इस्लामाबाद, 12 अप्रैल 2026: अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद नाजुक सीजफायर और पाकिस्तान में चल रही उच्चस्तरीय शांति वार्ता के बीच ईरान का प्रतिनिधिमंडल एक बार फिर दुनिया का ध्यान खींच रहा है। इस बार सिर्फ कूटनीति नहीं, बल्कि नेतृत्व की गुणवत्ता भी चर्चा का विषय बन गई है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान (Masoud Pezeshkian) जाने-माने हृदय रोग सर्जन हैं, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ (Mohammad Bagher Ghalibaf) प्रशिक्षित पायलट और रणनीतिकार हैं, जबकि विदेश मंत्री अब्बास अरागची (Abbas Araghchi) अनुभवी कूटनीतिज्ञ और पूर्व सैनिक हैं। इनमें से हर एक ने ईरान-इराक युद्ध के दौरान सशस्त्र बलों में सेवा दी है।
ये नेता सिर्फ पद पर नहीं बैठे – ये मल्टी-टैलेंटेड धुरंधर हैं, जो ऑपरेशन थिएटर से लेकर संसद की जटिल राजनीति, स्टॉक मार्केट की चालाकी से लेकर अंतरराष्ट्रीय नेगोशिएशन तक हर मोर्चे पर कमाल दिखा चुके हैं।
राष्ट्रपति पेज़ेश्कियान: चाकू से लेकर राष्ट्रपति पद तक
मसूद पेज़ेश्कियान ईरान के 9वें राष्ट्रपति हैं और पेशे से हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियक सर्जन)। उन्होंने ईरान-इराक युद्ध (1980-88) के दौरान मेडिकल सेवा दी और बाद में टबरिज यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज में हार्ट सर्जरी में स्पेशलाइजेशन किया। वे लंबे समय तक शहीद मदनी अस्पताल के प्रमुख रहे और स्वास्थ्य मंत्री भी रह चुके हैं।
जब जरूरत पड़ती है, वे आज भी ऑपरेशन थिएटर में उतरकर केस अटेंड करते हैं। नागरिकों की जान बचाना उनके लिए सिर्फ ड्यूटी नहीं, बल्कि जुनून है। युद्ध के मैदान से लेकर राजनीति तक उनका सफर दिखाता है कि ईरान के नेता कितने ग्राउंडेड और समर्पित हैं। पेज़ेश्कियान की सादगी और ईमानदारी को यहां तक कि उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं।
संसद अध्यक्ष ग़ालिबाफ़: पायलट से रणनीतिकार तक
मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर हैं। वे न सिर्फ राजनीतिज्ञ हैं, बल्कि **प्रशिक्षित कमर्शियल पायलट** भी हैं। उन्होंने फ्रांस से एयरबस विमानों को उड़ाने का सर्टिफिकेट प्राप्त किया है और ईरान एयर के लिए भी उड़ान भरी है। युद्ध के दौरान वे इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में ब्रिगेडियर जनरल के रूप में सेवा दे चुके हैं।
संसद में इतने बड़े देश की कानूनी जटिलताओं, दांव-पेंच और अंतरराष्ट्रीय दबाव को संभालना कोई आसान काम नहीं। ग़ालिबाफ़ ने अमेरिका और उसके सहयोगियों को कई बार फंसाया है। युद्ध के दौरान उनका एक-एक ट्वीट स्टॉक मार्केट पर भारी पड़ा। उन्होंने ट्रंप के प्री-मार्केट “ट्रुथ” पोस्ट्स को “रिवर्स इंडिकेटर” बताया और निवेशकों को सलाह दी – “जब वे पंप करें तो शॉर्ट करो, जब डंप करें तो लॉन्ग करो।” दुनिया के बड़े वित्तीय खिलाड़ियों ने खुलकर कहा कि इन्वेस्टमेंट के फैसले में ग़ालिबाफ़ की बात माननी चाहिए। उनके एक ट्वीट से ट्रंप के हजार पैंतरे फेल हो गए।
अब ये ग़ालिबाफ़ ईरान के नेगोशिएशन पैनल में पाकिस्तान पहुंचे हैं। और सबसे दिलचस्प बात – ईरानी प्रतिनिधिमंडल का जहाज तेहरान से इस्लामाबाद खुद ग़ालिबाफ़ उड़ाकर लाए। पायलट स्पीकर की यह छवि दुनिया भर में चर्चित हो गई।
विदेश मंत्री अब्बास अरागची: कूटनीति के धुरंधर
अब्बास अरागची ईरान के विदेश मंत्री हैं। वे JCPOA (2015 न्यूक्लियर डील) के प्रमुख नेगोशिएटर्स में से एक रहे हैं। उन्होंने यूके के यूनिवर्सिटी ऑफ केंट से पीएचडी की है और फिनलैंड व जापान में राजदूत रह चुके हैं। ईरान-इराक युद्ध में उन्होंने भी IRGC में सेवा दी।
अरागची पश्चिम के साथ बातचीत में कड़े लेकिन समझदार माने जाते हैं। वर्तमान वार्ता में वे ईरान की “नॉन-नेगोशिएबल” शर्तों को मजबूती से रख रहे हैं।
तीनों ने युद्ध देखा, तीनों ने देश संभाला
पेज़ेश्कियान, ग़ालिबाफ़ और अरागची – तीनों ने इराक युद्ध के दौरान सशस्त्र बलों में योगदान दिया। एक सर्जन ने घायलों की जान बचाई, एक पायलट ने हवाई रक्षा संभाली और एक कूटनीतिज्ञ ने बाद में अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर लड़ाई लड़ी।
ये नेता दिखाते हैं कि ईरान का नेतृत्व **बहुआयामी** है:
- वैज्ञानिक और चिकित्सकीय विशेषज्ञता (पेज़ेश्कियान)
- सैन्य, उड्डयन और आर्थिक रणनीति (ग़ालिबाफ़)
- कूटनीतिक गहराई और कानूनी समझ (अरागची)
मुकाबला किससे? विश्व नेतृत्व का नया मापदंड
दुनिया के कई देशों में नेता अक्सर सिर्फ राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं। लेकिन ईरान में ये धुरंधर व्यावहारिक अनुभव के साथ सत्ता में हैं। जब राष्ट्रपति खुद ऑपरेशन करते हैं, संसद अध्यक्ष खुद विमान उड़ाते हैं और विदेश मंत्री युद्ध के मैदान से कूटनीति तक का सफर तय कर चुके हैं, तो सवाल उठता है – कहाँ मिलेंगे ऐसे नेता?
अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ग़ालिबाफ़ जैसे नेता का शामिल होना दिखाता है कि ईरान न सिर्फ सैन्य रूप से तैयार है, बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर भी पूरी तरह सजग है। उनके ट्वीट्स ने वैश्विक बाजारों को प्रभावित किया, जो साबित करता है कि ईरान अब पारंपरिक शक्ति से आगे सोच रहा है।
भारत के लिए मायने
भारत के नजरिए से यह नेतृत्व महत्वपूर्ण है। ईरान भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स में सहयोग है। होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। ऐसे बहुमुखी और अनुभवी नेताओं के साथ भारत को संतुलित कूटनीति रखनी होगी – न सिर्फ अमेरिका के साथ, बल्कि ईरान के साथ भी।
निष्कर्ष: ईरान की ताकत उसके लोगों और नेताओं में
ईरान पर अक्सर प्रतिबंधों, युद्ध और अलगाव की छाप लगाई जाती है, लेकिन उसके नेतृत्व की गहराई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पेज़ेश्कियान का चिकित्सकीय समर्पण, ग़ालिबाफ़ की रणनीतिक चतुराई और अरागची की कूटनीतिक समझ – ये तीनों मिलकर ईरान को एक मजबूत, आत्मनिर्भर और बहुआयामी राष्ट्र बनाते हैं।
जब सीजफायर के बीच इस्लामाबाद में बातचीत चल रही है, तो ये नेता याद दिलाते हैं कि ईरान सिर्फ प्रतिरोध नहीं, बल्कि **बुद्धिमत्ता और अनुभव** के साथ लड़ रहा है। मुकाबला किससे? शायद उन देशों से जिनके नेता सिर्फ भाषण देते हैं, लेकिन मैदान में उतरने का साहस नहीं रखते।
ईरान का यह नेतृत्व एक संदेश है – सच्चा नेता वह नहीं जो सिर्फ शासन करता है, बल्कि वह जो देश की हर चुनौती में खुद शामिल होता है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 12,2026