Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Sunday, 19 April 2026

नारी शक्ति का दोहरा चेहरा: महिला आरक्षण की वकालत कर रहे वे, जिनके संगठन में महिलाओं की एंट्री तक नहीं!

नारी शक्ति का दोहरा चेहरा: महिला आरक्षण की वकालत कर रहे वे, जिनके संगठन में महिलाओं की एंट्री तक नहीं!-Friday World-April 19,2026 
नई दिल्ली: संसद में महिला आरक्षण से जुड़े संशोधन विधेयकों पर बहस के दौरान वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष ने भाजपा और आरएसएस पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा, “महिला आरक्षण की बात वो लोग कर रहे हैं जिनके संगठन में महिलाओं की कोई एंट्री ही नहीं है। गजब हिप्पोक्रेसी है?” 

आशुतोष ने आरोप लगाया कि जहां आरएसएस जैसे संगठनों में महिलाओं को शाखाओं में शामिल होने की अनुमति नहीं है, वहीं भाजपा महिला सशक्तिकरण और आरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें कर रही है। उनका यह बयान संसद की बहस के बीच आया, जब महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को लागू करने और उससे जुड़े परिसीमन व अन्य संशोधनों पर चर्चा हो रही थी।

आशुतोष का तीखा आरोप और संदर्भ

आशुतोष ने कहा कि आरएसएस का मूल संगठन पुरुष-केंद्रित है। महिलाओं के लिए अलग से राष्ट्र सेविका समिति (Rashtra Sevika Samiti) है, जो 1936 में स्थापित हुई, लेकिन मुख्य आरएसएस शाखाओं (शाखाओं) में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती। उन्होंने इसे हिप्पोक्रेसी करार दिया कि जो संगठन अपनी आंतरिक संरचना में महिलाओं को समान स्थान नहीं देता, वह देश की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण की वकालत कैसे कर सकता है?

यह बयान ऐसे समय में आया जब संसद में महिला आरक्षण अधिनियम 2023 को पूरी तरह लागू करने के लिए तकनीकी अधिसूचना जारी की गई है। 16 अप्रैल 2026 को कानून मंत्रालय ने अधिसूचना जारी कर 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम (Nari Shakti Vandan Adhiniyam) लागू कर दिया। हालांकि, वास्तविक आरक्षण का क्रियान्वयन जनगणना और परिसीमन के बाद, संभवतः 2029 के आसपास ही हो पाएगा।

महिला आरक्षण अधिनियम क्या कहता है?

2023 में पारित यह ऐतिहासिक संविधान संशोधन (106वां संशोधन) लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित करता है। यह आरक्षण अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा। आरक्षण 15 साल के लिए होगा, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है।

सरकार का दावा है कि यह महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेताओं ने इसे नारी शक्ति का सम्मान बताया। लेकिन विपक्षी नेता और आशुतोष जैसे कमेंटेटर इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं।

 आरएसएस की संरचना: महिलाओं की भूमिका क्या है?

आरएसएस की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 1925 में स्थापित इस संगठन का मूल फोकस पुरुष स्वयंसेवकों (स्वयंसेवक) पर है। महिलाएं मुख्य आरएसएस शाखाओं में नहीं शामिल हो सकतीं। इसके बजाय, महिलाओं के लिए अलग स्वतंत्र संगठन **राष्ट्र सेविका समिति** काम करता है, जिसमें हजारों सेविकाएं सक्रिय हैं। समिति की अपनी शाखाएं, प्रचारिकाएं और कार्यक्रम हैं, जो महिला सशक्तिकरण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक गतिविधियों पर केंद्रित हैं।

आरएसएस के अनुसार, दोनों संगठन समान विचारधारा वाले हैं लेकिन अलग-अलग संचालित होते हैं। समिति की प्रचारिकाएं आजीवन समर्पण करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे आरएसएस के प्रचारक। समिति के पास 55,000 से ज्यादा सेविकाएं और 2,700 से अधिक शाखाएं बताई जाती हैं।

आरएसएस के आलोचक कहते हैं कि मुख्य संगठन में महिलाओं की अनुपस्थिति पुरानी मानसिकता को दर्शाती है। जबकि समर्थक तर्क देते हैं कि अलग संगठन महिलाओं को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार काम करने की स्वतंत्रता देता है। हाल के वर्षों में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने महिला सशक्तिकरण पर कई बार बात की है, लेकिन मुख्य शाखाओं में महिलाओं की एंट्री पर अभी कोई आधिकारिक बदलाव नहीं हुआ है।

 हिप्पोक्रेसी का मुद्दा: दोनों पक्षों की सच्चाई

आशुतोष का आरोप सिर्फ आरएसएस-भाजपा तक सीमित नहीं है। राजनीति में महिला प्रतिनिधित्व की स्थिति हर पार्टी में चिंताजनक रही है। 

- भाजपा की स्थिति: भाजपा ने कई महिला नेताओं को महत्वपूर्ण पद दिए हैं – स्मृति ईरानी, निर्मला सीतारमण, नirmala Sitharaman जैसी मंत्री, कई राज्य इकाइयों में महिला अध्यक्ष। पार्टी ने महिला आरक्षण बिल को पास कराने में सक्रिय भूमिका निभाई। लेकिन आलोचक कहते हैं कि पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर भी टॉप लीडरशिप में महिलाओं की संख्या सीमित है।

- अन्य दलों की स्थिति: कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस आदि में भी महिला टिकटों की संख्या अक्सर कम रहती है। कई क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद और पुरुष-प्रधान संस्कृति हावी है। 2023 के बिल के समय लगभग सभी दलों ने एकमत से समर्थन किया था, लेकिन अंदरूनी स्तर पर महिला उम्मीदवारों को टिकट देने में अनिच्छा दिखती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि असली बदलाव तब आएगा जब पार्टियां अपनी आंतरिक संरचनाओं में महिलाओं को ज्यादा जगह देंगी – चाहे टिकट वितरण हो या संगठनात्मक पद।

 महिला सशक्तिकरण: कानून vs वास्तविकता

महिला आरक्षण कानून एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन कई चुनौतियां बाकी हैं:

- परिसीमन का इंतजार: आरक्षण तब लागू होगा जब अगली जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होगा। इससे लोकसभा की सीटें बढ़कर 850 के आसपास हो सकती हैं।
- रोटेशन सिस्टम: आरक्षित सीटें हर चुनाव में घूमती रहेंगी, जिससे पुरुष सांसदों/विधायकों को अपनी सीट छोड़नी पड़ सकती है।
- ग्रासरूट स्तर: पंचायतों में पहले से 33-50% महिला आरक्षण है, जहां महिलाएं सक्रिय हैं, लेकिन कई जगहों पर वे प्रॉक्सी (पति या परिवार के पुरुष सदस्य) के रूप में काम करती दिखती हैं।

देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए शिक्षा, आर्थिक स्वावलंबन और सामाजिक बदलाव भी जरूरी हैं।

 बहस का बड़ा सवाल

आशुतोष का बयान राजनीतिक बहस को फिर से गरमा गया है। एक तरफ सरकार इसे महिलाओं के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि बता रही है, दूसरी तरफ विपक्ष और स्वतंत्र कमेंटेटर संगठनात्मक हिप्पोक्रेसी की बात उठा रहे हैं।

आरएसएस और भाजपा का जवाब आमतौर पर यही होता है कि उनकी विचारधारा परिवार और समाज में महिलाओं को सम्मान देती है, लेकिन आधुनिक राजनीतिक आरक्षण से अलग उनका फोकस चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक सशक्तिकरण पर है।

दूसरी ओर, आलोचक पूछते हैं – अगर आरक्षण इतना जरूरी है, तो क्यों न अपनी शाखाओं और संगठनों में पहले महिलाओं को बराबरी का स्थान दिया जाए?

 निष्कर्ष: सच्चा सशक्तिकरण कहां?

महिला आरक्षण विधेयक निस्संदेह एक सकारात्मक कदम है, जो भारतीय लोकतंत्र को ज्यादा समावेशी बना सकता है। लेकिन कानून पास करना एक बात है, उसे सही मायने में लागू करना और मानसिकता बदलना दूसरी बात। 

आशुतोष का बयान हमें याद दिलाता है कि राजनीतिक दलों को अपने घर से ही शुरुआत करनी चाहिए। जब तक संगठनात्मक स्तर पर महिलाओं को समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक बड़े-बड़े दावे सिर्फ वोट बैंक की राजनीति लगेंगे।

नारी शक्ति वाकई वंदनीय है, लेकिन उसे सिर्फ आरक्षण के जरिए नहीं, बल्कि समाज की हर संस्था में बराबरी से सम्मान देकर सच्चा रूप देना होगा। संसद की बहस जारी है, देश देख रहा है कि यह हिप्पोक्रेसी की बहस कहां तक जाती है और असली सशक्तिकरण की राह कितनी लंबी है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 19,2026