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इम्फाल/चुराचांदपुर, २१ अप्रैल २०२६: भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर पिछले तीन वर्षों से भयानक जातीय हिंसा की आग में जल रहा है। मई २०२३ में शुरू हुई मैतीई और कुकी-जो समुदायों के बीच संघर्ष आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब तक २६० से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि ६०,००० से ज्यादा लोग बेघर होकर राहत शिविरों में जीवन गुजार रहे हैं। दोनों तरफ से घातक हथियारों का इस्तेमाल हो रहा है, गांव जलाए जा रहे हैं और महिलाओं के साथ हुए अपराध इतने घिनौने हैं कि उनका वर्णन भी मुश्किल है।
लेकिन देश की मुख्यधारा की मीडिया (जिसे कई लोग ‘गोदी मीडिया’ कहते हैं) इस मानवीय संकट को लगातार नजरअंदाज कर रही है। जबकि सोशल मीडिया और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में मणिपुर की तस्वीरें बार-बार वायरल हो रही हैं – जलते घर, रोते बच्चे, बेघर परिवार और सुरक्षा बलों की तैनाती। सवाल उठता है: क्या भाजपा शासित केंद्र और राज्य सरकार की छवि बचाने के लिए मणिपुर की खबरों को दबाया जा रहा है?
हिंसा की शुरुआत और जड़ें
३ मई २०२३ को मणिपुर में ट्राइबल सॉलिडैरिटी मार्च के दौरान हिंसा भड़की। मुख्य मुद्दा था – मेइती समुदाय (जो राज्य की आबादी का बहुमत है और इम्फाल घाटी में रहता है) का अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा मांगना। कुकी-जो समुदाय (जो पहाड़ी इलाकों में रहता है) ने इसका विरोध किया। इससे दोनों समुदायों के बीच गहरी खाई पैदा हो गई।
हिंसा तेजी से फैली। मेइती भीड़ ने कुकी गांवों पर हमले किए, घरों और चर्चों को आग के हवाले किया। वहीं कुकी समुदायों से भी जवाबी कार्रवाई हुई। दोनों तरफ से हथियारबंद समूह सक्रिय हो गए। परिणामस्वरूप राज्य दो हिस्सों में बंट गया – घाटी मेइती-बहुल और पहाड़ी इलाके कुकी-बहुल।
आंकड़े बोलते हैं:
- मौतें: आधिकारिक रूप से २५८ (नवंबर २०२४ तक), बाद में और बढ़कर २६०+।
- विस्थापित: ६०,००० से अधिक लोग ३५०+ राहत शिविरों में।
- संपत्ति क्षति: हजारों घर, चर्च और स्कूल जलाए गए।
- अप्रैल २०२६ में भी ताजा हिंसा: बिश्नुपुर में बच्चों की मौत, इम्फाल घाटी में कर्फ्यू और इंटरनेट बंदी।
महिलाओं पर अत्याचार: शर्मनाक अध्याय
मणिपुर हिंसा का सबसे काला पहलू महिलाओं और लड़कियों पर हुए जघन्य अपराध हैं। मई २०२३ में दो कुकी महिलाओं को नंगी घुमाने और गैंगरेप का वीडियो वायरल होने के बाद पूरे देश में सनसनी फैली। सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच के आदेश दिए।
कई रिपोर्ट्स में बताया गया कि महिलाओं को घरों से घसीटकर, बलात्कार कर हत्या की गई। कुछ शवों को जला दिया गया। २०२६ में भी एक २० वर्षीय कुकी-जो महिला की मौत हुई, जिसे २०२३ में गैंगरेप किया गया था। वह दो साल तक इलाज कराती रही लेकिन ट्रॉमा से उबर नहीं पाई। कुकी संगठनों ने २९ से ज्यादा महिलाओं की हत्या और यौन हिंसा के मामलों का जिक्र किया है।
ये अपराध दोनों तरफ से हुए, लेकिन पैमाना और प्रकृति ने पूरे देश को झकझोर दिया। मानवाधिकार संगठनों ने दोनों समुदायों पर आरोप लगाए, लेकिन न्याय की प्रक्रिया बेहद धीमी रही।
‘गोदी मीडिया’ का सन्नाटा
हिंसा शुरू होने के पहले २-३ महीनों में राष्ट्रीय टीवी चैनल और बड़े अखबारों ने मणिपुर को लगभग अनदेखा कर दिया। जब महिलाओं का वीडियो वायरल हुआ तब जाकर कुछ कवरेज शुरू हुआ।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट में स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया पर “एकतरफा” और “बायस्ड” होने का आरोप लगाया गया। रिपोर्ट के बाद मणिपुर पुलिस ने एडिटर्स गिल्ड के सदस्यों पर केस दर्ज कर दिए। कई पत्रकारों का कहना है कि घाटी (इम्फाल) के मीडिया को “मेइती मीडिया” कहा जाने लगा, जबकि पहाड़ी इलाकों की खबरें दबाई जा रही थीं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया (BBC, Reuters, Human Rights Watch) ने लगातार रिपोर्टिंग की, लेकिन भारतीय मुख्यधारा ने “राष्ट्रीय एकता” और “सकारात्मक खबरें” के नाम पर इस संकट को पीछे धकेल दिया। सोशल मीडिया पर तस्वीरें और वीडियो वायरल होते रहे, लेकिन टीवी पर बहस कम ही हुई।
वर्तमान स्थिति (अप्रैल २०२६)
- फरवरी २०२६ में राष्ट्रपति शासन हटाकर नया भाजपा नेतृत्व वाला सरकार बनी। नए मुख्यमंत्री ने दोनों समुदायों से बातचीत शुरू की।
- मार्च २०२६ में मेइती और कुकी-जो प्रतिनिधियों के बीच पहली सीधी बैठक हुई, लेकिन मूल मुद्दे (जमीन, ST दर्जा, विस्थापितों की वापसी, न्याय) अनसुलझे हैं।
- अप्रैल २०२६ में फिर हिंसा भड़की – बच्चों की मौत, विरोध प्रदर्शन, कर्फ्यू और इंटरनेट बंदी।
- राज्य अभी भी विभाजित है। लोग अलग-अलग इलाकों में रह रहे हैं। राहत शिविरों में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की भारी कमी है।
प्रभाव और सवाल
मणिपुर की हिंसा ने पूरे उत्तर-पूर्व को प्रभावित किया। अर्थव्यवस्था ठप, शिक्षा बाधित, युवा निराश। सीमा क्षेत्र होने के कारण म्यांमार से हथियारों की तस्करी और विदेशी तत्वों की भूमिका पर भी सवाल उठे।
सबसे बड़ा सवाल है – क्या केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन ने समय पर कार्रवाई की? क्या सेना और अर्धसैनिक बल पर्याप्त थे? और सबसे महत्वपूर्ण – क्या मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी निभाई?
दोनों समुदायों के लोग पीड़ित हैं। मेइती कहते हैं कि कुकी उग्रवादी हमले कर रहे हैं। कुकी कहते हैं कि मेइती भीड़ और सुरक्षा बल पक्षपाती हैं। हकीकत यह है कि आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
आगे का रास्ता
शांति के लिए जरूरी है:
- दोनों समुदायों के बीच विश्वास बहाली
- सभी अपराधों की निष्पक्ष CBI जांच और जल्द मुकदमे
- विस्थापितों की सुरक्षित वापसी और पुनर्वास
- विकास कार्यों में तेजी
- मीडिया की जिम्मेदार रिपोर्टिंग
मणिपुर भारत का अभिन्न अंग है। यहां की पीड़ा पूरे देश की पीड़ा है। इसे दबाकर या अनदेखा करके समस्या हल नहीं होगी। जरूरत है खुली चर्चा, न्याय और समावेशी विकास की।
जब तक मणिपुर की आग बुझ नहीं जाती, भारत की लोकतांत्रिक छवि पर सवाल उठते रहेंगे। ताजा तस्वीरें हमें याद दिलाती हैं कि शांति की राह अभी लंबी है – और चुप्पी इसका समाधान नहीं है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 21,2026