-Friday World Jul 21 2026
यूक्रेन युद्ध और प्रतिबंधों के बीच रूसी राष्ट्रपति का तीखा बयान, कहा पश्चिम हुकुम चलाने की कोशिश कर रहा है, रूस अपनी शर्तों पर चलेगा
रूस और पश्चिम के बीच तकरार कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने जिस अंदाज में पश्चिम को जवाब दिया है, उसने दुनिया भर में हलचल मचा दी है।
एक सार्वजनिक मंच पर बोलते हुए पुतिन ने कहा:
“तुम अपने आपको क्या समझते हो? हम हमेशा यही सुनते हैं: तुम्हें यह करना ही होगा… तुम्हें वह करना पड़ेगा… हम तुम्हें चेतावनी दे रहे हैं… आख़िर तुम होते कौन हो?”
यह सिर्फ एक बयान नहीं था। यह पिछले 30 साल से चली आ रही रूस-पश्चिम की कड़वाहट का सार था।
पुतिन ने ऐसा क्यों कहा?
पुतिन का यह बयान ऐसे समय आया है जब यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस पर अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। हर हफ्ते नए प्रतिबंध, नई चेतावनी और नई "लाल लकीरें" खींची जा रही हैं।
पुतिन के अनुसार, पश्चिम की आदत बन गई है कि वह दुनिया को आदेश देता है।
"पहले इराक, फिर लीबिया, फिर सीरिया और अब रूस। हर बार यही स्क्रिप्ट है। हम तुम्हें बताएंगे कि क्या करना है, कैसे जीना है, किससे व्यापार करना है।"
रूसी राष्ट्रपति का गुस्सा इस बात पर था कि पश्चिम खुद को "नियम बनाने वाला" मानता है, लेकिन जब बात खुद पर आती है तो उन्हीं नियमों को तोड़ देता है।
"हम आदेश नहीं मानेंगे" - रूस का नया रुख
पुतिन ने साफ कहा कि सोवियत संघ के टूटने के बाद रूस ने पश्चिम से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। लेकिन बदले में उसे सिर्फ विस्तार मिला - NATO का विस्तार, यूरोप में मिसाइल डिफेंस और रूस की सीमाओं के पास सैन्य अभ्यास।
"हमें बताया गया कि शीत युद्ध खत्म हो गया। लेकिन क्या वाकई खत्म हुआ? दीवार गिरी, लेकिन मानसिकता नहीं गिरी।"
पुतिन का कहना है कि रूस अब 1990 वाला रूस नहीं है। यह एक संप्रभु देश है जो अपनी विदेश नीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा खुद तय करेगा।
"तुम चेतावनी दे रहे हो? किस बात की चेतावनी? हमने चेतावनियां बहुत देखी हैं। रूस किसी के दबाव में नहीं आएगा।"
पश्चिम क्या कर रहा है?
पिछले 2 सालों में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर 16,000 से ज्यादा प्रतिबंध लगाए हैं। मकसद एक ही था - रूस की अर्थव्यवस्था तोड़ दो, ताकि वह यूक्रेन से पीछे हट जाए।
लेकिन हुआ उल्टा।
1. तेल और गैस: रूस ने अपना तेल भारत, चीन और अन्य देशों को सस्ते में बेचना शुरू किया। यूरोप को झटका लगा।
2. रूबल: प्रतिबंधों के बाद रूबल पहले गिरा, फिर संभला और अब स्थिर है।
3. विकल्प: SWIFT से हटाए जाने के बाद रूस ने अपना पेमेंट सिस्टम और चीन के साथ व्यापार बढ़ाया।
पश्चिम लगातार कह रहा है "तुम्हें यूक्रेन से निकलना होगा", "तुम्हें हथियार नहीं बनाने चाहिए", "तुम्हें चुनाव इस तरह कराने होंगे"। पुतिन का सवाल यही है - तुम कौन होते हो ये तय करने वाले?
भारत और ग्लोबल साउथ के लिए क्या मायने?
पुतिन का यह बयान सिर्फ रूस-पश्चिम तक सीमित नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है, खासकर भारत जैसे देशों के लिए।
भारत ने यूक्रेन युद्ध में न रूस का साथ दिया, न पश्चिम का। भारत ने कहा "यह हमारा युद्ध नहीं है" और सस्ता तेल खरीदा। अमेरिका ने चेतावनी दी, यूरोप ने नसीहत दी। लेकिन भारत नहीं माना।
ठीक यही बात पुतिन भी कह रहे हैं। "बहुध्रुवीय दुनिया" का मतलब यही है कि अब कोई एक देश दुनिया को हुकुम नहीं दे सकता।
ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, सऊदी अरब, तुर्की - सभी देश अब अपनी शर्तों पर फैसला ले रहे हैं। पश्चिम को यह पसंद नहीं आ रहा।
इतिहास के आईने में
रूसी नेता हमेशा से पश्चिम की "दोहरी नीति" की शिकायत करते आए हैं।
- 1999 में NATO ने बिना UN की इजाजत के यूगोस्लाविया पर बमबारी की।
- 2003 में अमेरिका ने इराक पर "WMD" के नाम पर हमला किया, जो बाद में झूठ निकला।
- 2011 में लीबिया में "लोकतंत्र" के नाम पर शासन पलट दिया गया।
रूस का तर्क है कि जब पश्चिम ये सब करता है तो "अंतरराष्ट्रीय कानून" याद नहीं आता। लेकिन जब रूस अपनी सुरक्षा की बात करता है तो तुरंत प्रतिबंध और चेतावनी शुरू हो जाती है।
इसी दर्द को पुतिन ने "तुम होते कौन हो?" वाले सवाल में उतार दिया।
विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रो. स्वर्ण सिंह कहते हैं, "पुतिन का बयान भावनात्मक भी है और रणनीतिक भी। वह घरेलू जनता को दिखाना चाहते हैं कि रूस झुका नहीं है। और दुनिया को दिखाना चाहते हैं कि एक नया पावर सेंटर बन रहा है।"
पूर्व राजदूत कंवल सिब्बल का कहना है, "पश्चिम ने रूस को 30 साल तक नीचा दिखाया। अब रूस पलटवार कर रहा है। भाषा कठोर है, लेकिन संदेश साफ है - हम बराबरी पर बात करेंगे, आदेश पर नहीं।"
आगे क्या होगा?
1. और तनाव: पुतिन के इस बयान के बाद पश्चिम और सख्त हो सकता है। नए प्रतिबंध, नई सैन्य मदद यूक्रेन को।
2. नया गठबंधन: रूस, चीन, ईरान और उत्तर कोरिया की नजदीकी बढ़ सकती है। इसे पश्चिम "एक्सिस ऑफ ऑटोक्रेसी" कहता है।
3. बातचीत की संभावना कम: जब नेता इस तरह की भाषा बोलें तो डिप्लोमेसी की जगह कम बचती है।
लेकिन एक बात तय है - दुनिया अब 1991 वाली नहीं रही।
आदेश देने का जमाना गया
"तुम होते कौन हो?" - यह सवाल पुतिन ने पश्चिम से पूछा, लेकिन यह सवाल हर उस देश से है जो समझता है कि वही दुनिया का ठेकेदार है।
पुतिन ने यह भी कहा कि रूस युद्ध नहीं चाहता, लेकिन वह अपनी सुरक्षा से समझौता भी नहीं करेगा। रूस बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन "बराबरी और सम्मान" की शर्त पर।
भारत जैसे देशों के लिए यह सबक है। 21वीं सदी में कोई महाशक्ति किसी को डिक्टेट नहीं कर सकती। हर देश अपने हित देखेगा।
पश्चिम को अगर दुनिया का नेतृत्व करना है तो उसे "तुम्हें यह करना होगा" वाली भाषा छोड़नी होगी। वरना पुतिन जैसे और नेता खड़े होकर यही सवाल पूछते रहेंगे।
और जवाब में दुनिया शायद कहे - अब पुराना ऑर्डर बदल चुका है।
Sajjadali Nayani ✍
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