-Friday World-April 10,2026
मिडिल ईस्ट में जारी तनावपूर्ण जंग के बीच एक अचानक और चौंकाने वाला विकास सामने आया है। अमेरिका और ईरान दो हफ्ते के युद्धविराम (ceasefire) पर सहमत हो गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद Truth Social पर इसकी घोषणा की, जबकि ईरान की ओर से भी आधिकारिक तौर पर सहमति जताई गई। यह समझौता पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुआ है और इसमें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को तुरंत, पूरी तरह और सुरक्षित रूप से खोलने की शर्त शामिल है।
ट्रंप ने लिखा, “हमने अपने सभी सैन्य उद्देश्यों को पूरा कर लिया है और ईरान के साथ लंबे समय के शांति समझौते की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं।” उन्होंने ईरान के 10-पॉइंट प्रस्ताव को “negotiate करने के लिए workable basis” बताया। इस घोषणा से ठीक दो घंटे पहले ट्रंप ने ईरान पर भारी हमलों की धमकी दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर होर्मुज नहीं खुला तो “पूरी सभ्यता मर जाएगी”।
समझौते की मुख्य शर्तें क्या हैं?
- अमेरिका और इजरायल ईरान पर दो हफ्ते के लिए सभी सैन्य हमले रोक देंगे।
- ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (जिससे दुनिया का पांचवां तेल गुजरता है) को तुरंत खोल देगा, ताकि तेल टैंकरों की आवाजाही बिना रुकावट हो सके।
- यह “डबल साइडेड सीजफायर” होगा, यानी दोनों पक्ष हमले रोकेंगे।
- अगले दो हफ्तों में पाकिस्तान के इस्लामाबाद में बातचीत होगी, जहां ईरान के 10-पॉइंट प्रस्ताव पर विस्तृत शांति समझौता तैयार किया जाएगा।
यह ceasefire 40 दिनों से ज्यादा चले संघर्ष को अस्थायी रूप से रोकता है, जिसमें अमेरिका-इजरायल ने ईरान के सैन्य और सरकारी ठिकानों पर हमले किए थे। ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की थी, जिससे क्षेत्रीय तनाव चरम पर पहुंच गया था।
रूस और स्पेन का तंज: “अमेरिका-इजरायल की हार”
समझौते की घोषणा के तुरंत बाद रूस ने अमेरिका पर कड़ा तंज कसा। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता **मारिया जखारोवा** ने कहा कि यह “एकतरफा, आक्रामक और बिना उकसावे वाली कार्रवाई” की करारी हार है। उन्होंने Sputnik Radio को दिए इंटरव्यू में कहा:
“सभी बयान – ज्यादा आक्रामक होने के, सोशल मीडिया पर जीत की घोषणा करने के – एक बार फिर हार गए। अमेरिका-इजरायल की यह स्थिति पूरी तरह हार गई है।”
जखारोवा ने जोर देकर कहा कि रूस शुरू से ही सैन्य समाधान के खिलाफ था और राजनीतिक-कूटनीतिक बातचीत की वकालत कर रहा था। उन्होंने “आक्रामकता” को तुरंत रोकने और असली शांति स्थापित करने की जरूरत पर बल दिया। स्पेन ने भी अमेरिका की नीति पर सवाल उठाए और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सही रास्ता अपनाने की सलाह दी।
क्यों महत्वपूर्ण है यह ceasefire?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा का गला है। अगर यह बंद रहता तो वैश्विक तेल की कीमतें आसमान छू जातीं, भारत जैसे आयातक देशों पर भारी असर पड़ता। इस समझौते से तेल आपूर्ति में राहत मिली है, लेकिन विशेषज्ञ इसे “fragile truce” (नाजुक युद्धविराम) बता रहे हैं।
अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं:
- लेबनान में इजरायल-हिजबुल्लाह संघर्ष जारी है, जिसे ceasefire में शामिल करने पर मतभेद हैं।
- ईरान ने कहा है कि अमेरिकी-इजरायली हमले पूरी तरह बंद होने और संपत्तियां अनब्लॉक होने तक बातचीत आगे नहीं बढ़ेगी।
- अमेरिका का कहना है कि सैन्य ताकत “in place” रहेगी जब तक पूर्ण समझौता नहीं हो जाता।
- उपराष्ट्रपति JD Vance ने चेतावनी दी है कि ईरान अमेरिका के साथ “खेल” न करे।
भू-राजनीतिक प्रभाव
यह घटनाक्रम ट्रंप की विदेश नीति का नया अध्याय है। चुनावी वादों के मुताबिक “अमेरिका फर्स्ट” रखते हुए उन्होंने सैन्य escalation से पीछे हटकर कूटनीति का रास्ता चुना। पाकिस्तान की मध्यस्थता ने इस्लामाबाद की भूमिका को मजबूत किया है।
ईरान इसे अपनी जीत बता रहा है। तेहरान में लोग सड़कों पर उतरे और इसे “अमेरिकी आक्रामकता का मुंहतोड़ जवाब” करार दिया गया। वहीं इजरायल ने साफ कहा कि लेबनान में कार्रवाई जारी रहेगी।
विश्लेषकों का मानना है कि अगले दो हफ्ते निर्णायक होंगे। अगर इस्लामाबाद में बातचीत सफल रही तो मिडिल ईस्ट में लंबे समय की शांति की राह खुल सकती है। लेकिन अगर कोई पक्ष शर्तों का उल्लंघन किया तो जंग फिर से भड़क सकती है।
दुनिया की प्रतिक्रिया
- पाकिस्तान: प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की मध्यस्थता को सराहा जा रहा है।
- गल्फ देश: तेल आपूर्ति बहाल होने से राहत, लेकिन ईरान के प्रभाव को लेकर सतर्क।
- भारत: क्षेत्रीय स्थिरता और तेल की कीमतों पर नजर रखे हुए है।
यह ceasefire सिर्फ एक ठहराव नहीं, बल��कि बड़े शांति समझौते की दिशा में पहला कदम हो सकता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि मिडिल ईस्ट में युद्धविराम अक्सर नाजुक होते हैं। अगले 14 दिन तय करेंगे कि क्या ट्रंप की यह पहल “Longterm PEACE” ला पाएगी या फिर पुरानी दुश्मनी फिर सिर उठाएगी।
अमेरिका-ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम एक राहत की सांस है, लेकिन रूस जैसे देश इसे अमेरिका-इजरायल की रणनीतिक हार मान रहे हैं। अब सारी नजरें पाकिस्तान में होने वाली बातचीत पर हैं। अगर सफल हुई तो मिडिल ईस्ट का नक्शा बदल सकता है; वरना फिर तनाव बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।
शांति की राह हमेशा चुनौतीपूर्ण होती है, लेकिन इस मौके को दोनों पक्षों को सही मायने में इस्तेमाल करना चाहिए – सिर्फ दो हफ्ते नहीं, बल्कि स्थायी समाधान के लिए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 10,2026