-फ्राइडे वर्ल्ड, 21 जनवरी 2026
वैश्विक राजनीति में 2026 की शुरुआत से ही बड़े बदलावों के संकेत मिलने लगे हैं। एक ओर यूक्रेन-रूस युद्ध थमने का नाम नहीं ले रहा, वहीं दूसरी ओर ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप के बीच अभूतपूर्व तनाव पैदा हो गया है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज ने हाल ही में एक ऐसी घोषणा की है, जिसने नाटो (NATO) के समीकरण को ही हिला दिया है। जर्मनी ने यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना (कन्वेंशनल आर्मी) खड़ी करने का ऐलान कर दिया है। यह फैसला द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी का सबसे बड़ा सैन्य विस्तार है। लेकिन सवाल यह है कि जर्मनी इतना आक्रामक क्यों हो रहा है? ग्रीनलैंड विवाद से इसका क्या संबंध है? आइए विस्तार से समझते हैं।
जर्मनी का 'यूरोप की महा सेना' बनाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य जर्मनी में अब 18 वर्ष से अधिक उम्र के युवाओं को लश्करी सेवा से जुड़े शारीरिक फिटनेस संबंधी प्रश्नावली भरना अनिवार्य हो गया है। यह कदम हाल ही में पारित नए कानून के तहत उठाया गया है। फिलहाल भर्ती स्वैच्छिक है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सरकार को अनिवार्य भर्ती शुरू करने का अधिकार प्राप्त है। जर्मनी का स्पष्ट लक्ष्य है—द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहली बार यूरोप की सबसे शक्तिशाली पारंपरिक सेना तैयार करना।
नवंबर 2025 तक जर्मनी के सक्रिय सैनिकों की संख्या 1,84,000 तक पहुंच चुकी है। चांसलर मेर्ज ने संसद में घोषणा की कि बुंडेसवेहर (Bundeswehr) यूरोप की सबसे मजबूत कन्वेंशनल सेना बनेगी। 1990 के दशक के बाद यह जर्मनी का सबसे बड़ा सैन्य विस्तार है। सरकार का लक्ष्य 2035 तक सक्रिय सैनिकों की संख्या 2,60,000 और रिजर्व सैनिकों की संख्या 2,00,000 तक बढ़ाना है। यह नाटो के नए लक्ष्यों के अनुरूप है, जहां रूस के बढ़ते खतरे के मद्देनजर यूरोपीय देश अपनी रक्षा क्षमता मजबूत कर रहे हैं।
सैन्य बजट में भारी उछाल और आधुनिकीकरण जर्मनी ने अपनी सेना को मजबूत करने के लिए भारी रकम मंजूर की है। लगभग 60 अरब डॉलर (करीब 5,400 अरब रुपये) के नए सैन्य उपकरणों को हरी झंडी मिल चुकी है। इस वर्ष रक्षा खर्च जीडीपी का 2.5% (लगभग 108 अरब यूरो या 11,550 अरब रुपये) है। 2030 तक इसे 3.5% तक ले जाने का लक्ष्य है। यह वृद्धि जर्मनी की उस नीति का हिस्सा है, जिसमें रूस और चीन जैसे खतरों से निपटने के लिए यूरोपीय स्वतंत्र रक्षा क्षमता विकसित की जा रही है।
युवाओं को सेना में आकर्षित करने के लिए आकर्षक पैकेज जर्मनी सरकार युवाओं को सेना में शामिल होने के लिए कई लुभावने ऑफर दे रही है:
- 23 महीने के अनुबंध पर मासिक वेतन करीब 2,600 यूरो (लगभग 2,75,000 रुपये)।
- मुफ्त आवास और स्वास्थ्य बीमा।
- कर कटौती के बाद हाथ में औसतन 2,300 यूरो (लगभग 2,43,000 रुपये) बचत।
ये सुविधाएं जर्मनी की युवा पीढ़ी को सेना की ओर आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, खासकर जब देश में बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियां मौजूद हैं।
मूल कारण: ग्रीनलैंड पर अमेरिका का कब्जा और यूरोप का गुस्सा जर्मनी के इन कदमों का मुख्य कारण ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दबाव है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने या नियंत्रित करने की आक्रामक मांग की है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड के नेताओं ने अमेरिका के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। इसके जवाब में 17 जनवरी 2026 को ट्रंप ने जर्मनी, फ्रांस, डेनमार्क सहित आठ यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की। ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट कहा कि ग्रीनलैंड की 'खरीद' का समझौता नहीं होने तक ये टैरिफ जारी रहेंगे और इन्हें 25% तक बढ़ाया जा सकता है।
ट्रंप का उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन के खिलाफ ग्रीनलैंड को रणनीतिक कुंजी बनाना है, लेकिन यूरोप इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मान रहा है। यूरोपीय देशों को लगता है कि अमेरिका अब सहयोगी की बजाय जबरदस्ती करने वाला व्यापारी बन गया है। **
यूरोप की जवाबी कार्रवाई: 'ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस' अमेरिकी दबाव के सामने झुकने के बजाय यूरोप ने मजबूत जवाब दिया। डेनमार्क के नेतृत्व में 'ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस' शुरू किया गया, जिसमें जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे, नीदरलैंड्स और फिनलैंड जैसे देशों ने ग्रीनलैंड में सैन्य हाजिरी बढ़ा दी। जर्मनी ने पहली बार हजारों मील दूर अपने सैनिकों को ऐसे मिशन में भेजा, जो सीधे अमेरिका के विरोध में है। जर्मनी ने 13-15 सैनिकों की टुकड़ी भेजी, जो समुद्री निगरानी और सुरक्षा मजबूत करने के लिए थी। यह मिशन नाटो को दो हिस्सों में बांट रहा है—एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ यूरोपीय देश।
यह घटना यूरोप के लिए ऐतिहासिक है, क्योंकि अब यूरोपीय देश अमेरिकी निर्भरता से मुक्त होकर अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करने की राह पर हैं। चांसलर मेर्ज ने स्पष्ट कहा कि यूरोप अपने हितों की रक्षा करेगा, भले ही अमेरिका से टकराव हो।
नई विश्व व्यवस्था की शुरुआत? ग्रीनलैंड विवाद अब सिर्फ एक द्वीप का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह अमेरिका-यूरोप संबंधों की नई परीक्षा बन गया है। जर्मनी का यह सैन्य विस्तार यूरोप की स्वतंत्र रक्षा नीति की दिशा में बड़ा कदम है। क्या यह नाटो के टूटने की शुरुआत है या यूरोप की नई ताकत का उदय? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल तनाव का पारा लगातार बढ़ रहा है। दुनिया अब आर्कटिक से यूरोपीय राजधानियों तक की इस जंग पर नजर रखे हुए है।
जर्मनी का यह फैसला न केवल उसकी सुरक्षा को मजबूत करेगा, बल्कि पूरे यूरोप को एक नई दिशा दे सकता है—जहां अमेरिका का डर अब कमजोर पड़ रहा है और यूरोपीय एकता मजबूत हो रही है।
सज्जादअली नयानी ✍
फ्राइडे वर्ल्ड, 21 जनवरी 2026