-Friday world 14th Feb 2026
बांग्लादेश की 13वीं संसदीय चुनाव (फरवरी 2026) में एक ऐसा नतीजा सामने आया है, जो न केवल अल्पसंख्यक समुदाय के लिए प्रेरणादायक है, बल्कि पड़ोसी देशों में राजनीतिक समावेशिता पर भी सवाल खड़े करता है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के वरिष्ठ नेता और हिंदू समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गयेश्वर चंद्र रॉय ने ढाका-3 सीट से शानदार जीत हासिल की। यह जीत इसलिए खास है क्योंकि यह ढाका में 1971 के बाद पहली बार किसी हिंदू सांसद की सफलता है, और BNP ने उन्हें पार्टी टिकट देकर भरोसा जताया।
ऐतिहासिक जीत का विवरण गयेश्वर चंद्र रॉय, जो BNP की स्थायी समिति के सदस्य और पूर्व राज्य मंत्री रह चुके हैं, ने ढाका-3 (केरानीगंज क्षेत्र) से 99,163 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी जमात-ए-इस्लामी के उम्मीदवार मो. शाहीनुर इस्लाम को 83,264 वोट मिले। यह जीत तब आई जब हाल के महीनों में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरें आई थीं, फिर भी मतदाताओं ने धार्मिक आधार से ऊपर उठकर समर्थन दिया। रॉय ने खुद को पहले बांग्लादेशी बताते हुए कहा कि उनकी जीत सभी समुदायों के लिए है।
BNP ने इस चुनाव में हिंदू उम्मीदवारों को खुलकर मौका दिया। कुल मिलाकर तीन हिंदू उम्मीदवार (सभी BNP से) जीते, जबकि जमात-ए-इस्लामी का एकमात्र हिंदू उम्मीदवार हार गया। यह दिखाता है कि BNP अल्पसंख्यकों को पार्टी में महत्वपूर्ण स्थान देती है, और जीत के बाद उन्हें मंत्री पद या अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिल सकती हैं – जैसा कि रॉय के पूर्व अनुभव से साफ है।
महिलाओं की भागीदारी भी उल्लेखनीय चुनाव में महिलाओं ने भी मजबूत प्रदर्शन किया। BNP की कई महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की, जिसमें कुल सात महिलाएं संसद पहुंचीं (जिनमें से अधिकांश BNP से)। जैसे अफरोजा खानम रिता (मानिकगंज-3), तहसीना रुश्दीर लूना (सिलहट-2), शमा ओबैद (फरीदपुर-2) आदि। यह संख्या दिखाती है कि BNP ने महिलाओं और अल्पसंख्यकों दोनों को टिकट देकर समावेशी राजनीति का उदाहरण पेश किया।
भारत से तुलना: टिकट से मंत्री तक का फासला भारत में स्थिति अलग है। यहां हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद कई पार्टियां अल्पसंख्यक (खासकर मुस्लिम) उम्मीदवारों को टिकट देने में हिचकिचाती हैं, और जीतने के बाद भी मंत्री पद मिलना मुश्किल होता है। लेकिन बांग्लादेश जैसे मुस्लिम-बहुल देश में BNP ने हिंदू उम्मीदवार को न सिर्फ टिकट दिया, बल्कि जीत के बाद उच्च पद की संभावना भी बनाई। यह विडंबना है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यक को राजनीतिक मुख्यधारा में जगह मिल रही है, जबकि भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ वर्गों को लगता है कि उनकी आवाज दबाई जा रही है।
यह चुनाव BNP की व्यापक अपील दिखाता है – जहां तारिक रहमान के नेतृत्व में पार्टी ने 200+ सीटें जीतीं और दो दशक बाद सत्ता में वापसी की। गयेश्वर चंद्र रॉय की जीत सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि समावेशी लोकतंत्र का प्रतीक है। क्या भारत की पार्टियां इससे सबक लेंगी? समय बताएगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday world 14th Feb 2026