-Friday World-April 16,2026
पश्चिम एशिया में फरवरी के अंत से शुरू हुए संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के प्रभावी रूप से बंद होने ने महज डेढ़ महीने में वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। दुनिया के तेल और गैस के करीब 20 प्रतिशत निर्यात इसी संकरी खाड़ी से होता है। ईरान की कार्रवाइयों और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी तनाव के कारण शिपिंग ट्रैफिक लगभग ठप हो गया। नतीजा? तेल की कीमतें $70 से बढ़कर $100-120 प्रति बैरल तक पहुंच गईं।
इस ऊर्जा संकट का सबसे सीधा और कड़वा असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर दिखने लगा है। भारत जैसे तेल आयातक देशों में घरेलू खर्च में 15 से 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी जा रही है। रसोई गैस, खाने का तेल, सब्जियां, अनाज और दैनिक जरूरतों की कीमतें तेजी से चढ़ रही हैं। जो महंगाई पूरे साल में होती थी, वह अब कुछ हफ्तों में ही हो रही है।
होर्मुज संकट क्यों इतना खतरनाक?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज मात्र 34 किलोमीटर चौड़ी है, लेकिन यह वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का गला है। यहां से रोजाना लगभग 21 मिलियन बैरल तेल और बड़ी मात्रा में LNG (तरलीकृत प्राकृतिक गैस) गुजरता है। संघर्ष शुरू होने के बाद ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया। समुद्री माइन्स, जहाजों पर हमले और ट्रांजिट फीस की मांग ने स्थिति और जटिल बना दी।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, यह 1970 के दशक के तेल संकट के बाद सबसे बड़ी ऊर्जा आपूर्ति बाधा है। तेल की कीमतों में 30-50 प्रतिशत की उछाल आई। वैश्विक मुद्रास्फीति (inflation) के पूर्वानुमान भी बढ़ गए हैं। IMF ने 2026 के लिए वैश्विक विकास दर घटाकर 3.1 प्रतिशत कर दी है, जबकि मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत पर सबसे गहरा असर: रसोई और घरेलू खर्च
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। उसकी लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल की जरूरत और 90 प्रतिशत LPG (रसोई गैस) आयात होर्मुज मार्ग से होती है। संकट शुरू होने के बाद:
- LPG संकट: घरेलू सिलेंडर की बुकिंग में देरी हो रही है। रेस्तरां, होटल और छोटे खाने के ठेले प्रभावित हुए हैं। कई जगहों पर व्यावसायिक सिलेंडर की कमी से दुकानें बंद हो रही हैं।
- खाने के तेल और खाद्य पदार्थ: तेल की कीमतें बढ़ने से खाना पकाने का खर्च 7-15 प्रतिशत तक बढ़ गया। खाद्य तेल, बिस्किट, साबुन जैसी चीजों की कीमतें चढ़ी हैं या पैकेट सिकुड़ गए हैं।
- रसोई का कुल खर्च: औसत परिवार में रसोई संबंधी खर्च 15-20 प्रतिशत बढ़ गया है। दूध, सब्जी, अनाज और परिवहन लागत भी प्रभावित हुई है।
- उर्वरक और कृषि: होर्मुज से उर्वरक (fertilizer) की आपूर्ति बाधित होने से खेती की लागत बढ़ रही है। FAO (खाद्य एवं कृषि संगठन) ने चेतावनी दी है कि अगर संकट लंबा चला तो साल के अंत और 2027 में खाद्य कीमतों में और उछाल आ सकता है। भारत में भी इसकी झलक दिखनी शुरू हो गई है।
परिणामस्वरूप, खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ रही है। कुछ अनुमानों के मुताबिक, अगर संकट जारी रहा तो भारत में मुद्रास्फीति 4.5-4.7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। रुपया भी कमजोर हुआ है, जिससे आयात और महंगा हो गया।
वैश्विक स्तर पर लहरें: खाद्य सुरक्षा पर खतरा
संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक गैस की कमी से उर्वरक उत्पादन प्रभावित हुआ है। गल्फ क्षेत्र दुनिया के उर्वरक निर्यात का बड़ा हिस्सा है। planting season (बुआई का मौसम) में उर्वरक की कमी से फसल उत्पादन घट सकता है।
UN और FAO ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज मार्ग नहीं खुला तो वैश्विक खाद्य संकट गहरा सकता है। विकासशील देशों में खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ेगी, गरीब परिवार सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। पेट्रोकेमिकल्स (प्लास्टिक, डिटर्जेंट, कपड़े आदि) की कीमतें भी बढ़ रही हैं, जो रोजमर्रा की वस्तुओं को महंगा बना रही हैं।
सरकार की तैयारी और चुनौतियां
भारत सरकार ने स्थिति को संभालने के प्रयास शुरू कर दिए हैं:
- घरेलू LPG उत्पादन बढ़ाने के निर्देश दिए गए।
- आयात diversifying (विविधीकरण) पर जोर।
- तेल विपणन कंपनियों को सब्सिडी देकर पंप पर कीमतें स्थिर रखने की कोशिश।
- रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व का उपयोग।
फिर भी, पूर्ण युद्ध या लंबे संकट की स्थिति में ये उपाय सीमित साबित हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल $130-150 प्रति बैरल तक पहुंच गया तो GDP विकास दर पर 0.5-1 प्रतिशत का असर पड़ सकता है।
आम आदमी क्या कर सकता है?
इस संकट में व्यक्तिगत स्तर पर बचत जरूरी है:
- ऊर्जा की बचत करें – बिजली, गैस और पानी का सावधानीपूर्वक उपयोग।
- स्थानीय और मौसमी उत्पाद खरीदें, महंगे आयातित सामान कम करें।
- वैकल्पिक ईंधन (जैसे इंडक्शन या सोलर) पर विचार करें जहां संभव हो।
- बजट बनाकर खर्च नियंत्रित रखें।
आगे का रास्ता: डिप्लोमेसी की उम्मीद
अभी कुछ सकारात्मक संकेत भी हैं। ईरान की ओर से नए प्रस्ताव आए हैं और पाकिस्तान जैसे देश मध्यस्थता कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी युद्ध समाप्ति के संकेत दिए हैं। अगर होर्मुज मार्ग जल्द खुलता है और माइन्स हटाए जाते हैं, तो कीमतें स्थिर हो सकती हैं।
लेकिन फिलहाल स्थिति अनिश्चित है। विश्लेषक चेतावते हैं कि अगर संकट अप्रैल-मई तक चला तो मुद्रास्फीति और गहरी हो जाएगी। विकासशील देशों में गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।
पश्चिम एशिया का यह तनाव अब कोई दूर की घटना नहीं रह गया है। यह सीधे हमारी रसोई, बजट और भविष्य को प्रभावित कर रहा है। ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने, नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा देने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को विविधीकरण की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस हो रही है।
दुनिया उम्मीद कर रही है कि डिप्लोमेसी जीतेगी और इस संकट का जल्द समाधान निकलेगा। तब तक सतर्क रहना और खर्च में संयम बरतना ही सबसे अच्छा उपाय है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 16,2026