-Friday World-April 30,2026
23 अप्रैल 2026 की रात बेन गुरियन एयरपोर्ट पर जब 240 से अधिक बनी मेनाशे (Bnei Menashe) सदस्य भारत से उतरे, तो इज़राइल सरकार ने इसे “खोई हुई जनजाति की घर वापसी” बताया। लेकिन सवाल उठ रहे हैं — क्या यह सिर्फ धार्मिक वापसी है या इज़राइल की रणनीतिक जरूरत का हिस्सा? सस्ता लेबर, फ्री में मिलने वाले आर्मी के जवान, और उत्तर इज़राइल (गलील) में यहूदी आबादी बढ़ाने की कोशिश — ये वो असली वजहें हैं जो इस “ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन” के पीछे काम कर रही हैं।
नवंबर 2025 में इज़राइल सरकार ने 2030 तक लगभग 5,800 बचे हुए बनी मेनाशे सदस्यों को लाने की योजना मंजूर की। 2026 के अंत तक 1,200 लोगों के आने का लक्ष्य है। पहला बैच 240 लोगों का आ चुका है, और अगले हफ्तों में और उड़ानें आने वाली हैं। ज्यादातर इन नए इमिग्रेंट्स को **नोफ हागलील** और गलील क्षेत्र में बसाया जाएगा।
बनी मेनाशे की कहानी: प्राचीन दावा या सुविधाजनक पहचान?
बनी मेनाशे खुद को बाइबिल की “दस खोई हुई जनजातियों” में से जनजाति मनाशे का वंशज मानते हैं। सदियों पहले असीरियन निर्वासन के बाद वे भारत के मणिपुर और मिजोरम तक पहुंच गए। 19वीं सदी में ईसाई बनने के बावजूद उन्होंने कुछ यहूदी रीति-रिवाज बनाए रखे। 2005 में लंबी बहस के बाद इज़राइल के धार्मिक अधिकारियों ने उन्हें यहूदी स्वीकार कर लिया और अलियाह (यहूदी वापसी) का रास्ता खोला।
अब तक करीब 5,000 बनी मेनाशे इज़राइल पहुंच चुके हैं। नया प्लान बाकी बचे सदस्यों को लाने का है। लेकिन कई आलोचक कहते हैं कि धार्मिक आस्था के नाम पर इज़राइल अपनी जनसांख्यिकीय और आर्थिक जरूरतें पूरी कर रहा है।
असली वजह 1: सस्ता लेबर और आर्थिक फायदा
इज़राइल में युद्ध और सुरक्षा स्थिति के कारण श्रम बाजार पर दबाव है। फिलिस्तीनी मजदूरों पर निर्भरता कम करने की कोशिश में सरकार वैकल्पिक स्रोत ढूंढ रही है। बनी मेनाशे, जो मुख्य रूप से कृषि, निर्माण, छोटे व्यवसाय और सेवा क्षेत्र में काम करते हैं, इज़राइल के लिए सस्ते और अनुशासित लेबर का स्रोत साबित हो रहे हैं।
कुछ भारतीय और अंतरराष्ट्रीय टिप्पणीकार इसे खुलकर “लो कॉस्ट लेबर इंपोर्ट” कहते हैं। इज़राइल में स्थानीय आबादी महंगे वेतन और आरामदेह नौकरियों की ओर आकर्षित होती है, जबकि ये नए आप्रवासी मेहनतकश काम करने को तैयार रहते हैं। सरकार उन्हें उड़ान, हिब्रू शिक्षा, आवास और प्रारंभिक सहायता देती है — लंबे समय में यह निवेश रिटर्न देता है।
असली वजह 2: फ्री में मिलने वाले IDF सैनिक
यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। बनी मेनाशे समुदाय में सैन्य सेवा की दर बहुत ऊंची है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सैन्य उम्र के लगभग 99% युवा पुरुष IDF (इज़राइल डिफेंस फोर्स) में भर्ती होते हैं। कई कॉम्बैट यूनिट्स में सेवा कर रहे हैं। अक्टूबर 2023 के बाद से सैकड़ों बनी मेनाशे सैनिकों ने हमास और हिजबुल्लाह के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लिया।
इज़राइल के लिए यह “फ्री” सैनिक हैं — वे न सिर्फ सेवा करते हैं बल्कि देश के प्रति गहरी निष्ठा रखते हैं। युद्ध के समय जब रिजर्विस्ट्स की जरूरत बढ़ जाती है, ऐसे समर्पित आप्रवासी इज़राइल की सुरक्षा को मजबूत करते हैं। कई युवा बनी मेनाशे इज़राइल आने का सपना इसलिए देखते हैं ताकि वे IDF में शामिल हो सकें और “अपने यहूदी भाई-बहनों” के साथ लड़ सकें।
असली वजह 3: जनसांख्यिकी और गलील को यहूदी बनाने की रणनीति
इज़राइल की जन्म दर यहूदियों में अपेक्षाकृत ऊंची है (लगभग 3.0+ प्रति महिला), लेकिन लगातार युद्ध, आतंकवाद और आर्थिक दबाव के कारण अतिरिक्त आबादी की जरूरत महसूस की जा रही है। 2025 में इज़राइल की कुल जनसंख्या वृद्धि दर 1% से नीचे आ गई, जो कई दशकों का निचला स्तर है। सुरक्षा स्थिति और युद्ध के कारण उत्तर इज़राइल (गलील) से कई परिवार दक्षिण या केंद्र की ओर शिफ्ट हो रहे हैं।
गलील क्षेत्र में अरब आबादी का अनुपात ऊंचा है। सरकार बार-बार यहूदी आबादी बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं चलाती रही है। बनी मेनाशे को यहां बसाने का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा लगता है। नोफ हागलील जैसे शहरों में उन्हें बसाकर क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है। आलोचक इसे “जनसांख्यिकीय इंजीनियरिंग” कहते हैं — धार्मिक वापसी के आवरण में बस्तियों और सीमावर्ती इलाकों को मजबूत करना।
भारतीय समुदाय पर मौत का खतरा: इज़राइल में नई चुनौतियां
भारत में मणिपुर-मिजोरम की जातीय हिंसा में बनी मेनाशे पहले ही प्रभावित हुए हैं — उनके घर, सिनागॉग जलाए गए, कई परिवार विस्थापित हुए। इज़राइल आने को वे सुरक्षित भविष्य मानते हैं। लेकिन हकीकत अलग है।
इज़राइल में आतंकवादी हमलों, रॉकेट हमलों और सड़क दुर्घटनाओं (रैमिंग अटैक्स) का खतरा बना रहता है। बनी मेनाशे समुदाय के कुछ सदस्य पहले ही IDF में सेवा करते हुए शहीद हो चुके हैं। गलील और वेस्ट बैंक के नजदीक बसने पर उन्हें सीधे खतरे का सामना करना पड़ सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में नए आप्रवासियों को “आउटसाइडर” के रूप में देखा जाता है, और युद्ध के समय सामाजिक तनाव बढ़ जाता है।
भारत सरकार ने इज़राइल के लिए ट्रैवल एडवाइजरी जारी रखी हुई है। फिर भी सैकड़ों परिवार अपना सब कुछ छोड़कर इज़राइल जा रहे हैं — आस्था, बेहतर आर्थिक अवसर और सुरक्षा की तलाश में। लेकिन क्या इज़राइल उन्हें वास्तविक सुरक्षा और समानता दे पाएगा, या वे सिर्फ जनसांख्यिकी और अर्थव्यवस्था के लिए इस्तेमाल किए जाएंगे?
संतुलित नजरिया और आगे की राह
इज़राइल की आधिकारिक लाइन साफ है — यह “अलियाह” नीति का हिस्सा है, दुनिया भर के यहूदियों को घर लाना उनका राष्ट्रीय और धार्मिक कर्तव्य है। बनी मेनाशे की कहानी सदियों पुरानी आस्था और पहचान की तलाश को दर्शाती है। कई नए आप्रवासी जल्दी ही इज़राइली समाज में घुल-मिल जाते हैं, हिब्रू सीखते हैं और देश की रक्षा में योगदान देते हैं।
दूसरी तरफ, आलोचना भी जायज है। जब कोई देश बड़े पैमाने पर एक खास समुदाय को लाता है, तो धार्मिक कारणों के साथ-साथ रणनीतिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय गणना भी होती है। सस्ता लेबर, उच्च सैन्य भर्ती दर, और गलील जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में आबादी संतुलन — ये तथ्य इज़राइल की जरूरतों से सीधे जुड़े हैं।
भारतीय नजरिए से यह उत्तर-पूर्व के एक अनोखे समुदाय की दर्दनाक यात्रा है। मणिपुर-मिजोरम की अस्थिरता से भागकर वे हजारों किलोमीटर दूर एक युद्ध प्रभावित देश में नए खतरे का सामना करने जा रहे हैं। कुछ परिवारों के लिए यह सपनों की पूर्ति हो सकती है, तो कई के लिए सांस्कृतिक अलगाव और सुरक्षा की अनिश्चितता।
बेन गुरियन एयरपोर्ट पर उतरते वे 240 चेहरे सिर्फ बैग नहीं, सदियों की आस्था, मेहनत और उम्मीद साथ लाए हैं। इज़राइल उन्हें “भाई” कहकर स्वागत कर रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि ये नए नागरिक इज़राइल की अर्थव्यवस्था, सेना और जनसांख्यिकी को तुरंत मजबूती देंगे।
क्या यह खोई हुई जनजाति की सच्ची वापसी है या आधुनिक समय की रणनीतिक जरूरतों का चतुर इस्तेमाल? बहस जारी रहेगी। लेकिन एक बात तय है — बनी मेनाशे की यह यात्रा अब सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य आयाम वाली बड़ी कहानी बन चुकी है।
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 30,2026