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Sunday, 19 April 2026

मन की बात या मन की अकेली बात? – राष्ट्र के नाम संदेश अब सिर्फ़ रिकॉर्डिंग बन गया?

मन की बात या मन की अकेली बात? – राष्ट्र के नाम संदेश अब सिर्फ़ रिकॉर्डिंग बन गया?
-Friday World-April 19,2026
कल्पना कीजिए, रविवार सुबह 11 बजे। पूरे देश में रेडियो, टीवी और यूट्यूब चैनल एक साथ खुलते हैं। प्रधानमंत्री जी माइक पर आते हैं, मुस्कुराते हुए कहते हैं – “मेरे प्यारे देशवासियों...”। स्क्रीन पर फूलों की बारिश, बच्चों की तस्वीरें, योग की क्लिप्स और “विकसित भारत” का जादू। लेकिन घरों में क्या हो रहा है? 

अधिकांश आम जनता तो चाय पीते हुए चैनल बदल रही है। जो “भक्त” कहा जाता है, वे भी अब धीरे-धीरे कान में ईयरफोन लगाकर कोई और पॉडकास्ट सुन रहे हैं। मन की बात अब न तो आम आदमी की बात है, न अंधभक्त की। यह सिर्फ़ एक पुरानी रस्म बन गई है – राष्ट्र के नाम संदेश, जिसे राष्ट्र अब नाम मात्र को सुन रहा है।

यह व्यंग्य नहीं, हकीकत का आईना है। 2014 में जब मन की बात शुरू हुई थी, तब यह एक तूफान था। लोग रेडियो के आसपास बैठते थे, चाय की दुकानों पर लाउडस्पीकर लगते थे, व्हाट्सएप पर ऑडियो वायरल होता था। प्रधानमंत्री जी की आवाज़ में एक नई उम्मीद थी – योग, स्वच्छता, बेटी बचाओ, स्टार्टअप, आत्मनिर्भर भारत। लेकिन 12 साल बाद, 132वीं कड़ी (मार्च 2026) तक पहुंचते-पहुंचते यह कार्यक्रम “मास्टरपीस” से “मास्टरपीस ऑफ़ रूटीन” बन गया है।

 सुनने वाले कहाँ गए?

सरकारी आंकड़े तो हमेशा की तरह शानदार हैं। IIM रोहतक की सर्वे रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि 100 करोड़ से ज्यादा लोग कम से कम एक बार सुन चुके हैं, 23 करोड़ नियमित श्रोता हैं। लेकिन स्वतंत्र सर्वेक्षण दूसरी कहानी बताते हैं। CSDS-लोकनीति के पुराने अध्ययन में साफ़ था – 60% से ज्यादा लोग एक साल में कभी नहीं सुनते। दक्षिण भारत में तो 75% लोग इसे छूते तक नहीं, क्योंकि भाषा की दीवार है।

यूट्यूब पर लाइव स्ट्रीम देखिए। पुराने एपिसोड पर लाखों व्यूज थे, अब कई एपिसोड पर सिर्फ़ कुछ हजार लाइव व्यूअर्स रह जाते हैं। एक वीडियो में तो सिर्फ़ 3500 लोग देख रहे थे – जबकि चैनल के सब्सक्राइबर 18 लाख के पार हैं। रेडियो पर सुनने वाले तो और भी कम। AIR के पुराने आरटीआई डेटा में भी 2015 से 2017 तक सुनने वालों का प्रतिशत लगातार गिरता दिखा था।

आम जनता क्यों नहीं सुनती? क्योंकि उनकी “मन की बात” अलग है। वे महंगाई की बात सुनना चाहते हैं, बेरोजगारी की, पेट्रोल-डीजल के दामों की, बेरोजगार युवाओं की। लेकिन मन की बात में ये विषय अक्सर “चुनौतीपूर्ण समय” या “वैश्विक परिस्थितियां” के खूबसूरत पैकेज में आते हैं। जब पड़ोस में युद्ध हो और ईंधन संकट की बात हो, तो भी “एकजुट रहें, अफवाहों से बचें” जैसा संदेश आता है। लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं – “सरकार को पता है कि अफवाहें फैला रहे हैं, लेकिन दाम क्यों नहीं कम हो रहे?”

 अंधभक्त भी अब “सिलेक्टिव” हो गए

यह सबसे मजेदार मोड़ है। जिन्हें “अंधभक्त” कहा जाता है, वे भी अब थक चुके हैं। पहले हर एपिसोड के बाद सोशल मीडिया पर “वाह मोदी जी वाह” के कमेंट्स की बाढ़ आ जाती थी। अब कई भक्त खुलकर कह रहे हैं – “भाई, रोज़ वही बातें। योग, आयुष, स्टार्टअप, महिला सशक्तिकरण... अच्छी बातें हैं, लेकिन रोज़ सुन-सुनकर कान पक गए।”

एक यूजर ने तो सीधा ट्वीट किया – “जब कोई हमारी मन की बात नहीं सुनता, तो हम उनकी मन की बात क्यों सुनें?” दूसरे ने लिखा – “मैं तो बिल्कुल नहीं सुनता।” तीसरा व्यंग्य करता है – “मन की बात सुनते-सुनते अब प्रधानमंत्री जी के मन की बात जानने लगी हूं।”

भक्तों का गुस्सा भी समझ में आता है। वे देख रहे हैं कि चुनावी वादे, रोज़गार, किसान की आय दोगुनी जैसी बातें अब मन की बात में कम आती हैं। बजाय इसके “वोकल फॉर लोकल”, “पंच प्राण”, “ऐतिहासिक उपलब्धियां” और थ्रोबैक क्लिप्स ज्यादा आती हैं। एक भक्त ने मुझसे कहा – “यार, 2014 में जो जोश था, वो अब कहाँ? अब लगता है जैसे कोई पुराना रिकॉर्ड दोहरा रहा हो।”

राष्ट्र के नाम संदेश... लेकिन राष्ट्र कहाँ है?

मन की बात का मूल उद्देश्य था – प्रधानमंत्री का आम लोगों से सीधा संवाद। लेकिन अब यह संवाद एकतरफा हो गया है। प्रधानमंत्री बोलते हैं, मंत्रालय फोटो-वीडियो जारी करता है, सरकारी अधिकारी और कार्यकर्ता “सुन रहे हैं” की तस्वीरें पोस्ट करते हैं। लेकिन असली श्रोता – किसान, मजदूर, छोटा व्यापारी, बेरोजगार युवा, गृहिणी – वे कहाँ हैं?

दिलचस्प यह है कि कार्यक्रम अब भी हर महीने की आखिरी रविवार को चलता है। 2026 में भी 130वीं, 131वीं, 132वीं कड़ी आईं। विषय बदलते हैं – कभी क्रिकेट जश्न, कभी रणजी ट्रॉफी, कभी स्टार्टअप, कभी मध्य पूर्व संकट। लेकिन टोन वही रहती है – सकारात्मक, प्रेरणादायक, और थोड़ी-बहुत “चुनौतियों” का जिक्र।

व्यंग्य यह है कि जब देश में बेरोजगारी, महंगाई, बेरोजगार युवाओं की संख्या करोड़ों में है, तब मन की बात में “क्वालिटी मैन्युफैक्चरिंग” और “AI इन एग्रीकल्चर” की चर्चा होती है। जब पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, तब “वैश्विक तनाव” का जिक्र आता है, लेकिन राहत की कोई ठोस बात नहीं। लोग पूछते हैं – “राष्ट्र के नाम संदेश है या सरकार के नाम आत्म-प्रशंसा?”

 क्यों हो रहा है यह बदलाव?

कारण कई हैं। 

पहला – ओवर-एक्सपोजर। 12 साल में 130+ एपिसोड हो गए। जो नया था, वह अब पुराना लगने लगा। 

दूसरा – सोशल मीडिया का युग। लोग अब 15 सेकंड के रील्स देखते हैं, 30 मिनट की लंबी “मन की बात” नहीं। टिकटॉक, इंस्टाग्राम, शॉर्ट्स ने धैर्य खत्म कर दिया है। 

तीसरा – वास्तविकता से दूरी। जब रोज़ की जिंदगी में दिक्कतें बढ़ रही हैं, तो सिर्फ़ अच्छी खबरें सुनना लोगों को फालतू लगने लगा है। 

चौथा – विपक्ष और स्वतंत्र मीडिया। अब हर एपिसोड के बाद तुरंत फैक्ट-चेक और काउंटर नैरेटिव आ जाता है। लोग दोनों तरफ सुनते हैं और अपना मन बना लेते हैं।

क्या मन की बात का भविष्य है?

सरकार कहती है – हाँ। यह “सबसे लोकप्रिय” कार्यक्रम है। लेकिन हकीकत में यह अब “सरकारी कार्यक्रम” बन गया है, न कि जन-संवाद। अगर वाकई लोकप्रिय बनाना है, तो कुछ बदलाव करने पड़ेंगे:

- विषयों में विविधता लाएं – सिर्फ़ सरकारी योजनाएं नहीं, आम जनता की असली समस्याएं भी शामिल करें।
- इंटरैक्टिव बनाएं – लोगों से लाइव सवाल लेने की व्यवस्था।
- क्षेत्रीय भाषाओं में ज्यादा फोकस – खासकर दक्षिण और पूर्वोत्तर में।
- छोटा और रोचक बनाएं – 30 मिनट की जगह 15-20 मिनट, ज्यादा स्टोरीटेलिंग।

नहीं तो यह कार्यक्रम “राष्ट्र के नाम संदेश” से “मंत्रालय के नाम रूटीन ब्रॉडकास्ट” बन जाएगा।

 अंत में एक व्यंग्य

प्रधानमंत्री जी अगर अगली मन की बात में कहें – “मेरे प्यारे देशवासियों, आज मैं आपसे पूछना चाहता हूँ – आप मेरी मन की बात सुनते क्यों नहीं?” तो शायद पूरा देश एक साथ जवाब दे – “सर, हमारी मन की बात सुन लीजिए तो हम भी सुन लेंगे।”

क्योंकि लोकतंत्र में संवाद दोतरफा होता है। एक तरफ से सिर्फ़ “मन की बात” होती रही, तो दूसरे तरफ “मन की चुप्पी” बढ़ती जाती है।

अब सवाल यह है – क्या मन की बात फिर से आम जनता और यहां तक कि भक्तों की भी “मन की बात” बन पाएगी? या यह सिर्फ़ एक पुरानी याद बनकर रह जाएगी – जब लोग वाकई सुनते थे, और प्रधानमंत्री की आवाज़ में उम्मीद जागती थी।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 19,2026