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Friday, 10 April 2026

“पाकिस्तान ने पूरी सभ्यता बचा ली!” – न्यूयॉर्क टाइम्स का फ्रंट पेज, जबकि भारत का विदेश मंत्री इसे ‘दलाली’ बता रहा है

“पाकिस्तान ने पूरी सभ्यता बचा ली!” – न्यूयॉर्क टाइम्स का फ्रंट पेज, जबकि भारत का विदेश मंत्री इसे ‘दलाली’ बता रहा है
-Friday World-April 10,2026 
जब दुनिया के सबसे प्रभावशाली अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने फ्रंट पेज पर हेडलाइन लगाई – “Pakistan Saved an Entire Civilization!” – तो पूरी दुनिया ने एक पल के लिए रुककर सोचा। अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते का युद्धविराम (ceasefire) पाकिस्तान की मध्यस्थता से संभव हुआ, जिससे संभावित तीसरे विश्व युद्ध की आशंका टल गई। ट्रंप ने खुद स्वीकार किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से बातचीत के बाद उन्होंने हमले रोकने का फैसला लिया।

लेकिन वहीं गांधी और बुद्ध की भूमि भारत में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तान की इस भूमिका को “दलाली” करार दिया। एक ऑल-पार्टी मीटिंग में उन्होंने कहा, “भारत दलाल देश नहीं है।” यह बयान न केवल पाकिस्तान के प्रति तीखा है, बल्कि वैश्विक कूटनीति के बदलते समीकरणों पर भारत की असहजता को भी उजागर करता है।

 कैसे पाकिस्तान बन गया शांति का दूत?

अप्रैल 2026 की शुरुआत में मिडिल ईस्ट तनाव अपने चरम पर था। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को चेतावनी दी थी कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज** नहीं खोला गया तो “पूरी सभ्यता मिट जाएगी”। दुनिया की पांचवां तेल गुजरने वाला यह जलमार्ग बंद होने की कगार पर था। तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था धराशायी होने की आशंका थी।

इसी बीच पाकिस्तान ने आखिरी घड़ी में कदम उठाया। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक अपील की और ट्रंप से दो हफ्ते का समय मांगा। पाकिस्तानी राजनयिकों ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच बैकचैनल टॉक चलाए। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका भी अहम रही। नतीजा? अमेरिका और ईरान दोनों ने दो हफ्ते के युद्धविराम पर सहमति जताई। ईरान ने होर्मुज खोलने की गारंटी दी और बातचीत के लिए इस्लामाबाद को मंच बनाया गया।

न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जजीरा, गार्डियन, ब्लूमबर्ग और रॉयटर्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने पाकिस्तान की इस सफलता को “अप्रत्याशित कूटनीतिक जीत” बताया। कई रिपोर्टों में लिखा गया कि पाकिस्तान ने न केवल युद्ध रोका, बल्कि पूरी सभ्यता को बचाया। ट्रंप ने अपने पोस्ट में स्पष्ट रूप से शरीफ और मुनीर का जिक्र किया। ईरान ने भी पाकिस्तान की मध्यस्थता को स्वीकार किया।

जयशंकर का ‘दलाली’ वाला बयान और भारत की असहजता

इसी दौरान भारत में ऑल-पार्टी मीटिंग हुई। विपक्ष ने जब पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठाया तो विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा, “भारत दलाल देश नहीं है। हम मध्यस्थता करने वाले या फिक्सर नहीं बनेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान अमेरिका द्वारा 1981 से इस्तेमाल होता आ रहा है।

यह बयान भारत की विदेश नीति की एक पुरानी सोच को दर्शाता है – “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” और “नॉन-इंटरवेंशन”। भारत ने हमेशा बड़े संघर्षों में प्रत्यक्ष मध्यस्थता से दूर रहने की कोशिश की है। लेकिन इस बार जब पाकिस्तान वैश्विक मंच पर शांति दूत के रूप में उभरा, तो भारत की चुप्पी और जयशंकर का तीखा बयान दोनों ने ध्यान खींचा।

विश्लेषकों का कहना है कि भारत की यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक पहुंच से असहजता दर्शाती है। पाकिस्तान के पास अमेरिका, चीन, सऊदी अरब और ईरान – सभी के साथ चैनल खुले हैं। वहीं भारत ने इजरायल के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे, जिससे ईरान और अरब देशों के साथ बैलेंस बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया।

 शांति मध्यस्थता ‘दलाली’ है या कूटनीति?

दुनिया में मध्यस्थता को हमेशा सम्मान की नजर से देखा जाता है। नॉर्वे, स्विट्जरलैंड, कतर और तुर्की जैसी छोटी-बड़ी ताकतें बार-बार शांति वार्ताओं का मंच बनती रही हैं। पाकिस्तान ने इस बार अपनी भौगोलिक स्थिति, अमेरिका से पुराने संबंध और ईरान के साथ सांस्कृतिक-धार्मिक जुड़ाव का फायदा उठाया।

जयशंकर का “दलाली” शब्द इस्तेमाल करना कई लोगों को अजीब लगा। कूटनीति में मध्यस्थता कोई शर्म की बात नहीं, बल्कि रणनीतिक कौशल है। अगर पाकिस्तान ने युद्ध रोककर तेल आपूर्ति बहाल की और वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत दी, तो इसे नकारात्मक तरीके से देखना उचित नहीं लगता।

भारत के लिए यह एक सबक भी हो सकता है। गांधी और बुद्ध की परंपरा शांति और अहिंसा की है। अगर भारत चाहे तो दक्षिण एशिया, अफ्रीका या अन्य क्षेत्रों में शांति की भूमिका निभा सकता है। लेकिन “हम दलाल नहीं” वाली मानसिकता बड़े खिलाड़ी बनने में बाधक बन सकती है।

 आगे क्या?

अभी ceasefire नाजुक है। इस्लामाबाद में होने वाली बातचीत में अमेरिका और ईरान के बीच कई मुद्दे बाकी हैं – यूरेनियम संवर्धन, मिसाइल कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रॉक्सी और प्रतिबंध हटाना। अगर ये बातचीत सफल हुई तो पाकिस्तान की कूटनीतिक हैसियत और मजबूत होगी। अगर फेल हुई तो फिर तनाव बढ़ सकता है।

भारत को इस घटनाक्रम से सीख लेनी चाहिए। वैश्विक राजनीति में चुप रहना हमेशा फायदेमंद नहीं होता। सक्रिय, संतुलित और प्रभावी कूटनीति की जरूरत है। पाकिस्तान को “दलाल” कहकर भारत ने अपनी निराशा जाहिर की, लेकिन दुनिया इसे पाकिस्तान की सफलता के रूप में देख रही है।

: जब न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार पाकिस्तान को “पूरी सभ्यता बचाने वाला” बता रहे हों, तो भारत को आत्मचिंतन करना चाहिए। शांति की मध्यस्थता दलाली नहीं, बल्कि जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान है। गांधी और बुद्ध के देश को शांति का दूत बनना चाहिए, न कि सिर्फ टिप्पणी करने वाला।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 10,2026