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Sunday, 26 April 2026

April 26, 2026

चरण स्पर्श की राजनीति: एक माँ के पैर छूकर वोट माँगना, दूसरी माँओं की पीड़ा को अनदेखा करना

चरण स्पर्श की राजनीति: एक माँ के पैर छूकर वोट माँगना, दूसरी माँओं की पीड़ा को अनदेखा करना
-Friday World-April 27,2026 
पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में बलात्कार-हत्या की शिकार डॉक्टर की माँ रत्ना देबनाथ के पैर छुए। यह दृश्य भावुक था। महिला शक्ति का सम्मान दिखाने वाला भी। माँ के प्रति आदर का प्रतीक। लेकिन इस एक घटना ने देशभर में तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। 

क्या चरण वंदना सिर्फ चुनावी रणभूमि में ही दिखाई जाती है? जब सत्ता की जरूरत हो, तब माँ के पैर छूना और जब सत्ता अपने हाथ में हो, तब अन्य बलात्कार पीड़िताओं और उनकी माँओं की पीड़ा को क्यों अनदेखा किया जाता है? 

यह सवाल राजनीतिक दोहरे मापदंड का है, न कि किसी एक घटना का।

आरजी कर मामला: चुनावी मंच पर सम्मान

अगस्त 2024 में आरजी कर अस्पताल में एक युवा डॉक्टर की बलात्कार के बाद हत्या हो गई थी। पूरे देश में आक्रोश फैला। पीड़िता की माँ रत्ना देबनाथ ने न्याय की लड़ाई लड़ी। टीएमसी शासन पर आरोप लगाए। भाजपा ने उन्हें पानिहाटी सीट से उम्मीदवार बनाया। 

24 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने पानिहाटी और दमदम में रैलियों में रत्ना देबनाथ के साथ मंच साझा किया। उन्होंने उनकी हिम्मत की सराहना की, सिर पर हाथ रखा और टीएमसी के “जंगल राज” को दोषी ठहराया। यह दृश्य वायरल हुआ। भाजपा इसे महिलाओं की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बता रही है।

महिलाओं का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। माँ के प्रति श्रद्धा दिखाना सराहनीय है। लेकिन सवाल उठता है – यह सम्मान चुनिंदा क्यों?

 वो मामले जब चुप्पी साध ली गई

भारत में कई भयानक बलात्कार-हत्या के मामले सामने आए हैं। कुछ में आरोपी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली थे या सत्ताधारी दलों से जुड़े थे। आइए उन मामलों को याद करें जहां प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार की ओर से ऐसी भावुक चरण स्पर्श जैसी कोई कार्रवाई नहीं हुई:

1. बिलकिस बानो मामला (2002)
गुजरात दंगों के दौरान गर्भवती बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। उनके परिवार के 14 सदस्यों की हत्या कर दी गई। 11 दोषियों को सजा हुई। लेकिन 2022 में (जब मोदी सरकार केंद्र में थी) गुजरात सरकार ने उन्हें समय से पहले रिहा कर दिया। दोषियों का स्वागत मिठाई और पैर छूकर किया गया। बिलकिस ने न्याय की गुहार लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में रिहाई रद्द की। लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी बिलकिस या उनकी माँ के पैर नहीं छुए, न ही सार्वजनिक रूप से माफी माँगी।

2. कठुआ (आसिफा) मामला (2018)
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में 8 वर्षीय मुस्लिम बच्ची आसिफा का मंदिर में सामूहिक बलात्कार और हत्या की गई। आरोपी हिंदू थे। भाजपा के दो मंत्रियों ने आरोपी पक्ष का समर्थन किया और प्रदर्शन किए। प्रधानमंत्री मोदी ने काफी देर बाद चुप्पी तोड़ी और कहा कि “हमारी बेटियों को न्याय मिलेगा”। लेकिन पीड़िता की माँ के पैर छूने या व्यक्तिगत संवेदना व्यक्त करने जैसा कोई भावुक दृश्य नहीं देखा गया।

3. उन्नाव बलात्कार मामला (2017)
उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर 16 वर्षीय लड़की से बलात्कार का आरोप लगा। पीड़िता की माँ ने न्याय की लड़ाई लड़ी। बाद में पीड़िता के पिता की हत्या का आरोप भी लगा। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। सेंगर को सजा हुई, लेकिन पीड़िता और उनकी माँ को बार-बार धमकियाँ मिलीं। 2025 में भी पीड़िता की माँ को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के दौरान रोका गया। प्रधानमंत्री ने कभी उन्नाव की माँ के पैर नहीं छुए।

4. हाथरस मामला (2020)
उत्तर प्रदेश के हाथरस में 19 वर्षीय दलित लड़की से सामूहिक बलात्कार हुआ। वह दिल्ली के अस्पताल में मर गई। परिवार का आरोप था कि पुलिस ने आधी रात (2:45 बजे) जबरन शव का दाह संस्कार कर दिया, परिवार को अंतिम विदाई तक नहीं दी गई। ऊपरी जाति के आरोपी थे। पूरे देश में आक्रोश फैला। विपक्ष ने योगी सरकार की इस्तीफे की माँग की। प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री से बात की और “सख्त कार्रवाई” की बात कही, लेकिन पीड़िता की माँ के पैर छूने या व्यक्तिगत रूप से मिलने जैसा कोई संकेत नहीं दिया।

ये मामले अलग-अलग राज्यों और समय के हैं। लेकिन एक पैटर्न साफ दिखता है – जब आरोपी सत्ताधारी पक्ष से जुड़े दिखते हैं, तो चुप्पी या औपचारिक बयान। जब विपक्षी राज्य में मामला हो, तो भावुक चरण स्पर्श और “जंगल राज” का नारा।

राजनीति और पीड़ा का शोषण

राजनीति में भावनाओं का इस्तेमाल होता है। लेकिन जब एक पीड़िता की माँ को उम्मीदवार बनाकर वोट माँगे जाएं और दूसरी पीड़िताओं को सिर्फ वोट बैंक समझा जाए, तो यह दोगलापन कहलाता है। 

आरजी कर मामले में न्याय की माँग जायज है। लेकिन क्या बिलकिस, आसिफा, उन्नाव और हाथरस की माँओं का दर्द कम था? क्या उनकी बेटियों की जान सत्ता के खेल में कम कीमती थी?

एक अकेली जान सत्ता के लिए कितना कुछ कर रही है – यह सवाल गंभीर है। लेकिन सवाल यह भी है कि हजारों अन्य जानों के साथ क्या हो रहा है? क्या महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी मुद्दा है या हर राज्य, हर सरकार में समान रूप से लागू होना चाहिए?

 सच्ची महिला शक्ति का सम्मान कब?

महिला शक्ति का सम्मान तभी सार्थक होगा जब:
- हर बलात्कार पीड़िता को बिना भेदभाव के न्याय मिले
- दोषी चाहे किसी भी दल या जाति से हो, सजा हो
- पीड़ित परिवार को राजनीतिक हथियार न बनाया जाए, बल्कि न्याय दिलाया जाए
- चरण स्पर्श दिखावा न हो, बल्कि हर पीड़िता की माँ के प्रति सच्ची संवेदना हो

प्रधानमंत्री का आरजी कर पीड़िता की माँ के प्रति सम्मान सराहनीय है। लेकिन देश की अन्य माँओं – बिलकिस, आसिफा, उन्नाव और हाथरस की माँओं – की पीड़ा को भी उसी नजर से देखा जाना चाहिए। 

चुनाव आते-जाते रहते हैं। लेकिन न्याय और महिला सुरक्षा का मुद्दा स्थायी होना चाहिए। अगर एक माँ के पैर छूकर वोट माँगे जा सकते हैं, तो सभी माँओं के दर्द को समझकर न्याय सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है।

देश को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर हर पीड़िता को समान न्याय दे। तभी “माँ तुझे सलाम” का नारा सच्चा लगेगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 27,2026 
April 26, 2026

एक पेड़ माँ के नाम, पूरा जंगल अडानी के नाम: हसदेव अरण्य में कोयला खदान की सच्चाई

एक पेड़ माँ के नाम, पूरा जंगल अडानी के नाम: हसदेव अरण्य में कोयला खदान की सच्चाई
-Friday World-April 27,2026 
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य जंगल में एक तरफ़ सरकार ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान चला रही है – भावुक अपील, फोटो सेशन और पौधरोपण के कार्यक्रम। वहीं दूसरी तरफ़ अदानी समूह द्वारा संचालित कोयला खदानों के विस्तार के लिए हजारों-लाखों प्राचीन पेड़ काटे जा रहे हैं। यह विरोधाभास सिर्फ़ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरण, आदिवासी अधिकारों और सच्चे विकास की हकीकत को उजागर करता है।

हसदेव अरण्य (Hasdeo Arand) छत्तीसगढ़ का एक घना, जैव-विविधता से भरपूर जंगल क्षेत्र है, जो लगभग १७०,००० हेक्टेयर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र हाथियों का गलियारा, सैकड़ों दुर्लभ पौधों और जानवरों का घर और हजारों आदिवासी परिवारों की आजीविका का आधार है। लेकिन कोयला भंडार के कारण यह क्षेत्र पिछले एक दशक से खनन कंपनियों की नजर में है।

मुहिम की शुरुआत और हकीकत

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को भावनात्मक अपील के साथ प्रचारित किया गया। माँ के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह अभियान जनता को दिखावा भर है, जबकि वास्तविकता में घने जंगलों को कॉर्पोरेट हितों के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है।

हसदेव में अदानी समूह द्वारा संचालित पारसा ईस्ट केते बासन (PEKB) कोयला खदान और उसके विस्तार (Kete Extension, Parsa आदि) के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए। 

- आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, २०१२-१३ से २०२२-२३ तक लगभग ८१,८६६ पेड़ काटे गए।
- पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय लोग दावा करते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है – ३.५ लाख से ३.६८ लाख या उससे भी अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं।
- २०२४-२५ में विस्तार के लिए अतिरिक्त ११,००० से १५,००० पेड़ एक-एक बार में काटे गए।
- सलही, घटबर्रा, हरिहारपुर, फतेहपुर जैसे गांवों में पेड़ कटाई के विरोध में प्रदर्शन हुए, जिसमें आदिवासी महिलाओं ने पेड़ों को गले लगाकर (चिपको आंदोलन शैली) बचाने की कोशिश की।

इन पेड़ों में महुआ, आम, कटहल जैसे फलदार वृक्ष शामिल हैं, जो आदिवासियों की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का हिस्सा हैं। कई पेड़ सदियों पुराने और आदिवासियों द्वारा पूजनीय माने जाते थे।
           आदिवासी जीवन पर असर

हसदेव के आदिवासी (मुख्यतः गोंड समुदाय) सदियों से जंगल पर निर्भर हैं। जंगल उन्हें भोजन, ईंधन, औषधि, पानी और आजीविका देता है। खदान विस्तार के कारण:

- गांवों का विस्थापन या खतरा
- जल स्रोतों (नदियों, झरनों) का प्रदूषण और सूखना
- वन्यजीवों का विस्थापन – हाथी, भालू आदि के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ा
- पारंपरिक वन अधिकार (FRA) का उल्लंघन होने के आरोप

कई गांवों में लोगों ने वन अधिकार पट्टे सौंपने से इनकार किया, लेकिन कथित दबाव और मुआवजे के लालच में कुछ मामलों में सहमति बनाई गई। कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुआवजा अपर्याप्त है और पुनर्वास की सुविधाएं खराब हैं।

 पर्यावरणीय कीमत

हसदेव अरण्य सिर्फ़ पेड़ों का समूह नहीं है। यह कार्बन सिंक, वर्षा चक्र को बनाए रखने वाला क्षेत्र और जैव-विविधता का हॉटस्पॉट है। लाखों पेड़ काटने से:

- स्थानीय जलवायु प्रभावित – गर्मी बढ़ना, वर्षा पैटर्न बदलना
- भूजल स्तर गिरना
- मिट्टी का कटाव और बाढ़ का खतरा बढ़ना
- पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी असंतुलित होना

कार्यकर्ता अलोक शुक्ला जैसे लोगों ने इस मुद्दे पर दशकों से संघर्ष किया और उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार भी मिला। हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने लगातार विरोध प्रदर्शन, कानूनी लड़ाई और जागरूकता अभियान चलाए।

 क्या है सच्चाई – दिखावा बनाम हकीकत?

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान में पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन पुराने, घने जंगल की जगह नए पौधे लगाना पर्यावरणीय रूप से समकक्ष नहीं होता। एक परिपक्व जंगल में सैकड़ों प्रजातियाँ, जटिल इकोसिस्टम और कार्बन स्टोरेज क्षमता होती है, जो नई रोपाई में दशकों बाद भी नहीं आ पाती।
                   आलोचक कहते हैं:
- एक तरफ़ माँ के नाम पर एक पेड़ लगाने का भावुक नारा
- दूसरी तरफ़ हज़ारों पेड़ “बाप” (कॉर्पोरेट हित) के नाम पर काट दिए जाते हैं

यह विरोधाभास विकास मॉडल की मूल समस्या को उजागर करता है – जहां अल्पकालिक औद्योगिक लाभ को दीर्घकालिक पर्यावरणीय और सामाजिक लागत से ऊपर रखा जाता है।

 आगे का रास्ता

हसदेव जैसे क्षेत्रों में सच्चा विकास तभी संभव है जब:
- वन क्षेत्रों को ‘नो-गो’ जोन घोषित कर संरक्षण दिया जाए
- वन अधिकार अधिनियम को सख्ती से लागू किया जाए
- खनन परियोजनाओं में पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाया जाए
- आदिवासी समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाए
- सस्टेनेबल ऊर्जा स्रोतों (सौर, पवन) को प्राथमिकता दी जाए, कोयले पर निर्भरता कम की जाए

हसदेव की लड़ाई सिर्फ़ एक जंगल की नहीं है। यह सवाल है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ रहे हैं – हरा-भरा, जीवंत पर्यावरण या धूल-धक्कड़, प्रदूषित खदानें?

‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की भावना सराहनीय है, लेकिन जब पूरा जंगल ही खतरे में हो तो दिखावे की रोपाई पर्याप्त नहीं होती। सच्ची श्रद्धांजलि माँ प्रकृति को तभी दी जा सकती है जब हम उसके अस्तित्व को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं – न कि सिर्फ़ फोटो खिंचवाएं।

हसदेव के आदिवासी आज भी संघर्ष कर रहे हैं। उनका संदेश साफ़ है – जंगल हमारी माँ है, उसे बचाना हमारा कर्तव्य। क्या हम इस हकीकत को समझेंगे या सिर्फ़ नारों में उलझे रहेंगे?

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 27,2026 
April 26, 2026

भारत का ‘विकास’ बन गया ‘विनाश’ का मॉडल: जल-जंगल-जमीन छीनने का १२ साल का हिसाब

भारत का ‘विकास’ बन गया ‘विनाश’ का मॉडल: जल-जंगल-जमीन छीनने का १२ साल का हिसाब
-Friday World-April 27,2026 
अप्रैल २०२६। देश की सड़कें पिघल रही हैं, आसमान से आग बरस रही है। बिहार के भागलपुर, ओडिशा के तालचेर, पश्चिम बंगाल के आसनसोल और मेदिनीपुर में तापमान ४४-४५ डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है। दुनिया के १०० सबसे गर्म शहरों में से ९५ भारत में हैं। २० में से १९ सबसे गर्म जगहें भी यहीं। 

यह कोई सामान्य गर्मी नहीं है। यह पर्यावरणीय असंतुलन का चरम रूप है – जिसकी नींव पिछले १२ सालों में विकास के नाम पर पड़ी है। आदिवासियों और किसानों से छीनी गई जल, जंगल और जमीन आज देश को ‘विश्व का हीट बॉक्स’ बना रही है।

 जब विकास ने प्रकृति से छेड़छाड़ की

२०१४ से अब तक देश में बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, माइनिंग, हाईवे, स्मार्ट सिटी और औद्योगिक क्षेत्रों के नाम पर लाखों हेक्टेयर जंगल और कृषि भूमि पर कब्जा किया गया। ग्लोबल फॉरेस्ट वॉच के आंकड़ों के अनुसार, २००१ से २०२४ तक भारत में २.३ मिलियन हेक्टेयर ट्री कवर गायब हो गया, जिसमें प्राकृतिक जंगलों का बड़ा हिस्सा शामिल है। 

आदिवासी समुदाय, जो देश की कुल आबादी का मात्र ८.६% हैं, विकास परियोजनाओं से विस्थापित होने वालों में ४०% से ज्यादा हिस्सा रखते हैं। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में कोयला खदान, नर्मदा घाटी के बड़े बांध, ओडिशा और झारखंड के खनिज क्षेत्र – हर जगह आदिवासियों की पारंपरिक जमीन, जल स्रोत और जंगल छीन लिए गए। 

जंगल सिर्फ पेड़ नहीं होते। वे वर्षा चक्र को नियंत्रित करते हैं, भूजल रिचार्ज करते हैं, मिट्टी को बांधे रखते हैं और तापमान को संतुलित रखते हैं। जब लाखों-करोड़ों पेड़ कटते हैं तो:

- कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ता है  
- स्थानीय वर्षा घटती है  
- भूजल स्तर गिरता है  
- हीट आइलैंड इफेक्ट तेज होता है  

नतीजा? शहरों में कंक्रीट और एस्फाल्ट की दीवारें गर्मी को सोख लेती हैं और रात में वापस छोड़ती हैं, जिससे रात का तापमान भी नहीं गिरता।

 २०२६ की भीषण गर्मी: आंकड़े जो चेतावनी दे रहे हैं

इस साल अप्रैल में ही भारत ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। AQI.in के रीयल-टाइम डेटा के अनुसार, दुनिया के सबसे गर्म शहरों की लिस्ट पर लगभग पूरी तरह भारतीय शहरों का कब्जा है। भागलपुर, तालचेर, आसनसोल, मेदिनीपुर जैसे इलाकों में ४४-४५°C तापमान दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई शहर ४०-४३°C की चपेट में हैं।

मौसम विभाग (IMD) ने पहले ही कई राज्यों में हीटवेव की चेतावनी जारी की है। गर्मी सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा बन गई है। खेतों में फसलें जल रही हैं, मजदूर दोपहर में काम नहीं कर पा रहे, अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। पशुधन भी प्रभावित हो रहा है।

यह गर्मी अकेले प्राकृतिक नहीं है। इसमें मानवीय हस्तक्षेप की बड़ी भूमिका है। जंगलों की कटाई, नदियों पर बांध, पहाड़ों की खुदाई और शहरीकरण ने भूमि की नमी और हरियाली दोनों छीन ली है।

‘विकास’ का मॉडल: किसके लिए और किसकी कीमत पर?

पिछले १२ सालों में सरकार ने तेज गति से इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर जोर दिया। हाईवे, एयरपोर्ट, रेलवे कॉरिडोर, औद्योगिक गलियारे – सब जरूरी थे। लेकिन सवाल यह है कि यह विकास कितना समावेशी और पर्यावरण-अनुकूल था?

- आदिवासी इलाकों में बिना पर्याप्त पुनर्वास के भूमि अधिग्रहण  
- पर्यावरण मंजूरी में तेजी के नाम पर ढील  
- वन क्षेत्रों में माइनिंग को बढ़ावा  
- कृषि भूमि को नॉन-एग्रीकल्चरल यूज में बदलना  

नतीजा यह हुआ कि जो समुदाय सदियों से जंगल और जमीन के संरक्षक थे, उन्हें ही विस्थापित कर दिया गया। वे न तो पुरानी आजीविका पा सके और न नई। वहीं, शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में गर्मी बढ़ती गई क्योंकि आसपास की हरियाली खत्म हो गई।

आज देशवासी इस ‘विकास मॉडल’ की कीमत भुगत रहे हैं। किसान फसल नुकसान से परेशान, आदिवासी अपनी संस्कृति और आजीविका से वंचित, आम नागरिक भीषण गर्मी और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा है। 

 क्या यह ‘सरेंडर’ है?

जब विकास पर्यावरण और लोगों की कीमत पर हो तो उसे सच्चा विकास नहीं कहा जा सकता। प्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा आज सामने है – बढ़ती गर्मी, घटते जल स्रोत, बिगड़ता मौसम पैटर्न और असंतुलित पारिस्थितिकी।

वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि भारत अभी जलवायु संकट के सबसे बुरे प्रभावों को नहीं देखा है। अगर जंगलों की रक्षा, जल संरक्षण और सस्टेनेबल डेवलपमेंट को प्राथमिकता नहीं दी गई तो आने वाले सालों में स्थिति और बिगड़ सकती है।

 अब क्या किया जाए?

1. वन संरक्षण को प्राथमिकता: मौजूदा जंगलों को सख्ती से बचाएं, बड़े पैमाने पर वास्तविक वनीकरण करें (केवल कागजी आंकड़े नहीं)।  
2. आदिवासी अधिकारों का सम्मान: वन अधिकार अधिनियम (FRA) को प्रभावी ढंग से लागू करें, विस्थापितों को उचित पुनर्वास दें।  
3. सस्टेनेबल इंफ्रास्ट्रक्चर: हर बड़े प्रोजेक्ट में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन को गंभीरता से लें, ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाएं।  
4. शहरी नियोजन: शहरों में ग्रीन स्पेस बढ़ाएं, हीट आइलैंड प्रभाव कम करने के लिए पेड़ लगाएं और जल निकायों को बचाएं।  
5. जलवायु अनुकूलन: किसानों के लिए रेजिलिएंट फसलें, पानी की बचत वाली तकनीकें और स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण।

विकास जरूरी है, लेकिन वह प्रकृति और लोगों के साथ हो, उनके खिलाफ नहीं। ‘जल, जंगल, जमीन’ हमारी विरासत हैं। इन्हें बचाना सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि भविष्य की सुरक्षा का सवाल है।

अगर हम अभी नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ गर्मी ही नहीं, बल्कि विकास के नाम पर हुए विनाश की भारी कीमत चुकाएंगी। 

समय है सोचने का – क्या हम वाकई विकास कर रहे हैं या सिर्फ विनाश को नया नाम दे रहे हैं?

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 27,2026 
April 26, 2026

ગુજરાતના ગામોમાં ‘વિકાસ નહીં તો વોટ નહીં’નો રણકાર: સ્થાનિક ચૂંટણીમાં બહિષ્કારની આગ

ગુજરાતના ગામોમાં ‘વિકાસ નહીં તો વોટ નહીં’નો રણકાર: સ્થાનિક ચૂંટણીમાં બહિષ્કારની આગ
-Friday World-April 27,2026 
                પ્રતિકાતમક તસવીર 
આજે ગુજરાતમાં સ્થાનિક સ્વરાજ્યની ચૂંટણીનું મતદાન ચાલી રહ્યું છે. લોકશાહીના આ મહાપર્વમાં મતદાન કેન્દ્રો પર ઉત્સાહ જોવા મળવો જોઈએ, પરંતુ કેટલાક ગામોમાં સન્નાટો છવાયેલો છે. ગ્રામજનોએ સ્પષ્ટ સંદેશ આપ્યો છે – “રોડ નહીં તો વોટ નહીં, પુલ નહીં તો વોટ નહીં, વિકાસ નહીં તો વોટ નહીં.” 

મેઘપર ટીટોડી, કોટમદર, દેલા અને ડોકેલાવ જેવા ગામોમાં આ બહિષ્કારની લહેરે વહીવટી તંત્રને ચોંકાવી દીધું છે. આ ઘટનાઓ એક તરફ લોકોના અસંતોષને ઉજાગર કરે છે તો બીજી તરફ વિકાસના કામોમાં વહીવટી ઉદાસીનતાને પણ પ્રશ્નાર્થ ચિહ્ન લગાવે છે.

 મેઘપર ટીટોડી: જર્જરિત રસ્તાઓના વિરોધમાં સંપૂર્ણ બહિષ્કાર

દ્વારકા જિલ્લાના કલ્યાણપુર તાલુકાના મેઘપર ટીટોડી ગામમાં આજે સવારથી મતદાન મથકો પર એક પણ મત નથી પડ્યો. ગામને જોડતા મુખ્ય માર્ગો વર્ષોથી જર્જરિત હાલતમાં છે. વરસાદમાં પાણી ભરાઈ જાય છે, વાહનો અટવાઈ જાય છે અને દરરોજનું જીવન મુશ્કેલ બની ગયું છે. પ્રાથમિક સુવિધાઓના અભાવે ગ્રામજનોમાં ભારે અસંતોષ વ્યાપ્યો હતો. 

થોડા દિવસ પહેલા જ ગ્રામજનોએ જિલ્લા કલેક્ટર કચેરી ખાતે આવેદન આપીને ચૂંટણી બહિષ્કારની ચેતવણી આપી હતી. આજે તેમના શબ્દો સાચા પડ્યા. આખા ગામે એકજૂથ થઈને મતદાનનો બહિષ્કાર કર્યો છે. આ ઘટના દ્વારકા જિલ્લામાં ચર્ચાનો વિષય બની ગઈ છે.

કોટમદર ગામ: “રોડ નહીં તો વોટ નહીં, પુલ નહીં તો વોટ નહીં”

ડાંગ જિલ્લાના આહવા તાલુકાના કોટમદર ગામમાં પણ મતદાન શરૂ હોવા છતાં સન્નાટો છવાયેલો છે. ગ્રામજનોએ બેનરો લગાવીને સ્પષ્ટ સંદેશ આપ્યો છે – રસ્તા અને પુલ વિના મત નહીં. ગામમાં મૂળભૂત સુવિધાઓના અભાવે લોકો વર્ષોથી પીડાઈ રહ્યા છે. 

ગ્રામજનોએ ચેતવણી આપી છે કે જો સ્થાનિક ચૂંટણી પછી પણ પુલનું નિર્માણ નહીં થાય તો આગામી વિધાનસભા અને લોકસભા ચૂંટણીઓનો પણ બહિષ્કાર કરશે. આ આક્રોશ ડાંગ જિલ્લાના અન્ય વિસ્તારોમાં પણ પડઘા પાડી રહ્યો છે.

 દેલા ગામ, મહેસાણા: મનપામાંથી મુક્તિની માગ સાથે સંપૂર્ણ બહિષ્કાર

મહેસાણા જિલ્લાના દેલા ગામમાં મહાનગરપાલિકાની ચૂંટણીનો સંપૂર્ણ બહિષ્કાર નોંધાયો છે. ગામના એક પણ નાગરિકે મતદાન કર્યું નથી. મહેસાણા મનપામાં સમાવેશ પછી ગામના ખેડૂતોની જમીનો TP યોજનામાં કપાઈ જવાના વિરોધમાં આ નિર્ણય લેવામાં આવ્યો છે. 

ગ્રામજનો મનપામાંથી દેલા ગામને અલગ કરવાની માગ કરી રહ્યા છે. નજીકના ઉચરપી અને તાવડિયા ગામોમાં પણ મતદાન પ્રત્યે નિરસતા જોવા મળી છે. પ્રાંત અધિકારીએ ગામે આવીને સમજાવવાનો પ્રયાસ કર્યો, પરંતુ લોકો sv પોતાના નિર્ણય પર અડગ રહ્યા.

 ડોકેલાવ ગામ, લુણાવાડા: મતદાન બૂથ ૮ કિમી દૂર ખસેડાતા આક્રોશ

મહીસાગર જિલ્લાના લુણાવાડા તાલુકાના ડોકેલાવ ગામમાં મતદાન મથક બદલાતા ગ્રામજનોમાં ભારે રોષ ફેલાયો છે. નાયક અને બારીયા ફળિયાના મતદાન બૂથને ૮ કિમી દૂર ‘નવા ખાંટના મુવાડા’ ખાતે ખસેડી દેવામાં આવ્યા છે. 

વર્ષોથી ગામમાં જ મતદાન કરતા લોકોને કોઈ પૂર્વ સૂચના વગર આ ફેરફાર કરવામાં આવ્યો. વૃદ્ધો અને દિવ્યાંગ મતદારો માટે આ અંતર અસહ્ય છે. ૨૦૦થી વધુ મતદારો બહિષ્કારના મૂડમાં છે. ગ્રામજનોએ મામલતદારને રજૂઆત કરી હતી, પરંતુ કોઈ ફેરફાર ન થતા આક્રોશ વધ્યો છે. 

જિલ્લા કલેક્ટર, પોલીસ વડા અને DDOનો કાફલો ગામે પહોંચ્યો હતો. લોકોને સમજાવવાના પ્રયાસો થયા, પરંતુ ગ્રામજનો અડગ રહ્યા. તેઓએ સ્પષ્ટ કહ્યું કે સાંજ સુધીમાં ૧૫૭૪ મતદારોમાંથી એક પણ મત નહીં પડે.

આ બહિષ્કારનું મહત્વ શું છે?

આ ઘટનાઓ સ્થાનિક સ્તરે વિકાસના કામો અને મૂળભૂત સુવિધાઓના અભાવને રાજ્યના ધ્યાનમાં લાવે છે. ગ્રામજનોનો આ અસંતોષ એક તરફ લોકશાહીની તાકાત દર્શાવે છે તો બીજી તરફ વહીવટી તંત્રને પણ જવાબદાર બનાવે છે. 

જ્યારે લોકો વર્ષોથી પોતાની માગણીઓ રજૂ કરે છે અને તેનું નિરાકરણ નથી થતું ત્યારે બહિષ્કાર જેવા આત્યંતિક પગલાં લેવા પડે છે. આ ઘટનાઓ પછી તંત્રે તાત્કાલિક પગલાં લેવા પડ્યા છે, જે દર્શાવે છે કે લોકોનો અવાજ અવગણી શકાતો નથી.

ગુજરાતના આ ગામોની વાતો એક મોટો પાઠ છે – વિકાસ એ માત્ર યોજનાઓ અને ભાષણો નથી, તે લોકોના રોજિંદા જીવન સુધી પહોંચવો જોઈએ. જો રસ્તા, પુલ, પાણી અને જમીનના મુદ્દાઓ ઉકેલાશે નહીં તો લોકોનો વિશ્વાસ જીતવો મુશ્કેલ બનશે.

આ બહિષ્કારની લહેર રાજ્યના અન્ય વિસ્તારોમાં પણ પ્રભાવ પાડી રહી છે. તંત્રે આ તકે ગામડાઓના વિકાસને પ્રાથમિકતા આપવી જોઈએ જેથી આવનારી ચૂંટણીઓમાં લોકો વધુ ઉત્સાહથી ભાગ લઈ શકે. 

લોકશાહી ત્યારે જ મજબૂત બને છે જ્યારે લોકોની માગણીઓ સાંભળવામાં આવે અને તેમના જીવનમાં વાસ્તવિક ફેરફાર આવે. આ ગામોની વાતો એક યાદ અપાવે છે કે વિકાસ વિનાની ચૂંટણી માત્ર ઔપચારિકતા બની રહી જાય છે.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 27,2026 
April 26, 2026

मध्य पूर्व में तनाव के बीच ईरान की सक्रिय कूटनीति: पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने का फ्रेमवर्क पेश

मध्य पूर्व में तनाव के बीच ईरान की सक्रिय कूटनीति: पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका-इजरायल युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने का फ्रेमवर्क पेश
-Friday World-April 27,2026
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची की कूटनीति: इस्लामाबाद-मस्कट-मॉस्को का दौरा

तेहरान/इस्लामाबाद, 27 अप्रैल 2026 – ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची इन दिनों क्षेत्रीय शांति स्थापना के लिए तीव्र कूटनीतिक गतिविधियों में जुटे हुए हैं। ईरानी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, ओमान की अपनी एक दिवसीय यात्रा समाप्त करने के बाद अराघची रविवार को इस्लामाबाद लौट आए हैं और वहां से मॉस्को के लिए रवाना होने वाले हैं। यह दौरा अमेरिका-इजरायल द्वारा थोपे गए युद्ध को स्थायी रूप से समाप्त करने के प्रयासों का हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।

अराघची पिछले दो दिनों में पाकिस्तानी उच्चाधिकारियों से विस्तृत चर्चा कर चुके हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार सहित शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात की। इन बैठकों में ईरान ने अमेरिका-इजरायल युद्ध को पूरी तरह समाप्त करने के लिए एक व्यावहारिक ढांचा (workable framework) प्रस्तुत किया। अराघची ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि उन्होंने पाकिस्तान को ईरान की स्थिति स्पष्ट रूप से बताई है, लेकिन यह देखना बाकी है कि अमेरिका वास्तव में कूटनीति के प्रति कितना गंभीर है।

 यात्रा का क्रम और उद्देश्य
अराघची की यह त्रि-राष्ट्रीय यात्रा शुक्रवार को इस्लामाबाद पहुंचने से शुरू हुई। उन्होंने पाकिस्तान में क्षेत्रीय स्थिति, द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने और युद्ध समाप्ति के मुद्दों पर चर्चा की। इसके बाद शनिवार को वे मस्कट (ओमान) पहुंचे, जहां ओमानी सुल्तान हैथम बिन तारिक से मुलाकात हुई। ओमान ऐतिहासिक रूप से मध्य पूर्व में मध्यस्थता की भूमिका निभाता रहा है और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हरमुज जलडमरूमध्य के दूसरी ओर स्थित है।

ओमान यात्रा के दौरान अराघची ने क्षेत्रीय विकास, युद्ध की समाप्ति और हरमुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा पर चर्चा की। ओमान की यात्रा समाप्त करने के तुरंत बाद वे रविवार को इस्लामाबाद वापस लौट आए। आईआरएनए के मुताबिक, उनके प्रतिनिधिमंडल का एक हिस्सा परामर्श और आगे के निर्देशों के लिए तेहरान लौट चुका था, जो रविवार रात को इस्लामाबाद में उनसे मिलने वाला था।

इस्लामाबाद में छोटे ठहराव के बाद अराघची मॉस्को के लिए रवाना होंगे, जहां वे रूसी अधिकारियों और संभवतः राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात करेंगे। यह दौरा ईरान-रूस के मजबूत संबंधों को और गहरा करने तथा क्षेत्रीय मुद्दों पर समन्वय स्थापित करने का हिस्सा है।

 पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका
पाकिस्तान इस पूरे प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पुल की भूमिका निभा रहा है। इस्लामाबाद ने ईरान और अमेरिका के बीच अप्रत्यक्ष वार्ता को सुविधा प्रदान करने की कोशिश की है। अराघची की मुलाकातों में ईरान ने अपनी 'रेड लाइन्स' (लाल रेखाएं) स्पष्ट की हैं, जिनमें परमाणु मुद्दा, क्षेत्रीय सुरक्षा और हरमुज जलडमरूमध्य में नौवहन की स्वतंत्रता शामिल है।

पाकिस्तानी मीडिया और सरकारी सूत्रों के अनुसार, अराघची की पहली यात्रा 'बहुत फलदायी' रही। उन्होंने पाकिस्तान के 'भाईचारे वाले प्रयासों' की सराहना की, जो क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए किए जा रहे हैं। हालांकि, अमेरिकी पक्ष की ओर से कुछ भ्रम की स्थिति बनी रही। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान में प्रस्तावित अपनी दूतों की यात्रा रद्द कर दी, जिससे वार्ता की प्रगति पर सवाल उठे।

ईरान का स्पष्ट संदेश है कि वह युद्ध की समाप्ति चाहता है, लेकिन किसी भी समझौते में अपनी संप्रभुता और सुरक्षा हितों से समझौता नहीं करेगा। अराघची ने कहा कि अमेरिका-इजरायल 'आक्रामक' हैं और युद्ध के परिणामों की जिम्मेदारी उन्हें उठानी होगी।

 क्षेत्रीय संदर्भ और प्रभाव
यह कूटनीतिक दौरा मध्य पूर्व में चल रहे तनाव के बीच हो रहा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच आठ सप्ताह से अधिक का युद्ध क्षेत्र की स्थिरता को प्रभावित कर रहा है। हरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले तेल निर्यात पर खतरा मंडरा रहा है, जिसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है।

ईरान ओमान और पाकिस्तान जैसे देशों के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। रूस के साथ निकट संबंध ईरान को अतिरिक्त कूटनीतिक समर्थन प्रदान कर सकते हैं। मॉस्को यात्रा में द्विपक्षीय संबंधों के अलावा क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

पाकिस्तान की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस्लामाबाद ईरान के साथ अच्छे संबंध रखता है और अमेरिका के साथ भी संतुलित नीति अपनाता है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की बैठकें दर्शाती हैं कि पाकिस्तान युद्ध समाप्ति में सक्रिय योगदान देना चाहता है।

आगे की संभावनाएं
अराघची की मॉस्को यात्रा के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है। यदि अमेरिका कूटनीति के प्रति गंभीर साबित होता है, तो अप्रत्यक्ष वार्ता आगे बढ़ सकती है। लेकिन दोनों पक्षों की 'रेड लाइन्स' को देखते हुए प्रक्रिया जटिल हो सकती है।

ईरान का जोर है कि कोई भी समझौता स्थायी होना चाहिए और युद्ध की पुनरावृत्ति को रोके। पाकिस्तान ने भरोसा दिलाया है कि वह क्षेत्रीय शांति के लिए हर संभव प्रयास करेगा।

यह दौरा दर्शाता है कि कूटनीति अभी भी युद्ध का विकल्प है। मध्य पूर्व की शांति न केवल क्षेत्रीय देशों बल्कि पूरी दुनिया के हित में है। तेल की आपूर्ति, नौवहन सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता जैसे मुद्दे इससे जुड़े हैं।

अराघची की यह यात्रा ईरान की सक्रिय विदेश नीति का प्रतीक है, जो चुनौतियों के बीच भी संवाद का रास्ता तलाश रही है। पाकिस्तान, ओमान और रूस जैसे साझेदारों के साथ समन्वय बढ़ाना तेहरान की प्राथमिकता है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 27,2026
April 26, 2026

गाजीपुर की बेटी की मौत: FIR में देरी, बयान बदलने का दबाव और पथराव — क्या योगी सरकार में कानून-व्यवस्था फिर से सवालों के घेरे में?

गाजीपुर की बेटी की मौत: FIR में देरी, बयान बदलने का दबाव और पथराव — क्या योगी सरकार में कानून-व्यवस्था फिर से सवालों के घेरे में?
-Friday World-April 26,2026 
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के करंडा थाना क्षेत्र के कटारिया गांव में 15 अप्रैल 2026 को गंगा नदी में एक नाबालिग लड़की निशा विश्वकर्मा का शव मिला। परिवार ने इसे बलात्कार के बाद हत्या बताते हुए आरोप लगाया कि स्थानीय प्रभावशाली युवकों ने यह जघन्य अपराध किया। विपक्षी दलों ने इसे **हाथरस कांड का दोहराव** करार दिया। आरोप है कि पीड़ित परिवार पर बयान बदलने का दबाव डाला गया, FIR लिखवाने में देरी हुई और जब सपा नेताओं ने परिवार से मिलने की कोशिश की तो पथराव हुआ। 

यह घटना एक बार फिर उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा, गरीब-बेबस परिवारों पर दबाव और जातीय-वर्चस्व की राजनीति को लेकर सवाल खड़े कर रही है।

 घटना का क्रम और उठते सवाल

निशा विश्वकर्मा (लगभग 17 वर्ष) 14 अप्रैल की रात गायब हुई। अगले दिन उसका शव गंगा नदी में करीब तीन किलोमीटर दूर मिला। परिवार ने तुरंत थाने में शिकायत की, लेकिन आरोप है कि प्रारंभिक शिकायत में बलात्कार का जिक्र दर्ज नहीं किया गया। बाद में परिवार ने दावा किया कि स्थानीय वर्चस्ववादी तत्वों के दबाव में बयान बदले गए। 

मुख्य सवाल ये हैं:

- FIR लिखवाने में इतनी देरी क्यों हुई?
  परिवार का आरोप है कि घटना की सूचना मिलने के बावजूद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई नहीं की। अंततः हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया, लेकिन शुरुआती शिकायत में बलात्कार का पहलू शामिल नहीं था। पुलिस का पक्ष है कि प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डूबने (drowning) का संकेत था और आत्महत्या का एंगल भी सामने आया। हालांकि, परिवार और विपक्ष इसे साजिश बता रहा है।

- बातें क्यों बदलवाई गईं?
  विपक्ष (सपा और कांग्रेस) का दावा है कि पीड़ित परिवार को धमकाया गया और बयान बदलने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने इसे “गरीब-बेबस पीड़ितों पर दबाव” करार दिया। पुलिस ने मुख्य आरोपी हरिओम पांडे और अभिषेक पांडे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। फिर भी, परिवार का कहना है कि पूरी सच्चाई सामने नहीं आ रही।

- पुलिस पर पथराव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं?
  जब सपा नेता पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे तो गांव में पथराव हुआ। इसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। विपक्ष पूछ रहा है कि ऐसे वर्चस्ववादी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या स्थानीय प्रभावशाली लोग अभी भी पुलिस-प्रशासन को प्रभावित कर रहे हैं?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुछ भी कहा जाए, गांव के लोग अपनी ज़मीनी सच्चाई जानते हैं। आरोप है कि निशा विश्वकर्मा विश्वकर्मा (OBC) समाज से थीं और आरोपी प्रभावशाली समुदाय से जुड़े थे। यह पीड़ित ‘पीडीए परिवार’ और उत्पीड़क ‘वर्चस्ववादी’ का पैटर्न हाथरस (2020) से मिलता-जुलता बताया जा रहा है, जहां भी दलित लड़की पर ऊपरी जाति के युवकों द्वारा गैंगरेप और हत्या का आरोप लगा था।

 हाथरस और गाजीपुर: समानताएं और सबक

हाथरस कांड में 19 वर्षीय दलित लड़की पर कथित गैंगरेप हुआ, परिवार पर दबाव डाला गया, शव की रात में जबरन अंतिम संस्कार कर दिया गया और शुरू में बलात्कार से इनकार किया गया। CBI जांच के बाद भी मुकदमे में विवाद रहा — कुछ आरोपियों को बरी कर दिया गया। 

गाजीपुर में भी:
- पीड़ित परिवार गरीब और पिछड़े समुदाय से।
- आरोपियों पर वर्चस्व का आरोप।
- FIR में देरी और बयान में बदलाव के आरोप।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और पथराव।

ये घटनाएं दिखाती हैं कि उत्तर प्रदेश में जाति-आधारित हिंसा और महिलाओं के प्रति अपराध अभी भी एक गंभीर चुनौती बने हुए हैं। चाहे कोई भी सरकार हो, कानून-व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी मजबूत होती है जब गरीब परिवार बिना डर के न्याय मांग सके।

 योगी सरकार का पक्ष और कार्रवाई

उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस का कहना है कि मामले में त्वरित कार्रवाई की गई। मुख्य आरोपी गिरफ्तार हैं, जांच चल रही है। मुख्यमंत्री योगी आदितनाथ ने अतीत में कई बार महिलाओं की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता देने का दावा किया है। उन्होंने बार-बार कहा है कि अपराधियों को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वे किसी भी जाति-समुदाय के हों।

पुलिस ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम और प्रारंभिक जांच में आत्महत्या का एंगल भी है, लेकिन परिवार की शिकायत पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। गाजीपुर में पथराव की घटना पर भी जांच हो रही है।

फिर भी, विपक्ष का आरोप है कि “कमजोर मुख्यमंत्री” की छवि बन रही है क्योंकि गरीब परिवारों पर दबाव डालकर मामलों को दबाने की कोशिश की जा रही है। अखिलेश यादव और राहुल गांधी ने इसे “पीडीए परिवारों पर अत्याचार” बताया और उच्च स्तरीय जांच की मांग की।

 वास्तविकता: जटिल और बहुआयामी

ऐसी घटनाओं में सच्चाई अक्सर जटिल होती है:
- पोस्टमार्टम रिपोर्ट वैज्ञानिक सबूत देती है, लेकिन परिवार की गवाही भावनात्मक और सामाजिक संदर्भ रखती है।
- गांवों में जातीय समीकरण और वर्चस्व की पुरानी व्यवस्था अभी भी सक्रिय है।
- पुलिस पर दोनों तरफ से दबाव पड़ता है — एक तरफ प्रभावशाली लोग, दूसरी तरफ राजनीतिक दलों का।
- सोशल मीडिया और विपक्षी बयानबाजी घटना को और polarized कर देते हैं।

गाजीपुर जैसी घटनाएं समाज को चेतावनी देती हैं कि महिलाओं की सुरक्षा, खासकर गरीब और पिछड़े परिवारों की बेटियों की, अभी भी कमजोर कड़ी है। चाहे आत्महत्या हो या हत्या, किसी भी युवती की मौत दुखद है।

आगे क्या?

1. निष्पक्ष जांच: CBI या SIT जैसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए ताकि परिवार को न्याय मिले और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला रुके।
2. पुलिस सुधार: FIR दर्ज करने में देरी न हो, पीड़ित परिवार को तुरंत सुरक्षा मिले।
3. जातीय हिंसा पर सख्ती: वर्चस्ववादी तत्वों के खिलाफ बिना भेदभाव के कार्रवाई हो।
4. महिलाओं की सुरक्षा: स्कूल-कॉलेज से लेकर गांवों तक जागरूकता और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाए।
5. राजनीतिक परिपक्वता: घटना को सिर्फ वोट बैंक के लिए इस्तेमाल करने के बजाय न्याय सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाए।

गाजीपुर की बेटी की मौत एक दुखद घटना है। चाहे पोस्टमार्टम कुछ भी कहे, गांव की ज़मीनी सच्चाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर परिवार पर बयान बदलने का दबाव साबित होता है तो यह कानून-व्यवस्था की विफलता है। हाथरस जैसी पुरानी घटनाओं से सबक लेकर उत्तर प्रदेश सरकार को साबित करना होगा कि आज का UP हर बेटी के लिए सुरक्षित है — चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय की हो।

गरीबों में गुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में नहीं, बल्कि तेज, निष्पक्ष और पारदर्शी न्याय में है। जब तक हर पीड़ित परिवार बिना डर के FIR दर्ज करा सकेगा और अपराधी सजा पाएगा, तब तक “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” का नारा सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगा।

समाज को मिलकर लड़ना होगा — जाति से ऊपर उठकर, बेटियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देकर। गाजीपुर जैसी घटनाएं दोहराई न जाएं, यही असली न्याय होगा।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 26,2026 
April 26, 2026

ट्रंप का भारत पर ड्रग स्मगलिंग का आरोप: सच्चाई क्या है, राजनीति कितनी और तथ्य कितने?

ट्रंप का भारत पर ड्रग स्मगलिंग का आरोप: सच्चाई क्या है, राजनीति कितनी और तथ्य कितने?
-Friday World-April 26,2026 
                     प्रतिकात्मक तस्वीर 
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक बयान और अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में भारत को उन 23 देशों की सूची में शामिल किया है जिन्हें उन्होंने मेजर ड्रग ट्रांजिट या मेजर इलिसिट ड्रग प्रोड्यूसिंग कंट्रीज के रूप में नामित किया है। इस सूची में चीन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार, मैक्सिको और कोलंबिया जैसे देश भी शामिल हैं। ट्रंप प्रशासन ने कांग्रेस को सौंपी गई रिपोर्ट में कहा कि ये देश अवैध नशीले पदार्थों और उनके प्रीकर्सर केमिकल्स के उत्पादन व तस्करी के जरिए अमेरिका की सुरक्षा को खतरे में डाल रहे हैं।

यह बयान कई भारतीय नागरिकों के लिए चिंताजनक रहा। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया — “भारत अब गैंगस्टरों द्वारा चलाया जा रहा देश बन गया है”, “मोदी सरकार अफ्रीकी देशों को ड्रग्स निर्यात करने वालों को खुली छूट दे रही है”, “भारत की इज्जत मिट्टी में मिल गई”। लेकिन वास्तविकता को समझने के लिए तथ्यों की पड़ताल जरूरी है।

ट्रंप की रिपोर्ट क्या कहती है?

सितंबर 2025 में जारी प्रेसिडेंशियल डिटर्मिनेशन में ट्रंप ने 23 देशों को नामित किया। भारत को इसमें शामिल किया गया, लेकिन रिपोर्ट स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि भारतीय सरकार जानबूझकर ड्रग तस्करी को बढ़ावा दे रही है। बल्कि यह मुख्य रूप से उन देशों की पहचान करती है जहां से **फेंटानिल** जैसे सिंथेटिक ओपियोइड्स के प्रीकर्सर केमिकल्स या अन्य नशीले पदार्थों का ट्रांजिट/उत्पादन होता है। 

भारत में फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री दुनिया की सबसे बड़ी जेनेरिक दवाओं की उत्पादक है। यही कारण है कि कुछ केमिकल कंपनियां (जैसे वासुधा फार्मा केस) प्रीकर्सर केमिकल्स के अवैध निर्यात में फंसीं। अमेरिका ने ऐसे कुछ भारतीय अधिकारियों के वीजा भी रद्द किए। लेकिन साथ ही, रिपोर्ट में भारत के साथ सहयोग की सराहना भी की गई है।

 भारत की वास्तविक स्थिति और प्रयास

भारत ड्रग तस्करी का शिकार भी है और कुछ हद तक ट्रांजिट पॉइंट भी। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा से हेरोइन और अफीम आती है, जबकि कुछ सिंथेटिक ड्रग्स दक्षिण-पूर्व एशिया या अफ्रीका रूट से गुजरते हैं। हाल के वर्षों में पंजाब, गुजरात, महाराष्ट्र और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में ड्रग समस्या बढ़ी है।

लेकिन मोदी सरकार और केंद्र की एजेंसियां इसे नजरअंदाज नहीं कर रही हैं:

- नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने 2026 के पहले तीन महीनों (जनवरी-मार्च) में ही 73 दोषियों को सजा दिलाई। इनमें चार को 20 साल की सजा और 54 को 10 साल या उससे अधिक की सजा हुई। कुल 1.22 करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया।
- अंतरराष्ट्रीय मामलों में NCB ने पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आने वाली हेरोइन की खेपें पकड़ीं। अहमदाबाद एयरपोर्ट और फाजिल्का बॉर्डर के केस में विदेशी तस्करों को 20-20 साल की सजा हुई।
- सरकार ने 2022-2024 के बीच 20.8 लाख किलोग्राम नशीले पदार्थ नष्ट किए।
- PM मोदी ने G20 समिट में ग्लोबल फ्रंट अगेंस्ट ड्रग टेरर नेक्सस** का प्रस्ताव रखा। भारत-अमेरिका के बीच ड्रग पॉलिसी वर्किंग ग्रुप भी सक्रिय है।

हालांकि, कुछ रिपोर्ट्स (जैसे बेलिंगकैट की जांच) में भारत से पश्चिम अफ्रीका को टैपेंटाडोल जैसे ओपियोइड्स की बड़ी खेपों के बारे में चिंता जताई गई है। ये मुख्य रूप से फार्मास्यूटिकल कंपनियों से लीगल एक्सपोर्ट के रूप में शुरू होकर अवैध नेटवर्क तक पहुंच जाती हैं। यहां नियामक कमजोरियां और करप्शन की भूमिका हो सकती है, लेकिन इसे पूरे देश या सरकार को “गैंगस्टरों द्वारा चलाया जा रहा” कहना अतिशयोक्ति है।

 राजनीतिक रंग क्यों चढ़ा?

ट्रंप का बयान कई बार व्यापार युद्ध और टैरिफ नीति से जुड़ा दिखता है। भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ पर तनाव रहा है। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ड्रग लिस्ट को कभी-कभी दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। चीन को रिपोर्ट में सबसे बड़ा स्रोत बताया गया, फिर भी ट्रंप अक्सर भारत पर भी निशाना साधते हैं।

दूसरी ओर, भारत में विपक्षी पार्टियां और कुछ सोशल मीडिया हैंडल इस मुद्दे को मोदी सरकार के खिलाफ इस्तेमाल कर रहे हैं। “अफ्रीकी देशों को ड्रग्स निर्यात” वाली बात आंशिक रूप से उन रिपोर्ट्स पर आधारित है जहां भारत से अवैध फार्मा प्रोडक्ट्स अफ्रीका पहुंच रहे हैं, लेकिन यह सरकारी नीति नहीं बल्कि कुछ बेईमान व्यापारियों का काम है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में कानून प्रवर्तन एजेंसियां स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। NCB, ED, CBI और राज्य पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही हैं। अगर कुछ गैंगस्टर राजनीतिक संरक्षण ले रहे हैं तो यह गंभीर मुद्दा है, लेकिन पूरे देश को “अपराधी गैंग द्वारा चलाया जा रहा” कहना न सिर्फ गलत है बल्कि भारत की छवि को अनावश्यक रूप से नुकसान पहुंचाता है।

 ड्रग समस्या: वैश्विक चुनौती

ड्रग तस्करी कोई एक देश की समस्या नहीं। 
- चीन फेंटानिल प्रीकर्सर का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है।
- अफगानिस्तान अफीम का प्रमुख उत्पादक।
- मैक्सिको और कोलंबिया कार्टेल्स अमेरिका में ड्रग्स पहुंचाते हैं।
- अफ्रीका अब नया ट्रांजिट हब बन रहा है।

भारत में युवाओं के बीच ड्रग्स का बढ़ता सेवन चिंताजनक है। पंजाब और उत्तर भारत के कई इलाकों में यह सामाजिक संकट बन चुका है। सरकार को और सख्ती बरतनी चाहिए — बॉर्डर सुरक्षा मजबूत करना, फार्मा एक्सपोर्ट पर बेहतर निगरानी, डार्कनेट ट्रैफिकिंग पर कंट्रोल और पुनर्वास कार्यक्रम चलाना।

भारत की इज्जत: तथ्यों पर टिकी है

भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यह फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, स्पेस और रक्षा क्षेत्र में मजबूत है। अमेरिका के साथ उसका रणनीतिक साझेदारी QUAD, iCET और व्यापार संबंधों पर आधारित है। एक वार्षिक रिपोर्ट में नाम आने से भारत की वैश्विक इज्जत “मिट्टी में नहीं मिलती”। 

कई देशों ने भारत के साथ ड्रग काउंटर नारकोटिक्स सहयोग बढ़ाया है। हाल ही में अमेरिका ने NCB की मदद से कुछ फेंटानिल नेटवर्क तोड़े और सराहना की।

 आगे का रास्ता

ट्रंप के बयान को गंभीरता से लेते हुए भारत को चाहिए:
1. फार्मास्यूटिकल एक्सपोर्ट पर सख्त रेगुलेशन और ट्रैकिंग सिस्टम।
2. NCB को और मजबूत बनाना, स्टेट पुलिस के साथ बेहतर कोऑर्डिनेशन।
3. अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना — अमेरिका, UNODC और पड़ोसी देशों के साथ।
4. युवाओं में जागरूकता अभियान और ड्रग फ्री इंडिया मिशन को तेज करना।

अंधेरे में तीर चलाने या राजनीतिक हमले करने से बेहतर है कि हम समस्या को जड़ से सुलझाएं। ड्रग तस्करी एक वैश्विक खतरा है। भारत अगर इसमें अपनी भूमिका निभाता है तो न सिर्फ अपनी युवा पीढ़ी बचाएगा बल्कि विश्व मंच पर अपनी विश्वसनीयता भी बढ़ाएगा।

 ट्रंप की सूची में भारत का नाम शामिल होना चेतावनी है, लेकिन पूरे देश को “गैंगस्टर राज्य” बताना अतिरंजित और गलत है। भारत सरकार ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई कर रही है, लेकिन और ज्यादा पारदर्शिता, सख्ती और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है। असली लड़ाई नारकोटिक्स के खिलाफ है — राजनीति नहीं। जब तक हम तथ्यों पर खड़े रहेंगे, भारत की इज्जत मजबूत रहेगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 26,2026