युद्ध की आग से लेकर आज तक ईरान ने हर मोर्चे पर एक अनुशासित और कनसिस्टेंट रणनीति दिखाई है, जबकि अमेरिका बार-बार अपनी नीतियों में उलट-फेर करता रहा है। ब्लॉकेड के दौर में भी ईरान ने जस-की-तस जवाबी कार्रवाई की। अमेरिका ने दो जहाज पकड़े, तो ईरान ने भी दो जहाजों को अपने कब्जे में ले लिया। हिसाब बराबर। यह संतुलन ईरान की मजबूती और अमेरिका की हताशा को साफ दर्शाता है।
ट्रंप प्रशासन को शुरू से ही यह भ्रम था कि नौसैनिक ब्लॉकेड और दबाव डालकर ईरान को वार्ता की मेज पर लाया जा सकता है और अपनी शर्तें मनवाई जा सकती हैं। लेकिन हकीकत उल्टी निकली। ईरान वार्ता के लिए तैयार था, लेकिन ब्लॉकेड ने उसे और सख्त बना दिया। अब तेहरान में यह आवाज और तेज हो रही है कि जो चीज अमेरिका युद्ध के मैदान में हासिल नहीं कर सका, उसे वार्ता के जरिए हासिल करने की कोशिश कर रहा है। जबकि युद्ध में ईरान ने अपनी रक्षा क्षमता साबित की और अब अमेरिका को ईरान की मुख्य शर्तें—ब्लॉकेड हटाना, प्रतिबंधों में राहत और क्षेत्रीय सुरक्षा की गारंटी—माननी पड़ेंगी।
अमेरिकी मीडिया का नया सुर्रा: ईरान में ‘दो धड़े’ और तख्तापलट की अफवाहें
अमेरिकी मीडिया, खासकर फॉक्स न्यूज जैसे चैनलों ने हाल के दिनों में एक नया नैरेटिव गढ़ा है। चार-पांच दिन पहले विदेश मंत्री अब्बास अराकची के हॉर्मुज स्ट्रेट खोलने वाले ट्वीट के बाद व्हाइट हाउस के इशारे पर चर्चा शुरू हुई कि ईरान दो धड़ों में बंट गया है—एक वार्ता के पक्ष में और दूसरा उसके खिलाफ। कुछ ‘एक्सपर्ट्स’ तो यहां तक कह रहे हैं कि तेहरान में तख्तापलट होने वाला है। कई अमेरिकी ऐंकरों को यह भी समझ नहीं आ रहा कि ईरान को आखिर चला कौन रहा है!
इसी क्रम में एक रिटायर्ड भारतीय जनरल ने कहा कि ईरान में अभी मोहम्मद बागेर कालिबाफ ही सरकार चला रहे हैं। वजह? क्योंकि कालिबाफ इस्लामाबाद वार्ता दल के प्रमुख थे। लेकिन ये विश्लेषक यह भूल जाते हैं कि कालिबाफ को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (SNSC) ने ही वार्ता दल का अध्यक्ष नियुक्त किया था। इसलिए इस्लामाबाद में ईरान की अगुवाई करना उनका आधिकारिक दायित्व था, न कि कोई व्यक्तिगत या ‘सरकार चलाने’ वाला रोल।
इसी तर्ज पर कुछ लोग यह दावा करने लगे हैं कि अब ईरान को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) चला रहा है। सही है कि युद्ध के बाद IRGC की भूमिका और मजबूत हुई है—जैसा कि हर देश में युद्ध की स्थिति में होता है। लेकिन IRGC के प्रतिनिधि भी SNSC के सदस्य हैं और सारे फैसले वहीं सामूहिक रूप से होते हैं। तख्तापलट की बातें बेबुनियाद हैं। अगर ऐसा होना होता, तो अमेरिकी-इजरायली हमलों के शुरुआती दिनों में ही हो जाता। उल्टा, युद्ध के बाद ईरान में मौजूदा सरकार और लीडरशिप को अभूतपूर्व जनसमर्थन मिला है। ट्रंप और उनके समर्थक इसी भ्रम और ‘सुर्रे’ में उलझे हुए हैं।
ब्लॉकेड का खेल और हॉर्मुज का संकट
हालिया घटनाक्रम इस तनाव को और स्पष्ट करते हैं। अमेरिका ने इस्लामाबाद वार्ता के फेल होने के बाद हॉर्मुज स्ट्रेट पर नौसैनिक ब्लॉकेड लगा दिया। ईरान ने जवाब में स्ट्रेट को नियंत्रित किया और कुछ जहाजों को अपने कब्जे में लिया। अराकची के ट्वीट में स्ट्रेट को कमर्शियल जहाजों के लिए खोलने की घोषणा के बाद ट्रंप ने इसे अपनी जीत बताने की कोशिश की, लेकिन ब्लॉकेड जारी रखा। ईरान के स्टेट मीडिया ने इस ट्वीट की आलोचना की और कहा कि इससे भ्रम पैदा हुआ तथा ट्रंप को ‘विक्ट्री’ क्लेम करने का मौका मिला।
IRGC ने जवाबी कार्रवाई में दो जहाजों (MSC Francesca और Epaminondas) को जब्त कर लिया। अमेरिका ने भी ईरानी जहाजों को रोका और कुछ को जब्त किया। ईरान इसे ‘सीजफायर वॉयलेशन’ बता रहा है, जबकि अमेरिका कह रहा है कि ब्लॉकेड तब तक रहेगा जब तक ‘ट्रांजैक्शन’ पूरा नहीं हो जाता। दुनिया भर की अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिखने लगा है—तेल की कीमतें अस्थिर, शिपिंग रूट प्रभावित और वैश्विक सप्लाई चेन में चरमराहट।
ट्रंप के आसपास की टीम मूर्खों की मंडली साबित हो रही है। उन्हें लगा था कि दबाव से ईरान झुक जाएगा, लेकिन ईरान ने अपने तेवर और कड़े कर लिए। अब ईरान युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार बैठा है, जबकि दबाव अमेरिका पर बढ़ रहा है। ट्रंप का आखिरी दांव—ब्लॉकेड—भी बेकार साबित हो रहा है। युद्ध लड़ने की क्षमता उन्होंने पहले ही खो दी, अब आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चे पर भी हार का सामना है।
वास्तविकता: ईरान की एकता और अमेरिका की दुविधा
ईरान में कोई तख्तापलट या गहरा विभाजन नहीं है। SNSC में IRGC, सरकार और अन्य हितधारक सामूहिक फैसले लेते हैं। कालिबाफ जैसे नेता वार्ता दल का हिस्सा थे, लेकिन फैसले सामूहिक हैं। युद्ध ने ईरान को और मजबूत बनाया है—जनता का समर्थन बढ़ा है, रक्षा क्षमता साबित हुई है और क्षेत्रीय प्रभाव बरकरार है।
दूसरी ओर, अमेरिका अपनी इनकनसिस्टेंट पॉलिसी से उलझा हुआ है। ट्रंप कभी रिजीम चेंज की बात करते हैं, कभी न्यूक्लियर डील, कभी सिर्फ हॉर्मुज खुलवाना। वार्ता की पेशकश करते हैं, लेकिन ब्लॉकेड हटाने से इनकार। यह अस्थिरता न सिर्फ ईरान के साथ, बल्कि वैश्विक सहयोगियों के साथ भी अमेरिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा रही है।
ईरान का संदेश साफ है—अच्छे इरादे अच्छे जवाब देते हैं, दुश्मनी दुश्मनी पैदा करती है। ब्लॉकेड हटाओ, सही वार्ता करो, वरना ईरान तैयार है। ट्रंप की मदहोशी में अल्ल-बल्ल बयानबाजी अब काम नहीं आ रही। दुनिया देख रही है कि युद्ध ईरान ने नहीं हारा—उसने अपनी इज्जत और रणनीतिक स्थिति बचाई है। अब अमेरिका को वास्तविकता स्वीकार करनी होगी।
ईरान की यह अटलता न सिर्फ उसके लोगों की एकता को दिखाती है, बल्कि यह भी साबित करती है कि दबाव और ब्लॉकेड से कोई राष्ट्र नहीं झुकता, खासकर जब वह अपनी जमीन, अपनी सुरक्षा और अपनी गरिमा के लिए लड़ रहा हो। ट्रंप की मंडली को अब समझ आना चाहिए—ईरान जस-का-तस है, लेकिन अमेरिका की नीतियां हर रोज बदल रही हैं। अंत में, इतिहास गवाह है कि जो पक्ष सच्चाई और संकल्प पर खड़ा होता है, वही टिकता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 25,2026