नई दिल्ली: भारत ने एक बार फिर चीन की उन शरारती कोशिशों को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें पड़ोसी देश भारतीय क्षेत्र के स्थानों को नया नाम देने की कोशिश कर रहा है। विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे प्रयास व्यर्थ और बेतुके हैं। ये न तो वास्तविकता बदल सकते हैं और न ही भारत की संप्रभुता पर कोई असर डाल सकते हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से इस मुद्दे पर अपना मजबूत बयान साझा किया। इसमें कहा गया, “भारत, चीन की ओर से उन जगहों को मनगढ़ंत नाम देने के किसी भी शरारती प्रयास को पूरी तरह से खारिज करता है, जो भारतीय क्षेत्र का हिस्सा हैं।” मंत्रालय ने आगे जोर देकर कहा कि अरुणाचल प्रदेश समेत ये सभी क्षेत्र हमेशा से भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग रहे हैं और हमेशा रहेंगे। झूठे दावे या काल्पनिक नामकरण से इस अटल सच्चाई में कोई फर्क नहीं पड़ सकता।
यह कड़ी आपत्ति चीन की हालिया हरकतों के बाद आई है। चीन ने अरुणाचल प्रदेश (जिसे वह ‘ज़ंगनान’ या दक्षिणी तिब्बत कहता है) के 27 स्थानों के लिए नए चीनी नाम जारी किए हैं। इनमें 15 पहाड़, 4 दर्रे, 2 नदियां, 1 झील और 5 बस्तियां शामिल हैं। यह चीन की पांचवीं ऐसी सूची है। इससे पहले 2017, 2021, 2023 और 2024 में भी ऐसी कोशिशें की जा चुकी हैं। भारत हर बार इनको सिरे से खारिज करता रहा है।
विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि चीन की ये हरकतें भारत-चीन संबंधों को स्थिर और सामान्य बनाने के प्रयासों को कमजोर करती हैं। “चीन को ऐसी हरकतों से बचना चाहिए, जो संबंधों को बिगाड़ती हैं और आपसी विश्वास तथा समझ को नुकसान पहुंचाती हैं।” मंत्रालय ने इसे ‘पूरी तरह निरर्थक’ करार दिया और दोहराया कि नाम बदलने से भौगोलिक या कानूनी वास्तविकता नहीं बदलती।
अरुणाचल प्रदेश: भारत की पहचान, चीन की महत्वाकांक्षा
अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न राज्य है। यहां की विविध संस्कृति, प्राकृतिक सौंदर्य और रणनीतिक महत्व दुनिया भर में जाना जाता है। तवांग, बंगोंग त्सो झील, सियांग नदी जैसी जगहें न केवल भारत की भौगोलिक विरासत हैं, बल्कि सैन्य और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। चीन इसे दक्षिणी तिब्बत बताकर अपना दावा जताता रहा है, लेकिन भारत ने हमेशा इसे खारिज किया है।
स्थानीय लोगों ने भी चीन की इस कोशिश पर तीखी प्रतिक्रिया दी। अरुणाचल प्रदेश के अंजाव जिले के हवाई शहर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। लोगों ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीरें जलाकर अपना गुस्सा जताया। एक प्रदर्शनकारी ने कहा, “यह 1962 नहीं, 2025 (और अब 2026) है। हम चीन के नामकरण के प्रयासों को पूरी तरह खारिज करते हैं। हम भारत का हिस्सा हैं और हमेशा रहेंगे।” यह प्रदर्शन दर्शाता है कि अरुणाचल के निवासी अपनी भारतीय पहचान पर कितने गर्वित और दृढ़ हैं।
सेनलिंग (Cenling) ज़िला: काराकोरम की रणनीतिक चाल
चीन की हरकत केवल अरुणाचल तक सीमित नहीं है। हाल ही में चीन ने अपने शिनजियांग प्रांत में ‘सेनलिंग’ (Cenling) नाम का एक नया ज़िला बनाया है। यह ज़िला काराकोरम पर्वतमाला के पास स्थित है, जो पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर (PoK), अफगानिस्तान की सीमा और विवादित क्षेत्रों के निकट है।
यह चीन का तीसरा नया ज़िला है, जिसकी स्थापना पिछले एक साल में हुई है। इससे पहले ‘हीन’ (Hean) और ‘हेकांग’ (Hekang) ज़िले बनाए गए थे। हीन ज़िले में अक्साई चिन पठार का बड़ा हिस्सा शामिल है, जो 1962 के युद्ध के बाद चीन के कब्जे में है और लद्दाख का हिस्सा माना जाता है। भारत ने इन ज़िलों के निर्माण पर पहले भी विरोध दर्ज कराया था।
सेनलिंग ज़िले का रणनीतिक महत्व अत्यधिक है। यह वाखान कॉरिडोर के पास है, जहां से उइगुर अलगाववादी गतिविधियों को नियंत्रित करने का दावा किया जा रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत के साथ पश्चिमी क्षेत्र (लद्दाख और अक्साई चिन) में दबाव बढ़ाने और पाकिस्तान के साथ CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) को और मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है। शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) भी इसी क्षेत्र में है, जिसे पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से चीन को सौंप दिया था। भारत इसे अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और किसी भी गतिविधि को खारिज करता है।
भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी समेत कई अधिकारियों ने शक्सगाम घाटी में किसी भी निर्माण या दावे को ‘अवैध’ बताया है। विदेश मंत्रालय ने भी कहा है कि 1963 का चीन-पाकिस्तान सीमा समझौता भारत पर लागू नहीं होता।
ऐतिहासिक संदर्भ और 1962 का सबक
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद अक्साई चिन पर कब्जा एक लंबे विवाद की शुरुआत बना। तब से LAC (वास्तविक नियंत्रण रेखा) पर तनाव बना हुआ है। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद संबंध और खराब हुए, लेकिन दोनों देशों के बीच सीमा वार्ता जारी है।
चीन की नामकरण नीति को ‘कार्टोग्राफिक आक्रामकता’ कहा जाता है। यह प्रतीकात्मक रूप से दावा मजबूत करने की कोशिश है, लेकिन वास्तविकता पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। भारत ने अपनी सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, सड़कें, पुल और सैन्य तैयारियां तेज कर दी हैं। अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र पर बड़े पुल, सड़क नेटवर्क और पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
भारत की मजबूत स्थिति और रणनीतिक जवाब
भारत की विदेश नीति स्पष्ट है — कोई भी एकतरफा कदम स्वीकार्य नहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने ‘नेबरहुड फर्स्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत पूर्वोत्तर को विकास की मुख्यधारा में जोड़ा है। अरुणाचल प्रदेश में सड़कें, हवाई अड्डे, बिजली और शिक्षा पर भारी निवेश हो रहा है।
चीन की ये हरकतें न केवल भारत-चीन संबंधों को प्रभावित करती हैं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भी खतरा हैं। क्वाड, इंडो-पैसिफिक फ्रेमवर्क और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत अपनी चिंताएं मजबूती से रखता है।
: सच्चाई अटल है
चीन कितने भी मनगढ़ंत नाम गढ़ ले या नए ज़िले बना ले, भारत की संप्रभुता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख का अक्साई चिन क्षेत्र और शक्सगाम घाटी भारत की भूमि हैं। विदेश मंत्रालय का बयान इस बात को दोहराता है कि भारत किसी भी चुनौती का डटकर सामना करेगा और अपने हितों की रक्षा करेगा।
भारतीय जनता, खासकर पूर्वोत्तर के निवासी, अपनी मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा रखते हैं। 2026 में भी यह संदेश साफ है — “यह हमारा देश है, हमारा अभिन्न अंग है और रहेगा।”
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 13,2026