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Sunday, 23 August 2026

August 23, 2026

रसोई से टंकी तक: जब चीनी एथेनॉल बन गई, तो महंगाई ने रसोई का स्वाद बिगाड़ दिया

रसोई से टंकी तक: जब चीनी एथेनॉल बन गई, तो महंगाई ने रसोई का स्वाद बिगाड़ दिया
-Friday World 23 Aug 2026
पिछले तीन महीनों में आपकी रसोई में क्या बदला है? अगर आप बाजार गए हैं तो जवाब आपके बिल में है। वही चीनी जो कुछ महीने पहले 45-50 रुपये किलो मिल रही थी, अब 70-75 रुपये किलो तक पहुंच गई है। यानी 3 महीने में करीब 40% या 19 रुपये प्रति किलो की सीधी बढ़ोतरी। गुड़ 24%, चावल 16% और मक्के का आटा 11% तक महंगा हो चुका है। सालों तक स्थिर रहने वाले ये दाम अचानक क्यों आग की तरह बढ़ रहे हैं?

जवाब है - एथेनॉल।

25 लाख टन चीनी, जो कड़ाही में नहीं, टंकी में चली गई

ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले साल देश में 720 करोड़ लीटर एथेनॉल का उत्पादन हुआ। इसके लिए 1.33 करोड़ टन अनाज और 25 लाख टन चीनी बनाने लायक गन्ना और शीरा इस्तेमाल हुआ।

सरकार के एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के तहत पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य है। इसके लिए मानक तय है - 67% मक्का, टूटा चावल और खराब अनाज, और 33% गन्ना और उसके उत्पाद।

नतीजा? जो गन्ना आपकी चाय मीठी करता था, वो अब गाड़ी चलाएगा। जो टूटा चावल और खराब अनाज पशु आहार और पोल्ट्री फीड बनता था, वो अब शराब भट्टियों में चला गया।

इसका सीधा असर दिख रहा है:
- पशु आहार 8-10% महंगा
- दूध और अंडे 5-10% महंगे
- पूरी रसोई का बजट गड़बड़ाया

 स्टॉक खत्म, निर्यात जीरो, आयात शुरू

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। 1 अक्टूबर से शुरू हो रहे 2026-27 शुगर सीजन का ओपनिंग स्टॉक घरेलू खपत के लिए जरूरी 50 लाख टन से भी कम रहने का अनुमान है। यानी देश के पास खाने के लिए ही चीनी कम पड़ने वाली है।

इसीलिए सरकार को गुरुवार को दो बड़े फैसले लेने पड़े:

1. 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी (Raw Sugar) का शुल्क-मुक्त आयात टैरिफ रेट कोटा के तहत।

2. हर महीने 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करने वाले हलवाई, बिस्किट, कोल्ड ड्रिंक कंपनियों जैसे थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक लिमिट। अब वे 15 दिन की खपत से ज्यादा स्टॉक नहीं रख सकेंगे।

यह कितनी बड़ी पलट है, इसे निर्यात के आंकड़ों से समझिए। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार:

- 2022-23: 1.33 करोड़ टन चीनी-शीरा और उत्पादों का निर्यात
- 2023-24: 51.35 लाख टन
- 2024-25: 38.43 लाख टन
- 2026-27: निर्यात शून्य, उल्टा आयात की नौबत

चार साल में दुनिया के सबसे बड़े चीनी निर्यातकों में से एक भारत, अब आयातक बनने की कगार पर है।

आपकी थाली पर क्या असर?

ये सिर्फ चीनी की कहानी नहीं है, ये फूड चेन की कहानी है। जब 1.33 करोड़ टन अनाज एथेनॉल में जाएगा, तो:

1. गरीब की थाली: टूटा चावल जो राशन की दुकानों और मिड-डे मील में जाता था, महंगा हो रहा है।

2. किसान की जेब: पशुपालक को महंगा चारा खरीदना पड़ रहा है, तो दूध महंगा करना मजबूरी है।

3. आम आदमी का त्योहार: आने वाले नवरात्रि, दिवाली में मिठाई, गुड़, चीनी की मांग और बढ़ेगी। अगर स्टॉक नहीं संभला तो दाम और 10-15% बढ़ सकते हैं।

 समाधान क्या है?

सरकार संतुलन साधने की कोशिश कर रही है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए एथेनॉल जरूरी है, इससे करोड़ों डॉलर का कच्चा तेल आयात बचता है और किसानों को गन्ने का बेहतर दाम मिलता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसकी कीमत रसोई से वसूली जानी चाहिए?

विशेषज्ञों का मानना है कि तीन कदम तुरंत जरूरी हैं:
- एथेनॉल के लिए गन्ने की जगह वैकल्पिक फीडस्टॉक जैसे बांस, पराली को बढ़ावा देना।
- मक्का और धान का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को MSP से ज्यादा प्रोत्साहन देना।
- चीनी और अनाज के स्टॉक की रियल टाइम मॉनिटरिंग, ताकि एथेनॉल डायवर्जन का फैसला बाजार देखकर लिया जाए।

फिलहाल एक बात तय है - जब तक टंकी और थाली के बीच का संतुलन नहीं बनेगा, तब तक आपकी चाय की मिठास आपके बजट पर भारी पड़ती रहेगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 23 Aug 2026

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August 23, 2026

IIT की लैब से IAS के शीर्ष तक: आकांक्षा सिंह राजावत ने लखनऊ में जीता पूरे बैच का 'बेस्ट रिसर्च' अवार्ड, ग्वालियर-चंबल के गौरव ने रचा इतिहास

IIT की लैब से IAS के शीर्ष तक: आकांक्षा सिंह राजावत ने लखनऊ में जीता पूरे बैच का 'बेस्ट रिसर्च' अवार्ड, ग्वालियर-चंबल के गौरव ने रचा इतिहास
-Friday World 23 Aug 2026

लखनऊ/ग्वालियर -प्रतिभा जब संस्कारों से जुड़ती है तो इतिहास बनता है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मध्य प्रदेश की बेटी और देश की होनहार युवा आईएएस अधिकारी आकांक्षा सिंह राजावत ने। परसों लखनऊ में आयोजित उनके प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन समारोह में आकांक्षा को पूरे बैच में सर्वश्रेष्ठ शोध (Best Research Award) से सम्मानित किया गया। यह केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उनकी बौद्धिक क्षमता, प्रशासनिक दृष्टिकोण और जमीनी समस्याओं को वैज्ञानिक नजरिए से समझने की अद्वितीय प्रतिभा का प्रमाण है।

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जब मंच से आकांक्षा का नाम पुकारा गया, तो पूरा सभागार गर्व से भर उठा। यह क्षण उनके परिवार के लिए ही नहीं, पूरे ग्वालियर-चंबल अंचल और युवा सिविल सेवा आकांक्षियों के लिए प्रेरणा बन गया।
       IIT कानपुर से IAS तक का असाधारण सफर

आकांक्षा की कहानी आम नहीं है। देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान IIT कानपुर से केमिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट की चकाचौंध वाली दुनिया के बजाय देश सेवा का कठिन रास्ता चुना।

IIT में रहते हुए ही उनमें रिसर्च और इनोवेशन की गहरी समझ विकसित हुई। केमिकल इंजीनियरिंग की जटिल प्रयोगशालाओं में जहाँ अणुओं के व्यवहार को समझा जाता है, वहीं आकांक्षा ने समाज के अणुओं यानी आम लोगों की समस्याओं को समझने की ठानी। उनके प्रोफेसर बताते हैं कि वे हमेशा पूछती थीं - "इस टेक्नोलॉजी का उपयोग गांव के आखिरी व्यक्ति तक कैसे पहुंचेगा?"

यही वैज्ञानिक सोच उनके शोध को दूसरों से अलग बनाती है। लखनऊ प्रशिक्षण के दौरान प्रस्तुत उनके शोध प्रबंध में प्रशासन में डेटा-ड्रिवन डिसीजन मेकिंग, ग्रामीण विकास में तकनीक का समावेश और सुशासन के लिए नवाचार पर गहन अध्ययन था, जिसे निर्णायक मंडल ने सर्वश्रेष्ठ माना।

संस्कारों की जड़ें: एक ऐसा परिवार जो राष्ट्र सेवा का पर्याय है

आकांक्षा की सफलता के पीछे एक ऐसे परिवार का त्याग, अनुशासन और संस्कार है जो पिछले कई दशकों से राष्ट्र के चार अलग-अलग स्तंभों को संभाल रहा है। यह परिवार इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कैसे एक ही वटवृक्ष की शाखाएं देश के अलग-अलग क्षेत्रों में राष्ट्र-निर्माण कर रही हैं।
पिता - मानवेंद्र सिंह राजावत: आकांक्षा के पिता श्री मानवेंद्र सिंह राजावत मध्य प्रदेश पुलिस में ग्वालियर में एडिशनल SP के पद पर सेवाएं दे रहे हैं। कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और अपराध नियंत्रण में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित IPS अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है। पिता की वर्दी, उनकी ईमानदारी और जनता के प्रति समर्पण ने ही बचपन से आकांक्षा के मन में सिविल सेवा का बीज बोया।

बड़े चाचा - लेफ्टिनेंट जनरल धीरेन्द्र सिंह राजावत: परिवार के बड़े स्तंभ भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद पर हैं। उन्होंने देश के कई बड़े और संवेदनशील मिलिट्री ऑपरेशनों का सफल नेतृत्व किया है। सीमा पर देश की सुरक्षा करने वाले चाचा से आकांक्षा ने अनुशासन, नेतृत्व और विपरीत परिस्थितियों में निर्णय लेने की कला सीखी।

दूसरे चाचा - शैलेन्द्र सिंह राजावत: जब एक भाई सीमा संभाल रहा है तो दूसरा भाई खेत संभाल रहा है। श्री शैलेन्द्र सिंह राजावत एक वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक हैं और गवालियर KVK (कृषि विज्ञान केंद्र) के हेड हैं। किसानों की आय दोगुनी करने और नई कृषि तकनीकों को खेत तक पहुंचाने में उनका योगदान अतुलनीय है। कृषि और ग्रामीण भारत की समझ आकांक्षा को यहीं से मिली।

तीसरे चाचा - अविनाश सिंह राजावत: परिवार के तीसरे स्तंभ भारतीय रेल के भविष्य को गढ़ रहे हैं। श्री अविनाश सिंह राजावत भारतीय रेल में EDEE (Executive Director Electrical Engineering) को हेड करते हैं और भारत के ड्रीम प्रोजेक्ट, जापान के सहयोग से बन रहे बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट को लीड कर रहे हैं। उनसे आकांक्षा ने तकनीक, इंजीनियरिंग और बड़े विजन को जमीन पर उतारने की प्रेरणा ली।

पुलिस, सेना, विज्ञान और तकनीक - चारों दिशाओं से मिले इस ज्ञान और संस्कार के संगम ने ही आकांक्षा को एक परिपूर्ण प्रशासक बनाया है।

 क्यों खास है यह 'बेस्ट रिसर्च' अवार्ड?

IAS प्रशिक्षण में बेस्ट रिसर्च अवार्ड केवल किताबी ज्ञान के लिए नहीं मिलता। इसके लिए अधिकारी को एक ऐसी समस्या चुननी होती है जो जमीनी हकीकत से जुड़ी हो, उस पर फील्ड में जाकर काम करना होता है, डेटा जुटाना होता है और ऐसा समाधान देना होता है जो सरकार की नीति में बदलाव ला सके।

सूत्रों के अनुसार आकांक्षा के शोध का विषय प्रशासनिक पारदर्शिता और ग्रामीण स्तर पर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने IIT की अपनी तकनीकी पृष्ठभूमि का बेहतरीन उपयोग किया। यही कारण है कि उनका शोध मॉडल अब अन्य जिलों के लिए भी एक केस स्टडी के रूप में देखा जा रहा है।

 युवाओं के लिए प्रेरणा

आज जब युवा भ्रमित हैं कि इंजीनियरिंग के बाद क्या करें, आकांक्षा की कहानी उन्हें रास्ता दिखाती है। वे साबित करती हैं कि IIT का मतलब सिर्फ विदेश में नौकरी नहीं, बल्कि अपनी इंजीनियरिंग का उपयोग भारत के प्रशासन को बेहतर बनाने में भी किया जा सकता है।

लखनऊ में मिला यह सम्मान उनके उज्ज्वल प्रशासनिक भविष्य की सिर्फ शुरुआत है। ग्वालियर से लखनऊ तक, और IIT कानपुर से LBSNAA तक का उनका सफर हर बेटी को यह संदेश देता है - सपना बड़ा देखो, जड़ें मजबूत रखो और देश के लिए काम करो, सम्मान खुद-ब-खुद आपके कदम चूमेगा।

आकांक्षा सिंह राजावत Friday World की ओर से हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 23 Aug 2026

#AkankshaSinghRajawat #IAS #BestResearchAward #IITKanpur #Lucknow #GwaliorPride #WomenInCivilServices #IASMotivation #NationFirst #InspiringIndia
August 23, 2026

आरक्षण भीख नहीं, बाबा साहेब का दिया संवैधानिक अधिकार है - जंतर-मंतर पर उठी 'आरक्षण हटाओ' की मांग पर गरजे चिराग पासवान

आरक्षण भीख नहीं, बाबा साहेब का दिया संवैधानिक अधिकार है - जंतर-मंतर पर उठी 'आरक्षण हटाओ' की मांग पर गरजे चिराग पासवान
- Friday World 23 Aug 2026
नई दिल्ली/पटना: देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर इन दिनों दो अलग-अलग विचारधाराओं का टकराव देखने को मिल रहा है। एक तरफ 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' के बैनर तले सैकड़ों लोग आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार में मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने इस आंदोलन को सिरे से खारिज करते हुए आरक्षण को भारत के वंचितों का अटूट संवैधानिक अधिकार बताया है।

चिराग पासवान ने बिहार में पत्रकारों से बातचीत में दो टूक कहा, "आरक्षण हमारा अधिकार है, दान में नहीं मिला है। यह कोई दया या किसी की दी हुई भीख नहीं है।"

क्या है पूरा मामला?

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' तेजी से वायरल हो रहा है। इस आंदोलन से जुड़े पेज को 5.6 मिलियन से ज्यादा लोग फॉलो कर रहे हैं। इसी के आह्वान पर दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में युवा और विभिन्न संगठनों के लोग एकत्रित हुए।

आंदोलनकारियों की 5 बड़ी मांगें:

1. सरकारी नौकरियों, स्कॉलरशिप और शिक्षा में जाति के बजाय सिर्फ आर्थिक स्थिति को आधार बनाया जाए।
2. उच्च शिक्षण संस्थानों जैसे IIT, IIM, AIIMS में प्रवेश के लिए न्यूनतम अंकों (Minimum Marks Criteria) का सख्ती से पालन हो।
3. OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर के नियमों को और अधिक स्पष्ट और पारदर्शी किया जाए।
4. पिछले 80 सालों में आरक्षण से कितना सामाजिक बदलाव आया, इस पर सरकार श्वेत पत्र (White Paper) जारी करे।
5. सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए EWS आरक्षण की सीमा और सुविधाओं को बढ़ाया जाए।

आंदोलनकारियों का तर्क है कि अब देश को जाति आधारित नहीं, बल्कि अर्थ आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ना चाहिए ताकि सभी गरीबों को समान अवसर मिल सके।

चिराग पासवान ने दिया करारा जवाब

केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान, जो खुद दलित समुदाय से आते हैं, ने इस आंदोलन पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि आरक्षण की व्यवस्था को समझे बिना इसे हटाने की बात करना देश की 80 प्रतिशत आबादी की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है।

उन्होंने कहा, "अनुसूचित जाति (SC) की पहचान सिर्फ गरीबी के आधार पर नहीं हुई थी। उनकी पहचान सदियों से चली आ रही अस्पृश्यता और घोर सामाजिक भेदभाव के आधार पर हुई थी। अनुसूचित जनजाति (ST) की अपनी अलग संस्कृति, भाषा और जीवनशैली है जो उन्हें मुख्यधारा से अलग करती थी।"

उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर को याद करते हुए कहा कि बाबा साहेब ने संविधान में आरक्षण का प्रावधान दया दिखाने के लिए नहीं, बल्कि बराबरी का हक देने के लिए किया था। इस प्रावधान को समय-समय पर संसद ने और मजबूत किया है। आज तो उच्च जातियों के गरीबों को भी 10 प्रतिशत EWS आरक्षण दिया जा रहा है, जो इस व्यवस्था के विस्तार का प्रतीक है।

पासवान ने चेतावनी दी कि किसी एक व्यक्ति या समूह के कहने से आरक्षण खत्म नहीं हो सकता। इसके लिए व्यापक संवैधानिक प्रक्रिया और गहन विचार-विमर्श की जरूरत है।

सरकार बातचीत को तैयार

हालांकि, चिराग पासवान ने एक सुलह वाला रुख भी दिखाया। उन्होंने कहा कि अगर आंदोलनकारी अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से और तथ्यों के साथ सरकार के सामने रखते हैं, तो सरकार उनकी बात सुनने और सकारात्मक चर्चा करने के लिए पूरी तरह तैयार है। सूत्रों के मुताबिक, चिराग पासवान व्यक्तिगत रूप से इस आंदोलन के प्रतिनिधियों से मिलकर उनकी शंकाओं को दूर कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आरक्षण को लेकर कोई भी गलतफहमी देश में सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है, इसलिए सरकार नहीं चाहती कि कोई भी वर्ग खुद को उपेक्षित महसूस करे।

अधिकार बनाम समानता की बहस

यह पूरा विवाद फिर से वही पुराना सवाल खड़ा करता है - क्या भारत को जाति-आधारित आरक्षण की जरूरत है या आर्थिक-आधारित आरक्षण की? एक पक्ष इसे सामाजिक न्याय का आधार मानता है, तो दूसरा इसे मेरिट के खिलाफ मानता है। लेकिन फिलहाल केंद्र सरकार और उसके सहयोगी दलों का स्टैंड साफ है - आरक्षण था, है और रहेगा। यह बाबा साहेब का दिया हुआ वह अधिकार है जो दान में नहीं मिला।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 23 Aug 2026

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August 23, 2026

तीस्ता से सिंधु तक वॉटर वार - क्या बांग्लादेश और पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ खोल रहे हैं पानी वाला मोर्चा?

तीस्ता से सिंधु तक वॉटर वार - क्या बांग्लादेश और पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ खोल रहे हैं पानी वाला मोर्चा?
-Friday World 23 Aug 2026
ढाका से इस्लामाबाद तक, एक ही स्क्रिप्ट, एक ही धमकी। भारत के दो पड़ोसी - बांग्लादेश और पाकिस्तान - पानी को हथियार बनाकर एक जैसी रणनीति पर चल पड़े हैं। सवाल गंभीर है: क्या भारत के खिलाफ एक अनौपचारिक जल-मोर्चा तैयार हो रहा है?

 बांग्लादेश की दोहरी मांग: गारंटी क्लॉज और तीस्ता

19 अगस्त 2026 को ढाका में एक सेमिनार में बांग्लादेश के जल संसाधन मंत्री मोहम्मद शाहिद उद्दीन चौधरी अनी ने खुली चेतावनी दी। उनकी दो मांगें हैं:

 1. गंगा जल संधि में गारंटी क्लॉज वापस लाओ: भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को हुई 30 साल की गंगा जल संधि 11 दिसंबर 2026 को खत्म हो रही है। बांग्लादेश चाहता है कि नई संधि में 1977 वाला गारंटी क्लॉज फिर से जोड़ा जाए। 1977 में जियाउर्रहमान के समय हुई पहली संधि में यह था कि सूखे के समय में भी बांग्लादेश को न्यूनतम पानी मिलेगा। 1982, 1985 के अस्थायी समझौतों और 1996 की फाइनल संधि से इसे हटा दिया गया।

आज के फॉर्मूले के मुताबिक फरक्का बैराज पर पानी 70,000 क्यूसेक से कम होने पर आधा-आधा बंटवारा। 11 मार्च से 10 मई के सबसे संवेदनशील समय में 35,000 क्यूसेक की गारंटी बारी-बारी से 10-10 दिन के लिए है। बांग्लादेश का कहना है, जलवायु परिवर्तन के कारण फरक्का पर पानी लगातार कम हो रहा है, इसलिए 40,000 क्यूसेक की पक्की गारंटी चाहिए।

 2. तीस्ता का पानी दो: मंत्री ने कहा कि तीस्ता मास्टर प्लान का मुख्य काम अगले साल शुरू होगा। प्रधानमंत्री तारिक रहमान खुद फाइल देख रहे हैं। 2011 में मनमोहन सिंह के समय 42.5% भारत और 37.5% बांग्लादेश का ड्राफ्ट बना था, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध से लटका है। गजलडोबा बैराज के बाद तीस्ता का बहाव 200 क्यूमेक से घटकर 40 क्यूमेक रह गया है।

मंत्री ने कहा, "हम भारत से संबंध खराब नहीं करना चाहते, लेकिन यह हमारा अधिकार है। नहीं माने तो हम UN समेत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जाएंगे।"

 दूसरा किनारा: सिंधु पर पाकिस्तान का UN दांव

ठीक यही भाषा 4 महीने पहले पाकिस्तान ने बोली थी। अप्रैल 2026 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, तो पाकिस्तान UN सिक्योरिटी काउंसिल पहुंच गया था। वहां उसे कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि सिंधु संधि वर्ल्ड बैंक की गारंटी वाली द्विपक्षीय संधि है, UN का विषय नहीं।

लेकिन रणनीति एक जैसी है - द्विपक्षीय मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाओ।

UNECE वाटर कन्वेंशन - बांग्लादेश का नया हथियार

जून 2025 में बांग्लादेश ने एक बड़ा कदम उठाया। वह UNECE वाटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने वाला दक्षिण एशिया का पहला देश बन गया। भारत इस कन्वेंशन का सदस्य नहीं है, इसलिए कानूनी तौर पर भारत पर यह लागू नहीं होता। फिर भी ढाका इसका इस्तेमाल नैतिक दबाव बनाने के लिए कर रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय जल कानून का पालन कर रहा है।

भारत की चिंता यही है कि बांग्लादेश इस कन्वेंशन के जरिए 14 साझा नदियों के लिए एक नया संस्थागत ढांचा बनाने की मांग कर रहा है, जिसे भारत द्विपक्षीय मुद्दा मानता है।

 क्या सच में संयुक्त मोर्चा बन रहा है?

दोनों देशों के बीच सीधा सैन्य गठबंधन नहीं है, लेकिन तीन समानताएं खतरनाक संकेत देती हैं:

1. समय: दोनों संधियां 2026 में निर्णायक मोड़ पर हैं। गंगा संधि का नवीनीकरण और सिंधु संधि का निलंबन।

2. भाषा: दोनों "गारंटी", "अधिकार" और "अंतरराष्ट्रीयकरण" शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं।

3. मंच: दोनों UN और अंतरराष्ट्रीय कानून का हवाला दे रहे हैं।

हाल ही में ढाका में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ता भी हुई है, हालांकि पाक विदेश मंत्री इशाक डार का दौरा पहलगाम पर उनके विवादित बयान के बाद टल गया।

 भारत के लिए चुनौती और रास्ता

भारत के पास 54 साझा नदियां हैं, लेकिन सिर्फ गंगा पर ही औपचारिक संधि है। भारत का पक्ष है कि सभी जल समझौते द्विपक्षीय हैं और निचले तटवर्ती देशों की चिंता का सम्मान करते हुए, ऊपरी तटवर्ती देश के किसानों और बाढ़ नियंत्रण का भी ध्यान रखना होगा। पश्चिम बंगाल सरकार को भी भरोसे में लेना जरूरी है, क्योंकि संविधान के तहत पानी राज्य का विषय है।

सरकार ने पहले ही सभी हितधारकों से राय ली है और पश्चिम बंगाल के प्रतिनिधि अक्टूबर 2023 से मार्च 2025 तक हुई चार अंतर-मंत्रालयी बैठकों में शामिल हुए हैं।

तीस्ता से सिंधु तक पानी अब सिर्फ नदी नहीं, कूटनीति है। बांग्लादेश और पाकिस्तान का एक साथ UN का रुख करना भारत के लिए चेतावनी है कि जल कूटनीति को अब राष्ट्रीय सुरक्षा की तरह ही देखना होगा। द्विपक्षीय वार्ता, वैज्ञानिक डेटा शेयरिंग और समय पर संधि नवीनीकरण ही इस नए मोर्चे को टूटने से बचा सकता है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 23 Aug 2026

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August 23, 2026

सरेंडर नहीं करेगा कनाडा - अमेरिका के 50% टैरिफ बम के बाद टूटी ट्रेड डील, विश्व के दो सबसे करीबी दोस्तों में छिड़ा महा-व्यापार युद्ध

सरेंडर नहीं करेगा कनाडा - अमेरिका के 50% टैरिफ बम के बाद टूटी ट्रेड डील, विश्व के दो सबसे करीबी दोस्तों में छिड़ा महा-व्यापार युद्ध
-Friday World 23 Aug 2026
वॉशिंगटन/ओटावा। दुनिया के दो सबसे पुराने और भरोसेमंद पड़ोसियों के बीच वो हो गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। अमेरिका और कनाडा के बीच दशकों पुरानी दोस्ती व्यापार के मैदान में सबसे बड़ी दुश्मनी में बदल गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐतिहासिक और कठोर फैसला लेते हुए कनाडा से आने वाले सामान पर 50 प्रतिशत का भारी-भरकम टैरिफ लगा दिया है। जवाब में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भी साफ कह दिया है - सरेंडर नहीं होगा, अमेरिका को उसकी ही भाषा में जवाब मिलेगा, एक-एक डॉलर का हिसाब लिया जाएगा।

आधी रात से लागू हुआ काला कानून - सेक्शन 338 क्या है?

तीन दिन तक वॉशिंगटन में चली मैराथन बैठकें फेल हो गईं। कोई समझौता नहीं बन सका। कनाडा के मुख्य वार्ताकारों को तुरंत ओटावा वापस बुला लिया गया।

20 जुलाई 2026 को ट्रंप ने 1930 के टैरिफ एक्ट के सेक्शन 338 का इस्तेमाल करते हुए तीन अलग-अलग घोषणाओं पर हस्ताक्षर किए। यह कानून इतना पुराना और दुर्लभ है कि पिछले 100 साल में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इसका इस्तेमाल नहीं किया था। यह कानून राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि अगर कोई देश अमेरिकी सामान के साथ भेदभाव करता है तो उस पर 50% तक टैक्स लगाया जा सकता है।

इस नए टैरिफ के दायरे में लगभग 20 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 28 अरब कनाडाई डॉलर) का सामान आएगा। यह अमेरिका द्वारा कनाडा से साल 2025 में आयात किए गए कुल 382 अरब डॉलर के सामान का 5.2 प्रतिशत है।

लिस्ट बहुत लंबी और अजीब है - वाइन, हॉकी स्टिक, सीमेंट, डेयरी प्रोडक्ट्स, फर्नीचर, फिशिंग रॉड, स्विमिंग पूल, बीज, कपड़े और विग तक। सबसे बड़ी बात - इस बार ये टैरिफ USMCA (अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा ट्रेड एग्रीमेंट) के तहत सुरक्षित माने जाने वाले सामान पर भी लगेगा। सिर्फ एनर्जी, पोटाश, मछली और क्रिटिकल मिनरल्स को छूट दी गई है।

ट्रंप प्रशासन का आरोप - कनाडा ने की गद्दारी

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर का कहना है कि कनाडा ने अमेरिका के साथ बदले की कार्रवाई की है, जो किसी और सहयोगी ने नहीं की। व्हाइट हाउस का आरोप है कि कनाडा ने:

1. अमेरिकी कारों पर भेदभावपूर्ण टैरिफ लगाया।
2. डेयरी सेक्टर में 200% से ज्यादा का टैक्स लगाकर सप्लाई मैनेजमेंट सिस्टम से अमेरिकी किसानों को रोका।
3. ज्यादातर प्रांतों में अमेरिकी शराब (वाइन और बीयर) की बिक्री पर बैन लगा दिया। इसके कारण पिछले एक साल में कनाडा में अमेरिकी शराब की बिक्री 81% और गाड़ियों की बिक्री 22% गिर गई।

अमेरिका का दावा है कि उसने कनाडा को एक शानदार ऑफर दिया था - कनाडाई गाड़ियों पर टैरिफ 25% से घटाकर 15% और स्टील-एल्युमीनियम पर 50% से घटाकर 25% करने की पेशकश, जो किसी भी दूसरे देश को नहीं मिली। लेकिन कनाडा ने डेयरी और वाइन पर अपनी जिद नहीं छोड़ी।

मार्क कार्नी का पलटवार - बदल चुका है अमेरिका

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बेहद सख्त लहजे में कहा, "हमें समझ आ गया है कि अमेरिका पूरी तरह बदल चुका है। वह अब अपने सबसे करीबी सहयोगी से भी बाजार में प्रवेश की भारी कीमत वसूल रहा है।"

कार्नी ने बताया कि पिछले 18 महीनों से कनाडा ने लगातार अमेरिका को मनाने की कोशिश की। विस्तृत प्रस्ताव दिए, CUSMA को आधुनिक बनाने की बात कही, लेकिन अमेरिका ने एकतरफा कार्रवाई की।

कार्नी ने दो बड़े ऐलान किए हैं:

 1. डॉलर-फॉर-डॉलर बदला: ओंटारियो के प्रीमियर डग फोर्ड ने मांग की है कि अमेरिका पर ठीक उसी तरह का टैरिफ लगाया जाए। कनाडा सरकार ने साफ कहा है कि वह कनाडाई कामगारों, किसानों और छोटे उद्योगों की रक्षा के लिए हर जरूरी कदम उठाएगी।

 2. 500 अरब डॉलर का आत्मनिर्भर प्लान: कार्नी ने कहा कि व्यापार युद्ध से कनाडा की रणनीति नहीं डगमगाएगी। देश में 500 अरब कनाडाई डॉलर के इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। कनाडा की अर्थव्यवस्था अमेरिका से चार गुना तेजी से नौकरियां पैदा कर रही है और G-7 में अगले दो साल में उसकी ग्रोथ दूसरी सबसे तेज रहेगी। सरकार ने पहले ही स्थानीय उद्योगों को 25 अरब डॉलर की मदद दी है और नए राहत पैकेज तैयार हैं।

आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?

इस टकराव का सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी को होगा।

अमेरिका में - कनाडा से आने वाला लकड़ी, सीमेंट, फर्नीचर महंगा होगा तो घर बनाना महंगा हो जाएगा। हॉकी का सामान, वाइन महंगी।

कनाडा में - अगर कनाडा ने बदला लिया तो अमेरिकी सामान महंगा होगा, फैक्ट्रियों में छंटनी का डर है।

दोनों देशों के बीच रोजाना 2.5 अरब डॉलर का व्यापार होता है। यह दीवार गिरेगी तो दोनों तरफ महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी।

अब सबकी नजर 19 अगस्त की डेडलाइन पर है, जब ये नए 50% टैरिफ पूरी तरह लागू होंगे। क्या उससे पहले ट्रंप और कार्नी के बीच फोन पर बातचीत से कोई चमत्कार होगा, या दुनिया दो सबसे बड़े लोकतांत्रिक दोस्तों के बीच सबसे बड़ा व्यापार युद्ध देखेगी? एक बात तय है - कनाडा ने कह दिया है, वह झुकेगा नहीं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 23 Aug 2026

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August 23, 2026

121 चीनी मिलों वाला यूपी भी कंगाल, 80 साल का रिकॉर्ड टूटा - क्या इथेनॉल ने खा ली चीनी की मिठास?

121 चीनी मिलों वाला यूपी भी कंगाल, 80 साल का रिकॉर्ड टूटा - क्या इथेनॉल ने खा ली चीनी की मिठास?
-Friday World 23 Aug 2026
विदेश से 10 लाख टन चीनी मंगाने को मजबूर हुआ भारत, किराना दुकान पर 61 रुपये किलो पहुंची चीनी, जानिए आम आदमी की थाली से मिठास क्यों गायब हो रही है

लखनऊ / नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश को देश का चीनी का कटोरा कहा जाता है। यहां 121 चीनी मिलें पेराई सीजन में चलती हैं, जो पूरे देश की लगभग 35% चीनी पैदा करती हैं। फिर भी आज हालत ये है कि अलीगढ़, मुजफ्फरनगर और लखनऊ में चीनी 61 रुपये प्रति किलो बिक रही है। पिछले डेढ़ महीने में ही 17 रुपये किलो की बढ़ोतरी हुई है। हर दिन 1-2 रुपये का इजाफा हो रहा है।

सवाल सबके मन में एक ही है - जब मिलें हमारे यहां हैं, गन्ना हमारे खेत में है, तो चीनी विदेश से क्यों मंगानी पड़ रही है? और आम पब्लिक की चाय इतनी कड़वी क्यों हो गई?

 1. आंकड़ों का खेल जो बिगड़ गया

कहानी शुरू होती है गलत अनुमान से। सरकार और इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन ने इस सीजन 2025-26 के लिए 343 लाख टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया था। लेकिन जमीन पर उत्पादन सिमट कर 306 लाख टन पर आ गया।

क्यों? दो बड़ी वजहें -

रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी: पश्चिमी यूपी में गन्ने की फसल में लाल सड़न रोग ने 15% तक फसल खराब कर दी।

जल-जमाव: ज्यादा बारिश से खेतों में पानी भर गया, गन्ने की मिठास कम हो गई।

देश में कुल उपलब्धता का गणित देखिए: नया उत्पादन 279 लाख टन (24 लाख टन इथेनॉल के लिए निकालने के बाद) + पुराना स्टॉक 47 लाख टन = 326 लाख टन। देश की सालाना खपत 280 लाख टन है। इसमें से 8 लाख टन सरकार ने नवंबर 2024 और फरवरी 2025 में निर्यात करने की अनुमति दे दी। अब बचा स्टॉक सिर्फ 35-39 लाख टन। जबकि नियम कहता है कि नए सीजन (1 अक्टूबर) से पहले कम से कम 60 लाख टन बफर स्टॉक होना चाहिए। यही कमी आयात की नौबत ले आई।

आखिरी बार भारत ने 2016-17 में चीनी का आयात किया था। 9 साल बाद फिर वही स्थिति है।

 2. क्या इथेनॉल वाकई में विलेन है?

बाजार में सबसे ज्यादा चर्चा इसी पर है। थोक व्यापारी विशाल भगत का कहना है - मिलों ने गन्ने से चीनी की जगह इथेनॉल ज्यादा बनाया, इसलिए चीनी कम पड़ी।

लेकिन केंद्र सरकार के उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने 22 अगस्त को इसे सिरे से खारिज कर दिया। सरकार का तर्क है:

2022-23 में कुल चीनी का 12% हिस्सा इथेनॉल में जाता था। 2025-26 में यह घटकर सिर्फ 9% रह गया है। आज भारत का 75% इथेनॉल मक्का और अनाज से बन रहा है, गन्ने से नहीं।

तो फिर असली वजह क्या है? सरकार के अनुसार - त्योहारी मांग, कम उत्पादन और जमाखोरी।

दरअसल, इथेनॉल प्रोग्राम ने चीनी उद्योग को बचाया है। जब चीनी का भाव 17 रुपये किलो था अंतरराष्ट्रीय बाजार में, तब मिलें बंद होने की कगार पर थीं। इथेनॉल से उन्हें पैसा मिला और किसानों को 76,000 करोड़ का भुगतान हो पाया।

 3. अदानी के स्टॉक भंडार ने चीनी को कड़वा किया? सच क्या है?

सोशल मीडिया पर एक और थ्योरी वायरल है - बड़े औद्योगिक घरानों ने चीनी का स्टॉक कर लिया है, इसलिए दाम बढ़े हैं। इसमें अदानी ग्रुप का नाम भी लिया जा रहा है।

तथ्यों पर बात करें तो सरकार ने खुद माना है कि जमाखोरी हो रही है। इसी कारण 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक सख्त स्टॉक लिमिट लगाई गई है:

- छोटे डीलरों के लिए अधिकतम 400 टन का स्टॉक
- बड़े थोक उपभोक्ता (जो महीने में 10 टन से ज्यादा चीनी इस्तेमाल करते हैं) सिर्फ 15 दिन की जरूरत का स्टॉक रख सकते हैं।

सरकार ने मिलों में फिजिकल वेरिफिकेशन के लिए केंद्रीय और राज्य टीमों को भी भेजा है। किसी एक कंपनी का नाम लेकर स्टॉक जमा करने का आधिकारिक प्रमाण अभी तक किसी सरकारी रिपोर्ट में नहीं है। वैश्विक कारण भी बड़ा है - पूरी दुनिया में 33 लाख टन चीनी की कमी का अनुमान है। 30 जून को अंतरराष्ट्रीय भाव 474 डॉलर प्रति टन था, जो 20 अगस्त को 552 डॉलर हो गया, यानी 16% की सीधी बढ़ोतरी।

 4. सरकार ने क्या कदम उठाए?

20 अगस्त 2026 को केंद्र ने बड़ा फैसला लिया - 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी का शून्य शुल्क (ड्यूटी-फ्री) आयात। यह TRQ सिस्टम के तहत 31 अक्टूबर तक होगा। एक दशक में पहली बार भारत बिना टैक्स के चीनी मंगा रहा है।

उम्मीद है कि इससे त्योहारी सीजन - दशहरा, दिवाली में मिठाई और कोल्ड ड्रिंक कंपनियों की मांग पूरी होगी और दाम 50 रुपये के नीचे आएंगे।

 5. आम पब्लिक क्यों हो रही परेशान?

असर सीधा रसोई पर है।

- फुटकर व्यापारी मनोज कुमार कहते हैं - ग्राहक रोज बहस करते हैं। उन्हें लगता है हम ज्यादा कमा रहे हैं, जबकि पीछे से ही महंगी आ रही है।
- एक गरीब परिवार जो महीने में 5 किलो चीनी लेता था, अब 3 किलो पर आ गया है। चाय फीकी, खीर-सिवइयां त्योहार पर ही बन रही हैं।
- हलवाई और बिस्किट-नमकीन उद्योग की लागत 40% बढ़ गई है। इसका असर उनके उत्पादों पर भी पड़ेगा।


मिठास लौटेगी, पर सबक जरूरी है

यूपी की 121 मिलें होना ताकत है, लेकिन सिर्फ मिलें होना काफी नहीं। गन्ने की बीमारी-रोधी किस्म, सही उत्पादन अनुमान और निर्यात पर समय पर ब्रेक - यही भविष्य में इस संकट को रोक सकता है। इथेनॉल दुश्मन नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का साथी है। जरूरत है संतुलन की, ताकि पेट्रोल की टंकी भरने के लिए थाली की मिठास कम न हो।

अक्टूबर में नया पेराई सीजन शुरू होने तक 10 लाख टन विदेशी चीनी ही आम आदमी की चाय में मिठास घोलेगी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 23 Aug 2026

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Saturday, 22 August 2026

August 22, 2026

મહેસાણામાં પ્રેમલગ્નનો વિવાદ બન્યો જ્ઞાતિનો જંગ! પાટીદાર સમાજના મેદાને આવતા પોલીસ સ્ટેશનમાં હાઇવોલ્ટેજ ડ્રામા

મહેસાણામાં પ્રેમલગ્નનો વિવાદ બન્યો જ્ઞાતિનો જંગ! પાટીદાર સમાજના મેદાને આવતા પોલીસ સ્ટેશનમાં હાઇવોલ્ટેજ ડ્રામા
- Friday World 23 Aug 2026
                   પ્રતિકાત્મક તસ્વીર 

મહેસાણા - મહેસાણામાં એક ડોક્ટર યુવતીના આંતરજ્ઞાતિય લવ મેરેજના મામલે હવે સમગ્ર મામલો સામાજિક આંદોલનમાં ફેરવાઈ ગયો છે. પાલનપુરની પટેલ સમાજની ડોક્ટર યુવતી ચાંદની પટેલ અને મહેસાણાની ખાનગી હોસ્પિટલમાં ફરજ બજાવતા દલિત સમાજના ડોક્ટર સ્મિત પરમારે 4 મહિના પહેલા પરિવારની મરજી વિરુદ્ધ લવ મેરેજ કર્યા હતા. આ લગ્ન બાદ શરૂ થયેલો પારિવારિક વિવાદ હવે પોલીસ સ્ટેશન સુધી પહોંચ્યો છે.

શું છે સમગ્ર ઘટના?
પ્રાપ્ત માહિતી મુજબ, 18 ઓગસ્ટના રોજ બપોરના સમયે ચાંદની તેના સાસરીમાં સાસુ સાથે હાજર હતી. તે સમયે તેના પિતા જિતેન્દ્ર પટેલ, માતા નીતાબેન અને કાકા નરેશભાઈ સહિતના પરિવારજનો બે કારમાં ત્યાં પહોંચ્યા હતા. આરોપ છે કે માતાની તબિયત ખરાબ હોવાનું બહાનું કાઢીને તેઓ ઘરમાં પ્રવેશ્યા અને ત્યારબાદ ચાંદનીને વાળ પકડીને બળજબરીથી ઢસડીને કારમાં નાખી અપહરણ કરીને લઈ ગયા. આ સમગ્ર ઘટના ઘરમાં લાગેલા CCTV કેમેરામાં કેદ થઈ ગઈ હતી. આ ઘટના બાદ ડો. સ્મિતની માતાએ મહેસાણા એ-ડિવિઝન પોલીસ સ્ટેશનમાં ફરિયાદ નોંધાવી હતી.

પોલીસે આ મામલે અપહરણનો ગુનો નોંધીને તપાસ હાથ ધરી હતી. પરંતુ બીજી તરફ આ મામલે નવો વળાંક આવ્યો છે.

પાટીદાર સમાજ કેમ મેદાને આવ્યો?
આ કેસમાં પોલીસે ચાંદનીની માતા નીતાબેન અને અન્ય 8 લોકોની અટકાયત કરી હોવાના સમાચાર વહેતા થતા જ પાટીદાર સમાજમાં રોષ ફાટી નીકળ્યો હતો. પાટીદાર અનામત આંદોલન સમિતિ (PAAS), સરદાર પટેલ ગ્રુપ (SPG), વિશ્વ ઉમિયા ફાઉન્ડેશન અને ખોડલધામ સહિતની સંસ્થાઓના આગેવાનો મોટી સંખ્યામાં મહેસાણા એ-ડિવિઝન પોલીસ મથકે પહોંચી ગયા હતા.

પાટીદાર અગ્રણી સતિષ પટેલે આક્ષેપ કર્યો હતો કે, યુવતી ઘરેથી ભાગી જતા તેનો પરિવાર તેને માત્ર સમજાવવા ગયો હતો. પરંતુ સામા પક્ષે તેમના પર જીવલેણ હુમલો કર્યો હતો. નીતાબેન પર લાકડીઓ વડે હુમલો કરવામાં આવ્યો અને તેમને બંધક બનાવવાની ધમકી આપવામાં આવી હતી. તેમણે વધુમાં આક્ષેપ કર્યો કે પોલીસે એકતરફી કાર્યવાહી કરી છે અને સામા પક્ષના દબાણમાં આવીને ખોટી રીતે અપહરણ અને એટ્રોસિટી એક્ટ હેઠળ ફરિયાદ નોંધીને ઈજાગ્રસ્ત માતા સહિત 9 લોકોને જેલમાં ધકેલી દીધા છે.

આગેવાનોએ એવો પણ ગંભીર આક્ષેપ કર્યો કે પોલીસ કસ્ટડીમાં ઈજાગ્રસ્ત મહિલાને યોગ્ય સારવાર અને ભોજન પણ આપવામાં આવ્યું નથી.

પોલીસ સ્ટેશનમાં પાટીદાર સમાજના લોકોના આક્રમક તેવરને જોતા માહોલ તંગ બની ગયો હતો અને પોલીસે તે દિવસનો લોક દરબાર પણ રદ કરવો પડ્યો હતો.

પાટીદાર સમાજની માંગ અને ચીમકી
પાટીદાર સમાજના આગેવાનોએ પોલીસ સમક્ષ સ્પષ્ટ માંગ મૂકી છે કે:

1. પોલીસે તટસ્થ તપાસ કરવી જોઈએ અને બંને પક્ષને સમાન ન્યાય આપવો જોઈએ.
2. ખોટી રીતે નોંધવામાં આવેલી અપહરણ અને એટ્રોસિટીની ફરિયાદ રદ કરવી જોઈએ.
3. ચાંદનીની માતા પર હુમલો કરનાર સાચા આરોપીઓ સામે તાત્કાલિક ગુનો દાખલ કરવો જોઈએ.

જો તાત્કાલિક આ માંગણીઓ સ્વીકારવામાં નહીં આવે તો સમગ્ર ગુજરાતમાં ઉગ્ર આંદોલન કરવામાં આવશે તેવી ચીમકી પણ ઉચ્ચારવામાં આવી છે. હાલ પોલીસે મામલો શાંત પાડવા બંને પક્ષની ફરિયાદોની તટસ્થ તપાસની ખાતરી આપી છે.

આ ઘટનાએ ફરી એકવાર પ્રેમલગ્ન અને જ્ઞાતિવાદના મુદ્દે ગુજરાતમાં ચર્ચા જગાવી છે.

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World 23 Aug 2026

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