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Tuesday, 28 April 2026

121 देशों के समर्थन से ईरान बना परमाणु अप्रसार संधि का उपाध्यक्ष: अमेरिका देखता रहा, जबकि ईरान परमाणु हथियारों का मुखर विरोधी

121 देशों के समर्थन से ईरान बना परमाणु अप्रसार संधि का उपाध्यक्ष: अमेरिका देखता रहा, जबकि ईरान परमाणु हथियारों का मुखर विरोधी
-Friday World-April 28,2026 
27 अप्रैल 2026 को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, न्यूयॉर्क में परमाणु अप्रसार संधि (NPT) की समीक्षा सम्मेलन की शुरुआत में एक ऐतिहासिक और विवादास्पद घटना घटी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) के 121 विकासशील देशों के मजबूत समर्थन से ईरान को सम्मेलन के 34 उपाध्यक्षों (Vice-Presidents) में से एक चुना गया। अमेरिका और उसके कुछ पश्चिमी सहयोगियों के तीखे विरोध के बावजूद ईरान यह पद हासिल करने में सफल रहा। वियतनाम के राजदूत दो हंग वियत सम्मेलन के मुख्य अध्यक्ष बने।

यह चुनाव महज एक प्रक्रियात्मक नियुक्ति नहीं है। यह बहुपक्षीय कूटनीति की जीत, विकासशील देशों की बढ़ती आवाज और परमाणु अप्रसार व्यवस्था में व्याप्त दोहरे मापदंडों (double standards) पर गहरी बहस को जन्म दे रहा है। ईरान सदैव परमाणु हथियारों का विरोध करता रहा है, फिर भी उसे बार-बार संदेह की नजर से देखा जाता है।

 ईरान की स्पष्ट नीति: परमाणु हथियार हराम

ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई ने बार-बार फतवा जारी कर परमाणु हथियारों के उत्पादन, भंडारण और उपयोग को इस्लामी कानून के विरुद्ध बताया है। ईरान का आधिकारिक रुख हमेशा से यही रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूर्ण रूप से शांतिपूर्ण है — ऊर्जा उत्पादन, चिकित्सा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए। ईरान ने कभी भी परमाणु हथियार बनाने का प्रयास नहीं किया और न ही उनका समर्थन किया। बल्कि वह NPT के अनुच्छेद VI के तहत मौजूदा परमाणु शस्त्रधारी देशों से पूर्ण निरस्त्रीकरण (disarmament) की मांग करता रहा है।

ईरानी राष्ट्रपति और अधिकारी बार-बार दोहराते हैं कि परमाणु हथियार मानवता के खिलाफ हैं और ईरान की धार्मिक, नैतिक तथा रणनीतिक नीति उन्हें अस्वीकार करती है। फिर भी कुछ पश्चिमी देश ईरान पर उल्लंघन के आरोप लगाते रहते हैं, जबकि IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) की रिपोर्ट्स में भी ईरान सहयोग करता दिखता है, हालांकि राजनीतिक दबाव के कारण विवाद बने रहते हैं।

 केवल एक देश ने परमाणु हथियारों का इस्तेमाल किया

इतिहास गवाह है कि केवल अमेरिका ने परमाणु हथियारों का वास्तविक युद्ध में उपयोग किया। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम चरण में अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर परमाणु बम गिराए। इन हमलों में लाखों निर्दोष नागरिक मारे गए, और विकिरण के प्रभाव आज भी पीढ़ियों को प्रभावित कर रहे हैं। कोई अन्य देश आज तक परमाणु हथियारों का युद्ध में उपयोग नहीं कर सका।

ईरान इस तथ्य की ओर इशारा करते हुए पूछता है — जो देश खुद परमाणु हथियारों का उपयोग कर चुका है और हजारों हथियार रखता है, वह विकासशील देशों को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा से भी वंचित क्यों रखना चाहता है?

बिना परमाणु हथियार के भी जनसंहार: अमेरिका-इजरायल के उदाहरण

परमाणु हथियारों के बिना भी शक्तिशाली देशों ने बड़े पैमाने पर जनसंहार किए हैं। 

- द्वितीय विश्व युद्ध में पारंपरिक बमबारी और आगजनी से लाखों लोग मारे गए।
- वियतनाम युद्ध में अमेरिका द्वारा केमिकल हथियारों (एजेंट ऑरेंज) और बमबारी से लाखों नागरिक प्रभावित हुए।
- इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी आक्रमणों में लाखों निर्दोष मौतें हुईं।
- इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में भी पारंपरिक हथियारों से बड़े पैमाने पर नागरिक हताहत हुए हैं।

ये उदाहरण दर्शाते हैं कि विनाश की क्षमता केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है। फिर भी वैश्विक व्यवस्था में केवल कुछ देशों को "परमाणु क्लब" का सदस्य माना जाता है, जबकि बाकी को संदेह की नजर से देखा जाता है। ईरान इस असमानता की मुखर आलोचना करता है।

 NPT की संरचना और उसकी कमजोरियां

परमाणु अप्रसार संधि (NPT) 1970 में लागू हुई। इसके तीन मुख्य स्तंभ हैं:
1. अप्रसार (Non-Proliferation)— गैर-परमाणु देशों को हथियार न बनाने देना।
2. निरस्त्रीकरण (Disarmament)— पांच मान्यता प्राप्त परमाणु शक्तियों (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन) द्वारा हथियारों में कमी।
3. शांतिपूर्ण उपयोग (Peaceful Uses) — सदस्य देशों को परमाणु ऊर्जा और प्रौद्योगिकी का अधिकार।

समस्या यह है कि निरस्त्रीकरण का स्तंभ लगभग स्थिर रहा है। परमाणु शक्तियां अपने हथियारों का आधुनिकीकरण कर रही हैं, जबकि विकासशील देशों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। NAM देशों का मानना है कि NPT भेदभावपूर्ण है — यह कुछ देशों को विशेषाधिकार देता है और बाकियों को रोकता है।

ईरान 1970 से NPT का सदस्य है और बार-बार अनुच्छेद IV के तहत शांतिपूर्ण परमाणु अधिकार की रक्षा करता रहा है।

 121 देशों की एकजुटता: NAM की ताकत

गुटनिरपेक्ष आंदोलन में अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका के ज्यादातर देश शामिल हैं। इन देशों ने ईरान को NAM की ओर से नामांकित किया क्योंकि वे मानते हैं कि:
- ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध राजनीतिक हैं, न कि तकनीकी।
- पश्चिमी देश दोहरे मापदंड अपनाते हैं — इजरायल NPT का सदस्य नहीं है, फिर भी परमाणु क्षमता रखता है, पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता।
- विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा और वैज्ञानिक प्रगति से वंचित रखने की कोशिश की जा रही है।

ईरान ने इस चुनाव को "बहुपक्षीयता और न्याय की जीत" बताया। तेहरान का कहना है कि यह फैसला दर्शाता है कि विश्व अब अमेरिका के एकतरफा आदेशों पर नहीं चलता।

 अमेरिका का विरोध: क्या डर?

अमेरिका ने ईरान की नियुक्ति को NPT की "अखंडता पर हमला" बताया। अमेरिकी प्रतिनिधियों ने कहा कि ईरान पर IAEA के कुछ प्रश्न हैं, इसलिए उसे उपाध्यक्ष नहीं बनाया जाना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने भी आपत्ति जताई।

लेकिन वास्तविकता यह है कि सम्मेलन में वोटिंग नहीं हुई। आम सहमति या समूह नामांकन के आधार पर चुनाव हुआ। अमेरिका विरोध दर्ज करा कर रह गया। कई विश्लेषक इसे अमेरिकी प्रभाव में गिरावट का संकेत मानते हैं।

ईरान ने आरोपों को "राजनीतिक रूप से प्रेरित और बेबुनियाद" बताया। रूस और चीन जैसे देशों ने भी ईरान को अलग-थलग करने का विरोध किया।

 बदलता वैश्विक परिदृश्य

2026 का यह सम्मेलन बहुपोलीय विश्व व्यवस्था का प्रतीक बन गया है। जहां अमेरिका और उसके सहयोगी अप्रसार पर जोर देते हैं, वहीं NAM देश निरस्त्रीकरण, समान अधिकार और शांतिपूर्ण उपयोग पर। 

भारत जैसे देश, जो NPT के बाहर हैं लेकिन जिम्मेदार परमाणु शक्ति हैं, इस स्थिति को ध्यान से देख रहे हैं। भारत हमेशा से NPT की भेदभावपूर्ण प्रकृति की आलोचना करता रहा है और पूर्ण, गैर-भेदभावपूर्ण निरस्त्रीकरण की वकालत करता है।

 क्या NPT की विश्वसनीयता खतरे में है?

कुछ आलोचक कहते हैं कि आरोपों वाले देश को उपाध्यक्ष बनाना संधि की गरिमा को कम करता है। लेकिन समर्थक तर्क देते हैं कि NPT सभी सदस्यों का है। बहुमत की इच्छा को मानना लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। असली खतरा दोहरे मापदंडों से है — जब परमाणु शक्तियां खुद हथियार बढ़ाती हैं और दूसरों को उपदेश देती हैं।

ईरान का रुख स्पष्ट है: परमाणु हथियार मानवता के दुश्मन हैं। वह केवल शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा चाहता है, जैसा कि NPT उसे अधिकार देता है।

आगे का रास्ता

यह सम्मेलन मई 2026 तक चलेगा। इसमें मध्य पूर्व में परमाणु मुक्त क्षेत्र (Nuclear Weapon Free Zone), निरस्त्रीकरण और शांतिपूर्ण सहयोग पर चर्चा होगी। ईरान उपाध्यक्ष के रूप में प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा सकता है, लेकिन फैसले आम सहमति से होते हैं।

यह घटना सिखाती है कि आज का विश्व एकध्रुवीय नहीं रहा। 121 देशों का समर्थन विकासशील राष्ट्रों की बढ़ती एकजुटता दर्शाता है। परमाणु अप्रसार की सच्ची सफलता तब होगी जब सभी देश समान नियमों का पालन करेंगे — न कि कुछ के लिए नियम और कुछ के लिए अपवाद।

ईरान का संदेश साफ है: हम परमाणु हथियार नहीं चाहते, क्योंकि हमारी धार्मिक, नैतिक और रणनीतिक सोच उन्हें अस्वीकार करती है। जो देश खुद परमाणु हथियारों का उपयोग कर चुका है, उसे दूसरों पर उंगली उठाने का नैतिक अधिकार नहीं है।

वैश्विक शांति तभी संभव है जब परमाणु हथियारों का पूर्ण उन्मूलन हो और हर देश को शांतिपूर्ण प्रौद्योगिकी का समान अधिकार मिले। जब तक "शक्तिशाली के नियम" चलेंगे, ऐसी कूटनीतिक घटनाएं होती रहेंगी — जो कमजोर देशों की आवाज को मजबूत करती हैं।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 28,2026