Breaking

यमन ने सऊदी अरब के सामने रखी अजीब शर्त, यमनियों की जाल में फंसा रियाज़...

Monday, 13 April 2026

ट्प और वेंस की सारी कोशिशें बेकार, हंगरी में 'अमेरिका-परस्त' नेता की हार ने वैश्विक दक्षिणपंथी राजनीति को हिला दिया

ट्प और वेंस की सारी कोशिशें बेकार, हंगरी में 'अमेरिका-परस्त' नेता की हार ने वैश्विक दक्षिणपंथी राजनीति को हिला दिया
-Friday World-April 14,2026 
अमेरिका को एक और बड़ा झटका — 16 साल तक सत्ता संभालने वाले विक्टर ऑर्बन चुनाव हार गए!

14 अप्रैल 2026 को हंगरी की संसदीय चुनावों में एक ऐतिहासिक उलटफेर हुआ है। देश के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन (Viktor Orbán), जो पिछले 16 साल से लगातार सत्ता में थे, को भारी हार का सामना करना पड़ा है। विपक्षी तिस्ज़ा पार्टी (Tisza Party) के नेता पीटर माग्यार (Péter Magyar) ने भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की है। ऑर्बन ने खुद इस हार को “दर्दनाक लेकिन स्पष्ट” बताते हुए हार स्वीकार कर ली।

यह हार सिर्फ हंगरी की घरेलू राजनीति नहीं है। यह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) के लिए भी एक बड़ा राजनीतिक झटका है। कुछ दिन पहले ही जेडी वेंस खुद हंगरी गए थे और ऑर्बन के लिए खुलकर प्रचार किया था। ट्रंप ने भी फोन पर रैली को संबोधित कर ऑर्बन को अपना पूरा समर्थन दिया था। लेकिन हंगरी की जनता ने इन सब को नकार दिया।
विक्टर ऑर्बन कौन थे और क्यों माने जाते थे ‘अमेरिका-परस्त’?
विक्टर ऑर्बन को यूरोप का सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाला नेता कहा जाता था। उनकी फिदेज़ पार्टी (Fidesz) ने 2010 से लगातार चार चुनाव जीते थे। वे ‘इलिबरल डेमोक्रेसी’ (illiberal democracy) के बड़े समर्थक थे — अर्थात लोकतंत्र का नाम लेकर राष्ट्रवाद, ईसाई मूल्यों, प्रवासियों के विरोध और ब्रुसेल्स (EU) के खिलाफ मजबूत रुख अपनाते थे।

अमेरिका में ट्रंप और MAGA आंदोलन के लिए ऑर्बन एक प्रेरणा स्रोत थे। वे रूस के राष्ट्रपति पुतिन के भी करीबी माने जाते थे। हंगरी में उन्होंने मीडिया, न्यायपालिका और शिक्षा पर मजबूत नियंत्रण स्थापित किया था। कई आलोचक उन्हें “यूरोप का ट्रंप” कहते थे। 

हंगरी की राजनीति में ऑर्बन की भूमिका को भारतीय संदर्भ में समझें तो वे हंगरी की ‘बीजेपी’ जैसे माने जाते थे — राष्ट्रवादी, सांस्कृतिक मूल्यों पर जोर देने वाले और विपक्ष को कमजोर करने वाले। लेकिन इस बार भ्रष्टाचार, महंगाई, युवाओं में बेरोजगारी और यूरोपीय संघ से रिश्तों की खराबी ने उनकी हार का बड़ा कारण बना।

 जेडी वेंस का हंगरी दौरा — आखिरी कोशिश जो नाकाम रही
चुनाव से महज कुछ दिन पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस हंगरी पहुंचे। उन्होंने ऑर्बन के साथ रैली की, उन्हें “यूरोप के सच्चे राजनेताओं में से एक” बताया और ब्रुसेल्स की आलोचना की। ट्रंप ने भी दूर से समर्थन दिया। यह दौरा स्पष्ट रूप से ऑर्बन को जिताने के लिए था। 

लेकिन नतीजा उल्टा निकला। रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत के साथ हंगरी की जनता ने बदलाव का संदेश दिया। तिस्ज़ा पार्टी को दो-तिहाई बहुमत मिलने की संभावना है, जबकि फिदेज़ पार्टी बुरी तरह पिछड़ गई। पीटर माग्यार, जो खुद कभी ऑर्बन के करीबी थे लेकिन बाद में अलग हो गए, ने प्रो-यूरोपीय, भ्रष्टाचार-मुक्त और लोकतांत्रिक हंगरी का वादा किया है।

यह हार ट्रंप प्रशासन के लिए दूसरा बड़ा झटका है। हंगरी जैसे छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश में अमेरिका का प्रभाव कमजोर पड़ता दिख रहा है।

 वैश्विक प्रभाव — यूरोप, रूस और भारत के लिए क्या मायने रखता है?
ऑर्बन की हार यूरोपीय संघ (EU) के लिए राहत की खबर है। ऑर्बन EU की नीतियों को बार-बार वीटो करते थे, खासकर यूक्रेन युद्ध और प्रवासी नीति पर। नई सरकार के आने से ब्रुसेल्स के साथ हंगरी के संबंध सुधर सकते हैं।

रूस के लिए यह नुकसान है क्योंकि ऑर्बन पुतिन के सबसे करीबी यूरोपीय नेताओं में से एक थे। अब हंगरी NATO और EU के साथ और करीब आ सकता है।

भारत के लिए भी यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है। भारत ने ऑर्बन सरकार के साथ अच्छे संबंध बनाए थे, खासकर ऊर्जा, रक्षा और व्यापार क्षेत्र में। नई सरकार के साथ भारत को अपनी विदेश नीति को थोड़ा समायोजित करना पड़ सकता है। लेकिन भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति (सभी के साथ संतुलित संबंध) को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

यह चुनाव दर्शाता है कि राष्ट्रवादी पॉपुलिज्म की लहर भी हमेशा नहीं चलती। जब जनता को महंगाई, भ्रष्टाचार और लोकतंत्र की चिंता सताती है, तो वह बदलाव चुन लेती है — भले ही सत्ता में कोई कितना भी मजबूत क्यों न दिख रहा हो।

क्या सीख मिलती है?
विक्टर ऑर्बन की 16 साल की सत्ता का अंत कई सबक देता है:
- विदेशी समर्थन (ट्रंप-वेंस) हमेशा घरेलू जनता को प्रभावित नहीं करता।
- भ्रष्टाचार और सत्ता के लंबे समय तक कब्जे से लोग ऊब जाते हैं।
- युवा और महिलाओं का वोट निर्णायक साबित होता है।
- ‘इलिबरल’ मॉडल की भी सीमाएं होती हैं।

ट्रंप प्रशासन के लिए यह एक चेतावनी है। हंगरी में हार के बाद अमेरिका को यूरोप में अपने प्रभाव को नए सिरे से मजबूत करने की जरूरत पड़ेगी।

हंगरी में विक्टर ऑर्बन की हार अमेरिका के लिए एक और झटका है। 16 साल की तानाशाही जैसी सत्ता का अंत हुआ है। पीटर माग्यार की जीत हंगरी में नई सुबह का संकेत दे रही है। लेकिन वैश्विक राजनीति में यह बदलाव सिर्फ हंगरी तक सीमित नहीं रहेगा। 

यह घटना याद दिलाती है कि लोकतंत्र में आखिरकार जनता ही सबसे बड़ी ताकत होती है। चाहे नेता कितना भी शक्तिशाली क्यों न लगे, जनता जब फैसला कर लेती है तो कोई नहीं रोक पाता।

ट्रंप और उनकी टीम अब सोच रही होगी — अगला झटका कहां से आएगा?

Sajjadali Nayani ✍ 
Friday World-April 14,2026