मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक **मोहन भागवत** ने एक बार फिर अपनी समर्पण भावना और संगठन के प्रति निष्ठा को दोहराया है। रविवार को मुंबई में आरएसएस के शताब्दी वर्ष समारोह के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि 75 साल की उम्र पूरी होने के बाद भी वे पद और जिम्मेदारी से मुक्त होने के लिए तैयार हैं—लेकिन यह फैसला केवल संघ का होगा। भागवत ने स्पष्ट किया, "जब संघ कहेगा, दायित्व छोड़ दूंगा, लेकिन कार्य से निवृत्ति कभी नहीं होगी।"
भागवत सितंबर 2025 में 75 वर्ष के हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने संघ को अपनी उम्र पूरी होने की सूचना दे दी थी और सामान्य परंपरा के अनुसार 75 के बाद बिना किसी पद के काम करना चाहिए। लेकिन संघ ने उनसे कहा, "आप घूम रहे हैं, काम कीजिए।" इस पर उन्होंने काम जारी रखा। भागवत ने कहा, "मैं यहां हूं यह मेरी मर्जी नहीं है। अगर मैं यहां नहीं रहूं तो यह भी मेरा ऑप्शन नहीं होता, यह संघ का ऑप्शन है।"
संघ की परंपरा: उम्र नहीं, समर्पण मायने रखता है आरएसएस में कोई सख्त रिटायरमेंट नियम नहीं है। भागवत ने जोर दिया कि संघ अपने स्वयंसेवकों से "अंतिम बूंद रक्त तक" काम लेता है। उन्होंने कहा, "दायित्व से निवृत्त होने के बाद भी जीवनभर काम चलता रहता है। संघ के इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं जहां किसी को जबरन रिटायर किया गया हो।" यह बयान आरएसएस की अनुशासन और सेवा की भावना को दर्शाता है, जहां व्यक्तिगत इच्छा से ज्यादा संगठन की जरूरत महत्वपूर्ण होती है।
भागवत ने कार्यक्रम में अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आरएसएस का सरसंघचालक किसी जाति का नहीं, बल्कि केवल हिंदू होगा। कोई भी हिंदू, चाहे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र, संगठन के लिए समर्पित हो तो प्रमुख बन सकता है। उन्होंने वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग का समर्थन किया और कहा कि इससे पुरस्कार की गरिमा बढ़ेगी।
राजनीतिक संदर्भ और विपक्ष की प्रतिक्रियाएं भागवत के इस बयान को कई लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो भी 75 वर्ष के हो चुके हैं) के संदर्भ में देख रहे हैं, क्योंकि पहले भी 75 साल की उम्र पर रिटायरमेंट की चर्चा हुई थी। लेकिन भागवत ने स्पष्ट किया कि उनका बयान व्यक्तिगत नहीं, बल्कि संघ की कार्यशैली पर है। विपक्षी दलों ने इसे "आरएसएस का असली चेहरा" बताकर राजनीतिक टिप्पणियां कीं, जबकि समर्थकों ने इसे "समर्पण का प्रतीक" कहा।
आरएसएस शताब्दी वर्ष (2025-2026) में विभिन्न कार्यक्रमों के जरिए संगठन अपनी 100 साल की यात्रा को याद कर रहा है। भागवत का यह बयान संघ की एकता, अनुशासन और लंबे समय तक सेवा की भावना को मजबूत करता है। उन्होंने कहा कि संघ कभी पावर या पद के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के लिए काम करता है।
संघ में नेतृत्व का मतलब: सेवा, नहीं पद भागवत के शब्दों में, "संघ में काम कोई नौकरी नहीं, जीवन का हिस्सा है।" यह बयान उन लाखों स्वयंसेवकों के लिए प्रेरणा है जो उम्र, पद या व्यक्तिगत इच्छा से ऊपर संगठन को रखते हैं। फिलहाल, संघ ने भागवत से काम जारी रखने को कहा है, और वे इसे पूरा समर्पण से निभा रहे हैं।
यह घटना आरएसएस की आंतरिक संस्कृति को समझने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है—जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि सामूहिक लक्ष्य सर्वोपरि होते हैं। क्या भविष्य में कोई बदलाव आएगा? यह संघ का फैसला होगा। लेकिन फिलहाल, मोहन भागवत का संदेश साफ है: "संघ कहेगा, तो दायित्व छोड़ दूंगा—लेकिन काम कभी नहीं रुकेगा!"
Sajjadali Nayani ✍
Friday world 8/2/2026