-Friday World Jul 12 2026
वैश्विक भू-राजनीति एक बार फिर से उबाल पर है। अमेरिका और ईरान के बीच पुराना विवाद नया रूप ले चुका है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने हाल ही में सख्त बयान देते हुए अमेरिका पर भरोसा न करने की बात कही है। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि अगर अमेरिका किसी समझौते से पीछे हटा या धोखा दिया, तो ईरान पूर्ण पैमाने पर रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है। गालिबाफ ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस से सीधे कहा कि अमेरिका से बातचीत केवल वे देश कर सकते हैं, जो युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार हों। यह बयान न केवल दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है, बल्कि मध्य पूर्व की अस्थिरता को और गहरा करने वाला है।
पुराना दुश्मन, नया दौर
अमेरिका और ईरान के संबंध 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ही तनावपूर्ण रहे हैं। ईरान को "बुराई की धुरी" (Axis of Evil) करार देने से लेकर परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाने तक, अमेरिका ने ईरान को अलग-थलग करने की कोशिश की। 2015 का JCPOA (Joint Comprehensive Plan of Action) परमाणु समझौता एक उम्मीद की किरण था, लेकिन 2018 में ट्रंप प्रशासन द्वारा एकतरफा तरीके से इससे बाहर निकलने के बाद संबंध और बिगड़ गए।
अब 2026 में, नए सिरे से बातचीत की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन ईरानी नेतृत्व में गहरी अविश्वास की भावना है। गालिबाफ का बयान इसी अविश्वास का परिणाम है। उन्होंने कहा, "अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं किया जा सकता। अगर वे समझौते से मुकर गए या धोखा दिया, तो हम फुल स्केल डिफेंस के लिए तैयार हैं।"
गालिबाफ का बयान: क्या कहा और क्यों?
मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ईरान की राजनीति के प्रमुख चेहरे हैं। संसद स्पीकर के रूप में उन्होंने ईरानी विदेश नीति में सख्त रुख अपनाया है। जेडी वेंस से बातचीत का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अमेरिका को समझना चाहिए कि ईरान अब कमजोर नहीं है। ईरान की मिसाइल क्षमता, क्षेत्रीय सहयोगी (हिजबुल्लाह, हमास, हूती) और परमाणु कार्यक्रम की प्रगति उसे मजबूत बनाती है।
यह बयान ऐसे समय आया है जब मध्य पूर्व में इजरायल-ईरान छाया युद्ध, गाजा संकट और लेबनान में तनाव चरम पर हैं। ईरान का मानना है कि अमेरिका इजरायल का समर्थन कर क्षेत्रीय संतुलन बिगाड़ रहा है। गालिबाफ का संदेश साफ है — ईरान युद्ध से नहीं डरता, बल्कि तैयार है।
ईरान की सैन्य तैयारी: फुल स्केल डिफेंस
ईरान ने पिछले दो दशकों में अपनी सैन्य क्षमता को काफी मजबूत किया है।
- बैलिस्टिक मिसाइलें: शाहाब-3, फतेह, सज्जील जैसी मिसाइलें 2000+ किलोमीटर तक मारक क्षमता रखती हैं। ये इजरायल, अमेरिकी ठिकानों और सऊदी अरब को निशाना बना सकती हैं।
- ड्रोन और हाइपरसोनिक हथियार: शाहिद ड्रोन और हालिया हाइपरसोनिक मिसाइलें ईरान को असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) में लाभ देती हैं।
- नौसेना: होर्मुज की खाड़ी में नियंत्रण और माइन्स, स्पीडबोट्स तथा एंटी-शिप मिसाइलों से अमेरिकी नौसेना को चुनौती।
- परमाणु कार्यक्रम: IAEA रिपोर्टों के अनुसार ईरान यूरेनियम संवर्धन को 60% के करीब ले गया है। ब्रेकआउट टाइम बहुत कम हो चुका है।
ईरान की "अक्ष ऑफ रेसिस्टेंस" (Axis of Resistance) रणनीति के तहत हिजबुल्लाह, हमास, हूती और सीरियाई मिलिशिया उसके विस्तारित हाथ हैं। अगर पूर्ण युद्ध हुआ तो यह क्षेत्रीय स्तर पर फैल सकता है।
अमेरिका का रुख: जेडी वेंस और ट्रंप 2.0?
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ट्रंप प्रशासन की कठोर विदेश नीति के प्रतीक हैं। ईरान पर अधिकतम दबाव (Maximum Pressure) की नीति फिर से सक्रिय हो सकती है। अमेरिका ईरान के तेल निर्यात, बैंकिंग और परमाणु कार्यक्रम पर नए प्रतिबंध लगाने की तैयारी में है।
लेकिन अमेरिका के पास भी चुनौतियां हैं। यूक्रेन-रूस युद्ध, चीन के साथ तनाव और घरेलू अर्थव्यवस्था के बीच मध्य पूर्व में नया युद्ध महंगा पड़ सकता है। गालिबाफ का बयान अमेरिका को याद दिलाता है कि ईरान 2003 की तरह आसान लक्ष्य नहीं है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
- इजरायल: ईरान-इजरायल दुश्मनी चरम पर। हाल के हमलों के बाद दोनों पक्ष तैयार हैं।
- सऊदी अरब और GCC: वे ईरान को खतरा मानते हैं, लेकिन चीन के साथ संबंध बढ़ा रहे हैं।
- भारत: भारत ईरान से चाबहार पोर्ट और तेल आयात करता है। तनाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हितों को प्रभावित करेगा। भारत दोनों पक्षों के साथ संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
- चीन और रूस: वे ईरान के साथ आर्थिक और सैन्य सहयोग बढ़ा रहे हैं। BRICS और SCO में ईरान की भूमिका मजबूत हो रही है।
ऐतिहासिक सबक और भविष्य
1979 की क्रांति के बाद ईरान-अमेरिका संबंध कभी सामान्य नहीं हुए। 1980 का ईरान-इराक युद्ध, 2003 का इराक आक्रमण, 2015 का JCPOA और 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या — ये घटनाएं ईरानी अविश्वास को गहरा करती हैं।
आज ईरान की अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से प्रभावित है, लेकिन वह ड्रोन और मिसाइल निर्यात से कमाई कर रहा है। युवा आबादी और आंतरिक विरोध के बावजूद, शासन मजबूत दिखता है।
क्या होगा आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्ण युद्ध की संभावना कम है, लेकिन छाया संघर्ष (Shadow War) जारी रहेगा। साइबर हमले, प्रॉक्सी युद्ध और आर्थिक दबाव मुख्य हथियार होंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को कूटनीति से समाधान निकालना चाहिए।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति चुनौती है। ऊर्जा आयात, समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ेगा। भारत को विविध स्रोतों से तेल आयात और मजबूत विदेश नीति की जरूरत है।
शांति या विनाश का रास्ता?
गालिबाफ का बयान एक चेतावनी है — ईरान अब पीछे हटने वाला नहीं। अमेरिका को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। मध्य पूर्व में नया युद्ध न केवल क्षेत्रीय, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकता है — तेल कीमतें बढ़ेंगी, आपूर्ति प्रभावित होगी और लाखों जिंदगियां खतरे में पड़ेंगी।
दुनिया को संवाद और समझौते की राह चुननी होगी। विश्व शांति के हित में सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए। लेकिन इतिहास गवाह है — जब विश्वास टूटता है, तो तनाव आसानी से युद्ध में बदल सकता है।
ईरान-अमेरिका टकराव की यह नई कड़ी भविष्य के लिए सबक है। शक्ति संतुलन, कूटनीति और आर्थिक हित — सबको ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना होगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World Jul 12 2026