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Saturday, 24 January 2026

"अब्राहम लिंकन ईरान की जद में: अमेरिकी 'सुपरकैरियर' अब मिसाइल रेंज में, क्या मध्य पूर्व युद्ध की कगार पर?"

"अब्राहम लिंकन ईरान की जद में: अमेरिकी 'सुपरकैरियर' अब मिसाइल रेंज में, क्या मध्य पूर्व युद्ध की कगार पर?"
-Friday World 24 January 2026
अमेरिकी नौसेना का यह निमित्ज-क्लास विमानवाहक पोत (CVN-72) दुनिया के सबसे शक्तिशाली युद्धपोतों में से एक है। यह पोत लगभग 100,000 टन वजनी है, जिसमें 60-70 लड़ाकू विमान (जैसे F/A-18 सुपर हॉर्नेट, F-35C स्टेल्थ फाइटर) तैनात रहते हैं। इसके साथ डिस्ट्रॉयर, क्रूजर और सबमरीन मिलकर पूरा कैरियर स्ट्राइक ग्रुप (CSG) बनता है, जो हजारों किलोमीटर दूर से भी सटीक हमले कर सकता है। हाल के दिनों में ट्रैकिंग डेटा और पेंटागन के सूत्रों के अनुसार, अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप दक्षिण चीन सागर से निकलकर मलक्का जलडमरूमध्य पार कर हिंद महासागर में पहुंच चुका है। जनवरी 2026 के मध्य तक यह अरब सागर या ओमान की खाड़ी में पहुंचने की स्थिति में है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि यह पोत अब फारस की खाड़ी के निकट या उसमें प्रवेश करने की कगार पर है।

 ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का एक बड़ा जखीरा है, जिनमें फतेह-110, ज़ोल्फ़ाग़ार, ख़ैबर-शिकन और सेज्जील जैसी मिसाइलें शामिल हैं। इनकी रेंज 300 से 2,000 किलोमीटर तक है, जबकि कुछ उन्नत मिसाइलें (जैसे होरमुज़-2 या ख़ैबर शिकन के अपग्रेडेड वर्जन) 1,450-2,000 किमी तक की रेंज का दावा करती हैं। ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने बार-बार दावा किया है कि वे अमेरिकी विमानवाहक पोतों को निशाना बनाने में सक्षम हैं, खासकर जब वे फारस की खाड़ी, होर्मुज़ जलडमरूमध्य या अरब सागर में हों। 

अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अब्राहम लिंकन ओमान की खाड़ी या अरब सागर में तैनात होता है, तो यह ईरान की कई मिसाइलों की प्रभावी रेंज में आ जाता है। ईरान के पास एंटी-शिप बैलिस्टिक मिसाइलें जैसे ख़ालिज फार्स और हॉर्मुज़ भी हैं, जो विशेष रूप से विमानवाहकों को टारगेट करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं। इनकी रेंज 300-700 किमी है, लेकिन ईरान दावा करता है कि वह इनसे कैरियर स्ट्राइक ग्रुप को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

 यह तैनाती महज संयोग नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों और पेंटागन की कार्रवाइयों से साफ है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी हमलों (हूती, हिज़्बुल्लाह आदि) और इज़राइल के साथ बढ़ते तनाव के जवाब में यह कदम उठाया गया है। अमेरिका ने B-52 बॉम्बर, अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम और अन्य नौसैनिक संपत्तियों को भी मध्य पूर्व में भेजा है। 

लेकिन सवाल यह है – क्या ईरान ने मरो या मारो की नीती अपनाई तो अमेरिका-इज़राइल के लिए अस्तित्व पर कड़ा ख़तरा हे और ईरान के लिए कुछ भी करना कोई मुश्किल नही हे।

इतिहास बताता है कि कोई भी देश अब तक सफलतापूर्वक अमेरिकी विमानवाहक पर हमला नहीं कर पाया है। लेकिन अमेरिका-खुद दुविधा मे हे की ईरान ने अब्राहम लिंकन पर कब्जा कर लिया तो दुनियाभर मे मुह दिखा ने लायक नही रहेगा 

फिर भी, ईरान की रणनीति "असिमेट्रिक वॉरफेयर" पर आधारित है – स्वार्म अटैक (सैकड़ों छोटी मिसाइलें और ड्रोन एक साथ), माइन वारफेयर, स्पीडबोट अटैक और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को ब्लॉक करना। अगर ऐसा हुआ, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर भारी असर पड़ेगा, क्योंकि दुनिया का 20-30% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। 

अमेरिकी सैन्य अड्डे – जैसे बहरीन में NSA Bahrain, कतर में अल उदैद एयर बेस, UAE में अल धफ्रा, सऊदी अरब और इराक में – भी ईरान की मिसाइल रेंज में हैं। ईरान ने इन्हें "सॉफ्ट टारगेट" कहा है, क्योंकि ये जमीन पर हैं और मोबाइल नहीं। लेकिन अमेरिका का दावा है कि इन अड्डों पर पैट्रियट, THAAD और अन्य एयर डिफेंस सिस्टम तैनात हैं, जो ईरानी मिसाइलों को रोक सकते हैं। 

यह स्थिति इज़राइल-अमेरिका गठजोड़ को और मजबूत करती है। इज़राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले की धमकी दी है, और अमेरिकी कैरियर की मौजूदगी इज़राइल को एयर सपोर्ट दे सकती है। लेकिन ईरान भी चुप नहीं बैठेगा – उसने कहा है कि कोई भी हमला "पूर्ण युद्ध" में बदल सकता है। 

निष्कर्ष में, अब्राहम लिंकन की यह तैनाती एक शक्ति प्रदर्शन है, लेकिन साथ ही एक उच्च जोखिम वाला दांव  भी। दुनिया की नजरें फारस की खाड़ी पर टिकी हैं – क्या यह तनाव युद्ध में बदलता है, या कूटनीति से सुलझता है? समय ही बताएगा। 

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World 24 January 2026