तालिबान का ईरान समर्थन: जून 2025 में इजराइल-US दबाव के बाद नया गठबंधन का संकेत?
जून 2025 का महीना मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इजराइल के सैन्य हमलों और अमेरिका की कड़ी धमकियों के बाद तालिबान के वरिष्ठ नेताओं तथा उनके सहयोगी समूहों ने ईरान के प्रति खुला समर्थन जताया। यह घटनाक्रम उन लंबे समय से चले आ रहे विवादों के बावजूद हुआ, जो तालिबान और तेहरान के बीच सालों से चले आ रहे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह **सीमित और सशर्त गठबंधन** (limited and conditional alignment) का संकेत है, जो क्षेत्रीय शक्तियों के नए समीकरणों की ओर इशारा करता है।
पृष्ठभूमि: इजराइल के हमले और अमेरिकी दबाव
जून 2025 में इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों पर लक्षित हमले किए। इन हमलों का उद्देश्य ईरान की बढ़ती सैन्य क्षमता को रोकना था। हमलों के तुरंत बाद अमेरिका ने भी ईरान पर कड़ी चेतावनी जारी की, जिसमें सैन्य हस्तक्षेप की धमकी शामिल थी। इस स्थिति में ईरान को क्षेत्रीय समर्थन की जरूरत महसूस हुई।
इसी दौरान अफगानिस्तान में सत्ता संभाले तालिबान ने अप्रत्याशित रूप से ईरान के पक्ष में आवाज उठाई। तालिबान के कई वरिष्ठ नेता, जिनमें राजनीतिक और सैन्य कमांडर शामिल थे, ने सार्वजनिक बयानों में ईरान की संप्रभुता का समर्थन किया और इजराइल-US गठबंधन की निंदा की। कुछ तालिबान से जुड़े प्रभावशाली धार्मिक और जनजातीय नेताओं ने भी ईरान के साथ एकजुटता व्यक्त की।
तालिबान-ईरान संबंधों का जटिल इतिहास
तालिबान और ईरान के संबंध हमेशा से तनावपूर्ण रहे हैं। 1990 के दशक में तालिबान के उदय के समय दोनों के बीच सीमा विवाद, शिया-सुन्नी मतभेद और अफगान शिया समुदाय (हजारा) पर तालिबान के अत्याचारों को लेकर गहरी दरार थी। 2001 में अमेरिकी आक्रमण के बाद ईरान ने तालिबान विरोधी ताकतों का समर्थन किया, जबकि तालिबान ने ईरान को दुश्मन मानकर देखा।
फिर भी, व्यावहारिक जरूरतों ने कभी-कभी सहयोग को जन्म दिया। 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद ईरान ने अफगानिस्तान के साथ सीमा प्रबंधन, व्यापार और पानी के मुद्दों पर बातचीत बढ़ाई। लेकिन सांप्रदायिक तनाव, अफगान शरणार्थियों की समस्या और क्षेत्रीय प्रभाव की होड़ जारी रही।
जून 2025 की घटनाएं इन पुराने विवादों को पृष्ठभूमि में धकेलकर एक नए अध्याय की शुरुआत लगती हैं।
तालिबान का समर्थन: क्या कारण?
1. साझा दुश्मन: इजराइल और अमेरिका दोनों ही तालिबान के लिए भी चुनौती हैं। तालिबान अमेरिकी वापसी के बावजूद वाशिंगटन को अपना दुश्मन मानता है। इजराइल के हमलों को वे इस्लामिक दुनिया पर हमला मानते हैं।
2. रणनीतिक आवश्यकता: तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता और आर्थिक सहायता चाहिए। ईरान अफगानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण ट्रांजिट रूट और व्यापारिक साझेदार है। ईरान के साथ निकटता तालिबान को क्षेत्रीय संतुलन बनाने में मदद कर सकती है।
3. आंतरिक दबाव: तालिबान के अंदर कुछ गुट ईरान के साथ संबंध सुधारने के पक्ष में हैं। धार्मिक नेतृत्व भी इस्लामिक एकजुटता की अपील पर प्रतिक्रिया दे रहा है।
4. पाकिस्तान और अन्य खिलाड़ियों की भूमिका: पाकिस्तान, जो तालिबान का पारंपरिक समर्थक रहा है, भी ईरान के साथ अपने संबंध संभाल रहा है। चीन और रूस जैसे देश, जो ईरान के करीबी हैं, इस गठबंधन को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
क्षेत्रीय प्रभाव: नया शक्ति संतुलन?
यह सीमित अलाइनमेंट मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया में नई गतिशीलता पैदा कर सकता है।
- ईरान के लिए फायदा: तालिबान का समर्थन ईरान को मनोबल और क्षेत्रीय बैकअप देता है। इससे इजराइल-US दबाव के सामने उसकी स्थिति मजबूत होती है।
- तालिबान के लिए: यह अंतरराष्ट्रीय अलगाव कम करने और आर्थिक अवसर पैदा करने का रास्ता हो सकता है। ईरान के जरिए चीन की बेल्ट एंड रोड पहल से जुड़ने के अवसर बढ़ सकते हैं।
- अफगानिस्तान पर असर: हजारा और अन्य शिया समुदायों में चिंता बढ़ सकती है। वहीं, तालिबान की सत्ता मजबूत होने का भी संकेत है।
- वैश्विक प्रभाव: अमेरिका और इजराइल के लिए यह चिंता का विषय है। यह दिखाता है कि उनके दबाव से क्षेत्रीय ताकतें एकजुट हो सकती हैं।
विशेषज्ञ विश्लेषण
अंतरराष्ट्रीय संबंध विशेषज्ञों का कहना है कि यह गठबंधन “व्यावहारिक” है, न कि विचारधारा पर आधारित। यह “शत्रु के शत्रु दोस्त” वाली रणनीति का उदाहरण है। CSIS, Brookings Institution जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट्स में ऐसे संभावित समीकरणों का पहले ही जिक्र किया गया था।
हालांकि, यह गठबंधन कितना टिकाऊ होगा, यह देखना बाकी है। पुराने मतभेद किसी भी समय सिर उठा सकते हैं। पानी के बंटवारे, सीमा सुरक्षा और अफगान शिया अधिकारों जैसे मुद्दे चुनौती बने रहेंगे।
भविष्य की संभावनाएं
जून 2025 का यह विकास बड़े पैमाने पर क्षेत्रीय गठबंधनों का हिस्सा लगता है। ईरान, रूस, चीन और अब तालिबान के बीच बढ़ते समन्वय से पश्चिमी देशों को नई चुनौतियां मिल सकती हैं।
तालिबान अगर ईरान के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करता है, तो अफगानिस्तान में स्थिरता और आर्थिक विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं। लेकिन मानवीय अधिकार, महिलाओं की शिक्षा और अल्पसंख्यक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी रहेगी।
निष्कर्ष: जून 2025 में तालिबान का ईरान समर्थन एक महत्वपूर्ण घटना है, जो दिखाता है कि भू-राजनीति में पुराने दुश्मन भी परिस्थितियों के दबाव में निकट आ सकते हैं। यह सीमित और सशर्त गठबंधन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को बदलने की क्षमता रखता है। भविष्य में यह कितना गहरा होता है, यह समय बताएगा। लेकिन एक बात साफ है – मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया की राजनीति अब पहले से कहीं अधिक जटिल और गतिशील हो गई है।