता था, और उनकी मौत (1991) को रहस्यमयी बताया जाता है। पूर्व इंटेलिजेंस अधिकारी बेन-मेनाशे का क्लेम है कि एपस्टीन और मैक्सवेल ने 1980 के दशक में मोसाद के लिए 'हनीट्रैप' चलाया, जहां आर्म्स डील्स के साथ-साथ ब्लैकमेल का खेल चला। एपस्टीन की पीड़िता मारिया फार्मर ने भी इसे "यहूदी सुप्रीमसिस्ट" ब्लैकमेल रिंग बताया, जो मेगा ग्रुप जैसे प्रो-इजराइल बिलियनेयर्स के साथ जुड़ा था। 

एपस्टीन के कनेक्शन बड़े थे: बिल क्लिंटन, डोनाल्ड ट्रंप, प्रिंस एंड्रयू, एलन डर्शोविट्ज़, और यहां तक कि पूर्व इजराइली PM एहुद बाराक। बाराक ने एपस्टीन के मैनहटन घर में कई बार मुलाकात की, और एपस्टीन ने बाराक की कंपनी में निवेश किया। टकर कार्लसन जैसे पंडित्स ने इसे मोसाद का ब्लैकमेल ऑपरेशन बताया, जहां एपस्टीन इजराइल के लिए काम करता था। लेकिन कुछ स्रोत कहते हैं कि एपस्टीन के कनेक्शन रूसी इंटेलिजेंस से भी थे, जैसे KGB के साथ। FBI की एक डीक्लासिफाइड मेमो में कहा गया कि एपस्टीन को मोसाद का को-ऑप्टेड एजेंट माना जाता था। 

 ब्लैकमेल का जाल: ह्यूमन ट्रैफिकिंग से राजनीतिक नियंत्रण तक सिद्धांतों के अनुसार, मोसाद का ब्लैकमेल नेटवर्क ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर टिका था। एपस्टीन का 'लिटिल सेंट जेम्स' आइलैंड कथित तौर पर ऐसे पार्टियों का केंद्र था, जहां नाबालिगों को फंसाया जाता और कैमरों से रिकॉर्ड किया जाता। ये रिकॉर्डिंग्स बाद में राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल होतीं। विक्टिम वर्जिनिया गिफ्रे ने दावा किया कि एपस्टीन ने उसे कई पावरफुल लोगों के साथ ट्रैफिक किया, ताकि वे 'उसकी जेब में' रहें। ब्लैकमेल का लक्ष्य: बिजनेसमैन, राजनेता, रॉयल फैमिली, और ग्लोबल लीडर्स। परिणाम? इजराइल की विदेश नीति को सपोर्ट, जैसे US में प्रो-इजराइल पॉलिसी। 

कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि एपस्टीन ने इजराइल-UAE रिलेशंस में बैकचैनल रोल प्ले किया, जो अब्राहम अकॉर्ड का आधार बना। लीक ईमेल्स से पता चलता कि एपस्टीन ने UAE के सुल्तान अहमद बिन सुलेम से मिलकर इजराइली टेक और सर्विलांस को प्रमोट किया। क्या यह ब्लैकमेल का हिस्सा था? स्पेकुलेशन है कि अरब लीडर्स को कम्प्रोमैट से मजबूर किया गया। 

एपस्टीन की मौत: कवर-अप या संयोग? 2019 में जेल में एपस्टीन की मौत को सुसाइड बताया गया, लेकिन सिद्धांत कहते हैं कि यह मर्डर था – ताकि बड़े नाम सामने न आएं। मौत के बाद, केस को दबा दिया गया; मीडिया चुप हो गया, और एपस्टीन फाइल्स में से कई हिस्से रेडैक्टेड रहे। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन ने फाइल्स रिलीज का बिल साइन किया, लेकिन क्या सब कुछ सामने आएगा? पूर्व FBI ऑपरेटिव एरिक ओ'नील कहते हैं कि कुछ हिस्से कभी नहीं रिलीज होंगे। परिणाम: इजराइल और यहूदी लॉबी की ताकत बढ़ी, US और यूरोप की पॉलिसी पर असर गहरा हुआ। 

 राजनीतिक प्रभाव: US, यूरोप और अरब दुनिया पर कंट्रोल मोसाद के ब्लैकमेल सिद्धांत US पॉलिसी को प्रभावित करने के लिए सबसे ज्यादा चर्चित हैं। जोनाथन पोलार्ड जैसे पुराने केस से लेकर एपस्टीन तक, मोसाद पर US लॉमेकर्स को ब्लैकमेल करने का आरोप है। यूरोप में भी, लीडर्स को फंसाने की अफवाहें हैं। लेकिन सबसे बड़ा ट्विस्ट अरब दुनिया में: सिद्धांत कहते हैं कि अरब लीडर्स को अब्राहम अकॉर्ड (2020) में शामिल होने के लिए ब्लैकमेल किया गया। UAE, बहरीन, मोरक्को जैसे देशों ने इजराइल से रिलेशंस नॉर्मलाइज किए, जो पहले फिलिस्तीन के सपोर्टर थे। क्या यह ब्लैकमेल का नतीजा था? तेहरान टाइम्स जैसी रिपोर्ट्स कहती हैं कि UAE को ब्लैकमेल किया गया। मोसाद चीफ योसी कोहेन और UAE एम्बेसडर्स के कनेक्शन का जिक्र है। 

 फिलिस्तीन मुद्दा: गायब होता एजेंडा और नॉर्मलाइजेशन का खेल सबसे बड़ा नुकसान फिलिस्तीन को हुआ। सिद्धांतों के मुताबिक, ब्लैकमेल से अरब दुनिया चुप हो गई; फिलिस्तीन इश्यू अंतरराष्ट्रीय एजेंडे से हटता गया। अब्राहम अकॉर्ड ने इजराइल को मिडल ईस्ट में मजबूत बनाया, लेकिन फिलिस्तीन के अधिकारों को कमजोर किया। अरब लीडर्स, जो पहले फिलिस्तीन के साथ खड़े थे, अब इजराइल के साथ ट्रेड और सिक्योरिटी डील्स कर रहे हैं। क्या यह ब्लैकमेल की वजह से? रिसर्च में कहा गया कि सऊदी जैसे देशों पर दबाव डाला गया। नतीजा: फिलिस्तीन का संघर्ष 'नॉर्मलाइज' हो रहा है, और दुनिया की नजरें हट रही हैं।

 सच्चाई या साजिश? पारदर्शिता की जरूरत मोसाद को ब्लैकमेल ग्रुप बताने वाले सिद्धांत आकर्षक हैं, लेकिन ज्यादातर स्पेकुलेटिव। एपस्टीन के कनेक्शन, मौत का रहस्य, और अब्राहम अकॉर्ड का टाइमिंग सवाल उठाते हैं, लेकिन सबूत सीमित हैं। इजराइल इन दावों को झूठ बताता है, जबकि जांचकर्ता जैसे रेयान ग्रिम कहते हैं कि मुख्यस्ट्रीम मीडिया इसे इग्नोर कर रहा है। अगर ये सही हैं, तो ग्लोबल पावर डायनामिक्स बदल सकती हैं। लेकिन बिना ठोस सबूतों के, ये महज थ्योरीज हैं। जरूरत है पारदर्शिता की – एपस्टीन फाइल्स पूरी रिलीज हों, और जांच हो। क्योंकि अगर ब्लैकमेल राजनीति का हिस्सा है, तो लोकतंत्र खतरे में है। क्या दुनिया इसके लिए तैयार है?

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 3/2/2026
February 03, 2026

एपस्टीन फाइल्स में उछला मोदी-अंबानी कनेक्शन: क्या है सच, क्या राजनीतिक बवाल?

एपस्टीन फाइल्स में उछला मोदी-अंबानी कनेक्शन: क्या है सच, क्या राजनीतिक बवाल?
-Friday world 3/2/2026
जेफ्री एपस्टीन – वह नाम जो अमेरिकी इतिहास के सबसे कुख्यात यौन अपराधियों में से एक है। मानव तस्करी, नाबालिगों के यौन शोषण और उच्च-स्तरीय प्रभावशाली लोगों के साथ गहरे संबंधों के आरोपों वाला यह व्यक्ति 2019 में जेल में मौत के बाद भी सुर्खियों में बना हुआ है। अमेरिकी न्याय विभाग (US Department of Justice) द्वारा हाल ही में जारी लाखों पेज के दस्तावेजों ने एक बार फिर दुनिया को हिला दिया है। इन फाइलों में भारतीय अरबपति अनिल अंबानी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अप्रत्यक्ष जिक्र सामने आया है, जिसने भारत में तीखी राजनीतिक बहस छेड़ दी। कांग्रेस ने इसे लेकर लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव तक पेश कर दिया। लेकिन क्या ये दस्तावेज वाकई कोई बड़ा खुलासा करते हैं, या यह महज राजनीतिक हथियार बन गए हैं? 

एपस्टीन-अंबानी के मैसेज: 2017 से 2019 तक का सफर दस्तावेजों के अनुसार, 2017 से 2019 के बीच अनिल अंबानी और जेफ्री एपस्टीन के बीच नियमित संवाद हुआ। ये मैसेज और ईमेल एपस्टीन के जब्त किए गए फोन और डिवाइस से निकले हैं। मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं: 

- मार्च 2017: अनिल अंबानी ने एपस्टीन को मैसेज किया कि "दिल्ली की लीडरशिप" चाहती है कि वे उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर और सलाहकार स्टीव बनन से मिलवाएं। यह मैसेज मोदी की अमेरिका यात्रा (जून 2017) से ठीक पहले का है। अंबानी ने लिखा: "Leadership wld like ur help for me to meet jared and bannon asap... Likely visit to dc by pm in may to meet donald." 

- इजराइल यात्रा का जिक्र: एक ईमेल में एपस्टीन ने दावा किया कि मोदी ने उनकी "सलाह" ली और इजराइल में "डांस और गाना" करके अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए फायदा पहुंचाया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसे "convicted criminal की trashy ruminations" करार देते हुए खारिज कर दिया। 

- मई 2019 मीटिंग: लोकसभा चुनाव परिणाम आने वाले दिन (23 मई 2019) को अंबानी ने न्यूयॉर्क में एपस्टीन से मुलाकात की। इसके बाद एपस्टीन ने स्टीव बनन को मैसेज किया कि उन्होंने "Modi’s guy" से मुलाकात की, जो शिकायत कर रहा था कि "Washington में कोई उससे (मोदी से) बात नहीं करता"।

 ये संवाद दिखाते हैं कि अंबानी खुद को मोदी सरकार और अमेरिकी राजनीतिक हलकों के बीच एक तरह का ब्रिज बनाने की कोशिश में थे। हालांकि, दस्तावेजों में कहीं भी यह साबित नहीं होता कि मोदी या उनकी सरकार ने एपस्टीन से सीधे संपर्क किया, या अंबानी को कोई आधिकारिक भूमिका दी गई थी। अंबानी के दफ्तर ने इन मैसेज पर कोई टिप्पणी नहीं की, और स्वतंत्र सत्यापन मुश्किल है। 

 कांग्रेस का हमला: स्थगन प्रस्ताव और "राष्ट्रीय गरिमा" का सवाल इन दस्तावेजों के सामने आने के बाद कांग्रेस ने तुरंत रिएक्ट किया। लोकसभा में कांग्रेस सांसद माणिक्कम टैगोर ने स्थगन प्रस्ताव पेश किया, जिसमें "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एपस्टीन फाइल्स में जिक्र" पर तत्काल चर्चा की मांग की गई। कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने सोशल मीडिया पर लिखा कि ये रिपोर्ट्स "PM मोदी तक पहुंच रखने वाले राक्षसों" के बारे में चेतावनी हैं, और प्रधानमंत्री को खुद सफाई देनी चाहिए। 

विपक्ष का तर्क है कि एक यौन अपराधी के साथ किसी भी तरह का अप्रत्यक्ष लिंक भी राष्ट्रीय गरिमा का सवाल है। वे पूछ रहे हैं – क्या सरकार को इन बातों की जानकारी थी? क्या अंबानी को कोई अनौपचारिक भूमिका दी गई थी? और सबसे बड़ा सवाल – क्या ये बैकचैनल डिप्लोमेसी ट्रंप प्रशासन के साथ संबंध मजबूत करने का हिस्सा थी? 


 सरकार का जवाब: "ट्रैशी रुमिनेशन्स ऑफ ए क्रिमिनल" भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने साफ-साफ इन दावों को खारिज कर दिया। प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा कि मोदी का जिक्र महज एक convicted criminal की "trashy ruminations" है, जिसे utmost contempt से खारिज किया जाना चाहिए। सरकार का कहना है कि 2017 की इजराइल यात्रा आधिकारिक थी, और एपस्टीन के बाकी दावे निराधार हैं। BJP ने भी इसे राजनीतिक साजिश बताया और कहा कि विपक्ष बिना सबूत के अफवाहें फैला रहा है। 

क्या है असली मुद्दा? ये फाइलें एपस्टीन के व्यापक नेटवर्क को दिखाती हैं – जहां ट्रंप, क्लिंटन, बिल गेट्स, एलन मस्क जैसे नाम पहले से ही चर्चा में थे। भारत के संदर्भ में यह पहली बार है जब एक भारतीय अरबपति और प्रधानमंत्री का नाम साथ आया। लेकिन महत्वपूर्ण बात:

 - कोई भी दस्तावेज मोदी को एपस्टीन से सीधे जुड़ा नहीं दिखाता। 

- न कोई फ्लाइट लॉग, न कोई गवाही, न कोई यौन अपराध से संबंधित आरोप। 

- ज्यादातर जिक्र एपस्टीन के खुद के ईमेल और मैसेज में है, जो एक ऐसे व्यक्ति के हैं जिसकी विश्वसनीयता शून्य है।

 फिर भी, राजनीति में "perception" सब कुछ है। कांग्रेस इसे मोदी सरकार की "विदेश नीति की कमजोरी" और "क्रोनी कैपिटलिज्म" से जोड़ रही है, जबकि सत्ता पक्ष इसे "मिथ्या प्रचार" कह रहा है।

 पारदर्शिता की जरूरत एपस्टीन फाइल्स ने एक बार फिर साबित किया कि उच्च-स्तरीय राजनीति और कारोबार के बीच की रेखाएं कितनी धुंधली हो सकती हैं। भारत जैसे लोकतंत्र में ऐसे मुद्दों पर खुली चर्चा जरूरी है।

 सरकार को चाहिए कि वह स्पष्ट बयान दे, और अगर कोई अनौपचारिक संपर्क था भी तो उसकी सीमा बताए। क्योंकि जनता का विश्वास सबसे बड़ा पूंजी है।

 क्या यह महज राजनीतिक बवाल है, या कुछ गहरा राज छिपा है? समय और जांच ही बताएगी। फिलहाल, यह विवाद भारतीय राजनीति में नया अध्याय जोड़ चुका है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 3/2/2026

Monday, 2 February 2026

February 02, 2026

ન્યાયની જ્વાળા હવે બગદાણાના આંગણે ભભૂકી રહી છે: નવનીત બલધીયાની અગ્રેસરતામાં કોળી-ઠાકોર સમાજની એકતા અને આગામી મોટી રણનીતિ!

ન્યાયની જ્વાળા હવે બગદાણાના આંગણે ભભૂકી રહી છે: નવનીત બલધીયાની અગ્રેસરતામાં કોળી-ઠાકોર સમાજની એકતા અને આગામી મોટી રણનીતિ!
-Friday world 3/2/2026
ભાવનગર જિલ્લાના બગદાણા ગામમાં 29 ડિસેમ્બર 2025ના રોજ કોળી સમાજના યુવા નેતા તેમજ પૂર્વ સરપંચ નવનીત બલધીયા પર થયેલા જીવલેણ હુમલાએ આખા ગુજરાતમાં ચકચાર મચાવી દીધી હતી. આ ઘટનાએ કોળી અને ઠાકોર સમુદાયને એકજૂટ કર્યા છે, અને હવે ન્યાય માટેની લડાઈ નવા તબક્કામાં પહોંચી ગઈ છે. તાજેતરમાં ભાવનગરમાં યોજાયેલી 'ન્યાય સભા'માં અભૂતપૂર્વ એકતા જોવા મળી, જ્યાં હજારોની સંખ્યામાં લોકો ઉમટી પડ્યા હતા. આ સભા પછી નવનીત બલધીયાએ મીડિયા સમક્ષ મહત્વની જાહેરાત કરી: "ન્યાય માટેની લડાઈ હવે બગદાણાના આંગણે છે. આગામી રણનીતિ કોળી સમુદાયના આભારવિધિ સમારોહ સાથે તૈયાર કરવામાં આવશે." 

હુમલાની પૃષ્ઠભૂમિ અને સમાજનો આક્રોશ બગદાણા ગામના નવનીત બલધીયા, જેઓ આશ્રમ સેવક તરીકે પણ જાણીતા છે, પર રાત્રે અજાણ્યા હુમલાખોરોએ પાઈપ અને લાકડીઓથી હુમલો કર્યો હતો. આ ઘટના પાછળ ડાયરા કલાકાર માયાભાઈ આહીરના પુત્ર જયરાજ આહીર સહિત અન્ય આરોપીઓના નામ સામે આવ્યા હતા. પ્રારંભિક તપાસમાં અનેક અનિયમિતતાઓ જોવા મળતાં સ્ટેટ સરકારે SITની રચના કરી, જેણે જયરાજ આહીર સહિત 14 આરોપીઓને પકડ્યા. જોકે, તાજેતરમાં મહુવા કોર્ટે 8 આરોપીઓને જામીન મંજૂર કર્યા છે, જેનાથી સમાજમાં ફરી આક્રોશ ફેલાયો છે. 

ભાવનગરની ન્યાય સભામાં નવનીત બલધીયા સ્વયં હાજર રહ્યા અને સમાજને સંબોધિત કર્યું. તેમણે કહ્યું કે સોશિયલ મીડિયાની શક્તિએ જ આ મેળાવડો શક્ય બનાવ્યો – કોઈ વ્યક્તિગત આમંત્રણ વગર, માત્ર અપીલથી હજારો લોકો એકઠા થયા. આ એકતા માટે તેમણે તમામ જ્ઞાતિઓ અને સોશિયલ મીડિયા મિત્રોનો આભાર માન્યો. 

આગામી રણનીતિ: બગદાણામાં મહાસમ્મેલન નવનીત બલધીયાએ સ્પષ્ટ જણાવ્યું કે આગામી મુખ્ય કાર્યક્રમ પવિત્ર યાત્રાધામ બગદાણા ખાતે યોજાશે. આ સમારોહમાં માત્ર આભારવિધિ જ નહીં, પરંતુ સમગ્ર કોળી-ઠાકોર સમાજની શક્તિનું પ્રદર્શન થશે. તેમણે કહ્યું, "અમે તમામ સમુદાયના નેતાઓ, સાંસદો અને ધારાસભ્યોને આમંત્રિત કરીશું. જો ન્યાયિક પ્રક્રિયામાં કોઈ અનિયમિતતા જોવા મળશે, તો આંદોલનનો આગળનો તબક્કો ત્યાંથી શરૂ થશે." 

આ મેળાવડો ગુજરાતભરમાંથી કોળી અને ઠાકોર સમુદાયના નેતાઓને એક મંચ પર લાવશે, જે રાજકીય અને સામાજિક પરિવર્તનનું કારણ બની શકે છે. સમાજનો સંદેશ સ્પષ્ટ છે: પીડિતોને પૂર્ણ ન્યાય ન મળે તો આ સંઘર્ષ વધુ તીવ્ર બનશે. 

સમાજની એકતા અને સોશિયલ મીડિયાની ભૂમિકા આ આંદોલનમાં સોશિયલ મીડિયાએ મુખ્ય ભૂમિકા ભજવી છે. નવનીત બલધીયાએ જણાવ્યું કે કોઈ ફરજિયાત આમંત્રણ નહોતું, ફક્ત અપીલ કરી હતી અને પરિણામ અદ્ભુત આવ્યું. આ એકતા અન્યાય સામે સમુદાયના આક્રોશની હદ દર્શાવે છે. ભાવનગરની સભામાં 'જય જય કોળી સમાજ'ના નારા ગુંજ્યા, અને ઋષિભારતી બાપુ જેવા આગેવાનો પણ ઉપસ્થિત રહ્યા. 

આ લડાઈ માત્ર નવનીત બલધીયા માટે નથી, પરંતુ સમગ્ર સમાજના અધિકાર અને ન્યાય માટે છે. બગદાણામાં યોજાનાર આ મહાસમ્મેલન ગુજરાતના સામાજિક ઇતિહાસમાં એક મહત્વનું પ્રકરણ બની શકે છે – જ્યાં એકતા અને ન્યાયની જ્વાળા નવી ઊંચાઈઓ સર કરશે! 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 3/2/2026
February 02, 2026

સુરતના બિલ્ડર સામ્રાજ્યમાં ભૂકંપ: એક પત્રે PMOને જગાવ્યું, IT રેડથી ગજેરા બંધુઓની ઊંઘ ઉડી!

સુરતના બિલ્ડર સામ્રાજ્યમાં ભૂકંપ: એક પત્રે PMOને જગાવ્યું, IT રેડથી ગજેરા બંધુઓની ઊંઘ ઉડી!
-Friday world 3/2/2026
સુરત – ભારતનું હીરા અને ટેક્સટાઈલનું હૃદય – જ્યાં રાતોરાત કરોડોના સોદા થાય છે, ત્યાં એક સામાન્ય પત્રે આખું બિઝનેસ ઇકોસિસ્ટમ હલાવી દીધું. નામ છે પ્રવીણ અગ્રવાલ – જેને કેટલાક 'પ્રવીણ ભૂત' કહે છે. એક સમયે ગજેરા બંધુઓના નજીકના સાથીદાર રહેલા આ વ્યક્તિએ સીધો વડાપ્રધાન નરેન્દ્ર મોદીને પત્ર લખ્યો અને 2000 કરોડના આર્થિક અનિયમિતતાના ડોક્યુમેન્ટરી પુરાવા સાથે મોકલ્યો. પરિણામ? PMOમાંથી તાત્કાલિક આદેશ, અને આવકવેરા વિભાગની મેગા રેડ – લક્ષ્મી ગ્રુપના ગજેરા બંધુઓ પર! 

રોકડનો વરસાદ અને કાળા નાણાંની રમત પત્રમાં સૌથી ચોંકાવનારો ખુલાસો સુરતના મિલેનિયમ ટેક્સટાઈલ માર્કેટનો છે. હજારો દુકાનોના વેચાણમાં 80-90% રકમ રોકડમાં લેવાઈ – આ બ્લેક મની પ્રોજેક્ટના ખર્ચમાં દેખાડવાને બદલે ખાનગી રીતે વહેંચાઈ ગઈ. IT ટીમોએ આ આક્ષેપોની ચકાસણી કરી અને મોટા પાયે અનિયમિતતા જોવા મળી. આ રોકડનો મોટો ભાગ હવાલા રૂટથી હોંગકોંગ પહોંચ્યો, જ્યાંથી વિદેશી રોકાણના નામે ફરી ભારતમાં 'વ્હાઈટ' થઈને પાછો આવ્યો. આ રમતથી મૂળ ભાગીદારોના શેર ઘટાડીને કંપની પર પૂરો કબજો મેળવવામાં આવ્યો. 

હોંગકોંગથી સુરત સુધીનો મની ટ્રેલ આ આંતરરાષ્ટ્રીય મની લોન્ડરિંગની ચેઈનમાં રાકેશ ગજેરા જેવા નામો સામે આવ્યા. સુરતમાંથી ઉઘરાવાયેલી રોકડ હવાલા દ્વારા વિદેશ મોકલાઈ, ત્યાંથી શેલ કંપનીઓ મારફતે ભારતમાં રોકાણ તરીકે પાછી આવી. આ પ્રક્રિયાએ કાળા નાણાંને સફેદ બનાવ્યા અને ગ્રુપના વિસ્તારમાં મોટો હાથ વધાર્યો. પ્રવીણ અગ્રવાલના પુરાવાઓમાં ટ્રાન્ઝેક્શન રેકોર્ડ, ડિજિટલ ટ્રેલ અને દસ્તાવેજો સામેલ હતા – જેણે PMOને તરત જ એક્શન લેવા મજબૂર કર્યું. 

મેહુલ ચોક્સીની છાયા અને PNB કૌભાંડની લિંક પત્રનો સૌથી વિસ્ફોટક ભાગ PNB કૌભાંડના મુખ્ય આરોપી મેહુલ ચોક્સી સાથેનો સંબંધ છે. આક્ષેપ છે કે ચોક્સીના ગુનાહિત નાણાં (પ્રોસીડ્સ ઓફ ક્રાઈમ) લક્ષ્મી ગ્રુપના રિયલ એસ્ટેટ પ્રોજેક્ટ્સમાં રોકાયા. IT અને ED વિભાગ હવે આ લિંકની ઊંડી તપાસ કરી રહ્યા છે – શું ટેક્સપેયર્સના લૂંટાયેલા પૈસા અહીં વપરાયા? આ પ્રશ્ન દેશની આર્થિક સુરક્ષા સાથે જોડાયેલો છે. 

શાંતિ રેસીડન્સી અને રોકાણકારોનો વિશ્વાસઘાત આ માત્ર ટેક્સ ચોરીની વાત નથી. પ્રવીણ અગ્રવાલે સુરત ઈકો સેલમાં પણ અરજી કરી, જેમાં 'શાંતિ રેસીડન્સીસ' જેવા પ્રોજેક્ટ્સમાં શેરધારકોના હક છીનવી લેવાની અને છેતરપિંડીની વિગતો આપી. બેનામી જમીન વ્યવહારો, શેર મેનિપ્યુલેશન અને રોકાણકારો સાથેનો વિશ્વાસઘાત – આ બધું હવે ફોજદારી તપાસના દાયરામાં છે. 

એક પત્રે બદલાયું સમીકરણ પ્રવીણ અગ્રવાલની આ હિંમતે સાબિત કર્યું કે કાળા કામનો પરદો ક્યારેક ખુલે જ છે. PMO સુધી પહોંચેલા આ પત્રે 150થી વધુ અધિકારીઓની ટીમને સુરતમાં 30+ સ્થળોએ રેડ કરાવી. ગજેરા બંધુઓ માટે આ રાત્રિઓ ઊંઘ વિનાની બની ગઈ છે. હવે સવાલ એ છે – આ તપાસ ક્યાં સુધી જશે? કેટલા મોટા નામો સામે આવશે? અને સુરતના બિઝનેસ વર્લ્ડમાં કેટલા રહસ્યો હજુ છુપાયેલા છે? 

કાળા નાણાંની આ રમત દર્શાવે છે કે કોઈ પણ સામ્રાજ્ય કેટલું મોટું હોય, સાચા પુરાવા સાથેની એક અવાજ તેને હલાવી શકે છે. આ કેસ હજુ ચાલુ છે – અને આગામી દિવસોમાં વધુ ખુલાસા થવાની શક્યતા છે. સુરતના બજારમાં હલચલ મચી ગઈ છે... અને આ દાસ્તાન હજુ પૂરી થઈ નથી!
Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 3/2/2026
February 02, 2026

ગુજરાતમાં SIR વિવાદ: લાખો ફોર્મ-7નો હોબાળો, ભાજપને જેલ-દંડનો ડર, રાતોરાત હજારો વાંધા પરત લેવા પડ્યા!

ગુજરાતમાં SIR વિવાદ: લાખો ફોર્મ-7નો હોબાળો, ભાજપને જેલ-દંડનો ડર, રાતોરાત હજારો વાંધા પરત લેવા પડ્યા! -Friday world 3/2/2026
ગુજરાતની રાજકીય હવામાનમાં તાજેતરમાં એક એવો વિવાદ ઉભો થયો છે જેણે ચૂંટણી પંચથી લઈને રાજકીય પક્ષો સુધી સૌને હલાવી દીધા છે. આ વિવાદ છે સ્પેશિયલ ઇન્ટેન્સિવ રિવિઝન (SIR) ના નામે મતદાર યાદીમાંથી નામો કાઢવાના પ્રયાસોનો. ખાસ કરીને ફોર્મ-7 ના ઉપયોગને લઈને ભારે બબાલ મચ્યો હતો, જેમાં લાખો વાંધા ભરાયા અને પછી રાતોરાત તેમને પરત લેવા પડ્યા. આ ઘટનાએ ભાજપના નેતાઓ અને કાર્યકરોમાં પણ ડરનું વાતાવરણ સર્જ્યું, કારણ કે ખોટી માહિતી આપવા પર જેલ અને ભારે દંડની જોગવાઈ છે. 

SIR શું છે અને વિવાદ કેમ ઉભો થયો? સ્પેશિયલ ઇન્ટેન્સિવ રિવિઝન (SIR) એ ચૂંટણી પંચ દ્વારા મતદાર યાદીને સ્વચ્છ અને સચોટ બનાવવાની એક વિશેષ કવાયત છે. આ પ્રક્રિયામાં મતદારોની વિગતોની ચકાસણી કરવામાં આવે છે, અને જો કોઈ મતદાર મૃત્યુ પામ્યો હોય, સ્થળાંતર કર્યું હોય કે બે જગ્યાએ નોંધાયો હોય તો તેનું નામ કાઢી શકાય છે. આ માટે ફોર્મ-7 નો ઉપયોગ થાય છે, જેમાં કોઈ પણ મતદાર અન્ય વ્યક્તિના નામ પર વાંધો ઉઠાવી શકે છે.

 ગુજરાતમાં SIR શરૂ થયા બાદ ડ્રાફ્ટ મતદાર યાદી જાહેર થઈ, જેમાં અંદાજે 73.73 લાખ નામો પહેલેથી જ કાઢી નાખવામાં આવ્યા હતા (પહેલાં 5.08 કરોડથી ઘટીને 4.34 કરોડ). પરંતુ ફાઈનલ યાદી માટેની ક્લેઈમ-ઓબ્જેક્શન પ્રક્રિયામાં અચાનક લાખો ફોર્મ-7 ભરાવા લાગ્યા. એક સમયે રાજ્ય ચૂંટણી પંચને 14.11 લાખ જેટલા ફોર્મ-7 મળ્યા હોવાનું કહેવાય છે, જેમાંથી મોટા ભાગના વાંધા ખોટા નામે અથવા બનાવટી રીતે ભરાયા હોવાના આક્ષેપો થયા. 

 ભાજપ નેતાઓ-કાર્યકરો પર આક્ષેપો: ખોટા ફોર્મ-7નો ઉપયોગ? વિપક્ષી પક્ષોએ, ખાસ કરીને કોંગ્રેસે, આને એક સુનિયોજિત કાવતરું ગણાવ્યું. તેમનો આક્ષેપ છે કે ભાજપના બૂથ લેવલ એજન્ટ્સ અને કાર્યકરોએ વિપક્ષી મતદારો, ખાસ કરીને લઘુમતી વિસ્તારોમાં, નામો કાઢવા માટે મોટા પાયે ફોર્મ-7 ભર્યા. કેટલાક કિસ્સાઓમાં પ્રખ્યાત વ્યક્તિઓ જેમ કે પદ્મશ્રી વિજેતા ગુજરાતી હાસ્ય કલાકાર શહાબુદ્દીન રઠોડ અને ઢોલક વાદક હાજી રમઝાનુ (મીર હાજીભાઈ કાસમભાઈ)ના નામ પર પણ વાંધા ઉઠાવવામાં આવ્યા, જેનાથી વિવાદ વધુ ભડક્યો. 

રાહુલ ગાંધીએ પણ X પર પોસ્ટ કરીને આ પ્રક્રિયાને "વોટ ચોરી"ની સાજિશ ગણાવી અને ચૂંટણી પંચને ભાજપનો સાથી ઠેરવ્યું. તેમણે કહ્યું કે "જ્યાં SIR છે ત્યાં વોટ ચોરી છે" અને ગુજરાતમાં આને "સુનિયોજિત વોટ ચોરી" તરીકે ગણાવ્યું. 

રાતોરાત ફોર્મ-7 પરત લેવાની ઘટના: જેલ-દંડનો ડર! આ વિવાદ વચ્ચે સૌથી મોટી વાત એ બની કે રાજ્ય ચૂંટણી પંચે સ્પષ્ટ કર્યું કે ફોર્મ-7માં ખોટી માહિતી આપનાર વ્યક્તિને પુરાવા રજૂ કરવા પડશે. જો માહિતી ખોટી સાબિત થશે તો ભારતીય દંડ સંહિતા અને અન્ય કાયદાઓ હેઠળ એક વર્ષ સુધીની જેલ અને એક લાખ રૂપિયા સુધીનો દંડ થઈ શકે છે. આ જોગવાઈના ડરથી ઘણા ભાજપ નેતાઓ અને કાર્યકરોએ પોતાના ભરેલા ફોર્મ-7 પરત લીધા અથવા એફિડેવિટ કરીને વાંધા ઉઠાવવાનું બંધ કર્યું. 

પરિણામે, શરૂઆતમાં 14.11 લાખ જેટલા ફોર્મ-7માંથી સંખ્યા રાતોરાત ઘટીને 1.83 લાખ થઈ ગઈ! આ આંકડો ચૂંટણી પંચના અધિકારીઓ દ્વારા જાહેર કરાયો હતો. આ ઘટનાએ સાબિત કર્યું કે મોટા ભાગના વાંધા બનાવટી અથવા રાજકીય હેતુથી ભરાયા હતા. 

ચૂંટણી પંચની ભૂમિકા અને સુપ્રીમ કોર્ટની તૈયારી મુખ્ય ચૂંટણી અધિકારી હારિત શુક્લા એ પણ આ મુદ્દે દિલ્હીમાં વાસ્તવિકતા રજૂ કરી હતી. પંચે સ્પષ્ટ કર્યું કે દરેક વાંધા પર સુનાવણી થશે અને ખોટા વાંધા ભરનારા સામે કડક કાર્યવાહી થશે. આ વિવાદને લઈને સુપ્રીમ કોર્ટમાં પણ અરજીઓ દાખલ થવાની તૈયારી ચાલી રહી હતી, જેના કારણે પંચ વધુ સાવચેત બન્યું. 

 શું આ લોકશાહી પર હુમલો છે? આ ઘટના ગુજરાતની રાજકીય ચર્ચાનો મુખ્ય વિષય બની ગઈ છે. વિપક્ષ કહે છે કે આ મતદારોના અધિકાર છીનવવાનો પ્રયાસ છે, જ્યારે શાસક પક્ષ આને મતદાર યાદી સ્વચ્છ કરવાની પ્રક્રિયા ગણાવે છે. પરંતુ રાતોરાત ફોર્મ-7 પરત લેવાની ઘટના અને જેલ-દંડના ડરથી પીછેહટ સ્પષ્ટ કરે છે કે અહીં કંઈક ગડબડ હતી. 

આ વિવાદ એક વાત સ્પષ્ટ કરે છે: લોકશાહીમાં મતદાર યાદીની પવિત્રતા જરૂરી છે, પરંતુ તેને રાજકીય હથિયાર બનાવવાના પ્રયાસો ખતરનાક છે. ગુજરાતના આ SIR વિવાદએ ફરી એક વાર ચૂંટણી પ્રક્રિયાની પારદર્શિતા અને નિષ્પક્ષતા પર સવાલ ઉઠાવ્યા છે. 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 3/2/2026