सोशल मीडिया इन दिनों गरम है—नितिन गडकरी के दिल्ली स्थित आधिकारिक (या व्यक्तिगत) बंगले को लेकर। लोग तस्वीरें शेयर कर रहे हैं, वीडियो वायरल हो रहे हैं, और अंदाज़े लगाए जा रहे हैं कि इस लुटियंस-स्टाइल बंगले की लागत कितनी होगी—कुछ करोड़ से लेकर दर्जनों करोड़ तक के अनुमान उड़ रहे हैं। गोबर से पुते दीवारें, पारंपरिक लकड़ी का काम, भारतीय लोक कला, मोरों से भरा बगीचा, ऑर्गेनिक फार्मिंग—ये सब देखकर एक तरफ तारीफ हो रही है कि "सस्टेनेबल और भारतीय संस्कृति से जुड़ा घर", तो दूसरी तरफ सवाल उठ रहे हैं कि जब आम आदमी महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहा है, तो मंत्रियों के घरों की चमक-दमक क्यों बढ़ती जा रही है?
लेकिन ये बहस सिर्फ एक बंगले तक सीमित नहीं। इसी बीच वर्ल्ड इनइक्वालिटी रिपोर्ट 2026 (World Inequality Report 2026) ने भारत की आर्थिक खाई को एक बार फिर उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक:
- देश की शीर्ष 10% आबादी राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा हड़प लेती है।
- वहीं निचले 50% लोग को सिर्फ 15% मिल पाता है।
- धन के मामले में असमानता और भी भयानक है—शीर्ष 10% के पास कुल संपत्ति का 65%, और सिर्फ शीर्ष 1% के पास 40% संपत्ति है।
ये आंकड़े 2014-2024 के बीच स्थिर रहे हैं, यानी असमानता कम होने की बजाय जस की तस बनी हुई है। औसत आय (PPP में) करीब 6,224 यूरो सालाना है, लेकिन नीचे के 50% की औसत आय सिर्फ 940 यूरो—यानी अमीर और गरीब के बीच का फासला पहाड़ जैसा।
इसी रिपोर्ट के साथ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की 2026 रिपोर्ट ने आग में घी डाल दिया। ADR ने 2014 से 2024 तक लगातार दोबारा चुने गए 102 सांसदों की संपत्ति की तुलना की:
- 2014 में इनकी औसत संपत्ति थी 15.83 करोड़ (कुछ रिपोर्ट्स में 15.76 करोड़)।
- 2024 में ये बढ़कर 33.13 करोड़ हो गई।
- यानी 10 साल में 110% की बढ़ोतरी—औसतन 17.36 करोड़ का इजाफा।
ये वो सांसद हैं जो 2014, 2019 और 2024—तीनों लोकसभा चुनाव जीते। कईयों की संपत्ति में 200-700% तक का उछाल आया। कुछ मामलों में तो हजारों प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। सवाल उठता है—क्या ये बढ़ोतरी सिर्फ "स्मार्ट निवेश", "व्यवसायिक सफलता" या "पारदर्शी कमाई" से हुई? या राजनीतिक पद का फायदा उठाकर?
नितिन गडकरी का मामला: गडकरी की व्यक्तिगत संपत्ति घोषणा में दिल्ली का बंगला सरकारी आवास है (जो मंत्री रहते हुए मिलता है), लेकिन उनकी घोषित संपत्ति में नागपुर का घर (5.14 करोड़), मुंबई का फ्लैट (4.95 करोड़), पैतृक संपत्ति और खेती की जमीन शामिल है। हाल की चर्चाओं में उनके दिल्ली घर की तस्वीरें—जहां गोबर पेंट, फोक आर्ट और पारंपरिक डिजाइन है—वायरल हैं। लोग कह रहे हैं, "ये तो सादगी का प्रतीक है", लेकिन दूसरी तरफ पूछा जा रहा है कि जब आम जनता 100-200 रुपये के पेट्रोल-डीजल में सांस ले रही है, तो क्या ऐसे घरों की चमक जरूरी है?
बड़ी तस्वीर
- एक तरफ विश्व असमानता रिपोर्ट कह रही है कि भारत में असमानता दुनिया में सबसे ऊंचे स्तर पर बनी हुई है—टॉप 1% के पास 40% संपत्ति।
- दूसरी तरफ ADR रिपोर्ट दिखा रही है कि सांसदों की औसत संपत्ति दोगुनी से ज्यादा हो गई।
- बीच में आम आदमी—जो महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा-स्वास्थ्य की मार झेल रहा है।
ये बहस सिर्फ एक मंत्री के बंगले या सांसदों की संपत्ति की नहीं। ये उस व्यवस्था की है जहां राजनीतिक शक्ति और आर्थिक शक्ति एक-दूसरे को मजबूत करती जा रही है। क्या पारदर्शिता बढ़ेगी? क्या संपत्ति घोषणा में और सख्ती आएगी? क्या टैक्स सिस्टम में सुधार होगा ताकि नीचे के 50% को ज्यादा हिस्सा मिले?
नितिन गडकरी का बंगला भले ही गोबर से पुता हो, लेकिन भारत की आर्थिक असमानता अब "गोबर" से भी ज्यादा बदबूदार हो चुकी है। जब शीर्ष 1% के पास 40% धन हो और सांसदों की संपत्ति 10 साल में दोगुनी हो जाए, तो "सबका साथ, सबका विकास" का नारा कितना खोखला लगता है—ये सोचने की जरूरत है।
सोशल मीडिया पर चर्चा जारी है, लेकिन असल बदलाव संसद, नीतियों और व्यवस्था में ही आएगा। क्या हम तैयार हैं सवाल पूछने के लिए... और सुनने के लिए? 🇮🇳 🇮🇳
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Sajjadali Nayani ✍
Friday world 14th Feb 2026