-Friday World January 21, 2026
नई दिल्ली/लंदन, 21 जनवरी 2026: दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार को लेकर बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ ब्रिटेन की राजधानी लंदन में 8 साल के हिंदू बच्चे को तिलक लगाने के कारण स्कूल में भेदभाव का सामना करना पड़ा और उसे स्कूल छोड़ना पड़ा। दूसरी तरफ भारत में मुस्लिम छात्राओं को बुर्का या हिजाब पहनने के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश से रोका गया, कई मामलों में परीक्षा देने से वंचित किया गया। ये दोनों घटनाएं एक ही सवाल उठाती हैं – क्या किसी बच्चे की धार्मिक पहचान उसके शिक्षा के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकती है?
लंदन की घटना: तिलक पर 'स्किन मार्क' का आरोप लंदन के एल्पर्टन इलाके में स्थित विकार्स ग्रीन प्राइमरी स्कूल में 8 वर्षीय हिंदू छात्र को नियमित रूप से तिलक लगाकर स्कूल जाने पर रोक लगाई गई। स्कूल प्रशासन ने इसे 'स्किन मार्किंग' बताकर यूनिफॉर्म कोड का उल्लंघन माना। INSIGHT UK (ब्रिटिश हिंदू और भारतीय समुदाय की एडवोकेसी संस्था) के अनुसार, हेड टीचर ने ब्रेक टाइम में बच्चे पर लगातार नजर रखी, जिससे वह डर गया, अन्य बच्चों से अलग-थलग हो गया और जिम्मेदारियों से हटा दिया गया। माता-पिता ने कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन स्कूल ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। अंत में बच्चे को दूसरी स्कूल में ट्रांसफर करना पड़ा। संस्था का दावा है कि इस स्कूल में पहले भी चार हिंदू बच्चों को इसी कारण छोड़ना पड़ा।
INSIGHT UK ने कहा, "तिलक कोई 'मार्क' नहीं, पवित्र धार्मिक प्रतीक है। किसी बच्चे को धर्म के कारण अलग-थलग या डराया नहीं जाना चाहिए।" यह मामला यूके के Equality Act 2010 के तहत धार्मिक भेदभाव के रूप में देखा जा रहा है।
भारत में बुर्का-हिजाब विवाद: परीक्षा से वंचित मुस्लिम छात्राएं भारत में भी इसी तरह के कई मामले सामने आए हैं, खासकर कर्नाटक हिजाब विवाद (2022) के बाद। कर्नाटक हाई कोर्ट ने हिजाब को 'इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा' नहीं माना और शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिबंध को बरकरार रखा। इसके परिणामस्वरूप: - कई मुस्लिम लड़कियों को क्लास में प्रवेश से रोका गया।
- कुछ ने परीक्षा बहिष्कार की, जैसे उदुपी में 40 छात्राओं ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ परीक्षा देने से इनकार किया।
- शिवमोग्गा और चिक्कमगलुरु में बुर्का पहनने वाली छात्राओं को हिजाब हटाने को कहा गया, जिसके बाद उन्होंने परीक्षा नहीं दी।
- हाल के मामलों में (2025): उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में क्लास 10 की छात्राओं ने हिजाब नहीं हटाने पर परीक्षा से इनकार किया। जौनपुर में चार लड़कियां बुर्का हटाने से मना करने पर घर लौट आईं।
- महाराष्ट्र में कुछ कॉलेजों में बुर्का-निकाब पर प्रतिबंध की मांग हुई, जबकि बोर्ड परीक्षाओं में कोई सख्त रोक नहीं लगी।
ये घटनाएं दिखाती हैं कि धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध से मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा प्रभावित हुई – कई ने परीक्षा छोड़ी, कुछ ने स्कूल बदल लिया।
दोहरी नैतिकता का सवाल लंदन में तिलक पर भेदभाव को 'धार्मिक असहिष्णुता' कहा जा रहा है, जबकि भारत में हिजाब-बुर्का पर रोक को 'यूनिफॉर्म पॉलिसी' और 'शैक्षणिक अनुशासन' का नाम दिया जाता है। दोनों ही मामलों में बच्चे शिक्षा से वंचित हुए।
- क्या पश्चिमी देशों में अल्पसंख्यक धार्मिक प्रतीकों पर सवाल उठाना 'भेदभाव' है, लेकिन भारत में बहुसंख्यक दबाव में अल्पसंख्यक प्रतीकों पर रोक 'नियम' है?
- दोनों देशों में Equality Act या संवैधानिक अधिकार (भारत में अनुच्छेद 25-28) धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, फिर भी बच्चे प्रभावित हो रहे हैं।
- शिक्षा का अधिकार (RTE Act भारत में, Equality Act यूके में) धर्म के आधार पर सीमित नहीं होना चाहिए।
हिंदू और मुस्लिम समुदाय दोनों ही नजरअंदाज किए जाने से आक्रोशित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूलों को धार्मिक संवेदनशीलता बढ़ानी चाहिए, न कि प्रतिबंध लगाकर छात्रों को अलग-थलग करना चाहिए।
आगे क्या? ये घटनाएं वैश्विक स्तर पर धार्मिक सहिष्णुता की चुनौती पेश करती हैं। लंदन में INSIGHT UK कार्रवाई की मांग कर रहा है, जबकि भारत में कई संगठन सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे हैं। सवाल यह है – क्या शिक्षा प्रणाली धर्मनिरपेक्ष रहेगी या धार्मिक प्रतीकों को 'समस्या' मानकर छात्रों के भविष्य से समझौता करेगी?
अंततः, एक बच्चे का तिलक या हिजाब उसके व्यक्तित्व का हिस्सा है – इसे शिक्षा के रास्ते में रोड़ा नहीं बनना चाहिए।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World January 21, 2026