-Friday World-April 23,2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में मतदान चल रहा है। दक्षिण दिनाजपुर के कुमारगंज विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी शुभेंदु सरकार पर भीड़ द्वारा हमले की खबरें आ रही हैं। वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रत्याशी को घेरकर पीटा जा रहा है, सुरक्षाकर्मियों के साथ वे किसी तरह भागकर जान बचाते हैं। मौके पर सुरक्षा की कमी साफ नजर आ रही है – सिर्फ एक पुलिसकर्मी दिखाई दे रहा है।
भाजपा समर्थक इसे विपक्षी गुंडागर्दी बता रहे हैं, जबकि विपक्षी खेमे में इसे 'ड्रामा' कहकर खारिज किया जा रहा है। सवाल उठ रहा है – क्या यह वाकई हमला था या वोट बटोरने का कैमरा-लाइट-एक्शन वाला स्टंट? आम नागरिक सोच रहे हैं: जो खुद एक घटना को ठीक से मैनेज नहीं कर पाता, वो राज्य कैसे संभालेगा?
राजनीतिक हिंसा का पुराना पैटर्न पीड़ित चेहरा' दिखाना वोट बढ़ाने का पुराना फॉर्मूला है,
कुछ विपक्षी आवाजें इसे 'स्टेज मैनेज्ड' बता रही हैं – जहां कैमरे पहले से तैयार, लाइटें ऑन और एक्शन शुरू।
सवाल जायज है। अगर यह असली हमला था तो प्रशासन की भूमिका क्या थी? और अगर ड्रामा था तो क्या फायदा? चुनावी रणनीति में ऐसे 'पीड़ित चेहरा' दिखाना वोट बढ़ाने का पुराना फॉर्मूला है, लेकिन आज के समय में जनता ज्यादा सतर्क हो गई है। वे वीडियो देखते हैं, तथ्य जांचते हैं और फिर फैसला करते हैं।
ड्रामा vs वास्तविकता: जनता का नजरिया
आम नागरिक की सोच साफ है – "खुद एक ड्रामा ठीक से नहीं कर सकता, सरकार क्या चलेगी?" अगर कोई नेता या पार्टी सुरक्षा की कमी का रोना रोती है लेकिन खुद की तैयारी में चूक करती दिखे, तो विश्वास टूटता है।
- सुरक्षा की कमी: चुनाव आयोग और राज्य सरकार दोनों जिम्मेदार हैं। केंद्र बलों की तैनाती के बावजूद अगर प्रत्याशी को भीड़ घेर ले, तो सवाल उठना लाजमी है।
- कैमरा-लाइट-एक्शन कल्चर: आज हर राजनीतिक घटना लाइव स्ट्रीम होती है। अगर वीडियो में सिर्फ पीटना दिख रहा है और कोई बड़ा घायल होने का सबूत नहीं, तो संदेह होना स्वाभाविक है। कई बार पार्टियां ऐसी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हैं ताकि सहानुभूति मिले।
- वोट पर असर: ऐसे फालतू ड्रामे से वोट बढ़ने के बजाय घट सकते हैं। लोग अब परफॉर्मेंस देखते हैं – विकास, कानून-व्यवस्था, रोजगार। अगर कोई नेता सिर्फ 'पीड़ित' बनकर वोट मांगता है, तो जनता पूछती है – "अच्छा ड्रामा तो करो, कम से कम विश्वसनीय तो लगो।"
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से हिंसा और गुंडागर्दी से ग्रस्त रही है। चाहे TMC हो या BJP, दोनों पक्षों ने आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेला है। लेकिन जनता थक चुकी है। वे चाहते हैं कि चुनाव मुद्दों पर लड़े जाएं – शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी। न कि हर दिन नए 'हमला' या 'ड्रामा' के वीडियो से।
# क्या सीखना चाहिए राजनीतिक दलों को?
1. सुरक्षा पर फोकस: प्रत्याशियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। अगर भीड़ हमला कर रही है तो तुरंत कार्रवाई हो, न कि बाद में बयानबाजी।
2. मुद्दों की राजनीति: ड्रामा कम, विकास ज्यादा। बंगाल में युवा बेरोजगारी, उद्योगों का पलायन, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
3. जनता की समझ: सोशल मीडिया के युग में लोग फेक वीडियो और स्टेज्ड घटनाओं को पहचानने लगे हैं। जो पार्टी बार-बार ऐसे 'फालतू ड्रामे' करती है, उसका विश्वसनीयता स्कोर गिरता है।
4. चुनाव आयोग की भूमिका: केंद्र और राज्य स्तर पर बेहतर समन्वय जरूरी। हिंसा मुक्त चुनाव सुनिश्चित करना लोकतंत्र की बुनियाद है।
शुभेंदु सरकार की घटना चाहे असली हो या स्टेज्ड, यह बंगाल की चुनावी संस्कृति को दर्शाती है। जहां विकास की बात कम और 'पीटवाने' या 'हमला करवाने' के आरोप ज्यादा होते हैं।
नागरिक सोच रहे हैं – अगर कोई नेता खुद की सुरक्षा नहीं संभाल पाता या उसे 'ड्रामा' के लिए इस्तेमाल करता है, तो वो पूरे राज्य की सुरक्षा और विकास कैसे सुनिश्चित करेगा? कैमरा, लाइट और एक्शन तो अच्छा है, लेकिन असली एक्शन चाहिए – जनता की समस्याओं का समाधान।
निष्कर्ष: वोट की असली ताकत
पश्चिम बंगाल के मतदाता समझदार हैं। वे वीडियो देखते हैं, लेकिन अंत में फैसला तथ्यों और पिछले प्रदर्शन से करते हैं। अगर भाजपा या कोई भी पार्टी ऐसे 'पीटवाने वाले ड्रामे' पर निर्भर रहती है, तो वोट कम होने का खतरा रहता है।
अच्छा ड्रामा वह होता है जो विश्वसनीय लगे, मुद्दों से जुड़ा हो और जनता को उम्मीद दे। फालतू स्टंट से सिर्फ सुर्खियां मिलती हैं, वोट नहीं।
बंगाल की जनता अब बदलाव चाहती है – हिंसा मुक्त, विकास केंद्रित और जिम्मेदार राजनीति। चाहे कोई भी पार्टी हो, अगर वो इस उम्मीद को पूरा नहीं करेगी तो जनता का जवाब वोट के रूप में आएगा।
ड्रामा करना है तो कुछ शानदार करो – वरना जनता कहेगी: "भाई, कैमरा बंद करो, असली काम दिखाओ!"
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 23,2026