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Friday, 10 April 2026

ईरान की बड़ी अपील: प्रतिबंधों के पीड़ितों के लिए बने अंतरराष्ट्रीय मुआवजा कोष, “आर्थिक आतंकवाद” का खुला विरोध!

ईरान की बड़ी अपील: प्रतिबंधों के पीड़ितों के लिए बने अंतरराष्ट्रीय मुआवजा कोष, “आर्थिक आतंकवाद” का खुला विरोध!-
जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर ईरान ने एक बार फिर विश्व समुदाय को चुनौती दी है। एकतरफा प्रतिबंधों (Unilateral Coercive Measures) को “आर्थिक आतंकवाद” करार देते हुए ईरान ने इनके शिकार देशों और जनता के लिए अंतरराष्ट्रीय मुआवजा कोष बनाने की मांग की है। ईरानी राजदूत अली बहरेनी के इस बयान ने वैश्विक स्तर पर चर्चा छेड़ दी है।

जेनेवा सम्मेलन में उठी मजबूत आवाज
9-10 अप्रैल 2026 को जेनेवा के पैलेस ऑफ नेशंस में “एकतरफा जबरदस्ती उपायों पर मानवीय कार्रवाई, मुआवजा और जवाबदेही” विषय पर दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि अली बहरेनी ने प्रमुख भाषण दिया।

बहरेनी ने स्पष्ट कहा कि कुछ देशों द्वारा लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध दबाव, अस्थिरता और आक्रामकता का हथियार बन गए हैं। उन्होंने इन प्रतिबंधों को राज्यों को कमजोर करने और संभावित सैन्य कार्रवाई से पहले की तैयारी का माध्यम बताया। बहरेनी ने इन्हें “आर्थिक आतंकवाद” की संज्ञा दी और कहा कि यह अमानवीय रणनीति का पहला कदम है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि संयुक्त राष्ट्र को व्यावहारिक कदम उठाते हुए एक ऐसा मुआवजा तंत्र विकसित करना चाहिए जिसमें प्रतिबंध लगाने वाले देश प्रभावित देशों को नुकसान की भरपाई (reparations) करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हों।

ईरान का प्रस्ताव: क्या है मुआवजा कोष?
ईरानी राजदूत ने प्रस्ताव रखा कि अंतरराष्ट्रीय मुआवजा कोष बनाया जाए, जिसमें:
- प्रतिबंधों से हुई आर्थिक, सामाजिक और मानवीय क्षति की भरपाई हो
- प्रभावित सरकारों और आम जनता दोनों को लाभ मिले
- प्रतिबंध लगाने वाले देशों पर कानूनी दायित्व हो

बहरेनी ने आगे कहा कि मानवीय छूट (humanitarian exemptions) महज कानूनी नाटक हैं। द्वितीयक प्रतिबंधों (secondary sanctions) का डर इन छूटों को पूरी तरह无效 बना देता है।

 प्रतिबंधों से बचाव के वैकल्पिक रास्ते
सम्मेलन में बहरेनी ने सकारात्मक समाधान भी सुझाए। उन्होंने कहा कि दुनिया को:
- स्वतंत्र बैंकिंग प्रणालियों का विकास करना चाहिए
- राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए
- क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को मजबूत करना चाहिए

इन कदमों से महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को प्रतिबंधों से होने वाली बाधाओं से बचाया जा सकता है।

ईरान ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि घरेलू क्षमताओं, वैज्ञानिक प्रगति और आत्मनिर्भरता के जरिए ईरान ने प्रतिबंधों, असुरक्षा और युद्ध की तर्क को कमजोर कर दिया है। ईरान की यह “प्रतिरोध क्षमता” (resilience) अन्य देशों के लिए उदाहरण बन सकती है।

 सम्मेलन में कौन-कौन शामिल?
यह सम्मेलन कई देशों और संगठनों के लिए महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। इसमें शामिल प्रमुख देश थे:
- क्यूबा
- वेनेजुएला
- ईरान
- चीन
- जिम्बाब्वे
- रूस
- इरिट्रिया
- ब्राजील

इसके अलावा कानूनी विशेषज्ञ, संयुक्त राष्ट्र के रिपोर्टeurs और विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने भी सक्रिय भागीदारी की।

सम्मेलन में एकतरफा प्रतिबंधों के मानवीय, कानूनी और राजनीतिक प्रभावों पर विस्तृत चर्चा हुई। कई प्रतिनिधिमंडलों ने बाध्यकारी कानूनी उपकरण बनाने की मांग की, ताकि न केवल प्रतिबंध लगाने वाले देशों बल्कि उन वित्तीय संस्थानों की भी जवाबदेही तय की जा सके जो इन प्रतिबंधों को लागू करते हैं।

प्रतिभागियों ने चिंता जताई कि जब प्रतिबंध राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में असफल रहते हैं तो कुछ देश सैन्य बल का सहारा लेने लगते हैं। यह प्रवृत्ति वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए खतरा है।

 वैश्विक संदर्भ: प्रतिबंध क्यों विवादास्पद?
एकतरफा प्रतिबंध लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय रहे हैं। पश्चिमी देश इन्हें विदेश नीति का वैध उपकरण मानते हैं, जबकि प्रभावित देश (जैसे ईरान, रूस, वेनेजुएला, क्यूबा) इन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और सामूहिक सजा मानते हैं।

ये प्रतिबंध अक्सर आम नागरिकों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं – दवाइयों की कमी, खाद्य सुरक्षा पर असर, आर्थिक मंदी और विकास कार्यों में बाधा। सम्मेलन में यह बात बार-बार उठी कि प्रतिबंध “सभी को प्रभावित” करते हैं, भले ही उनका लक्ष्य कोई खास सरकार हो।

ईरान का यह बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधों का उपयोग बढ़ रहा है। कई देश अब इनके विकल्प तलाश रहे हैं – जैसे BRICS देशों में स्थानीय मुद्रा में व्यापार, नई बैंकिंग व्यवस्था और क्षेत्रीय गठबंधन।

 ईरान की मजबूत स्थिति
ईरानी राजदूत ने सम्मेलन में ईरान की उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्षों के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ने अपनी वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक क्षमताओं को मजबूत किया है। यह “प्रतिरोध अर्थव्यवस्था” का सफल मॉडल अन्य प्रतिबंधित देशों के लिए प्रेरणा है।

 आगे का रास्ता
सम्मेलन में उठाई गई मांगें अब संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय मुआवजा कोष जैसा तंत्र बनता है तो यह एक ऐतिहासिक कदम साबित हो सकता है। साथ ही, स्वतंत्र आर्थिक व्यवस्थाओं का विकास प्रतिबंधों के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा।

हालांकि, पश्चिमी देशों की तरफ से इस प्रस्ताव पर क्या प्रतिक्रिया आएगी, यह देखना बाकी है। फिलहाल ईरान और उसके समर्थक देश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाते रहेंगे।

यह घटना दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में आर्थिक हथियारों का इस्तेमाल अब सिर्फ द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रहा। यह मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय कानून और विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ा गहरा मुद्दा बन चुका है।

ईरान की अपील केवल मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक नई वैश्विक व्यवस्था की मांग है – जहां कोई भी देश दूसरे देश की जनता को सामूहिक सजा न दे सके।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 10,2026