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यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Thursday, 5 February 2026

February 05, 2026

આસારામનું મોટેરા આશ્રમ તૂટવાના માર્ગે: ગુજરાત હાઈકોર્ટની મોટી મંજૂરી, ૪૫,૦૦૦ ચો.મી. જાહેર જમીન પરત લેવા લીલીઝંડી

આસારામનું મોટેરા આશ્રમ તૂટવાના માર્ગે: ગુજરાત હાઈકોર્ટની મોટી મંજૂરી, ૪૫,૦૦૦ ચો.મી. જાહેર જમીન પરત લેવા લીલીઝંડી -Friday world 5/2/2026
          ૫૦૦ કરોડની જમીન પર બુલડોઝર ફરશે! 

અમદાવાદ: રેપ કેસમાં આજીવન કેદની સજા ભોગવી રહેલા આસારામ બાપુના મોટેરા આશ્રમ માટે મોટો ઝટકો! ગુજરાત હાઈકોર્ટે રાજ્ય સરકારને ૪૫,૦૦૦ ચોરસ મીટરથી વધુ જાહેર જમીન પાછી લેવાની મંજૂરી આપી દીધી છે. આ જમીનનું મૂલ્ય આશરે ૫૦૦ કરોડ રૂપિયા આંકવામાં આવ્યું છે. હવે આ વિસ્તાર પર બનેલા ૩૦થી વધુ ગેરકાયદેસર બાંધકામો પર બુલડોઝર ફરી વળશે અને આશ્રમનું સરનામું વિખરાઈ જશે. 

આ ઐતિહાસિક નિર્ણય ગુજરાત હાઈકોર્ટના જસ્ટિસ વી. ડી. નાનાવટીએ આપ્યો છે. કોર્ટે આશ્રમને જમીન છોડવા માટે બે અઠવાડિયાનો સમય આપ્યો છે, જે અમદાવાદ મ્યુનિસિપલ કોર્પોરેશન (AMC)ની એવિક્શન નોટિસ સાથે સુસંગત છે. આ નિર્ણયથી મોટેરા વિસ્તારમાં સરદાર પટેલ સ્પોર્ટ્સ એન્ક્લેવ, ઓલિમ્પિક વિલેજ અને અન્ય રમતગમત સુવિધાઓના વિકાસ માટે માર્ગ મોકળો થયો છે. 

વિવાદની શરૂઆત અને કોર્ટની કડક ટિપ્પણી આ જમીન દાયકાઓ પહેલાં મર્યાદિત ધાર્મિક ઉપયોગ માટે ફાળવવામાં આવી હતી. પરંતુ તપાસમાં બહાર આવ્યું કે આશ્રમે કાયદેસર સીમાઓને પાર કરીને વ્યાપક અનધિકૃત બાંધકામ કર્યા છે. જમીન ફાળવણીની શરતો સ્પષ્ટ હતી – કોઈ વ્યાવસાયિક પ્રવૃત્તિ નહીં, કોઈ અનધિકૃત બાંધકામ નહીં અને તમામ મંજૂરીઓનું કડક પાલન. તેમ છતાં આશ્રમે ફાળવેલી જમીન કરતાં ઘણી વધુ જમીન પર કબજો કરી લીધો હતો.

 રાજ્ય સરકારના મુખ્ય સરકારી વકીલ જી.એચ. વિર્કેએ કોર્ટમાં મજબૂત દલીલ કરી કે આ કોઈ અચાનક કાર્યવાહી નથી, પરંતુ લાંબા સમયની ધીરજપૂર્વકની પ્રક્રિયાનું પરિણામ છે. આશ્રમને અનેક વખત નોટિસ આપવામાં આવી, સુનાવણીઓ કરવામાં આવી અને તકો આપવામાં આવી. આશ્રમે પોતે અનધિકૃત બાંધકામને નિયમિત કરવાની અરજીઓ કરી હતી, જે તેમની ભૂલને સ્વીકારતી હતી. 

કોર્ટે નોંધ્યું કે જાહેર જમીન પર ઇંચે-ઇંચે અતિક્રમણ કરીને પછી તેને કાયદેસર બનાવવાનો પ્રયાસ સ્વીકાર્ય નથી. આ જમીનનો ઉપયોગ જાહેર હિતમાં – ખાસ કરીને રમતગમત અને શહેરી વિકાસ માટે – કરવો જરૂરી છે. 

મોટેરા – અમદાવાદનું નવું રમતગમત કેન્દ્ર મોટેરા વિસ્તાર હાલમાં વિશ્વના સૌથી મોટા ક્રિકેટ સ્ટેડિયમ – નરેન્દ્ર મોદી સ્ટેડિયમ – નું ઘર છે. આ વિસ્તારમાં સરદાર પટેલ સ્પોર્ટ્સ કોમ્પ્લેક્સ અને સાબરમતી રિવરફ્રન્ટ પણ આવેલા છે. અમદાવાદ ૨૦૩૦માં કોમનવેલ્થ ગેમ્સ અને લાંબા ગાળે ૨૦૩૬ ઓલિમ્પિક્સ માટે તૈયારીઓ કરી રહ્યું છે. આ માટે આશરે ૬૫૦ એકર જમીનની જરૂર છે, જેમાં મોટેરા આશ્રમની જમીન મહત્વનો ભાગ છે. 

આ વિકાસથી અમદાવાદને આંતરરાષ્ટ્રીય રમતગમતનું હબ બનાવવાનું સપનું સાકાર થશે. સરકારનું કહેવું છે કે આ જમીન જાહેર હિત અને શહેરના ભવિષ્ય માટે જરૂરી છે. 

આસારામના વિવાદિત ઇતિહાસનો અંત? આસારામ બાપુ ૨૦૧૮માં જોધપુરમાં નાબાલિકા પર બળાત્કારના કેસમાં આજીવન કેદની સજા ભોગવી રહ્યા છે. ૨૦૨૩માં મોટેરા આશ્રમમાં એક મહિલા અનુયાયિની પર જાતીય શોષણના કેસમાં પણ આજીવન કેદની સજા થઈ છે. આ જમીન પરના અતિક્રમણ અને ગેરકાયદેસર બાંધકામોના કારણે વર્ષોથી વિવાદ ચાલતો હતો. AMCએ જાન્યુઆરી ૨૦૨૬માં ૩૨ ગેરકાયદેસર બાંધકામોને નિયમિત કરવાની અરજી નકારી હતી. 

હવે હાઈકોર્ટના આ નિર્ણયથી આ વિવાદનો અંત આવ્યો છે. આશ્રમને જમીન છોડવી પડશે અને બુલડોઝરની કાર્યવાહી શરૂ થશે. આ નિર્ણય જાહેર જમીનના રક્ષણ અને કાયદાના શાસનની જીત તરીકે જોવામાં આવી રહ્યો છે. 

અમદાવાદના લોકો માટે આ એક મોટો વિકાસ છે – એક બાજુ વિવાદિત આશ્રમનો અંત, બીજી બાજુ રમતગમત અને શહેરી વિકાસની નવી શરૂઆત. શું આ બદલાવ અમદાવાદને વૈશ્વિક સ્તરે નવી ઓળખ આપશે? સમય જ કહેશે.

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

संसद में आग! प्रियंका गांधी का तीखा हमला: "पीएम मोदी स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं, हिम्मत नहीं रही सदन में आने की!"

संसद में आग! प्रियंका गांधी का तीखा हमला: "पीएम मोदी स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं, हिम्मत नहीं रही सदन में आने की!" -Friday world 5/2/2026

नई दिल्ली: संसद की कार्यवाही इन दिनों राजनीतिक जंग का मैदान बन चुकी है। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सदन में न आने और लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के विवादास्पद बयान ने विपक्ष को हमला बोलने का मौका दे दिया। कांग्रेस महासचिव और वायनाड से सांसद **प्रियंका गांधी वाड्रा** ने गुरुवार (5 फरवरी 2026) को स्पीकर के दावे पर कड़ा पलटवार करते हुए कहा कि पीएम मोदी अब "स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं" और विपक्ष पर लगाए गए आरोप "पूरी तरह झूठ" हैं। 

प्रियंका गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बातचीत में कहा, "प्रधानमंत्री अब स्पीकर के पीछे छिप रहे हैं। उनमें कल सदन में आने की हिम्मत नहीं हुई।" उन्होंने स्पष्ट किया कि पीएम मोदी को चोट पहुंचाने या कोई अप्रिय घटना करने की कोई योजना नहीं थी – "यह पूरी तरह झूठ है... इस बात का कोई सवाल ही नहीं उठता कि प्रधानमंत्री के साथ ऐसा कुछ करने की कोई योजना थी।" प्रियंका ने आगे तंज कसा, "तीन महिला सांसद उनकी सीट के सामने खड़ी थीं, क्या इसी वजह से पीएम सदन नहीं आए? यह क्या बकवास है!"

 यह सब तब शुरू हुआ जब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बुधवार को सदन में कहा कि उन्हें "पक्की जानकारी" मिली थी कि कुछ कांग्रेस सांसद प्रधानमंत्री की कुर्सी के पास पहुंचकर "अप्रत्याशित हरकत" कर सकते थे। बिरला ने दावा किया कि अगर ऐसा होता तो संसदीय परंपराओं को गहरा झटका लगता, इसलिए उन्होंने पीएम से सदन न आने की सलाह दी। स्पीकर ने इसे लोकतंत्र की रक्षा का कदम बताया और कहा कि पीएम ने उनकी सलाह मानकर "अप्रिय घटना" को रोका।

 लेकिन विपक्ष ने इसे "झूठा बहाना" करार दिया। प्रियंका गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार स्पीकर से "यह सब कहलवा रही है" क्योंकि पीएम में जवाब देने की हिम्मत नहीं बची। उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार नेता प्रतिपक्ष को बोलने क्यों नहीं दे रही? "क्या उनके पास कोई आधार है कि एक सोर्स का उद्धरण देने से रोका जाए? उनके पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है। तथ्य यह है कि चर्चा इसलिए नहीं हुई क्योंकि सरकार चर्चा के लिए तैयार नहीं थी।"

 इस बीच, शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने भी स्पीकर के बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी "भारत में सबसे सुरक्षित व्यक्ति" हैं। "उनके लिए यह कहना कि उन्हें महिला सांसदों से खतरा था, यह महिला सांसदों पर दी गई दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी है।" चतुर्वेदी ने इसे महिलाओं की गरिमा पर हमला बताया।

 कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर इसे और तेज कर दिया। उन्होंने लिखा, "लोकसभा स्पीकर के दफ्तर से मीडिया में खबरें डलवाई जा रही हैं कि कांग्रेस पार्टी ने महिला सांसदों के जरिए कल प्रधानमंत्री पर 'हमला' करने की योजना बनाई थी।" खेड़ा ने पूछा, "क्या किसी महिला का विरोध करना आतंकवाद माना जाता है? क्या वे उन्हें अछूत मानते हैं? मोदी सरकार और उसके चापलूस पत्रकारों को देश की महिलाओं से, खासकर दलित महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए।" 

यह विवाद संसद में जारी गतिरोध का नया अध्याय है। विपक्ष का कहना है कि सरकार बहस से भाग रही है, जबकि सत्ता पक्ष इसे "संसदीय मर्यादा की रक्षा" बता रहा है। प्रियंका गांधी के शब्दों में यह "छिपने" की राजनीति है, जहां पीएम जवाब देने के बजाय स्पीकर की आड़ ले रहे हैं। 

संसद की ये बहसें लोकतंत्र की ताकत दिखाती हैं, लेकिन साथ ही गहरे राजनीतिक विभाजन को भी उजागर करती हैं। क्या यह सिर्फ एक दिन का हंगामा है या लंबे समय तक चलने वाली जंग की शुरुआत? आने वाले दिनों में सदन की कार्यवाही और बयानबाजी से जवाब मिलेगा। फिलहाल, "स्पीकर के पीछे छिप रहे पीएम" वाला तंज राजनीतिक गलियारों में गूंजता रहेगा! 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

ट्रंप का तीखा तीर: जो बाइडन को करार दिया 'अमेरिकी इतिहास का सबसे खराब राष्ट्रपति'!

ट्रंप का तीखा तीर: जो बाइडन को करार दिया 'अमेरिकी इतिहास का सबसे खराब राष्ट्रपति'!
-Friday world 5/2/2026
वाशिंगटन डीसी की गलियों में एक बार फिर गूंजा डोनाल्ड ट्रंप का पुराना राग – पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन पर जमकर निशाना! ट्रंप ने हाल के बयानों में बाइडन को न सिर्फ "सबसे खराब राष्ट्रपति" बताया, बल्कि यह भी कहा कि उन्हें राष्ट्रपति बनने का मतलब ही समझ नहीं आया। ट्रंप की यह आलोचना अब लगभग रोजमर्रा की बात बन चुकी है, जहां वे बाइडन के कार्यकाल को "आर्थिक तबाही", "खुली सीमाओं" और "राष्ट्रीय कमजोरी" का प्रतीक बताते हैं, जबकि खुद की वापसी को "अमेरिका को बचाने" का मिशन करार देते हैं। 

ट्रंप ने एक संबोधन में साफ-साफ कहा, "जो बाइडन अमेरिकी इतिहास के सबसे खराब राष्ट्रपति रहे हैं। उन्हें पता ही नहीं था कि राष्ट्रपति होना क्या चीज है।" उन्होंने आगे जोड़ा, "मैं नहीं चाहता कि इसे कोई व्यक्तिगत रूप से लें, लेकिन सच यही है – वह हमारे सबसे खराब राष्ट्रपति थे।" ट्रंप ने यहां रुकने की बजाय पुराने प्रतिद्वंद्वी बाराक ओबामा को भी घसीटा और कहा, "हमारे पास कुछ और भी खराब रहे हैं, जैसे ओबामा, जो देश को बांटने वाले थे। लेकिन अब हम देश को एकजुट कर रहे हैं।" 

यह बयान ट्रंप की क्लासिक स्टाइल को बयां करता है – विरोधियों पर व्यक्तिगत हमले, अपनी उपलब्धियों को चमकाना और पुरानी राजनीतिक दुश्मनी को जिंदा रखना। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी सरकार के आने के बाद अमेरिका में निवेश का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ है, "जितना पहले कभी किसी ने नहीं देखा।" वे बार-बार बाइडन को मुद्रास्फीति, अवैध आप्रवासन और विदेश नीति की कमजोरियों के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। 

हाल के महीनों में ट्रंप के कई मौकों पर ऐसे बयान आए हैं। मार्च 2025 में कांग्रेस के संयुक्त सत्र में उन्होंने बाइडन को "worst president in American history" कहा, जहां उन्होंने बाइडन के कार्यकाल में "सैकड़ों हजारों अवैध घुसपैठ" और "अंडों की कीमतों में उछाल" जैसी बातों का जिक्र किया। दिसंबर 2025 में व्हाइट हाउस में "Presidential Walk of Fame" बनाया गया, जहां बाइडन की जगह सिर्फ उनके ऑटोपेन साइनेचर की तस्वीर लगाई गई और प्लाक पर लिखा – "Sleepy Joe Biden was, by far, the worst President in American History." ओबामा को "most divisive" बताया गया। 

ट्रंप की यह रणनीति साफ दिखती है: पुराने "दुश्मन" को निशाना बनाकर वर्तमान सफलताओं को हाईलाइट करना। वे कहते हैं, "बाइडन को पता ही नहीं चलता कि मैं क्या कह रहा हूं" – जो उनकी उम्र और मानसिक स्थिति पर तंज कसने का तरीका है। ट्रंप के समर्थक इसे "सच्चाई" मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक बदले की भावना और विभाजनकारी भाषा कहते हैं।

 ट्रंप का संदेश एकदम स्पष्ट है – "बाइडन के समय देश बर्बादी की कगार पर था, लेकिन अब हम फिर से महान बन रहे हैं।" चाहे अर्थव्यवस्था हो, सीमा सुरक्षा हो या अंतरराष्ट्रीय छवि – हर मुद्दे पर बाइडन को दोषी ठहराकर ट्रंप खुद को "सुधारक" के रूप में पेश करते हैं।

 यह बयान अमेरिकी राजनीति की कड़वी हकीकत को उजागर करता है, जहां पूर्व और वर्तमान नेताओं के बीच दुश्मनी कभी खत्म नहीं होती। ट्रंप की जुबान से निकले ये शब्द अब वाशिंगटन की हवा में तैरते रहेंगे – "Sleepy Joe सबसे खराब था, और अब अमेरिका वापस ट्रैक पर है!" 

क्या यह सिर्फ पुरानी यादें ताजा करने का खेल है, या आने वाले चुनावों की तैयारी? वक्त ही बताएगा। फिलहाल, ट्रंप की यह आगामी बयानबाजी राजनीतिक बहस को और गरमाती रहेगी! 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने एप्स्टीन पीड़ितों से मांगी माफी: "मैंने मैंडलसन के झूठ पर भरोसा किया"

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने एप्स्टीन पीड़ितों से मांगी माफी: "मैंने मैंडलसन के झूठ पर भरोसा किया"
-Friday world 5/2/2026
लंदन: ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने हाल ही में एक बड़े राजनीतिक विवाद के बीच जेफरी एप्स्टीन के यौन शोषण के शिकार लोगों से खुलकर माफी मांगी है। यह माफी पूर्व लेबर नेता और ब्रिटिश राजनेता **पीटर मैंडलसन** को अमेरिका में ब्रिटेन का राजदूत नियुक्त करने के फैसले को लेकर है। स्टार्मर ने स्वीकार किया कि उन्होंने मैंडलसन के झूठ पर विश्वास कर लिया, जिससे ताकतवर लोगों के खिलाफ न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हुई। 

 विवाद की जड़ क्या है? दिसंबर 2024 में कीर स्टार्मर ने पीटर मैंडलसन को वॉशिंगटन में ब्रिटेन का राजदूत नियुक्त किया था। मैंडलसन लंबे समय से लेबर पार्टी के प्रभावशाली नेता रहे हैं, लेकिन उनकी जेफरी एप्स्टीन से गहरी दोस्ती पहले से विवादास्पद थी। एप्स्टीन, जो एक अमेरिकी फाइनेंशियर थे, 2008 में नाबालिग लड़कियों के यौन शोषण के लिए दोषी ठहराए गए थे। 2019 में जेल में उनकी मौत हो गई, लेकिन उनके मामले की जांच आज भी जारी है। 

हाल ही में अमेरिकी जस्टिस डिपार्टमेंट ने एप्स्टीन से जुड़ी नई फाइलें जारी कीं, जिनमें मैंडलसन और एप्स्टीन के बीच ईमेल और अन्य सबूत शामिल थे। इनमें मैंडलसन द्वारा एप्स्टीन को "बेस्ट पाल" कहने जैसे संकेत मिले, जबकि नियुक्ति के दौरान मैंडलसन ने दावा किया था कि वे एप्स्टीन को "बमुश्किल जानते थे"। इस खुलासे के बाद सितंबर 2025 में मैंडलसन को राजदूत पद से हटा दिया गया, लेकिन अब यह मामला स्टार्मर की साख पर भारी पड़ रहा है। 

स्टार्मर का भावुक बयान 5 फरवरी 2026 को ईस्ट ससेक्स में दिए गए एक भाषण में स्टार्मर ने पीड़ितों से सीधे संबोधित करते हुए कहा: 

"मैं माफी मांगता हूं। आपके साथ जो हुआ, उसके लिए माफी। इस बात के लिए माफी कि ताकतवर लोगों ने आपको बार-बार निराश किया। मैं माफी मांगता हूं कि मैंने मैंडलसन के झूठ पर भरोसा किया और उन्हें नियुक्त किया। और माफी मांगता हूं कि आज भी आपको यह सब सार्वजनिक रूप से देखना पड़ रहा है।"

" स्टार्मर ने आगे कहा कि वे लोगों के गुस्से को महसूस कर रहे हैं। उन्होंने जोर दिया कि मैंडलसन ने वेटिंग प्रक्रिया में धोखा दिया और एप्स्टीन से अपने संबंधों की गहराई छिपाई। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि वे मैंडलसन की फाइलें जल्द जारी करना चाहते हैं, लेकिन पुलिस की सलाह के खिलाफ जाकर जांच या कानूनी प्रक्रिया को खतरे में नहीं डालेंगे। 

राजनीतिक दबाव और आलोचना यह मामला स्टार्मर सरकार के लिए बड़ा संकट बन गया है। लेबर पार्टी के अंदरूनी सांसदों और विपक्षी नेताओं ने उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। कुछ ने तो इस्तीफे की मांग भी की। स्टार्मर ने इस्तीफे से इनकार करते हुए कहा कि वे झूठे कदम नहीं उठाएंगे, जो पीड़ितों के न्याय को प्रभावित कर सकता है। 

यह घटना ब्रिटेन में ताकतवर लोगों के खिलाफ जवाबदेही की बहस को फिर से गरमा रही है। एप्स्टीन मामले में कई हाई-प्रोफाइल नाम पहले ही सामने आ चुके हैं, और अब मैंडलसन-स्टार्मर कनेक्शन ने इसे नया आयाम दिया है।


 न्याय की राह में बाधा? कीर स्टार्मर का यह माफी बयान राजनीतिक मजबूरी से ज्यादा पीड़ितों के प्रति संवेदना दिखाने की कोशिश लगता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पर्याप्त होगा? ब्रिटेन की जनता और मीडिया इस मामले को लेकर सतर्क है। स्टार्मर ने वादा किया है कि सच्चाई सामने आएगी और दोषियों को जवाबदेह ठहराया जाएगा।

 यह घटना याद दिलाती है कि राजनीति में व्यक्तिगत संबंध और फैसले कितने खतरनाक हो सकते हैं, खासकर जब वे किसी बड़े अपराध से जुड़े हों। एप्स्टीन के पीड़ितों के लिए न्याय अभी भी अधूरा है, और स्टार्मर की माफी शायद शुरुआत भर है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

"अंधेरे सुरंगों में दम तोड़ते मजदूर: मेघालय का एक और रैट-होल हादसा, 18 जिंदगियां राख, कानून की नींद अभी भी गहरी"

"अंधेरे सुरंगों में दम तोड़ते मजदूर: मेघालय का एक और रैट-होल हादसा, 18 जिंदगियां राख, कानून की नींद अभी भी गहरी" -Friday world 5/2/2026
        प्रतिकात्मक तस्वीर 
मेघालय खदान हादसा: मौत का आंकड़ा 18 पर पहुंचा, रैट-होल माइनिंग की काली सच्चाई फिर उजागर 

मेघालय के पूर्वी जैंतिया हिल्स जिले में 5 फरवरी 2026 को एक बार फिर मौत ने दस्तक दी। थंगस्काई (Thangskai) इलाके की एक गैर-कानूनी रैट-होल कोयला खदान में विस्फोट हुआ, जिसमें अब तक 18 मजदूरों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। एक घायल मजदूर को शिलांग के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जबकि कई और लोग अभी भी सुरंग के अंदर फंसे होने की आशंका है। 

पूर्वी जैंतिया हिल्स के पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने मीडिया को बताया, "हादसे के दौरान बचाव अभियान में 18 शव बरामद हुए हैं। शवों की अभी पहचान नहीं हो पाई है। हम खदान मालिकों और संचालकों की जानकारी जुटा रहे हैं, जल्द सख्त कार्रवाई होगी।" डीजीपी आई. नोंगरांग ने भी कहा कि खदान के अंदर कितने लोग थे और कितने फंसे हैं, इसकी सटीक जानकारी अभी नहीं है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और स्थानीय बचाव दल लगातार कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उपकरणों की कमी और सुरंग की गहराई ने काम को मुश्किल बना दिया है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पीएमएनआरएफ से प्रत्येक मृतक के परिजनों को 2 लाख रुपये और घायल को 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की है। मुख्यमंत्री कोनराड के. सांगमा ने भी घटना की जांच के आदेश दिए हैं और जिम्मेदारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया है। लेकिन सवाल ये है—क्या ये घोषणाएं और जांचें मौतों को रोक पाएंगी? 

 रैट-होल माइनिंग: मौत का काला खेल रैट-होल माइनिंग कोयला निकालने की सबसे खतरनाक और गैर-कानूनी विधि है। इसमें संकरी, क्षैतिज सुरंगें बनाई जाती हैं—जिन्हें 'चूहे के बिल' जैसा कहा जाता है। एक व्यक्ति मुश्किल से अंदर जा सकता है। कोई सुरक्षा उपकरण नहीं, कोई वेंटिलेशन सिस्टम नहीं, कोई इमरजेंसी एग्जिट नहीं। डायनामाइट से ब्लास्टिंग होती है, जिससे मीथेन गैस या धूल जमा होकर विस्फोट हो जाता है। 

2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मेघालय में रैट-होल माइनिंग और कोयला परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। कारण—पर्यावरण को भारी नुकसान और बार-बार होने वाले हादसे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रतिबंध को बरकरार रखा। लेकिन हकीकत ये है कि प्रतिबंध सिर्फ कागजों पर है। कोयला माफिया, स्थानीय प्रभावशाली लोग और राजनीतिक संरक्षण के चलते ये खदानें दिन-रात चल रही हैं। 

2018 में इसी पूर्वी जैंतिया हिल्स के क्षान (Ksan) इलाके में एक रैट-होल खदान में पानी भर जाने से 15 मजदूरों की मौत हो गई थी। वे 370 फीट गहराई में फंस गए थे। तब भी बड़े-बड़े वादे हुए, जांच हुई, लेकिन बदलाव कुछ नहीं आया। 2025 के अंत में भी एक और हादसा हुआ था। आंकड़े बताते हैं कि 2012 से अब तक पूर्वोत्तर में रैट-होल माइनिंग से 63 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। लेकिन ये सिर्फ आंकड़े हैं—हर मौत के पीछे एक परिवार बिखरता है, बच्चे अनाथ होते हैं, मांएं विधवा। 

 मजदूरों की मजबूरी, मालिकों की कमाई ज्यादातर मजदूर असम, बिहार, झारखंड और पड़ोसी राज्यों से आते हैं। वे गरीबी और बेरोजगारी के कारण यहां आते हैं। रोजाना 500-1000 रुपये कमाने के लिए वे मौत के मुंह में कूद पड़ते हैं। खदान मालिकों को सस्ता कोयला निकालने में फायदा है—क्योंकि कोई लाइसेंस फीस, कोई टैक्स, कोई सुरक्षा खर्च नहीं। कोयला स्थानीय बाजारों और बाहर भेजा जाता है। परिवहन पर भी रोक है, लेकिन ट्रकों में छिपाकर कोयला निकाला जाता है। 

इस पूरे सिस्टम में राजनीतिक-प्रशासनिक मिलीभगत साफ दिखती है। चुनाव के समय कोयला माफिया फंडिंग करते हैं, बदले में संरक्षण मिलता है। हादसे के बाद जांच होती है, कुछ गिरफ्तारियां, फिर सब शांत। मजदूरों के परिवारों को कुछ मुआवजा मिलता है, लेकिन जिंदगी नहीं लौटती। 

क्या कभी रुकेगा ये सिलसिला? मेघालय सरकार ने कई बार कहा है कि अवैध खदानों पर कार्रवाई हो रही है। लेकिन हकीकत में खदानें फिर से खुल जाती हैं। एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं हो रहा। केंद्र सरकार भी चुप है। मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार की कोई योजना नहीं। पर्यावरण बचाने के नाम पर प्रतिबंध लगा, लेकिन मजदूरों की जान बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं।

 ये हादसा सिर्फ एक विस्फोट नहीं है—ये हमारी व्यवस्था की नाकामी है। जहां गरीब की जान सस्ती है, जहां कानून अमीरों के लिए लचीला है, जहां जांचें सिर्फ समय काटने के लिए होती हैं। 

18 जिंदगियां चली गईं। कितनी और जाएंगी? क्या हम इंतजार करेंगे अगले हादसे का? या अब सच में कुछ बदलेगा—प्रतिबंध को सख्ती से लागू किया जाएगा, माफियाओं पर कार्रवाई होगी, मजदूरों को सुरक्षित रोजगार मिलेगा?

 भाड़ में जाए ऐसी व्यवस्था जो मजदूरों को मौत की खदानों में धकेलती है।

 अब वक्त है जागने का—क्योंकि हर मौत हमें चेतावनी दे रही है। 

Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

"લોકશાહીના ગળામાં રોક લગાવીને ચૂપ કરવાનું કાવતરું? ગુજરાતના યુવાનો કહે છે – રાહુલ બોલશે, દેશ સાંભળશે!"

"લોકશાહીના ગળામાં રોક લગાવીને ચૂપ કરવાનું કાવતરું? ગુજરાતના યુવાનો કહે છે – રાહુલ બોલશે, દેશ સાંભળશે!" -Friday world 5/2/2026
આવતીકાલે અમદાવાદમાં ગુજરાત યુવા કોંગ્રેસનો જોરદાર વિરોધ પ્રદર્શન: રાહુલ ગાંધીને સંસદમાં બોલવાનો અધિકાર આપો! 

આજના ભારતીય લોકતંત્રમાં એક નવી જ અનોખી ઘટના બની રહી છે. વિપક્ષના નેતા અને લોકસભાના લીડર ઓફ ઓપોઝિશન રાહુલ ગાંધીને સંસદમાં બોલવાથી રોકવામાં આવ્યા છે. બજેટ સેશન ૨૦૨૬ દરમિયાન રાષ્ટ્રપતિના અભિભાષણ પર ચર્ચા વખતે રાહુલ ગાંધીએ ભૂતપૂર્વ આર્મી ચીફ જનરલ મનોજ મુકુંદ નરવણેના પુસ્તકના આધારે રાષ્ટ્રીય સુરક્ષાના મુદ્દા ઉઠાવ્યા તો તરત જ હંગામો થયો. સરકારી બેન્ચેથી તીવ્ર વિરોધ થયો, માઈક્રોફોન બંધ કરાયા અને અંતે રાહુલને પૂર્ણ ભાષણ આપવા દેવામાં આવ્યું નહીં. આ ઘટનાને રાહુલ ગાંધીએ લોકસભા અધ્યક્ષને પત્ર લખીને "લોકશાહી પર કાળો ડાઘ" ગણાવી છે.

 રાહુલ ગાંધીએ કહ્યું કે, સંસદમાં વિપક્ષના નેતાને રાષ્ટ્રીય સુરક્ષા જેવા મહત્વના મુદ્દા પર બોલતા રોકવું એ લોકતંત્રના મૂળભૂત અધિકારનું ઉલ્લંઘન છે. તેમણે ઉલ્લેખ કર્યો કે, પહેલી વખત સંસદના ઇતિહાસમાં લીડર ઓફ ઓપોઝિશનને આવી રીતે ચૂપ કરવાનો પ્રયાસ કરવામાં આવ્યો છે. આ વિરોધમાં કોંગ્રેસના સાંસદોએ વેલમાં ધસીને સૂત્રોચ્ચાર કર્યા, કાગળ ઉછાળ્યા અને હંગામો કર્યો, જેના કારણે ૮ વિપક્ષી સાંસદોને સસ્પેન્ડ કરવામાં આવ્યા. આ બધું જોતાં લાગે છે કે સરકાર રાહુલ ગાંધીના અવાજને દબાવવા માટે કોઈ પણ હદ પાર કરવા તૈયાર છે.

 આ જ અન્યાય સામે હવે ગુજરાત પ્રદેશ યુવા કોંગ્રેસ પણ મેદાનમાં ઉતરી છે. આવતીકાલે તા. ૦૬/૦૨/૨૦૨૬ના રોજ સાંજે ૫:૦૦ વાગે અમદાવાદના સરદાર બાગ, નેહરુ બ્રિજ ખાતે એક શક્તિશાળી વિરોધ પ્રદર્શન અને ઉગ્ર દેખાવો યોજાશે. આ કાર્યક્રમમાં ગુજરાત પ્રદેશ યુવા કોંગ્રેસના પ્રમુખ પ્રવિણસિંહ વણોલ અને ઉપપ્રમુખ ઉવેશ મન્સૂરી સહિત હજારો યુવાનો ભાગ લેશે. આ વિરોધનો મુખ્ય ઉદ્દેશ છે: 

- રાહુલ ગાંધીને સંસદમાં બોલવા દેવા માટે લગાવેલી રોકને તાત્કાલિક હટાવવી. 

- રાહુલ ગાંધીને "દેશના દુશ્મન" જેવા શબ્દોમાં નિશાન બનાવવાના પ્રયાસોનો વિરોધ કરવો.

 - લોકશાહીમાં વિપક્ષના અવાજને સ્થાન આપવાની માંગ કરવી. 

ગુજરાતના યુવાનો કહે છે કે, જ્યારે દેશના લીડર ઓફ ઓપોઝિશનને જ બોલવાનો અધિકાર ન મળે તો આ લોકશાહી કેવી? રાહુલ ગાંધી દેશના યુવાનોના મુદ્દાઓ ઉઠાવે છે, ખેડૂતો, યુવાનો, મહિલાઓના હક્કો માટે લડે છે. તેમને ચૂપ કરવું એ આખા વિપક્ષ અને કરોડો નાગરિકોના અવાજને દબાવવા સમાન છે. 

આ પ્રદર્શનમાં યુવાનો શાંતિપૂર્ણ રીતે પોતાનો અવાજ ઉઠાવશે, પરંતુ તેમની માંગ સ્પષ્ટ છે – લોકશાહીને બચાવો, રાહુલ ગાંધીને બોલવા દો! આ કાર્યક્રમ ગુજરાતમાંથી એક મોટો સંદેશ આપશે કે યુવા શક્તિ જાગી છે અને અન્યાય સામે લડવા તૈયાર છે. 

આવો, આવતીકાલે સરદાર બાગ ખાતે પહોંચીને લોકશાહીના રક્ષણ માટે એકજૂટ થઈએ. કારણ કે જ્યારે અવાજ દબાય છે ત્યારે લોકશાહી ખતરામાં હોય છે! 

#રાહુલ_બોલશે 
#લોકશાહી_બચાવો
 #ગુજરાત_યુવા_કોંગ્રેસ 

#RahulGandhi 
#DemocracyInDanger

 Sajjadali Nayani ✍
 Friday world 5/2/2026
February 05, 2026

ભારત-અમેરિકા વેપાર સમજૂતી: વાહવાહીનું મધુર સંગીત કે 'ડેવિલ ઇન ધ ડિટેઇલ્સ'ની ચેતવણી?

ભારત-અમેરિકા વેપાર સમજૂતી: વાહવાહીનું મધુર સંગીત કે 'ડેવિલ ઇન ધ ડિટેઇલ્સ'ની ચેતવણી?
-Friday world 4/2/2026
અમેરિકાના પ્રમુખ ડોનાલ્ડ ટ્રમ્પે ફેબ્રુઆરી 2026ના પ્રથમ અઠવાડિયામાં એક જાહેરાત કરી કે ભારત પરના અમેરિકન ટેરિફ (કરવેરા) 50%થી ઘટાડીને 18% કરવામાં આવ્યા છે. આ જાહેરાત પછી ભારતીય મીડિયા અને સોશિયલ મીડિયામાં 'વાહવાહી'નું તોફાન આવી ગયું. સ્ટોક માર્કેટમાં ઉછાળો, રૂપિયો મજબૂત થયો અને ઘણા લોકોએ આને 'મોટી જીત' તરીકે ઉજવવાનું શરૂ કરી દીધું. પરંતુ શું આ ખરેખર એટલી સરળ અને મીઠી જીત છે? કે પછી આ ફક્ત એક 'ઘટાડો ઘટાડો અને વાહ વાહ'ની રાજકીય-આર્થિક રમત છે? 

આખી વાતની શરૂઆત થઈ હતી ગયા વર્ષે, જ્યારે ટ્રમ્પ વહીવટે ભારત પર 25% 'રેસિપ્રોકલ' ટેરિફ લગાવ્યા અને રશિયન તેલની ખરીદીને કારણે વધારાના 25% પેનલ્ટી ટેરિફ પણ ઉમેર્યા. આનાથી કુલ 50% સુધીનો ભારે બોજ ભારતીય નિર્યાત પર પડ્યો. ભારતે રશિયન ક્રૂડ ઓઇલની ખરીદી ચાલુ રાખી, જે અમેરિકાને ગમતી નહોતી. પરિણામે વેપાર યુદ્ધ તીવ્ર બન્યું. 

હવે ટ્રમ્પ કહે છે કે ભારતે રશિયન તેલની ખરીદી બંધ કરવાનું સ્વીકાર્યું છે, અમેરિકન તેલ (અને કદાચ વેનેઝ્યુએલન તેલ) વધુ ખરીદશે, અમેરિકન માલ પરના ટેરિફ અને નોન-ટેરિફ અવરોધોને શૂન્ય કરશે અને $500 બિલિયનથી વધુના અમેરિકન ઉત્પાદનો (ઊર્જા, ટેક્નોલોજી, કૃષિ વગેરે) ખરીદશે. બદલામાં અમેરિકા ભારતીય માલ પર ટેરિફ 18% પર લાવી દીધા. 

સાંભળવામાં તો આ બહુ સારું લાગે છે, પણ વાસ્તવિકતા 'ડેવિલ ઇન ધ ડિટેઇલ્સ'માં છે. 

પહેલું મોટું પ્રશ્ન: રશિયન તેલની ખરીદી ખરેખર બંધ થશે? ભારતે અત્યાર સુધી આ વાતની સત્તાવાર પુષ્ટિ કરી નથી. રશિયન ક્રૂડ ઓઇલ ભારત માટે સસ્તું અને વિશ્વસનીય સ્ત્રોત છે. તેને અચાનક બંધ કરવાથી તેલના ભાવમાં વધારો થઈ શકે છે, જે ભારતીય અર્થતંત્ર અને સામાન્ય નાગરિક પર ભારે પડશે. બીજી તરફ, અમેરિકન તેલ વધુ મોંઘું હોઈ શકે છે. આ રાજદ્વારી અને આર્થિક નુકસાનની શક્યતા છે – રશિયા સાથેના સંબંધો પર અસર, BRICSમાં સ્થિતિ અને વૈશ્વિક ઊર્જા બજારમાં અસ્થિરતા. 

બીજું: ભારતે અમેરિકન માલ પર ટેરિફ શૂન્ય કરવાનું સ્વીકાર્યું? અમેરિકન અધિકારીઓ કહે છે કે ભારતીય ઔદ્યોગિક માલ પરના ટેરિફ 13.5%થી ઘટીને શૂન્ય થશે. પણ કૃષિ ક્ષેત્રમાં રક્ષણ જળવાઈ રહેશે. ભારતીય ખેડૂતો માટે અમેરિકન કૃષિ ઉત્પાદનોની સસ્તી આયાતથી સ્પર્ધા વધશે. ડેરી, પોલ્ટ્રી, ફળો-શાકભાજી જેવા ક્ષેત્રોમાં સ્થાનિક ઉત્પાદકોને નુકસાન થઈ શકે છે. વિરોધ પક્ષો પહેલેથી જ પૂછી રહ્યા છે: "શું ભારત હવે બધી જગ્યાએથી ખરીદી બંધ કરી દેશે?" 

ત્રીજું: $500 બિલિયનની ખરીદીની વાત કેટલી વાસ્તવિક છે? આ આંકડો ખૂબ મોટો છે અને સમયમર્યાદા, ક્ષેત્રો કે બાઈન્ડિંગ કમિટમેન્ટ વિશે વિગતો નથી. આ ફક્ત એક આશાસ્પદ વાત હોઈ શકે છે, જેમાં ભારત પર દબાણ વધારવાનું સાધન બને. 

છેલ્લું પણ મહત્વનું: ઈરાન સાથેના સંબંધો, ચીન સાથેની સ્પર્ધા અને વૈશ્વિક રાજનીતિમાં ભારતની સ્વતંત્રતા. અમેરિકાને રાજી રાખવા માટે ભારતે પોતાની વિદેશનીતિમાં કેટલા રાજીનામા આપવા પડશે? રશિયા-ઈરાન જેવા દેશો સાથેના સંબંધો ખતરામાં મુકાઈ શકે છે. 

આખરે, વેપારમાં ફાયદો તો જોવો જોઈએ, પણ તે ફાયદો કયા પરિપ્રેક્ષ્યમાં છે? ટૂંકા ગાળાના નિર્યાત વધારા માટે લાંબા ગાળાના રાજદ્વારી અને આર્થિક સ્વાતંત્ર્યનો ભોગ આપવો યોગ્ય છે? મીડિયામાં 24 કલાકથી વધુ સમયથી 'ટેરિફ ઘટાડો'નું ગીત ગવાઈ રહ્યું છે, પણ પૂર્ણ વિગતો સામે આવે ત્યાં સુધી ઉજવણીમાં ઉતાવળ ન કરવી જોઈએ. 

અધૂરી માહિતી વધુ ખતરનાક હોય છે. સામાન્ય નાગરિકને 'નિષ્ફળતાની ઉજવણી' કરાવવાને બદલે પારદર્શિતા અને સ્વતંત્ર વિચાર જરૂરી છે. ચિંતા વધારે, બચત ઘટાડે અને વાહવાહીના તાળીઓ વચ્ચે સાચી તસવીર સમજવી જરૂરી છે. 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday world 4/2/2026