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1954 का मिस्र, जहां जमाल अब्देल नासिर अपनी ताकत मजबूत कर रहे थे और ब्रिटेन स्वेज नहर क्षेत्र से अपनी सेना वापस लेने की तैयारी में था। इज़राइल, जो तब सिर्फ छह साल पुराना युवा देश था, को डर था कि ब्रिटिश सेना के जाने के बाद मिस्र और अधिक आक्रामक हो जाएगा। इसी पृष्ठभूमि में इज़राइल की सैन्य खुफिया एजेंसी अमन ने एक जोखिम भरा कदम उठाया—ऑपरेशन सुसाना (जिसे लावोन अफेयर भी कहा जाता है)।
यह एक क्लासिक फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन था। इज़राइल ने मिस्र के यहूदियों को भर्ती किया और उन्हें निर्देश दिया कि वे अमेरिकी और ब्रिटिश स्वामित्व वाले नागरिक ठिकानों—सिनेमा, लाइब्रेरी, अमेरिकन कल्चरल सेंटर, पोस्ट ऑफिस और थिएटर—पर बम लगाएं। मकसद था कि हमलों का दोष मुस्लिम ब्रदरहुड या मिस्री कम्युनिस्टों पर डाला जाए, ताकि पश्चिमी देशों को लगे कि नासिर की मिस्र अस्थिर और खतरनाक है। इससे ब्रिटेन को स्वेज नहर से अपनी सेना वापस न लेने के लिए मजबूर किया जा सके।
लेकिन योजना बुरी तरह फेल हो गई। जुलाई 1954 में बम लगाए गए, पर एक एजेंट की जेब में बम समय से पहले फट गया। मिस्र की खुफिया एजेंसी ने पूरे नेटवर्क को पकड़ लिया। 11 लोग गिरफ्तार हुए। दो को फांसी दी गई, दो ने जेल में आत्महत्या कर ली और बाकी को लंबी सजाएं मिलीं। इज़राइल ने लंबे समय तक अपनी भूमिका से इनकार किया। आखिरकार 2005 में, यानी 51 साल बाद, इज़राइल के राष्ट्रपति ने बचे हुए एजेंटों को सम्मानित किया।
इस घटना ने इज़राइल-अमेरिका संबंधों पर सवाल खड़े किए, लेकिन अमेरिका ने कोई सख्त कदम नहीं उठाया।
जोनाथन पोलार्ड का मामला: मित्र देश के लिए जासूसी
तीस साल बाद, 1984-85 में एक और बड़ा विवाद सामने आया। जोनाथन पोलार्ड, अमेरिकी नौसेना का खुफिया विश्लेषक, ने इज़राइल के लिए जासूसी की। उसने सूटकेस भरकर गोपनीय दस्तावेज सौंपे, जिनमें शामिल थे:
- NSA का 10 वॉल्यूम सिग्नल इंटेलिजेंस मैनुअल
- हजारों अमेरिकी एजेंटों और सहयोगियों के नाम
- सोवियत हथियारों और सिस्टम की विस्तृत जानकारी
- सैटेलाइट तस्वीरें और क्षेत्रीय खुफिया रिपोर्ट्स
- कुल 800 से ज्यादा क्लासिफाइड डॉक्यूमेंट और 1,500 से अधिक इंटेलिजेंस समरी
बदले में इज़राइल ने उसे सालाना 30,000 डॉलर देने का वादा किया और शुरुआत में 45,000 डॉलर से ज्यादा दिए। नवंबर 1985 में पोलार्ड पकड़ा गया। उसने इज़राइली दूतावास में शरण मांगी, लेकिन गिरफ्तार हो गया। 1987 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई—यह इकलौता मामला था जहां किसी अमेरिकी को "मित्र देश" के लिए जासूसी करने पर ऐसी सजा मिली।
शुरुआत में इज़राइल ने इसे "रोग ऑपरेशन" (अनधिकृत) बताया, लेकिन 1998 में बेंजामिन नेतन्याहू ने स्वीकार किया कि पोलार्ड इज़राइली एजेंट था। विश्लेषकों का मानना है कि पोलार्ड की जानकारी का कुछ हिस्सा सोवियत संघ तक पहुंचा हो सकता है, शायद सोवियत यहूदियों को इज़राइल आने की अनुमति दिलाने के बदले। 2015 में पोलार्ड रिहा हुआ और 2020 में इज़राइल पहुंचा, जहां नेतन्याहू ने खुद एयरपोर्ट पर उसका स्वागत किया।
मोसाद की छवि और विवादास्पद आरोप
मोसाद को दुनिया की सबसे कुशल खुफिया एजेंसियों में गिना जाता है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह एजेंसी जानकारी तभी साझा करती है जब इज़राइल को सीधा फायदा हो। कुछ ऐतिहासिक उदाहरण:
- 1983 बेरूत बैरक बम विस्फोट: 241 अमेरिकी मरीन मारे गए। पूर्व मोसाद एजेंट विक्टर ओस्ट्रोव्स्की की किताब के अनुसार, मोसाद को हमले की पहले से जानकारी थी, लेकिन अमेरिका को सिर्फ सामान्य चेतावनी दी गई, विशिष्ट डिटेल नहीं। मोसाद प्रमुख ने कथित तौर पर कहा था कि उनका काम अमेरिकियों की रक्षा नहीं है। हालांकि ये आरोप विवादास्पद हैं और आधिकारिक रूप से साबित नहीं हुए।
- 1985 TWA फ्लाइट 847 हाईजैकिंग: हिजबुल्लाह ने विमान हाईजैक किया और एक अमेरिकी नौसैनिक को मार डाला। रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इज़राइल को पहले से सूचना थी, लेकिन साझा नहीं की।
- 1985 अचिल्ले लॉरो हाईजैकिंग: एक अमेरिकी यात्री की हत्या हुई। इज़राइली खुफिया को जानकारी होने के बावजूद अमेरिका को पर्याप्त चेतावनी नहीं दी गई, ऐसा कुछ आरोप लगे।
9/11 हमलों से जुड़ा सबसे विवादास्पद दावा "डांसिंग इज़राइलिस" का है। कुछ इज़राइलियों को न्यू जर्सी में हमलों के दौरान वैन से टावरों को फिल्म करते और खुश होते देखा गया। वे गिरफ्तार हुए, लेकिन बाद में रिहा कर दिए गए। एफबीआई जांच में उन्हें हमलों की पूर्व जानकारी न होने का निष्कर्ष निकला, पर यह घटना साजिश सिद्धांतों में आज भी घूमती रहती है। कोई ठोस सबूत नहीं मिला कि मोसाद ने हमलों में कोई भूमिका निभाई या जानबूझकर चेतावनी नहीं दी।
7 अक्टूबर 2023: इंटेलिजेंस फेलियर?
7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले से पहले मिस्र ने इज़राइल को बार-बार चेतावनी दी थी कि "कुछ बड़ा" होने वाला है। मिस्र के खुफिया प्रमुख ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री नेतन्याहू को फोन पर भी चेताया। अमेरिकी कांग्रेस के एक प्रमुख सदस्य ने भी इसकी पुष्टि की। फिर भी इज़राइल ने इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया या कम आंका। यह इज़राइली खुफिया तंत्र की सबसे बड़ी विफलता मानी जा रही है।
इराक युद्ध और WMD नैरेटिव
2003 के इराक युद्ध से पहले इज़राइल की खुफिया रिपोर्ट्स ने भी सद्दाम हुसैन के पास "विनाशकारी हथियार" (WMD) होने का आकलन मजबूत किया। इज़राइल ने अमेरिका और ब्रिटेन के साथ यह जानकारी साझा की। युद्ध के बाद कोई WMD नहीं मिले। इज़राइली विशेषज्ञों ने बाद में स्वीकार किया कि उनका आकलन अतिरंजित था और वे "वर्स्ट-केस सिनेरियो" पर आधारित था। युद्ध में 4,431 अमेरिकी सैनिक और लाखों इराकी मारे गए। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि इज़राइल को सद्दाम के हटने से फायदा हुआ, लेकिन खुफिया विफलता की कीमत भारी पड़ी।
निष्कर्ष: रणनीतिक साझेदारी या शुद्ध हित?
इन घटनाओं से साफ है कि इज़राइल-अमेरिका संबंध "अटूट दोस्ती" से ज्यादा जटिल रणनीतिक साझेदारी है। दोनों देश एक-दूसरे के हितों की रक्षा करते हैं, लेकिन जब अपने राष्ट्रीय हित दांव पर लगते हैं, तो खुफिया खेल में कोई कसर नहीं छोड़ते। पोलार्ड जैसे मामले में इज़राइल ने मित्र देश पर जासूसी की, जबकि लावोन अफेयर में सहयोगी देशों के ठिकानों को निशाना बनाया।
दूसरी ओर, अमेरिका ने इन विवादों के बावजूद इज़राइल को अरबों डॉलर की सैन्य सहायता दी और राजनीतिक समर्थन जारी रखा। दोनों तरफ से "हितों का सौदा" चलता है—इज़राइल को क्षेत्रीय सुरक्षा चाहिए, तो अमेरिका को मध्य पूर्व में मजबूत सहयोगी।
यह संबंध न तो पूरी तरह भावनात्मक है और न ही पूरी तरह निष्कलंक। इतिहास सिखाता है कि राष्ट्र कभी भी पूरी तरह एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करते। वे सिर्फ अपने हितों की रक्षा करते हैं। इज़राइल की खुफिया सफलताएं विश्व प्रसिद्ध हैं, लेकिन इन विवादों ने दिखाया कि कोई भी एजेंसी या देश गलतियों से मुक्त नहीं।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 22,2026