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Saturday, 18 April 2026

यह विशेषाधिकार का दुरुपयोग है, प्रधानमंत्री जी!राष्ट्र के नाम संबोधन का राजनीतिक दुरुपयोग: महिलाओं का सम्मान या चुनावी चाल?

यह विशेषाधिकार का दुरुपयोग है, प्रधानमंत्री जी!
राष्ट्र के नाम संबोधन का राजनीतिक दुरुपयोग: महिलाओं का सम्मान या चुनावी चाल?
-Friday World-April 19,2026 
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन एक गंभीर और पवित्र अवसर माना जाता है। यह संकट के समय एकता का संदेश देने के लिए, राष्ट्रीय उपलब्धियों को साझा करने के लिए या देशवासियों को प्रेरित करने के लिए होता आया है। लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा दिए गए राष्ट्र के नाम संबोधन ने इस परंपरा को नया मोड़ दे दिया। विपक्षी दलों पर तीखे हमले, बार-बार एक ही बात का दोहराव और तथ्यों से परे आरोपों का पुलिंदा – यह सब सरकारी खर्च पर, टेलीप्रॉम्प्टर के सहारे राष्ट्र के नाम संदेश के रूप में पेश किया गया।

क्या यह वाकई राष्ट्र को संबोधन था या चुनावी रणनीति का हिस्सा? सवाल उठना लाजमी है।

### 2023 का ऐतिहासिक विधेयक: क्या हुआ था?

सितंबर 2023 में संसद के विशेष सत्र के दौरान **नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण विधेयक)** लोकसभा और राज्यसभा में भारी बहुमत से पारित हुआ था। लोकसभा में 454-2 के विशाल अंतर से और राज्यसभा में सर्वसम्मति से यह विधेयक पास हुआ। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जी ने 28 सितंबर 2023 को इस पर सहमति प्रदान की। यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लगभग एक-तिहाई (33%) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान करता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि संविधान या संसदीय नियमों में किसी पारित विधेयक को दोबारा पारित करने की कोई अनिवार्यता नहीं है। संशोधन किया जा सकता है, लेकिन मूल विधेयक को फिर से पारित करने की जरूरत नहीं पड़ती। फिर भी, अप्रैल 2026 में सरकार ने एक नया संवैधानिक संशोधन विधेयक (131वां संशोधन) पेश किया, जिसका उद्देश्य 2029 के चुनावों में आरक्षण लागू करना बताया गया। 

हालांकि, मूल 2023 के अधिनियम में स्पष्ट प्रावधान है कि आरक्षण **अगली जनगणना के बाद सीमा निर्धारण (delimitation)** के पूरा होने के बाद ही प्रभावी होगा। 16 अप्रैल 2026 को सरकार ने मूल अधिनियम को अधिसूचित कर दिया, लेकिन कार्यान्वयन अभी भी जनगणना और delimitation पर निर्भर है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार महिलाओं को आरक्षण देने की बजाय राजनीतिक बिसात बिछाने में लगी है – उत्तर-दक्षिण राज्यों के बीच जनसंख्या आधारित सीटों के पुनर्निर्धारण से जुड़े विवाद को लेकर।

### राष्ट्र के नाम संबोधन: तथ्य vs दोहराव

प्रधानमंत्री के संबोधन में विपक्ष पर लगाए गए आरोपों में कई बार एक ही वाक्य दोहराए गए। महिलाओं के साथ “अन्याय” का जिक्र बार-बार आया, लेकिन मूल मुद्दे पर स्पष्टता कम थी। अगर विपक्ष को कोसना ही था, तो इसे “राष्ट्र के नाम संदेश” का नाम क्यों दिया गया? सरकारी संसाधनों का उपयोग करके चुनावी भाषण देना क्या उचित है?

विपक्ष का कहना है कि 2023 का विधेयक पहले ही पास हो चुका है। उसे लागू करने में देरी क्यों? क्या मंशा महिलाओं को सशक्त बनाना है या 2029 के चुनावों में फायदे की राजनीति? महिलाएं इन बारीकियों को अच्छी तरह समझ रही हैं। वे जानती हैं कि आरक्षण का वादा पुराना है, लेकिन जमीन पर उतरने में देरी लगातार हो रही है।

पंचायत और नगरपालिका स्तर पर महिलाओं को 33% आरक्षण पहले से मिला हुआ है और उसने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। संसद और विधानसभाओं में भी यही होना चाहिए, लेकिन बिना राजनीतिक खेल के।

### महिलाओं की समझ: बरगलावे से परे

भारतीय महिलाएं आज शिक्षित, जागरूक और सशक्त हैं। वे जानती हैं कि आरक्षण मात्र कागजी घोषणा नहीं, बल्कि वास्तविक प्रतिनिधित्व है। अगर सरकार की मंशा सच्ची होती, तो 2023 के बाद तुरंत delimitation की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती या स्पष्ट समयसीमा तय की जाती। 

विपक्षी दलों ने भी विधेयक के खिलाफ वोट किया, जिसे सरकार ने “महिलाओं पर अन्याय” बताया। लेकिन सच्चाई यह है कि राजनीतिक दलों के बीच विश्वास की कमी और delimitation से जुड़े क्षेत्रीय असंतुलन (उत्तर भारत में सीटें बढ़ने का मुद्दा) इस विवाद की जड़ हैं। 

महिलाएं इस खेल को समझती हैं। वे न तो भाजपा के नारे से बहक रही हैं और न ही विपक्ष के आरोपों से। वे चाहती हैं कि आरक्षण जल्द से जल्द लागू हो, बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के। 

### लोकतंत्र की मजबूती: विशेषाधिकार का सम्मान

प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधित करने का अधिकार निर्विवाद है। लेकिन जब यह अधिकार चुनावी हमलों के लिए इस्तेमाल होता है, तो सवाल उठता है – क्या यह लोकतंत्र की भावना के अनुरूप है? राष्ट्र के नाम संबोधन को तथ्यों पर आधारित, एकता का संदेश देने वाला बनाना चाहिए, न कि विभाजनकारी भाषण।

महिला आरक्षण एक राष्ट्रीय मुद्दा है, न कि किसी एक पार्टी का। 30 साल से लंबित इस मुद्दे पर सभी दलों को मिलकर काम करना चाहिए। देरी का खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। 

**समाधान का रास्ता:** 
- मूल 2023 अधिनियम को सम्मान दें।
- delimitation की प्रक्रिया को निष्पक्ष और समयबद्ध बनाएं।
- महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए ठोस कदम उठाएं, न कि सिर्फ भाषण।

महिलाएं इंतजार नहीं कर रही हैं – वे मांग कर रही हैं। भारत की आधी आबादी को उनका हक मिलना चाहिए, बिना किसी राजनीतिक चालबाजी के। 

यह विशेषाधिकार का दुरुपयोग न हो, बल्कि लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक बने। महिलाओं का भविष्य राजनीति से ऊपर है।

Sajjadali Nayani ✍
 Friday World-April 19,2026