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Sunday, 12 April 2026

“कुछ घंटों में समझौता हो जाएगा?” रूसी राजनयिक मिखाइल उल्यानोव ने JD वेंस को दिया कड़ा जवाब – इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा, कूटनीति की ABC याद दिलाई

“कुछ घंटों में समझौता हो जाएगा?” रूसी राजनयिक मिखाइल उल्यानोव ने JD वेंस को दिया कड़ा जवाब – इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा, कूटनीति की ABC याद दिलाई-Friday World-April 12,2026 
इस्लामाबाद, 12 अप्रैल 2026: अमेरिका और ईरान के बीच पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई उच्चस्तरीय शांति वार्ता बेनतीजा रही। 21 घंटे से अधिक चली मैराथन बैठकें खत्म होने के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने स्पष्ट कहा कि कोई समझौता नहीं हुआ। ईरान ने अमेरिका का “अंतिम और सर्वश्रेष्ठ प्रस्ताव” स्वीकार नहीं किया। 

लेकिन बात यहीं नहीं रुकी। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में रूस के स्थायी प्रतिनिधि मिखाइल उल्यानोव ने JD वेंस की टिप्पणियों पर तीखा पलटवार किया। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट करते हुए उल्यानोव ने पूछा – “क्या उपराष्ट्रपति को वास्तव में उम्मीद थी कि इतने जटिल और बहुआयामी मुद्दे पर कुछ ही घंटों में समझौता हो जाएगा?”

उन्होंने आगे लिखा कि समझौता तभी संभव है जब कोई एक पक्ष **आत्मसमर्पण** करने को तैयार हो, जो इस मामले में नहीं है। उल्यानोव ने साफ कहा – अगर अमेरिका वाकई समझौता चाहता है तो उसे **विशेषज्ञ स्तर पर कई दौर की बातचीत** के लिए तैयार रहना होगा। कूटनीति में यह बुनियादी प्रक्रिया है।

क्या हुआ इस्लामाबाद में?

पाकिस्तान की राजधानी में अमेरिका और ईरान के बीच सीधे चेहरे-से-चेहरे वार्ता हुई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस खुद नेतृत्व कर रहे थे, जबकि ईरानी पक्ष में मजबूत प्रतिनिधिमंडल शामिल था। वार्ता में परमाणु कार्यक्रम, होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल थे।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में JD वेंस ने कहा, “हम यहां से एक बहुत ही आसान प्रस्ताव देकर जा रहे हैं – यही हमारा अंतिम और बेस्ट ऑफर है। हम देखेंगे कि ईरानी इसे स्वीकार करते हैं या नहीं।” उन्होंने बताया कि 21 घंटे की मेहनत के बावजूद कोई समझौता नहीं हो सका। वेंस ने ईरान पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिकी शर्तें मानने से इनकार कर दिया।

ईरानी पक्ष ने अमेरिका की “अत्यधिक मांगों” को जिम्मेदार ठहराया। दोनों पक्षों ने लिखित दस्तावेजों का आदान-प्रदान किया, लेकिन मुख्य मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। अब दो हफ्ते का नाजुक सीजफायर और भी अनिश्चित हो गया है।

 रूस का सख्त रुख: “कूटनीति की ABC समझिए”

मिखाइल उल्यानोव रूस के अनुभवी राजनयिक हैं, जो IAEA और वियना में रूस की आवाज माने जाते हैं। उन्होंने JD वेंस की “आसान प्रस्ताव” वाली टिप्पणी पर व्यंग्य करते हुए कहा कि इतने जटिल मुद्दों को कुछ घंटों में सुलझाने की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।

उल्यानोव का संदेश साफ था:
- कूटनीति धैर्य और कई दौर की बातचीत की मांग करती है।
- एक पक्ष से आत्मसमर्पण की अपेक्षा करना गलत है।
- विशेषज्ञ स्तर पर विस्तृत चर्चा जरूरी है।

रूस लंबे समय से ईरान का समर्थक रहा है। वह JCPOA (2015 न्यूक्लियर डील) का भी पक्षधर रहा है। इस्लामाबाद वार्ता के बेनतीजा रहने पर रूस ने अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका को चेतावनी दी है कि जल्दबाजी या दबाव वाली रणनीति काम नहीं करेगी।

 क्यों फंस गई बात?

मुख्य अड़चनें:
1. परमाणु संवर्धन— ईरान अपना अधिकार छोड़ने को तैयार नहीं।
2. होर्मुज स्ट्रेट— ईरान ने अपना पूर्ण नियंत्रण बनाए रखने का दावा किया है।
3. सैन्य क्षमता — मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव पर गहरे मतभेद।
4. ट्रस्ट की कमी— दोनों पक्ष एक-दूसरे पर “अत्यधिक मांग” और “असमर्पण” का आरोप लगा रहे हैं।

JD वेंस ने कहा कि अमेरिका को ईरान से “न्यूक्लियर वेपन न बनाने” की स्पष्ट प्रतिबद्धता चाहिए। ईरान इसे अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव

इस्लामाबाद वार्ता का असफल होना पूरे मध्य पूर्व की स्थिरता को प्रभावित कर सकता है:
- होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनाव बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक तेल कीमतें प्रभावित होंगी।
- भारत जैसे देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा चुनौती बनी रहेगी।
- पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठ सकते हैं, हालांकि इस्लामाबाद दोनों पक्षों से संपर्क बनाए रखने का दावा कर रहा है।
- चीन और रूस ईरान के करीब रहकर अमेरिकी एकतरफा नीति का विरोध जारी रख सकते हैं।

ईरान का मजबूत नेतृत्व बनाम अमेरिकी दबाव

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान (हृदय रोग सर्जन), संसद अध्यक्ष मोहम्मद बागेर ग़ालिबाफ़ (प्रशिक्षित पायलट) और विदेश मंत्री अब्बास अरागची जैसे अनुभवी नेताओं का प्रतिनिधिमंडल वार्ता में शामिल था। इन नेताओं ने युद्ध के मैदान से लेकर कूटनीति तक का अनुभव लिया है। रूस का समर्थन इनके आत्मविश्वास को और बढ़ाता है।

दूसरी ओर, अमेरिकी पक्ष “अंतिम ऑफर” देकर दबाव बनाने की रणनीति पर अड़ा रहा, जिसे रूसी राजनयिक ने “कूटनीति की बुनियादी समझ की कमी” बताया।

 आगे क्या?

वार्ता बेनतीजा रहने के बावजूद दोनों पक्षों ने दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। विशेषज्ञ स्तर पर आगे की बातचीत की संभावना बनी हुई है। लेकिन अगर अमेरिका अपनी “अंतिम शर्तें” पर अड़ा रहा और ईरान ने उन्हें ठुकरा दिया तो सीजफायर टूटने का खतरा बढ़ जाएगा।

रूस जैसे देशों का रुख साबित करता है कि इस मुद्दे पर बहुपक्षीय और धैर्यपूर्ण तरीके की जरूरत है। जल्दबाजी या “टेक इट या लीव इट” वाली शैली काम नहीं करेगी।

 इस्लामाबाद में हुई वार्ता एक बार फिर याद दिलाती है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को कुछ घंटों या “अंतिम प्रस्ताव” से नहीं सुलझाया जा सकता। मिखाइल उल्यानोव का सवाल JD वेंस और ट्रंप प्रशासन के लिए सोचने लायक है – क्या कूटनीति की ABC भूल गए हैं? 

ईरान मजबूती से खड़ा है, रूस उसका समर्थन कर रहा है, और क्षेत्र में नई वास्तविकता बन रही है। अब देखना होगा कि अमेरिका धैर्य दिखाता है या फिर दबाव बढ़ाने का रास्ता चुनता है। मध्य पूर्व की शांति एक बार फिर कसौटी पर है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 12,2026