Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 19 April 2026

सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर चरमराती व्यवस्था: गैस संकट ने मचा दिया पलायन का तूफान, 24 घंटे की कतार में भूखे-प्यासे मजदूरों ने कूदी बाउंड्री, पुलिस का लाठीचार्ज

सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर चरमराती व्यवस्था: गैस संकट ने मचा दिया पलायन का तूफान, 24 घंटे की कतार में भूखे-प्यासे मजदूरों ने कूदी बाउंड्री, पुलिस का लाठीचार्ज-Friday World-April 20,2026 
19 अप्रैल 2026। गुजरात की टेक्सटाइल राजधानी सूरत के उधना रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जो दिल दहला देने वाला था। हजारों प्रवासी श्रमिक — हाथों में सामान, बच्चों को गोद में लिए, कुछ की आंखों में घर लौटने की बेचैनी और कुछ के चेहरों पर थकान — स्टेशन के बाहर 3 से 5 किलोमीटर तक लंबी कतार में खड़े थे। गर्मी का पारा चढ़ा हुआ था, प्यास लगी थी, भूख सता रही थी, लेकिन ट्रेन नहीं आ रही थी। धैर्य टूटा तो भगदड़ मच गई। कुछ लोग बाउंड्री दीवार कूदकर प्लेटफॉर्म पर पहुंचने की कोशिश करने लगे। स्थिति को काबू में लाने के लिए रेलवे पुलिस और आरपीएफ को लाठीचार्ज करना पड़ा।

यह महज गर्मी की छुट्टियों या शादी सीजन की भीड़ नहीं थी। असली वजह थी — एलपीजी सिलेंडर का गंभीर संकट। ईरान-इजराइल संघर्ष के कारण मध्य पूर्व से आने वाली गैस आपूर्ति प्रभावित हुई, जिसकी मार सूरत जैसे शहरों में रहने वाले लाखों प्रवासी मजदूरों पर पड़ी।

 गैस नहीं तो गुजारा नहीं — मजदूरों का पलायन

सूरत में हीरा और टेक्सटाइल उद्योग में काम करने वाले ज्यादातर मजदूर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और मध्य प्रदेश से आते हैं। पिछले एक-दो महीनों से घरेलू गैस सिलेंडर बाजार में गायब हो गए। जहां पहले 1000-1200 रुपये में सिलेंडर मिल जाता था, वहां अब ब्लैक में 4000-5000 रुपये तक की मांग हो रही थी। कई परिवारों के लिए खाना बनाना मुश्किल हो गया।

मजदूरों ने बताया — “रसोई में चूल्हा जलता ही नहीं। बच्चे भूखे सो जाते हैं। काम तो है, लेकिन घर चलाने लायक गैस नहीं है।” नतीजा? फैक्टरियां भी प्रभावित होने लगीं और मजदूर परिवार समेत गांव लौटने लगे। उधना स्टेशन पर रोजाना 7000 से ज्यादा यात्री जमा हो गए। सामान्य दिनों में दो-तीन ट्रेनें पर्याप्त होती थीं, लेकिन इस बार भीड़ तीन गुनी हो गई।
 24 घंटे की कतार, बाउंड्री कूदना और लाठीचार्ज

स्टेशन के बाहर लाइन 3 किलोमीटर से ज्यादा लंबी हो गई। लोग 16-18 घंटे से ज्यादा खड़े रहे। पानी की सुविधा न के बराबर थी। जब रेलवे प्रशासन ने आखिरकार पानी की व्यवस्था की, तो तृष्णार्त लोग एक-दूसरे के हाथ से बोतलें छीनने लगे। एक हृदयविदारक दृश्य भी देखने को मिला — एक युवक अपनी पत्नी की अस्थियों का कलश हाथ में लिए घंटों ट्रेन में चढ़ने की कोशिश करता रहा, लेकिन भीड़ में जगह नहीं मिली।

धैर्य खत्म होने पर कुछ लोग बाउंड्री दीवार फांदकर अंदर घुसने लगे। सुरक्षा बलों ने स्थिति संभालने के लिए हल्का लाठीचार्ज किया। दो मजदूर गर्मी और भीड़ में बेहोश भी हो गए। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो गए, जिसमें भगदड़ और पुलिस की कार्रवाई साफ दिख रही थी।

 रेलवे की नाकामी और प्रशासनिक तैयारी की कमी

मुसाफिरों का आरोप है कि हर साल गर्मी की छुट्टियों और शादी सीजन में भीड़ बढ़ती है, फिर भी रेलवे पहले से कोई विशेष व्यवस्था नहीं करता। इस बार तो एलपीजी संकट ने स्थिति और बिगाड़ दी। उपलब्ध ट्रेनों की संख्या बेहद कम थी। स्पेशल ट्रेनें चलाने या अतिरिक्त कोच लगाने की मांग की गई, लेकिन तत्काल कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

पश्चिम रेलवे ने बाद में बयान जारी कर कहा कि स्थिति नियंत्रण में है और अतिरिक्त व्यवस्था की जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बता रही थी।

गैस संकट की जड़ें और व्यापक प्रभाव

यह संकट अचानक नहीं आया। मध्य पूर्व (विशेषकर ईरान) में बढ़ते तनाव के कारण एलपीजी और संबंधित गैसों की आयात आपूर्ति प्रभावित हुई। भारत दुनिया का बड़ा एलपीजी आयातक है। जब अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन दबाव में आती है, तो सबसे पहले गरीब और मध्यम वर्ग प्रभावित होता है। सूरत जैसे औद्योगिक शहर में यह संकट और गहरा हो गया क्योंकि यहां लाखों मजदूर परिवार रहते हैं।

टेक्सटाइल उद्योग भी चिंता में है। मजदूरों के पलायन से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। कई यूनिट्स ने कामकाजी घंटे कम कर दिए या अस्थायी छुट्टियां घोषित कर दीं।

 क्या सबक मिलेगा?

यह घटना कई सवाल खड़े करती है:
- क्या केंद्र और राज्य सरकारें गैस आपूर्ति की वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे घरेलू उत्पादन बढ़ाना, रणनीतिक भंडारण) पर पर्याप्त काम कर रही हैं?
- क्या रेलवे बड़े पैमाने पर पलायन की स्थिति में स्पेशल ट्रेनों और बेहतर क्राउड मैनेजमेंट के लिए तैयार है?
- क्या प्रवासी मजदूरों की समस्याओं को केवल चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय स्थायी समाधान निकाला जाएगा?

उधना स्टेशन पर जो दृश्य देखे गए, वे केवल एक स्टेशन की कहानी नहीं हैं। वे उन लाखों अजान परिवारों की पीड़ा की कहानी हैं जो शहरों में मेहनत करके देश की अर्थव्यवस्था चलाते हैं, लेकिन संकट के समय सबसे पहले असुरक्षित हो जाते हैं।

पानी की बोतल के लिए लूट, बेहोश होते मजदूर, बाउंड्री फांदते लोग और लाठी की मार — ये दृश्य किसी भी संवेदनशील समाज के लिए शर्मनाक हैं। समय आ गया है कि सरकारें न सिर्फ तत्काल राहत दें, बल्कि लंबे समय के लिए मजबूत नीतियां बनाएं ताकि गैस जैसे बुनियादी जरूरत का संकट फिर कभी इतना भयानक रूप न ले।

उधना रेलवे स्टेशन की यह घटना महज भीड़ प्रबंधन की नाकामी नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक-आर्थिक संकट का संकेत है। एलपीजी संकट ने दिखा दिया कि वैश्विक घटनाएं कितनी तेजी से आम भारतीयों की जिंदगी प्रभावित कर सकती हैं। अब जरूरत है त्वरित कार्रवाई की — अतिरिक्त ट्रेनें, गैस आपूर्ति बहाल करना, मजदूरों को सहायता और भविष्य के लिए बेहतर तैयारी।

अन्यथा ऐसे दृश्य बार-बार दोहराए जाएंगे, और हर बार मजदूरों की पीड़ा बढ़ती ही जाएगी।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 20,2026