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Wednesday, 29 April 2026

चीन ने ताइवान पर दबाव बढ़ाया: पेंघू द्वीप समूह के पास भेजे दो युद्धपोत, ताइवान ने अलर्ट जारी किया

चीन ने ताइवान पर दबाव बढ़ाया: पेंघू द्वीप समूह के पास भेजे दो युद्धपोत, ताइवान ने अलर्ट जारी किया
-Friday World-April 29,2026 
नई दिल्ली, 29 अप्रैल 2026: दुनिया पहले से ही ईरान-अमेरिका तनाव की आग में जल रही है, उसी बीच पूर्वी एशिया में नया तनाव भड़क उठा है। चीन ने ताइवान स्ट्रेट में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दी हैं। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने घोषणा की है कि चीन के दो युद्धपोत — एक डिस्ट्रॉयर और एक फ्रिगेट— पेंघू द्वीप समूह के दक्षिण-पश्चिम जल क्षेत्र में घुस आए हैं। इस घटना के बाद ताइवान ने तत्काल अलर्ट जारी कर दिया और अपनी नौसेना तथा वायुसेना को सक्रिय कर दिया है।

यह घटना ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव चरम पर है। ईरान-अमेरिका संघर्ष अभी थमा नहीं है, उसी बीच चीन ताइवान पर अपना दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।

 पेंघू द्वीप समूह के पास चीनी युद्धपोतों की घुसपैठ

ताइवान के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, 27 अप्रैल की रात को पेंघू द्वीप समूह के दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में चीन का एक एडवांस्ड डिस्ट्रॉयर और एक जियांगकाई-II क्लास फ्रिगेट देखा गया। पेंघू द्वीप समूह ताइवान का महत्वपूर्ण सामरिक केंद्र है, जहां ताइवान की नौसेना और वायुसेना के बड़े ठिकाने स्थित हैं। यह क्षेत्र ताइवान स्ट्रेट के ताइवान पक्ष के बहुत करीब है।

ताइवान की सशस्त्र सेनाओं ने तुरंत इन चीनी जहाजों की निगरानी शुरू कर दी। नौसेना के जहाज और लड़ाकू विमानों को तैनात किया गया। रक्षा मंत्रालय ने इन युद्धपोतों की हवाई तस्वीरें भी जारी की हैं, हालांकि सुरक्षा कारणों से सटीक लोकेशन का खुलासा नहीं किया गया है।

ताइवान की सेना ने कहा कि उसने चीनी जहाजों के गठन की “कड़ी निगरानी” की और “उचित जवाब” दिया। हालांकि, इस जवाब की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।

 चीन की “ग्रे जोन” रणनीति

यह घटना चीन की लगातार “ग्रे जोन” रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और “एक चीन” सिद्धांत पर जोर देता है। पिछले कई वर्षों से चीन ताइवान के आसपास हवाई और समुद्री घुसपैठ बढ़ा रहा है। 

2025-26 में भी चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने ताइवान के आसपास बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इन गतिविधियों के जरिए ताइवान पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रखना चाहता है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह संदेश देना चाहता है कि ताइवान पर उसका दावा वैध है।

चीन का आधिकारिक रुख है कि ये गतिविधियां “नियमित प्रशिक्षण” का हिस्सा हैं और तनाव के लिए ताइवान की “स्वतंत्रता” की कोशिशें जिम्मेदार हैं। वहीं ताइवान सरकार बार-बार कह चुकी है कि ताइवान एक संप्रभु लोकतंत्र है और उसका भविष्य केवल ताइवान के लोगों द्वारा तय किया जाएगा।

 पेंघू द्वीप समूह की सामरिक अहमियत

पेंघू द्वीप समूह (Pescadores Islands) ताइवान के मुख्य द्वीप से पश्चिम में स्थित है। यह क्षेत्र ताइवान स्ट्रेट को नियंत्रित करने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां ताइवान की नौसेना और वायुसेना के प्रमुख अड्डे हैं। अगर चीन यहां अपनी उपस्थिति मजबूत करता है तो ताइवान की समुद्री आपूर्ति लाइनों पर खतरा बढ़ सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि चीन इन छोटी-छोटी घुसपैठों के जरिए ताइवान की रक्षा व्यवस्था को थका रहा है और भविष्य में बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

 वैश्विक संदर्भ: ईरान-अमेरिका तनाव और ताइवान

यह घटना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि दुनिया पहले से ही मध्य पूर्व में ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव से जूझ रही है। अमेरिका ताइवान का मजबूत समर्थक है और हाल के वर्षों में ताइवान को हथियारों की आपूर्ति बढ़ाई है। 

यदि चीन ताइवान पर आक्रामक रुख अपनाता है तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर संघर्ष को जन्म दे सकता है। कई विशेषज्ञ इसे “दो मोर्चों की जंग” की स्थिति से जोड़ रहे हैं — एक तरफ मध्य पूर्व, दूसरी तरफ इंडो-पैसिफिक।

ताइवान की तैयारियां और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

ताइवान लगातार अपनी रक्षा क्षमता बढ़ा रहा है। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ उसकी सैन्य और कूटनीतिक साझेदारी मजबूत हो रही है। ताइवान ने हाल के वर्षों में स्वदेशी हथियारों का विकास भी तेज किया है।

अमेरिका ने चीन की इन गतिविधियों की निंदा की है और ताइवान स्ट्रेट में शांति बनाए रखने की अपील की है। जापान और फिलीपींस जैसे देश भी चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर चिंता जता चुके हैं।

निष्कर्ष: बढ़ता तनाव और भविष्य की चुनौतियां

चीन द्वारा पेंघू द्वीप समूह के पास दो युद्धपोत भेजना ताइवान स्ट्रेट में तनाव का एक नया अध्याय है। हालांकि यह पहली बार नहीं है, लेकिन ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच यह घटना वैश्विक स्थिरता के लिए चिंता का विषय बन गई है।

ताइवान अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए दृढ़ है, जबकि चीन अपना “एक चीन” सिद्धांत थोपने की कोशिश कर रहा है। दोनों पक्षों के बीच बढ़ता यह सैन्य तनाव न केवल एशिया-प्रशांत क्षेत्र बल्कि पूरे विश्व की शांति को प्रभावित कर सकता है।

विश्व समुदाय अब इस बात पर नजर रखे हुए है कि क्या यह “ग्रे जोन” रणनीति आगे बढ़कर बड़े संघर्ष में बदलती है या कूटनीतिक प्रयासों से स्थिति नियंत्रण में रहती है।

भारत के लिए सबक:
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण संदेश देती है — मजबूत रक्षा क्षमता, स्वदेशी हथियार प्रणालियां (जैसे S-400, ब्रह्मोस आदि) और रणनीतिक साझेदारियों की जरूरत।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 29,2026