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Wednesday, 29 April 2026

ममता बनर्जी की सत्ता: बंगाल की 'ट्रिपल एम' रणनीति और राष्ट्रीय विपक्ष की कीमत

ममता बनर्जी की सत्ता: बंगाल की 'ट्रिपल एम' रणनीति और राष्ट्रीय विपक्ष की कीमत
-Friday World-April 29,2026 
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 अपने चरम पर है। ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता बचाने की जंग लड़ रही हैं, जबकि भाजपा 'अबकी बार बंगाल' का नारा लेकर पूरी ताकत झोंक रही है। केंद्रीय एजेंसियां, राज्यपाल, चुनाव आयोग और न्यायपालिका की कड़ी नजर के बावजूद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) अपनी जड़ें मजबूत रखे हुए है। लेकिन सवाल उठता है — क्या यह जीत ममता की लोकप्रियता का प्रमाण होगी, या फिर क्षेत्रीय सत्ता के संकीर्ण गणित की?

बंगाल में टीएमसी की रणनीति को 'ट्रिपल एम' कहा जा रहा है — ममता (नेतृत्व), महिला (लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाओं से दो करोड़ से ज्यादा महिला लाभार्थी) और मुस्लिम वोट बैंक। राज्य में मुस्लिम आबादी करीब 27-32% मानी जाती है। कई विश्लेषकों के अनुसार, मुस्लिम-बहुल सीटों पर टीएमसी का स्ट्राइक रेट 95% के आसपास रहा है। ममता सरकार ने इमाम-मुअज्जिन भत्ते, ओबीसी सूची में मुस्लिमों को शामिल करने जैसे कदम उठाए, जिससे अल्पसंख्यक वोट का एक बड़ा हिस्सा सॉलिडिफाई हो गया। इसके साथ ब्राह्मण और कुछ अन्य हिंदू वोटों का 15-16% जोड़कर सरकार बन जाती है।

भाजपा इस बार 'राफेल' और 'आईएनएस विक्रांत' स्तर की तैयारी के साथ मैदान में है — संगठनात्मक ताकत, आरएसएस की बूथ-लेवल माइक्रो मैनेजमेंट, हिंदू वोट कंसोलिडेशन और सीमा सुरक्षा-घुसपैठ जैसे मुद्दे। विशेष गहन समीक्षा (SIR) में लगभग 90 लाख वोटर सूची से हटाए गए, जिसमें मुस्लिमों का अनुपात अधिक बताया गया (हालांकि आंकड़े विवादित हैं)। टीएमसी इसे भाजपा-समर्थक पक्षपात बताती है।

 2024 लोकसभा चुनाव और विपक्षी एकता की खोई हुई संभावना

ममता बनर्जी पर सबसे बड़ी आलोचना 2024 के लोकसभा चुनाव को लेकर है। इंडिया गठबंधन की नींव में नीतीश कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण थी। गठबंधन को मजबूत बनाने और समन्वयक चुनने की प्रक्रिया में ममता की बैठक से जल्दी निकल जाना और बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कई विपक्षी नेताओं को नागवार गुजरा। उन्होंने कहा कि अगर ममता ने नीतीश को समन्वयक बनाने का विरोध नहीं किया होता और राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता दिखाई होती, तो मोदी सरकार को कड़ी चुनौती मिल सकती थी।

वास्तव में, टीएमसी ने बंगाल में कांग्रेस से गठबंधन तोड़ा और अकेले लड़ी। परिणामस्वरूप विपक्षी वोट बिखरा और भाजपा को फायदा हुआ। आलोचक कहते हैं कि ममता का फोकस हमेशा पश्चिम बंगाल की अपनी सत्ता पर रहा। वे अन्य विपक्षी दलों (खासकर कांग्रेस या वाम) को बंगाल में जगह नहीं देना चाहतीं, क्योंकि इससे उनका 32% मुस्लिम वोट बैंक बिखर सकता है। बंगाल में भाजपा का मजबूत होना उन्हें परोक्ष रूप से फायदेमंद लगता है — क्योंकि द्विध्रुवीय लड़ाई में अल्पसंख्यक वोट टीएमसी के पास सुरक्षित रहता है।

राष्ट्रीय राजनीति में ममता की यह 'बंगाल फर्स्ट' मानसिकता विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। जब पूरे देश में भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की जरूरत थी, तब ममता क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता देती रहीं। परिणाम — 2024 में मोदी सरकार वापस आई और अब 2026 में बंगाल में टीएमसी को अकेले ही भारी दबाव झेलना पड़ रहा है।

 ममता की उपलब्धियां और आलोचनाएं

ममता बनर्जी की ताकत उनकी घास-जड़ स्तर की राजनीति, महिला सशक्तिकरण योजनाएं और 'परिवर्तन' का नारा है। उन्होंने 34 साल के वाम शासन का अंत किया और बंगाल को नई दिशा दी। लेकिन 15 साल की सत्ता में भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, हिंसा और विकास की धीमी गति की शिकायतें भी लगातार रही हैं। राज्यपाल-टीएमसी टकराव, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में कई मामले, ED-CBI-IT की जांचें — ये सब ममता के खिलाफ केंद्र की 'राजनीतिक साजिश' के रूप में पेश किए जाते हैं, लेकिन विपक्ष इन्हें शासन की नाकामी बताता है।

भाजपा का आरोप है कि ममता सरकार घुसपैठियों को संरक्षण देती है और हिंदू वोट को नजरअंदाज करती है। वहीं टीएमसी कहती है कि भाजपा बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और संघीय ढांचे पर हमला कर रही है। चुनाव में महिलाओं की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है — लक्ष्मीर भंडार जैसी स्कीम्स ने टीएमसी को मजबूत आधार दिया है।

क्या ममता की जीत 'कमीनेपन' साबित करेगी?

आपके शब्दों में — अगर ममता जीत गईं तो कई लोगों का 'भरोसा' उठ जाएगा। क्योंकि केंद्र और राज्य की सारी ताकतें उनके खिलाफ होने के बावजूद वे टिकी हुई हैं। लेकिन राजनीति में 'कमीनेपन' या नैतिकता से ज्यादा वोटों का गणित मायने रखता है। ममता की रणनीति क्षेत्रीय है — वे जानती हैं कि राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा के लिए पहले बंगाल को संभालना जरूरी है। लेकिन इसी संकीर्ण सोच ने राष्ट्रीय विपक्ष को कमजोर किया।

अगर टीएमसी जीतती है, तो यह उनकी कुशल वोट बैंक पॉलिटिक्स, महिला योजनाओं और अल्पसंख्यक समर्थन का नतीजा होगा। लेकिन अगर हारती हैं, तो इसका बड़ा कारण उनकी खुद की राष्ट्रीय स्तर पर एकता न दिखाना भी होगा। बंगाल की लड़ाई अब सिर्फ स्थानीय नहीं रही — यह विपक्ष की रणनीति की परीक्षा भी है।

 ममता बनर्जी बंगाल की 'दिदी' हैं, लेकिन राष्ट्रीय विपक्ष के लिए वे 'अड़चन' भी साबित हुईं। उनकी सत्ता बचाना या खोना सिर्फ बंगाल का नहीं, पूरे विपक्षी राजनीति का भविष्य तय करेगा। 4 मई 2026 को वोटों की गिनती बताएगी कि क्या 'ट्रिपल एम' फॉर्मूला फिर कामयाब हुआ, या भाजपा की व्यापक तैयारी ने इतिहास रच दिया।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 29,2026