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Tuesday, 21 April 2026

सुरत का अनोखा ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ स्टेशन: 3-5 किलोमीटर लंबी कतार, २४ घंटे की प्रतीक्षा… फिर भी भारतीय मीडिया ‘मौन’! विदेशी चैनलों पर बार-बार लाठीचार्ज और लाइन की तस्वीरें

सुरत का अनोखा ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ स्टेशन: 3-5 किलोमीटर लंबी कतार, २४ घंटे की प्रतीक्षा… फिर भी भारतीय मीडिया ‘मौन’! विदेशी चैनलों पर बार-बार लाठीचार्ज और लाइन की तस्वीरें
-Friday World-April 21,2026 
सूरत/उधना, 21 अप्रैल 2026: गुजरात के सूरत शहर में बने उधना रेलवे स्टेशन ने इन दिनों एक ऐसा ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बना दिया है, जिसे देखकर हर कोई हैरान है। ट्रेन पकड़ने के लिए स्टेशन के बाहर ३ से ५ किलोमीटर तक लंबी कतारें लगी हुई हैं। लोग १४ से १६ घंटे, कुछ तो पिछले २४ घंटे से भी ज्यादा समय से खड़े हैं। गर्मी ४० डिग्री के पार, बच्चों-बुजुर्गों के साथ महिलाएं और मज़दूर पसीने में भीगते हुए, पानी की एक बूंद के लिए तरसते हुए… लेकिन भारतीय मीडिया इस भयानक भीड़ को नज़रअंदाज कर रहा है। वहीं विदेशी मीडिया (BBC, Reuters समेत कई अंतरराष्ट्रीय चैनल) इसे बार-बार दिखा रहा है – लाठीचार्ज की तस्वीरें, रोते बच्चे, धक्का-मुक्की और हताश यात्रियों की कहानियां।

ट्रेन के लिए इतनी लंबी लाइन आपने कभी नहीं देखी होगी!

 क्या हुआ उधना स्टेशन पर?
१९ अप्रैल २०२६ (रविवार) को उधना जंक्शन रेलवे स्टेशन पर अचानक हज़ारों प्रवासी मज़दूर जमा हो गए। ज्यादातर उत्तर प्रदेश और बिहार के, जो सूरत के टेक्सटाइल और डायमंड उद्योग में काम करते हैं। गर्मी की छुट्टियों की शुरुआत, उद्योग में मंदी और एलपीजी संकट के कारण लोग घर वापस लौटना चाहते थे। 

रेलवे ने तीन स्पेशल अनारक्षित ट्रेनें चलाई थीं, लेकिन क्षमता सिर्फ १५००-२००० यात्रियों की थी। नतीजा? स्टेशन के प्लेटफॉर्म, वेटिंग एरिया और बाहर सड़क तक २२,००० से ज्यादा लोग जमा हो गए। कतारें स्टेशन से बाहर २ से ५ किलोमीटर तक फैल गईं। कुछ यात्रियों ने बताया, “मैं कल रात ८ बजे से लाइन में खड़ा हूं। परिवार के साथ खड़े-खड़े पैर सूज गए, लेकिन जगह नहीं मिल रही।”

गर्मी में बच्चे बेहोश हो रहे थे, बुजुर्गों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। खाने-पीने की कोई व्यवस्था नहीं। पानी की बोतलें खत्म, शौचालयों की लाइन भी घंटों लंबी। स्थिति बेकाबू होते ही पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। वीडियो में दिखा कि लोग रेलिंग फांदकर भाग रहे थे। एक यात्री ने कैमरे के सामने भावुक होकर कहा, “अब मैं दोबारा सूरत नहीं आऊंगा दोस्त… ये क्या हालत है!”

 रेलवे का दावा vs हकीकत
वेस्टर्न रेलवे ने बयान जारी कर कहा – “कोई स्टैंपेड नहीं हुआ, सब नियंत्रण में है। २३,००० से ज्यादा यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाया गया।” स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं। लेकिन यात्री कह रहे हैं कि ये आंकड़े हकीकत से कोसों दूर हैं। 

एक यात्री शोभित तांती (दर्भंगा, बिहार) ने बताया, “१५ घंटे धूप में खड़े रहने के बाद भी जगह नहीं मिली। सरकार को इस समस्या पर ध्यान देना चाहिए।” कई परिवार रात भर स्टेशन पर सोए रहे। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ड्रोन शॉट्स से दिखा कि स्टेशन के बाहर सड़क पूरी तरह कतारों से भर गई थी।

 क्यों भारतीय मीडिया ने अनदेखा किया?
यह सवाल सबसे बड़ा है। देश के बड़े समाचार चैनल और अखबार इस घटना को छोटी-मोटी खबर मानकर नजरअंदाज कर रहे हैं। जबकि विदेशी मीडिया इसे “भारत के प्रवासी संकट” की मिसाल बता रहा है। BBC World Service ने शॉर्ट वीडियो में दिखाया – “सूरत स्टेशन पर १२ घंटे की प्रतीक्षा, माइग्रेंट वर्कर्स की दुर्दशा”। अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स पर यह खबर ट्रेंड कर रही है।

क्या कारण है? शायद चुनावी मौसम, सरकारी दबाव या फिर “सकारात्मक खबरें” दिखाने का ट्रेंड। लेकिन हकीकत यह है कि सूरत जैसे औद्योगिक शहर में लाखों मज़दूर रोजगार के लिए आते हैं। जब वे वापस जाते हैं तो बुनियादी सुविधाओं का अभाव उनकी पीड़ा बढ़ा देता है।

 पृष्ठभूमि: सूरत का माइग्रेंट संकट
सूरत गुजरात का ‘डायमंड सिटी’ और टेक्सटाइल हब है। यहां उत्तर भारत से लाखों मज़दूर काम करते हैं। गर्मियों में छुट्टियां, बच्चों की पढ़ाई और उद्योग में मंदी (एलपीजी संकट भी एक वजह) के कारण घर वापसी का सिलसिला शुरू हो जाता है। पिछले साल भी इसी तरह की भीड़ देखी गई थी, लेकिन इस बार रिकॉर्ड स्तर पर।

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही हैं, लेकिन मांग इतनी ज्यादा है कि व्यवस्था चरमरा रही है। यात्री मांग कर रहे हैं – 
- ज्यादा स्पेशल ट्रेनें
- बेहतर कतार प्रबंधन
- पानी, छाया और मेडिकल सुविधा
- अनारक्षित कोचों की संख्या बढ़ाना

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
रेलवे विशेषज्ञों का मानना है कि उधना स्टेशन की क्षमता सीमित है। नया आधुनिक स्टेशन बनाने की बातें चल रही हैं, लेकिन फिलहाल पुरानी व्यवस्था ही है। माइग्रेंट राइट्स एक्टिविस्ट कहते हैं, “ये सिर्फ एक स्टेशन की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश की माइग्रेंट पॉलिसी की नाकामी है। लाखों लोग बिना सुविधा के यात्रा करते हैं।”

 आगे क्या?
अभी भी स्टेशन पर भीड़ बनी हुई है। रेलवे ने अतिरिक्त ट्रेनों का ऐलान किया है, लेकिन यात्री कह रहे हैं कि “देखते हैं कब असर दिखता है”। इस घटना ने एक बार फिर सवाल उठाया है – क्या हमारी रेलवे व्यवस्था २१वीं सदी के भारत के अनुरूप है? क्या मज़दूरों की पीड़ा को सिर्फ वीडियो बनाकर भुला दिया जाएगा?

 सूरत के उधना रेलवे स्टेशन ने एक ऐसा ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड’ बनाया है जो गर्व की बजाय चिंता का विषय है। ३-५ किलोमीटर लंबी कतार, २४ घंटे की प्रतीक्षा, लाठीचार्ज और हताश यात्रियों की कहानियां… ये तस्वीरें भारत की विकास यात्रा में एक काली छाया हैं। विदेशी मीडिया इसे दिखा रहा है, भारतीय मीडिया चुप है। अब समय आ गया है कि सरकार और रेलवे इस समस्या को गंभीरता से लें। ताकि अगली बार कोई यात्री यह न कहे – “अब मैं दोबारा नहीं आऊंगा!”

यह घटना हमें याद दिलाती है कि विकास तभी सार्थक है जब आम आदमी, खासकर प्रवासी मज़दूर, उसका फायदा उठा सके। उधना स्टेशन की यह तस्वीर सिर्फ एक स्टेशन की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कहानी बयां करती है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 21,2026