अमेरिका और डॉलर की ताकत को लंबे समय से अजेय माना जाता रहा है। लेकिन मध्य-पूर्व से आई एक खबर ने इस धारणा को हिला दिया है। ईरान से बढ़ते तनाव और तेल व्यापार पर मंडराते संकट के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने अमेरिका को सीधी चेतावनी दी कि अगर डॉलर की किल्लत हुई तो वह चीन की मुद्रा युआन में तेल-गैस बेचना शुरू कर देगा। इस 'आर्थिक धमकी' का असर वॉशिंगटन में तुरंत दिखा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खुद कहा कि वे यूएई के साथ करेंसी स्वैप यानी मुद्रा अदला-बदली की संभावना पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। यह कदम डॉलर के दबदबे के लिए एक बड़ा संदेश है।
पूरा मामला क्या है? आखिर यूएई ने क्यों दी धमकी*
संयुक्त अरब अमीरात दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता है। इसकी ताकत का आधार है तेल। यूएई की मुद्रा दिरहम दशकों से अमेरिकी डॉलर से सीधे जुड़ी हुई है। 1 अमेरिकी डॉलर = 3.67 दिरहम का फिक्स रेट है। इस व्यवस्था से यूएई को वैश्विक व्यापार में स्थिरता मिलती रही है।
लेकिन ईरान के साथ बढ़ते युद्ध के हालात ने समीकरण बदल दिए। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है। दुनिया का करीब 20% तेल यहीं से होकर गुजरता है। युद्ध की आशंका से इस रास्ते पर खतरा मंडराने लगा। अगर यह स्ट्रेट बंद होता है तो यूएई समेत खाड़ी देशों का तेल निर्यात रुक जाएगा।
तेल बिकेगा नहीं तो डॉलर आएगा नहीं। और डॉलर नहीं आया तो दिरहम को संभालना मुश्किल हो जाएगा। इसी डर से यूएई ने अमेरिका को साफ कहा कि डॉलर की कमी हुई तो वह चीन के युआन या किसी अन्य मुद्रा में तेल बेचने को मजबूर होगा।
ट्रंप का बयान: 'वे अमीर हैं, लेकिन मदद चाहिए'
मीडिया से बात करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे पर खुलकर कहा। उनके शब्द थे, "यह देश मदद मांग रहा है। मैं हैरान हूं क्योंकि वे वाकई बहुत अमीर हैं। आप जानते हैं, वे हमारे देश के लिए बहुत अच्छे रहे हैं। तो अगर मैं उनकी मदद कर पाया, तो मैं करूंगा।"
ट्रंप का यह बयान कूटनीति के लिहाज से बहुत अहम है। अमेरिका आमतौर पर अपने सहयोगियों को सीधे डॉलर देने से बचता है। लेकिन यहां मामला डॉलर के वर्चस्व का है। अगर यूएई युआन में व्यापार शुरू करता है तो चीन की मुद्रा को वैश्विक ताकत मिलेगी। यह अमेरिका कभी नहीं चाहेगा। इसलिए ट्रंप करेंसी स्वैप के लिए तैयार दिख रहे हैं।
करेंसी स्वैप क्या होता है? आसान भाषा में समझें
करेंसी स्वैप दो देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच एक समझौता होता है। इसमें दोनों देश तय करते हैं कि जरूरत पड़ने पर वे एक-दूसरे को अपनी-अपनी मुद्रा उधार देंगे।
मान लीजिए यूएई को डॉलर की कमी हो गई। स्वैप समझौते के तहत अमेरिकी फेडरल रिजर्व यूएई के सेंट्रल बैंक को, कहिए, 10 अरब डॉलर देगा। बदले में यूएई उतनी कीमत के दिरहम अमेरिका को दे देगा। एक तय समय बाद दोनों देश अपनी मुद्रा वापस ले लेंगे, एक छोटी फीस के साथ।
फायदा ये कि यूएई को बाजार से महंगे डॉलर नहीं खरीदने पड़ेंगे। उसकी अर्थव्यवस्था स्थिर रहेगी। और अमेरिका का फायदा ये कि यूएई डॉलर छोड़कर युआन के पास नहीं जाएगा।
यूएई के पास तो बेशुमार दौलत है, फिर डॉलर क्यों चाहिए?
यही सबसे बड़ा सवाल है। कैपिटल इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञ जेसन ट्यूवी के मुताबिक यूएई के पास लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर की बचत और सॉवरेन वेल्थ फंड है। इतना पैसा होने पर भी डॉलर की चिंता क्यों?
जवाब तीन हिस्सों में है:
1. तेल का व्यापार सिर्फ डॉलर में: 1970 के दशक से 'पेट्रोडॉलर' सिस्टम चल रहा है। सऊदी अरब और यूएई समेत OPEC देशों ने तय किया था कि वे तेल सिर्फ डॉलर में बेचेंगे। इससे डॉलर की मांग पूरी दुनिया में बनी रही। यूएई का सारा तेल, गैस, इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट डॉलर पर टिका है।
2. दिरहम की साख डॉलर से जुड़ी: यूएई ने अपनी मुद्रा दिरहम को डॉलर के साथ 'पेग' कर रखा है। इसका मतलब है कि दिरहम की कीमत तभी स्थिर रहेगी जब देश के पास पर्याप्त डॉलर भंडार हो। अगर डॉलर कम हुए तो निवेशकों का भरोसा डगमगा जाएगा और दिरहम गिर सकता है।
3. युद्ध लंबा खिंचा तो दिक्कत: यूएई ने होर्मुज स्ट्रेट का विकल्प बनाने के लिए ओमान की खाड़ी तक पाइपलाइन बना ली है। फिर भी, युद्ध की स्थिति में बीमा महंगा हो जाता है, शिपिंग रुकती है, खरीदार पीछे हटते हैं। कुछ हफ्ते का झटका यूएई झेल लेगा, पर महीनों तक युद्ध चला तो डॉलर का प्रवाह कम होगा। तब स्वैप एक 'सुरक्षा कवच' का काम करेगा।
चीन का युआन फैक्टर: असली खेल यहीं है
यूएई की धमकी में सबसे अहम शब्द 'युआन' था। चीन पिछले 10 साल से युआन को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने में जुटा है। उसने रूस, ब्राजील, अर्जेंटीना जैसे देशों से युआन में व्यापार शुरू करवा दिया है। सऊदी अरब से भी वह युआन में तेल खरीदने की बात कर रहा है।
अगर यूएई जैसा अमेरिका का करीबी सहयोगी भी युआन में चला गया, तो यह डॉलर के लिए मनोवैज्ञानिक हार होगी। दूसरे खाड़ी देश भी यही रास्ता अपना सकते हैं। इसे 'डी-डॉलराइजेशन' कहते हैं, यानी दुनिया का डॉलर से धीरे-धीरे दूर होना।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इस बात पर टिका है कि दुनिया भर में डॉलर की मांग बनी रहे। अगर मांग घटी तो अमेरिका पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा और ब्याज दरें बेकाबू हो सकती हैं। बस इसी डर ने ट्रंप को तुरंत बातचीत की मेज पर ला दिया।
भारत पर क्या असर होगा?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर। 2023-24 में भारत ने यूएई से करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा।
1. रुपये-दिरहम व्यापार को बढ़ावा: भारत और यूएई पहले ही रुपये-दिरहम में व्यापार का सिस्टम बना चुके हैं। अगर यूएई डॉलर की जगह दूसरी मुद्राओं पर जोर देता है, तो भारत के लिए रुपये में तेल खरीदना आसान हो जाएगा। इससे भारत को डॉलर बचाने में मदद मिलेगी।
2. तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव: युद्ध की वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल पार जा सकते हैं। भारत के लिए यह महंगाई बढ़ाने वाला होगा। लेकिन अगर यूएई-दिरहम स्थिर रहा तो कम से कम सप्लाई को लेकर भरोसा बना रहेगा।
3. रणनीतिक संतुलन: भारत के अमेरिका और यूएई दोनों से अच्छे रिश्ते हैं। साथ ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा भी है। भारत नहीं चाहेगा कि खाड़ी में युआन का दबदबा बढ़े। इसलिए भारत की कोशिश रहेगी कि यूएई-भारत व्यापार रुपये-दिरहम में ही बढ़े।
क्या डॉलर का युग खत्म हो रहा है?
नहीं, अभी इतनी जल्दी नहीं। वैश्विक व्यापार का 88% हिस्सा आज भी किसी न किसी रूप में डॉलर से होकर गुजरता है। दुनिया के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का 59% डॉलर में है। युआन अभी सिर्फ 2.7% है।
लेकिन बदलाव की शुरुआत हो चुकी है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने रूस के डॉलर भंडार फ्रीज कर दिए थे। उस घटना ने कई देशों को डरा दिया कि कल को अमेरिका उन पर भी प्रतिबंध लगा सकता है। तभी से चीन, रूस, ब्राजील, यूएई जैसे देश 'प्लान बी' पर काम कर रहे हैं।
यूएई का यह कदम 'प्लान बी' की टेस्टिंग है। वह अमेरिका को बता रहा है कि 'हम आपके साथ हैं, लेकिन हमारी अपनी अर्थव्यवस्था भी बचानी है। अगर आपने मदद नहीं की, तो हमारे पास दूसरे विकल्प हैं।'
आगे क्या होगा? 3 संभावनाएं
1. स्वैप डील हो जाती है: सबसे संभव यही है। अमेरिका और यूएई 6 महीने या 1 साल का स्वैप समझौता कर लेंगे। इससे बाजार को संदेश जाएगा कि हालात काबू में हैं। युआन की बात ठंडे बस्ते में चली जाएगी।
2. सीमित युआन व्यापार: यूएई अमेरिका को खुश रखने के लिए डॉलर में व्यापार जारी रखेगा, लेकिन चीन को तेल बेचने के लिए थोड़ा-बहुत युआन स्वीकार कर लेगा। चीन पहले से यूएई का बड़ा व्यापारिक साझेदार है।
3. युद्ध टल जाए: अगर ईरान के साथ तनाव कम हो गया और होर्मुज स्ट्रेट पर खतरा टला, तो पूरा मुद्दा ही खत्म हो जाएगा। न स्वैप की जरूरत पड़ेगी, न युआन की धमकी की।
निष्कर्ष: एक धमकी ने बदल दिए समीकरण
यूएई की यह 'युआन वाली धमकी' बताती है कि अब दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही। अमेरिका के सबसे करीबी सहयोगी भी अब अपने हित खुलकर सामने रख रहे हैं। डॉलर आज भी बादशाह है, लेकिन उसे चुनौती मिलने लगी है।
ट्रंप का झुकना मजबूरी भी है और रणनीति भी। मजबूरी ये कि डॉलर का दबदबा बचाना है। रणनीति ये कि स्वैप देकर यूएई को अपना बनाए रखना है, वरना वह चीन की गोद में जा सकता है।
आने वाले महीने तय करेंगे कि यह घटना सिर्फ एक कूटनीतिक दांव थी, या वाकई 'डी-डॉलराइजेशन' की असली शुरुआत। फिलहाल इतना तय है कि तेल, युद्ध और मुद्रा की यह तिकड़ी दुनिया की अर्थव्यवस्था का भविष्य लिख रही है। और भारत जैसे देशों के लिए इसमें खतरे भी हैं और मौके भी।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 22,2026