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Saturday, 4 April 2026

ईरान परमाणु डील का विश्वासघात: ट्रंप ने एकतरफा रद्द करके अमेरिका की विश्वसनीयता को हमेशा के लिए खो दिया — अब दुनिया ट्रंप या अमेरिका पर कैसे भरोसा करे?

ईरान परमाणु डील का विश्वासघात: ट्रंप ने एकतरफा रद्द करके अमेरिका की विश्वसनीयता को हमेशा के लिए खो दिया — अब दुनिया ट्रंप या अमेरिका पर कैसे भरोसा करे?-Friday World-April 4,2026 
2015 में विश्व के प्रमुख शक्तिशाली देशों ने ईरान के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया था — जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA), जिसे आम भाषा में ईरान परमाणु डील कहा जाता है। इस डील में P5+1 देश (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन + जर्मनी) और यूरोपीय संघ (EU) के साथ ईरान शामिल था। इसका उद्देश्य था कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण रहे और वह परमाणु हथियार बनाने की दिशा में न बढ़े। 

ईरान ने बदले में कई सख्त शर्तें मानीं — जैसे यूरेनियम संवर्धन की मात्रा 3.67% तक सीमित रखना, स्टॉकपाइल 300 किलोग्राम से ज्यादा न रखना, सेंट्रीफ्यूज की संख्या घटाना, IAEA निरीक्षकों को पूर्ण पहुंच देना और फोर्डो, नतांज, अराक जैसे सुविधाओं को सिविलियन उपयोग तक सीमित करना। बदले में अमेरिका, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के परमाणु संबंधी प्रतिबंध हटाए जाने थे, जिससे ईरान को आर्थिक राहत मिलती। 

यह डील बहुपक्षीय कूटनीति की एक बड़ी सफलता मानी गई थी। लगभग 12 साल की मेहनत के बाद 14 जुलाई 2015 को विएना में यह समझौता हुआ। IAEA ने बार-बार पुष्टि की कि ईरान डील की शर्तों का पालन कर रहा है। 
ट्रंप का एकतरफा फैसला — 8 मई 2018 लेकिन 8 मई 2018 को अमेरिकी राष्ट्रपति **डोनाल्ड ट्रंप** ने एक झटके में अमेरिका को इस डील से बाहर निकाल लिया। उन्होंने इसे “बहुत खराब सौदा” बताया और ईरान पर फिर से सख्त प्रतिबंध लगा दिए। यह फैसला पूरी तरह एकतरफा था। बाकी सभी देश — रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी और यूरोपीय संघ — डील को बचाने की कोशिश करते रहे। उन्होंने ट्रंप से अनुरोध किया कि वह डील में बने रहें, लेकिन ट्रंप ने अपनी मर्जी से फैसला कर दिया।
 इस फैसले के तुरंत बाद यूरोपीय नेताओं ने संयुक्त बयान जारी किया — फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल और ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अफसोस जताया और कहा कि वे डील को बनाए रखेंगे। लेकिन अमेरिका की सेकेंडरी सैंक्शंस (तीसरे देशों पर भी प्रतिबंध) के कारण यूरोपीय कंपनियां ईरान से व्यापार करने में डर गईं। 

 ट्रंप के फैसले के परिणाम ट्रंप के इस कदम ने ईरान को डील से पीछे हटने का मौका दे दिया। 2019 से ईरान ने धीरे-धीरे डील की शर्तें तोड़ना शुरू कर दिया — यूरेनियम संवर्धन 60% तक बढ़ाया, स्टॉकपाइल बढ़ाया और IAEA की पहुंच सीमित की। नतीजा? ईरान आज परमाणु हथियार बनाने के लिए जरूरी सामग्री से महज हफ्तों दूर पहुंच गया, जबकि डील के दौरान वह साल भर दूर था।

 दुनिया भर में इस फैसले की कड़ी आलोचना हुई। यूरोपीय देशों ने कहा कि अमेरिका ने बहुपक्षीय समझौते को तोड़ा है। रूस और चीन ने इसे अमेरिकी एकतरफा नीति का उदाहरण बताया। यहां तक कि अमेरिकी सहयोगी देश भी हैरान थे कि एक समझौते को, जिसमें अमेरिका खुद शामिल था और जिसकी पुष्टि IAEA कर चुका था, बिना किसी बड़े उल्लंघन के रद्द कर दिया गया। 

 विश्वासघात का सबसे बड़ा सबक: अब ट्रंप या अमेरिका पर कोई कैसे भरोसा करे? ट्रंप के इस एकतरफा कदम ने अमेरिका की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई। दुनिया के कई देशों ने कहा — “अगर अमेरिका आज एक समझौते से बाहर निकल सकता है, तो कल दूसरे समझौते से भी निकल सकता है।”

 यह सिर्फ ईरान डील तक सीमित नहीं था। ट्रंप प्रशासन ने पेरिस जलवायु समझौते से भी बाहर निकलने की कोशिश की, NAFTA को बदल दिया और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से दूरी बनाई। नतीजा? सहयोगी देशों में भी अमेरिका पर भरोसा घटने लगा। यूरोप ने “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” (स्वतंत्र विदेश नीति) की बात शुरू कर दी। रूस और चीन को मौका मिला कि वे अमेरिका के खिलाफ गठबंधन मजबूत करें। 

आज जब ट्रंप दूसरी बार सत्ता में हैं (2025-2026), तो ईरान के साथ नई बातचीत की कोशिश हो रही है, लेकिन पुराना विश्वासघात भुलाया नहीं जा सकता। दुनिया के देश पूछ रहे हैं

 — अगर कल कोई नया समझौता होता है, तो क्या ट्रंप या कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति उसे फिर से रद्द नहीं कर देंगे?

 यह सवाल सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं। उत्तर कोरिया, चीन, रूस या किसी भी देश के साथ भविष्य के किसी भी समझौते में यही आशंका रहेगी — “अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं?”

 ट्रंप ने कहा था कि वे “बेहतर डील” लाएंगे, लेकिन वास्तव में ईरान का परमाणु कार्यक्रम और आगे बढ़ गया, क्षेत्रीय तनाव बढ़ा और अमेरिका खुद अलग-थलग पड़ गया। यह दिखाता है कि एकतरफा फैसले कितने खतरनाक हो सकते हैं।  

बहुपक्षीयता बनाम एकतरफा नीति ईरान परमाणु डील का विश्वासघात एक सबक है — अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बहुपक्षीय समझौते की अहमियत। जब एक देश अपने सहयोगियों की राय को नजरअंदाज कर एकतरफा फैसला लेता है, तो न सिर्फ वह समझौता टूटता है, बल्कि उस देश की लंबे समय की विश्वसनीयता भी खतरे में पड़ जाती है।

 आज जब विश्व कई चुनौतियों — परमाणु प्रसार, जलवायु परिवर्तन, व्यापार युद्ध — से जूझ रहा है, तो देश पूछ रहे हैं: अमेरिका या ट्रंप पर भरोसा किया जा सकता है? जवाब आसान नहीं है। इतिहास गवाह है कि 2018 का फैसला अभी भी दुनिया की कूटनीति पर साया डाल रहा है।

 शांति और स्थिरता के लिए जरूरी है कि बड़े देश एकतरफा फैसलों से बचें और सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम करें। अन्यथा, हर नया समझौता सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगा। 

(Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 4,2026