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Sunday, 12 April 2026

ईरान विश्वगुरु नहीं है, लेकिन झुकने वाला भी नहीं! मनचाहा टैरिफ लगाओ, फिर भी ईरान आँख में आँख डालकर दुश्मन से बात करेगा और किसी की करतूत कभी नहीं भूलेगा

ईरान विश्वगुरु नहीं है, लेकिन झुकने वाला भी नहीं! मनचाहा टैरिफ लगाओ, फिर भी ईरान आँख में आँख डालकर दुश्मन से बात करेगा और किसी की करतूत कभी नहीं भूलेगा-Friday World-April 12,2026

आज की दुनिया में जब अमेरिका जैसे महाशक्ति “मनचाहा टैरिफ” लगाकर दूसरे देशों को दबाने की कोशिश कर रही है, तब ईरान एक बार फिर साबित कर रहा है कि वह कोई साधारण देश नहीं है। ईरान विश्वगुरु नहीं है, लेकिन वह दबाव में दबने वाला भी नहीं है। चाहे कितने भी भारी-भरकम टैरिफ लगाए जाएँ, चाहे कितनी भी सख्त पाबंदियाँ थोपी जाएँ, तेहरान की नीति स्पष्ट है—आँख में आँख डालकर बात करना और दुश्मन की कोई करतूत भूलना नहीं।

दबाव की राजनीति और ईरान की अटलता

हाल के वर्षों में, खासकर 2025-2026 के दौरान, अमेरिकी प्रशासन ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए टैरिफ और सेकेंडरी सैंक्शंस का हथियार इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बार-बार चेतावनी दी कि जो भी देश ईरान से हथियार खरीदेगा या व्यापार करेगा, उसे अमेरिका में 25% से 50% तक अतिरिक्त टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर भी प्रतिबंधों की धमकी दी गई। फिर भी ईरान ने न तो घुटने टेके और न ही चुपचाप सहन किया।

ईरान की विदेश नीति हमेशा से “प्रतिरोध” (Resistance) पर आधारित रही है। जब अमेरिका-इजराइल ने 2026 की शुरुआत में ईरान पर हमले तेज किए, तो ईरान ने सिर्फ बचाव नहीं किया, बल्कि जवाबी कार्रवाई की। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी, तेल टैंकरों पर हमले और क्षेत्रीय सहयोगियों के जरिए दबाव बनाना—ये सब ईरान की उस रणनीति का हिस्सा थे जो कहती है कि हम कमजोर नहीं हैं।

ईरान जानता है कि वह विश्वगुरु नहीं है। उसके पास अमेरिका जितनी सैन्य या आर्थिक ताकत नहीं है, लेकिन उसके पास **इच्छाशक्ति, रणनीतिक धैर्य और क्षेत्रीय प्रभाव** है। पिछले चार दशकों से अमेरिकी सैंक्शंस झेलते हुए भी ईरान ने अपना परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय गठबंधन (जैसे हिजबुल्लाह, हमास, हूती) को मजबूत रखा। 2026 के संघर्ष में भी ईरान ने दिखाया कि वह अस्थायी युद्धविराम को स्वीकार कर सकता है, लेकिन स्थायी समाधान के बिना नहीं। उसने 10 सूत्रीय प्रस्ताव दिया, जिसमें स्थायी शांति, सैंक्शंस हटाना और क्षेत्रीय सुरक्षा शामिल थी।

 क्यों नहीं दबता ईरान?

1. ऐतिहासिक स्मृति: ईरान 1953 के CIA समर्थित तख्तापलट से लेकर 1980 के ईरान-इराक युद्ध और हाल के हमलों तक हर “करतूत” को याद रखता है। तेहरान की राजनीति में “भूलना” शब्द नहीं है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता एस्माइल बाग़ई ने साफ कहा कि अमेरिका की “वादाखिलाफी” और “अत्यधिक माँगें” कभी भुलाई नहीं जाएंगी।

2. आर्थिक लचीलापन: सैंक्शंस के बावजूद ईरान ने “प्रतिरोध अर्थव्यवस्था” (Resistance Economy) विकसित की। घरेलू उत्पादन, चीन-रूस जैसे वैकल्पिक साझेदार और तेल निर्यात के गैर-पारंपरिक रास्ते अपनाए। 2026 के युद्ध में होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण रखकर ईरान ने वैश्विक तेल कीमतों को प्रभावित किया, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर भी दबाव पड़ा।

3. रणनीतिक गहराई: ईरान सिर्फ अपने देश तक सीमित नहीं। वह क्षेत्रीय धुरी (Axis of Resistance) का केंद्र है। जब दुश्मन हमला करता है, तो जवाब सीधा या अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में आता है। यह नीति ईरान को “दबने” नहीं देती।

4. राष्ट्रीय गौरव और जनसमर्थन: ईरानी नेता और जनता दोनों “समर्पण नहीं, समझौता नहीं” का नारा लगाते हैं। युद्ध के दौरान भी तेहरान की सड़कों पर बड़ी भीड़ “अमेरिका के खिलाफ संघर्ष” का समर्थन करती दिखी।

 अमेरिका की टैरिफ नीति: शक्ति या कमजोरी?

अमेरिका का टैरिफ हथियार अब पुराना पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ और हथियार सप्लाई करने वालों पर 50% टैरिफ की धमकी दी। लेकिन परिणाम? वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ा, तेल की कीमतें ऊपर गईं, मुद्रास्फीति बढ़ी और अमेरिकी किसान-उद्योग भी प्रभावित हुए। 

ईरान इस खेल को समझता है। वह जानता है कि अमेरिका की “अधिकतम दबाव” नीति (Maximum Pressure) बार-बार असफल हुई है। 2018 से शुरू हुई इस नीति ने ईरान को कमजोर नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक आत्मनिर्भर बनाया। अब 2026 में भी जब युद्धविराम हुआ, तो ट्रंप ने सैंक्शंस राहत की बात की, लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया—**कोई अस्थायी राहत नहीं, स्थायी समाधान चाहिए**।

 भविष्य की राह: संवाद या संघर्ष?

ईरान विश्वगुरु नहीं है, इसलिए वह अनावश्यक रूप से युद्ध नहीं छेड़ता। लेकिन वह इतना नासमझ भी नहीं कि दुश्मन की हरकत को भूल जाए या दबाव में झुक जाए। हाल के वार्ताओं में ईरान ने परमाणु संवर्धन का अधिकार, सैंक्शंस हटाना और क्षेत्रीय सुरक्षा की माँग रखी। ये माँगें “अत्यधिक” नहीं, बल्कि संप्रभु राष्ट्र के अधिकार हैं।

दुनिया को समझना चाहिए कि ईरान जैसे देशों को सिर्फ टैरिफ या सैन्य धमकी से नहीं दबाया जा सकता। उन्हें सम्मानजनक संवाद से जोड़ा जा सकता है। अगर अमेरिका वाकई मध्य पूर्व में स्थिरता चाहता है, तो उसे अपना “अहंकार” (Ego) छोड़ना होगा। आज पूरी दुनिया अमेरिका-इजराइल अक्ष के खिलाफ खड़ी है, फिर भी अगर वाशिंगटन इजराइल का साथ देता रहेगा, तो संघर्ष जारी रहेगा।

ईरान की नीति साफ है—**आँख में आँख डालकर बात करो, लेकिन हमारी गरिमा और हितों का सम्मान करो**। हमारी कोई करतूत भुलाई नहीं जाएगी, चाहे वह पुरानी हो या नई।

 निष्कर्ष: ईरान की ताकत उसकी अटलता में है

ईरान कोई विश्वगुरु नहीं, लेकिन वह एक गर्वित, आत्मसम्मानपूर्ण राष्ट्र है जो दबाव में नहीं झुकता। मनचाहा टैरिफ लगाओ, सैंक्शंस थोपो, हमले करो—फिर भी ईरान खड़ा रहेगा। क्योंकि उसकी ताकत सिर्फ तेल या मिसाइलों में नहीं, बल्कि उसके लोगों की इच्छाशक्ति, नेतृत्व की दूरदर्शिता और इतिहास की याद में है।

जो देश अपनी करतूतों को भूलने को मजबूर करते हैं, वे कभी स्थायी दोस्ती नहीं बना पाते। ईरान इस सबक को अच्छी तरह समझता है। इसलिए वह दुश्मन से भी आँख मिलाकर बात करता है और कहता है—**हम तैयार हैं संवाद के लिए, लेकिन समर्पण के लिए नहीं**।

यह ईरान की कहानी है—न दबने वाली, न भूलने वाली। 
Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 12,2026