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Saturday, 2 May 2026

सीरिया में शहीद हुई आवाज़: सैयदा ज़ैनब में इमाम-ए-जुमा फ़रहान मंसूर की दिल दहला देने वाली शहादत

सीरिया में शहीद हुई आवाज़: सैयदा ज़ैनब में इमाम-ए-जुमा फ़रहान मंसूर की दिल दहला देने वाली शहादत
-Friday World-May 2,2026
दमिश्क की पवित्र धरती पर फिर बरपा हुआ आतंक का साया – बीबी ज़ैनब के रौज़े के खादिम को निशाना बनाया गया

दमिश्क के बाहरी इलाके में स्थित पवित्र सैयदा ज़ैनब क्षेत्र, जहां हज़रत ज़ैनब बिन्ते अली (स.अ.) का रौज़ा-ए-मुबारक है, आज गम और गुस्से की चादर ओढ़े हुए है। स्थानीय सूत्रों और शिया उलेमा अथॉरिटी सीरिया की पुष्टि के अनुसार, शुक्रवार की नमाज़ और खिदमत से जुड़े जाने-माने विद्वान इमाम-ए-जुमा फ़रहान मंसूर पर HTS के आतंकवादियों ने ग्रेनेड हमला कर दिया। इस हमले में वे शहीद हो गए।

यह हमला न सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या था, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक सहिष्णुता, इल्मी विरासत और सामाजिक सेवा की परंपरा पर सीधा हमला था। सैयदा ज़ैनब का इलाका, जो लाखों शिया और सुन्नी ज़ायरीनों का केंद्र है, अब डर और शोक की लहरों में डूबा हुआ है।

 हमले की पूरी कहानी

सैयदा ज़ैनब क्षेत्र की संकरी गलियों और रौज़ा-ए-मुबारक के आसपास की हलचल के बीच, इमाम फ़रहान मंसूर अपनी रोज़मर्रा की धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए अपनी गाड़ी में सवार थे। अचानक HTS के आतंकवादियों ने उनके काफिले पर ग्रेनेड से हमला बोल दिया। विस्फोट की गूंज पूरे इलाके में गूंजी और धुएं के गुबार के बीच खून से लथपथ मंजर ने सबको स्तब्ध कर दिया। तुरंत मौके पर पहुंची स्थानीय लोगों और सुरक्षा बलों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तब तक उनकी रूह अल्लाह को प्यारी हो चुकी थी।

शिया उलेमा अथॉरिटी सीरिया ने इस शहादत की आधिकारिक पुष्टि की और इसे “धर्म विरोधी ताकतों का कायरतापूर्ण कृत्य” बताया।

 फ़रहान मंसूर – एक विद्वान, एक खादिम, एक समाज सेवक

इमाम फ़रहान मंसूर सैयदा ज़ैनब के रौज़े से गहरा लगाव रखते थे। वे न सिर्फ जुमे की नमाज़ पढ़ाते और खिताब देते थे, बल्कि इलाके के युवाओं को इल्मी शिक्षा, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने में भी अग्रणी भूमिका निभाते थे। 

उनके व्याख्यान हमेशा इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत, हज़रत ज़ैनब (स.अ.) के सब्र और करबला की universal message से भरे होते थे। वे कहते थे – “ज़ैनब का रौज़ा सिर्फ एक मजार नहीं, बल्कि इंसानियत की रोशनी का मीनार है।” 

उनकी सामाजिक खिदमत भी कम उल्लेखनीय नहीं थी। गरीब परिवारों की मदद, विधवाओं और अनाथ बच्चों की देखभाल, युवाओं में नशे और अपराध से मुक्ति के कार्यक्रम – ये सब उनके दैनिक कार्य थे। इलाके के लोग उन्हें “अब्बा” कहकर पुकारते थे। उनकी शहादत की खबर फैलते ही सैयदा ज़ैनब के बाज़ार, मदरसे और रौज़ा परिसर में सन्नाटा छा गया। महिलाएं रो-रोकर मातम कर रही हैं, युवा गुस्से में नारे लगा रहे हैं और बुजुर्ग सिर पीट रहे हैं।

 सैयदा ज़ैनब – इतिहास, आस्था और चुनौतियां

सैयदा ज़ैनब का इलाका सीरिया की राजधानी दमिश्क से महज कुछ किलोमीटर दूर स्थित है। यहां हज़रत ज़ैनब (स.अ.) का रौज़ा मुबारक है, जिन्होंने करबला के बाद अपनी बहादुरी और सब्र से उमय्यद ख़िलाफ़त की जड़ें हिला दी थीं। 

यह जगह न सिर्फ शिया मुसलमानों के लिए, बल्कि पूरे मुस्लिम दुनिया के लिए पवित्र तीर्थ है। हर साल लाखों ज़ायरीन यहां आते हैं – ईरान, इराक, लेबनान, पाकिस्तान, भारत और अफगानिस्तान से। रौज़े के आसपास मदरसे, हुसैनिया, अस्पताल और सामुदायिक केंद्र बने हुए हैं जो युद्ध के बावजूद इलाके को स्थिरता प्रदान करते रहे।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में HTS और अन्य चरमपंथी समूहों की गतिविधियां बढ़ी हैं। वे धार्मिक अल्पसंख्यकों, खासकर शिया समुदाय को निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह हमला उसी सिलसिले की एक कड़ी माना जा रहा है।

 क्षेत्र में फैला ग़म और गुस्सा

हमले के बाद पूरे सैयदा ज़ैनब इलाके में भारी सुरक्षा व्यवस्था कर दी गई है। रौज़ा परिसर में मातमी जलसे शुरू हो गए हैं। लोग काले झंडे लहरा रहे हैं। स्थानीय उलेमा ने अपील की है कि शांति बनाए रखी जाए, लेकिन न्याय की मांग भी ज़ोर-शोर से की जा रही है।

एक स्थानीय निवासी ने बताया, “फ़रहान मंसूर साहब सिर्फ इमाम नहीं थे, वे इस इलाके की रूह थे। उनका जाना जैसे पूरे समुदाय का हिस्सा चला गया।” 

दूसरी ओर, शिया उलेमा अथॉरिटी सीरिया ने सभी मुस्लिम देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि ऐसे आतंकवादी हमलों की निंदा करें और सीरिया में स्थायी शांति के लिए ठोस कदम उठाएं।

 यह हमला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह घटना सिर्फ एक स्थानीय हमला नहीं है। यह बड़े भू-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाती है। सीरिया में पिछले वर्षों के संघर्ष के बाद नई सरकार और सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद चरमपंथी ताकतें अभी भी सक्रिय हैं। सैयदा ज़ैनब जैसे संवेदनशील धार्मिक केंद्रों को निशाना बनाकर वे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैलाना चाहते हैं।

फ़रहान मंसूर जैसी हस्तियां, जो संप्रदायिक सद्भाव और इल्मी काम के प्रतीक थीं, उनकी शहादत युवा पीढ़ी को सोचने पर मजबूर कर रही है – क्या धर्म के नाम पर हिंसा कभी जायज़ हो सकती है?

शहादत की विरासत

इमाम फ़रहान मंसूर की शहादत उनके जीवन से भी बड़ी है। शहीदों की रूह अल्लाह के करीब होती है। उनका खून न सिर्फ सैयदा ज़ैनब की मिट्टी को सींचेगा, बल्कि नई पीढ़ी में सब्र, हिम्मत और सच्चाई की मिसाल बनकर रहेगा।

उनके परिवार, शागिर्दों और पूरे समुदाय को यह दुख सहन करने की ताकत मिले। सैयदा ज़ैनब का रौज़ा हमेशा की तरह चमकता रहे और वहां की आवाज़ें शांति, न्याय और इंसानियत की पैरोकार बनी रहें।

अल्लाह इमाम फ़रहान मंसूर की शहादत को क़बूल फरमाए और उनके परिवार को सब्र-ए-जमील अता फरमाए।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-May 2,2026