उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में सेठ पी.सी. बागला डिग्री कॉलेज के भूगोल विभाग के प्रोफेसर रजनीश कुमार पर 30 से अधिक छात्राओं का यौन शोषण करने और उनकी 65 अश्लील वीडियो बनाने तथा पोर्न साइट्स पर अपलोड करने के गंभीर आरोप लगे थे। पुलिस ने मोबाइल से वीडियो बरामद किए थे। मामले ने पूरे देश में सनसनी फैला दी थी।
लेकिन 24 मार्च 2026 को हाथरस की फास्ट ट्रैक कोर्ट (अतिरिक्त जिला न्यायाधीश महेंद्र कुमार श्रीवास्तव) ने प्रोफेसर रजनीश कुमार को **सभी आरोपों से बरी** कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सबूतों का अभाव है, पीड़ित छात्राओं ने अदालत में अपने बयान से मुकर लिया और आरोप साबित नहीं हो सके।
यह फैसला न सिर्फ पीड़िताओं के परिवारों को झटका देने वाला है, बल्कि पूरे समाज में न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर रहा है।
### क्या हुआ था हाथरस मामले में?
2025 में एक गुमनाम शिकायत (लाचार बेटी के नाम से) मिली थी, जिसमें प्रोफेसर रजनीश कुमार पर छात्राओं को नौकरी और परीक्षा पास कराने के बहाने यौन शोषण करने का आरोप लगाया गया था। पुलिस ने FIR दर्ज की, प्रोफेसर को गिरफ्तार किया और उनके मोबाइल से दर्जनों अश्लील वीडियो बरामद किए। आरोप थे कि उन्होंने 20 वर्षों से अधिक समय तक इस प्रकार की गतिविधियां चलाई थीं।
मामले में धारा 376 (बलात्कार), 376C (अधिकार का दुरुपयोग कर यौन संबंध), 354A (यौन उत्पीड़न) और IT एक्ट की धारा 67 (अश्लील सामग्री प्रसारण) लगाई गई थी। लेकिन जब मामला अदालत पहुंचा तो कई छात्राओं ने कोर्ट में बयान बदल दिया। बचाव पक्ष ने वीडियो को AI जनरेटेड बताने का दावा भी किया। नतीजा — सबूतों के अभाव में बरी।
प्रोफेसर ने बाद में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और कॉलेज ने उन्हें परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया। लेकिन पीड़िताओं की आवाज दब गई, न्याय की उम्मीद टूट गई।
### अशोक कुमार खरात का मामला: क्या अलग होगा?
नासिक (महाराष्ट्र) के स्वयंभू ज्योतिषी और गॉडमैन **अशोक कुमार खरात** पर भी महिलाओं का यौन शोषण, बलात्कार, धोखाधड़ी और ब्लैकमेलिंग के कई मामले दर्ज हैं। एक पूर्व कर्मचारी की स्टिंग ऑपरेशन में 100 से अधिक वीडियो क्लिप्स सामने आए, जिनमें महिलाओं के साथ कथित दुराचार दिखाया गया है।
अब तक खरात पर 8 से 10 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें से अधिकांश बलात्कार और धोखाधड़ी से संबंधित हैं। महिलाएं आरोप लगाती हैं कि खरात अपनी “दिव्य शक्तियों” का हवाला देकर उन्हें यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते थे और बाद में वीडियो से ब्लैकमेल करते थे।
**सवाल यह है** — क्या हाथरस वाले प्रोफेसर रजनीश कुमार के मामले की तरह खरात को भी सबूतों के अभाव में या बयान बदलने पर बरी कर दिया जाएगा? या इस बार न्याय व्यवस्था मजबूती से खड़ी होगी?
### न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल
हाथरस फैसले ने कई गंभीर मुद्दे उजागर कर दिए हैं:
1. **पीड़िताओं का बयान बदलना**: कई बार पीड़ित परिवार पर दबाव, धमकी या सामाजिक कलंक के डर से बयान बदल देते हैं। क्या पुलिस और कोर्ट ऐसे मामलों में पीड़िताओं की सुरक्षा और काउंसलिंग सुनिश्चित कर पाते हैं?
2. **सबूतों की विश्वसनीयता**: डिजिटल युग में वीडियो और फोटो जैसे ठोस सबूत भी “AI जनरेटेड” कहकर खारिज किए जा सकते हैं। फॉरेंसिक जांच की गुणवत्ता और अदालत में उसकी स्वीकार्यता पर सवाल है।
3. **शिक्षण संस्थानों में शक्ति का दुरुपयोग**: प्रोफेसर जैसी पोजीशन में व्यक्ति छात्राओं पर आसानी से दबाव बना सकता है। क्या कॉलेजों में आंतरिक शिकायत समितियां (ICC) वाकई प्रभावी हैं?
4. **गॉडमैन और बाबाओं के मामलों में पैटर्न**: अशोक खरात जैसे कई स्वयंभू संतों पर बार-बार यौन शोषण के आरोप लगते हैं। वे धार्मिक भावनाओं का फायदा उठाकर महिलाओं को फंसाते हैं। हाथरस मामले के बाद क्या खरात मामले में भी “सबूत नाकाफी” का हवाला दिया जाएगा?
### समाज और कानून को क्या सीख लेनी चाहिए?
हाथरस फैसला सिर्फ एक प्रोफेसर की बेगुनाही नहीं, बल्कि न्याय प्रक्रिया की कमजोरियों को उजागर करता है। अगर ठोस डिजिटल सबूत, दर्जनों शिकायतें और प्रारंभिक पुलिस जांच के बावजूद आरोपी बरी हो जाता है, तो आम आदमी का न्याय पर विश्वास कैसे बनेगा?
अशोक कुमार खरात का मामला अभी जांच के विभिन्न चरणों में है। कई महिलाएं सामने आ रही हैं। अगर पुलिस मजबूत फॉरेंसिक सबूत जुटाती है, पीड़िताओं को सुरक्षा प्रदान करती है और अदालत बिना दबाव के सुनवाई करती है, तो न्याय मिलने की उम्मीद है। लेकिन हाथरस ने साबित कर दिया कि रास्ता आसान नहीं है।
**पीड़िताओं की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण**
- यौन अपराधों में पीड़िताओं को तुरंत सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक मदद और कानूनी सहायता मिलनी चाहिए।
- डिजिटल सबूतों की फॉरेंसिक जांच को और मजबूत बनाना होगा।
- पावर पोजीशन में बैठे लोगों पर नजर रखने के लिए सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम जरूरी है।
- समाज को कलंक के डर से ऊपर उठकर पीड़िताओं का साथ देना होगा।
हाथरस का फैसला कई परिवारों के लिए निराशाजनक है। लेकिन इससे हार नहीं माननी चाहिए। अशोक कुमार खरात जैसे मामलों में अगर समाज, मीडिया और कानून व्यवस्था एकजुट हुई तो न्याय मिल सकता है।
**निष्कर्ष**:
प्रोफेसर रजनीश कुमार को बरी किए जाने से यौन शोषण के मामलों में “सबूतों की कमी” का सवाल फिर से उठ गया है। अब सबकी नजर अशोक कुमार खरात के मामले पर है। क्या इस बार न्याय की जीत होगी या फिर सबूत नाकाफी कहकर आरोपी बच निकलेगा?
समय बताएगा। लेकिन एक बात तय है — जब तक पीड़िताओं की आवाज को मजबूती से सुना और संरक्षित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसे फैसले समाज में निराशा और अविश्वास पैदा करते रहेंगे।
न्याय की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। इसे मजबूत बनाने की जरूरत है — ताकि हर पीड़िता को विश्वास हो कि उसकी आवाज दबाई नहीं जा सकती।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 14,2026