- Friday World 22 Jun 2026
1. क्या क़ुरान पैग़म्बरों के रोने को बयान करता है?
जो लोग कहते हैं “किताब काफी है” उन्होंने शायद क़ुरान को ग़ौर से नहीं पढ़ा। क़ुरान खुद कई नबियों के ग़म और आँसुओं का ज़िक्र करता है:
- हज़रत याक़ूब (अ.स.): बेटे यूसुफ़ (अ.स.) के फ़िराक़ में इतना रोए कि “उनकी आँखें सफ़ेद हो गईं” और ग़म से नाबीना होने लगे। क़ुरान कहता है: “और उनकी आँखें ग़म से सफ़ेद हो गईं और वह ग़म को दबाए हुए थे” (सूरह यूसुफ़ 12:84)। 10 बेटों के होते हुए एक बेटे के लिए यह हाल था।
- हज़रत नूह (अ.स.): आप का लक़ब “नूह” ही इसलिए पड़ा कि आप अपनी क़ौम के गुमराह होने पर बहुत “नौहा” यानी रोया करते थे। “नूह” नाम का मतलब ही गिरया-ओ-ज़ारी करने वाला है।
- रसूलुल्लाह (स.अ.व.): अहले-सुन्नत की रिवायतों में है कि जब इमाम हुसैन (अ.स.) बचपन में रोए तो आप (स.अ.व.) घर में दाख़िल हुए और फ़रमाया: “ऐ फ़ातिमा, क्या तुम्हें मालूम नहीं कि हुसैन के रोने से मुझे तकलीफ़ पहुँचती है”। आप (स.अ.व.) ने खुद भी इमाम हुसैन की शहादत की ख़बर सुनकर आँसू बहाए।
जब अल्लाह के नबी ग़म में रो सकते हैं, तो नवासा-ए-रसूल (स.अ.व.) की मज़लूमाना शहादत पर रोना “बिदअत” कैसे हो गया?
2. इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत की पेशीनगोई सुन्नी किताबों में
सुन्नी अहादीस की मोतबर किताबें गवाह हैं कि रसूल (स.अ.व.) ने कर्बला की ख़बर पहले ही दे दी थी:
1. जिब्रईल का पैग़ाम: उम्मुल फ़ज़्ल से रिवायत है कि रसूल (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “जिब्रईल आए थे और मुझे ख़बर दे गए कि मेरी ही उम्मत के कुछ लोग मेरे बेटे को शहीद कर देंगे” और वह कर्बला की लाल मिट्टी भी दे गए। हाकिम नेशापूरी ने इसे “सही” कहा है।
2. कर्बला का नाम: जिब्रईल ने कहा: “इस जगह का नाम ‘तफ़’ यानी कर्बला है जहाँ हुसैन को शहीद किया जाएगा”।
3. रसूल का ग़म: जब जिब्रईल ने यह ख़बर दी तो रसूल (स.अ.व.) रो पड़े और सहाबा को बुलाकर बताया कि “मेरी उम्मत मेरे बाद हुसैन को कर्बला में शहीद कर देगी”।
सवाल यह है: अगर रसूल (स.अ.व.) हुसैन (अ.स.) के लिए पहले से रोए, तो उम्मती का रोना गुनाह कैसे?
3. “हुसैन मुझसे है, मैं हुसैन से हूँ”
तिर्मिज़ी शरीफ़ की हदीस है: रसूल (स.अ.व.) ने फ़रमाया: “हुसैन मुझसे है और मैं हुसैन से हूँ। जो हुसैन से मोहब्बत करेगा, अल्लाह उससे मोहब्बत करेगा”। यानी हुसैन पर ज़ुल्म रसूल पर ज़ुल्म है। 10 मुहर्रम को हुसैन (अ.स.) और उनके 72 साथियों को भूखा-प्यासा शहीद किया गया।
4. तो मातम से तकलीफ़ किसे और क्यों?
1. क़ुरान का उसूल: क़ुरान कहता है ज़ालिमों से बेज़ारी ज़रूरी है। सूरह शूरा 42:23 में “क़ुर्बा की मोहब्बत” को अज्र-ए-रिसालत कहा गया। हुसैन (अ.स.) अहलेबैत में सबसे अफ़ज़ल “क़ुर्बा” हैं।
2. तारीख़ी हक़ीक़त: यज़ीद ने ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा किया और इमाम हुसैन ने बैअत से इनकार किया क्योंकि यज़ीद शराब-जुए का आदी ज़ालिम हुक्मरान था। कर्बला की जंग हक़ और बातिल के दरमियान थी।
3. मातम छुपाने की कोशिश?: इमाम रज़ा (अ.स.) फ़रमाते हैं: “मोहर्रम वह महीना है जिसमें जाहिलियत में जंग हराम थी, लेकिन दुश्मनों ने इसी महीने में हमारा ख़ून बहाया… और हमारे हक़ में पैग़म्बर के एहतराम का ख़याल नहीं किया”। जो लोग मातम को रोकते हैं, कहीं वह क़ातिलों की पहचान तो नहीं छुपाना चाहते?
5. अहले-सुन्नत में भी अज़ादारी की रिवायत
1. ख़ुलफ़ा का गिरया: हज़रत उस्मान एक क़ब्र पर बैठकर इतना रोए कि दाढ़ी भीग गई।
2. सहाबा का मामूल: रसूल (स.अ.व.) की वफ़ात पर हज़रत अबू-बक्र और सहाबा भी रोए। मदीने की औरतें शहीदों पर नौहा करती थीं।
3. सुन्नी उलमा की किताबें: महाराजा सर किशन परसाद ‘शाद’ ने “मातम-ए-हुसैन” किताब लिखी। यानी मातम का तसव्वुर सुन्नी अदब में भी मौजूद है।
नतीजा: रोना इंसानियत है, चुप रहना ज़ुल्म की हिमायत
क़ुरान नूह पैगंबर साहब, और याक़ूब पैगम्बर स, आँसुओं को बयान करके बताता है कि मज़लूम पर रोना फ़ितरत और दीन दोनों है। रसूल (स.अ.व.) ने हुसैन (अ.स.) की शहादत पर पहले से आँसू बहाए और उम्मत को आगाह किया।
आज अगर कोई हुसैन (अ.स.) के ग़म पर रोने वालों से तकलीफ़ महसूस करता है तो उसे अपने दिल से सवाल करना चाहिए: क्या मैं उस रसूल के नवासे के क़त्ल पर राज़ी हूँ जिसके लिए रसूल ख़ुद रोए? क्या मैं यज़ीद के ज़ुल्म को जस्टिफ़ाई करना चाहता हूँ?
इमाम हुसैन (अ.स.) ने फ़रमाया: “मिस्ले-मन मिस्ले-यज़ीद की बैअत नहीं कर सकता”। हुसैनी बनो, हक़ के लिए खड़ा होना ही असल अज़ादारी है। और आँसू वह एलान हैं कि हम ज़ालिम के साथ नहीं, मज़लूम के साथ हैं।
लब्बैक या हुसैन (अ.स.)
Sajjadali Nayani ✍
Friday World 22 Jun 2026