-Friday World-April 19
भारतीय लोकतंत्र में महिला सशक्तिकरण एक लंबे समय से चली आ रही मांग रही है। 2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान का 106वां संशोधन) पारित किया, जिसे आमतौर पर महिला आरक्षण बिल कहा जाता है। इसका उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का लगभग एक-तिहाई (33%) हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करना था। यह बिल लोकसभा में 454-2 से और राज्यसभा में सर्वसम्मति से पास हुआ, राष्ट्रपति की मंजूरी मिली और हाल ही में (अप्रैल 2026) इसे लागू करने की अधिसूचना भी जारी हुई। लेकिन असल में यह बिल क्या था—केवल महिला आरक्षण या परिसीमन (delimitation) से जुड़ा संविधान संशोधन? और मीडिया ने इसे कैसे पेश किया?
दो प्रमुख अखबारों—इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू—की रिपोर्टिंग इस मुद्दे पर मीडिया की दो अलग-अलग शैलियों को उजागर करती है। एक तरफ जहां इंडियन एक्सप्रेस को कुछ आलोचक "BJP का नरेटिव" मानते हैं, वहीं द हिंदू को "फैक्ट-बेस्ड पत्रकारिता" का उदाहरण बताया जाता है। आइए तथ्यों के आधार पर समझते हैं कि असलियत क्या है।
2023 का बिल: क्या पेश हुआ था?
सितंबर 2023 के विशेष सत्र में पेश संविधान (128वां संशोधन) बिल, 2023 (आधिकारिक नाम: नारी शक्ति वंदन अधिनियम) ने महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया। लेकिन इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया कि यह आरक्षण जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन के पूरा होने के बाद ही लागू होगा। अनुच्छेद 334A में यह शर्त रखी गई कि आरक्षण पहली जनगणना (2023 बिल के बाद की) के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन के बाद शुरू होगा और 15 साल तक चलेगा। SC/ST महिलाओं के लिए भी सब-आरक्षण का प्रावधान था, और सीटें रोटेशन पर आधारित होंगी।
यह बिल केवल महिला आरक्षण का नाम नहीं था—यह एक संविधान संशोधन बिल था, जिसमें परिसीमन का लिंकेज अनिवार्य था। विपक्ष ने शुरू से ही इस लिंकेज पर सवाल उठाए थे, लेकिन बिल पास हो गया। 2026 में सरकार ने इसे तेज करने के लिए नए संशोधन (131वां संशोधन बिल सहित) लाए, जिसमें लोकसभा सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने, 2011 जनगणना आधारित परिसीमन और महिला आरक्षण को 2029 से लागू करने का प्रस्ताव था।
हालांकि, अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में यह संशोधन बिल लोकसभा में गिर गया। 528 सदस्यों में से 298 के पक्ष में और 230 के विरुद्ध वोट पड़े, लेकिन संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत (352) नहीं मिला। विपक्ष ने इसे "महिलाओं के नाम पर परिसीमन का षड्यंत्र" बताया, जबकि सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण का कदम करार दिया। नतीजा? 2023 का मूल कानून लागू हो गया, लेकिन बिना तेजी के—परिसीमन का इंतजार जारी।
इंडियन एक्सप्रेस: 'बदमाशी' या BJP का नरेटिव?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्टिंग अक्सर सरकार की उपलब्धियों को प्रमुखता देती दिखती है। 2023 के बिल को उन्होंने "ऐतिहासिक" और "महिला सशक्तिकरण की बड़ी जीत" के रूप में पेश किया। परिसीमन के लिंक को "जरूरी व्यावहारिक कदम" बताया गया, क्योंकि बिना नए जनगणना आंकड़ों और सीट पुनर्विन्यास के आरक्षण लागू करना मुश्किल था। 2026 के संशोधन बिल पर उनकी कवरेज में विपक्ष की आपत्तियों को "दक्षिणी राज्यों की चिंता" या "राजनीतिक विरोध" के रूप में दर्शाया गया, जबकि सरकार की मंशा को "महिलाओं को जल्दी प्रतिनिधित्व देने" का प्रयास बताया।
आलोचक इसे "BJP नरेटिव" कहते हैं क्योंकि अखबार अक्सर परिसीमन को तटस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया के रूप में दिखाता है, न कि उत्तर-दक्षिण असंतुलन या BJP के राजनीतिक फायदे का मुद्दा। उदाहरण के लिए, दक्षिणी राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल) की चिंता कि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की लोकसभा सीटें कम हो सकती हैं, को वे कम महत्व देते दिखे। कुछ रिपोर्टों में विपक्ष को "रोकने वाला" बताया गया, जबकि तथ्य यह है कि 2026 का बिल परिसीमन से सीधा जुड़ा था और विपक्ष ने इसे "संवैधानिक हमला" करार दिया।
यह शैली कुछ हद तक "बदमाशी" लग सकती है अगर कोई इसे पक्षपाती मानता है—क्योंकि यह सरकार की पहल को सकारात्मक फ्रेम में रखती है और विरोध को तकनीकी या राजनीतिक बाधा के रूप में। लेकिन यह भी सच है कि अखबार ने बिल के ऐतिहासिक महत्व और महिला प्रतिनिधित्व की कमी (वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिशत लगभग 14% है) को उजागर किया।
द हिंदू: 'पत्रकारिता' या फैक्ट-चेक?
द हिंदू की रिपोर्टिंग को अक्सर अधिक विश्लेषणात्मक और फैक्ट-आधारित माना जाता है। उन्होंने 2023 के बिल को स्पष्ट रूप से "संविधान संशोधन" बताया, जिसमें परिसीमन का शर्तिया लिंक था। 2026 के संशोधन पर उनकी कवरेज में विपक्ष की चिंताओं को प्रमुखता दी—खासकर दक्षिणी राज्यों पर असर, संघीय संतुलन का उल्लंघन और "महिलाओं के नाम पर चुनावी नक्शा बदलने" का आरोप।
उन्होंने रिपोर्ट किया कि मूल 2023 कानून लागू हो गया है, लेकिन आरक्षण अभी लागू नहीं होगा क्योंकि परिसीमन लंबित है। विपक्ष की एकता और बिल के गिरने को "संघीयता की जीत" या "सरकार की जल्दबाजी का सबक" के रूप में पेश किया। कुछ एडिटोरियल में परिसीमन को "राजनीतिक रूप से संवेदनशील" बताया गया, जहां उत्तर भारत की जनसंख्या वृद्धि से सीटें बढ़ सकती हैं और दक्षिण का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
यह "फैक्ट" आधारित लगता है क्योंकि उन्होंने बिल के नाम, नंबर (128वां vs 131वां), प्रावधानों और वोटिंग डिटेल्स को सही-सही रखा। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह कभी-कभी सरकार-विरोधी नजरिया अपनाता है, जहां हर सरकारी कदम को "षड्यंत्र" के रूप में देखा जाता है। वास्तव में, दोनों पक्षों की बातें तथ्यों पर आधारित हैं—महिला आरक्षण जरूरी है, लेकिन परिसीमन बिना सहमति के विवादास्पद हो सकता है।
तथ्यों का फैसला: नरेटिव vs वास्तविकता
- महिला आरक्षण पेश हुआ था: हां, 2023 में पास हुआ और 2026 में अधिसूचित भी। लेकिन यह "केवल महिला आरक्षण बिल" नहीं था—यह संविधान संशोधन था जिसमें परिसीमन अनिवार्य था।
- विपक्ष ने वोट क्यों किया?: 2023 में बिल पास हो गया (केवल 2 विरोधी वोट), लेकिन 2026 के तेजी वाले संशोधन पर विरोध किया क्योंकि वे परिसीमन फॉर्मूले से सहमत नहीं थे। वे कहते हैं कि महिलाओं के नाम पर लोकसभा का नक्शा बदला जा रहा है, जिससे दक्षिणी राज्य प्रभावित होंगे।
- असल मुद्दा: भारत में महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाना जरूरी है, लेकिन परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति की जरूरत है। बिना जाति जनगणना या व्यापक चर्चा के इसे आगे बढ़ाना विवाद पैदा करता है।
दोनों अखबार अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। इंडियन एक्सप्रेस विकास और सरकारी पहल पर फोकस करता है, जबकि द हिंदू सवाल उठाता है और संघीय चिंताओं को जगह देता है। सच्चाई बीच में है—महिला आरक्षण एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसे परिसीमन के बिना या बिना सहमति के लागू करना चुनौतीपूर्ण है।
मीडिया की भूमिका नरेटिव सेट करना नहीं, बल्कि नागरिकों को तथ्य देना है। पाठकों को दोनों पक्ष पढ़ने चाहिए, आंकड़े चेक करने चाहिए और खुद फैसला करना चाहिए। नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं की आधी आबादी को राजनीति में जगह दे सकता है, लेकिन अगर यह परिसीमन के विवाद में फंस गया तो इसका फायदा टल सकता है।
भारतीय लोकतंत्र की ताकत बहस में है। क्या हमें महिलाओं को तुरंत 33% सीटें देनी चाहिए, या परिसीमन जैसे बड़े बदलाव को सहमति से करना चाहिए? बहस जारी रहे, लेकिन तथ्यों पर आधारित हो।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 19