ईरान-इजरायल संघर्ष (जिसमें अमेरिका भी शामिल हो गया) ने फरवरी-मार्च 2026 से दुनिया के ऊर्जा बाजार को हिला दिया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज – दुनिया के करीब 20% तेल और LNG का रास्ता – प्रभावित होने से कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं। कई देशों पर इसका असर पड़ा, लेकिन पाकिस्तान सबसे बुरी तरह प्रभावित हुआ। तेल आयात पर पूरी तरह निर्भर इस देश की अर्थव्यवस्था पहले से ही कर्ज, मुद्रास्फीति और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही थी। अब युद्ध ने उसे पूरी तरह हिला दिया।
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मार्च 2026 में आपातकालीन कदम उठाते हुए लगभग स्मार्ट लॉकडाउन जैसे उपायों की घोषणा की। सरकारी खर्च कम करने, ईंधन बचाने और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सख्त फैसले लिए गए। ये कदम बताते हैं कि पाकिस्तान न केवल तेल संकट से, बल्कि बाहरी मदद के रास्ते बंद होने से भी जूझ रहा है।
शहबाज सरकार के सख्त उपाय: लगभग लॉकडाउन जैसी स्थिति
- सरकारी वाहनों पर रोक: अगले दो महीनों के लिए 60% सरकारी वाहन सड़कों से हटा दिए गए (एम्बुलेंस और पब्लिक बसों को छोड़कर)। ईंधन आवंटन में 50% कटौती की गई।
- शिक्षा संस्थान बंद: सभी स्कूल दो हफ्तों के लिए बंद कर दिए गए। कॉलेज और यूनिवर्सिटी में ऑनलाइन क्लासेस शुरू कर दी गईं। इसका मकसद छात्र-छात्राओं और शिक्षकों के आवागमन से होने वाले ईंधन खर्च को कम करना था।
- सरकारी दफ्तरों में बदलाव: अब सरकारी कार्यालय केवल 4 दिन ही खुलेंगे। स्टाफ की 50% अटेंडेंस अनिवार्य, बाकी Work From Home। इससे परिवहन और बिजली दोनों की बचत हो रही है।
- खर्च में भारी कटौती: सभी सरकारी विभागों के बजट में 20% की कमी। नई खरीदारी (वाहन, फर्नीचर, एयर कंडीशनर आदि) पर पूरी रोक। सरकारी अधिकारियों के विदेश दौरे रद्द। सेमिनार-कॉन्फ्रेंस अब सरकारी भवनों में ही होंगे, होटलों में नहीं।
- वेतन और भत्तों में कटौती: मंत्रियों और कैबिनेट सदस्यों के वेतन-भत्ते दो महीनों के लिए रोक दिए गए। सांसदों और विधायकों की सैलरी में 20-50% तक कटौती। बड़े सरकारी अधिकारियों के वेतन से दो दिन का वेतन काटने का फैसला। राज्य-owned enterprises के कर्मचारियों की सैलरी भी 5-30% तक घटाई गई।
ये उपाय ईंधन बचाने और सरकारी घाटे को नियंत्रित करने के लिए लिए गए, लेकिन आम नागरिकों पर इसका बोझ सीधे पड़ रहा है।
पेट्रोल की कीमतों में आसमान छूती उछाल
युद्ध से पहले पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमतें अपेक्षाकृत नियंत्रित थीं, लेकिन मार्च-अप्रैल 2026 में कई बार भारी बढ़ोतरी हुई। एक बार में ही 55 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अप्रैल 2026 के अंत तक पेट्रोल Rs 393.35 प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीजल *Rs 380.19 प्रति लीटर पहुंच गया। कुछ रिपोर्ट्स में पहले के चरण में Rs 460 तक की बात भी आई।
तुलना करें तो भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों में स्थिति अलग है:
- अफगानिस्तान — अभी तक पेट्रोल की कीमत नहीं बढ़ाई (या बहुत मामूली)।
- बांग्लादेश— सिर्फ 4-5% बढ़ोतरी।
- श्रीलंका — लगभग 1-22% (स्रोत के अनुसार) बढ़ोतरी।
- भारत — न्यूनतम या शून्य बढ़ोतरी (सरकारी नियंत्रण और सब्सिडी के कारण)।
पाकिस्तान में बढ़ोतरी सबसे तेज और सबसे ज्यादा रही, क्योंकि यहां IMF के दबाव में सब्सिडी नहीं दी जा सकी और आयात बिल सीधे उपभोक्ताओं पर डाला गया।
मुख्य कारण: भीख बंद, कर्ज वापसी का दबाव और अतिरिक्त खर्च
पाकिस्तान की मुश्किल सिर्फ तेल की महंगाई नहीं है। युद्ध ने उसकी बाहरी मदद के स्रोतों को भी प्रभावित किया:
1. अरब देशों से कर्ज वापसी: UAE ने $3.5 बिलियन का कर्ज वापस मांग लिया, जिसे पाकिस्तान ने अप्रैल 2026 में चुकाया। सऊदी अरब ने कुछ सहायता ($3 बिलियन) दी, लेकिन कुल मिलाकर खाड़ी देशों से मिलने वाली पुरानी “भीख” या आसानी से रोलओवर होने वाले फंड अब उपलब्ध नहीं रहे।
2. अफगानिस्तान के साथ तनाव और खर्च: फरवरी-मार्च 2026 में पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष बढ़ा। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में हवाई हमले किए, जिससे अतिरिक्त सैन्य खर्च बढ़ा। सीमा बंद होने से व्यापार प्रभावित हुआ और सुरक्षा व्यय में इजाफा हुआ।
3. *मरिमिटेंस पर खतरा: खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों पाकिस्तानी मजदूरों की नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। रिमिटेंस पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
नतीजा: विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव, मुद्रास्फीति में उछाल, और आम आदमी की जेब पर बोझ। एक पाकिस्तानी पत्रकार या विश्लेषक की भाषा में कहें तो – “नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या”। देश पहले से कर्ज में डूबा है, अब नई मदद नहीं मिल रही और पुरानी देनदारियां भी वापस मांगी जा रही हैं।
व्यापक प्रभाव: महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक तनाव
- परिवहन और लॉजिस्टिक्स महंगे होने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं। गेहूं की कटाई जैसे मौसमी कार्य भी महंगे इनपुट से प्रभावित।
- बिजली संकट: महंगे ईंधन से बिजली उत्पादन प्रभावित, जिससे लोड शेडिंग बढ़ सकती है।
- व्यापार और उद्योग: छोटे व्यापारी और परिवहन क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए।
- राजनीतिक दबाव: सरकार पर IMF के लक्ष्यों को पूरा करने और जनता की नाराजगी दोनों का बोझ।
दुनिया के अन्य देशों (भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका) ने सब्सिडी, स्टॉक मैनेजमेंट या वैकल्पिक स्रोतों से खुद को कुछ हद तक बचाया, लेकिन पाकिस्तान की संरचनात्मक कमजोरियां (आयात पर निर्भरता, कम विदेशी मुद्रा भंडार, राजनीतिक अस्थिरता) इसे सबसे कमजोर बना रही हैं।
निष्कर्ष: एक सबक और चुनौती
ईरान-इजरायल युद्ध ने साबित कर दिया कि वैश्विक संघर्षों का असर सबसे ज्यादा उन विकासशील देशों पर पड़ता है जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं और जिनकी अर्थव्यवस्था पहले से संकटग्रस्त है। पाकिस्तान के लिए यह “परफेक्ट स्टॉर्म” साबित हुआ – तेल महंगा, मदद बंद, अतिरिक्त युद्ध व्यय, और कर्ज का दबाव।
शहबाज शरीफ सरकार के कड़े कदम अल्पकालिक राहत दे सकते हैं, लेकिन लंबे समय में पाकिस्तान को ऊर्जा विविधीकरण, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आर्थिक सुधारों की जरूरत है। वरना “नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या” वाली स्थिति बार-बार दोहराती रहेगी।
यह संकट न सिर्फ पाकिस्तान के लिए, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए चेतावनी है – भू-राजनीतिक तूफानों से बचने के लिए आर्थिक मजबूती जरूरी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 28,2026