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Wednesday, 8 April 2026

महीने में तीन दिन अछूत, और चौथे दिन नहीं — ऐसा नहीं हो सकता”: जस्टिस बीवी नागरत्ना की सबरीमाला सुनवाई में तीखी टिप्पणी

महीने में तीन दिन अछूत, और चौथे दिन नहीं — ऐसा नहीं हो सकता”: जस्टिस बीवी नागरत्ना की सबरीमाला सुनवाई में तीखी टिप्पणी
-Friday World-April 8,2026
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक बार फिर सबरीमाला मंदिर विवाद सुर्खियों में है। 7 अप्रैल 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मामले की पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। केंद्र सरकार ने साफ कहा कि 28 सितंबर 2018 का फैसला गलत था, जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं पर मंदिर प्रवेश का प्रतिबंध हटा दिया गया था। 

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने एक महिला के नजरिए से एक ऐसी टिप्पणी की जो पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई। उन्होंने कहा — 

> “एक महिला होने के नाते मैं यह कह सकती हूं कि पीरियड्स के दौरान हर महीने तीन दिन के लिए किसी महिला को अछूत माना जाए और फिर चौथे दिन वो अछूत न रहे, ऐसा नहीं हो सकता।”

यह टिप्पणी अनुच्छेद 17 (छुआछूत का निषेध) के संदर्भ में आई, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले में की गई उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई जिसमें मंदिर में महिलाओं की उम्र-आधारित रोक को ‘छुआछूत’ करार दिया गया था।

2018 का फैसला और विवाद की जड़
सबरीमाला मंदिर केरल के पठानमथिट्टा जिले में स्थित भगवान अय्यप्पा का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। परंपरा के अनुसार, भगवान अय्यप्पा को ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ माना जाता है। इसी कारण मंदिर ट्रस्ट ने दशकों से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं (मासिक धर्म की उम्र) को प्रवेश देने से मना कर रखा था। 

2018 में सुप्रीम कोर्ट की 4:1 बहुमत वाली बेंच (जस्टिस दीपक मिश्रा, आर.एफ. नरीमन, डी.वाई. चंद्रचूड़ और ए.एम. खानविलकर के पक्ष में, जस्टिस इंदु मल्होत्रा के विरोध में) ने फैसला दिया कि यह प्रतिबंध असंवैधानिक है। अदालत ने कहा कि यह महिलाओं की समानता (अनुच्छेद 14), स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) और धर्म की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) का उल्लंघन है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी राय में इसे छुआछूत से जोड़ा और कहा कि यह महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक है।

इस फैसले के बाद केरल में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। लाखों श्रद्धालु सड़कों पर उतरे। कई महिलाएं मंदिर जाने की कोशिश में असफल रहीं। राजनीतिक दलों में भी गहरी विभाजन देखा गया।

2026 में पुनर्विचार: 9 जजों की पीठ क्यों?
2018 के फैसले के खिलाफ कई समीक्षा याचिकाएं दाखिल हुईं। 2019 में एक छोटी बेंच ने इसे बड़ी पीठ को रेफर कर दिया। अब 7 अप्रैल 2026 से मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह, आर. महादेवन, प्रसन्ना बी. वराले और जोयमल्या बागची की 9 जजों वाली बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।

सुनवाई 22 अप्रैल तक पूरी होने की उम्मीद है। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि 2018 का फैसला गलत था। उन्होंने कहा कि भारत पितृसत्तात्मक या जेंडर-स्टिरियोटाइप्ड समाज नहीं है जैसा पश्चिम समझता है। धार्मिक आस्था और आवश्यक धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) पर अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। 

मेहता ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 17 (छुआछूत) का मासिक धर्म या उम्र-आधारित प्रतिबंध से कोई संबंध नहीं है। इसी बिंदु पर जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी आई।

 जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी का महत्व
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, जो सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश बनने की प्रबल दावेदार मानी जाती हैं, ने बहुत साफ और भावुक शब्दों में कहा:

“अनुच्छेद 17 सबरीमाला के संदर्भ में कैसे लागू होगा, मुझे समझ नहीं आता। एक महिला के रूप में बोलते हुए, मैं कह सकती हूं कि हर महीने तीन दिन की छुआछूत नहीं हो सकती और चौथे दिन वह छुआछूत खत्म नहीं हो सकती।”

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का नाम देकर छिपाया जाए तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। यह टिप्पणी न सिर्फ मासिक धर्म को लेकर प्रचलित पुरानी मान्यताओं पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि संवैधानिक मूल्यों को कैसे व्यावहारिक और यथार्थवादी नजरिए से देखना चाहिए।

 सबरीमाला परंपरा: आस्था बनाम समानता
सबरीमाला मंदिर की परंपरा सदियों पुरानी है। भक्त मानते हैं कि अय्यप्पा स्वामी की ब्रह्मचर्य प्रतिज्ञा के कारण मासिक धर्म वाली महिलाओं का प्रवेश उनके लिए अनुचित है। महिलाएं 41 दिनों का व्रत रखकर, माला पहनकर, काला वस्त्र पहनकर आती हैं। कई महिलाएं खुद इस परंपरा का सम्मान करती हैं और कहती हैं कि यह उनके लिए कोई भेदभाव नहीं, बल्कि आस्था का हिस्सा है।

दूसरी ओर, समानता के पक्षधर कहते हैं कि कोई भी धार्मिक स्थल लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। महिलाओं को भी पुरुषों के समान पूजा-अर्चना का अधिकार होना चाहिए।

केंद्र सरकार ने अब तर्क दिया कि धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) को सीमित करने से पहले अदालत को बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। 

सुनवाई का व्यापक संदर्भ
यह सुनवाई सिर्फ सबरीमाला तक सीमित नहीं है। पीठ अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव वाले मामलों पर भी विचार कर रही है। इसमें दत्तात्रेय मंदिर, हाजी अली दरगाह (जिसमें पहले महिलाओं पर प्रतिबंध था) जैसे मामले शामिल हैं। 

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हर धार्मिक प्रथा को “तर्कसंगत” या “आधुनिक” मानदंडों से नहीं आंका जा सकता। भारत की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक बहुलता को समझना जरूरी है।

केरल सरकार, जो 2018 में महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करती थी, अब चुनावी मौसम में अपना रुख बदलकर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन कर रही है। यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 समाज में मासिक धर्म की छवि: एक गहरी जड़ें वाली समस्या
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी मासिक धर्म को लेकर भारतीय समाज में चली आ रही पुरानी सोच को चुनौती देती है। कई इलाकों में आज भी लड़कियों को पीरियड्स के दौरान अलग कमरे में रखा जाता है, मंदिर जाने से रोका जाता है या उन्हें “अशुद्ध” माना जाता है। 

यह प्रथा विज्ञान से कोसों दूर है। मासिक धर्म एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, न कि कोई अशुद्धि। फिर भी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताएं इसे अपवित्रता से जोड़ती रही हैं। 

जस्टिस नागरत्ना की बात सही दिशा में है — कोई भी प्रथा जो महिलाओं को अस्थायी रूप से “अछूत” घोषित करे, वह संवैधानिक मूल्यों से मेल नहीं खाती। लेकिन साथ ही, धार्मिक आस्था को भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।

 आगे क्या?
9 जजों की पीठ अब इस मामले में गहन बहस सुनेगी। सुनवाई 8 अप्रैल को भी जारी रही और आगे भी चलेगी। फैसला आने में समय लग सकता है, लेकिन यह फैसला सिर्फ सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा। यह तय करेगा कि भविष्य में अदालतें धार्मिक प्रथाओं में कितना हस्तक्षेप कर सकती हैं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की टिप्पणी एक महिला जज की संवेदना और संवैधानिक समझ दोनों को दर्शाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि छुआछूत जैसा गंभीर शब्द मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक प्रक्रिया पर लागू नहीं किया जा सकता, खासकर जब वह अस्थायी हो। 

सबरीमाला विवाद आस्था, समानता, परंपरा और संविधान के बीच का संतुलन खोजने का प्रयास है। चाहे जो भी फैसला आए, यह सुनिश्चित होना चाहिए कि महिलाओं की गरिमा, उनकी आस्था और उनकी समानता — तीनों का सम्मान हो। 

भारतीय समाज को मासिक धर्म को अब “अशुद्धि” की नजर से नहीं, बल्कि प्रकृति की देन के रूप में देखना चाहिए। शिक्षा, जागरूकता और संवेदनशीलता से ही पुरानी कुरीतियां दूर होंगी।

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई न सिर्फ कानूनी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है। देश इसकी प्रतीक्षा कर रहा है कि आखिरकार आस्था और समानता में सही संतुलन कैसे बनेगा।

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 8,2026