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Tuesday, 14 April 2026

भारतीय रेलवे और वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान: कांग्रेस की संस्कृति बनाम भाजपा की 'बोझ' वाली सोच

भारतीय रेलवे और वरिष्ठ नागरिकों का सम्मान: कांग्रेस की संस्कृति बनाम भाजपा की 'बोझ' वाली सोच
-Friday World-April 15,2026 
भारतीय संस्कृति में वरिष्ठ नागरिकों को 'बुज़ुर्ग' कहा जाता है, जो परिवार और समाज के स्तंभ होते हैं। वे अनुभव के खजाने हैं, जिन्होंने देश की नींव रखी। प्राचीन काल से ही हमारी परंपरा में elders का सम्मान करना, उनकी सुविधा सुनिश्चित करना भारतीय मूल्यों का अभिन्न अंग रहा है। लेकिन आज की राजनीति में यह सम्मान कहाँ खो गया है? एक तरफ कांग्रेस सरकारें थीं, जिन्होंने रेलवे में 60 वर्ष से अधिक उम्र के नागरिकों को सीनियर सिटीजन मानते हुए टिकट पर सीधे 50% की छूट दी। दूसरी तरफ मोदी सरकार ने मार्च 2020 में इस छूट को 'देशहित' के नाम पर स्थायी रूप से बंद कर दिया।

यह फैसला कोविड-19 महामारी के दौरान लिया गया था, ताकि बुज़ुर्गों को अनावश्यक यात्रा से रोका जा सके। लेकिन महामारी के सालों बाद भी यह छूट बहाल नहीं की गई। RTI डेटा के अनुसार, मार्च 2020 से फरवरी 2025 तक लगभग 31.35 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों ने रेलवे से यात्रा की और सरकार ने उनकी छूट छीनकर लगभग 8,913 करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूले। आपके बताए आंकड़े (32 करोड़ और 9000 करोड़) के काफी करीब हैं।

### कांग्रेस सरकार का दृष्टिकोण: संस्कार और सम्मान
कांग्रेस के शासनकाल में रेलवे नीति बुज़ुर्गों के प्रति संवेदनशील थी। पुरुषों (60+) को 40% और महिलाओं (58+) को 50% की छूट मिलती थी। यह सिर्फ आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का प्रतिबिंब था – जहां elders को बोझ नहीं, आशीर्वाद माना जाता है। कांग्रेस ने हमेशा सामाजिक कल्याण को प्राथमिकता दी, चाहे वह पेंशन हो, स्वास्थ्य योजनाएं हों या यात्रा सुविधाएं। बुज़ुर्गों की यात्रा आसान बनाकर समाज को संदेश दिया जाता था कि वे अभी भी सक्रिय और सम्मानित हैं।

### मोदी सरकार का बदलाव: छूट बंद, 'बोझ' का लेबल
मार्च 2020 में रेल मंत्रालय ने अचानक यह छूट वापस ले ली। शुरू में इसे कोविड प्रबंधन बताया गया, लेकिन बाद में सरकार ने कहा कि रेलवे को सब्सिडी का बोझ नहीं उठाया जा सकता। आश्चर्यजनक रूप से, टिकट के पीछे प्रिंट होने लगा – "आपकी यात्रा का 43% बोझ सरकार और आम नागरिक उठाते हैं।" यह शब्द बुज़ुर्गों के दिल को चोट पहुंचाने वाला था।

ऑल इंडिया सीनियर सिटीजन कॉन्फेडरेशन (AISCCON) जैसे संगठनों ने रेल मंत्रालय को चिट्ठी लिखी। उन्होंने कहा – "हम भी टैक्स भरते हैं। जीवन भर देश की सेवा की है। 'बोझ' शब्द हमारा अपमान है।" लेकिन सरकार ने कोई संज्ञान नहीं लिया। छूट बहाल करने की मांगें संसद में भी उठीं, लेकिन जवाब मिला – "रेलवे घाटे में है, छूट देना संभव नहीं।"

### दोहरी नीति: उद्योगपतियों के लिए उदारता, बुज़ुर्गों के लिए कठोरता
सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं है। पिछले 10-12 वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र में 16.35 लाख करोड़ रुपये से अधिक के NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) को राइट-ऑफ कर दिया गया। इनमें से बड़ा हिस्सा बड़े उद्योगपतियों और कॉर्पोरेट्स के कर्ज था। सरकार का तर्क था कि बैलेंस शीट साफ करना जरूरी है। लेकिन जब बात वरिष्ठ नागरिकों की छूट की आती है, तो अचानक "पैसे नहीं हैं" का बहाना।

क्या बुज़ुर्ग उद्योगपतियों से कम महत्वपूर्ण हैं? क्या टैक्स भरने वाले, देश की आजादी और विकास में योगदान देने वाले elders 'बोझ' हैं, जबकि करोड़ों के कर्ज माफ करने वाले 'संपत्ति'?

### कांग्रेस बनाम भाजपा: मूल्यों का अंतर
यह कांग्रेस और भाजपा के बीच सबसे बड़ा वैचारिक अंतर है। कांग्रेस में भारतीय संस्कार जीवित हैं – जहां बुज़ुर्ग सम्मान के पात्र हैं, उनकी जरूरतों को प्राथमिकता दी जाती है। भाजपा शासन में प्रतीत होता है कि आर्थिक दक्षता और 'डेवलपमेंट' के नाम पर सामाजिक संवेदनशीलता को पीछे धकेल दिया गया। बुज़ुर्गों को बोझ बताना न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि समाज की नैतिक नींव को कमजोर करता है।

आज जब भारत विश्व गुरु बनने का दावा करता है, तो क्या हमें अपनी जड़ें भूलनी चाहिए? संस्कृति वह है जो elders को गौरव देती है, न कि उन्हें बोझ बताती है।

### आगे का रास्ता: सम्मान वापस लौटाएं
वरिष्ठ नागरिक संगठन, विपक्षी दल और आम जनता लगातार मांग कर रहे हैं कि रेलवे छूट बहाल की जाए, कम से कम स्लीपर और थ्री-टीयर एसी में। संसदीय समितियों ने भी सिफारिश की है। सरकार को समझना चाहिए कि बुज़ुर्ग सिर्फ यात्री नहीं, राष्ट्र के अनुभवी मार्गदर्शक हैं।

भारतीय रेलवे दुनिया की सबसे बड़ी नेटवर्क में से एक है। इसमें बुज़ुर्गों को सम्मानजनक यात्रा देना कोई बोझ नहीं, बल्कि सभ्यता का प्रतीक है। कांग्रेस की पुरानी नीति याद दिलाती है कि कल्याणकारी राज्य में हर वर्ग का ख्याल रखा जाता है – खासकर वे जो कमजोर हैं।

अंत में, सवाल यह है – क्या हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जहां बुज़ुर्गों को 'बोझ' माना जाए, या जहां उन्हें सम्मान और सुविधा मिले? संस्कार वाली कांग्रेस की सोच आज भी प्रासंगिक है। मोदी सरकार को इस दोहरी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। बुज़ुर्गों का सम्मान देश का सम्मान है।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 15,2026