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Friday, 1 May 2026

अमेरिकी डॉलर का दबदबा खत्म हो रहा है? BRICS की 'डी-डॉलराइजेशन' लहर: रूस-चीन से भारत तक, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बदल रही है

अमेरिकी डॉलर का दबदबा खत्म हो रहा है? BRICS की 'डी-डॉलराइजेशन' लहर: रूस-चीन से भारत तक, वैश्विक वित्तीय व्यवस्था बदल रही है
-Friday World- May 1,2026 
एक समय विश्व अर्थव्यवस्था का अन undisputed राजा माना जाने वाला अमेरिकी डॉलर अब अपने शताब्दी पुराने एकाधिकार को चुनौती का सामना कर रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजरायल तनाव और पश्चिमी प्रतिबंधों ने डी-डॉलराइजेशन (डॉलर से दूर होने) की प्रक्रिया को नई रफ्तार दी है। BRICS देश (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और नए सदस्य UAE, ईरान, मिस्र, इथियोपिया) अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार में स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा दे रहे हैं और SWIFT जैसी पश्चिमी प्रणालियों के विकल्प विकसित कर रहे हैं।

यह कोई अचानक क्रांति नहीं है, बल्कि पिछले 15-20 वर्षों की धीमी लेकिन निरंतर प्रक्रिया है, जिसे हाल की भू-राजनीतिक घटनाओं ने तेज कर दिया है। 2026 में BRICS की भारत अध्यक्षता के दौरान यह मुद्दा और चर्चा में आने वाला है।

 डी-डॉलराइजेशन क्या है और क्यों हो रहा है?

डी-डॉलराइजेशन का मतलब है अंतरराष्ट्रीय व्यापार, कमोडिटी (तेल, गैस आदि) के लेन-देन और विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता को कम करना। इसका उद्देश्य पश्चिमी नियंत्रित वित्तीय व्यवस्था (SWIFT) से मुक्ति पाना और स्थानीय मुद्राओं को मजबूत करना है।
                  इसकी मुख्य वजहें:
- प्रतिबंधों का हथियार: रूस पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों ने दिखाया कि डॉलर और SWIFT को हथियार बनाया जा सकता है। इससे कई देशों को लगा कि अत्यधिक निर्भरता खतरनाक है।
- भू-राजनीतिक तनाव: ईरान-इजरायल संघर्ष ने पेट्रो-डॉलर सिस्टम की कमजोरी उजागर की।
- BRICS का उदय: BRICS देश अब विश्व GDP (PPP आधार पर) का लगभग 40% हिस्सा रखते हैं और वे आपसी व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

BRICS में स्थानीय मुद्रा व्यापार की प्रगति

BRICS देशों ने महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है कि उनके आपसी व्यापार का बड़ा हिस्सा स्थानीय मुद्राओं में हो। वास्तविकता में प्रगति काफी प्रभावशाली है:

- रूस-चीन व्यापार दोनों देशों के बीच 90-99% व्यापार अब युआन और रूबल में हो रहा है। डॉलर की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है।
- भारत-रूस व्यापार: 2026 की शुरुआत तक लगभग 96% व्यापार रुपये और रूबल में हो रहा है। दोनों देश $100 बिलियन व्यापार लक्ष्य की ओर बढ़ रहे हैं, मुख्य रूप से ऊर्जा आयात के जरिए। FY 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार $68.7 बिलियन तक पहुंच चुका है।
- अन्य BRICS जोड़े: चीन-ब्राजील के बीच युआन-रियल में समझौता हो चुका है। UAE और भारत के बीच रुपये में व्यापार बढ़ रहा है।

BRICS के न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) ने 2026 तक अपनी उधार राशि का 30% स्थानीय मुद्राओं में देने का लक्ष्य रखा है।

 BRICS Pay: SWIFT का मजबूत विकल्प

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया BRICS देशों के साथ मिलकर BRICS Pay (या BRICS Cross-Border Payments Initiative) विकसित कर रहा है, जिसका लॉन्च 2026 में भारत की अध्यक्षता के दौरान संभावित है। यह पश्चिमी SWIFT सिस्टम का सीधा विकल्प बनेगा।

मुख्य फायदे:
- स्थानीय मुद्राओं में सीधा लेन-देन
 → डॉलर में कन्वर्ट करने की फीस, विलंब और जोखिम बचेंगे।
- पश्चिमी बैंकों और संस्थाओं पर निर्भरता घटेगी।
- भारत के लिए यह 'बीमा पॉलिसी' की तरह काम करेगा, क्योंकि हम तेल और अन्य जरूरी आयात के लिए अभी भी डॉलर पर काफी निर्भर हैं।

BRICS देशों के पास विश्व का लगभग 42% तेल उत्पादन क्षमता और 40% अनाज उत्पादन है, जो उन्हें आर्थिक रूप से बहुत मजबूत बनाता है। RBI ने BRICS देशों की डिजिटल मुद्राओं (CBDC) को जोड़ने का भी प्रस्ताव दिया है, ताकि सीमा-पार व्यापार और पर्यटन आसान हो।

 रूस पर प्रतिबंधों ने 'पेट्रो-डॉलर' को हिला दिया

दशकों तक तेल, गैस, कोयला और अन्य कमोडिटी का व्यापार डॉलर में होता था — इसे पेट्रो-डॉलर सिस्टम कहा जाता है। रूस पर पश्चिमी प्रतिबंधों ने इसे बड़ी चुनौती दी।

यूरोप ने रूसी ऊर्जा खरीदना कम कर दिया, लेकिन रूस ने चीन, भारत और अन्य BRICS देशों को ऊर्जा बेचना जारी रखा — अब युआन, रूबल, रुपये या सोने में। परिणामस्वरूप, विश्व के सबसे बड़े और सबसे तरल बाजार (तेल-गैस) में डॉलर की मांग घटी। रूस ने अपनी वैकल्पिक व्यवस्थाएं मजबूत कीं, जिससे पेट्रो-डॉलर का एकाधिकार कमजोर पड़ा।

 चीन का आक्रामक कदम: युआन और CIPS

चीन डी-डॉलराइजेशन का सबसे सक्रिय खिलाड़ी है। वह अधिक से अधिक देशों के साथ व्यापार युआन में कर रहा है। उसकी CIPS (Cross-Border Interbank Payment System) अब 190 से ज्यादा देशों और क्षेत्रों की 5,000+ बैंकिंग संस्थाओं से जुड़ी हुई है।

2024 में CIPS ने 175 ट्रिलियन युआन (लगभग $25 ट्रिलियन) के लेन-देन संसाधित किए, जो पिछले वर्ष से 40%+ अधिक था। 2026 में मार्च में ही औसत दैनिक लेन-देन 920 बिलियन युआन तक पहुंच गया — एक नया रिकॉर्ड। CIPS डॉलर या SWIFT के बिना युआन आधारित व्यापार को आसान बनाता है।

चीन ने रूस के साथ 90-99% व्यापार युआन-रूबल में शिफ्ट कर दिखाया कि समानांतर प्रणाली कितनी प्रभावी हो सकती है।

 युद्ध और तनावों का प्रभाव

ईरान-इजरायल संघर्ष ने पेट्रो-डॉलर की कमजोरी को और स्पष्ट किया। कुछ विश्लेषक मानते हैं कि यह संघर्ष पेट्रो-युआन की शुरुआत का उत्प्रेरक बन सकता है। ईरान ने युआन में तेल व्यापार को बढ़ावा दिया।

पश्चिमी मीडिया ने भी स्वीकार किया कि ये घटनाएं डी-डॉलराइजेशन को नई गति दे रही हैं। बिडेन काल की "रूबल को कचरे में बदलने" वाली धमकी उल्टी पड़ गई — रूस ने अपनी वैकल्पिक व्यवस्थाएं और मजबूत कर लीं।

 वास्तविकता का आकलन: डॉलर अभी भी मजबूत है, लेकिन चुनौती बढ़ रही है

हालांकि उत्साह के साथ सच्चाई भी समझनी चाहिए। 2025 के अंत तक IMF डेटा के अनुसार, अमेरिकी डॉलर वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार का अभी भी लगभग 56-58% हिस्सा रखता है (यूरो लगभग 20%, युआन मात्र 2% के आसपास)। SWIFT में डॉलर की हिस्सेदारी 2026 में 50% से ऊपर पहुंच गई है — कुछ महीनों में तो 51% तक।

विदेशी मुद्रा लेन-देन में डॉलर की भूमिका 88-89% के आसपास बनी हुई है। यानी वैश्विक स्तर पर डॉलर अभी भी प्रभुत्व बनाए हुए है, लेकिन BRICS के अंदरूनी व्यापार और कुछ क्षेत्रीय गलियारों में उसकी हिस्सेदारी निश्चित रूप से घट रही है।

भारत की स्थिति संतुलित है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट कहा है कि भारत डॉलर को बदलने की नीति नहीं अपना रहा। डॉलर वैश्विक स्थिरता का स्रोत है। भारत रुपये को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन BRICS मुद्रा या पूर्ण डी-डॉलराइजेशन से दूरी बनाए हुए है।

 भविष्य की दिशा: क्या होगा आगे?

2026 में भारत BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। यहां BRICS Pay को मजबूत करने, डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने और स्थानीय मुद्रा व्यापार को बढ़ाने पर फोकस रहने की संभावना है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि धीरे-धीरे एक "बास्केट" आधारित सेटलमेंट यूनिट या न्यूट्रल क्लियरिंग मैकेनिज्म विकसित हो सकता है।

सोने की मांग भी बढ़ रही है क्योंकि कई उभरते बाजार केंद्रीय बैंक डॉलर से विविधीकरण कर रहे हैं।

अमेरिकी डॉलर का दबदबा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, लेकिन उसका पूर्ण एकाधिकार जरूर कमजोर पड़ रहा है। BRICS देशों की कोशिशें — विशेष रूप से रूस-चीन की जोड़ी और भारत की संतुलित भूमिका — वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को अधिक बहुध्रुवीय बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। 

यह प्रक्रिया धीमी लेकिन निरंतर है। भारत जैसे देशों के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी — अवसर क्योंकि हम अपनी मुद्रा को मजबूत कर सकते हैं, चुनौती क्योंकि वैश्विक स्थिरता बनी रहनी चाहिए।

भविष्य में अगर BRICS Pay सफल रहा और स्थानीय मुद्रा व्यापार 50-60% तक पहुंच गया, तो डॉलर का प्रभाव क्षेत्रीय स्तर पर काफी कम हो जाएगा। लेकिन पूरी दुनिया से डॉलर का अंत अभी दूर है। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World- May 1,2026