भारतीय राजनीति में महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण की बातें अक्सर जोर-शोर से की जाती हैं, लेकिन हकीकत जब सामने आती है तो चेहरा बेनकाब हो जाता है। शादीशुदा होने के बावजूद, खुद को अविवाहित बताते रहना, समाज में पत्नी को कोई सम्मान न देना—ये आरोप कई नेताओं पर लगते रहे हैं। साथ ही, प्रज्जवल रेवन्ना जैसे बलात्कार के आरोपितों के लिए वोट मांगना, पार्टी में बलात्कारियों को जगह देना और संरक्षण प्रदान करना, यह सब मिलकर एक सवाल खड़ा करता है: क्या महिलाओं के प्रति सम्मान सिर्फ चुनावी नारे हैं?
बलात्कार के आरोप और सजा: BJP नेताओं का रिकॉर्ड
Association for Democratic Reforms (ADR) और विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, सांसदों और विधायकों में क्राइम्स अगेंस्ट वुमेन के मामले काफी हैं। 2024-26 के आंकड़ों में 151 सिटिंग MPs/MLAs ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले घोषित किए हैं, जिनमें 16 रेप के मामले शामिल हैं। BJP इनमें सबसे आगे है—करीब 54 मामले BJP नेताओं से जुड़े बताए गए।
कुछ प्रमुख उदाहरण:
- प्रज्जवल रेवन्ना (पूर्व JD(S) MP, NDA सहयोगी): सैकड़ों वीडियो के जरिए महिलाओं का यौन शोषण, घरेलू नौकरानी पर बार-बार बलात्कार का आरोप। 2025 में एक मामले में दोषी करार देकर **लाइफ इम्प्रिजनमेंट** की सजा। BJP ने 2024 चुनाव में उन्हें टिकट दिया और प्रचार भी किया।
- कुलदीप सिंह सेंगर (पूर्व BJP MLA, उन्नाव): नाबालिग लड़की से बलात्कार का मामला। दोषी ठहराए गए, लाइफ सजा। बाद में सजा पर रोक लगी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्टे किया।
- रामदुलार गोंड (पूर्व BJP MLA, UP): 15 साल की लड़की से बलात्कार का दोषी, 25 साल की सजा।
- बृजभूषण शरण सिंह (पूर्व BJP MP): महिला पहलवानों पर यौन उत्पीड़न के आरोप। पार्टी ने पूर्ण समर्थन दिया।
- बिलकिस बानो मामले में दोषियों को रिहाई (बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की) और कुछ BJP नेताओं का उनके साथ मंच साझा करना।
कांग्रेस का दावा है कि 44 BJP lawmakers यौन अपराधों के आरोपों का सामना कर रहे हैं। कई मामलों में पार्टी ने आरोपितों को टिकट दिया, बचाव किया या कार्रवाई में देरी की। विपक्ष इसे "बलात्कारियों को संरक्षण" कहता है, जबकि BJP इसे राजनीतिक साजिश बताती है। सच्चाई यह है कि ऐसे मामलों में त्वरित न्याय और सख्त कार्रवाई की बजाय राजनीतिक गणित हावी दिखता है।
महिला आरक्षण बिल: 2010 से 2026 तक का राजनीतिक खेल
2010 में कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल लाया (33% सीटें महिलाओं के लिए)। BJP ने उस समय विरोध किया या समर्थन में स्पष्ट नहीं रहा, जिससे बिल लोकसभा में अटक गया। समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल आदि ने भी पुरुष-प्रधान विरोध किया।
2023 में BJP सरकार ने **नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संशोधन)** पास कराया। इसे सर्वसम्मति से पास किया गया, लेकिन लागू करने को परिसीमन (delimitation) और अगली जनगणना से जोड़ दिया गया। इसका मतलब—आरक्षण 2029 या उसके बाद ही प्रभावी होगा।
अब 2026 में BJP ने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन को साथ जोड़कर पेश किया। प्रस्ताव था:
- लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर करीब 850 करना।
- 2026 जनगणना/2011 डेटा के आधार पर परिसीमन।
- महिला आरक्षण को जल्द लागू करना (एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए, SC/ST सब-कोटा सहित, 15 साल तक)।
सरकार का तर्क: इससे महिलाओं को जल्द प्रतिनिधित्व मिलेगा, "एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य" का सिद्धांत मजबूत होगा। विपक्ष (खासकर कांग्रेस, दक्षिणी दलों) ने इसे **राजनीतिक फायदे** का खेल बताया। आरोप—परिसीमन से उत्तर भारत (BJP मजबूत क्षेत्र) की सीटें बढ़ेंगी, दक्षिणी राज्यों (कम जनसंख्या वृद्धि वाले) की राजनीतिक ताकत घटेगी। महिला आरक्षण को **ढाल** बनाकर फेडरल स्ट्रक्चर को प्रभावित करने की कोशिश।
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में 131वां संशोधन बिल दो-तिहाई बहुमत न मिलने से गिर गया (298 समर्थन, 230 विरोध)। सरकार ने अन्य बिल वापस ले लिए। विपक्ष ने इसे "संविधान बचाव" बताया, BJP ने "महिलाओं के साथ धोखा" कहा।
सवाल उठते हैं...
क्या महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना जरूरी था? 2023 का कानून पहले से पास था—इसे बिना सीटें बढ़ाए लागू क्यों नहीं किया गया? क्या 2010 में विरोध करने वाले और 2023 में बिल पास कराने वाले एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? और सबसे बड़ा सवाल—जिस पार्टी पर बलात्कारियों को संरक्षण देने के आरोप लगते हैं, क्या उसकी "नारी शक्ति" की मंशा सच्ची है?
BJP "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" का नारा देती है, लेकिन कई मामलों में आरोपितों पर सख्ती नहीं दिखाई। विपक्ष भी 2010 में बिल अटकने में अपनी भूमिका से इनकार नहीं कर सकता। असली मुद्दा महिलाओं का सम्मान और न्याय है—न कि वोट बैंक या सीटों का गणित।
भारत की आधी आबादी को राजनीति में बराबरी का हक मिलना चाहिए। लेकिन जब आरोपित नेता टिकट पाते हैं, पत्नी को सम्मान नहीं मिलता और बिल राजनीतिक हथियार बन जाते हैं, तो "नारी शक्ति" सिर्फ शब्द बनकर रह जाती है।
समाज को सोचना होगा—क्या हम महिलाओं को वास्तविक सम्मान दे रहे हैं या सिर्फ चुनावी बयानबाजी? सच्चा सशक्तिकरण तब होगा जब बलात्कारियों को संरक्षण न मिले, न्याय त्वरित हो और आरक्षण बिना किसी सियासी चाल के लागू हो।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 18,2026