-Friday World-April 11,2026
भारत की आदिवासी भूमि पर एक पुरानी लेकिन दर्दनाक कहानी बार-बार दोहराई जा रही है। ओडिशा के रायगड़ा और कालाहांडी ज़िलों में सिजिमली (सिजिमाली या तिजमाली) पहाड़ियों से लेकर देश के अन्य आदिवासी क्षेत्रों तक, जहाँ-जहाँ विकास के नाम पर खनन और औद्योगिक परियोजनाएँ आगे बढ़ रही हैं, वहीं आदिवासियों के जल, जंगल और ज़मीन पर हमला तेज हो रहा है। सिजिमली पहाड़ी, जो घने जंगलों और बक्साइट के भंडार से भरी है, आज आदिवासियों के लिए अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक बन गई है। यहां वेदांता लिमिटेड जैसी कंपनियों को खनन पट्टा दिया जा रहा है, जबकि स्थानीय **कोंध, परोजा** और अन्य आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से इन पहाड़ियों पर निर्भर हैं।
ये पहाड़ियाँ सिर्फ़ ज़मीन नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। यहां से नदियाँ निकलती हैं, जंगल फल-फूल और औषधियाँ देते हैं, और ज़मीन आजीविका का स्रोत है। लेकिन विकास के नाम पर इनका सौंपा जाना आदिवासियों के हक़ पर सीधा हमला है।
सिजिमली का संघर्ष: 365 दिनों से अधिक की अनथक लड़ाई
सिजिमली बक्साइट ब्लॉक में वेदांता को फरवरी 2023 में पसंदीदा बोलीदाता घोषित किया गया। परियोजना लगभग 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है, जिसमें 708 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि शामिल है। अनुमान है कि इससे 140 से अधिक आदिवासी परिवार विस्थापित होंगे। ग्राम सभाओं की सहमति के बिना प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, जिसके खिलाफ़ आदिवासी लगातार विरोध कर रहे हैं।
दिसंबर 2023 से ही सिजिमली के गांवों में पुलिस की भारी तैनाती, कथित फर्जी ग्राम सभाओं और जबरन सहमति के आरोप लग रहे हैं। मार्च 2024 में आदिवासियों ने 365 दिनों से अधिक का विरोध दर्ज किया। हाल ही में अप्रैल 2026 में रोड निर्माण को लेकर हुए संघर्ष में दर्जनों ग्रामीण और पुलिसकर्मी घायल हुए। आदिवासी कहते हैं, “हम सिजिमली पहाड़ियों के बिना अपनी कल्पना नहीं कर सकते।” ये पहाड़ियाँ उनके लिए पवित्र हैं और पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा।
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (PESA) 1996 और अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम 2006 (FRA) स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अनुसूचित क्षेत्रों में निजी खनन या भूमि अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की पूर्व सहमति अनिवार्य है। लेकिन आरोप है कि इन कानूनों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। फर्जी ग्राम सभा, दबाव और पुलिस कार्रवाई के माध्यम से विरोध को कुचला जा रहा है।
वन संरक्षण अधिनियम में हालिया संशोधनों ने भी ‘वन’ की परिभाषा को सीमित कर दिया, जिससे ग्राम सभा की सहमति की आवश्यकता कम हो गई। नतीजा? कॉरपोरेट को आसानी से रास्ता मिल रहा है।
ओडिशा से पूरे देश तक: एक ही पैटर्न
ओडिशा में यह कहानी नई नहीं। नियामगिरि की डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने वेदांता के खिलाफ़ दशकों तक संघर्ष किया और जीत हासिल की। लेकिन अब सिजिमली उसी नियामगिरि की गूँज है। कालाहांडी, रायगड़ा, कोरापुट जैसे क्षेत्रों में बक्साइट, ग्रेफाइट और अन्य खनिजों के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं।
देश के अन्य हिस्सों में भी यही तस्वीर है। छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों में खनन परियोजनाओं के कारण विस्थापन की घटनाएँ आम हैं। अनुमान है कि 1951 से 1995 तक विकास परियोजनाओं से विस्थापित हुए 60 मिलियन लोगों में से करीब 40% आदिवासी थे। आज भी लाखों आदिवासी परिवार अपनी ज़मीन, जंगल और आजीविका खो रहे हैं।
FRA के तहत व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता में ओडिशा ने कुछ प्रगति की है, लेकिन समुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकारों और आदत अधिकारों में बड़ी कमी बनी हुई है। कई दावे खारिज हो जाते हैं, कागजी प्रक्रिया जटिल है, और वन विभाग का विरोध जारी रहता है। भाजपा शासित राज्यों में FRA लागू करने का रिकॉर्ड औसत से नीचे रहा है।
विकास का मॉडल: किसके लिए?
सरकारें “विकास” का नारा लगाती हैं। रोज़गार, बुनियादी ढांचा और आर्थिक प्रगति का वादा किया जाता है। लेकिन सवाल यह है — यह विकास किसके लिए? आदिवासियों को विस्थापित कर कॉरपोरेट को खनिज सौंपने से कौन फायदा उठाता है?
विस्थापित परिवारों को अक्सर अपर्याप्त मुआवजा और पुनर्वास मिलता है। वे अपनी पारंपरिक आजीविका (वन उत्पाद, खेती, पशुपालन) खो देते हैं और शहरों के झुग्गी-झोपड़ियों में पहुँच जाते हैं। पर्यावरणीय नुकसान भी भारी है — जंगल कटते हैं, नदियाँ प्रदूषित होती हैं, जैव विविधता नष्ट होती है, और जल संकट बढ़ता है। सिजिमली जैसे क्षेत्रों में पहाड़ियों से निकलने वाली नदियाँ सूख सकती हैं, जिसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा।
भाजपा की सरकारों पर आरोप है कि वे कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दे रही हैं। केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर खनन नीतियाँ उदार बनाई गई हैं। वहीं, आदिवासी विरोध को “माओवाद” या “विकास विरोधी” करार देकर दबाने की कोशिश की जाती है। हाल के वर्षों में सिजिमली में गिरफ्तारियाँ, धमकियाँ और पुलिस कार्रवाई इसके उदाहरण हैं।
राष्ट्रपति पद और वास्तविकता
द्रौपदी मुर्मू, जो एक आदिवासी महिला हैं, भारत की राष्ट्रपति बनीं। भाजपा इसे आदिवासी सशक्तिकरण का प्रतीक बताती है। निस्संदेह यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व अकेले पर्याप्त नहीं। जब ज़मीन छीनी जा रही हो, जंगल काटे जा रहे हों और विरोध दबाया जा रहा हो, तो एक आदिवासी राष्ट्रपति का होना उन “पापों” को नहीं छिपा सकता जो नीति स्तर पर हो रहे हैं।
आदिवासियों की असली सशक्तिकरण तब होगा जब उनके कानूनी अधिकार — PESA, FRA, पांचवीं अनुसूची — पूरी तरह लागू हों। जब ग्राम सभाएँ फैसले लें, न कि प्रशासन या कॉरपोरेट। जब विकास का मतलब स्थानीय समुदायों की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण हो, न कि सिर्फ़ GDP के आंकड़े।
क्या है समाधान?
1. FRA और PESA का सख्ती से पालन: हर खनन या विकास परियोजना के लिए ग्राम सभा की मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति (FPIC) अनिवार्य हो। फर्जी ग्राम सभाओं की जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई हो।
2. वन अधिकारों की पूर्ण मान्यता: व्यक्तिगत, सामुदायिक और आदत अधिकारों को तेजी से सुलझाया जाए। ओडिशा सहित सभी राज्यों में CFR अधिकारों पर विशेष अभियान चलाया जाए।
3. पारदर्शी पुनर्वास नीति: विस्थापितों को केवल मुआवजा नहीं, बल्कि समान या बेहतर आजीविका, सांस्कृतिक संरक्षण और पर्यावरणीय मुआवजा मिले।
4. पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन: EIA रिपोर्टों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ाई जाए और स्वतंत्र विशेषज्ञों द्वारा जांच हो।
5. विकल्पी विकास मॉडल: खनन पर अंधाधुंध निर्भरता कम कर स्थानीय संसाधनों (वन उत्पाद, पर्यटन, जैविक खेती) पर आधारित सतत विकास को बढ़ावा दिया जाए।
6. न्यायिक और प्रशासनिक जवाबदेही: विरोध करने वालों पर झूठे मामले न दर्ज हों। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग जैसी संस्थाएँ सक्रिय भूमिका निभाएँ।
अंत में: आवाज़ उठाते रहना ज़रूरी है
जल, जंगल, ज़मीन किसी सरकार या कॉरपोरेट की संपत्ति नहीं है। यह आदिवासियों का सांवैधानिक और नैतिक अधिकार है। संविधान की पांचवीं अनुसूची, PESA और FRA इसी सिद्धांत पर टिके हैं कि आदिवासी क्षेत्र स्वशासन का हक रखते हैं।
सिजिमली के आदिवासी, नियामगिरि के डोंगरिया कोंध और देश भर के संघर्षरत समुदाय हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ़ चुनाव नहीं, बल्कि लोगों की आवाज़ है। जब तक आदिवासी अपनी ज़मीन से बेदखल होते रहेंगे, विकास का दावा खोखला रहेगा।
हम इस अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाते रहेंगे। क्योंकि अगर आज सिजिमली बच गई, तो कल पूरा पर्यावरण और सांस्कृतिक विविधता बचेगी। विकास तभी सार्थक है जब वह सबसे कमज़ोर को भी साथ लेकर चले — न कि उन्हें कुचलकर।
जल-जंगल-ज़मीन: आदिवासियों का हक़, राष्ट्र का गौरव।
इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।✊
Sajjadali Nayani ✍
Friday World-April 11,2026