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Thursday, 13 August 2026

खड़गे का दर्द: हल्द्वानी में मंच का ‘शुद्धिकरण’ और छुआछूत का पुराना जख्म

खड़गे का दर्द: हल्द्वानी में मंच का ‘शुद्धिकरण’ और छुआछूत का पुराना जख्म
-Friday World 13 Aug 2026
भारत की संसद में एक बार फिर जाति और सम्मान का मुद्दा गरमा गया है। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बड़े दुख के साथ एक घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि हल्द्वानी के रामलीला मैदान में उन्होंने जनसभा को संबोधित किया। उस सभा में उन्होंने किसी जाति या धर्म का नाम नहीं लिया, सिर्फ जनता की समस्याओं पर बात की। लेकिन उनके भाषण के बाद कुछ लोगों ने वहां हवन किया और मंच का ‘शुद्धिकरण’ करने का काम किया।

खड़गे ने साफ कहा कि इस घटना ने उन्हें छुआछूत का दर्द महसूस कराया। वे दलित समुदाय से आते हैं और उच्च संवैधानिक पद पर हैं। फिर भी उनके बोलने के स्थान को ‘अशुद्ध’ मानकर शुद्ध करने की कोशिश की गई। उनका सवाल सीधा है—अगर इतने ऊंचे पद वाले व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम आदमी, खासकर दलित समुदाय के लोग रोजाना कितना अपमान झेलते होंगे?

यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक रैली के बाद की कार्रवाई नहीं है। यह भारत के सामाजिक ताने-बाने पर सवाल उठाती है। संविधान ने छुआछूत को खत्म कर दिया, समानता का अधिकार दिया और जाति के आधार पर भेदभाव को अपराध बनाया। लेकिन जमीनी हकीकत कभी-कभी अलग दिखती है। रामलीला मैदान जैसे सार्वजनिक स्थान पर राजनीतिक सभा होना आम बात है। कई दल वहां सभाएं करते हैं। फिर किसी एक नेता के आने के बाद ‘शुद्धिकरण’ की जरूरत क्यों पड़ी?

घटना के विवरण के अनुसार, 8 अगस्त को खड़गे ने हल्द्वानी में विजय शंखनाद रैली को संबोधित किया। कुछ दिन बाद श्री राम सेना धर्मार्थ सेवा न्यास नाम के एक संगठन ने वहां हवन और शुद्धिकरण का कार्यक्रम किया। संगठन का कहना है कि रामलीला मैदान धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थान है। उन्होंने आरोप लगाया कि रैली के दौरान कुछ नारे लगाए गए जो उनके अनुसार सनातन भावनाओं को ठेस पहुंचाते थे। कांग्रेस पक्ष का आरोप है कि यह काम भाजपा से जुड़े लोगों ने करवाया और इसमें जातिवादी मानसिकता झलकती है। भाजपा ने संगठन से किसी भी संबंध से इनकार किया है और कहा है कि वह ऐसी गतिविधियों का समर्थन नहीं करती।

दोनों पक्षों के बयान अलग-अलग हैं। एक तरफ अपमान और छुआछूत का आरोप है, दूसरी तरफ धार्मिक स्थल की गरिमा बनाए रखने का दावा। लेकिन मुद्दा इससे बड़ा है। भारत में दलित समुदाय के लोग लंबे समय से सामाजिक भेदभाव का सामना करते रहे हैं। शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में प्रगति हुई है। मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता उच्च पदों पर पहुंचकर इस प्रगति के प्रतीक बने हैं। फिर भी जब उनके भाषण स्थल को ‘शुद्ध’ करने की कोशिश होती है, तो यह सवाल खड़ा होता है कि मानसिक स्तर पर जाति की दीवारें कितनी मजबूत हैं।

लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है। जनसभाएं लोकतंत्र की जान होती हैं। अगर किसी नेता के आने के बाद स्थान को शुद्ध करने की परंपरा शुरू हो जाए, तो यह खतरनाक संदेश देगा। इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ सकता है और जाति-धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। संविधान की भावना यह है कि जन्म के आधार पर कोई ऊंचा-नीचा नहीं होता। पद, योग्यता और कार्य से व्यक्ति का सम्मान तय होता है।

इस घटना ने संसद में भी चर्चा पैदा की। खड़गे ने अस्पृश्यता अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की। कुछ नेताओं ने इसकी निंदा की और जांच की बात कही। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए असली सवाल यह है कि क्या हम सच में 21वीं सदी में जी रहे हैं या पुरानी मानसिकता अभी भी हावी है?

भारत में जाति व्यवस्था सदियों पुरानी है। स्वतंत्रता के बाद कानूनों से बहुत कुछ बदला। आरक्षण, शिक्षा के अवसर और राजनीतिक भागीदारी ने लाखों लोगों को आगे बढ़ाया। फिर भी गांवों, कस्बों और कभी-कभी शहरों में भी छुआछूत के मामले सामने आते रहते हैं। मंदिर प्रवेश, कुएं से पानी, शादी-ब्याह और सामाजिक कार्यक्रमों में भेदभाव की खबरें आती हैं। जब संसद का नेता प्रतिपक्ष भी खुद को अपमानित महसूस करे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।

इस पूरे विवाद से एक बात साफ होती है कि सामाजिक सुधार अभी अधूरा है। कानून अकेले पर्याप्त नहीं। मानसिकता बदलनी चाहिए। शिक्षा, संवाद और संवेदनशीलता से ही पुरानी दीवारें गिर सकती हैं। राजनीतिक दलों को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। वे जाति को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने की बजाय सामाजिक एकता पर जोर दें।

खड़गे का बयान सिर्फ व्यक्तिगत दुख नहीं है। यह उन लाखों लोगों की आवाज है जो रोज छुआछूत या भेदभाव का सामना करते हैं। उच्च पद पर होने के बावजूद अगर किसी को ऐसा महसूस होता है, तो व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब हर नागरिक को बराबरी का सम्मान मिले—चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या समुदाय से हो।

हल्द्वानी की यह घटना याद दिलाती है कि प्रगति के साथ-साथ हमें अपनी सामाजिक जड़ों की भी जांच करनी होगी। शुद्धिकरण का मतलब अगर किसी व्यक्ति या समुदाय को अशुद्ध मानना है, तो वह संविधान और आधुनिक भारत की भावना के खिलाफ है। सार्वजनिक स्थान सबके लिए हैं। जनसभाएं सबके लिए हैं। सम्मान सबका हक है।

भारत को आगे बढ़ना है तो पुरानी मानसिकता को पीछे छोड़ना होगा। छुआछूत जैसी प्रथाएं न सिर्फ अन्यायपूर्ण हैं, बल्कि देश की एकता के लिए भी नुकसानदेह हैं। खड़गे जैसे नेताओं का अनुभव इस बात की याद दिलाता है कि संघर्ष अभी बाकी है। कानूनी सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है। तभी सही मायनों में समानता का सपना साकार हो सकेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 13 Aug 2026


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