अप्रैल 2026 में अमेरिका और ईरान के बीच दो सप्ताह का सीजफायर (ceasefire) लागू होने के बावजूद, मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति हमेशा के लिए बदल चुकी है। लगभग 40 दिनों तक चले तीव्र संघर्ष में ईरान के जवाबी हमलों ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत में स्थित अमेरिकी बेस अब “लगभग रहने योग्य नहीं” रह गए हैं। नौसेना की पांचवीं फ्लीट का मुख्यालय बहरीन में बुरी तरह प्रभावित हुआ, जबकि अल उदैद (कतर), प्रिंस सुल्तान (सऊदी), अली अल सलेम (कुवैत) और अल धाफरा (यूएई) जैसे प्रमुख ठिकानों पर भी हमले हुए।
न्यूयॉर्क टाइम्स, बीबीसी और सीएसआईएस जैसी रिपोर्ट्स के अनुसार, पहले दो हफ्तों में ही ईरानी हमलों से अमेरिकी बेसों को करीब 800 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। कई बेसों पर बड़े-बड़े क्रेटर बन गए, इमारतें क्षतिग्रस्त हो गईं और सैनिकों को होटलों व सिविलियन इलाकों में शिफ्ट करना पड़ा। ट्रंप प्रशासन ने पूर्ण क्षति की डिटेल्स सार्वजनिक नहीं की हैं, लेकिन सैटेलाइट इमेजरी और रिपोर्ट्स साफ बता रही हैं कि अमेरिका की दशकों पुरानी सैन्य संरचना एक महीने में बुरी तरह हिल गई।
40 दिनों का युद्ध: क्या हुआ?
फरवरी-मार्च 2026 में अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू किए। ईरान ने जवाब में गल्फ देशों में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। ईरान की मिसाइल और ड्रोन हमलों में:
- बहरीन में यूएस फिफ्थ फ्लीट हेडक्वार्टर को सीधा नुकसान पहुंचा।
- कतर के अल उदैद एयर बेस, सऊदी के प्रिंस सुल्तान बेस और यूएई के अल धाफरा बेस प्रभावित हुए।
- कई जगहों पर ई-3 सेंट्री एयरक्राफ्ट क्षतिग्रस्त हुए और दर्जनों अमेरिकी सैनिक घायल हुए।
ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को प्रभावी रूप से ब्लॉक कर दिया, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई। अमेरिका ने माइन स्वीपिंग और एयर स्ट्राइक्स से जवाब दिया, लेकिन गल्फ देशों में स्थित उसके बेस अब हमलों का आसान निशाना बन गए। युद्ध के दौरान अमेरिका ने ईरान की मिसाइल और डिफेंस इंडस्ट्री को भारी क्षति पहुंचाई, लेकिन बदले में उसकी खुद की क्षेत्रीय मौजूदगी कमजोर हो गई।
सैन्य ठिकानों की सुरक्षा पर उठे सवाल
1990 के गल्फ वॉर के बाद अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में करीब 19 बड़े सैन्य ठिकाने बनाए और लगभग 50,000 सैनिक तैनात किए। इन बेसों से गल्फ देशों को सुरक्षा मिलती थी और अमेरिका को तेल सुरक्षा व रणनीतिक नियंत्रण। लेकिन 2026 के युद्ध ने यह समीकरण उलट दिया।
अब ये बेस सुरक्षा देने के बजाय खुद खतरे में पड़ गए हैं। बहरीन का फिफ्थ फ्लीट हेडक्वार्टर, जो अरब सागर, लाल सागर और फारस की खाड़ी की नौसेना कार्रवाइयों का केंद्र था, अब सीमित रूप से ही काम कर रहा है। कई बेस “all but uninhabitable” हो गए हैं। सैनिकों को रिमोट वर्किंग या अस्थायी जगहों पर शिफ्ट करना पड़ा।
निष्णातों का कहना है कि ईरान ने मात्र एक महीने में अमेरिका की दशकों की मेहनत को नुकसान पहुंचा दिया। अब इन बेसों को दोबारा मजबूत बनाना महंगा और समय लेने वाला काम होगा।
गल्फ देशों में बढ़ती चिंता और नई सोच
गल्फ देश (सऊदी, यूएई, कतर, बहरीन, कुवैत) लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर थे। लेकिन इस युद्ध में उन्होंने देखा कि अमेरिकी बेस उनके लिए खतरा बन गए। ईरानी हमलों में गल्फ की जमीन भी प्रभावित हुई, जिससे इन देशों में असुरक्षा का माहौल बना।
अब गल्फ देश आत्मनिर्भर सुरक्षा की ओर मुड़ रहे हैं:
- **अरब-ईरान गठबंधन की संभावना**: कुछ विश्लेषक मानते हैं कि भविष्य में अरब देश ईरान के साथ भी सुरक्षा समझौते की दिशा में सोच सकते हैं, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
- **आत्मनिर्भरता**: सऊदी और यूएई जैसे देश अपनी मिसाइल डिफेंस, ड्रोन टेक्नोलॉजी और स्वदेशी हथियारों पर जोर बढ़ा रहे हैं। यूक्रेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और इटली से अतिरिक्त मदद मांगी जा रही है।
- **अमेरिकी गारंटी पर सवाल**: गल्फ देश अब पूछ रहे हैं – क्या अमेरिका हमेशा सुरक्षा दे पाएगा? युद्ध में अमेरिकी बेस खुद निशाना बने, तो भविष्य में क्या होगा?
अगर गल्फ देश अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर न रहकर क्षेत्रीय सहयोग (यहां तक कि ईरान के साथ संतुलित संबंध) की ओर बढ़े, तो मिडिल ईस्ट में अमेरिकी दबदबा काफी हद तक कम हो जाएगा।
भविष्य के समीकरण
ट्रंप प्रशासन युद्ध को “सफल” बता रहा है क्योंकि ईरान की मिसाइल और न्यूक्लियर क्षमता को भारी झटका लगा। लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर अमेरिका की स्थिति कमजोर हुई है। स्ट्रेट ऑफ हार्मुज दोबारा खुलने की प्रक्रिया शुरू हुई है, लेकिन तेल बाजार अभी भी अस्थिर है।
गल्फ देश अब नई रणनीति बना रहे हैं – मजबूत क्षेत्रीय गठबंधन, स्वदेशी रक्षा क्षमता और अमेरिका के साथ संतुलित संबंध। अगर अरब-ईरान के बीच कोई सुरक्षा कवच या डायलॉग विकसित हुआ, तो अमेरिका को मिडिल ईस्ट से अपना प्रभाव घटता हुआ दिखाई देगा।
यह युद्ध साबित करता है कि आधुनिक युद्ध में पारंपरिक बेस अब आसान निशाना बन जाते हैं। ड्रोन, मिसाइल और असममित युद्ध की रणनीति ने अमेरिका की पारंपरिक ताकत को चुनौती दी है।
40 दिनों के ईरान युद्ध ने मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य पकड़ को ढीला कर दिया है। वर्षों की मेहनत से बने बेस क्षतिग्रस्त हो गए, गल्फ देश असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदल रहा है। अमेरिका अभी भी मजबूत है, लेकिन उसकी क्षेत्रीय रणनीति को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
गल्फ देशों का आत्मनिर्भरता की ओर झुकाव और संभावित क्षेत्रीय गठबंधन भविष्य की राजनीति तय करेंगे। ट्रंप प्रशासन सीजफायर को “जीत” बता रहा है, लेकिन लंबे समय में मिडिल ईस्ट में अमेरिकी प्रभाव कितना टिकेगा, यह देखना बाकी है।
वैश्विक तेल बाजार, सुरक्षा गठबंधन और क्षेत्रीय स्थिरता – सब कुछ इस युद्ध के बाद नई दिशा ले रहा है। आने वाले महीनों में गल्फ देशों की नई सुरक्षा नीतियां और अमेरिका-ईरान बातचीत का नतीजा पूरे क्षेत्र को प्रभावित करेगा।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 10,2026