-Friday World-April 29,2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के दूसरे चरण में फाल्टा (दक्षिण 24 परगना) एक बार फिर सुर्खियों में है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने गंभीर आरोप लगाया है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) ने महिलाओं को मतदान करने से रोकने के लिए लाठीचार्ज किया और उनके साथ बदसलूकी की। ममता बनर्जी समर्थक इसे “महिलाओं पर साजिश” और “बेशर्मी की हद” बता रहे हैं। वहीं, भाजपा का दावा है कि फाल्टा में टीएमसी कार्यकर्ता EVM बटन पर टेप लगाकर धांधली कर रहे थे, जिसके कारण मतदान रोकना पड़ा।
यह विवाद बंगाल की चुनावी राजनीति की जटिलता को उजागर करता है — जहां हर घटना को पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी व्याख्या देता है।
फाल्टा की घटना: क्या हुआ?
29 अप्रैल 2026 को दूसरे चरण के मतदान के दौरान फाल्टा विधानसभा क्षेत्र में तनाव बढ़ गया। टीएमसी ने आरोप लगाया कि केंद्रीय बलों ने महिला मतदाताओं पर लाठीचार्ज किया, उन्हें धक्का-मुक्की दी और मतदान केंद्रों से दूर हटाया। कुछ वीडियो और तस्वीरों में महिलाओं की कतारें और सुरक्षा बलों के साथ झड़प दिखाई दे रही है। ममता बनर्जी ने इसे “बाहरी ताकतों द्वारा महिलाओं पर अत्याचार” बताया और कहा कि भाजपा केंद्रीय बलों का दुरुपयोग कर रही है।
दूसरी ओर, भाजपा नेता अमित मालवीय और स्थानीय उम्मीदवार देबांशु पांडा ने आरोप लगाया कि कई बूथों पर EVM में भाजपा के बटन पर टेप लगाया गया था, जिससे मतदाता अपनी पसंद नहीं डाल पा रहे थे। इसे “डायमंड हार्बर मॉडल” कहा गया। चुनाव आयोग (ECI) ने इन आरोपों पर संज्ञान लिया और कहा कि अगर टेपिंग साबित होती है तो प्रभावित बूथों पर रिपोलिंग होगी। कुछ बूथों पर मतदान अस्थायी रूप से रोक भी दिया गया।
यह दोनों आरोप एक-दूसरे के विपरीत हैं। एक तरफ महिलाओं को मतदान से रोकने का मामला, दूसरी तरफ EVM में गड़बड़ी का। बंगाल में पिछले कई चुनावों की तरह इस बार भी हिंसा, धांधली और वोटर इंटिमिडेशन के आरोप आम हैं।
बंगाल चुनावों में महिलाओं की भूमिका
पश्चिम बंगाल में महिलाएं निर्णायक मतदाता रही हैं। ममता बनर्जी की सरकार ने **लक्ष्मीर भंडार**, कन्याश्री, रूपश्री जैसी योजनाओं के जरिए करोड़ों महिलाओं को सीधा लाभ पहुंचाया है। परिणामस्वरूप, महिला मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा टीएमसी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ माना जाता है।
भाजपा इस बार महिला सुरक्षा, घुसपैठ रोकने और “दीदी के गुंडों” से मुक्ति का मुद्दा उठा रही है। अमित शाह ने कहा था कि चुनाव के बाद भी 60 दिनों तक केंद्रीय बल बंगाल में रहेंगे, ताकि मतदाता बिना डर के अपनी पसंद बता सकें। केंद्रीय बलों की भारी तैनाती (लगभग 2.5 लाख जवान) का मकसद शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करना था, लेकिन टीएमसी इसे “वोटर दमन” बता रही है।
फाल्टा जैसी घटनाएं इस तनाव को बढ़ाती हैं। अगर महिलाओं को वास्तव में मतदान से रोका गया, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। लेकिन अगर सुरक्षा बलों ने केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई की, तो इसे “साजिश” कहना भी अतिशयोक्ति हो सकती है।
क्या जीत “कमीनेपन” की होगी?
आपके शब्दों में — अगर ऐसे हथकंडों से भाजपा जीत गई तो यह “कमीनेपन की जीत” होगी। यह भावना कई टीएमसी समर्थकों में है। वे कहते हैं कि केंद्र सरकार ने राज्यपाल, ED, CBI, IT, सुप्रीम कोर्ट और अब केंद्रीय बलों तक सब कुछ उतार दिया है। फिर भी ममता की लोकप्रियता और महिला-मुस्लिम वोट बैंक उन्हें टिकाए हुए है।
लेकिन राजनीति का गणित सरल नहीं है।
- टीएमसी का पक्ष: केंद्रीय बल भाजपा के इशारे पर काम कर रहे हैं। महिलाओं और अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा है। 15 साल की सत्ता में ममता ने बंगाल की “अस्मित” बचाई है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों की शिकायतों पर कार्रवाई शुरू की है — कुछ अधिकारियों का ट्रांसफर हुआ, रिपोलिंग की बात कही गई। लेकिन विश्वास की कमी गहरी है।
बंगाल की चुनावी संस्कृति: हिंसा और आरोपों का चक्र
बंगाल चुनाव लंबे समय से हिंसा, बूथ कैप्चरिंग और वोटर इंटिमिडेशन के लिए बदनाम रहे हैं। 2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथी शासन का अंत “परिवर्तन” के नाम पर किया।
2026 के चुनाव में भाजपा ने अभूतपूर्व तैयारी की है — बूथ स्तर पर संगठन, हिंदू वोट कंसोलिडेशन और विकास के मुद्दे। वहीं टीएमसी अपनी “महिला सशक्तिकरण” और क्षेत्रीय गर्व की राजनीति पर निर्भर है।
फाल्टा की घटना इसी ध्रुवीकरण का नतीजा है। जहां एक तरफ महिलाएं वोट डालने कतार में खड़ी हैं (जैसी तस्वीरें वायरल हो रही हैं), वहीं सुरक्षा बल और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो रही है।
लोकतंत्र की सच्ची परीक्षा
महिलाओं को मतदान से रोकना, चाहे कोई भी पक्ष करे, निंदनीय है। लोकतंत्र में हर वयस्क नागरिक का वोट डालने का अधिकार पवित्र है। अगर केंद्रीय बलों ने अत्यधिक बल प्रयोग किया, तो उसकी जांच होनी चाहिए। अगर टीएमसी ने EVM में छेड़छाड़ की कोशिश की, तो वह भी गंभीर अपराध है।
चुनाव आयोग, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की निगरानी कर रहे हैं। लेकिन अंतिम फैसला मतदाता करेंगे।
अगर भाजपा जीतती है, तो कई लोग इसे “केंद्रीय ताकत” की जीत कहेंगे। अगर ममता की टीएमसी फिर सत्ता में आती है, तो इसे “32% मुस्लिम + महिला वोट बैंक” की ताकत माना जाएगा। लेकिन सच्चाई यह है कि बंगाल की जनता थक चुकी है — हिंसा, आरोप-प्रत्यारोप और डर के माहौल से।
फाल्टा की घटना बंगाल चुनाव 2026 की एक छोटी सी कड़ी है, लेकिन यह बड़े सवाल उठाती है — क्या हम निष्पक्ष, भयमुक्त चुनाव करा पा रहे हैं? महिलाओं की सुरक्षा और उनकी वोटिंग अधिकार दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
“साजिश” या “कमीनेपन” के आरोप आसान हैं, लेकिन समाधान कठिन। जरूरत है स्वतंत्र जांच की, वीडियो फुटेज की पारदर्शी समीक्षा की और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की — चाहे वह किसी भी पार्टी से हो।
बंगाल की मिट्टी लोकतंत्र की परीक्षा दे रही है। 2026 के नतीजे बताएंगे कि यहां की जनता ने किसकी “साजिश” को नकारा और किसकी “सेवा” को चुना।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 29,2026